जगदीशचंद्र माथुर
जगदीशचंद्र माथुर का जन्म सन् 1917 में शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ और शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। वे इंडियन सिविल सर्विस में भी चयनित हुए। बिहार राज्य के शिक्षा सचिव, आकाशवाणी के महानिदेशक, सूचना और प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिव आदि प्रशासनिक पदों पर कार्य करते हुए वे आजीवन साहित्य-सृजन में सक्रिय रहे।
प्रयाग में अध्ययन के दौरान ही जगदीशचंद्र माथुर ने लेखन आरंभ कर दिया था। उस समय की चर्चित पत्रिकाओं चाँद और रूपाभ आदि में उनके लिखे नाटक-एकांकी छपने लगे थे। हिंदी नाटक और रंगमंच के विकास में उनके एकांकी व नाटकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐतिहासिक नाटकों के साथ- साथ उन्होंने सामाजिक समस्याओं से जुड़े एकांकी नाटक भी लिखे हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं— भोर का तारा, कोणार्क, ओ मेरे सपने, शारदीया, पहला राजा, दस तस्वीरें, जिन्होंने जीना जाना। इनकी संपूर्ण रचनाएँ जगदीशचंद्र माथुर रचनावली (चार खंड) में संकलित हैं। कोणार्क उनका सर्वाधिक चर्चित और मंचित नाटक है। सन् 1978 में उनका निधन हो गया।
रीढ़ की हड्डी – पाठ परिचय
‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी भारतीय समाज में परंपरागत विवाह की व्यवस्था और स्त्रियों की शिक्षा को लेकर रूढ़िगत सोच पर चोट करती है। इस एकांकी की रचना 1939 में की गई। उस समय भारतीय समाज में शिक्षा और अन्य कार्यक्षेत्रों में स्त्रियों को समान अवसर नहीं मिलते थे। इस एकांकी के माध्यम से विवाह के लिए कम पढ़ी-लिखी लड़कियों की माँग, विवाह में लेन-देन जैसी सामाजिक कुरीतियों को उजागर किया गया है। एकांकी की मुख्य पात्र उमा पढ़ी-लिखी सशक्त महिला का प्रतिनिधित्व करती है।
आखिरी चट्टान तक
कन्याकुमारी। सुनहले सूर्योदय और सूर्यास्त की भूमि।
केप होटल के आगे बने बाथ टैंक के बाईं तरफ, समुद्र के अंदर से उभरी स्याह चट्टानों में से एक पर खड़ा होकर मैं देर तक भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देखता रहा। पृष्ठभूमि में कन्याकुमारी के मंदिर की लाल और सफेद लकीरें चमक रही थीं। अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी – इन तीनों के संगम स्थल-सी वह चट्टान, जिस पर कभी स्वामी विवेकानंद ने समाधि लगायी थी, हर तरफ से पानी की मार सहती हुई स्वयं भी समाधिस्थ-सी लग रही थी। हिंद महासागर की ऊँची-ऊँची लहरें मेरे आस-पास की स्याह चट्टानों से टकरा रही थीं। बलखाती लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं जिससे उनके ऊपर चूरा बूँदों की जालियाँ बन जाती थीं। मैं देख रहा था और अपनी पूरी चेतना से महसूस कर रहा था – शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति। तीनों तरफ से क्षितिज तक पानी-ही-पानी था, फिर भी सामने का क्षितिज, हिंद महासागर का, अपेक्षया अधिक दूर और अधिक गहरा जान पड़ता था। लगता था कि उस ओर दूसरा छोर है ही नहीं। तीनों ओर के क्षितिज को आँखों में समेटता मैं कुछ देर भूला रहा कि मैं मैं हूँ, एक जीवित व्यक्ति, दूर से आया यात्री, एक दर्शक। उस दृश्य के बीच में जैसे दृश्य का एक हिस्सा बनकर खड़ा रहा- बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच एक छोटी-सी चट्टान। जब अपना होश हुआ, तो देखा कि मेरी चट्टान भी तब तक बढ़ते पानी में काफी घिर गई है। मेरा पूरा शरीर सिहर गया। मैंने एक नजर फिर सामने के उमड़ते विस्तार पर डाली और पास की एक सुरक्षित चट्टान पर कूदकर दूसरी चट्टानों पर से होता हुआ किनारे पर पहुँच गया।
पच्छिमी क्षितिज में सूर्य धीरे-धीरे नीचे जा रहा था। मैं सूर्यास्त की दिशा में चलने लगा। दूर पच्छिमी तट रेखा के एक मोड़ पर पीली रेत का एक ऊँचा टीला नजर आ रहा था। सोचा उस टीले पर जाकर सूर्यास्त देखूँगा।
यात्रियों की कितनी ही टोलियाँ उस दिशा में जा रही थीं। हम लोग टीले पर पहुँच गए। यह वह ‘सैंड हिल’ थी जिसकी चर्चा मैं वहाँ पहुँचने के बाद से ही सुन रहा था। सैंड हिल पर बहुत से लोग थे। आठ-दस नवयुवतियाँ, छह-सात नवयुवक और दो-तीन गाँधी टोपियों वाले व्यक्ति। वे शायद सूर्यास्त देख रहे थे। गवर्नमेंट गेस्ट हाउस के बैरे उन्हें सूर्यास्त के समय की कॉफी पिला रहे थे। उन लोगों के वहाँ होने से सैंड हिल बहुत रंगीन हो उठी थी। कन्याकुमारी का सूर्यास्त देखने के लिए उन्होंने विशेष रुचि के साथ सुंदर रंगों का रेशम पहना था। हवा समुद्र की तरह उस रेशम में भी लहरें पैदा कर रही थी। कुछ युवतियाँ वहाँ आकर थकी-सी एक तरफ बैठ गईं— उस पूरे कैनवस में एक तरफ छिटके हुए कुछ बिंदुओं की तरह। उनसे कुछ दूर पर एक रंगहीन बिंदु, मैं, ज्यादा देर अपनी जगह स्थिर नहीं रह सका। सैंड हिल से सामने का पूरा विस्तार तो दिखाई दे रहा था, पर अरब सागर की तरफ एक और ऊँचा टीला था जो उधर के विस्तार को ओट में लिए था। सूर्यास्त पूरे विस्तार की पृष्ठभूमि में देखा जा सके, इसके लिए मैं कुछ देर सैंड हिल पर रुका रहकर आगे उस टीले की तरफ चल दिया। पर रेत पर अपने अकेले कदमों को घसीटता वहाँ पहुँचा, तो देखा कि उससे आगे उससे भी ऊँचा एक और टीला है। जल्दी-जल्दी चलते हुए मैंने एक के बाद एक कई टीले पार किए। टाँगें थक रही थीं पर मन थकने को तैयार नहीं था। हर अगले टीले पर पहुँचने पर लगता कि शायद अब एक ही टीला और है, उस पर पहुँचकर पच्छिमी क्षितिज का खुला विस्तार अवश्य नजर आएगा। और सचमुच एक टीले पर पहुँचकर वह खुला विस्तार सामने फैला दिखाई दे गया वहाँ से दूर तक एक रेत की लंबी ढलान थी, जैसे वह टीले से समुद्र में उतरने का रास्ता हो। सूर्य तब पानी से थोड़ा ही ऊपर था। अपने प्रयत्न की सार्थकता से संतुष्ट होकर मैं टीले पर बैठ गया- ऐसे जैसे वह टीला संसार की सबसे ऊँची चोटी हो, और मैंने, सिर्फ मैंने, उस चोटी को पहली बार सर किया हो।
पीछे दाईं तरफ दूर-दूर हटकर उगे नारियलों के झुरमुट नजर आ रहे थे। गूँजती हुई तेज हवा से उनकी टहनियाँ ऊपर को उठ रही थीं। पच्छिमी तट के साथ-साथ सूखी पहाड़ियों की एक शृंखला दूर तक चली गई थी जो सामने फैली रेत के कारण बहुत रूखी, बीहड़ और वीरान लग रही थी। सूर्य पानी की सतह के पास पहुँच गया था। सुनहली किरणों ने पीली रेत को एक नया-सा रंग दे दिया था। उस रंग में रेत इस तरह चमक रही थी जैसे अभी-अभी उसका निर्माण करके उसे वहाँ उड़ेला गया हो। मैंने उस रेत पर दूर तक बने अपने पैरों के निशानों को देखा। लगा जैसे रेत पहली बार उन निशानों से टूटा हो। इससे मन में एक सिहरन भी हुई, हल्की उदासी भी घिर आई।
सूर्य का गोला पानी की सतह से छू गया। पानी पर दूर तक सोना ही सोना ढुल आया। पर वह रंग इतनी जल्दी-जल्दी बदल रहा था कि किसी भी एक क्षण के लिए उसे एक नाम दे सकना असंभव था। सूर्य का गोला जैसे एक बेबसी में पानी के लावे में डूबता जा रहा था। धीरे-धीरे वह पूरा डूब गया और कुछ क्षण पहले जहाँ सोना बह रहा था, वहाँ अब लहू बहता नजर आने लगा। कुछ और क्षण बीतने पर वह लहू भी धीरे-धीरे बैज़नी और बैज़नी से काला पड़ गया। मैंने फिर एक बार मुड़कर दाईं तरफ पीछे देख लिया। नारियलों की टहनियाँ उसी तरह हवा में ऊपर उठी थीं। हवा उसी तरह गूँज रही थी, पर पूरे दृश्यपट पर स्याही फैल गई थी। एक-दूसरे से दूर खड़े झुरमुट, स्याह पड़कर, जैसे लगातार सिर धुन रहे थे और हाथ-पैर पटक रहे थे। मैं अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और अपनी मुट्ठियाँ भींचता खोलता कभी उस तरफ और कभी समुद्र की तरफ देखता रहा।
