हमारी राष्ट्रभाषा
आधुनिक हिंदी के निर्माता भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र की भाषा के संबंध में लिखी गई ये पंक्तियाँ आज के दिन हमारे लिए एक अभूतपूर्व प्रेरणा का संदेश दे रही हैं।
निज़ भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटत न तन को सूल॥
वैसे यद्यपि हमारे देश के विभिन्न भागों में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं, फिर भी हिंदी हमारे देश की ऐसी भाषा है, जो प्रायः सारे देश में समान रूप से व्यवहार में लाई जाती है। उसके इस व्यापक रूप को समझाते हुए ही सारे देश ने इसे राष्ट्रभाषा के पावन अभिधान से अभिषिकत किया। इस विषय में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने देशवासियों को उद्बोधित करते हुए एक बार ठीक ही कहा था।
जैसे अंग्रेज़ अपनी मातृभाषा अंग्रेज़ी में बोलते हैं और सर्वथा उसे ही व्यवहार में लाते हैं वैसे ही मैं आप से प्रार्थना करता हूँ कि आप हिंदी को भारतमाता की एक भाषा बनाने का गौरव प्रदान करें। हिंदी सब समझते हैं। इसे राष्ट्रभाषा बनाकर हमें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
गाँधीजी ने ही हिंदी को राष्ट्र की उन्नति का मूल समझकर यह घोषणा नहीं की थी, प्रत्युत उनसे पूर्व भी देश के कभी अंचलों के समाज सुधारकों संतों और नेताओं ने उसके महत्त्व को समझ लिया था। महाराष्ट्र में जहाँ ग्यारहवीं तथा बारहवीं शताब्दी में मराठी के आदि कवि मुकुन्दाराज और संत ज्ञानेश्वर ने इसके महत्त्व को समझा था, वहाँ कालांतर में गोपाल नरहरि देशपांडे तथा केशव वामन पेठे नामक महानुभावों ने क्रमशः सन् 1875 तथा 1876 में हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का अभिनंदनीय प्रयास किया था। उन दिनों महादेव गोविंद रानडे तथा लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने भी इस दिशा में प्रशंसनीय कार्य किया था। इस प्रकार जहाँ महाराष्ट्र के ये संत सुधारक और नेता हिंदी के महत्त्व को समझकर उसके प्रचार में लगने लगे। जहाँ के सुधारक तथा नेता हिंदी की महत्त्व को समझकर उसके प्रचार में लगे हुए थे वहाँ नरसी महता मालण दयाराम तथा दलपत राज जैसे गुजराती कवियों ने भी अपनी कविताओं के माध्यम से हिंदी के महत्त्व को स्वीकार किया था।
हिंदी को यह महत्त्व इसलिए नहीं दिया गया था कि वह सारी भारतीय भाषाओं में ऊँची है, बल्कि उसे राष्ट्रभाषा इसलिए कहा और समझा जाता है कि, हिंदी को जानने समझने और बोलने वाले देश के कोने-कोने में फैले हुए हैं। ये लोग चाहे हिंदी न जानते हों, व्याकरण की भूलें करते हों अशुद्ध हिंदी बोलते हों, परंतु बोलते हिंदी ही है और उसी में अपना भाव व्यक्त करते एवं दूसरों की बात समझते हैं। वास्तव में हिंदी की यह प्रकृति ही देश की परिचायक है और इस प्रकृति ने ही उसे इतना व्यापक रूप दिया है। वह केवल हिंदुओं या कुछ मुट्ठीभर लोगों की भाषा नहीं, वह तो देश के कोटि-कोटि कंठों की पुकार और उनका हृदयहार है।
हिंदी के सूत्र के सहारे कोई भी व्यंक्ति देश के एक कोने से चलकर दूसरे कोने तक जा सकता है और अपना काम चला सकता है। देश में फैली हुई अनेक भाषाओं और संस्कृतियों के बीच यदि भारतीय जीवन की उदात्तता एवं एकात्मकता किसी एक भाषा में दिखाई देती है तो वह हिंदी में ही है। चाहे सब लोग हिंदी न जानते हों लेकिन फिर भी इस के द्वारा वे अपना काम चला लेते हैं और उन्हें इसमें कोई कठिनाई नहीं होती। भारत की बहु भाषिता के प्रश्न को उठाकर जो लोग हिंदी को राष्ट्रभाषा के गौरवपूर्ण स्थान पर अधिष्ठित करने में रुकावट डाल रहे हैं वे यह कैसे भूल जाते हैं कि आज विश्व के सर्वाधिक शक्ति संपन्न देश रूस ने इस समस्या का किस प्रकार समाधान किया है। उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि सोवियत संघ में यद्यपि 66 भाषाएँ बोली तथा लिख जाती है, किंतु फिर वहाँ की राष्ट्रभाषा रूसी ही है। सोवियत संघ की मंगोल और तुर्की भाषाओं के शब्दों का रूसी भाषा से कोई संबंध नहीं है। इसके विपरीत यहाँ की दक्षिण की भाषाओं के प्रायः 60 प्रतिशत शब्द मिल जाते हैं। तमिल को अपवाद के रूप में रख सकते हैं। किंतु उसमें भी कुछ शब्द तो ऐसे मिल जाते हैं जिन्हें भारत की दूसरी भाषाओं के बोलनेवाले सरलता से समझ लेते हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व हिंदी के ही माध्यम से भारत के अनेक संतों सुधारकों, मनीषियों और नेताओं ने अपने विचारों का प्रसार एवं प्रचार किया था। अपनी दूरदर्शिता के कारण उन्होंने ऐसी ही भाषा को अपनी भावधारा का साधन बनाया था। जो देश के सभी भूभागों के अधिकांश जन समुदाय को एकता के सूत्र में पिरो सकती थी और वह भाषा हिंदी थी। यही कारण था कि जहाँ उत्तर प्रदेश के कबीर, पंजाब के नानक, सिंध के सचल, काश्मीर के लल्लचंद, बंगाल के बदल, असम के शंकरदेव आदि संतों ने जिस सांस्कृतिक एकता को आधार बनाकर अपने काव्य की रचना की थी, वहाँ दक्षिण के वेमना, सर्वज्ञ, उल्लूर और आलवार आदि संतों की कविता की मूल भूमि भी वही थी, इनके संदेश में कहीं भी भाषागत विघटन का स्वर नहीं उभरा था, बल्कि सभी की रचनाएँ उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक समान रूप से समाद्वत हाती थी। जिन साधु बैरागियों के और अखाड़े सारे देश में फैले हुए थे उनमें भी कहीं भाषा का झगड़ा नहीं उठता था।
