Tulsi ke Dohe (Padya) – Class IX, Hindi Reader, Hindi Book, Tamilnadu State Board, The Best Solutions.

गोस्वामी तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास का जन्म सोलहवीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश के राजापुर नामक गाँव में हुआ। वे अपने समय के पहुँचे हुए विद्वान तथा महान संत थे। वे श्रीराम के अनन्य भक्त थे। उसी भक्ति से प्रेरित होकर उन्होंने ‘रामचरित मानस’ की रचना की। इस ग्रंथ ने गोस्वामी जी को अमर बना दिया। ‘रामचरित मानस’ के अलावा उन्होंने और भी कई ग्रंथ लिखे हैं।

तुलसी के दोहे

  1. दया धर्म को मूल है, पाप मूल अभिमान।

तुलसी दया न छाँडिए, जब लग घट में प्राण॥  

  1. पर सुख – संपति देखि सुनि, जरहि जे जड़ बिनु आगि।

तुलसी तिन के भाग ले चलै भलाई भागि॥

  1. तुलसी काया खेत है, मनसा भये किसान।

पाप पुण्य दोउ बीज है, बुबै सो लुनै निदान॥

  1. गोधन, गजधन, बाजिधन और रतनधन खान।

जब आवै संतोष धन सब धन धूरि समान॥

  1. आवत ही हरषै नही, नैनन नहीं सनेह।

तुलसी तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह॥

  1. काम क्रोध मद लोभ की, जौलौ मन में खान।

तौलौं पंडित मूरख सो, तुलसी एक समान॥

तुलसी के दोहे  व्याख्या सहित

  1. दया धर्म को मूल है, पाप मूल अभिमान।

तुलसी दया न छाँडिए, जब लग घट में प्राण॥

प्रसंग – यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित है। इसमें उन्होंने धर्म और पाप के मूल को स्पष्ट करते हुए मानवीय कर्तव्य का संदेश दिया है।

 

व्याख्या – तुलसीदास जी कहते हैं कि दया (करुणा) ही समस्त धर्मों की जड़ या मूल आधार है, जबकि अभिमान (अहंकार) सभी प्रकार के पापों की जड़ है। इसलिए, व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने शरीर में प्राण रहते तक कभी भी दया के भाव को न त्यागे। इसका अर्थ है कि मनुष्य को जीवन भर दयावान बने रहना चाहिए, क्योंकि यही परम धर्म है।

 

  1. पर सुख – संपति देखि सुनि, जरहि जे जड़ बिनु आगि।

तुलसी तिन के भाग ले चलै भलाई भागि॥

प्रसंग – इस दोहे में तुलसीदास ने ईर्ष्या (जलन) की भावना और उसके नकारात्मक परिणामों पर प्रकाश डाला है।

 

व्याख्या – तुलसीदास जी कहते हैं कि जो मूर्ख (जड़) लोग दूसरों के सुख और संपत्ति को देखकर बिना आग के ही अंदर-ही-अंदर जलते (ईर्ष्या करते) रहते हैं, उन लोगों के भाग्य (किस्मत) से भलाई (शुभता या कल्याण) स्वयं ही दूर भाग जाती है। भाव यह है कि ईर्ष्या का भाव रखने वाले कभी सुखी नहीं रह सकते और उनका स्वयं का भी कल्याण नहीं होता।

 

  1. तुलसी काया खेत है, मनसा भये किसान।

पाप पुण्य दोउ बीज है, बुबै सो लुनै निदान॥

प्रसंग – इस दोहे में कर्म के सिद्धांत (जैसी करनी वैसी भरनी) को खेती के रूपक द्वारा समझाया गया है।

 

व्याख्या – तुलसीदास जी कहते हैं कि यह मनुष्य का शरीर (काया) एक खेत के समान है, और हमारा मन ही उस खेत का किसान है। पाप और पुण्य दोनों ही उस खेत के बीज हैं। मनुष्य किसान बनकर जो बीज (कर्म) बोएगा, उसे अंत में (निदान) वही काटना (फल पाना) पड़ेगा। यह दोहा कर्मफल की अनिवार्यता पर बल देता है।

 

  1. गोधन, गजधन, बाजिधन और रतनधन खान।

जब आवै संतोष धन सब धन धूरि समान॥

प्रसंग – इस दोहे में तुलसीदास ने संतोष नामक गुण को सभी भौतिक संपत्तियों से श्रेष्ठ बताते हुए उसकी महिमा का वर्णन किया है।