अचानक खयाल आया कि मुझे वहाँ से लौटकर भी जाना है। इस खयाल से ही शरीर में कँपकँपी भर गई। दूर सैंड हिल की तरफ देखा। वहाँ स्याही में डूबे कुछ धुँधले रंग हिलते नजर आ रहे थे। मैंने रंगों को पहचानने की कोशिश की, पर उतनी दूर से आकृतियों को अलग-अलग कर सकना संभव नहीं था। मेरे और उन रंगों के बीच स्याह पड़ती रेत के कितने ही टीले थे। मन में डर समाने लगा कि क्या अँधेरा होने से पहले मैं उन सब टीलों को पार करके जा सकूँगा? कुछ कदम उस तरफ बढ़ा भी पर लगा कि नहीं! उस रास्ते से जाऊँगा, तो शायद रेत में ही भटकता रह जाऊँगा। इसलिए सोचा बेहतर है नीचे समुद्र तट पर उतर जाऊँ- तट का रास्ता निश्चित रूप से केप होटल के सामने तक ले जाएगा। निर्णय तुरंत करना था, इसलिए बिना और सोचे मैं रेत पर बैठकर नीचे तट की तरफ फिसल गया। पर तट पर पहुँचकर फिर कुछ क्षण बढ़ते अँधेरे की बात भूला रहा। कारण था तट की रेत। यूँ पहले भी समुद्र-तट पर कई-कई रंगों की रेत देखी थी— सुरमई, खाकी, पीली और लाल। मगर जैसे रंग उस रेत में थे, वैसे मैंने पहले कभी कहीं की रेत में नहीं देखे थे। कितने ही अनाम रंग थे वे। एक-एक इंच पर एक-दूसरे से अलग…. और एक-एक रंग कई-कई रंगों की झलक लिए हुए। काली घटा और घनी लाल आँधी को मिलाकर रेत के आकार में ढाल देने से रंगों के जितनी तरह के अलग-अलग सम्मिश्रण पाए जा सकते थे, वे सब वहाँ थे और उनके अतिरिक्त भी बहुत-से रंग थे। मैंने कई अलग-अलग रंगों की रेत को हाथ में लेकर देखा और मसलकर नीचे गिर जाने दिया। जिन रंगों को हाथों से नहीं छू सका, उन्हें पैरों से मसल दिया। मन था कि किसी तरह हर रंग की थोड़ी-थोड़ी रेत अपने पास रख लूँ। पर उसका कोई उपाय नहीं था। यह सोचकर कि फिर किसी दिन आकर उस रेत को बटोरूँगा, मैं उदास मन से वहाँ से आगे चल दिया।
समुद्र में पानी बढ़ रहा था। तट की चौड़ाई धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। एक लहर मेरे पैरों को भिगो गई, तो सहसा मुझे खतरे का एहसास हुआ। मैं जल्दी-जल्दी चलने लगा। तट का सिर्फ तीन-तीन चार-चार फुट हिस्सा पानी से बाहर था। लग रहा था कि जल्दी ही पानी उसे भी अपने अंदर समा लेगा। एक बार सोचा कि खड़ी रेत से होकर फिर ऊपर चला जाऊँ। पर वह स्याह पड़ती रेत इस तरह दीवार की तरह उठी थी कि उस रास्ते ऊपर जाने की कोशिश करना ही बेकार था। मेरे मन में खतरा बढ़ गया। मैं दौड़ने लगा। दो-एक और लहरें पैरों के नीचे तक आकर लौट गईं। मैंने जूता उतारकर हाथ में ले लिया। एक ऊँची लहर से बचकर इस तरह दौड़ा जैसे सचमुच वह मुझे अपनी लपेट में लेने आ रही हो। सामने एक ऊँची चट्टान थी। वक्त पर अपने को संभालने की कोशिश की, फिर भी उससे टकरा गया। बाँहों पर हल्की खरोंच आ गई, पर ज्यादा चोट नहीं लगी। चट्टान पानी के अंदर तक चली गई थी— उसे बचाकर आगे जाने के लिए पानी में उतरना आवश्यक था। पर उस समय पानी की तरफ पाँव बढ़ाने का मेरा साहस नहीं हुआ। मैं चट्टान की नोकों पर पैर रखता किसी तरह उसके ऊपर पहुँच गया। सोचा नीचे खड़े रहने की अपेक्षा वह अधिक सुरक्षित होगा। पर ऊपर पहुँचकर लगा जैसे मेरे साथ एक मजाक किया गया हो। चट्टान के उस तरफ तट का खुला फैलाव था— लगभग सौ फुट का। कितने ही लोग वहाँ टहल रहे थे। ऊपर सड़क पर जाने के लिए वहाँ से रास्ता भी बना था। मन से डर निकल जाने से मुझे अपने आप काफी हल्का लगा और मैं चट्टान से नीचे कूद गया।
रात केप होटल का लॉन। अँधेरे में हिंद महासागर को काटती कुछ स्याह लकीरें एक पौधे की टहनियाँ। नीचे सड़क पर टार्च जलाता बुझाता एक आदमी। दक्षिण-पूर्व के क्षितिज में एक जहाज की मद्धिम-सी रोशनी।
सूर्योदय। हम आठ आदमी ‘विवेकानंद चट्टान’ पर बैठे थे। चट्टान तट से सौ-सवा- सौ गज आगे समुद्र के बीच जाकर है— वहाँ, जहाँ बंगाल की खाड़ी की भौगोलिक सीमा समाप्त होती है। मेरे अलावा कन्याकुमारी के तीन नवयुवक थे जिनमें से एक ग्रेजुएट था। चार मल्लाह थे जो एक छोटी-सी मछुआ नाव में हमें वहाँ लाए थे। नाव क्या थी, रबड़ पेड़ के तीन तनों को साथ-साथ जोड़ लिया गया था, बस। नीचे की नुकीली चट्टानों और ऊपर की ऊँची-ऊँची लहरों से बचाते हुए मल्लाह नाव को उस तरफ ला रहे थे, तो मैंने समान की तरफ देखते हुए उतनी देर अपनी चेतना को स्थगित रखने की चेष्टा की थी, अपने अंदर के डर को दिखावटी उदासीनता से ढक रखना चाहा था। पर जब चट्टान पर पहुँच गए, तो डर मेरी टाँगों में उतर गया क्योंकि वहाँ बैठे हुए भी वे हल्के-हल्के काँप रही थीं।
ग्रेजुएट नवयुवक मुझे बता रहा था कि कन्याकुमारी की आठ हजार की आबादी में कम-से-कम चार-पाँच सौ शिक्षित नवयुवक ऐसे हैं जो बेकार हैं। उनमें से सौ के लगभग ग्रेजुएट हैं। उनका मुख्य धंधा है नौकरियों के लिए अर्ज़ियाँ देना और बैठकर आपस में बहस करना। वह खुद वहाँ फोटो एल्बम बेचता था। दूसरे नवयुवक भी उसी तरह के छोटे-मोटे काम करते थे। “हम लोग सीपियों का गूदा खाते हैं और दार्शनिक सिद्धांतों पर बहस करते हैं”, वह कह रहा था। “इस चट्टान से इतनी प्रेरणा तो हमें मिलती ही है।” मुझे दिखाने के लिए उसने वहीं से एक सीपी लेकर उसे तोड़ा और उसका गूदा मुँह में डाल लिया।
पानी और आकाश में तरह-तरह के रंग झिलमिलाकर, छोटे-छोटे द्वीपों की तरह समुद्र में बिखरी स्याह चट्टानों की ओट से सूर्य उदित हो रहा था। घाट पर बहुत-से लोग उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए एकत्रित थे। घाट से थोड़ा हटकर गवर्नमेंट गेस्ट हाउस के बैरे सरकारी मेहमानों को सूर्योदय के समय की कॉफी पिला रहे थे। दो स्थानीय नवयुवतियाँ उन्हें अपनी टोकरियों से शंख और मालाएँ दिखला रही थीं। वे लोग दोनों काम साथ-साथ कर रहे थे— मालाओं का मोल तोल और अपने बाइनाक्यूलर्ज से सूर्य-दर्शन। मेरा साथी अब मुहल्ले-मुहल्ले के हिसाब से मुझे बेकारी के आँकड़े बता रहा था। बहुत-से कडल-काक हमारे आस-पास तैर रहे थे — वहाँ की बेकारी की समस्या और सूर्योदय की विशेषता, इन दोनों से बे-लाग।
कन्याकुमारी के मंदिर में पूजा की घंटियाँ बज रही थीं। भक्तों की एक मंडली अंदर जाने से पहले मंदिर की दीवार के पास रुककर उसे प्रणाम कर रही थी। सरकारी मेहमान गेस्ट हाउस की तरफ लौट रहे थे। हमारी नाव और किनारे के बीच हल्की धूप में कई एक नावों के पाल और कडल-काकों के पंख एक-से चमक रहे थे। मैं अब भी आँखों से बीच की दूरी नाप रहा था और मन में बसों का टाइम टेबल दोहरा रहा था। तीसरी बस नौ चालीस पर, चौथी….।
आखिरी चट्टान तक – सारांश
‘आखिरी चट्टान तक’ एक अत्यंत संवेदनशील और प्रभावशाली यात्रा-वृत्तांत है, जिसमें लेखक ने भारत के दक्षिणतम छोर कन्याकुमारी की प्राकृतिक सुंदरता, समुद्र की विराटता, मनुष्य के भीतर उठने वाले भय और रोमांच तथा वहाँ के सामाजिक जीवन का अत्यंत जीवंत चित्र प्रस्तुत किया है।
लेखक कन्याकुमारी पहुँचकर केप होटल के पास समुद्र के बीच उभरी काली चट्टानों पर खड़े होकर भारत की अंतिम चट्टान को निहारते हैं। उनके सामने वह प्रसिद्ध चट्टान दिखाई देती है, जहाँ स्वामी विवेकानंद ने ध्यान किया था। पीछे कन्याकुमारी मंदिर की लाल-सफेद धारियाँ चमक रही थीं और चारों ओर अरब सागर, हिंद महासागर तथा बंगाल की खाड़ी का अद्भुत संगम दिखाई दे रहा था। समुद्र की ऊँची-ऊँची लहरें चट्टानों से टकराकर शक्ति और विस्तार का अद्वितीय दृश्य प्रस्तुत कर रही थीं। लेखक स्वयं को प्रकृति के उस विराट दृश्य का एक छोटा-सा हिस्सा अनुभव करते हैं।
कुछ समय बाद उन्हें ध्यान आता है कि बढ़ते ज्वार के कारण उनकी चट्टान जिसपर वे खड़े हैं चारों ओर से पानी से घिरती जा रही है। वे भयभीत होकर एक चट्टान से दूसरी चट्टान पर कूदते हुए सुरक्षित किनारे लौट आते हैं। इसके बाद वे सूर्यास्त देखने के लिए पश्चिम दिशा में स्थित प्रसिद्ध ‘सैंड हिल’ की ओर बढ़ते हैं। वहाँ अनेक पर्यटक सुंदर वस्त्रों में सूर्यास्त का आनंद ले रहे होते हैं। लेखक भी पूर्ण और निर्बाध सूर्यास्त देखने की इच्छा से एक के बाद एक कई रेत के टीलों को पार करते हैं। थकान के बावजूद उनका उत्साह कम नहीं होता।
अंततः, वे एक ऊँचे टीले पर पहुँचते हैं, जहाँ से उन्हें पश्चिमी क्षितिज का विशाल दृश्य दिखाई देता है। डूबते हुए सूर्य की सुनहरी किरणें पीली रेत को स्वर्णिम बना देती हैं। समुद्र पर फैला प्रकाश निरंतर बदलते रंगों का अद्भुत संसार रचता है—सोने जैसा पीला, फिर रक्तिम लाल, बैंगनी और अंततः गहरा काला। इस दृश्य को देखकर लेखक के मन में एक साथ रोमांच, सौंदर्यबोध और हल्की उदासी का भाव उत्पन्न होता है।
