ICSE, Class, IX and X, Ekanki Sanchay, Chapter – Matribhumi Ka Maan, Harikrishna ‘Premi’, The Best Solutions,   मातृभूमि का मान, हरिकृष्ण ‘प्रेमी’

हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ – एकांकीकार का परिचय

श्री हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ का जन्म मध्य प्रदेश के गुना शहर में सन् 1908 में हुआ। इन्होंने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत एक पत्रकार के रूप में की। प्रेमी जी एक लोकप्रिय और सफल नाटककार हैं। आप के प्रसिद्ध नाटक हैं- ‘बंधन’, ‘छाया’,’ममता’,‘पाताल विजय’, ‘रक्षा बंधन’, ‘शिवासाधना’, ‘प्रतिशोध’, ‘आहुति’, ‘विषपान’ आदि। प्रेमी जी के एकांकियों में – ‘बेड़ियाँ’, ‘बादलों के पार’, ‘वाणी मंदिर’, ‘नया समाज’, ‘मातृभूमि का मान’, ‘निष्ठुर न्याय’ आदि। इनके नाटक सामाजिक, ऐतिहासिक तथा पौराणिक हैं।

इन्होंने अपनी रचनाओं में मानवीय प्रेम, देशभक्ति, राष्ट्रीयता, वीरता, साहस, पराक्रम जैसे मानवीय मूल्यों को स्थान दिया है। सन् 1974 में इनका निधन हो गया।

एकांकी का कथानक

हरिकृष्ण प्रेमी द्वारा रचित एकांकी ‘मातृभूमि का मान’ राजपूती आन-बान, देशभक्ति और मातृभूमि के प्रति अनन्य भक्ति की एक प्रेरणादायक कहानी है। यह एकांकी स्पष्ट करती है कि एक वीर के लिए उसकी मातृभूमि का मान उसके प्राणों से भी बढ़कर होता है, चाहे वह जन्मभूमि असली हो या नकली।

  1. मेवाड़ और बूँदी के बीच मतभेद

एकांकी का प्रारंभ मेवाड़ के सेनापति अभयसिंह और बूँदी के राव हेमू की बातचीत से होता है। मेवाड़ के महाराणा लाखा चाहते हैं कि बूँदी मेवाड़ की अधीनता स्वीकार कर ले ताकि राजपूत शक्ति संगठित हो सके। परंतु स्वाभिमानी राव हेमू इसे अस्वीकार कर देते हैं। उनका मानना है कि हाड़ा वंश प्रेम का अनुशासन मान सकता है, शक्ति का नहीं। वे स्वतंत्र रहकर ही मेवाड़ का आदर करना चाहते हैं।

  1. महाराणा लाखा की भीषण प्रतिज्ञा

मेवाड़ और बूँदी के बीच युद्ध होता है जिसमें ‘नीमरा के मैदान’ में महाराणा लाखा को हाड़ा राजपूतों से पराजित होकर भागना पड़ता है। इस पराजय को महाराणा लाखा अपने कुल के नाम पर कलंक मानते हैं। आवेश और आत्मग्लानि में आकर वे प्रतिज्ञा कर लेते हैं कि— “जब तक मैं बूँदी के दुर्ग को जीत नहीं लूँगा, तब तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा।”

  1. नकली दुर्ग का निर्माण

बूँदी का वास्तविक दुर्ग जीतना इतना आसान नहीं था और महाराणा की प्रतिज्ञा कठोर थी। राजपूत शक्तियों के बीच शत्रुता को रोकने के लिए चारणी के सुझाव पर चित्तौड़ के पास बूँदी का एक ‘नकली दुर्ग’ बनाया जाता है। योजना यह थी कि महाराणा इस नकली दुर्ग को नष्ट करके अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर लेंगे।

  1. वीर सिंह का बलिदान

मेवाड़ की सेना में वीर सिंह नाम का एक सिपाही था, जो मूल रूप से बूँदी का रहने वाला था। जब उसे पता चलता है कि उसकी मातृभूमि बूँदी का अपमान करने के लिए एक नकली दुर्ग बनाया गया है, तो उसकी देशभक्ति जाग उठती है। वह अपने कुछ साथियों के साथ उस नकली दुर्ग के भीतर छिप जाता है और संकल्प लेता है कि वह जीते जी बूँदी का अपमान नहीं होने देगा।

“नकली बूँदी भी हमें प्राणों से अधिक प्रिय है। जहाँ एक भी हाड़ा है, वहाँ बूँदी का अपमान नहीं किया जा सकता।”

  1. वास्तविक युद्ध और वीरता

महाराणा लाखा जब नकली दुर्ग पर आक्रमण करते हैं, तो उन्हें उम्मीद नहीं थी कि वहाँ से वास्तविक प्रतिरोध होगा। वीर सिंह और उसके साथी मेवाड़ की सेना का वीरतापूर्वक मुकाबला करते हैं। महाराणा वीर सिंह की वीरता देखकर दंग रह जाते हैं। अंत में, एक गोले के प्रहार से वीर सिंह शहीद हो जाता है और दुर्ग पर मेवाड़ की विजय पताका फहरा दी जाती है।