 

व्याख्या – तुलसीदास कहते हैं कि गाय रूपी धन, हाथी रूपी धन, घोड़ा रूपी धन, और रत्नों से भरी खान (खजाना)—ये सभी धन महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं, परंतु जब व्यक्ति को संतोष रूपी धन प्राप्त हो जाता है, अर्थात् वह तृप्त हो जाता है, तब ये सभी प्रकार के भौतिक धन उसके लिए मिट्टी (धूल) के समान हो जाते हैं। भाव यह है कि संतोष सबसे बड़ा धन है।

 

  1. आवत ही हरषै नही, नैनन नहीं सनेह।

तुलसी तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह॥

प्रसंग – इस दोहे में तुलसीदास ने मान-सम्मान और प्रेम के महत्त्व को धन-संपत्ति से कहीं अधिक बताया है।

 

व्याख्या – तुलसीदास जी कहते हैं कि जिस स्थान पर आपके आते ही लोग प्रसन्न न हों और आँखों में प्रेम (स्नेह) का भाव न हो, हे तुलसी! वहाँ कभी नहीं जाना चाहिए, भले ही उस जगह पर सोने की वर्षा क्यों न हो रही हो। तात्पर्य यह है कि जहाँ आत्म-सम्मान और स्नेह न मिले, वहाँ भौतिक लाभ के लिए भी जाना व्यर्थ है।

 

  1. काम क्रोध मद लोभ की, जौलौ मन में खान।

तौलौं पंडित मूरख सो, तुलसी एक समान॥

प्रसंग – इस दोहे में तुलसीदास ने मन के विकारों और ज्ञान के बीच के संबंध को स्पष्ट किया है।

 

व्याख्या – तुलसीदास जी कहते हैं कि जब तक किसी व्यक्ति के मन में काम (वासना), क्रोध, मद (अहंकार) और लोभ रूपी विकारों की खान (भंडार) मौजूद है, तब तक वह विद्वान (पंडित) होकर भी मूर्ख के एक समान ही माना जाता है। भाव यह है कि सच्चा ज्ञान तभी फलदायी होता है जब मन इन दुर्गुणों से मुक्त हो।

 

कठिन शब्दार्थ

 

शब्द (Word)

हिंदी अर्थ (Hindi Meaning)

தமிழ் அர்த்தம் (Tamil Meaning)

English Meaning

अभिमान

अहंकार या घमंड

அகம்பாவம்

Pride or arrogance

घट

शरीर या हृदय

உடல் அல்லது இதயம்

Body or heart

जड़

मूर्ख या निर्जीव

முட்டாள் அல்லது உயிரற்ற

Foolish or inert

बिनु आगि

बिना आग के

நெருப்பு இல்லாமல்

Without fire

जरहि

जलते हैं

எரிகிறார்கள்

Burn (in jealousy)

भाग ले

भाग्य से

அதிர்ஷ்டத்தால்

From fortune

भलाई

कल्याण या शुभता

நன்மை

Welfare or goodness

काया

शरीर

உடல்

Body

मनसा

मन से

மனதால்

By mind

किसान

खेतिहर या कृषक

விவசாயி

Farmer

बुबै

बोएगा

விதைப்பார்

Will sow

निदान

अंत में या फलस्वरूप

இறுதியில்

In the end or result

गोधन

गायों का धन

பசு செல்வம்

Wealth in cows

गजधन

हाथियों का धन

யானை செல்வம்

Wealth in elephants

बाजिधन

घोड़ों का धन

குதிரை செல்வம்

Wealth in horses

रतनधन

रत्नों का धन

ரத்தின செல्वம்

Wealth in gems

खान

खदान या भंडार

சுரங்கம் அல்லது பொக்கிஷம்

Mine or treasure

संतोष

तृप्ति या प्रसन्नता

திருப்தி

Contentment or satisfaction

धूरि

धूल या मिट्टी

தூசி

Dust

हरषै

हर्षित होता है

மகிழ்ச்சியடைகிறார்

Becomes joyful

सनेह

प्रेम या स्नेह

அன்பு

Affection or love

कंचन

सोना

தங்கம்

Gold

बरसे

बरसता है

பொழிகிறது

Rains

मेह

वर्षा

மழை

Rain

जौलौ

जब तक

எப்பொழுது வரை

As long as

खान

खदान या भंडार (दुर्गुणों की)

சுரங்கம் (குற்றங்களின்)

Mine (of vices)

पंडित

विद्वान

பண்டிதர்

Scholar or learned

मूरख

मूर्ख

முட்டாள்

Fool

 

 

निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर लिखिए —

  1. धर्म का मूल क्या है?

