Mitra Ho To Aisa (Pauranik Katha) – Dr. Kamal Satyarthi, Bhasha Mani, Class VIII, The Best Solution

पाठ का सारांश

यह पाठ महाभारत के उस प्रसंग पर आधारित है जहाँ श्रीकृष्ण और कर्ण के बीच संवाद होता है। यह कहानी सच्ची मित्रता, वफादारी और नैतिकता के द्वंद्व को दर्शाती है।

  1. श्रीकृष्ण का शांति-प्रस्ताव और कर्ण से भेंट

दुर्योधन की सभा में शांति का प्रस्ताव ठुकराए जाने के बाद श्रीकृष्ण विक्षुब्ध होकर निकलते हैं। रास्ते में उन्हें कर्ण मिलते हैं। श्रीकृष्ण सोचते हैं कि यदि कर्ण पांडवों के पक्ष में आ जाएँ, तो विनाशकारी युद्ध टल सकता है। वे कर्ण को अपने रथ पर बिठाते हैं और उनसे भावपूर्ण संवाद शुरू करते हैं।

  1. जन्म का रहस्य और प्रलोभन

श्रीकृष्ण कर्ण को उसके जन्म का वह रहस्य बताते हैं जिसे वह अब तक नहीं जानता था। वे बताते हैं कि कर्ण वास्तव में कुंती का ज्येष्ठ पुत्र और पांडवों का बड़ा भाई है। श्रीकृष्ण उसे प्रलोभन देते हैं कि यदि वह पांडवों के साथ आ जाए, तो उसका राज्याभिषेक किया जाएगा, पांडव उसकी आज्ञा मानेंगे और वह ‘धर्मराज’ (युधिष्ठिर) का अग्रज कहलाएगा। इस तरह भीषण नरसंहार को रोका जा सकता है।

  1. कर्ण का संघर्ष और अतीत की पीड़ा

कर्ण श्रीकृष्ण की बातें धैर्यपूर्वक सुनता है, लेकिन वह विचलित नहीं होता। वह श्रीकृष्ण को याद दिलाता है कि जब समाज उसे ‘सूतपुत्र’ कहकर अपमानित कर रहा था और जब उसकी माता (कुंती) ने उसे त्याग दिया था, तब केवल दुर्योधन ने उसे गले लगाया था। दुर्योधन ने ही उसे ‘बंधु’ कहा और अंग देश का राजा बनाकर सम्मान दिया। कर्ण कहता है कि भाग्य ने उसे बचपन से ही छला है और अपमान की आग में झोंका है।

  1. मित्रता की पराकाष्ठा

कर्ण श्रीकृष्ण के प्रस्ताव को बड़ी विनम्रता और दृढ़ता से ठुकरा देता है। वह कहता है कि वह सत्ता, सिंहासन या कुल के नाम के लिए उस मित्र (दुर्योधन) को धोखा नहीं दे सकता जिसने उसे तब सहारा दिया जब कोई उसके साथ नहीं था। वह स्पष्ट करता है कि यदि उसे इंद्र का पद भी मिले, तो वह उसे दुर्योधन के चरणों में अर्पित कर देगा। उसके लिए मित्रता की शीतलता दुनिया की हर भौतिक संपदा से बड़ी है।

  1. श्रीकृष्ण का विस्मय

कर्ण की इस निःस्वार्थ मित्रता और अडिग चरित्र को देखकर श्रीकृष्ण चकित रह जाते हैं। जब कर्ण रथ से उतरकर उन्हें प्रणाम करता है, तो श्रीकृष्ण के मन में केवल एक ही विचार आता है— “ओह! मित्र हो तो ऐसा!”