अँधेरा बढ़ने पर लेखक को वापस लौटने की चिंता सताने लगती है। टीलों के बीच रास्ता भटकने के भय से वह समुद्र तट का मार्ग चुनते हैं। तट पर पहुँचकर उनका ध्यान वहाँ की बहुरंगी रेत की ओर आकर्षित होता है। उन्होंने पहले कभी इतने विविध रंगों वाली रेत नहीं देखी थी। वह उन रंगों को हाथों में लेकर महसूस करते हैं और चाहते हैं कि उन सबको अपने साथ ले जाए, किंतु ऐसा संभव नहीं होता। यह अनुभव उनके मन में सौंदर्य के क्षणभंगुर होने का भाव जगाता है।
इसी बीच समुद्र का जलस्तर बढ़ने लगता है और तट का रास्ता सँकरा होता जाता है। ऊँची लहरें उनके पैरों तक पहुँचने लगती हैं। लेखक लहरों में खिंच जाने के डर से भयभीत होकर दौड़ पड़ते हैं। लहरों के वेग के कारण एक चट्टान से टकराकर उन्हें हल्की चोट भी लगती है। अपनी जान बचाने के लिए घबराहट में वे चट्टान पर चढ़ते हैं तो देखते हैं कि दूसरी तरफ एक सुरक्षित और लगभग सौ फीट चौड़ा रास्ता मौजूद है। इससे उनकी जान में जान आती है।
रात्रि के शांत वातावरण में समुद्र, दूर दिखाई देती जहाज की रोशनी और अँधेरे में डूबी प्रकृति का दृश्य लेखक के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ता है।
अगली सुबह लेखक ‘विवेकानंद चट्टान’ पर सूर्योदय देखने जाते हैं। मल्लाहों द्वारा छोटी-सी नाव से समुद्र पार करते समय उन्हें भय का अनुभव होता है, पर वे स्वयं को संयत बनाए रखते हैं। चट्टान पर लेखक की मुलाकात एक शिक्षित परंतु बेरोजगार स्थानीय युवक से होती है। वह युवक बताता है कि कन्याकुमारी की आठ हजार की आबादी में सैकड़ों शिक्षित युवा बेरोजगार हैं। वे सीपियों का गूदा खाकर अपना पेट भरते हैं और दार्शनिक सिद्धांतों पर बहस करके समय काटते हैं। वहाँ का यह एक दृश्य गहरा विरोधाभास प्रस्तुत करता है— एक तरफ सरकारी मेहमान और अमीर पर्यटक कॉफी पीते हुए बाइनोकुलर से सूर्योदय का आनंद ले रहे हैं, और दूसरी तरफ स्थानीय युवा बेरोजगारी और भुखमरी से जूझ रहे हैं। इस प्रकार लेखक प्राकृतिक सौंदर्य के बीच समाज की आर्थिक समस्या को भी सामने लाते हैं।
इसी दौरान समुद्र की स्याह चट्टानों के पीछे से सूर्योदय का मनोहारी दृश्य प्रकट होता है। आकाश और जल विभिन्न रंगों से जगमगा उठते हैं। घाट पर श्रद्धालु उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर रहे होते हैं, मंदिर की घंटियाँ बज रही होती हैं, पर्यटक कॉफी पीते हुए दृश्य का आनंद ले रहे होते हैं और स्थानीय युवतियाँ शंख-मालाएँ बेच रही होती हैं। प्रकृति का यह अलौकिक सौंदर्य और मानव जीवन की व्यावहारिक समस्याएँ एक साथ उपस्थित दिखाई देती हैं। कहानी का अंत एक व्यावहारिक सत्य के साथ होता है। प्रकृति के इतने विराट दर्शन और सामाजिक यथार्थ से रू-ब-रू होने के बाद भी, एक आम यात्री की तरह लेखक का मन वापस अपनी दिनचर्या और वापसी की बसों के टाइम-टेबल में उलझ जाता है।
निष्कर्ष
इस यात्रा-वृत्तांत में लेखक ने कन्याकुमारी के सूर्योदय और सूर्यास्त, समुद्र की विराटता, बहुरंगी रेत, प्रकृति की रहस्यमय शक्ति तथा मनुष्य के भय, उत्साह और अकेलेपन का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है। साथ ही उन्होंने स्थानीय समाज की बेरोज़गारी जैसी समस्या को भी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। यह रचना पाठकों को प्रकृति के प्रति विस्मय, जीवन के प्रति गहरी संवेदना और मानवीय यथार्थ की नई समझ प्रदान करती है।
कन्याकुमारी – विस्तृत जानकारी
Cape – अंतरीप
अंतरीप – समुद्र में निकला हुआ स्थलखंड
Cape Hotel – कन्याकुमारी का पुराना अंग्रेज़ी नाम Cape Comorin था, जिसका हिंदी रूप कन्याकुमारी अंतरीप कहा जा सकता है। इसी स्थान पर होटल होने के कारण इसका नाम केप होटल पड़ा।
बाथ टैंक – कन्याकुमारी में समुद्र के किनारे पर्यटकों के स्नान के लिए पत्थरों या दीवारों से घिरा हुआ एक विशेष स्थान बनाया गया था, जिसे अंग्रेज़ी में Bath Tank कहा गया है। यह समुद्र की तेज़ लहरों से अपेक्षाकृत सुरक्षित होता है।
कन्याकुमारी भारत के सबसे दक्षिणी छोर पर स्थित है और अपनी अनूठी भौगोलिक, प्राकृतिक और धार्मिक विशेषताओं के कारण पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। इसके प्रसिद्ध होने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –
- तीन समुद्रों का संगम (त्रिवेणी संगम)
कन्याकुमारी वह अनूठा स्थान है जहाँ भारत के तीनों ओर मौजूद जलराशियों का मिलन होता है— पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर और दक्षिण में हिंद महासागर। इसे त्रिवेणी संगम भी कहा जाता है।
- सूर्योदय और सूर्यास्त का अद्भुत दृश्य
कन्याकुमारी अपने मनमोहक सूर्योदय और सूर्यास्त के लिए मशहूर है। यहाँ क्षितिज पर सूर्य को समुद्र से निकलते और उसी में डूबते हुए साफ देखा जा सकता है। पूर्णिमा के दिन यहाँ एक अद्भुत खगोलीय दृश्य देखने को मिलता है, जब एक ही समय पर पश्चिम में सूर्यास्त और पूर्व में चंद्रोदय होता है।
- स्वामी विवेकानंद रॉक मेमोरियल
समुद्र के बीचों-बीच स्थित एक विशाल चट्टान पर यह भव्य स्मारक बना है। यह वही चट्टान है जहाँ 1892 में ‘परिव्राजक’ अर्थात् घुमक्कड़ संन्यासी स्वामी विवेकानंद ने लगातार तीन दिन तक समाधि (ध्यान) लगाई थी और उन्हें जीवन का लक्ष्य प्राप्त हुआ था। पर्यटन के लिहाज से यह कन्याकुमारी का सबसे बड़ा आकर्षण है।
- कन्याकुमारी देवी का मंदिर या भगवती अम्मन मंदिर
इस शहर का नाम ही देवी ‘कन्याकुमारी’ अर्थात् पार्वती जी के कुँवारी रूप के नाम पर पड़ा है। यह मंदिर भारत के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है और हिंदू श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थ स्थल है।
- संत तिरुवल्लुवर की विशाल प्रतिमा
विवेकानंद रॉक के ठीक पास समुद्र में एक और चट्टान पर प्रसिद्ध तमिल कवि और दार्शनिक संत तिरुवल्लुवर की 133 फीट ऊँची भव्य पत्थर की मूर्ति स्थापित है। यह मूर्ति उनकी प्रसिद्ध रचना ‘तिरुक्कुरल’ के 133 अध्यायों का प्रतीक है।
- महात्मा गांधी मंडपम
महात्मा गांधी की अस्थियों को समुद्र में विसर्जित करने से पहले लोगों के दर्शन के लिए इसी स्थान पर रखा गया था। इस स्मारक की वास्तुकला की विशेषता यह है कि हर साल 2 अक्टूबर अर्थात् गांधी जयंती के दिन सूर्य की पहली किरण ठीक उसी स्थान पर पड़ती है, जहाँ उनकी अस्थियों का कलश रखा गया था।
- बहुरंगी रेत
यहाँ के समुद्र तटों की एक और खासियत यह है कि यहाँ की रेत सुरमई, पीली, लाल, खाकी और काले जैसे कई अलग-अलग रंगों में पाई जाती है।
संक्षेप में, कन्याकुमारी केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है, बल्कि यह भारत की आध्यात्मिक शांति, सांस्कृतिक एकता और प्राकृतिक सौंदर्य का एक महान प्रतीक है।
आखिरी चट्टान तक – समस्याएँ
शिक्षित बेरोजगारी (Educated Unemployment) – कन्याकुमारी जैसे छोटे क्षेत्र की केवल 8,000 की आबादी में लगभग 400-500 शिक्षित युवा (जिसमें 100 ग्रेजुएट हैं) बेरोजगार हैं। डिग्रियाँ होने के बावजूद वे पेट पालने के लिए सीपियों का गूदा खाने या पर्यटकों को फोटो एल्बम बेचने जैसे छोटे काम करने को मजबूर हैं। युवाओं का समय केवल नौकरियों के लिए अर्जियाँ देने और कुंठावश दार्शनिक बहस करने में बीत रहा है।
सामाजिक-आर्थिक असमानता (Socio-Economic Disparity) – समाज में अमीर और गरीब वर्ग के बीच की गहरी खाई साफ दिखाई देती है। एक तरफ अभिजात्य वर्ग (सरकारी मेहमान) है, जो सुंदर रेशमी कपड़े पहनकर दूरबीन से सूर्योदय देखता है और नौकरों के हाथों समुद्र किनारे कॉफी पीता है। दूसरी तरफ श्रमिक वर्ग (मल्लाह) है, जो रबर के तीन तनों को जोड़कर बनी मामूली नाव पर अपनी जान जोखिम में डालकर पर्यटकों को घुमाता है और रोज की रोटी के लिए संघर्ष करता है।
परिवहन और बुनियादी ढाँचे की चिंता – पाठ के अंत में लेखक प्राकृतिक सौंदर्य में खोए होने के बाद भी लगातार बसों का टाइम-टेबल (जैसे- तीसरी बस नौ चालीस पर, चौथी…) दोहरा रहा है। यह एक साधारण यात्री की उस व्यावहारिक समस्या को दिखाता है जहाँ समय पर साधन न मिलने से वह दूर-दराज के क्षेत्रों में फँस सकता है।
अभ्यास
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
- लेखक ने सूर्यास्त का मनोहारी दृश्य कहाँ से देखा?