इसका निष्कर्ष यही है कि भाषाओं की वह विविधता देश की एकता में कहीं भी बाधक नहीं समझी जानी चाहिए। इस बिगहा पर पानी बदले, दस कोसल पर बानी के अनुसार पानी और वाणी की अनेक विविधता तो स्वभाविक ही है, किंतु बकीर ने जिस संस्कृत को कूप जल और जिस भाषा को बहता नीर कहा है वह भाषा निश्चय ही हिंदी है। इसी में उन्होंने अपना संदेश को दिया था और उसे वे एकता की कडी के रूप में देखते थे। भाषा वही महत्त्वपूर्ण होती है जो लोगों को तोड़ने के बजाय जोड़ने का संदेश दे और जिस के माध्यम से प्रेम का मार्ग प्रशस्त हो। इसी पावन भावना से प्रेरित होकर महाकवि जायसी ने यह कहा था –
तुरकी अरबी, हिंदुई भाषा जेती आहि।
जेही महं मारग प्रेम का सवै सराहे ताहि॥
और यह प्रेम का मार्ग केवल हिंदी के माध्यम से ही प्रशस्त हो सकता है। यदि ऐसा न होता तो बंगाल के अद्विवतीय सुधारक राजा राम मोहन राय और केशवचंद्र सेन जैसे मनीषी अपने विचारों के प्रचार के लिए इसे क्यों अपनाते? आर्य समाज के संस्थापक महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती और राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने गुजराती होते हुए भी राष्ट्रीयता और समाज सुधार की अपनी भावधारा को हिंदी के द्वारा ही सारे देश में फैलाया।” स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है” के जन्मदाता लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्रीय होते हुए भी 1920 में बनारस में हिंदी में भाषण दिया था। उनका यह विचार वास्तव में हिंदी की व्यापकता का सुपुष्ठ प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने कहा था मेरी समझ में हिंदी भारत की सामान्य भाषा होनी चाहिए। जब एक प्रांत दूसरे प्रांत से मिले तो आपस में विचार विनिमय का माध्यम हिंदी ही होनी चाहिए। सामाजिक क्षेत्र में जहाँ अनेक सुधारकों द्वारा हिंदी को भारत की एकता का प्रमुख समझा जा रहा था, वहाँ महात्मा गाँधी के द्वारा उसके प्रचार और प्रसार को व्यापक बल मिला था।
हिंदी की सार्वजनिक उपयोगिता और महत्ता का इसी से पता चलता है कि इसे दूसरे प्रदेशों के निवासी नेताओं और विचारकों ने अपने विचारों को प्रकट करने का माध्यम बनाया था। आज दक्षिण के चारों राज्यों में हिंदी का जो सफल लेखन पठन और अध्यापन हो रहा है, उसमें भी राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी द्वारा स्थापित दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा और राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा जैसी अनेक संस्थाओं का अत्यधिक योगदान है। इसी प्रकार उड़ीसा, असाम तथा मेघालय में भी हिंदी का व्यापक प्रचार तथा प्रसार परिलक्षित होता है। विभाजन के उपरांत देश के विभिन्न आंचलों में फैले हुए सिंधी भाई भी किसी से पीछे नहीं है। आज के हिंदी के लेखन में भारत के सभी भाषा भाषियों का उल्लेखनीय योगदान है। श्रीमती सरोजिनी नायडु ने हिंदी की महत्ता को स्वीकार करते हुए एक बार कहा था, देश के सबसे ज्यादा हिस्से में हिंदी ही लिखी जाती है। अगर हम साधारण बुद्धि से काम लें तभी हमें पता चलेगा कि हमारी कौमी जवान हिंदी ही हो सकती है। सुप्रसिद्ध मनीषी आचार्य क्षितिमोहन सेन ने भाषा को किसी भी देश की एकता का प्रधान साधन मानते हुए हिंदी की महत्ता की जो प्रतिष्ठापना की थी वह हमारे लिए उपेक्षणीय नहीं है। उन्होंने कहा था, अंग्रेज़ी भाषा की महिमा इसलिए नहीं है कि वह हमारे शासकों की भाषा थी बल्कि इसलिए है कि उसने संसार की समस्त विद्याओं को आत्मसात किया है। हिंदी को भी यह पद पाना है। उसे भी नाना विधाओं कलाओं और संस्कृतियों की त्रिवेणी बनना होगा। हिंदी में वह क्षमता है। बिना ऐसे बने भाषा की साधना अधूरी रह जायगी। भाषा हमारे लिए साधन है; साध्य नहीं। मार्ग है; गंतव्य नहीं। आधार है, आधेय नहीं।
आज राजनीति की आड लेकर जहाँ बंगाल में यदा यदा हिंदी विरोध की जो आवाज़ उठ खड़ी होती वहाँ के निवासी यह कैसे भूल जाते हैं। कि अतीत काल में बंगाल ने हिंदी के संवर्धन और पल्लवन में बड़ा भारी योगदान दिया था। बंगाल के जहाँ राजा राममोहन राय ने अग्रदूत नामक पत्र हिंदी में सफलता पूर्वक प्रकाशित किया वहाँ वंदेमातरम्, राष्ट्रगान के अमर गायक बंकिम चंद्र चाटर्जी ने अपने बंग दर्शन नामक ग्रंथ के पांचवें खंड में स्पष्ट रूप से लिखा था हिंदी भाषा की ऐक्य बंधन स्थापित कर सकेंगे वास्तव में वे ही सच्चे भारतीय कहलाने योग्य हैं। केवल यही नहीं बंगला वसुमति के संपादक श्री सुरेश चंद्र समाजपति और संध्या के संपादक पं.बह्मबांधव उपाध्याय आदि ने भी अपने पत्रों में हिंदी की राष्ट्रभाषा संबंधी क्षमता को मुक्त कंठ से स्वीकार किया था। सुप्रसिद्ध तत्व चिंतक श्री अरविंद घोष ने भी अपने कर्मयोगी और धर्म नामक पत्रों के माध्यम से राष्ट्रभाषा हिंदी के उन्नयन में अपना सहयोग देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का कार्य किया था। जहाँ बंग देश में उक्त सुधारक विचारक और चिंतक हिंदी संबंधी आंदोलन को आगे बढ़ा रहे थे, वहाँ श्री भूदेव मुखर्जी बिहार में तथा श्री नवीनचंद्र राय पंजाब में हिंदी प्रचार का कार्य कर रहे थे। प्रकाशन और मुद्रण के क्षेत्र में भी बंग भाषियों की सेवाएँ अविस्मरणीय है। श्री रामानंद चाटर्जी ने अपने प्रवासी प्रेस से जहाँ विशाल भारत जैसा उच्चकोटि का मासिक पत्र निकाला वहाँ श्री चिंतमणी घोष के इन्डियन प्रेस ने सरस्वती का प्रकाशन करके हिंदी साहित्य की अभिवृद्धि में अभूत पूर्व योगदान दिया। बंगाल के ही सपूत श्री नागेंद्रनाथ बसु वह को श्रेय दिया जा सकता है कि उन्होंने 25 खंडों में विश्वकोश प्रकाशित करके हिंदी साहित्य की अभिवृद्धि की थी।