मुख्य संदेश –

  • सच्ची मित्रता – मित्रता किसी स्वार्थ या प्रलोभन की मोहताज नहीं होती।
  • कृतज्ञता – जो संकट में साथ दे, उसका साथ छोड़ना अधर्म और अनैतिकता है।
  • दृढ़ चरित्र – विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने सिद्धांतों पर टिके रहना ही महानता है।

कठिन शब्दार्थ

1 विक्षुब्ध – बहुत परेशान या दुखी  Agitated / Disturbed

 2 प्रलोभन – लालच  Temptation / Allurement

 3 आग्रह – निवेदन  Request / Urge

 4 सालना – पीड़ा देना / खटकना  To prick / Torment

 5 विचित्र – अनोखा / अजीब  Strange / Peculiar

 6 क्रूर – निर्दयी  Cruel / Merciless

 7 अभिभूत – भावुक होकर भर आना  Overwhelmed

 8 विस्मित – हैरान  Astonished / Amazed

 9 ग्लानि – मन की पीड़ा / पछतावा  Remorse / Guilt

 10 लांछना – दोषारोपण / बुराई  Stigma / Blame

 11 तिरस्कार – अपमान  Disdain / Rejection

 12 आलिंगन – गले लगाना  Embrace / Hug

 13 कलंकित – बदनाम  Tarnished / Stained

 14 विस्मय – आश्चर्य  Wonder / Surprise

 15 विनाशकारी – सब कुछ नष्ट करने वाला  Catastrophic / Destructive

 16 नरसंहार – भारी संख्या में हत्या  Massacre / Carnage

 17 ज्येष्ठ – सबसे बड़ा  Eldest

 18 अनुज – छोटा भाई  Younger brother

 19 सहोदर – एक ही माँ की संतान  Real brother (Sibling)

