पाठ का सारांश
द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी द्वारा रचित कविता ‘इतने ऊँचे उठो’ नई पीढ़ी को संकीर्णताओं से ऊपर उठकर एक सुंदर और समतावादी समाज बनाने का संदेश देती है।
प्रथम पद्य
इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।
देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से,
सिंचित करो धरा, समता की भाव-वृष्टि से,
जाति भेद की, धर्म-वेश की, काले-गोरे रंग-द्वेष की,
ज्वालाओं से जलते जग में,
इतने शीतल बहो कि जितना मलय पवन है।
व्याख्या –
कवि बच्चों को प्रेरित करते हुए कहते हैं कि तुम्हें अपने विचारों में आकाश की तरह ऊँचा उठना चाहिए। जिस प्रकार आकाश सबको समान रूप से ढकता है, वैसे ही तुम भी पूरी दुनिया को भेदभाव रहित एक समान दृष्टि से देखो। समाज में फैली जाति, धर्म, वेशभूषा और रंग-भेद की नफरत रूपी आग को बुझाने के लिए तुम्हें मलय पर्वत से आने वाली शीतल हवा की तरह बहना चाहिए। अर्थात्, तुम्हें संसार के द्वेष को अपनी शीतलता और समानता के भाव से शांत करना है।
द्वितीय पद्य
नए हाथ से, वर्तमान का रूप सँवारो,
नई तूलिका से चित्रों के रंग उभारो,
नए राग को नूतन स्वर दो, भाषा को नूतन अक्षर दो,
युग की नई मूर्ति-रचना में,
इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है।
व्याख्या –
कवि चाहते हैं कि नई पीढ़ी अपनी नई सोच से वर्तमान समाज का रूप बदल दे, जैसे चित्रकार नई तूलिका (ब्रश) से सुंदर चित्र बनाता है, वैसे ही तुम जीवन के रंगों को निखारो। नए युग के निर्माण के लिए नई भाषा और नए स्वर का संचार करो। कवि का संदेश है कि नए युग की रचना करते समय तुम्हें मौलिक (Original) बनना होगा। तुम्हारी रचना में वही मौलिकता होनी चाहिए जो स्वयं प्रकृति के ‘सृजन’ (Creation) में होती है, न कि किसी की नकल।
तृतीय पद्य
लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है,
जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है,
तोड़ो बंधन, रुके न चिंतन, गति, जीवन का सत्य चिरंतन,
धारा के शाश्वत प्रवाह में,
इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।
व्याख्या –
कवि कहते हैं कि हमें अपने इतिहास या ‘अतीत’ से केवल वही बातें लेनी चाहिए जो हमारे विकास के लिए लाभदायक हों। पुरानी, सड़ी-गली परंपराओं से चिपके रहना प्रगति में बाधक है और यह मृत्यु के समान है। प्रगति के लिए बंधनों को तोड़ना और निरंतर ‘चिंतन’ करना आवश्यक है। जीवन का शाश्वत सत्य ‘गति’ है। अतः तुम्हें परिवर्तन की तरह गतिशील बनना चाहिए, क्योंकि परिवर्तन ही संसार का नियम है और जड़ता पतन का कारण।
चतुर्थ पद्य
चाह रहे हम इस धरती को स्वर्ग बनाना,
अगर कहीं हो स्वर्ग, उसे धरती पर लाना।
सूरज, चाँद, चाँदनी, तारे, सब हैं प्रतिपल साथ हमारे,
दो कुरूप को रूप सलोना,
इतने सुंदर बनो कि जितना आकर्षण है।
व्याख्या –
कवि का लक्ष्य इस धरती को ही ‘स्वर्ग’ के समान सुंदर और सुखी बनाना है। वे कहते हैं कि प्रकृति की शक्तियाँ जैसे – सूरज, चाँद, तारे हर पल हमारे साथ हैं। हमें अपनी अच्छाई और ऊँचे विचारों से समाज की बुराइयों और कुरूपता को सुंदरता में बदलना चाहिए। कवि अंत में कहते हैं कि तुम्हें अपने विचारों और कार्यों में उतना सुंदर और आकर्षक बनना चाहिए जितना स्वयं ‘आकर्षण’ होता है।