  1. एकांकी का अंत – हृदय परिवर्तन

वीर सिंह के शव को देखकर महाराणा लाखा का हृदय पश्चात्ताप से भर जाता है। उन्हें अहसास होता है कि उन्होंने व्यर्थ के अहंकार में एक महान वीर के प्राण ले लिए। तभी बूँदी के राव हेमू भी वहाँ पहुँचते हैं। वीर सिंह के बलिदान ने दोनों पक्षों की आँखें खोल दीं। महाराणा लाखा अपनी अधीनता वाली बात त्याग देते हैं और सभी राजपूत मिलकर वीर सिंह के शव के आगे नतमस्तक होते हैं।

एकांकी का संदेश

यह एकांकी सिखाती है कि –

मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राणों का उत्सर्ग करना सबसे बड़ा धर्म है।

आपसी फूट और अहंकार राष्ट्र की शक्ति को कमजोर करते हैं।

सच्ची वीरता और देशभक्ति के आगे सत्ता का अहंकार हमेशा झुक जाता है।

पात्रों की चारित्रिक विशेषताएँ

(क) वीर सिंह (प्रमुख पात्र और नायक)

अनन्य देशभक्त – वीर सिंह एकांकी का सबसे तेजस्वी पात्र है। वह मेवाड़ की सेना में सैनिक है, लेकिन उसकी आत्मा बूँदी की मिट्टी से जुड़ी है। वह नकली बूँदी के किले की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे देता है।

स्वाभिमानी – वह अपनी मातृभूमि का अपमान सहने के बजाय मौत को चुनना बेहतर समझता है। उसका मानना है कि जहाँ एक भी हाड़ा है, वहाँ बूँदी का अपमान नहीं हो सकता।

वीर और साहसी – मुट्ठी भर साथियों के साथ वह महाराणा लाखा की विशाल सेना का सामना करता है और अंतिम श्वास तक लड़ता है।

 

(ख) महाराणा लाखा (मेवाड़ के शासक)

प्रतिष्ठा के प्रति सचेत – वे मेवाड़ के गौरव को लेकर बहुत संवेदनशील हैं। अपनी हार को वे कुल का कलंक मानते हैं।

भावुक और हठी – आवेश में आकर वे बूँदी को जीतने की ऐसी भीषण प्रतिज्ञा कर लेते हैं जो अव्यावहारिक थी।

न्यायप्रिय और उदार – वीर सिंह की मृत्यु के बाद उनका हृदय परिवर्तन हो जाता है। वे अपनी गलती स्वीकार करते हैं और वीर सिंह की वीरता के आगे नतमस्तक होते हैं।

 

(ग) राव हेमू (बूँदी के शासक)

स्वाभिमानी और स्वतंत्र प्रिय – वे किसी की अधीनता स्वीकार करना पसंद नहीं करते। वे स्पष्ट कहते हैं कि हाड़ा वंश प्रेम का अनुशासन मान सकता है, शक्ति का नहीं।

दूरदर्शी – वे राजपूतों की एकता के पक्षधर हैं, लेकिन आत्म-सम्मान की कीमत पर नहीं।

 

(घ) अभयसिंह (मेवाड़ के सेनापति)

कर्तव्यनिष्ठ – वे महाराणा के आदेशों का पालन पूरी निष्ठा से करते हैं।

कुशल राजनीतिज्ञ – वे युद्ध के स्थान पर संधि और कूटनीति से काम लेने का प्रयास करते हैं और महाराणा की प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए नकली दुर्ग का प्रस्ताव भी स्वीकार करते हैं।

 

एकांकी का उद्देश्य

इस एकांकी के माध्यम से लेखक ने निम्नलिखित महान उद्देश्यों को स्पष्ट किया है –

मातृभूमि के प्रति सर्वोच्च प्रेम – एकांकी का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना है कि जन्मभूमि असली हो या नकली, उसका मान-सम्मान प्राणों से भी बढ़कर होता है। वीर सिंह का बलिदान इसी भावना का प्रतीक है।

राष्ट्रीय एकता का संदेश – लेखक ने राजपूतों की आपसी फूट और अहंकार के दुष्परिणामों को दिखाया है। संदेश यह है कि यदि देश को बचाना है, तो आपसी मतभेद भुलाकर एक होना होगा।

अहंकार का त्याग – महाराणा लाखा के माध्यम से यह बताया गया है कि व्यर्थ का दंभ और हठ केवल विनाश और पश्चाताप की ओर ले जाता है।

वीरता का सम्मान – सच्ची वीरता किसी पद या सत्ता की मोहताज नहीं होती। एक साधारण सैनिक (वीर सिंह) भी अपनी देशभक्ति से एक राजा का अहंकार झुका सकता है।