(क) विवेकानंद चट्टान से
(ख) अरब सागर की ओर के ऊँचे टीले से
(ग) पच्छिमी क्षितिज से
(घ) सैंड हिल से
उत्तर – (ख) अरब सागर की ओर के ऊँचे टीले से
तर्क/कारण – यद्यपि लेखक पहले ‘सैंड हिल’ पर रुका था, लेकिन वहाँ से अरब सागर की ओर का पूरा विस्तार एक अन्य ऊँचे टीले की ओट में छिपा हुआ था। पूरा सूर्यास्त बिना किसी बाधा के साफ़ देखा जा सके, इसके लिए लेखक एक के बाद एक कई टीले पार करके अरब सागर की ओर वाले सबसे ऊँचे टीले पर पहुँचा और वहीं से उसने सूर्यास्त का पूरा मनोहारी दृश्य देखा।
- “मैं कुछ देर भूला रहा कि मैं मैं ही हूँ।” यह कथन लेखक की किस मनःस्थिति को दर्शाता है?
(क) मौन हो जाना
(ख) विस्मित हो जाना
(ग) भ्रमित हो जाना
(घ) आशंकित होना
उत्तर – (ख) विस्मित हो जाना (या दृश्य में पूरी तरह खो जाना/एकाकार होना)
तर्क/कारण – तीन सागरों के संगम पर खड़ी आखिरी चट्टान से जब लेखक ने समुद्र की असीम शक्ति और लहरों का विराट रूप देखा, तो वह आश्चर्यचकित रह गया। वह स्वयं को एक दर्शक या यात्री न मानकर उस अचेतन विशाल प्रकृति का ही एक छोटा सा हिस्सा महसूस करने लगा। यह मनःस्थिति विस्मय और आत्मविस्मृति की पराकाष्ठा को दर्शाती है।
- “मैंने, सिर्फ मैंने उस चोटी को पहली बार सर किया हो।” इस कथन में कौन-सा भाव व्यक्त होता है?
(क) करुणा
(ख) विनम्रता
(ग) आत्मीयता
(घ) संतुष्टि
उत्तर – (घ) संतुष्टि
तर्क/कारण – लगातार कई ऊँचे-नीचे रेत के टीलों को पार करते हुए लेखक की टाँगें पूरी तरह थक चुकी थीं, फिर भी उसका मन खुला विस्तार देखने के लिए दृढ़ था। जब अंततः सबसे ऊँचे टीले पर पहुँचकर उसे पश्चिमी क्षितिज का असीम दृश्य दिखाई दे गया, तो उसे अपने कठिन प्रयास की सार्थकता का अनुभव हुआ। यह पंक्ति उसी कठिन परिश्रम के बाद मिली मानसिक संतुष्टि और विजय के आनंद को प्रकट करती है।
- ‘शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति’ वाक्य में वर्णन है-
(क) बलखाती लहरों का
(ख) सागर की व्यापकता का
(ग) सूर्यास्त के दृश्य का
(घ) पच्छिमी क्षितिज का
उत्तर – (ख) सागर की व्यापकता का
तर्क/कारण – जब लेखक भारत के स्थल-भाग की अंतिम चट्टान पर खड़े होकर तीनों ओर अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी के फैले अनंत जल-राशि के क्षितिज को देखते हैं, तो उन्हें समुद्र की असीमित शक्ति और उसके अनंत फैलाव का अहसास होता है। यह वाक्य सागर की इसी विराट व्यापकता, अगाध गहराई और उसकी प्रचंड ऊर्जा को पूरी चेतना से महसूस करने का सजीव वर्णन है।
- लेखक की कन्याकुमारी की यात्रा का वर्णन पढ़कर कहा जा सकता है कि-
(क) यह कन्याकुमारी के मौसम को प्रमुखता से वर्णित करता है।
(ख) यह यात्रा को जीवंत अनुभूतियों से जोड़ता है।
(ग) यह केवल यात्रा के रोमांच पर केंद्रित है।
(घ) इसमें कन्याकुमारी का काल्पनिक वर्णन मिलता है।
उत्तर – (ख) यह यात्रा को जीवंत अनुभूतियों से जोड़ता है।
तर्क/कारण – मोहन राकेश का यह यात्रा-वृत्तांत केवल एक भौगोलिक विवरण या पर्यटन स्थलों की सूची मात्र नहीं है। लेखक जहाँ भी जाता है – चाहे वह चट्टानों के बीच बढ़ते पानी का डर हो, रेत के बदलते रंग हों, या विवेकानंद चट्टान पर बैठकर स्थानीय बेरोजगार युवाओं के साथ बातचीत हो – वह हर दृश्य को अपनी आंतरिक संवेदना और जीवंत अनुभूतियों के साथ जोड़कर पाठकों के सामने सजीव रूप से प्रस्तुत करता है।
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-
- यात्रियों का समूह सूर्यास्त का दृश्य देखने के लिए सैंड हिल की ओर बढ़ता जा रहा था लेकिन लेखक सैंड हिल पर पहुँचकर कुछ देर रुकने के बाद दूसरे टीले की ओर बढ़ने लगा। उसके ऐसा करने के पीछे मूल कारण क्या था?
उत्तर – लेखक सैंड हिल पर पहुँच तो गए, लेकिन वहाँ से अरब सागर की तरफ का पूरा प्राकृतिक विस्तार एक अन्य ऊँचे टीले की ओट में छिपा हुआ था। लेखक सूर्यास्त को बिना किसी रुकावट के उसके पूरे विराट फैलाव की पृष्ठभूमि में देखना चाहते थे। इसी बाधा को दूर करने के लिए वह सैंड हिल छोड़कर आगे के टीलों की ओर बढ़ने लगे।
- लेखक ने कन्याकुमारी के स्थानीय लोगों के विषय में क्या-क्या बताया?
उत्तर – लेखक ने बताया कि कन्याकुमारी की आठ हजार की आबादी में लगभग चार-पाँच सौ शिक्षित युवा बेरोजगार हैं, जिनमें सौ ग्रेजुएट हैं। उनका मुख्य काम नौकरियों के लिए अर्जियाँ देना और बहस करना है। वे पेट पालने के लिए सीपियों का गूदा खाते हैं और फोटो एल्बम या शंख बेचते हैं। स्थानीय लोगों से यह भी पता चला कि यहाँ के मल्लाह रबर के तनों की नाव से पर्यटकों को घुमाते हैं।
- “अपने प्रयत्न की सार्थकता से संतुष्ट होकर मैं टीले पर बैठ गया” इस पंक्ति में ‘प्रयत्न की सार्थकता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर – ‘प्रयत्न की सार्थकता’ का अभिप्राय लेखक द्वारा अपनी शारीरिक थकावट के बावजूद लगातार कई ऊँचे-नीचे रेत के टीलों को पार करने के कठिन प्रयास के बाद का सफल होना है। जब अंततः सबसे ऊँचे टीले पर पहुँचकर उसे पश्चिमी क्षितिज का वह असीम और निर्बाध सुंदर दृश्य दिखाई दे गया, तो उनका उद्देश्य पूरा हो गया और उसकी मेहनत सफल हो गई।
- यात्रा-वृत्तांत में आए उन दृश्यों के विषय में लिखिए जिनका अनुभव लेखक के लिए बिल्कुल नया था।
उत्तर – लेखक के लिए तीन सागरों के संगम स्थल की चट्टान पर असीम जल-राशि को देखना और सूर्योदय-सूर्यास्त के समय पल-पल बदलते रंगों जैसे – सोने से लहू और फिर बैंजनी होने का अनुभव बिल्कुल नया था। इसके अलावा, समुद्र तट पर एक-एक इंच पर अनाम और अनूठे सम्मिश्रणों वाली बहुरंगी रेत को देखना भी उसका पहला अनुभव था।
- यात्रा- वृत्तांत से ऐसे दो अंश चुनकर लिखिए जिससे लेखक की मानसिक दृढ़ता और हार न मानने की प्रवृत्ति का पता चलता है।
उत्तर – लेखक की मानसिक दृढ़ता को दर्शाने वाले दो मुख्य अंश निम्नलिखित हैं –
पहला अंश – “टाँगें थक रही थीं पर मन थकने को तैयार नहीं था। जल्दी-जल्दी चलते हुए मैंने एक के बाद एक कई टीले पार किए।”
दूसरा अंश – “चट्टान की नोकों पर पैर रखता किसी तरह उसके ऊपर पहुँच गया… खतरे के बावजूद बढ़ते पानी में रास्ता खोजने के लिए दौड़ने लगा।”
विधा से संवाद
यात्रा का वृत्तांत
मोहन राकेश का ‘आखिरी चट्टान तक’ यात्रा-वृत्तांत केवल स्थान चित्रण नहीं है बल्कि इसमें प्रकृति का सजीव रूपांकन, मानव-जीवन और समाज की झलक तथा आत्मानुभूति का गहरा समन्वय मिलता है।
नीचे यात्रा- वृत्तांत के प्रमुख तत्त्वों/विशेषताओं को कुछ प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से दर्शाया गया है। इन्हें पढ़कर यात्रा-वृत्तांत की रचना-प्रक्रिया को समझने का प्रयास कीजिए। अपनी किसी यात्रा को इन बिंदुओं के माध्यम से समझाइए।
- दृश्य- वर्णन
समुद्र, चट्टानें
लहरों का चित्रण
रंग, आकाश, रेत का
जीवंत चित्रण
- दृश्य-वर्णन
लद्दाख का स्वरूप – आँखों के सामने फैले अंतहीन भूरे और मटमैले ठंडे पहाड़, जिनके शिखरों पर सफेद बर्फ की चादर लिपटी थी।
नदी और आकाश – नीचे सिंधु नदी का गहरा नीला पानी पथरीली घाटियों को काटता हुआ बह रहा था। दोपहर का आकाश इतना साफ और गाढ़ा नीला था, मानो किसी चित्रकार ने कैनवस पर ताज़ा रंग बिखेर दिया हो। पैंगोंग झील का पानी सूर्य की किरणों के साथ अपना रंग नीले से पन्ने जैसा बदल रहा था।
- आत्मानुभूति व भावनाएँ
विस्मय, रोमांच, भय, आत्म-संवेदना
अपने अस्तित्व का बोध
प्रकृति से संवाद
- आत्मानुभूति व भावनाएँ
रोमांच और विस्मय – खारदुंगला दर्रे जो दुनिया की सबसे ऊँची मोटर योग्य सड़कों में से एक है, वहाँ पर पहुँचकर खड़े होना एक अद्भुत रोमांच था।