मुख्य संदेश
यह कविता सिखाती है कि प्रगति के लिए पुरानी रूढ़ियों को छोड़ना, समानता का भाव रखना और निरंतर गतिशील रहना अनिवार्य है।
कठिन शब्दार्थ
धरा – पृथ्वी / धरती Earth
समता – समानता / बराबरी Equality
दृष्टि – नज़र / देखने का नज़रिया Vision / Sight
सिंचित – सींचा हुआ Irrigated / Watered
द्वेष – ईर्ष्या / शत्रुता का भाव Malice / Hatred
ज्वाला – लपट / आग Flame
मलय पवन – मलय पर्वत से आने वाली शीतल हवा Fragrant / Cool breeze
तूलिका – कूंची / ब्रश Paintbrush
नूतन – नया / नवीन New / Modern
मौलिक – वास्तविक / असली Original
सृजन – निर्माण / रचना Creation
अतीत – बीता हुआ समय / इतिहास Past
पोषक – पालन करने वाला / शक्ति देने वाला Nutritious / Nourishing
जीर्ण-शीर्ण – सड़ा-गला / पुराना Dilapidated / Worn out
द्योतक – प्रतीक / सूचना देने वाला Indicator / Symbolic
चिरंतन – प्राचीन / हमेशा रहने वाला Eternal / Perennial
शाश्वत – सदा रहने वाला Perpetual / Everlasting
गतिमय – गतिशील / चलता हुआ Mobile / Dynamic
प्रतिपल – हर क्षण / हर समय Every moment
कुरूप – जो दिखने में सुंदर न हो Ugly
सलोना – सुंदर / प्यारा Beautiful / Charming
आकर्षण – खिंचाव / मनमोहक गुण Attraction
विशेष मुहावरे और शब्द युग्म
एक दृष्टि से देखना – बिना भेदभाव के सबको समान समझना।
सृष्टि की रचना – नया संसार बनाना।
सांसारिक वैमनस्य – दुनिया में फैली आपसी कड़वाहट या दुश्मनी।
मौखिक – 1. उच्चारण कीजिए –
दृष्टि, वृष्टि, सृजन, मृत्यु, द्वेष, पोषक, द्योतक, शाश्वत, धर्म, जीर्ण-शीर्ण, वर्तमान, मूर्ति, परिवर्तन
दृष्टि – Drish-ti – ‘दृ’ के लिए ‘D’ के साथ ‘Ri’ (ऋ) की ध्वनि निकालें।
वृष्टि – Vrish-ti – ‘वृ’ को ‘Vri’ की तरह बोलें।
सृजन – Sri-jan – “इसे ‘Sree-jan’ नहीं – बल्कि ‘Sri-jan’ बोलें।”
मृत्यु – Mrit-yu – ‘मृ’ को ‘Mri’ और ‘त्यु’ को छोटा और तेज़ बोलें।
द्वेष – Dvay-sh – ‘द’ और ‘व’ को मिलाकर ‘Dve’ जैसा उच्चारण करें।
पोषक – Po-shak – ‘ष’ के लिए जीभ को तालु के पीछे ले जाकर ‘Sha’ बोलें।
द्योतक – Dyo-tak – ‘द’ और ‘य’ को जोड़कर ‘Dyo’ बोलें।
शाश्वत – Shaash-vat – “पहले ‘Shaa’ को लंबा खींचें – फिर ‘sh-vat’ बोलें।”
धर्म – Dhar-ma – ‘र’ को ‘म’ के ऊपर जल्दी से बोलें।
जीर्ण-शीर्ण – Jeern-Sheern – ‘ण’ के उच्चारण के लिए जीभ को ऊपर मोड़ें।
वर्तमान – Var-ta-maan – ‘र’ की ध्वनि ‘त’ से पहले हल्की सी आएगी।
मूर्ति – Moor-ti – ‘मू’ को लंबा खींचें और ‘र’ को ‘ति’ के साथ जोड़ें।
परिवर्तन – Pa-ri-var-tan – ‘र’ को ‘व’ के ऊपर झटके से बोलें।
- निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर बताइए-
(क) कवि पृथ्वी को किन भावों की रचना से सींचना चाहता है?
उत्तर – कवि पृथ्वी को समता अर्थात् समानता के भावों की वर्षा से सींचना चाहता है।
(ख) कवि नए राग और नई भाषा को क्या देना चाहता है?
उत्तर – कवि नए राग को नूतन स्वर और नई भाषा को नूतन अक्षर देना चाहते हैं।
(ग) कवि ने जीर्ण-शीर्ण के मोह को कैसा कहा है?