कठिन शब्दों के सरल अर्थ

1 – अधीनता – गुलामी / परतंत्रता – Subjugation / Submission

2 – छिन्न-भिन्न – बिखरा हुआ – Scattered / Fragmented

3 – असंगठित – जो एक न हो – Unorganized

4 – गत-गौरव – बीता हुआ सम्मान – Past Glory

5 – आश्रित – निर्भर – Dependent

6 – एकसूत्र – एक धागे में बंधा – Unified

7 – अनुशासन – नियम पालन – Discipline

8 – दंभ – घमंड / अहंकार – Arrogance / Vanity

9 – श्रीगणेश – शुरुआत / प्रारंभ – Commencement / Beginning

10 – व्यथित – दुखी / पीड़ित – Distressed / Grieved

11 – कलंक – दाग / अपयश – Stigma / Blemish

12 – धिक्कारना – बुरा-भला कहना – To reproach / To curse

13 – धमनियों – नसों (रक्त वाहिका) – Arteries

14 – आकस्मिक – अचानक – Sudden / Accidental

15 – अपयश – बदनामी – Infamy / Disgrace

16 – उपहासजनक – हँसी उड़ाने योग्य – Ridiculous / Mocking

17 – पौरुष – वीरता / मर्दानगी – Valour / Manliness

18 – प्रतिज्ञा – भीषण कसम / संकल्प – Vow / Pledge

19 – धृष्टता – ढिठाई / गुस्ताखी – Audacity / Insolence

20 – यम – मृत्यु के देवता – God of Death

21 – निश्चयपूर्वक – पक्के तौर पर – Decisively / Definitely

22 – तरकश – बाण रखने का केस – Quiver

23 – पुष्टि – प्रमाण / समर्थन – Confirmation / Validation

24 – हीन – कमतर / नीचा – Inferior / Low

25 – नेपथ्य – पर्दे के पीछे का भाग – Backstage

26 – शृंखला – कड़ी / जंजीर – Chain / Series

27 – स्वाधीनता – आजादी – Independence / Liberty

28 – विवेक – भला-बुरा सोचने की शक्ति – Wisdom / Intellect

29 – निवेदन – विनती / प्रार्थना – Request / Petition

30 – साधन – जरिया – Resource / Means

31 – शुभचिंतक – भला चाहने वाला – Well-wisher

32 – विद्वेष – नफरत / शत्रुता – Malice / Enmity

33 – विध्वंस – विनाश / तबाही – Destruction / Demolition

34 – उद्दंडता – अनुशासनहीनता – Insolence / Naughtiness

35 – निरीक्षण – जाँच-पड़ताल – Inspection / Observation

36 – हु-ब-हू – बिलकुल वैसा ही – Exactly / Identical

37 – बाध्य – मजबूर – Forced / Obliged

38 – सिंहनाद – शेर की दहाड़ / युद्ध घोष – Lion’s roar / War cry

39 – पथ-प्रतिरोध – रास्ता रोकना – Obstruction / Resistance

40 – वास्तविकता – सच्चाई – Reality / Truth

41 – छूछे वार – खाली या नकली हमला – Blank fire / Fake attack

42 – मान का मंदिर – सम्मान का प्रतीक – Temple of Honor

43 – धिक्कार – धिक् ! (तिरस्कार) – Shame / Reproach

44 – चप्पा-चप्पा – हर छोटा हिस्सा – Every inch

45 – व्याघात – बाधा / रुकावट – Obstruction / Interruption

46 – आभा – चमक / कांति – Splendor / Glow

47 – क्षीण – कमजोर / कम होना – Feeble / Diminished

48 – ध्वज – झंडा / पताका – Flag / Banner

49 – अभिमान – गर्व – Pride / Arrogance

50 – नमक का बदला – वफादारी निभाना – Repaying loyalty

51 – लज्जा – शर्म – Shame / Modesty

52 – अचूक – जो न चूके – Unerring / Accurate

53 – निशाना – लक्ष्य – Target / Aim

54 – उपयुक्त – सही / उचित – Appropriate / Suitable

55 – प्रहार – चोट / हमला – Assault / Blow

56 – भौंचक्की – हैरान – Stunned / Amazed

57 – विलंब – देरी – Delay

58 – पराक्रम – बहादुरी – Prowess / Bravery

59 – अग्नि-वर्षा – गोलों की बारीश – Rain of fire

60 – अनुरोध – विनती – Request / Appeal

61 – व्यर्थ – बेकार – Useless / Vain

62 – प्रयास – कोशिश – Effort / Attempt

63 – चुनौती – ललकार – Challenge

64 – मजबूर – विवश – Compelled / Helpless

65 – कायर – डरपोक – Coward

66 – निष्प्राण – जिसमें जान न हो – Lifeless / Dead

67 – सराहनीय – प्रशंसा के योग्य – Praiseworthy / Laudable

68 – बहुमूल्य – कीमती – Precious / Valuable

69 – टोली – समूह / दल – Squad / Group

70 – धमाका – विस्फोट – Blast / Explosion

71 – प्राण-पखेरू उड़ना – मृत्यु होना – To die (Soul flying away)