उत्तर – गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार, दया ही धर्म का मूल है, जबकि अभिमान पाप का मूल है।

  1. तुलसी किसे छोड़ने को कहते हैं?

उत्तर – तुलसीदास कहते हैं कि जब तक शरीर में प्राण हैं, तब तक दया (करुणा) को नहीं छोड़ना चाहिए।

  1. तुलसी का भाग्य लक्षण क्या है?

उत्तर – तुलसीदास के अनुसार, जो मूर्ख लोग दूसरों के सुख और संपत्ति को देखकर बिना आग के जलते हैं, उनके भाग्य से भलाई दूर भाग जाती है—यही दुर्भाग्य का लक्षण है।

  1. हमें किन चीज़ों से दूर रहना चाहिए?

उत्तर – हमें उन स्थानों से दूर रहना चाहिए जहाँ हमारे जाने पर लोग प्रसन्न न हों और जिनकी आँखों में हमारे लिए स्नेह (प्रेम) न हो, भले ही वहाँ धन की वर्षा क्यों न होती हो।

  1. पंडित कैसे होना चाहिए।

उत्तर – तुलसीदास के अनुसार, जब तक किसी व्यक्ति के मन में काम, क्रोध, मद, अहंकार और लोभ की खान मौजूद है, तब तक वह विद्वान भी मूर्ख के समान ही होता है।

  1. मूर्ख के लक्षण क्या-क्या हैं?

उत्तर – ईर्ष्या, जलन और आंतरिक विकारों काम, क्रोध, मद, लोभ को मन से न निकाल पाना ही तुलसीदास के अनुसार मूर्खता के प्रमुख लक्षण हैं।

  1. किस धन के प्राप्ति से सब धन धूरी बनता है?

उत्तर – जब व्यक्ति को संतोष धन की प्राप्ति हो जाती है, तो गाय रूपी धन, हाथी रूपी धन, घोड़ा रूपी धन, और खानों में भरा रत्न रूपी धन—ये सभी धन मिट्टी के समान हो जाते हैं।

  1. तुलसी कहाँ जाने से मना करते हैं?

उत्तर – तुलसीदास ऐसे स्थान पर जाने से मना करते हैं जहाँ हमारे आने पर लोग हर्षित न हों और जहाँ की आँखों में हमारे लिए प्रेम न हो।

  1. आवत ही हर्ष नहीं तो क्या करना चाहिए?

उत्तर – यदि किसी स्थान पर हमारे आते ही हर्ष न हो और आँखों में स्नेह न हो, तो तुलसीदास के अनुसार, हमें वहाँ नहीं जाना चाहिए।

 

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

दया धर्म का मूल है, इसके विपरीत पाप का मूल क्या है?

a) क्रोध

b) अभिमान

c) लोभ

d) काम

   उत्तर – b (पहला दोहा – दया धर्म को मूल है, पाप मूल अभिमान।)

 

तुलसीदास के अनुसार दया कब तक नहीं छोड़नी चाहिए?

a) धन रहते तक

b) घट में प्राण रहते तक

c) युवावस्था तक

d) मित्र रहते तक

   उत्तर – b (जब लग घट में प्राण।)

 

दूसरे दोहे में जड़शब्द का अर्थ क्या है?

a) पेड़ की जड़

b) मूर्ख व्यक्ति

c) बीज

d) आग

   उत्तर – b (जो जड़ बिनु आगि जरहि।)

 

ईर्ष्या करने वालों के भाग्य से क्या भाग जाता है?

a) धन

b) भलाई

c) स्वास्थ्य

d) मित्र

   उत्तर – b (तुलसी तिन के भाग ले चलै भलाई भागि।)

 

तीसरे दोहे में मानव शरीर की तुलना किससे की गई है?

a) नदी से

b) खेत से

c) पर्वत से

d) वृक्ष से

   उत्तर – b (तुलसी काया खेत है।)

 

खेत का किसान कौन है?