अस्तित्व का बोध – चारों ओर फैले उन गगनचुंबी, अचल पहाड़ों के बीच खुद को खड़ा पाकर ऐसा लगा मानो इस विशाल ब्रह्मांड में मेरा अस्तित्व एक छोटे से रेत के कण जैसा है। प्रकृति की उस नीरवता में एक अजीब सी शांति थी, जो सीधे अंतरात्मा से संवाद कर रही थी।
- सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य
विवेकानंद चट्टान
स्थानीय लोग,
नवयुवक, शिक्षा
धार्मिक परंपराएँ
(मंदिर, अर्घ्य)
- सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य
मठ और स्थानीय जीवन – पहाड़ियों की चोटियों पर बने प्राचीन बौद्ध मठ ‘थिकसे मोनेस्ट्री’ और हवा में लहराते रंग-बिरंगे प्रार्थना ध्वज।
स्थानीय लोग – यहाँ के स्थानीय लद्दाखी लोगों के चेहरे पर आधुनिक दुनिया की भागदौड़ नहीं, बल्कि एक सहज मुस्कान और संतोष था। शून्य से नीचे के तापमान में भी सेना के जवान और सीमा सड़क संगठन के मज़दूर देश के लिए रास्ते बनाते दिखे, जो वहाँ के कठिन जीवन-संघर्ष को दर्शाता है।
- जीवन-दर्शन
शक्ति का विस्तार,
विस्तार की शक्ति
आत्म-चेतना
क्षणभंगुरता व उदासी
- जीवन-दर्शन
पहाड़ों का मौन संदेश – पहाड़ों का वह सदियों पुराना मौन यह सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठोर अर्थात् ठंडी और रूखी क्यों न हों, अपने स्थान पर अडिग रहना ही जीवन है।
क्षणभंगुरता – शाम को जब पहाड़ों के पीछे सूरज डूबा और चारों तरफ बर्फीली हवाएँ चलने लगीं, तो मन में एक हल्की उदासी और जीवन की क्षणभंगुरता का गहरा अहसास हुआ।
- शैलीगत विशेषताएँ
सजीव, प्रवाहपूर्ण भाषा
दृश्यात्मकता
रूपक, उपमा, प्रतीक
रंगों का भावात्मक प्रयोग
- शैलीगत विशेषताएँ
उपमा और प्रतीक – पहाड़ियों पर जमी बर्फ ऐसी लग रही थी मानो पहाड़ों ने ‘चाँदी के मुकुट’ पहन रखे हों। प्रार्थना ध्वज हवा में ऐसे फड़फड़ा रहे थे जैसे शांति के दूत मंत्र पढ़ रहे हों। भाषा में ‘ठंडी सिहरन’, ‘भूरा सन्नाटा’ और ‘नीली नीरवता’ जैसे दृश्यात्मक शब्दों का प्रयोग किया गया।
- रोमांच व संघर्ष
लहरों से संघर्ष
अँधेरे में भटकने का भय
सुरक्षित लौटने की चिंता
- रोमांच व संघर्ष
ऑक्सीजन का संकट – ऊँचाई पर पहुँचने पर हवा का पतला होना और साँस लेने में आने वाली हल्की दिक्कत एक बड़ा शारीरिक संघर्ष था।
भय और सुरक्षित वापसी – चांगला दर्रे को पार करते समय अचानक शुरू हुई बर्फबारी और संकरे मोड़ों पर गाड़ी के टायर फिसलने का डर। मन में बस यही चिंता थी कि रात होने से पहले सुरक्षित रूप से लेह घाटी के अपने होटल पहुँच जाएँ।
विषयों से संवाद
यात्रा और खोज
संसार में बहुत से लोगों ने लंबी-लंबी यात्राएँ की हैं और अपनी यात्रा से अर्जित ज्ञान और अनुभव से समाज को समृद्ध किया है। पुस्तकालय एवं शिक्षक की सहायता से कुछ महत्त्वपूर्ण यात्रा-वृत्तांत और उनके लेखकों के विषय में जानकारी एकत्रित कीजिए और लिखिए। आपकी सहायता के लिए एक संकेत नीचे दिया गया है।
महत्त्वपूर्ण यात्रा-वृत्तांत, स्थान एवं उनके रचनाकार
क्र. सं. | यात्रा-वृत्तांत (पुस्तक) | प्रमुख स्थान / क्षेत्र | रचनाकार / यात्री | ऐतिहासिक महत्त्व / मुख्य विशेषता |
1 | किन्नर देश में | किन्नौर (हिमाचल प्रदेश) | राहुल सांकृत्यायन | इन्हें ‘महापंडित’ और हिंदी यात्रा-साहित्य का जनक माना जाता है। इन्होंने वहाँ की जनजातियों का सुंदर वर्णन किया है। |
2 | मेरी लद्दाख यात्रा | लद्दाख और तिब्बत सीमा | राहुल सांकृत्यायन | इस यात्रा-वृत्तांत के माध्यम से भारतीयों को पहली बार लद्दाख की दुर्गम घाटियों और बौद्ध संस्कृति की प्रामाणिक जानकारी मिली। |
3 | अरे यायावर रहेगा याद | संपूर्ण भारत के सुदूर क्षेत्र | सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ | यह आधुनिक हिंदी का एक श्रेष्ठ यात्रा-वृत्तांत है, जिसमें असम के जंगलों से लेकर पंजाब तक की प्राकृतिक और सांस्कृतिक खोज है। |
4 | एक बूँद सहसा उछली | यूरोपीय देश (विदेश यात्रा) | सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ | इस पुस्तक में लेखक ने अपनी पश्चिमी देशों की यात्रा और वहाँ के आधुनिक जीवन-दर्शन का आत्मानुभूति के साथ वर्णन किया है। |
5 | पैरों में पंख बाँधकर | मध्य एशिया और विश्व भ्रमण | रामवृक्ष बेनीपुरी | इस वृत्तांत में लेखक की गत्यात्मक शैली और नई संस्कृतियों को जानने की तीव्र उत्सुकता दिखाई देती है। |
6 | चीड़ों पर चाँदनी | शिमला और यूरोपीय देश | निर्मल वर्मा | यह एक बहुत ही कलात्मक और दार्शनिक यात्रा-वृत्तांत है, जिसमें स्थानों के सौंदर्य को आंतरिक अनुभूतियों से जोड़ा गया है। |
7 | सफारी (सफ़रनामा) | भारत और चीन | इब्न बतूता | 14वीं शताब्दी का यह प्रसिद्ध मोरक्कन यात्री भारत (मोहम्मद बिन तुगलक के काल) आया था। इसका यात्रा-वृत्तांत मध्यकालीन इतिहास का मुख्य स्रोत है। |
8 | सी-यू-की (बौद्ध देशों का रिकॉर्ड) | प्राचीन भारत और नालंदा | ह्वेन सांग (Xuanzang) | यह चीनी बौद्ध भिक्षु सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया था। इसने भारत की शिक्षा, धर्म और सामाजिक व्यवस्था का ऐतिहासिक दस्तावेज़ तैयार किया। |
मेरे देश की धरती
कन्याकुमारी भारत के तमिलनाडु राज्य में स्थित एक तटीय शहर है जिसके प्राकृतिक सौंदर्य का चित्रण पाठ में हुआ है।
- भारत के समुद्री तट पर स्थित अन्य राज्यों के नाम तथा उनकी अवस्थिति को भारत के मानचित्र पर चिह्नित कीजिए।
उत्तर – भारत की मुख्य भूमि की तटरेखा लगभग 6,100 किलोमीटर लंबी है, जो पश्चिम में अरब सागर से लेकर पूर्व में बंगाल की खाड़ी तक फैली है। इस समुद्री तट पर कुल 9 राज्य स्थित हैं –
तट का नाम | समुद्री तट पर स्थित राज्य | मानचित्र पर अवस्थिति (Location) |
पश्चिमी तट (अरब सागर) | 1. गुजरात 2. महाराष्ट्र 3. गोवा 4. कर्नाटक 5. केरल | • भारत के उत्तर-पश्चिम से शुरू होकर दक्षिण-पश्चिम तक। • यह तट अपेक्षाकृत सँकरा है और यहाँ तीव्र ढलान वाली पहाड़ियाँ (पश्चिमी घाट) हैं। |
पूर्वी तट (बंगाल की खाड़ी) | 6. तमिलनाडु 7. आंध्र प्रदेश 8. ओडिशा 9. पश्चिम बंगाल | • भारत के दक्षिण-पूर्व से लेकर उत्तर-पूर्व तक। • यह तट चौड़ा, समतल है और यहाँ नदियाँ बड़े-बड़े डेल्टा बनाती हैं। |
मानचित्र गतिविधि निर्देश – छात्र भारत का एक राजनीतिक रेखा-मानचित्र (Outline Map) लेकर पश्चिमी भाग में गुजरात से केरल तक और पूर्वी भाग में तमिलनाडु से पश्चिम बंगाल तक के तटीय राज्यों को अलग-अलग रंगों से भरकर चिह्नित कर सकते हैं।
- यात्रा करना सभी को अच्छा लगता है। आपके मन में भी कुछ जगहों को देखने की इच्छा अवश्य हुई होगी। अपनी पसंद की उन जगहों की सूची नीचे दिए गए शीर्षकों के अनुसार बनाइए।
उत्तर –
पर्यटन स्थल | राज्य जहाँ वह स्थित है | पर्वतीय/समुद्री/मैदानी/अन्य क्षेत्र | जलवायु | घूमने का अनुकूल समय |
मनाली | हिमाचल प्रदेश | पर्वतीय क्षेत्र | अत्यधिक ठंडी और सुहावनी | मार्च से जून (या बर्फबारी के लिए दिसंबर-जनवरी) |
पुरी | ओडिशा | समुद्री तटीय क्षेत्र | उष्णकटिबंधीय (गर्म और आर्द्र) | अक्टूबर से फरवरी |
जयपुर | राजस्थान | मरुस्थलीय / ऐतिहासिक क्षेत्र | शुष्क और गर्म | नवंबर से मार्च (सर्दियों में) |
ऋषिकेश | उत्तराखंड | मैदानी व पर्वतीय संगम (धार्मिक) | समशीतोष्ण (Mild) | सितंबर से नवंबर और मार्च से मई |
- कन्याकुमारी की भौगोलिक स्थिति, परिवेश, महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थल एवं जन-जीवन का वर्णन करते हुए बताइए कि वहाँ की स्थिति आपके राज्य अथवा शहर / गाँव से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर – भौगोलिक स्थिति और परिवेश – कन्याकुमारी भारतीय प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण छोर पर स्थित है। यह तीन विशाल जल-राशियों—अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी का संगम स्थल है। इसका परिवेश पूरी तरह तटीय, पथरीला और रेतीला है, जहाँ दूर-दूर तक नारियल के झुरमुट दिखाई देते हैं।
महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थल – विवेकानंद रॉक मेमोरियल, तिरुवल्लुवर प्रतिमा, कन्याकुमारी अम्मन मंदिर, सनसेट पॉइंट (सैंड हिल) और गांधी मेमोरियल मंडपम।
जन-जीवन – यहाँ का जन-जीवन मुख्य रूप से पर्यटन, मछली पकड़ने (मल्लाह), सीपियों-शंखों के हस्तशिल्प और छोटे-मोटे व्यापार पर निर्भर है। यहाँ की मुख्य भाषा तमिल है और मुख्य भोजन चावल व मछली है।
चूँकि ओडिशा भी भारत के पूर्वी तट पर स्थित है, इसलिए यहाँ के तटीय शहरों जैसे- पुरी या गोपालपुर के परिवेश में कन्याकुमारी से बहुत समानताएँ हैं।
समानता – दोनों ही जगहों पर समुद्र तट, नारियल के पेड़, गर्म-आर्द्र जलवायु और मछली पकड़ने वाले नाविकों का जीवन देखने को मिलता है।
भिन्नता – ओडिशा की रेत मुख्य रूप से सुनहरी-पीली या खाकी है, जबकि कन्याकुमारी के तट पर अनाम रंगों वाली बहुरंगी रेत पाई जाती है। इसके अलावा, ओडिशा में तीन सागरों का ऐसा त्रिवेणी संगम नहीं है जैसा कन्याकुमारी में है, जहाँ एक ही स्थान से सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों देखा जा सकता है।
मेरे राज्य/शहर (ओडिशा) से तुलना –
चूँकि ओडिशा भी भारत के पूर्वी तट पर स्थित है, इसलिए यहाँ के तटीय शहरों (जैसे- पुरी या गोपालपुर) के परिवेश में कन्याकुमारी से बहुत समानताएँ हैं।
समानता – दोनों ही जगहों पर समुद्र तट, नारियल के पेड़, गर्म-आर्द्र जलवायु और मछली पकड़ने वाले नाविकों का जीवन देखने को मिलता है।
भिन्नता – ओडिशा की रेत मुख्य रूप से सुनहरी-पीली या खाकी है, जबकि कन्याकुमारी के तट पर अनाम रंगों वाली बहुरंगी (सुरमई, लाल, काली) रेत पाई जाती है। इसके अलावा, ओडिशा में तीन सागरों का ऐसा त्रिवेणी संगम नहीं है जैसा कन्याकुमारी में है, जहाँ एक ही स्थान से सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों देखा जा सकता है।
- इस यात्रा-वृत्तांत में कन्याकुमारी में स्थित चट्टान को आखिरी चट्टान कहा गया है। पुस्तकालय या अन्य स्रोतों तथा समाज विज्ञान के अपने शिक्षक से बातचीत करके पता लगाइए कि वर्तमान समय में भारत का अंतिम छोर (दक्षिणतम बिंदु) किसे माना जाता है। उस स्थान के विषय में लिखिए।
उत्तर – यात्रा-वृत्तांत में कन्याकुमारी को स्थल-भाग की आखिरी चट्टान कहा गया है, जो कि मुख्य भूमि का दक्षिणतम बिंदु है।
परंतु, यदि संपूर्ण भारत की बात की जाए, तो भारत का सबसे अंतिम छोर ‘इन्दिरा पॉइंट’ (Indira Point) है।
अवस्थिति – यह बिंदु अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के ‘ग्रेट निकोबार’ द्वीप पर स्थित है। भौगोलिक दृष्टि से यह भूमध्य रेखा (Equator) के अत्यंत निकट है।
विशेष जानकारी – पहले इसे ‘पिगमैलियन पॉइंट’ या ‘पार्सन्स पॉइंट’ कहा जाता था। वर्ष 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सम्मान में इसका नाम ‘इन्दिरा पॉइंट’ रखा गया। वर्ष 2004 में आई भयंकर सुनामी के कारण इस पॉइंट का एक बड़ा हिस्सा और यहाँ बना प्रकाश-स्तंभ (Lighthouse) समुद्र के पानी में आंशिक रूप से डूब गया था, लेकिन यह आज भी भारत की संप्रभुता का अंतिम दक्षिणी प्रतीक है।
- इंटरनेट या अन्य किन्हीं माध्यमों से पता लगाइए कि आखिरी चट्टान में वर्णित कन्याकुमारी के विवेकानंद स्मारक चट्टान के स्वरूप में किस प्रकार का विस्तार हुआ है?
(संकेत- तिरुवल्लुवर की प्रतिमा इत्यादि)
उत्तर – मोहन राकेश ने जब 1953 के आसपास यात्रा की थी, तब वह चट्टान एक निर्जन और सूनी समाधिस्थ चट्टान जैसी दिखती थी, जहाँ नाव से जाना भी बेहद खतरनाक था। वर्तमान समय में इस स्मारक के स्वरूप में बहुत बड़ा और भव्य विस्तार हो चुका है –
विवेकानंद रॉक मेमोरियल (1970) – राष्ट्रभक्तों और श्री एकनाथ रानाडे के अथक प्रयासों से सन 1970 में इस चट्टान पर एक अत्यंत भव्य और विशाल स्मारक भवन का निर्माण पूरा हुआ। इसमें स्वामी विवेकानंद की एक विशाल कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई है और एक ध्यान मंडपम बनाया गया है जहाँ पर्यटक ध्यान लगाते हैं।
तिरुवल्लुवर की विशाल प्रतिमा (2000) – विवेकानंद चट्टान के ठीक बगल वाली दूसरी चट्टान पर तमिल भाषा के महान संत और दार्शनिक कवि तिरुवल्लुवर की 133 फुट ऊँची विशाल पाषाण प्रतिमा स्थापित की गई है। यह प्रतिमा तमिल साहित्य के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘तिरुक्कुरल’ के 133 अध्यायों का प्रतीक है।
आधुनिक परिवहन और सुरक्षा – अब रबर के तनों वाली नावों की जगह ‘पूमपुहार शिपिंग कॉर्पोरेशन’ द्वारा संचालित आधुनिक, बड़ी और अत्यधिक सुरक्षित मोटर चालित जेटी/फेरी (Ferry) चलती हैं, जो चंद मिनटों में हज़ारों पर्यटकों को तट से इन चट्टानों तक पहुँचाती हैं। रात के समय यह पूरा परिसर रंग-बिरंगी आधुनिक लाइटों से जगमगा उठता है।
हस्तशिल्प कौशल
“दो स्थानीय नवयुवतियाँ उन्हें अपनी टोकरियों से शंख-मालाएँ दिखला रही थीं।”
उपर्युक्त पंक्ति में स्थानीय युवतियों द्वारा यात्रियों को दिखाए जाने वाली शंख-मालाओं का उल्लेख है। यह भारतीय हस्तकला उद्योग के एक पारंपरिक रूप को दर्शाता है, जहाँ स्थानीय कारीगर घरेलू स्तर पर उत्पाद बनाते और बेचते हैं। शिक्षक की सहायता से हस्तकला और कुटीर उद्योग के विषय में जानकारी एकत्रित कीजिए।
- किसी भी स्थानीय शिल्पकार से बात करके निम्नलिखित बिंदुओं पर जानकारी संगृहीत कीजिए। यह कार्य दो-दो के जोड़े में कीजिए-
शिल्प का नाम
यह कार्य कब से कर रहे हैं?
इसका प्रशिक्षण कहाँ से लिया?
शिल्प निर्माण में घर की महिलाओं की साझेदारी
प्रयुक्त सामग्री, तकनीक, लागत और विपणन
औपचारिक संस्थागत प्रशिक्षण
उत्तर – स्थानीय शिल्पकार से साक्षात्कार (एक अनुकरणीय केस स्टडी)
यह गतिविधि छात्रों को दो-दो के जोड़े में किसी स्थानीय कारीगर, जैसे- कुम्हार, बुनकर, या शंख-शिल्पी के पास जाकर करनी है। यहाँ समझने के लिए एक पारंपरिक शंख और सीप हस्तशिल्पकार का साक्षात्कार प्रारूप दिया गया है –
शिल्प का नाम – समुद्री सीप और शंख हस्तशिल्प।
यह कार्य कब से कर रहे हैं? – शिल्पकार रघुनाथ जी ने बताया कि उनका परिवार यह कार्य पिछली तीन पीढ़ियों से कर रहा है।
इसका प्रशिक्षण कहाँ से लिया? – उन्होंने इसका प्राथमिक प्रशिक्षण अपने माता-पिता और दादाजी से घर पर ही लिया।
शिल्प निर्माण में घर की महिलाओं की साझेदारी – इस उद्योग में महिलाओं की भूमिका सर्वोपरि है। सीपियों को समुद्र से लाने के बाद उन्हें साफ़ करना, रसायनों से धोना, उन पर पॉलिश करना और मालाओं में पिरोने का पूरा काम घर की महिलाएँ ही संभालती हैं।
प्रयुक्त सामग्री, तकनीक, लागत और विपणन – सामग्री व तकनीक – कच्चे शंख, कौड़ियाँ, रंगीन धागे, पॉलिश और घिसाई करने वाली छोटी मशीनें।
लागत और विपणन (मार्केटिंग) – शुरुआती लागत बहुत कम होती है (लगभग ₹5,000 से ₹10,000)। तैयार माल को वे टोकरियों में भरकर स्थानीय पर्यटन घाटों, सैंड हिल या अपनी छोटी दुकानों पर पर्यटकों को सीधे बेचते हैं।
औपचारिक संस्थागत प्रशिक्षण – रघुनाथ जी ने बताया कि उन्हें कोई औपचारिक डिग्री नहीं मिली है, लेकिन हाल ही में सरकार के ‘विकास आयुक्त (हस्तशिल्प)’ कार्यालय द्वारा आयोजित 15 दिनों के एक अपग्रेडेशन कैंप में उन्होंने आधुनिक कटिंग मशीनों को चलाना सीखा है।
- डिजिटल खरीददारी और ई-वाणिज्य कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने में किस प्रकार उपयोगी है?