72 – विजयश्री – जीत की देवी – Victory / Success

73 – शव – लाश / मृत शरीर – Corpse / Dead body

74 – पश्चाताप – पछतावा – Remorse / Repentance

75 – विकल – बेचैन / व्याकुल – Restless / Agitated

76 – सायर/सायत – शुभ मुहूर्त / समय – Auspicious time

77 – अभिलाषा – तीव्र इच्छा – Strong desire / Aspiration

78 – शहीद – बलिदान देने वाला – Martyr

79 – स्वजन – अपने लोग / संबंधी – Kin / Relative

80 – पृथक् – अलग – Separate / Distinct

81 – ज्वाला – आग की लपट – Flame

82 – बलिदान – कुर्बानी – Sacrifice

83 – पटाक्षेप – नाटक समाप्त होना – Curtain-fall

84 – ससैन्य – सेना के साथ – Along with army

85 – घृणा – नफरत – Hatred / Disgust

86 – अटल – जो टले नहीं – Firm / Unshakable

87 – आवेग – जोश – Surge / Impulses

88 – विवेकहीन – समझ रहित – Rash / Senseless

89 – निर्लज्ज – बेशर्म – Shameless

90 – पठार – ऊँची चौरस भूमि – Plateau

91 – वंशज – कुल में जन्म लेने वाला – Descendant

92 – हर्ष – खुशी – Joy / Delight

93 – दृढ़ता – मजबूती – Firmness / Rigidity

94 – स्वतंत्रता – आजादी – Freedom / Liberty

95 – सामना – मुकाबला – Encounter / Confrontation

96 – शोक – दुख – Mourning / Sorrow

97 – अग्नि-कुल – आग से उत्पन्न वंश – Fire-clan

98 – राज्य-पताका – राज्य का झंडा – State Flag

99 – दुंदुभि – नगाड़ा – War drum

100 – अधीन – वश में – Under / Subject to

101 – हृदय विदारक – दिल दहलाने वाला – Heart-rending

102 – स्वाभिमान – आत्म-सम्मान – Self-respect

103 – कल्याण – भलाई – Welfare / Wellbeing

104 – शक्तिशाली – ताकतवर – Powerful / Mighty

105 – कमान – धनुष – Bow

106 – नाज़ – गर्व – Pride

107 – एकता – मिल-जुलकर रहना – Unity

108 – विपत्ति – मुसीबत – Calamity / Adversity

109 – प्रस्ताव – सुझाव – Proposal

110 – मातृभूमि – जन्मभूमि – Motherland

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

अवतरणों पर आधारित प्रश्न

(i) महाराव, आज राजपूतों को एक सूत्र में गूँथे जाने की बड़ी आवश्यकता है और जो व्यक्ति यह माला तैयार करने की ताकत रखता है, वह है महाराणा लाखा।

(क) वक्ता और श्रोता कौन हैं? वाक्य का संदर्भ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – वक्ता मेवाड़ के सेनापति अभयसिंह हैं और श्रोता बूँदी के शासक राव हेमू हैं। मेवाड़ चाहता है कि विदेशी शक्तियों का सामना करने के लिए सभी राजपूत राज्य संगठित होकर मेवाड़ की अधीनता स्वीकार कर लें।

(ख) राणा लाखा बूँदी को मेवाड़ के अधीन क्यों करना चाहते थे?

उत्तर – महाराणा लाखा बूँदी को मेवाड़ के अधीन इसलिए करना चाहते थे ताकि राजपूतों की छिन्न-भिन्न शक्ति को एक केंद्र चित्तौड़ के अधीन संगठित किया जा सके।

(ग) वक्ता ने महाराणा लाखा के संबंध में क्या कहा?

उत्तर – वक्ता ने कहा कि महाराणा लाखा ही वह व्यक्ति हैं जो खंडित राजपूत शक्तियों को एकता की माला में पिरोने की ताकत रखते हैं।

(घ) राव हेमू के अनुसार हाड़ा वंश किस प्रकार का अनुशासन मान सकते हैं?

उत्तर – राव हेमू के अनुसार हाड़ा वंश प्रेम का अनुशासन मानने को सदा तैयार है, लेकिन शक्ति का अनुशासन वह कभी स्वीकार नहीं करेगा।

 

(ii) ताकत की बात छोड़ो, अभय सिंह! प्रत्येक राजपूत को अपनी ताकत पर नाज है। इतने बड़े दंभ को मेवाड़ अपने प्राणों में आश्रय न दे, इसी में उसका कल्याण है। रह गई बात एक माला में गूँथने की, सो वह माला तो बनी है। हाँ उस माला को तोड़ने का श्रीगणेश हो गया है।

(क) उपर्युक्त कथन किसने तथा किस संदर्भ में कहा है?

उत्तर – यह कथन राव हेमू ने अभयसिंह से तब कहा जब अभयसिंह ने महाराणा लाखा की ताकत का उल्लेख करते हुए बूँदी को अधीन होने का सुझाव दिया।

(ख) अभय सिंह का परिचय दीजिए। वह क्या संदेश लेकर आए हैं?

उत्तर – अभयसिंह मेवाड़ के सेनापति हैं। वे महाराणा लाखा का यह संदेश लेकर आए हैं कि बूँदी मेवाड़ की अधीनता स्वीकार कर ले।

(ग) वक्ता ने अभय सिंह से किस प्रकार के अनुशासन को मानने की बात कही?