अनेक बंग नेताओं द्वारा जहाँ राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार में योगदान की दिशा में ऐसे महत्त्वपूर्ण कार्य हो रहे थे वहाँ जस्टिस शारदाचरण मिश्र ने एक लिपि विस्तार परिषद की स्थापना करके उसके द्वारा देवनागर नामक ऐसा पत्र प्रकाशित किया था कि जिसका उद्देश्य देवनागरी लिपि के माध्यम से समस्त भारतीय भाषाओं की कृतियों को प्रकाशित करके उसमें समन्वय स्थापित करना था। उनका यह भी अभिमत था कि यदि भाषाओं में से लिपि की दीवार को हटा दिया जाये और सब भाषाओं को देवनागरी लिपि में ही लिखने की परंपरा चल पड़े तो भारत की एकता अखंड रह सकेगी। वास्तव में यदि लिपि की बाधा को दूर कर दिया जाये और सारे देश की भाषाएँ देवनागरी को अपना लें तो हमारी सांस्कृतिक सामाजिक और साहित्यिक चेतना को बड़ा बल मिल सकेगा। पश्चिमी एशियाकी ताजिक और तुर्कों भाषाओं ने जब अरबी लिपि को छोडकर रोमन लिपि को अपनाया तब वहाँ भी बड़े ही क्रांतिकारी परिवर्तन हुए थे। एक लिपि के माध्यम से हमारी एकता सर्वथा अक्षुण्ण रह सकेगी।
जिस हिंदी को जायसी, रहीम, रसखान, आलम, शेख और उस्मान जैसे मुस्लिम कवियों ने अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया, व केवल हिंदुओं की भाषा कही जा सकती है? खड़ीबोली के आदि कवि के रूप में जहाँ अमीर खुसरो ने हिंदी कविता को नये मुहावरे दिए वहाँ सैयद इन्शाअल्लाखाँ की” केतकी की कहानी” की रचना से हिंदी कहानी की विधा में एक अभूतपूर्व निखार आया है। हिंदी साहित्य में जहाँ उक्त विभूतियों का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है वहाँ आधुनिक काल में भी ऐसा अनेक नाम हमारे सामने उभर आते हैं। जिन्होंने जाति और धर्म की दीवार को तोड़कर साहित्य निर्माण के विविध क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किया था। ऐसे महानुभावों में सैयद अमीर अली, मीर कासिम अली साहित्यालंकार, बंदे अली, फातामी, जहूर बख्श कोविद और नवीन बख्श फलक आदि के नाम गौरव के साथ स्मरण किये जा सकते हैं।
पाठ का सार
भारतेंदु हरिश्चंद्र की पंक्तियों से शुरू कर लेख हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की आवश्यकता पर बल देता है। हिंदी देश के कोने-कोने में बोली-समझी जाती है, जो एकता का सूत्र है। गाँधीजी, तिलक, रानडे आदि नेताओं ने इसे अपनाया। विभिन्न क्षेत्रों के संतों, कवियों, सुधारकों ने हिंदी में विचार प्रसारित किए। सोवियत संघ की रूसी भाषा की तरह हिंदी बहुभाषी भारत की एकता का माध्यम है। बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात आदि में हिंदी प्रचार हुआ। देवनागरी लिपि अपनाने से एकता मजबूत होगी। मुस्लिम कवियों ने भी हिंदी में रचना की, यह सबकी भाषा है। हिंदी उन्नति का मूल और प्रेम का मार्ग है।
कठिन शब्दार्थ
शब्द (Word) | हिंदी अर्थ (Hindi Meaning) | தமிழ் அர்த்தம் (Tamil Meaning) | English Meaning |
अभूतपूर्व | अनोखा या पहले न हुआ | முன்னெப்போழும் இல்லாத | Unprecedented |
उद्बोधित | जागृत या प्रेरित करना | எழுப்புதல் | Awakened or inspired |
प्रत्युत | बल्कि या इसके विपरीत | மாறாக | Rather or on the contrary |
अंचलों | क्षेत्रों या भागों | பகுதிகள் | Regions |
अभिनंदनीय | प्रशंसा योग्य | பாராட்டத்தக்க | Commendable |
परिचायक | दर्शाने वाला | காட்டுபவர் | Indicator or representative |
कोटि-कोटि | करोड़ों | கோடிக்கணக்கான | Crores (millions) |
हृदयहार | हृदय जीतने वाला | இதயத்தை வென்றவர் | Heart-winning |
उदात्तता | उत्कृष्टता या महानता | உன்னதம் | Nobility or sublimity |
एकात्मकता | एकता | ஒருமைப்பாடு | Unity |
अधिष्ठित | स्थापित या विराजमान | அமர்த்தப்பட்ட | Enthroned or established |
त्रिवेणी | तीन नदियों का संगम | மூன்று ஆறுகளின் சங்கமம் | Confluence of three rivers |
आधेय | रखने योग्य वस्तु | வைக்கப்பட வேண்டியது | Content (to be placed) |
संवर्धन | बढ़ावा या पोषण | வளர்ச்சி | Promotion or nourishment |
पल्लवन | फूलना-फलना या विकास | விரிவாக்கம் | Flourishing or expansion |
ऐक्य बंधन | एकता का बंधन | ஒற்றுமை பிணைப்பு | Bond of unity |
समन्वय | सामंजस्य या संयोजन | இணைப்பு | Coordination or harmony |
अक्षुण्ण | अखंड या बिना क्षति का | குறைவில்லாத | Intact or unbroken |
अभिव्यक्ति | व्यक्त करना | வெளிப்பாடு | Expression |
मुहावरे | लोकोक्तियाँ या शैली | பழமொழிகள் | Idioms or style |
निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर पूरे वाक्यों में लिखिए।
II निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर तीन वाक्यों में लिखिए।
- हिंदी भाषा के प्रमुख कवियों का नाम लिखिए।
उत्तर – हिंदी के आरंभिक कवियों में अमीर खुसरो और सैयद इन्शाअल्लाखाँ का नाम उल्लेखनीय है।भक्ति काल के प्रमुख मुस्लिम कवियों में जायसी, रहीम, रसखान, आलम, शेख और उस्मान जैसे कवियों ने हिंदी को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।आधुनिक काल में भी अनेक साहित्यकारों ने जाति और धर्म की दीवार को तोड़कर हिंदी साहित्य में योगदान दिया है।
- हिंदी भाषा का उल्लेखनीय कार्य क्या है?