a) इंद्रियाँ

b) मन

c) बुद्धि

d) आत्मा

   उत्तर – b (मनसा भये किसान।)

 

पाप और पुण्य को किस रूप में दर्शाया गया है?

a) फल

b) बीज

c) पानी

d) खरपतवार

   उत्तर – b (पाप पुण्य दोउ बीज है।)

 

जो बीज बोया जाता है, उसे कब काटना पड़ता है?

a) तुरंत

b) अंत में

c) बीच में

d) कभी नहीं

   उत्तर – b (बुबै सो लुनै निदान।)

 

चौथे दोहे में संतोष धन प्राप्त होने पर अन्य धन कैसे हो जाते हैं?

a) सोने जैसे

b) धूरि समान

c) चाँदी जैसे

d) पानी जैसे

   उत्तर – b (सब धन धूरि समान।)

 

गजधनका अर्थ क्या है?

a) गाय का धन

b) हाथी का धन

c) घोड़ा का धन

d) रत्न का धन

    उत्तर – b (गोधन, गजधन, बाजिधन…)

 

पाँचवें दोहे में किस स्थान पर नहीं जाना चाहिए?

a) जहाँ भोजन न मिले

b) जहाँ आगमन पर हर्ष और स्नेह न हो

c) जहाँ पानी न हो

d) जहाँ छाया न हो

    उत्तर – b (आवत ही हरषै नही, नैनन नहीं सनेह।)

 

कंचन बरसे मेहका अर्थ है –

a) चाँदी की वर्षा

b) सोने की वर्षा

c) हीरे की वर्षा

d) पानी की वर्षा

    उत्तर – b (कंचन = सोना, मेह = वर्षा।)

 

छठे दोहे में मन में मौजूद खानकिसकी है?

a) धन की

b) काम, क्रोध, मद, लोभ की

c) ज्ञान की

d) भक्ति की

    उत्तर – b (काम क्रोध मद लोभ की जौलौ मन में खान।)

 

मन में विकार होने पर पंडित और मूरख में क्या समानता है?

a) दोनों धनी होते हैं

b) दोनों एक समान

c) दोनों विद्वान

d) दोनों गरीब

    उत्तर – b (पंडित मूरख सो तुलसी एक समान।)

 

प्रथम दोहे का मुख्य संदेश क्या है?

a) धन कमाओ

b) दया कभी न छोड़ो

c) युद्ध करो

d) यात्रा करो

    उत्तर – b (तुलसी दया न छाँडिए…)

 

ईर्ष्या करने वाले अंदर-ही-अंदर कैसे जलते हैं?

a) आग लगाकर

b) बिनु आगि

c) पानी डालकर

d) हवा से

    उत्तर – b (बिनु आगि जरहि।)

 

कर्मफल का सिद्धांत किस दोहे में रूपक के साथ समझाया गया?

a) पहला

b) दूसरा

c) तीसरा

d) चौथा

    उत्तर – c (काया खेत, मन किसान, बीज पाप-पुण्य।)

 

संतोष को किससे श्रेष्ठ बताया गया है?

a) ज्ञान से

b) सभी भौतिक धनों से

c) शक्ति से

d) सौंदर्य से

    उत्तर – b (सब धन धूरि समान।)

 

किस दोहे में आत्म-सम्मान को धन से ऊपर रखा गया है?

a) तीसरा

b) चौथा

c) पाँचवाँ

d) छठा

    उत्तर – c (तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह।)

 

मन के विकार होने पर सच्चा ज्ञान कैसा होता है?

a) फलदायी

b) निरर्थक

c) शक्तिशाली

d) स्थायी

    उत्तर – b (पंडित भी मूरख समान, जब तक विकार हैं।)

अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

  1. प्रश्न – “दया धर्म को मूल है, पाप मूल अभिमान” दोहे में तुलसीदास ने क्या बताया है?
    उत्तर – इस दोहे में तुलसीदास जी ने बताया है कि दया सभी धर्मों की जड़ है और अभिमान सभी पापों की जड़ है।
  2. प्रश्न – तुलसीदास के अनुसार मनुष्य को कब तक दया का भाव बनाए रखना चाहिए?
    उत्तर – तुलसीदास के अनुसार, मनुष्य को जब तक उसके शरीर में प्राण हैं, तब तक दया का भाव नहीं छोड़ना चाहिए।
  3. प्रश्न – तुलसीदास जी ने अभिमान को किसका मूल बताया है?
    उत्तर – तुलसीदास जी ने अभिमान को सभी प्रकार के पापों का मूल बताया है।
  4. प्रश्न – “पर सुख संपति देखि सुनि, जरहि जे जड़ बिनु आगि” दोहे में ‘बिनु आगि जरना’ का क्या अर्थ है?
    उत्तर – ‘बिनु आगि जरना’ का अर्थ है बिना आग के ही ईर्ष्या के कारण अंदर ही अंदर जलना।
  5. प्रश्न – तुलसीदास के अनुसार, ईर्ष्यालु व्यक्ति के साथ क्या होता है?
    उत्तर – तुलसीदास के अनुसार, ईर्ष्यालु व्यक्ति के भाग्य से भलाई स्वयं ही भाग जाती है।
  6. प्रश्न – तुलसीदास जी ईर्ष्या करने वालों को क्या उपदेश देते हैं?
    उत्तर – तुलसीदास जी उपदेश देते हैं कि दूसरों के सुख और संपत्ति को देखकर ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह स्वयं के पतन का कारण बनती है।
  7. प्रश्न – “तुलसी काया खेत है” दोहे में शरीर की तुलना किससे की गई है?
    उत्तर – इस दोहे में शरीर की तुलना एक खेत से की गई है।
  8. प्रश्न – “तुलसी काया खेत है” दोहे में मन की तुलना किससे की गई है?
    उत्तर – इस दोहे में मन की तुलना किसान से की गई है।
  9. प्रश्न – तुलसीदास के अनुसार, पाप और पुण्य किसके समान हैं?
    उत्तर – तुलसीदास के अनुसार, पाप और पुण्य दोनों बीज के समान हैं जो मनुष्य बोता है और उसी का फल पाता है।
  10. प्रश्न – “गोधन, गजधन, बाजिधन” दोहे में किन-किन प्रकार के धन का उल्लेख किया गया है?
    उत्तर – इस दोहे में गाय, हाथी, घोड़े और रत्न जैसे धन का उल्लेख किया गया है।
  11. प्रश्न – तुलसीदास के अनुसार सबसे बड़ा धन कौन-सा है?
    उत्तर – तुलसीदास के अनुसार, सबसे बड़ा धन संतोष है।
  12. प्रश्न – जब व्यक्ति को संतोष धन प्राप्त हो जाता है, तब अन्य धन कैसा प्रतीत होता है?
    उत्तर – जब व्यक्ति को संतोष धन प्राप्त होता है, तब अन्य धन उसे मिट्टी (धूल) के समान लगता है।
  13. प्रश्न – “आवत ही हरषै नही, नैनन नहीं सनेह” दोहे में तुलसीदास ने किसका महत्त्व बताया है?
    उत्तर – इस दोहे में तुलसीदास ने प्रेम और आत्म-सम्मान का महत्त्व बताया है।
  14. प्रश्न – तुलसीदास के अनुसार, कहाँ नहीं जाना चाहिए?
    उत्तर – तुलसीदास के अनुसार, जहाँ आपके आने पर लोग प्रसन्न न हों और आँखों में स्नेह न दिखाएँ, वहाँ नहीं जाना चाहिए।
  15. प्रश्न – तुलसीदास जी ने धन और प्रेम में किसे श्रेष्ठ बताया है?
    उत्तर – तुलसीदास जी ने धन की अपेक्षा प्रेम और मान-सम्मान को श्रेष्ठ बताया है।
  16. प्रश्न – “काम क्रोध मद लोभ की” दोहे में किन-किन दोषों का उल्लेख किया गया है?
    उत्तर – इस दोहे में काम, क्रोध, मद (अहंकार) और लोभ — इन चार दोषों का उल्लेख किया गया है।
  17. प्रश्न – तुलसीदास जी के अनुसार, जब तक मन में विकार हैं, तब तक व्यक्ति कैसा है?
    उत्तर – तुलसीदास जी के अनुसार, जब तक मन में विकार हैं, तब तक व्यक्ति विद्वान होकर भी मूर्ख के समान है।
  18. प्रश्न – सच्चा पंडित कौन है, तुलसीदास के अनुसार?
    उत्तर – तुलसीदास के अनुसार, वही सच्चा पंडित है जिसके मन में कोई विकार नहीं है और जो काम, क्रोध, लोभ, मद से मुक्त है।
  19. प्रश्न – तुलसीदास जी के दोहों से हमें कौन-से जीवन-मूल्य मिलते हैं?
    उत्तर – तुलसीदास जी के दोहों से हमें दया, संतोष, प्रेम, विनम्रता और पवित्रता जैसे जीवन-मूल्य मिलते हैं।
  20. प्रश्न – इन दोहों का सामूहिक संदेश क्या है?
    उत्तर – इन दोहों का सामूहिक संदेश है कि मनुष्य को दया, संतोष और सदाचार का पालन करते हुए ईर्ष्या, अभिमान और विकारों से दूर रहना चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