 20 पुरुषार्थ – पराक्रम / मेहनत  Valor / Human effort

 21 धनुर्धर – धनुष चलाने वाला  Archer

 22 महारथी – महान योद्धा  Great warrior

 23 पुण्य अभिषेक – पवित्र राज्याभिषेक  Sacred anointing / Coronation

 24 अंगरक्षक – शरीर की रक्षा करने वाला  Bodyguard

 25 दुराग्रह – गलत ज़िद  Obstinacy / Stubbornness

 26 अग्रज – बड़ा भाई  Elder brother

 27 उद्भट – प्रखर / महान  Eminent / Extraordinary

 28 नररत्न – मनुष्यों में रत्न के समान  A gem among men

 29 शांतिदूत – शांति का संदेश देने वाला  Messenger of peace

 30 कदाचित – शायद  Perhaps / Maybe

 31 रक्षी – रक्षा करने वाला  Protector

 32 वंचितों – जिन्हें कुछ न मिला हो  Underprivileged / Deprived

 33 बंधु – भाई या मित्र  Brother / Kin

 34 राधापुत्र – राधा का बेटा (कर्ण)  Son of Radha

 35 कृतज्ञ – उपकार मानने वाला  Grateful / Indebted

 36 परमबंधु – सबसे प्रिय मित्र  Dearest friend

 37 सूतपुत्र – सारथी का बेटा  Son of a charioteer

 38 अनर्थ – बुरा काम  Misfortune / Evil deed

 39 अधर्म – धर्म के विरुद्ध  Unrighteousness / Irreligion

 40 अनैतिक – नीति के विरुद्ध  Immoral

 41 लोकभय – समाज का डर  Fear of society

 42 अभय – निडर  Fearless

 43 अदेय – जो देने योग्य न हो  Not worth giving

 44 भौतिक संपदा – सांसारिक धन-दौलत  Material wealth

 45 कलंकित – अपमानित  Infamous / Disgraced

 46 समर्पित – अर्पण किया हुआ  Dedicated / Devoted

 47 ऐश्वर्य – विलासिता / वैभव  Opulence / Luxury

 48 विलीन – गायब होना  Disappear / Dissolve

 49 तिरस्कार – उपेक्षा  Scorn / Contempt

 50 छला – धोखा दिया  Deceived / Cheated

 51 अर्पित – भेंट करना  Offered / Bestowed

 52 आँका – मूल्य तय करना  Evaluated / Appraised

 53 विस्मित – चकित  Surprised / Stunned

 54 चिंतन – गहराई से सोचना  Reflection / Contemplation

 55 मंडित – सुसज्जित / युक्त  Adorned / Endowed

 56 ग्रस्त – पीड़ित / फँसा हुआ  Afflicted / Seized

 57 जयगान – जीत की घोषणा  Anthem of victory

 58 अभिभूत – भावुक  Overpowered with emotion

 59 पसीजा – पिघलना (दया आना)  To be moved with pity

 60 तिरस्कार – बेइज्जती  Rejection

 61 अवश – मजबूर  Helpless

 62 जल-तरंगों – पानी की लहरें  Water waves

 63 भीषण – डरावना / भयानक  Terrible / Dreadful

 64 आतंक – डर  Terror / Panic

 65 निश्चय – दृढ़ संकल्प  Determination / Decision

 66 रहस्यमयी – गुप्त  Mysterious

 67 नरपुंगव – श्रेष्ठ मनुष्य  Best among men

 68 शीतल – ठंडा / सुखद  Cool / Soothing

 69 मूल्य – कीमत  Value / Worth

 70 अद्वितीय – जिसके जैसा कोई न हो  Unique / Peerless

 

मौखिक – 1. उच्चारण कीजिए –

विक्षुब्ध, क्रोधित, आग्रह, कदाचित, ज्येष्ठ, अद्वितीय, पुरुषार्थ, पराक्रम, निस्सहायों, वंचितों, धनुर्धर, उद्भट,क्रूर, कुबुद्धि, अभिषेक, अंगरक्षक, निर्णय, कृतज्ञ, रहस्यमयी, विस्मित, लांछना, तिरस्कार, नरपुंगव ऐश्वर्य, ग्लानि, आँका

विक्षुब्ध – Vik-shubdh

अभिषेक – Ab-hi-shayk

क्रोधित – Krod-hit

अंगरक्षक – Ang-rak-shak

आग्रह – Aa-grah

निर्णय – Nir-nay

कदाचित – Ka-daa-chit

कृतज्ञ – Kri-tag-ya

ज्येष्ठ – Jyaish-th

रहस्यमयी – Ra-has-ya-ma-yee

अद्वितीय – Ad-vi-tee-ya

विस्मित – Vis-mit

पुरुषार्थ – Pu-ru-sharth

लांछना – Laanch-naa

पराक्रम – Pa-raa-kram

तिरस्कार – Ti-ras-kaar

निस्सहायों – Nis-sa-haa-yon

नरपुंगव – Nar-pung-gav

वंचितों – Van-chi-ton

ऐश्वर्य – Aish-var-ya

धनुर्धर – Dha-nur-dhar

ग्लानि – Glaa-ni

उद्भट – Ud-bhat

आँका – Aan-kaa

क्रूर – Kroor

कुबुद्धि – Ku-bud-dhi

  1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर बताइए-

(क) दुर्योधन की सभा से निकलते समय कृष्ण निराश क्यों थे?

उत्तर – दुर्योधन की सभा से निकलते समय कृष्ण निराश और विक्षुब्ध थे क्योंकि दुर्योधन ने उनके शांति-प्रस्ताव और किसी भी आग्रह-अनुरोध को स्वीकार नहीं किया था। इस कारण युद्ध अब अनिवार्य लग रहा था।

(ख) वह क्या भेद था जो कृष्ण के मन को सालता रहा था?

उत्तर – वह भेद यह था कि कर्ण वास्तव में कुंती का ज्येष्ठ पुत्र और पांडवों का सहोदर अर्थात् सगा भाई है, जिसे वह अपना शत्रु समझकर उनके विनाश का चिंतन करता रहता है।

(ग) कर्ण कृष्ण की किस बात से अभिभूत थे?