उत्तर – हिंदी का सबसे उल्लेखनीय कार्य यह है कि यह देश के सभी भूभागों के जनसमुदाय को एकता के सूत्र में पिरो सकती थी और आज भी पिरो रही है। हिंदी के सूत्र के सहारे कोई भी व्यक्ति देश के एक कोने से दूसरे कोने तक जाकर अपना काम चला सकता है। इसने स्वतंत्रता से पूर्व संतों, सुधारकों और नेताओं के विचारों का प्रसार करके राष्ट्रीय चेतना को जगाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- हिंदी के उन्नति में किनका योगदान रहा?
उत्तर – हिंदी की उन्नति में भारतेंदु हरिश्चंद्र, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी और महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे नेताओं और मनीषियों का योगदान रहा। इसके अलावा, महाराष्ट्र के संत सुधारकों, बंगाल के चिंतकों जैसे राजा राममोहन राय, बंकिम चंद्र चाटर्जी और दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा जैसी संस्थाओं का अत्यधिक योगदान रहा। कबीर, नानक, वेमना जैसे संतों और जायसी, रहीम जैसे कवियों ने भी हिंदी के महत्त्व को बढ़ाया।
- बंग दर्शन ग्रंथ में हिंदी के बारे में क्या लिखा है?
उत्तर – बंकिम चंद्र चाटर्जी ने अपने ‘बंग दर्शन’ नामक ग्रंथ के पाँचवें खंड में स्पष्ट रूप से लिखा था कि हिंदी भाषा की ऐक्य बंधन स्थापित कर सकेंगे, अर्थात् हिंदी भाषा देश को एकता के सूत्र में बांधने में सक्षम है।उन्होंने यह भी लिखा था कि जो लोग हिंदी को इस ऐक्य बंधन के रूप में स्वीकार करेंगे, वे ही सच्चे भारतीय कहलाने योग्य हैं।यह विचार बंगाल के एक महान साहित्यकार द्वारा हिंदी की राष्ट्रभाषा संबंधी क्षमता की मुक्त कंठ से स्वीकृति थी।
- किन-किन नेताओं की भाषा हिंदी नहीं थी?
उत्तर – राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी (गुजराती) और महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती (गुजराती) की मातृभाषा हिंदी नहीं थी। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (महाराष्ट्रीय) की मातृभाषा भी मराठी थी। श्रीमती सरोजिनी नायडु और बंगाल के अनेक नेता तथा विचारक (जैसे राजा राममोहन राय, बंकिम चंद्र चाटर्जी) भी हिंदी भाषी नहीं थे, फिर भी उन्होंने हिंदी को अपनाया।
II निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर पाँच वाक्यों में लिखिए।
- हिंदी की महिमा पर पाँच वाक्य लिखिए।
उत्तर – हिंदी हमारे देश की ऐसी भाषा है जो प्रायः सारे देश में समान रूप से व्यवहार में लाई जाती है और इसलिए इसे राष्ट्रभाषा का गौरव प्राप्त है।यह देश के एक कोने से दूसरे कोने तक विचार विनिमय का माध्यम बनकर राष्ट्रीय एकता का सूत्रधार बनती है। स्वतंत्रता से पूर्व, संतों और नेताओं ने इसी के माध्यम से अपनी भावधारा और सामाजिक सुधारों को पूरे देश में फैलाया था। यह अनेक भाषाओं और संस्कृतियों के बीच भारतीय जीवन की उदात्तता एवं एकात्मकता को दर्शाती है। हिंदी केवल कुछ मुट्ठी भर लोगों की नहीं, बल्कि देश के कोटि-कोटि कंठों की पुकार और हृदयहार है।
- भाषा के बारे में कबीर ने क्या कहा?
उत्तर – कबीर ने संस्कृत भाषा को कूप जल कहा है, जिसका अर्थ है कि यह एक सीमित और स्थिर भाषा है जो केवल कुछ विद्वानों तक ही सीमित रहती है। इसके विपरीत, उन्होंने भाषा को बहता नीर कहा है। ‘बहता नीर’ प्रतीक है कि लोकभाषा सरल, गतिशील और सभी के लिए सुलभ होती है। कबीर ने इसी ‘बहते नीर’ रूपी हिंदी के माध्यम से अपना संदेश दिया था, क्योंकि वे इसे एकता की कड़ी के रूप में देखते थे। उनका मानना था कि भाषा वही महत्त्वपूर्ण होती है जो लोगों को जोड़ने का संदेश दे और प्रेम का मार्ग प्रशस्त करे।
- राष्ट्रभाषा हिंदी के बारे में लेखक का क्या विचार था और क्या चाहते हैं?