  1. प्रश्न – तुलसीदास के अनुसार धर्म और पाप का मूल क्या है? उत्तर – तुलसीदास कहते हैं कि दया ही समस्त धर्मों का मूल आधार है। इसके विपरीत, अभिमान (अहंकार) को उन्होंने सभी प्रकार के पापों की जड़ माना है। उनका संदेश है कि जीवन भर दया के भाव को नहीं छोड़ना चाहिए।
  2. प्रश्न – हमें दया का भाव कब तक नहीं छोड़ना चाहिए?

उत्तर –  तुलसीदास जी कहते हैं कि जब तक घट (शरीर) में प्राण हैं, अर्थात् मनुष्य जीवन पर्यन्त, उसे कभी भी दया (करुणा) के भाव को नहीं छोड़ना चाहिए। दया ही परम धर्म है और मनुष्य का मुख्य कर्तव्य है।

  1. प्रश्न – दूसरों के सुख और संपत्ति को देखकर ईर्ष्या करने वाले का क्या परिणाम होता है?

उत्तर –  तुलसीदास के अनुसार, जो मूर्ख (जड़) लोग दूसरों के सुख-संपत्ति को देखकर बिना आग के जलते हैं (ईर्ष्या करते हैं), उनके भाग्य से भलाई (कल्याण) स्वयं ही दूर भाग जाती है। ईर्ष्यालु व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता।

  1. प्रश्न – तुलसीदास ने ‘काया’ और ‘मनसा’ के लिए किस रूपक का प्रयोग किया है?

उत्तर –  तुलसीदास ने काया (शरीर) को खेत के समान बताया है, और मनसा (मन) को उस खेत का किसान कहा है। यह रूपक कर्म के सिद्धांत को स्पष्ट करता है कि शरीर एक माध्यम है और मन कर्मों का कर्ता।

  1. प्रश्न – ‘पाप पुण्य दोउ बीज है, बुबै सो लुनै निदान’ का क्या अर्थ है?

उत्तर –  इस पंक्ति का अर्थ है कि पाप और पुण्य दोनों ही बीज के समान हैं, जिन्हें मनुष्य अपने कर्म रूपी खेत में बोता है। अंत में (निदान) किसान बनकर जो बीज बोया जाएगा, मनुष्य को वही काटना (फल प्राप्त करना) पड़ेगा।

  1. प्रश्न – संतोष धन की प्राप्ति होने पर भौतिक धन की क्या स्थिति हो जाती है?

उत्तर –  जब व्यक्ति को संतोष रूपी धन प्राप्त हो जाता है और वह तृप्त हो जाता है, तब गोधन, गजधन, बाजिधन और रत्नधन जैसे सभी भौतिक धन उसके लिए मिट्टी (धूल) के समान महत्त्वहीन हो जाते हैं।

  1. प्रश्न – तुलसीदास किन चीज़ों को धन मानते हैं, और वे संतोष से कैसे अलग हैं?

उत्तर –  तुलसीदास गोधन, गजधन, बाजिधन और रतनधन खान जैसी वस्तुओं को भौतिक धन मानते हैं। ये सभी धन बाहरी हैं, जबकि संतोष धन एक आंतरिक गुण है, जो बाकी सभी भौतिक धनों से श्रेष्ठ है।

  1. प्रश्न – तुलसीदास कहाँ न जाने की सलाह देते हैं, भले ही वहाँ क्या हो रहा हो?

उत्तर –  तुलसीदास सलाह देते हैं कि ऐसे स्थान पर कभी नहीं जाना चाहिए जहाँ हमारे आते ही लोग प्रसन्न न हों और जिनकी आँखों में प्रेम (स्नेह) न हो। यह सलाह तब भी लागू होती है, जब वहाँ सोने की वर्षा (कंचन बरसे मेह) क्यों न हो रही हो।

  1. प्रश्न – पंडित और मूर्ख एक समान कब माने जाते हैं?