उत्तर – वक्ता राव हेमू ने शक्ति के बल पर थोपे गए अनुशासन के बजाय प्रेम और परस्पर आदर के अनुशासन को मानने की बात कही।

(घ) ‘वह माला तो बनी हुई है। हाँ, उस माला को तोड़ने का श्रीगणेश हो गया है।’ -आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – इसका आशय है कि राजपूतों में एकता की माला पहले से है, लेकिन मेवाड़ द्वारा अपनी ही जाति के भाइयों को दबाने की कोशिश उस एकता को नष्ट करने की शुरुआत अर्थात श्रीगणेश है।

 

(iii) प्रेम का अनुशासन मानने को हाड़ा-वंश सदा तैयार है, शक्ति का नहीं। मेवाड़ के महाराणा को यदि अपने ही जाति-भाइयों पर अपनी तलवार आज़माने की इच्छा हुई है, तो उससे उन्हें कोई नहीं रोक सकता है।

(क) उपर्युक्त कथन किसने, किससे, कब और क्यों कहा?

उत्तर – यह कथन राव हेमू ने अभयसिंह से तब कहा जब अभयसिंह ने मेवाड़ की अधीनता की बात की। राव हेमू स्पष्ट करना चाहते थे कि बूँदी स्वतंत्र रहकर मेवाड़ का आदर कर सकती है, गुलाम बनकर नहीं।

(ख) ‘प्रेम के अनुशासन’ का संदर्भ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – ‘प्रेम के अनुशासन’ का अर्थ है स्वेच्छा से किया गया सम्मान और सहयोग, न कि किसी के दबाव या डर में आकर किया गया आत्मसमर्पण।

(ग) मेवाड़ के महाराणा ने क्या प्रतिज्ञा की थी और क्यों?

उत्तर – महाराणा लाखा ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक वे बूँदी के दुर्ग को जीत नहीं लेंगे, अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। ऐसा उन्होंने नीमरा के युद्ध में हाड़ाओं से मिली अपमानजनक पराजय का बदला लेने के लिए किया था।

(घ) महाराणा लाखा के अनुसार उन्होंने मेवाड़ के गौरवपूर्ण इतिहास में कलंक का टीका किस प्रकार लगाया है?

उत्तर – महाराणा लाखा के अनुसार, बाप्पा रावल के वंशज होने के बावजूद नीमरा के मैदान में मुट्ठी भर हाड़ाओं से हारकर भागना उनके इतिहास में कलंक का टीका है।

 

(iv) जिनकी खाल मोटी होती है, उनके लिए किसी भी बात में कोई भी अपयश, कलंक या अपमान का कारण नहीं होता, किंतु जो आन को प्राणों से बढ़कर समझते आए हैं, वे पराजय का मुख देखकर भी जीवत रहें, यह कैसी उपहासजनक बात है।

(क) वक्ता कौन है? उसका परिचय दीजिए।

उत्तर – वक्ता महाराणा लाखा हैं। वे मेवाड़ के शासक और बाप्पा रावल के वंशज हैं, जो आत्म-सम्मान और गौरव को प्राणों से प्रिय मानते हैं।

(ख) ‘खाल मोटी होना’ का प्रयोग किस संदर्भ में किया गया है और क्यों?

उत्तर – ‘खाल मोटी होना’ का प्रयोग उन लोगों के लिए किया गया है जिन्हें अपमान या पराजय से कोई फर्क नहीं पड़ता। लाखा यह कहना चाहते हैं कि वे एक संवेदनशील और स्वाभिमानी राजपूत हैं, अतः वे हार को आसानी से नहीं पचा सकते।

(ग) ‘उपहासजनक बात’ का आशय स्पष्ट कीजिए?

उत्तर – ‘उपहासजनक बात’ का अर्थ है कि आन पर मिटने वाले राजपूतों के लिए हार का मुँह देखकर भी जीवित रहना एक मजाक या शर्मिंदगी का विषय है।

(घ) वक्ता अपने मस्तक से कलंक के किस टीके को किस प्रकार धो डालना चाहता है?

उत्तर – वक्ता बूँदी के किले को जीतकर और वहाँ अपनी विजय पताका फहराकर इस कलंक को धोना चाहता है।

 

(v) ‘इसमें संदेह नहीं कि अंतिम विजय हमारी होगी, किंतु यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि इसमें कितने दिन लग जाएँगे।’

(क) वक्ता और श्रोता कौन हैं? उसने बूँदी की किस धृष्टता की ओर संकेत किया है?

उत्तर – वक्ता अभयसिंह और श्रोता महाराणा लाखा हैं। वक्ता ने बूँदी की उस धृष्टता की ओर संकेत किया है जिसके कारण उन्होंने मेवाड़ की शक्तिशाली सेना को युद्ध में हरा दिया था।

(ख) वक्ता ने हाड़ा के वीरों के संबंध में क्या कहा और क्यों?