उत्तर – लेखक का विचार है कि हिंदी केवल भाषा नहीं, बल्कि भारतीय जीवन की उदात्तता और एकात्मकता की परिचायक है और यह राष्ट्रीय एकता का मूल है। उनका मानना है कि हिंदी को यह महत्त्व उसकी श्रेष्ठता के कारण नहीं, बल्कि देश के कोने-कोने में व्यापक रूप से समझी और बोली जाने की प्रकृति के कारण मिला है। लेखक बहु-भाषिता को हिंदी के रास्ते में रुकावट नहीं मानते और रूस (सोवियत संघ) का उदाहरण देते हैं, जहाँ 66 भाषाएँ होने पर भी रूसी राष्ट्रभाषा है। लेखक चाहते हैं कि राजनीति की आड़ में हिंदी विरोध न हो और देवनागरी लिपि को सारे देश की भाषाओं के लिए अपना लिया जाए ताकि लिपि की बाधा दूर हो और सांस्कृतिक, सामाजिक व साहित्यिक चेतना को बल मिल सके। वह चाहते हैं कि हिंदी भी विश्व की समस्त विद्याओं को आत्मसात करे और नाना विधाओं, कलाओं और संस्कृतियों की त्रिवेणी बनकर राष्ट्र को जोड़ने का कार्य जारी रखे।
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
‘निज़ भाषा उन्नति अहै’ पंक्ति किसकी है?
a) गाँधीजी
b) भारतेंदु हरिश्चंद्र
c) तिलक
d) जायसी
उत्तर – b (आधुनिक हिंदी के निर्माता भारतेंदु।)
हिंदी को राष्ट्रभाषा क्यों बनाया गया?
a) सबसे पुरानी होने से
b) व्यापक रूप से व्यवहार में लाई जाती है
c) सबसे कठिन होने से
d) केवल उत्तर भारत में
उत्तर – b (सारे देश में समान रूप से।)
गाँधीजी ने हिंदी को क्या बनाने की प्रार्थना की?
a) प्रदेश भाषा
b) भारतमाता की एक भाषा
c) विदेशी भाषा
d) धार्मिक भाषा
उत्तर – b (भारतमाता की एक भाषा।)
महाराष्ट्र में हिंदी प्रचार किसने किया (1875-76)?
a) तिलक
b) गोपाल नरहरि देशपांडे और केशव वामन पेठे
c) गाँधी
d) रानडे
उत्तर – b (क्रमशः 1875 तथा 1876 में।)
गुजराती कवियों में हिंदी का महत्त्व किसने स्वीकार किया?
a) कबीर
b) नरसी मेहता, दयाराम, दलपत राम
c) ज्ञानेश्वर
d) तुलसीदास
उत्तर – b (कविताओं के माध्यम से।)
हिंदी की प्रकृति क्या है?
a) केवल हिंदुओं की
b) देश की परिचायक और व्यापक
c) मुट्ठी भर लोगों की
d) विदेशी
उत्तर – b (कोने-कोने में फैले लोगों की।)
सोवियत संघ में कितनी भाषाएँ बोली जाती हैं?
a) 10
b) 66
c) 100
d) 5
उत्तर – b (राष्ट्रभाषा रूसी।)
दक्षिण की भाषाओं में कितने प्रतिशत शब्द हिंदी से मिलते हैं?
a) 20%
b) 60%
c) 80%
d) 100%
उत्तर – b (तमिल को अपवाद।)
कबीर ने संस्कृत को क्या और हिंदी को क्या कहा?
a) बहता नीर, कूप जल
b) कूप जल, बहता नीर
c) पर्वत, नदी
d) आकाश, पृथ्वी
उत्तर – b (संस्कृत कूप जल, हिंदी बहता नीर।)
जायसी के अनुसार प्रेम का मार्ग कौन सी भाषा से प्रशस्त होता है?
a) तुर्की
b) अरबी
c) हिंदी
d) फारसी
उत्तर – c (जेही महं मारग प्रेम का।)
तिलक ने 1920 में कहाँ हिंदी में भाषण दिया?
a) दिल्ली
b) बनारस
c) मुंबई
d) कोलकाता
उत्तर – b (बनारस में।)
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा किसने स्थापित की?
a) तिलक
b) महात्मा गाँधी
c) रानडे
d) राममोहन राय
उत्तर – b (गाँधी द्वारा स्थापित।)
सरोजिनी नायडु ने हिंदी को क्या कहा?
a) प्रदेश भाषा
b) कौमी जवान (राष्ट्रीय भाषा)
c) विदेशी
d) स्थानीय
उत्तर – b (हमारी कौमी जवान हिंदी।)
बंकिम चंद्र चटर्जी ने हिंदी को क्या कहा?
a) विभाजनकारी
b) ऐक्य बंधन स्थापित करने वाली
c) कठिन
d) छोटी
उत्तर – b (ऐक्य बंधन स्थापित कर सकेंगे।)
देवनागरी लिपि परिषद किसने स्थापित की?
a) गाँधी
b) जस्टिस शारदाचरण मिश्र
c) तिलक
d) रानडे
उत्तर – b (लिपि विस्तार परिषद।)
हिंदी गद्य की पहली कहानी किसकी है?
a) खुसरो
b) इंशाअल्लाखाँ
c) जायसी
d) रहीम
उत्तर – b (केतकी की कहानी।)
हिंदी में विश्वकोश किसने प्रकाशित किया?
a) रामानंद चाटर्जी
b) नागेंद्रनाथ बसु
c) चिंतमणी घोष
d) सुरेश चंद्र
उत्तर – b (25 खंडों में।)
आर्य समाज के संस्थापक कौन थे जिन्होंने हिंदी अपनाई?
a) तिलक
b) स्वामी दयानंद सरस्वती
c) गाँधी
d) राममोहन
उत्तर – b (गुजराती होते हुए भी।)
लेख का मुख्य निष्कर्ष क्या है?
a) भाषा विविधता बाधक
b) विविधता एकता में बाधक नहीं, हिंदी जोड़ने वाली
c) अंग्रेजी सर्वश्रेष्ठ
d) लिपि बदलो
उत्तर – b (भाषाओं की विविधता एकता में बाधक नहीं।)
हिंदी को मुस्लिम कवियों ने क्यों अपनाया?
a) मजबूरी
b) अभिव्यक्ति का माध्यम
c) धन के लिए
d) राजनीति
उत्तर – b (जायसी, रहीम, खुसरो आदि।)
अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
1–10 – हिंदी की महत्ता और भारतेंदु का दृष्टिकोण
- प्रश्न – “हमारी राष्ट्रभाषा” पाठ के लेखक ने किसकी भाषा का उल्लेख प्रेरणा के रूप में किया है?
उत्तर – लेखक ने भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र की भाषा का उल्लेख प्रेरणा के रूप में किया है। - प्रश्न – भारतेंदु हरिश्चंद्र ने भाषा के संबंध में क्या कहा था?