उत्तर – कवि ने जीर्ण-शीर्ण अर्थात् पुरानी सड़ी-गली परंपराओं के मोह को मृत्यु का द्योतक या प्रतीक कहा है।
लिखित
- सही उत्तर पर ✓ लगाइए-
(क) कवि सारी दुनिया को कैसे देखना चाहता है?
(i) जाति भेद से
(ii) धर्म-वेश से ✓
(iii) एक दृष्टि से
(iv) राग-द्वेष से
(ख) कवि हमें किसमें मौलिक बनने को कह रहा है?
(i) चित्रों के रंगों में
(ii) नई मूर्ति रचना में ✓
(iii) स्वयं सृजन में
(iv) राग के स्वरों में
- निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
(क) कविता में संसार को किन ज्वालाओं से जलता हुआ बताया गया है?
उत्तर – कविता में संसार को जाति-भेद, धर्म-वेश और काले-गोरे रंग-द्वेष की ज्वालाओं से जलता हुआ बताया गया है।
(ख) नए निर्माण के युग में कवि क्या-क्या करने के लिए कह रहा है?
उत्तर – नए निर्माण के युग में कवि वर्तमान का रूप सँवारने, नई तूलिका से रंगों को उभारने, नए राग को स्वर देने और युग की नई मूर्ति-रचना में मौलिक बनने के लिए कह रहा है।
(ग) कविता में कुरूप को सलोना रूप देने में किस-किस को हमारे साथ बताया गया है?
उत्तर – कविता में कुरूप को सलोना रूप देने में सूरज, चाँद, चाँदनी और तारे को हर पल हमारे साथ बताया गया है।
- कविता से शब्द चुनकर रिक्त स्थान भरिए-
(क) वर्तमान का रूप नए हाथ से सँवारा जाएगा।
(ख) कवि हमें स्वयं सृजन जितना मौलिक बनाना चाहता है।
(ग) कवि आकर्षण जितना सुंदर बनने की प्रेरणा दे रहा है।
अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न
निम्नलिखित कवितांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
लो अतीत से उतना ही जितना पोषक है,
जीर्ण-शीर्ण का मोह मृत्यु का ही द्योतक है।
तोड़ो बंधन, रुके न चिंतन,
गति जीवन का सत्य चिरंतन
धारा के शाश्वत प्रवाह में,
इतने गतिमय बनो कि जितना परिवर्तन है।
(क) अतीत से कितना लेने के लिए कहा गया है?
उत्तर – अतीत से उतना ही लेने के लिए कहा गया है जितना हमारे विकास के लिए लाभदायक हो।
(ख) जीवन का चिरंतन सत्य किसे बताया है?
उत्तर – जीवन का चिरंतन सत्य ‘गति’ को बताया गया है।
(ग) उपरोक्त पंक्तियों में परिवर्तन से किस शिक्षा को लेने के लिए कहा है?
उत्तर – इन पंक्तियों में परिवर्तन से यह शिक्षा लेने को कहा गया है कि हमें हमेशा गतिशील रहना चाहिए और बदलाव को स्वीकार करना चाहिए।
जीवन मूल्यपरक प्रश्न
‘इतने ऊँचे उठो’ कविता के आधार पर लिखिए कि कवि संसार को अच्छा बनाने के लिए क्या-क्या करने की प्रेरणा दे रहा है?