उत्तर – अभयसिंह ने कहा कि हाड़ा लोग अत्यंत वीर हैं और युद्ध में वे यमराज से भी नहीं डरते, इसलिए उन्हें जीतना बहुत कठिन कार्य है।

(ग) महाराणा लाखा अपने मस्तक से किस कलंक को धोना चाहते थे?

उत्तर – लाखा नीमरा के मैदान में हाड़ाओं से मिली हार के कलंक को धोना चाहते थे।

(घ) महाराणा लाखा ने क्या प्रतिज्ञा की उसे पूरी करने के लिए क्या योजना बनाई गई और क्यों?

उत्तर – लाखा ने बूँदी दुर्ग जीतने तक अन्न-जल त्यागने की प्रतिज्ञा की थी। इसे पूरा करने के लिए नकली दुर्ग बनाकर उसे विध्वंस करने की योजना बनाई गई, क्योंकि असली बूँदी को तुरंत जीतना असंभव था।

 

(vi) क्या कभी आपने सुना है कि सूर्यवंश में पैदा होने वाले पुरुष ने अपनी प्रतिज्ञा को वापस लिया हो? ‘प्राण जाएँ पर वचन न जाए’ यह हमारे जीवन का मूलमंत्र है। जो तीर तरकश से निकलकर, कमान पर चढ़कर छूट गया, उसे बीच में नहीं लौटाया जा सकता।

(क) वक्ता का परिचय दीजिए और उसके द्वारा व्यक्त किए गए विचारों को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – वक्ता महाराणा लाखा हैं। वे अपनी प्रतिज्ञा के प्रति अटल हैं और प्राणों की कीमत पर भी अपने वचन को निभाने में विश्वास रखते हैं।

(ख) वक्ता ने सूर्यवंश के संबंध में क्या कहा है?

उत्तर – उन्होंने कहा कि सूर्यवंशियों का मूलमंत्र है—’प्राण जाए पर वचन न जाए’। उनके द्वारा की गई प्रतिज्ञा धनुष से निकले तीर की तरह है जिसे वापस नहीं लिया जा सकता।

(ग) वक्ता ने उपर्युक्त कथन श्रोता के किस कथन के उत्तर में कहे?

उत्तर – यह कथन उन्होंने सेनापति अभयसिंह के उस कथन के उत्तर में कहा जिसमें अभयसिंह ने उन्हें भीषण प्रतिज्ञा न करने की सलाह दी थी।

(घ) ‘मातृभूमि का मान’ एकांकी का संदेश स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – ‘मातृभूमि का मान’ एकांकी का संदेश है कि मातृभूमि का मान सर्वोपरि है। चाहे वह असली हो या नकली, अपनी जन्मभूमि का अपमान कोई भी सच्चा देशभक्त सहन नहीं कर सकता।

 

(vii) तुम संपूर्ण राजस्थान को एकता की श्रृंखला बाँधकर देश की स्वाधीनता के लिए कुछ करने का आदेश दे रही थी, किंतु मैं तो उस श्रृंखला को तोड़ने जा रहा हूँ। दो जातियों में जानी दुश्मनी पैदा करने जा रहा हूँ।

(क) उपर्युक्त कथन का वक्ता और श्रोता कौन-कौन है? कथन का संदर्भ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – वक्ता महाराणा लाखा और श्रोता चारणी है। संदर्भ यह है कि चारणी एकता के गीत गा रही थी, जबकि लाखा अपनी प्रतिज्ञा के कारण बूँदी पर आक्रमण करने वाले थे।

(ख) कौन क्या आदेश दे रहा था?

उत्तर – चारणी राजस्थान को एकता के सूत्र में बाँधने का आदेश दे रही थी।

(ग) कौन किस शृंखला को तोड़ने जा रहा था और क्यों?

उत्तर – लाखा अपनी प्रतिज्ञा के कारण हाड़ाओं और सिसोदियों के बीच की एकता की शृंखला को तोड़ने जा रहे थे, क्योंकि वे बूँदी को दंड देना चाहते थे।

(घ) वक्ता की बात सुनकर श्रोता ने क्या कहा?

उत्तर – चारणी ने सुझाव दिया कि राजपूत शक्तियों में स्नेह बना रहे और महाराणा नकली दुर्ग का विनाश कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर लें।

(viii) ‘यदि उनसे धृष्टता बन पड़ी हो तो महाराणा उसे भूल जाएँ और राजपूत शक्तियों में स्नेह का संबंध बना रहने दें।’

(क) वक्ता कौन है? उसका कथन किसके संबंध में है?

उत्तर – वक्ता चारणी है। उसका कथन हाड़ा राजपूतों के संबंध में है।

(ख) महाराणा लाखा किस श्रृंखला को तोड़कर किन दो जातियों में दुश्मनी पैदा करने जा रहे थे?

उत्तर – लाखा हाड़ा और सिसोदिया जातियों के बीच की मित्रता को तोड़कर दुश्मनी पैदा करने जा रहे थे।

(ग) वक्ता ने हाड़ा की शक्ति और साधनों के संबंध में क्या कहा?

उत्तर – वक्ता ने कहा कि हाड़ा शक्ति और साधनों में मेवाड़ से छोटे हो सकते हैं, लेकिन वे वीर हैं और मेवाड़ के पुराने सहयोगी रहे हैं।

(घ) वक्ता के कथन का महाराणा ने क्या उत्तर दिया?