उत्तर – उन्होंने कहा था, “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।” - प्रश्न – भारतेंदु जी के अनुसार बिना भाषा के क्या नहीं मिटता?
उत्तर – बिना निज भाषा के ज्ञान के तन का सूल (कष्ट) नहीं मिटता। - प्रश्न – हमारे देश में कितनी भाषाएँ बोली जाती हैं?
उत्तर – हमारे देश के विभिन्न भागों में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं। - प्रश्न – फिर भी पूरे देश में कौन-सी भाषा सबसे अधिक प्रचलित है?
उत्तर – पूरे देश में हिंदी भाषा सबसे अधिक प्रचलित है। - प्रश्न – हिंदी को “राष्ट्रभाषा” क्यों कहा गया?
उत्तर – हिंदी को इसलिए राष्ट्रभाषा कहा गया क्योंकि यह पूरे देश में समान रूप से व्यवहार में लाई जाती है। - प्रश्न – महात्मा गाँधी ने हिंदी के संबंध में क्या कहा था?
उत्तर – महात्मा गाँधी ने कहा था कि जैसे अंग्रेज़ अपनी भाषा अंग्रेज़ी में बोलते हैं, वैसे ही हमें भी हिंदी को भारत माता की भाषा बनाना चाहिए। - प्रश्न – गाँधीजी के अनुसार हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना क्यों आवश्यक है?
उत्तर – गाँधीजी के अनुसार हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना हमारे राष्ट्रीय कर्तव्य का पालन है। - प्रश्न – गाँधीजी ने हिंदी को किसका मूल बताया?
उत्तर – गाँधीजी ने हिंदी को राष्ट्र की उन्नति का मूल बताया। - प्रश्न – क्या केवल गाँधीजी ही हिंदी के महत्त्व को समझते थे?
उत्तर – नहीं, गाँधीजी से पहले भी अनेक संतों, सुधारकों और नेताओं ने हिंदी का महत्त्व समझा था।
11–20 – सुधारकों और नेताओं का योगदान
- प्रश्न – महाराष्ट्र में हिंदी के प्रचार में किनका योगदान रहा?
उत्तर – महाराष्ट्र में गोपाल नरहरि देशपांडे और केशव वामन पेठे का उल्लेखनीय योगदान रहा। - प्रश्न – इन दोनों ने किस वर्ष हिंदी प्रचार का कार्य किया?
उत्तर – गोपाल नरहरि देशपांडे ने सन् 1875 में और केशव वामन पेठे ने 1876 में हिंदी प्रचार का कार्य किया। - प्रश्न – मराठी संत ज्ञानेश्वर और मुकुंदराज किस युग के थे?
उत्तर – वे ग्यारहवीं और बारहवीं शताब्दी के संत थे। - प्रश्न – किन नेताओं ने हिंदी प्रचार में सहयोग दिया?
उत्तर – महादेव गोविंद रानडे और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने हिंदी प्रचार में सहयोग दिया। - प्रश्न – गुजरात के किन कवियों ने हिंदी को स्वीकार किया?
उत्तर – नरसी मेहता, मालन दयाराम और दलपत जैसे कवियों ने हिंदी को स्वीकार किया। - प्रश्न – हिंदी को महत्त्व क्यों दिया गया था?
उत्तर – हिंदी को इसलिए महत्त्व दिया गया क्योंकि यह सबसे अधिक लोगों द्वारा समझी और बोली जाने वाली भाषा थी। - प्रश्न – हिंदी की विशेषता क्या है?
उत्तर – हिंदी की विशेषता उसकी व्यापकता और सबको जोड़ने की क्षमता है। - प्रश्न – क्या हिंदी केवल हिंदुओं की भाषा है?
उत्तर – नहीं, हिंदी पूरे देश के सभी लोगों की भाषा है। - प्रश्न – हिंदी की प्रकृति कैसी बताई गई है?
उत्तर – हिंदी की प्रकृति देश की एकता और सर्वभौमिकता की परिचायक बताई गई है। - प्रश्न – हिंदी के सहारे व्यक्ति क्या कर सकता है?
उत्तर – हिंदी के सहारे कोई व्यक्ति देश के एक कोने से दूसरे कोने तक जाकर अपना काम चला सकता है।
21–30 – हिंदी और अन्य भाषाओं का संबंध
- प्रश्न – भारत में भाषाई विविधता के बावजूद कौन-सी भाषा एकता का प्रतीक है?
उत्तर – हिंदी भाषा ही भारत की एकता का प्रतीक है। - प्रश्न – रूस (सोवियत संघ) में कितनी भाषाएँ बोली जाती हैं?
उत्तर – रूस में लगभग 66 भाषाएँ बोली और लिखी जाती हैं। - प्रश्न – फिर भी रूस की राष्ट्रभाषा कौन-सी है?
उत्तर – रूस की राष्ट्रभाषा रूसी है। - प्रश्न – हिंदी और दक्षिण की भाषाओं में क्या समानता है?
उत्तर – दक्षिण की भाषाओं में लगभग 60 प्रतिशत शब्द हिंदी से मिलते हैं। - प्रश्न – किस भाषा को अपवाद के रूप में रखा गया है?
उत्तर – तमिल भाषा को अपवाद के रूप में रखा गया है। - प्रश्न – स्वतंत्रता से पहले भारत के संतों ने किस भाषा में प्रचार किया?
उत्तर – उन्होंने अपने विचारों का प्रचार हिंदी के माध्यम से किया। - प्रश्न – किन संतों ने हिंदी में रचना की?
उत्तर – कबीर, नानक, सचल, लल्लचंद, बदल, शंकरदेव आदि संतों ने हिंदी में रचना की। - प्रश्न – दक्षिण के कौन से कवि हिंदी भावधारा से जुड़े थे?
उत्तर – वेमना, सर्वज्ञ, उल्लूर और आलवार आदि कवि। - प्रश्न – कबीर ने संस्कृत और भाषा की तुलना किससे की थी?
उत्तर – कबीर ने संस्कृत को कूप जल और भाषा को बहता नीर कहा था। - प्रश्न – भाषा का क्या कार्य होता है?
उत्तर – भाषा लोगों को जोड़ने और प्रेम का संदेश देने का कार्य करती है।
31–40 – हिंदी के प्रचारक, संस्थाएँ और विचारक
- प्रश्न – महाकवि जायसी ने किस भाषा की सराहना की थी?