उत्तर – डिजिटल खरीदारी और ई-वाणिज्य (E-Commerce) की उपयोगिता
वर्तमान समय में इंटरनेट और ई-कॉमर्स, जैसे- Amazon Karigar, Flipkart Samarth, या ONDC जैसे कुटीर उद्योगों का भाग्य बदल रहे हैं। यह निम्नलिखित प्रकार से उपयोगी है –
बिचौलियों का अंत – पहले कारीगरों को अपना सामान बहुत कम दाम पर स्थानीय बड़े व्यापारियों को बेचना पड़ता था। अब ई-कॉमर्स की मदद से वे सीधे देश-विदेश के ग्राहकों से जुड़कर अपना वास्तविक मुनाफा कमा रहे हैं।
वैश्विक बाज़ार – कन्याकुमारी या भारत के किसी सुदूर गाँव में बैठी महिला की बनाई शंख-माला या हस्तनिर्मित साड़ी को दिल्ली, मुंबई या अमेरिका में बैठा व्यक्ति भी एक क्लिक पर खरीद सकता है।
डिजिटल भुगतान – UPI जैसे- PhonePe, Google Pay के आ जाने से छोटे से छोटे खोमचे और टोकरी वाले कारीगरों को भी खुले पैसों की समस्या से मुक्ति मिली है और भुगतान सीधा उनके बैंक खाते में सुरक्षित पहुँच जाता है।
सोशल मीडिया से विपणन – इंस्टाग्राम और फेसबुक के माध्यम से कारीगर अपने उत्पाद बनाने का वीडियो डालकर ग्राहकों में विश्वास जगाते हैं, जिससे उनके ब्रांड की वैल्यू बढ़ती है।
- हस्तशिल्प कला को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की जानकारी इकट्ठा कीजिए और अपनी कक्षा में उस पर चर्चा कीजिए।
उत्तर – भारत सरकार और राज्य सरकारों द्वारा कुटीर उद्योगों को जीवित रखने और कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई महत्त्वपूर्ण योजनाएँ चलाई जा रही हैं –
पीएम विश्वकर्मा योजना – इस योजना के तहत पारंपरिक कारीगरों को जैसे – लोहार, कुम्हार, बुनकर, मूर्तिकार आदि को पहचान पत्र, कौशल उन्नयन के लिए वजीफा, आधुनिक टूलकिट खरीदने के लिए ₹15,000 की वित्तीय सहायता और बिना गारंटी के बहुत कम ब्याज पर लोन दिया जाता है।
‘एक जिला एक उत्पाद’ योजना (ODOP – One District One Product) – इस योजना के तहत हर जिले के एक प्रसिद्ध पारंपरिक शिल्प जैसे- वाराणसी की सिल्क, आगरा का पेठा/चमड़ा या तटीय क्षेत्रों के सीप-शंख को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ब्रांडिंग और मार्केटिंग सहायता दी जाती है।
‘हुनर हाट’ और ‘सरस मेला’ का आयोजन – अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय और ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा समय-समय पर बड़े शहरों में प्रदर्शनियों का आयोजन किया जाता है, जहाँ देश भर के दूर-दराज के कारीगरों को मुफ्त स्टॉल देकर अपना सामान बेचने का मंच दिया जाता है।
जी.आई. टैग (Geographical Indication Tag) – किसी विशिष्ट क्षेत्र के पारंपरिक शिल्प जैसे- ओड़िशा के कटक की चाँदी की तारकशी, कश्मीर का पश्मीना आदि को कानूनी संरक्षण या जी.आई. टैग दिया जाता है, ताकि कोई उसकी नकली कॉपी बनाकर स्थानीय कारीगरों को नुकसान न पहुँचा सके।
मिलकर चलें
आपकी कक्षा में कुछ विशेष आवश्यकता वाले साथी भी होंगे जिन्हें अपने दैनिक जीवन में अनेक तरह की समस्याओं से जूझना पड़ता होगा।
- ऐसे साथियों को अगर किसी यात्रा पर जाना हो तो उनके समक्ष किस प्रकार की चुनौतियाँ आ सकती हैं?
उत्तर – विशेष आवश्यकता वाले साथियों के समक्ष आने वाली चुनौतियाँ –
अवरोधक बुनियादी ढाँचा – पर्यटन स्थलों, होटलों और स्टेशनों पर व्हीलचेयर के लिए रैंप (Ramp) और लिफ्ट का न होना।
परिवहन की समस्या – ट्रेनों, बसों या नावों में दिव्यांग-अनुकूल सीटों और वाशरूम की कमी।
सूचना का अभाव – दृष्टिबाधित साथियों के लिए ब्रेल लिपि (Braille) या श्रव्य (Audio) गाइड और मूक-बधिर साथियों के लिए सांकेतिक भाषा (Sign Language) के बोर्ड न होना।
- उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर कुछ ऐसे सुझाव दीजिए जो उनकी यात्रा को सहज बनाने में उपयोगी हों।
उत्तर – यात्रा को सहज बनाने के लिए विशिष्ट सुझाव –
रैंप और स्पर्श-पथ (Tactile Paths) – सभी सार्वजनिक व पर्यटन स्थलों पर व्हीलचेयर रैंप और दृष्टिबाधितों के लिए स्पर्श-पथ बनाए जाएँ।
प्रौद्योगिकी का उपयोग – स्मारकों पर क्यूआर कोड (QR Codes) हों, जिन्हें स्कैन करते ही ऑडियो गाइड या सांकेतिक भाषा में वीडियो उपलब्ध हो जाए।
संवेदनशील स्टाफ – परिवहन और होटलों के कर्मचारियों को दिव्यांग साथियों की सहायता के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाए।
- अपने द्वारा दिए गए सुझावों पर विद्यालय के विशेष शिक्षा शिक्षक के साथ चर्चा कीजिए और समझिए कि आपके द्वारा सुझाए गए उपाय कितने प्रभावी हैं तथा उनमें और क्या बदलाव किए जा सकते हैं?
उत्तर – विशेष शिक्षा शिक्षक (Special Educator) के साथ चर्चा –
हमारे द्वारा सुझाए गए उपाय अत्यंत प्रभावी और व्यावहारिक हैं।
शिक्षक का सुझाव (बदलाव) – शिक्षक के अनुसार, केवल भौतिक बदलाव काफी नहीं हैं; यात्रा पर जाने वाले समूह के सामान्य साथियों को भी ‘पियर-सपोर्ट’ (Peer Support) यानी अपने दिव्यांग मित्रों की स्वेच्छा से मदद करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण मिलना चाहिए।
- प्राप्त सुझावों के विषय में कक्षा के विशेष आवश्यकता वाले साथियों से भी चर्चा कीजिए और उनकी राय जानने का प्रयास कीजिए।
उत्तर – विशेष आवश्यकता वाले साथियों की राय –
जब इन उपायों को दिव्यांग साथियों के साथ साझा किया गया, तो उन्होंने खुशी जताई।
उनकी प्रतिक्रिया – उन्होंने कहा कि रैंप और ऑडियो गाइड जैसी सुविधाओं से उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा और उन्हें किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। उन्होंने ‘हैंड्स-ऑन एक्सपीरियंस’ जैसे स्मारकों के थ्री-डी मॉडल जिन्हें छूकर समझा जा सके आदि को शामिल करने की इच्छा जताई।
सृजन
प्रकृति की ओर
क्या आपने कभी सूर्योदय और सूर्यास्त के समय का दृश्य देखा है? अगर नहीं तो एक दिन सुबह जल्दी उठकर उगते सूरज की लालिमा को देखिए और अस्त होते सूर्य के साथ शाम का भी आनंद लीजिए। अब इन दोनों दृश्यों की तुलना करते हुए अपने अनुभव का वर्णन कीजिए।
उत्तर – सुबह जल्दी उठकर उगते हुए सूरज को देखना और शाम को ढलते हुए सूरज को विदा करना, प्रकृति के दो सबसे खूबसूरत और जादुई अनुभव हैं। मोहन राकेश जी ने भी ‘आखिरी चट्टान तक’ में कन्याकुमारी के इन दोनों दृश्यों के सजीव रंगों का वर्णन किया है।
सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्यों की तुलनात्मक समीक्षा और मेरा व्यक्तिगत अनुभव नीचे दिए गए बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है –
- सूर्योदय का अनुभव (लालिमा और नई ऊर्जा)
सुबह का दृश्य अत्यंत शांत, पवित्र और स्फूर्ति से भरा होता है।
रंगों का जादू – भोर के समय आकाश में सबसे पहले हल्की नीली और गहरी केसरिया लालिमा छा जाती है। जैसे-जैसे सूर्य उदित होता है, वह एक चमकदार सुनहरे गोले के रूप में दिखाई देता है।
परिवेश और ध्वनि – हवा में रात की सुखद ठंडक होती है। चारों ओर पक्षियों की चहचहाहट, मंदिरों की घंटियाँ और एक जागती हुई दुनिया का संगीत होता है।
मानसिक भाव – सूर्योदय को देखकर मन में उत्साह, नई आशा और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। ऐसा लगता है मानो प्रकृति हमें हर दिन एक नई शुरुआत करने का संदेश दे रही है।
- सूर्यास्त का अनुभव (शांति और विरक्ति)
शाम का दृश्य भव्य, भावुक और धीरे-धीरे ठहरने की ओर बढ़ता हुआ प्रतीत होता है।
रंगों का जादू – सूर्यास्त के समय रंगों का परिवर्तन बहुत तीव्र होता है। जैसा कि पाठ में भी कहा गया है—सोने जैसा पीला रंग देखते ही देखते सिंदूरी, फिर लहू जैसा लाल, बैंजनी और अंत में गहरे काले अंधकार में बदल जाता है।
परिवेश और ध्वनि – हवा धीमी और गंभीर हो जाती है। पक्षी अपने घोंसलों की ओर लौट रहे होते हैं और संपूर्ण चराचर जगत धीरे-धीरे मौन और विश्राम की ओर बढ़ता है।
मानसिक भाव – डूबते सूरज को देखकर मन में एक गहन शांति, आत्म-मंथन और हल्की उदासी घिर आती है। यह दृश्य हमें याद दिलाता है कि हर बड़े विस्तार या शुरुआत का एक अंत निश्चित है।
दोनों दृश्यों की मुख्य तुलना
विशेषता | सूर्योदय (Morning) | सूर्यास्त (Evening) |
केंद्रीय रंग | स्थिर लालिमा, केसरिया और चमकदार सुनहरा। | पल-पल बदलता सिंदूरी, गहरा लाल, बैंजनी और काला। |
वातावरण का भाव | स्फूर्ति, गतिशीलता और कोलाहल का आरंभ। | नीरवता, ठहराव और विश्राम की ओर झुकाव। |
आंतरिक अनुभूति | आशा, उमंग और नए संकल्प की प्रेरणा। | संतोष, विरक्ति और जीवन की क्षणभंगुरता का बोध। |