उत्तर – महाराणा ने कहा कि वे अभी तो नकली दुर्ग से काम चला लेंगे, लेकिन हाड़ाओं को दंड दिए बिना उन्हें संतोष नहीं होगा।

 

(ix) अच्छा अभी तो मैं नकली दुर्ग बनाकर उसका विध्वंस करके अपने व्रत का पालन करूँगा, किंतु हाड़ाओं को उनकी उद्दंडता का दंड दिए बिना मेरे मन को संतोष न होगा। सेनापति नकली दूर्ग बनवाने का प्रबंध करें।

(क) महाराणा ने अपनी प्रतिज्ञा का पालन करने का निश्चय किस प्रकार किया?

उत्तर – महाराणा ने नकली मिट्टी का दुर्ग बनाकर और उसे नष्ट करके अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने का निश्चय किया।

(ख) महाराणा हाड़ाओं की किस उद्दंडता का दंड देना चाहते थे?

उत्तर – वे हाड़ाओं द्वारा नीमरा के युद्ध में मेवाड़ को हराने की ‘उद्दंडता’ का दंड देना चाहते थे।

(ग) नकली दुर्ग बनाने का सुझाव किसने दिया था और क्यों?

उत्तर – नकली दुर्ग का सुझाव चारणी ने दिया था ताकि महाराणा के प्राणों की रक्षा हो सके और राजपूतों में खून-खराबा न हो।

(घ) हाड़ाओं ने किस प्रकार वीरता का परिचय दिया और इसका क्या परिणाम निकला?

उत्तर – वीर सिंह और उसके साथियों ने नकली दुर्ग की रक्षा के लिए अपने प्राण दे दिए। इसका परिणाम यह हुआ कि महाराणा का हृदय परिवर्तित हो गया।

(x) मैंने सोचा है दुर्ग के भीतर अपने ही कुछ सैनिक रख दिए जाएँगे, जो बंदूकों से हम लोगों पर छूछे वार करेंगे। कुछ घंटे ऐसा ही खेल होगा और फिर यह मिट्टी का दुर्ग मिट्टी में मिला दिया जाएगा। अच्छा, अब हम चलें।

(क) वक्ता और श्रोता कौन हैं? कथन का संदर्भ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – वक्ता अभयसिंह और श्रोता महाराणा लाखा हैं। नकली दुर्ग पर आक्रमण के ‘खेल’ को वास्तविक दिखाने के लिए यह चर्चा हो रही है।

(ख) दुर्ग के भीतर अपने कुछ सैनिक रखने के पीछे वक्ता का क्या आशय था और क्यों?

उत्तर – आशय यह था कि कुछ सैनिक भीतर से दिखावटी (नकली) हमला करेंगे ताकि दुर्ग को जीतना एक सच्चा युद्ध प्रतीत हो।

(ग) क्या आप महाराणा द्वारा नकली दुर्ग को ध्वस्त करके अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने को उपयुक्त मानते हैं? कारण सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर – नहीं, यह केवल एक छल था। लेकिन वीर सिंह के बलिदान ने इस छल को एक वास्तविक बलिदान में बदल दिया।

(घ) ‘घूँछे वार’ का आशय स्पष्ट कीजिए। नकली दुर्ग की रक्षा करने पर हाड़ा सैनिकों के चरित्र की किस विशेषता की ओर संकेत मिलता है?

उत्तर – ‘छूँछे वार’ का अर्थ है नकली या बिना गोली वाले वार। हाड़ा सैनिकों द्वारा नकली दुर्ग की रक्षा करना उनके अटूट देशभक्ति और मातृभूमि के प्रति सम्मान को दर्शाता है।

 

(xi) धिक्कार है तुम्हें! नकली बूँदी भी प्राणों से अधिक प्रिय है। जिस जगह एक भी हाड़ा है, वहाँ बूँदी का अपमान आसानी से नहीं किया जा सकता। आज महाराणा आश्चर्य के साथ देखेंगे कि यह खेल केवल खेल ही नहीं रहेगा, यहाँ की चप्पा-चप्पा भूमि सिसोदियों और हाड़ाओं के खून से लाल हो जाएगी।

(क) उपर्युक्त वाक्य किसने, किससे, कब और क्यों कहे हैं?

उत्तर – यह वाक्य वीर सिंह ने अपने साथियों से तब कहा जब उसके साथियों ने इसे केवल एक ‘नकली’ दुर्ग माना। वीर सिंह अपनी मातृभूमि के अपमान को सहन नहीं कर पा रहा था।

(ख) कौन-सा खेल केवल खेल नहीं रहा और कैसे?

उत्तर – महाराणा का ‘नकली युद्ध’ का खेल वास्तविक बन गया क्योंकि वीर सिंह ने वहाँ सचमुच तलवारें और बंदूकें चला दीं।

(ग) उपर्युक्त कथन के आधार पर वीर सिंह का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर – वीर सिंह एक अमर शहीद और स्वाभिमानी देशभक्त है। उसके लिए उसकी जन्मभूमि का प्रतीक नकली दुर्ग भी पूजनीय है।

(घ) इस घटना का क्या परिणाम निकला?