उत्तर – महाकवि जायसी ने हिंदी भाषा की सराहना की थी। - प्रश्न – महर्षि दयानंद सरस्वती ने कौन-सी भाषा में विचार फैलाए?
उत्तर – उन्होंने हिंदी भाषा के माध्यम से अपने विचार फैलाए। - प्रश्न – लोकमान्य तिलक ने हिंदी में भाषण कब दिया था?
उत्तर – उन्होंने सन् 1920 में बनारस में हिंदी में भाषण दिया था। - प्रश्न – दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार के लिए कौन-सी सभा स्थापित की गई?
उत्तर – दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की गई। - प्रश्न – हिंदी प्रचार समिति वर्धा की स्थापना किसने की?
उत्तर – इसका श्रेय राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को जाता है। - प्रश्न – हिंदी का प्रचार किन राज्यों में व्यापक हुआ?
उत्तर – हिंदी का प्रचार उड़ीसा, असम, मेघालय और दक्षिण भारत के राज्यों में व्यापक हुआ। - प्रश्न – विभाजन के बाद किन लोगों ने हिंदी में योगदान दिया?
उत्तर – विभाजन के बाद सिंधी भाइयों ने हिंदी लेखन में उल्लेखनीय योगदान दिया। - प्रश्न – श्रीमती सरोजिनी नायडु ने हिंदी के बारे में क्या कहा था?
उत्तर – उन्होंने कहा था कि देश के सबसे बड़े हिस्से में हिंदी बोली और लिखी जाती है। - प्रश्न – आचार्य क्षितिमोहन सेन ने हिंदी को क्या माना था?
उत्तर – उन्होंने हिंदी को देश की एकता का प्रधान साधन माना था। - प्रश्न – क्षितिमोहन सेन के अनुसार भाषा क्या है?
उत्तर – भाषा साधन है, साध्य नहीं; मार्ग है, गंतव्य नहीं; आधार है, आधेय नहीं।
41–50 – बंगाल और मुस्लिम कवियों का योगदान
- प्रश्न – बंगाल में हिंदी विरोध की आवाज़ के बारे में लेखक ने क्या कहा है?
उत्तर – लेखक ने कहा है कि बंगाल के लोग भूल गए हैं कि उन्होंने हिंदी के संवर्धन में बड़ा योगदान दिया था। - प्रश्न – राजा राममोहन राय ने कौन-सा पत्र हिंदी में निकाला था?
उत्तर – उन्होंने “अग्रदूत” नामक पत्र हिंदी में प्रकाशित किया था। - प्रश्न – बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने किस ग्रंथ में हिंदी का समर्थन किया?
उत्तर – उन्होंने “बंग दर्शन” ग्रंथ के पाँचवें खंड में हिंदी का समर्थन किया। - प्रश्न – अरविंद घोष ने किस माध्यम से हिंदी के उन्नयन में योगदान दिया?
उत्तर – उन्होंने “कर्मयोगी” और “धर्म” नामक पत्रों के माध्यम से योगदान दिया। - प्रश्न – जस्टिस शारदाचरण मिश्र ने कौन-सी परिषद स्थापित की?
उत्तर – उन्होंने लिपि विस्तार परिषद की स्थापना की थी। - प्रश्न – शारदाचरण मिश्र का उद्देश्य क्या था?
उत्तर – उनका उद्देश्य देवनागरी लिपि के माध्यम से भारतीय भाषाओं को एक सूत्र में बाँधना था। - प्रश्न – यदि सारी भाषाएँ देवनागरी लिपि अपना लें तो क्या होगा?
उत्तर – तो भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक एकता सुदृढ़ और अक्षुण्ण रहेगी। - प्रश्न – किन मुस्लिम कवियों ने हिंदी में लिखा?
उत्तर – जायसी, रहीम, रसखान, आलम, शेख और उस्मान जैसे मुस्लिम कवियों ने हिंदी में लिखा। - प्रश्न – हिंदी कहानी की विधा में निखार किसने लाया?
उत्तर – सैयद इंशाअल्ला ख़ाँ ने “केतकी की कहानी” लिखकर हिंदी कहानी को निखार दिया। - प्रश्न – इस पाठ का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर – इस पाठ का मुख्य संदेश यह है कि हिंदी भारत की एकता, संस्कृति और राष्ट्रीय भावना की सशक्त प्रतीक है, जो सबको जोड़ती है।
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- प्रश्न – राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए क्या तर्क दिया था?
उत्तर – गाँधीजी ने तर्क दिया था कि जैसे अंग्रेज़ अपनी मातृभाषा अंग्रेज़ी का प्रयोग करते हैं, वैसे ही भारतीयों को हिंदी को भारतमाता की एक भाषा बनाने का गौरव देना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदी सब समझते हैं, इसलिए इसे राष्ट्रभाषा बनाना कर्तव्य है।
- प्रश्न – महाराष्ट्र के किन नेताओं ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का अभिनंदनीय प्रयास किया?
उत्तर – महाराष्ट्र में गोपाल नरहरि देशपांडे और केशव वामन पेठे नामक महानुभावों ने क्रमशः 1875 और 1876 में हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया था। महादेव गोविंद रानडे और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने भी इस दिशा में प्रशंसनीय कार्य किया।
- प्रश्न – हिंदी को किस आधार पर राष्ट्रभाषा का गौरवपूर्ण स्थान मिला?
उत्तर – हिंदी को यह महत्त्व इसलिए मिला क्योंकि इसे जानने, समझने और बोलने वाले लोग देश के कोने-कोने में फैले हुए हैं। इसकी यह व्यापक प्रकृति ही देश की परिचायक है, न कि यह अन्य भाषाओं से ऊँची है।
- प्रश्न – सोवियत संघ का उदाहरण देकर लेखक ने क्या सिद्ध करने का प्रयास किया है?
उत्तर – लेखक ने सोवियत संघ का उदाहरण इसलिए दिया कि वहाँ 66 भाषाएँ बोली जाने के बावजूद, रूसी ही राष्ट्रभाषा है। इससे सिद्ध होता है कि बहु-भाषिता हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने में रुकावट नहीं डाल सकती।
- प्रश्न – स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व किन संतों और नेताओं ने हिंदी को अपनाया था?