उत्तर – कर्ण कृष्ण की इस बात से अभिभूत थे कि कृष्ण उनसे इतना स्नेह करते हैं और उनके जन्म के छिपे हुए रहस्य को बताकर उन्हें उचित सम्मान और स्थान दिलाने का प्रयास कर रहे हैं।

(घ) कर्ण की रहस्यमयी जन्मकथा क्या थी?

उत्तर – कर्ण की जन्मकथा यह थी कि वह माता कुंती और सूर्य देव का पुत्र था। लोक-लाज के भय से कुंती ने जन्म के तुरंत बाद उसे नदी की लहरों में बहा दिया था, जहाँ से उसे एक सूत अर्थात् सारथी परिवार ने अपनाया।

लिखित

  1. सही विकल्प पर लगाइए-

(क) कृष्ण कौन सी कोशिश करने के विषय में सोच रहे हैं?

(i) युद्ध को रोकने की

(ii) दुर्योधन को सद्बुद्धि दिलाने की

(iii) कर्ण को पांडव पक्ष में मिलाने की

(iv) कर्ण के कुंती को माँ मान लेने की

(ख) कृष्ण ने अनैतिक अधर्म और क्रूरता किसे कहा है?

(i) कर्ण और दुर्योधन की मित्रता हो जाने को

(ii) कुंती का कर्ण को जल-तरंगों को सौंप देने को

(iii) कर्ण और पार्थ का एक दूसरे का रक्त का प्यासा होने को

(iv) कौरव और पांडवों के बीच युद्ध होने को

(ग) कर्ण के अनुसार किसका मूल्य भौतिक संपदा और मान-सम्मान से नहीं आँका जा सकता?

(i) मुझे कुंती द्वारा पुत्र स्वीकारना

(ii) राजपुत्रों के बीच मिला सम्मान

(iii) पांडवों द्वारा दिया मान-सम्मान

(iv) दुर्योधन के प्रति मित्रता का भाव

  1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

(क) कृष्ण कर्ण को पांडवों के पक्ष में क्यों मिलाना चाहते थे?

उत्तर – कृष्ण जानते थे कि कर्ण अद्वितीय वीर और धनुर्धर है। यदि कर्ण पांडवों से मिल जाता, तो न केवल विनाशकारी युद्ध टल जाता, बल्कि पांडवों को अपना बड़ा भाई और अपार शक्ति भी मिल जाती।

(ख) कृष्ण ने कर्ण के किन गुणों की प्रशंसा की?

उत्तर – कृष्ण ने कर्ण के अद्वितीय बल, बुद्धि, दानवीरता, निस्सहायों की रक्षा करने के गुण, परशुराम के शिष्य होने और महान धनुर्धर होने की प्रशंसा की।

(ग) कृष्ण ने कर्ण के पांडवों से मिल जाने का क्या परिणाम बताया?

उत्तर – कृष्ण ने कहा कि यदि कर्ण पांडवों से मिल जाए तो उसका पुण्य अभिषेक होगा, पांडव उसका जयगान करेंगे, युद्ध का आतंक विलीन हो जाएगा और दुर्योधन भी अपना हठ त्याग देगा।

(घ) कर्ण ने कर्ण ने कृष्ण को दुर्योधन का साथ न छोड़ने का क्या कारण बताया?

उत्तर – कर्ण ने कहा कि जब पूरा संसार उसे ‘सूतपुत्र’ कहकर अपमानित कर रहा था, तब केवल दुर्योधन ने उसे गले लगाया, सम्मान दिया और राजा बनाया। ऐसे संकट के साथी का साथ केवल सत्ता और सिंहासन के लिए छोड़ना कृतघ्नता और कलंक होगा।