उत्तर – इसका परिणाम यह हुआ कि वीर सिंह और उसके साथी शहीद हो गए, जिससे महाराणा लाखा का अहंकार चूर-चूर हो गया।

 

(xii) हम लोग महाराणा के नौकर हैं। क्या महाराणा के विरुद्ध तलवार उठाना हमारे लिए उचित है? हमारा शरीर महाराणा के नमक से बना है। हमें उनकी इच्छा में व्याघात नहीं पहुँचाना चाहिए।

(क) वक्ता और श्रोता कौन-कौन हैं? वाक्य का संदर्भ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – वक्ता वीर सिंह का साथी है और श्रोता वीर सिंह है। वे नकली दुर्ग के भीतर महाराणा की सेना का विरोध करने के विषय में बात कर रहे हैं।

(ख) वक्ता महाराणा के विरुद्ध तलवार उठाने को उचित क्यों नहीं मानता? क्या आप उसकी बात से सहमत हैं?

उत्तर – वक्ता का मानना है कि उन्होंने महाराणा का नमक खाया है, इसलिए उनका विरोध करना वफादारी के खिलाफ है। मेरे विचार से नमक का कर्ज बड़ा है, पर जन्मभूमि का कर्ज सबसे ऊपर है।

(ग) वक्ता की बात सुनकर श्रोता ने क्या उत्तर दिया?

उत्तर – वीर सिंह ने उत्तर दिया कि जब मेवाड़ की स्वतंत्रता पर संकट आया, हमने वफादारी निभाई, पर जब बूँदी के मान का प्रश्न है, तो हम अपनी तलवारें महाराणा के चरणों में रखकर बूँदी की ओर से लड़ेंगे।

(घ) आप वक्ता और श्रोता में से किसकी बात को उचित मानते हैं। और क्यों?

उत्तर – वीर सिंह की बात अधिक उचित है क्योंकि देशभक्ति सर्वोपरि है।

 

(xiii) ‘महाराणा, अब तो आपकी आत्मा को शांति मिल गई होगी। अब तो आपने अपने सिर से कलंक का टीका धो लिया।’

(क) वक्ता कौन है? उसके कथन का क्या अभिप्राय है?

उत्तर – वक्ता चारणी है। उसका कथन एक व्यंग्य है कि लाखा ने एक नकली जीत पाकर और अपने ही वीर सैनिक की जान लेकर अब अपना ‘कलंक’ धो लिया है।

(ख) महाराणा ने अपने सिर से कलंक के किस टीके को धोया और किस प्रकार?

उत्तर – लाखा ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए नकली बूँदी को ध्वस्त किया और उसे अपनी विजय मानकर कलंक धोने का प्रयास किया।

(ग) महाराणा की आत्मा को शांति मिलने की बजाय किस बात पर पश्चाताप हुआ?

उत्तर – उन्हें शांति के बजाय इस बात का पश्चाताप हुआ कि उनके व्यर्थ के दंभ ने एक निस्वार्थ वीर (वीर सिंह) की बलि ले ली।

(घ) किसकी वीरता ने महाराणा के हृदय के द्वार खोल दिए तथा क्यों?

उत्तर – वीर सिंह की वीरता ने लाखा के हृदय के द्वार खोल दिए क्योंकि उसने दिखा दिया कि मातृभूमि का मान क्या होता है।

 

(xiv) वीर सिंह की वीरता ने मेरे हृदय के द्वार खोल दिए हैं। मेरी आँखों पर से पर्दा हटा दिया है। मैं देखता हूँ ऐसी वीर जाति को अधीन करने की अभिलाषा करना पागलपन है।

(क) वीर सिंह ने किस वीरता का परिचय दिया?

उत्तर – वीर सिंह ने नकली बूँदी की रक्षा के लिए अपने ही राजा (लाखा) की सेना से युद्ध किया और अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।

(ख) वक्ता और श्रोता कौन-कौन हैं? श्रोता के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर – वक्ता महाराणा लाखा और श्रोता राव हेमू हैं। राव हेमू स्वाभिमानी, वीर और राजपूत एकता के पक्षधर हैं।

(ग) ‘हृदय के द्वार खोलना’ और ‘आँखों पर से पर्दा हटना’ का प्रयोग किए उद्देश्य किया गया है?

उत्तर – इन मुहावरों का प्रयोग सत्य का बोध होने और भ्रम दूर होने के लिए किया गया है। लाखा को अपनी गलती का अहसास हो गया।

(घ) महाराणा ने अपनी किस अभिलाषा को पागलपन कहा है और क्यों?

उत्तर – लाखा ने बूँदी को ‘अधीन’ करने की इच्छा को पागलपन कहा क्योंकि उन्हें समझ आ गया कि ऐसी वीर जाति को बलपूर्वक गुलाम नहीं बनाया जा सकता, उन्हें केवल प्रेम से जीता जा सकता है।

 

 

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