उत्तर – कबीर, पंजाब के नानक, बंगाल के बदल और दक्षिण के वेमना जैसे संतों ने हिंदी को अपनाया। महात्मा गाँधी, दयानंद सरस्वती और लोकमान्य तिलक जैसे नेताओं ने भी अपने विचारों के प्रसार के लिए हिंदी को माध्यम बनाया था।
- प्रश्न – कबीर ने संस्कृत और भाषा (हिंदी) की तुलना किस प्रकार की है?
उत्तर – कबीर ने संस्कृत को कूप जल (कुएँ का सीमित जल) और भाषा (हिंदी) को बहता नीर (बहता पानी) कहा है। इसका अर्थ है कि हिंदी सरल, गतिशील और सभी के लिए सुलभ होने के कारण एकता की कड़ी है।
- प्रश्न – जायसी ने प्रेम के मार्ग को प्रशस्त करने वाली भाषा के बारे में क्या कहा है?
उत्तर – महाकवि जायसी ने कहा था, “तुरकी अरबी, हिंदुई भाषा जेती आहि। जेही महं मारग प्रेम का सवै सराहे ताहि॥” अर्थात, सभी भाषाएँ अच्छी हैं, लेकिन जिसमें प्रेम का मार्ग प्रशस्त हो, उसी की सब प्रशंसा करते हैं।
- प्रश्न – राजा राममोहन राय और बंकिम चंद्र चाटर्जी ने हिंदी को लेकर क्या महत्त्वपूर्ण योगदान दिया?
उत्तर – राजा राममोहन राय ने ‘अग्रदूत’ नामक पत्र हिंदी में प्रकाशित किया। बंकिम चंद्र चाटर्जी ने ‘बंग दर्शन’ में स्पष्ट लिखा कि हिंदी भाषा ही ऐक्य बंधन स्थापित कर सकेगी।
- प्रश्न – जस्टिस शारदाचरण मिश्र ने किस उद्देश्य से लिपि विस्तार परिषद की स्थापना की थी?
उत्तर – जस्टिस शारदाचरण मिश्र ने लिपि विस्तार परिषद की स्थापना करके देवनागर नामक पत्र प्रकाशित किया। उनका उद्देश्य देवनागरी लिपि के माध्यम से समस्त भारतीय भाषाओं की कृतियों को प्रकाशित करके उनमें समन्वय स्थापित करना था।
- प्रश्न – किन मुस्लिम कवियों और लेखकों ने हिंदी को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया?
उत्तर – जायसी, रहीम, रसखान, आलम, शेख और उस्मान जैसे मुस्लिम कवियों ने हिंदी को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। खड़ीबोली के आदि कवि अमीर खुसरो और सैयद इन्शाअल्लाखाँ (केतकी की कहानी) का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- प्रश्न – हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए स्वतंत्रता से पूर्व किन अंचलों के नेताओं ने प्रयास किए थे?
उत्तर – महाराष्ट्र में गोपाल नरहरि देशपांडे, केशव वामन पेठे और लोकमान्य तिलक जैसे नेताओं ने प्रयास किए। गुजरात में नरसी महता, दयाराम जैसे कवियों ने हिंदी के महत्त्व को स्वीकारा। इसके अतिरिक्त, बंगाल के राजा राम मोहन राय और बंकिम चंद्र चाटर्जी ने भी हिंदी को ऐक्य बंधन स्थापित करने वाली भाषा मानकर उसका संवर्धन किया, जिससे यह अखिल भारतीय आंदोलन बन गया।
- प्रश्न – लेखक ने किस प्रकार सिद्ध किया है कि भाषाओं की विविधता राष्ट्रीय एकता में बाधक नहीं है?
उत्तर – लेखक ने दो तर्क दिए हैं – पहला, कबीर ने हिंदी को बहता नीर कहा, जो जोड़ने का संदेश देता है। दूसरा, उन्होंने सोवियत संघ का उदाहरण दिया जहाँ 66 भाषाएँ बोली जाती हैं, फिर भी रूसी राष्ट्रभाषा है। इससे सिद्ध होता है कि पानी और वाणी की विविधता स्वाभाविक है, किंतु हिंदी की व्यापक प्रकृति देश की उदात्तता एवं एकात्मकता को भंग होने नहीं देती।
- प्रश्न – हिंदी की व्यापकता सिद्ध करने के लिए दक्षिण भारत के संतों और नेताओं का क्या योगदान रहा?
उत्तर – दक्षिण भारत के संतों जैसे वेमना, सर्वज्ञ और आलवारों की कविता की मूल भावना भी उत्तर के संतों के समान थी, जो सांस्कृतिक एकता को दर्शाती है। आधुनिक काल में महात्मा गाँधी ने दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना कर हिंदी के प्रचार-प्रसार को व्यापक बल दिया, जिसके कारण आज दक्षिण के राज्यों में हिंदी का सफल लेखन, पठन और अध्यापन हो रहा है।
- प्रश्न – आचार्य क्षितिमोहन सेन ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए क्या शर्त रखी थी?
उत्तर – आचार्य क्षितिमोहन सेन ने कहा था कि हिंदी को राष्ट्रभाषा का पद पाने के लिए अंग्रेज़ी भाषा की तरह संसार की समस्त विद्याओं, कलाओं और संस्कृतियों को आत्मसात करना होगा। उन्होंने जोर दिया कि हिंदी में वह क्षमता है, लेकिन बिना ऐसा किए भाषा की साधना अधूरी रह जाएगी। भाषा साधन है, साध्य नहीं, और उसे नाना विधाओं की त्रिवेणी बनना होगा।
- प्रश्न – लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गाँधी के विचारों ने हिंदी की व्यापकता को किस प्रकार पुष्ट किया?
उत्तर – लोकमान्य तिलक ने महाराष्ट्रीय होते हुए भी 1920 में हिंदी में भाषण देते हुए कहा था कि हिंदी भारत की सामान्य भाषा होनी चाहिए और प्रांतों के बीच विचार विनिमय का माध्यम हिंदी ही होनी चाहिए। महात्मा गाँधी ने गुजराती होते हुए भी हिंदी को राष्ट्रीयता और समाज सुधार की भावधारा का साधन बनाया। इन गैर-हिंदी भाषी नेताओं का हिंदी को अपनाना उसकी सार्वजनिक उपयोगिता और महत्ता का सुपुष्ट प्रमाण है।