  1. निम्नलिखित पंक्तियों को पाठ के क्रम में लगाइए-

(क) हे केशव जो भी आप मुझे देंगे वह सब मैं कुरुराज दुर्योधन को दे दूँगा।

(ख) रथ चला। कुशल-मंगल का आदान प्रदान हुआ।

(ग) पग-पग पर मुझे ग्लानि लांछना और अपमान भोगना पड़ा।

(घ) यदि आप मुझे इंद्रपद भी दे दें तो उसे भी मैं दुर्योधन के चरणों में अर्पित कर दूँगा।

(ङ) उस समय न माँ का कलेजा पसीजा न विधाता को ही तरस आया।

(ख) रथ चला। कुशल-मंगल का आदान प्रदान हुआ।

(ग) पग-पग पर मुझे ग्लानि लांछना और अपमान भोगना पड़ा।

(ङ) उस समय न माँ का कलेजा पसीजा न विधाता को ही तरस आया।

(क) हे केशव जो भी आप मुझे देंगे वह सब मैं कुरुराज दुर्योधन को दे दूँगा।

(घ) यदि आप मुझे इंद्रपद भी दे दें तो उसे भी मैं दुर्योधन के चरणों में अर्पित कर दूँगा।

जीवन मूल्यपरक प्रश्न

कृष्ण ने ऐसा क्यों कहा- “क्या ऐसा चरित्र संभव है? ओह ! मित्र हो तो ऐसा!”

उत्तर – कृष्ण ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि कर्ण को राजसिंहासन, अखंड साम्राज्य और पांडवों के ज्येष्ठ भ्राता होने का महान प्रलोभन दिया गया था। इसके बावजूद कर्ण ने अपने उस मित्र अर्थात् दुर्योधन को धोखा देने से मना कर दिया जिसने बुरे समय में उसका साथ दिया था। कर्ण का यह त्याग और मित्रता के प्रति समर्पण अतुलनीय है।

 

भाषा ज्ञान

  1. सही विकल्प पर लगाइए-

(क) ‘अभिषेक करना’ का क्या अर्थ है?

(i) तिलक लगाना

(ii) सिंहासन पर बैठाना

(iii) सम्मान देना

(iv) स्नान कराना

(ख) किस शब्द में ‘अ’ उपसर्ग का प्रयोग नहीं किया गया है?

(i) अधर्म

(ii) अनैतिक

(iii) अकेला

(iv) अद्वितीय

(ग) कौन सा शब्द ‘युद्ध’ का पर्यायवाची नहीं है?

(i) रण

(iii) हिंसा

(ii) समर

(iv) संग्राम

 

  1. निम्नलिखित वाक्यों को विराम चिह्न लगाकर फिर से लिखिए-

(क) कृष्ण ने फिर कहा इस युद्ध को रोक दो कर्ण रोक दो इस भीषण नरसंहार को

कृष्ण ने फिर कहा, “इस युद्ध को रोक दो कर्ण! रोक दो इस भीषण नरसंहार को।”

(ख) कृष्ण ने भावपूर्ण स्वर में कहा कर्ण क्या यह विनाशकारी युद्ध होकर ही रहेगा मैंने कितना प्रयास किया पर दुर्योधन ने मेरे किसी आग्रह अनुरोध को नहीं माना

कृष्ण ने भावपूर्ण स्वर में कहा, “कर्ण! क्या यह विनाशकारी युद्ध होकर ही रहेगा? मैंने कितना प्रयास किया, पर दुर्योधन ने मेरे किसी आग्रह-अनुरोध को नहीं माना।”

 

  1. दिए गए वाक्यांशों के लिए एक शब्द लिखिए-

(क) महान है आत्मा जिसकी महात्मा

(ख) जो धनुष को धारण करता है धनुर्धर

(ग) एक ही उदर से जन्म लेने वाले सहोदर

(घ) जो किसी के अंगों की रक्षा करता है अंगरक्षक

(ङ) जो सुख देने वाला हो सुखदायक

(च) किए गए उपकार को मानने वाला कृतज्ञ

 