उत्तर –  तुलसीदास के अनुसार, एक विद्वान (पंडित) व्यक्ति भी मूर्ख के समान माना जाता है, जब तक उसके मन में काम (वासना), क्रोध, मद (अहंकार) और लोभ रूपी विकारों की खान (भंडार) मौजूद रहती है।

 

  1. प्रश्न – दोहा संख्या 5 में ‘कंचन बरसे मेह’ का क्या तात्पर्य है?

उत्तर –  ‘कंचन बरसे मेह’ का तात्पर्य है कि जहाँ अत्यधिक धन-संपत्ति या भौतिक लाभ की संभावना हो। तुलसीदास कहते हैं कि आत्म-सम्मान और स्नेह के अभाव में ऐसा भौतिक लाभ भी व्यर्थ है।

 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

  1. प्रश्न – तुलसीदास ने दया को धर्म का मूल क्यों कहा है? दया और अभिमान के विपरीत संबंध को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – तुलसीदास ने दया को धर्म का मूल इसलिए कहा है क्योंकि दया परोपकार, करुणा और सद्भाव का भाव है, जो मनुष्य को उच्च नैतिक मार्ग पर ले जाता है। इसके विपरीत, अभिमान व्यक्ति को अहंकारी और स्वार्थी बनाता है, जिससे वह पापों की ओर प्रवृत्त होता है। इस प्रकार, दया कल्याण का मार्ग है, और अभिमान विनाश का, इसीलिए वे एक-दूसरे के विपरीत, क्रमशः धर्म और पाप के मूल हैं।

  1. प्रश्न – दोहा संख्या 3 के माध्यम से तुलसीदास कर्मफल की अनिवार्यता को कैसे समझाते हैं?

उत्तर –  दोहा संख्या 3 में, तुलसीदास ने शरीर को खेत, मन को किसान, और पाप-पुण्य को बीज मानकर कर्मफल के सिद्धांत को समझाया है। वे कहते हैं कि किसान (मन) जो बीज (पाप या पुण्य) बोएगा, अंत में उसे वही फसल काटनी पड़ेगी। यह स्पष्ट करता है कि मनुष्य अपने कर्मों के फल से बच नहीं सकता। अच्छे कर्मों का अच्छा और बुरे कर्मों का बुरा फल अवश्य मिलता है, यही कर्मफल की अनिवार्यता है।

  1. प्रश्न – तुलसीदास ने संतोष धन को भौतिक धनों से श्रेष्ठ क्यों माना है? दोहा संख्या 4 के संदर्भ में समझाइए।

उत्तर –  तुलसीदास ने संतोष को गोधन, गजधन, बाजिधन और रतनधन जैसे सभी भौतिक धनों से श्रेष्ठ माना है, क्योंकि ये सभी धन अस्थायी हैं और मनुष्य को तृप्ति नहीं दे सकते। जब संतोष धन की प्राप्ति होती है, तो व्यक्ति की इच्छाएँ शांत हो जाती हैं, जिससे वह आंतरिक रूप से तृप्त हो जाता है। इस मानसिक शांति के आगे बाहरी भौतिक धन धूल के समान मूल्यहीन हो जाते हैं, इसलिए संतोष ही परम धन है।

  1. प्रश्न – तुलसीदास ने मान-सम्मान और स्नेह को भौतिक लाभ से अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों बताया है? दोहा संख्या 5 के आधार पर उत्तर दीजिए।

उत्तर –  दोहा संख्या 5 के अनुसार, तुलसीदास ने मान-सम्मान और स्नेह को भौतिक लाभ से अधिक महत्त्वपूर्ण बताया है। वे कहते हैं कि जहाँ लोग हमारे आगमन पर प्रसन्न न हों और जहाँ आँखों में प्रेम का भाव न हो, वहाँ सोने की वर्षा हो रही हो, तब भी नहीं जाना चाहिए। इसका कारण यह है कि मनुष्य का आत्म-सम्मान और मानवीय संबंध किसी भी भौतिक संपत्ति  से अधिक मूल्यवान हैं। स्नेह के अभाव में धन-लाभ भी सूखा और व्यर्थ होता है।

 

 

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