उत्तर – कवि संसार को अच्छा बनाने के लिए निम्नलिखित प्रेरणा दे रहे हैं –
- भेदभाव और द्वेष से ऊपर उठकर सबको एक समान दृष्टि से देखना।
- समाज में व्याप्त नफरत की आग को शीतलता और प्रेम से शांत करना।
- पुरानी बेकार परंपराओं को त्यागकर नवीनता और मौलिकता को अपनाना।
- निरंतर गतिशील रहकर प्रगति के पथ पर आगे बढ़ना।
भाषा ज्ञान
- निम्नलिखित विकल्पों में जो परस्पर पर्यायवाची नहीं हैं उन पर x लगाइए-
(क) आकाश – विस्तार X (गगन, नभ, अंबर सही हैं)
(ख) पृथ्वी – मैदान X (धरा, वसुधा, अचला सही हैं)
(ग) चाँद – रात्रि X (शशि, इंदु, चंद्रमा सही हैं)
(घ) सूरज – प्रकाश X (भानु, दिनकर, सूर्य सही हैं)
- निम्नलिखित शब्दों से चुनकर विलोम शब्द लिखिए-
उष्ण, अधर्म, अतीत, जन्म, पुरातन, स्वर्ग
(क) धर्म x अधर्म
(ख) नरक x स्वर्ग
(ग) वर्तमान x अतीत
(घ) मृत्यु x जन्म
(ङ) शीतल x उष्ण
(च) नूतन x पुरातन
- सोचकर चार ऐसे शब्द लिखिए जिनमें ‘ऋ’ की मात्रा का प्रयोग किया गया हो-
- ‘ऋ’ की मात्रा वाले चार शब्द-
वृक्ष
कृषक
मृग
गृह
- ‘प्रतिपल’ शब्द प्रति + पल से बना है। निम्नलिखित शब्दों में ‘प्रति’ लगाकर नए शब्द बनाइए-
(क) प्रति + दिन – प्रतिदिन
(ख) प्रति + व्यक्ति – प्रतिव्यक्ति
(ग) प्रति + क्षण – प्रतिक्षण
(घ) प्रति + एक – प्रत्येक
रोचक क्रियाकलाप
- अपनी दादी जी / नानी जी को पत्र लिखकर बताइए कि इस कविता से आपने क्या सीखा?
उत्तर – दिनांक – 18 फरवरी, 2026
घर संख्या – W-414
टीसीआई, राउरकेला
ओड़िशा
आदरणीय दादी जी,
(सादर चरण स्पर्श!)
मैं यहाँ कुशल हूँ और आपकी कुशलता की कामना करता हूँ। आज मैंने स्कूल में द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी की एक बहुत सुंदर कविता ‘इतने ऊँचे उठो’ पढ़ी। इस कविता से मैंने सीखा कि हमें समाज में फैले जाति, धर्म और रंग-रूप के भेदभाव से ऊपर उठना चाहिए। कवि ने सिखाया है कि हमें पुरानी और सड़ी-गली परंपराओं को छोड़कर हमेशा गतिशील रहना चाहिए और नई दुनिया के निर्माण में अपना योगदान देना चाहिए। मैंने यह भी सीखा कि हमें अपनी धरती को स्वर्ग जैसा सुंदर बनाने का प्रयास करना चाहिए।
शेष सब सामान्य है। आप अपना ख्याल रखिएगा। दादा जी को मेरा प्रणाम कहिएगा।
आपका पोता
अविनाश
- अपने आस-पास आपको कौन-कौन सी बुराइयाँ दिखाई देती हैं? आप उन्हें कैसे दूर कर सकते हैं?
उत्तर – हमें अपने आस-पास कई बुराइयाँ दिखाई देती हैं, जिन्हें हम कविता की प्रेरणा से दूर कर सकते हैं –
भेदभाव – लोग अक्सर धर्म या जाति के आधार पर एक-दूसरे से नफरत करते हैं। हम सबको ‘एक दृष्टि’ से देखकर और समानता का व्यवहार करके इसे दूर कर सकते हैं।
पुरानी रूढ़ियाँ – समाज में कई ऐसी परंपराएँ हैं जो प्रगति में बाधक हैं। हमें केवल उन्हीं बातों को अपनाना चाहिए जो हमारे विकास के लिए ‘पोषक’ हों।
ईर्ष्या और द्वेष – लोग एक-दूसरे की उन्नति देखकर जलते हैं। हम ‘मलय पवन’ की तरह शीतल बनकर और सबके प्रति प्रेम भाव रखकर इसे समाप्त कर सकते हैं।
गंदगी और कुरूपता – पर्यावरण के प्रति लापरवाही एक बड़ी बुराई है। हम सुंदर कर्मों और जागरूकता से अपनी धरती को ‘स्वर्ग’ जैसा सुंदर बना सकते हैं।
गृहकार्य
पाठ से कोई पाँच संज्ञा शब्द चुनकर उनका अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
- गगन – गगन में पंछी उड़ रहे हैं।
- धरा – हमें अपनी धरा को हरा-भरा रखना चाहिए।
- सूरज – सूरज पूर्व से निकलता है।
- दुनिया – यह दुनिया बहुत सुंदर है।
- बंधन – हमें रूढ़ियों के बंधन तोड़ने चाहिए।