  1. निम्नलिखित समस्त पदों का विग्रह करके लिखिए-

(क) शांतिदूत – शांति का दूत

(ख) जन्मकथा – जन्म की कथा

(ग) लोकभय – लोक का भय

(घ) जयगान – जय का गान

(ङ) राजपुत्र – राजा का पुत्र

(च) पांडवपक्ष – पांडवों का पक्ष

 

  1. निम्नलिखित शब्दों के विलोम रूप लिखिए-

(क) कुबुद्धि X सुबुद्धि

(ख) कृतज्ञ X कृतघ्न

(ग) संभव X असंभव

(घ) शत्रु X मित्र

(ङ) दुर्भाग्य X सौभाग्य

(च) अग्रज X अनुज

(छ) विनाश X निर्माण/सृजन

(ज) सुखदायक X दुखदायक

 

  1. निम्नलिखित उपसर्गों से दो-दो शब्द बनाकर लिखिए-

(क) अ – अद्वितीय, अधर्म, अनैतिक

(ख) कु – कुबुद्धि, कुपुत्र, कुरीति

(ग) दुर् – दुराग्रह, दुर्भाग्य, दुर्लभ

(घ) अप – अपमान, अपशब्द, अपयश

(ङ) सम् – सम्मान, सम्मुख, संपत्ति

रोचक क्रियाकलाप

  1. अपने छोटे भाई/बहन को पत्र लिखकर बताइए कि आपने इस पाठ से क्या शिक्षा ग्रहण की?

उत्तर –

दिनांक – 14 फरवरी, 20XX

घर संख्या – W – 414

टीसीआई, राउरकेला

ओड़िशा

 

प्रिय अनुज

(शुभ स्नेहशीष)

आशा है कि तुम स्वस्थ और प्रसन्न होगे। आज मैंने हिंदी के पाठ ‘मित्र हो तो ऐसा’ को पढ़ा, जिसने मेरे हृदय को झकझोर दिया। इस पाठ से मैंने सीखा कि मित्रता केवल सुख का साथी होना नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में अडिग रहने का नाम है।

कर्ण ने राजसिंहासन और वैभव के बड़े से बड़े प्रलोभन को ठुकराकर दुर्योधन का साथ देना चुना, क्योंकि दुर्योधन ने उसके बुरे समय में उसे सम्मान दिया था। इस कहानी से हमें कृतज्ञता और निस्वार्थ वफ़ादारी की शिक्षा मिलती है। जीवन में कभी भी उस व्यक्ति का साथ मत छोड़ना जिसने तुम्हारी तब मदद की हो जब पूरी दुनिया तुम्हारे खिलाफ थी। उम्मीद है तुम भी अपने जीवन में ऐसे ही उच्च आदर्श अपनाओगे।

तुम्हारा अग्रज,

अविनाश

 

  1. अपने सच्चे मित्र के गुणों का वर्णन करते हुए एक अनुच्छेद लिखिए।

उत्तर – मेरा सच्चा मित्र वह है जो न केवल मेरी खुशियों में शामिल होता है, बल्कि मेरी गलतियों पर मुझे टोकता भी है। उसमें ईमानदारी, धैर्य और निस्वार्थ प्रेम कूट-कूट कर भरा है। वह संकट के समय साये की तरह मेरे साथ खड़ा रहता है।

  1. मित्र हो तो ऐसा‘ कथा का नाटक के रूप में मंचन कीजिए।

उत्तर – छात्र इस क्रियाकलाप को अपने शिक्षक के दिशानिर्देश में पूरा करेंगे।

 

गृहकार्य

जानें- हिंदी भाषा के कुछ शब्द जोड़े के रूप में प्रयोग किए जाते हैं। इन्हें शब्द-युग्म कहते हैं।

  • पाठ से छाँटकर छह शब्द-युग्म लिखिए।

कुशल-मंगल

आदान-प्रदान

दिन-रात

माँ-बाप

जय-जयकार

पग-पग

 

 

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