मेरा निष्कर्ष – जहाँ सूर्योदय हमें ‘कर्म और प्रयास’ की ओर आगे बढ़ाता है, वहीं सूर्यास्त हमें ‘संतोष और समर्पण’ की गहराई सिखाता है। ये दोनों ही दृश्य अपने आप में बेजोड़ हैं और हमें प्रकृति के विराट चक्र से जोड़ते हैं।
अनुभव की साझेदारी
विधा से संवाद के अंतर्गत आपने दिए गए बिंदुओं के माध्यम से यात्रा-वृत्तांत के प्रमुख तत्त्वों के विषय में जाना और समझा। इन तत्त्वों को ध्यान में रखकर आप भी अपने घूमे हुए किसी प्रिय स्थान के अनुभवों पर एक यात्रा संस्मरण लिखिए।
उत्तर – हिंदी साहित्य की ‘यात्रा-वृत्तांत’ विधा के तत्त्वों जैसे – दृश्य-वर्णन, आत्मानुभूति, सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य, जीवन-दर्शन, शैली और रोमांच को आधार बनाकर यहाँ “ओडिशा के चिलिका झील की एक अविस्मरणीय यात्रा” पर एक संस्मरण प्रस्तुत है –
मेरी चिलिका यात्रा – नीले जल का संगीत
दृश्य-वर्णन
सुबह के ठीक छह बजे थे। मेरी आँखों के सामने एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झील ‘चिलिका’ (Chilika Lake) का अनंत विस्तार फैला हुआ था। सुबह की धुंध में झील का पानी हल्के रूपहले रंग का दिख रहा था। जैसे ही हमारी मोटर-नाव पानी को चीरती हुई आगे बढ़ी, सूरज की पहली सुनहरी किरण ने पानी पर तैरते कमलों को चमका दिया। दूर-दूर तक केवल नीला पानी और क्षितिज पर तैरते छोटे-छोटे हरे टापू (द्वीप) दिखाई दे रहे थे, जो किसी कैनवस पर बिखरे मोतियों जैसे लग रहे थे।
आत्मानुभूति व भावनाएँ
जब नाव बीच झील में पहुँची, तो मल्लाह ने कुछ देर के लिए मोटर बंद कर दी। उस नीरव सन्नाटे में केवल पानी की लहरों की ‘छप-छप’ ध्वनि और ठंडी हवा की सिहरन महसूस हो रही थी। प्रकृति के उस असीम विस्तार के बीच बैठकर मुझे अपने अस्तित्व के बहुत छोटे होने का बोध हुआ। रोज़मर्रा की शहरी भागदौड़ से दूर, उस पल मेरे मन में एक असीम शांति और विस्मय का भाव था, मानो मैं स्वयं उस शांत झील का एक हिस्सा बन गया हूँ।
सांस्कृतिक व सामाजिक परिप्रेक्ष्य
चिलिका केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है, बल्कि यह हज़ारों स्थानीय मछुआरों की आजीविका का आधार है। नाव चलाते हुए युवा नाविक ने बताया कि सर्दियों के दिनों में यहाँ रूस के साइबेरिया और कैस्पियन सागर से लाखों प्रवासी पक्षी (Migrating Birds) आते हैं। झील के बीचों-बीच स्थित ‘कालिजाई मंदिर’ के पास जब हमारी नाव रुकी, तो मैंने देखा कि कैसे स्थानीय मछुआरे समुद्र और प्रकृति को देवता मानकर श्रद्धापूर्वक शीश नवा रहे थे। उनका पूरा जीवन इसी जल और जलचरों के साथ बंधा हुआ है।
रोमांच व जीवन-दर्शन
यात्रा का सबसे रोमांचक क्षण तब आया जब पानी के बीच अचानक एक काली परछाईं उभरी और हवा में गोता लगाकर गायब हो गई—वह चिलिका की प्रसिद्ध इरावदी डॉलफिन (Irrawaddy Dolphin) थी! डॉलफिन की एक झलक पाने का वह कौतूहल और रोमांच शब्दों से परे था।
शाम को लौटते समय जब सूरज पहाड़ों के पीछे छिप रहा था, तो पानी का रंग सोने से बदलकर गहरा सिंदूरी हो गया। उस डूबते सूर्य को देखकर मन में यह दार्शनिक विचार आया कि जीवन भी इस झील की तरह असीम है, जिसमें सुख-दुख की लहरें आती-जाती रहती हैं, पर जो ठहरना सीख जाता है, वही शांत रह पाता है।
संस्मरण का निष्कर्ष
चिलिका झील की इस यात्रा ने मुझे सिखाया कि प्रकृति से बड़ा कोई शिक्षक नहीं है। डायरी के इन पन्नों में कैद वे नीली लहरें, डॉलफिन की छलांग और नाविकों की वह सहज मुस्कान मेरे अंतर्मन में हमेशा एक ताज़ा अनुभूति की तरह जीवंत रहेगी।
चर्चा-परिचर्चा
‘यात्राएँ हमें समृद्ध करती हैं’ विषय पर कक्षा में एक परिचर्चा आयोजित कीजिए।” एक लहर मेरे पैरों को भिगो गई तो सहसा मुझे खतरे का एहसास हुआ।”
यात्रा के दौरान कई बार ऐसी अप्रत्याशित चुनौतियाँ सामने आ जाती हैं। ऐसी किसी स्थिति का सामना करने के लिए व्यक्ति में किन गुणों का होना आवश्यक है? अपने सहपाठियों के साथ मिलकर इस विषय पर चर्चा कीजिए।
यदि आपके पास भी कोई ऐसा अनुभव हो तो उसे अपने सहपाठियों के साथ साझा कीजिए।
यह प्रश्न मोहन राकेश के पाठ ‘आखिरी चट्टान तक’ के सबसे व्यावहारिक और विचारणीय खंड “चर्चा-परिचर्चा” से संबंधित है। यात्राएँ जहाँ हमारा मानसिक विकास करती हैं, वहीं कई बार वे हमारी परीक्षा भी लेती हैं।
इस विषय पर कक्षा में परिचर्चा आयोजित करने के लिए मुख्य बिंदु, आवश्यक गुण और एक वास्तविक जीवन का अनुभव नीचे दिया गया है –
भाग 1 – चर्चा का मुख्य विषय – ‘यात्राएँ हमें समृद्ध करती हैं’
कक्षा परिचर्चा के लिए मुख्य विचार बिंदु –
भौगोलिक और व्यावहारिक ज्ञान – किताबों में पढ़ा गया भूगोल जैसे – समुद्र, पहाड़, मरुस्थल आदि जब हम अपनी आँखों से देखते हैं, तो वह ज्ञान हमेशा के लिए स्थाई हो जाता है।
सांस्कृतिक सहिष्णुता – नई जगहों पर जाकर वहाँ के लोगों के खान-पान, वेशभूषा, भाषा और कठिनाइयों (जैसे कन्याकुमारी के बेरोजगार युवाओं की स्थिति) को देखकर हमारे भीतर सहानुभूति और संवेदनशीलता बढ़ती है।
आत्मनिर्भरता – यात्रा के दौरान बजट संभालना, रास्ता खोजना और अनजान लोगों के बीच तालमेल बिठाना हमें व्यावहारिक रूप से आत्मनिर्भर बनाता है।
भाग 2 – अप्रत्याशित चुनौतियों के समय आवश्यक मानवीय गुण
पाठ में जब अचानक समुद्र का पानी बढ़ने लगा और लेखक खड़ी रेत की दीवार और नुकीली चट्टानों के बीच फँस गया, तब उसने दौड़कर और अपनी बुद्धिमत्ता से जान बचाई। यात्रा के दौरान ऐसी किसी भी अचानक आई मुसीबत, जैसे- भूस्खलन, बाढ़, रास्ता भटकना या अचानक मौसम बदलना आदि से निपटने के लिए व्यक्ति में निम्नलिखित गुणों का होना अनिवार्य है –
धैर्य और मानसिक संतुलन – संकट के समय सबसे पहला नियम है—घबराएं नहीं। डरने से इंसान सोचने-समझने की शक्ति खो देता है। शांत रहकर ही सही निर्णय लिया जा सकता है।
त्वरित निर्णय क्षमता – जैसा कि लेखक ने किया—”निर्णय तुरंत करना था, इसलिए बिना और सोचे मैं रेत पर फिसल गया।”परिस्थितियों को भांपकर तुरंत सही कदम उठाना जीवन रक्षक साबित होता है।
साहस और शारीरिक सहनशीलता – विपरीत परिस्थितियों में शारीरिक रूप से हार न मानना और चोट लगने (जैसे लेखक को चट्टान से खरोंच आई थी) के बावजूद आगे बढ़ते रहना।
संसाधनों का सही उपयोग व अनुकूलनशीलता – जो कुछ भी पास में उपलब्ध हो, जैसे टॉर्च, नक्शा, सीमित पानी या स्थानीय लोगों की मदद आदि की सहायता से सुरक्षित रास्ता खोजना।
भाग 3 – अनुभव की साझेदारी (एक वास्तविक चुनौतीपूर्ण संस्मरण)
आप अपने सहपाठियों के साथ साझा करने के लिए इस प्रेरक अनुभव का उपयोग कर सकते हैं –
“जब हमारी नाव का इंजन बंद हो गया…”
पिछले वर्ष सर्दियों की छुट्टियों में मैं अपने परिवार के साथ ओडिशा की चिलिका झील में बर्ड सेंचुरी (मंगलाजोड़ी) देखने गया था। हम तट से लगभग ४-५ किलोमीटर दूर बीच झील में थे और चारों तरफ केवल पानी ही पानी था। अचानक हमारी मोटर-नाव के इंजन से तेज धुआँ निकलने लगा और नाविक ने इंजन बंद कर दिया। शाम के ५ बज रहे थे और धीरे-धीरे अँधेरा घिर रहा था।
उस निर्जन पानी के बीच अचानक नाव का रुक जाना हम सबके लिए बेहद डरावना था। मेरी छोटी बहन डर के मारे रोने लगी। लेकिन उस समय मेरे पिताजी ने अद्भुत धैर्य दिखाया। उन्होंने नाव में मौजूद सभी लोगों को शांत रहने के लिए कहा ताकि नाव का संतुलन न बिगड़े। नाविक ने अपनी त्वरित निर्णय क्षमता का उपयोग करते हुए तुरंत चप्पू (ओर्स) निकाले और हवा की दिशा का लाभ उठाते हुए नाव को एक छोटे से टापू की तरफ ले गया। पिताजी ने अपने मोबाइल का नेटवर्क काम न करने पर सैटेलाइट जीपीएस आधारित मैसेज से किनारे पर स्थित बेस कैंप को सूचना भेजी।
लगभग एक घंटे के रोमांच और तनाव के बाद, दूसरी बचाव नाव हमें लेने पहुँची। उस दिन मैंने सीखा कि संकट के समय यदि हम घबराने के बजाय धैर्य और सूझबूझ से काम लें, तो हर अप्रत्याशित चुनौती को पार किया जा सकता है।
सहपाठियों के लिए परिचर्चा प्रश्न –
चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए आप अपने सहपाठियों से ये प्रश्न पूछ सकते हैं –
- क्या आपके साथ कभी यात्रा में ऐसा हुआ है कि आपकी बस/ट्रेन छूट गई हो या आप रास्ता भटक गए हों? तब आपने क्या किया?
- यदि हम किसी ऐसी जगह फँस जाएँ जहाँ मोबाइल नेटवर्क न हो, तो हमें सुरक्षा के लिए क्या-क्या पूर्व-तैयारियाँ रखनी चाहिए?
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
क्रिया – विशेषण की पहचान और रेखांकन
“समुद्र में पानी बढ़ रहा था। तट की चौड़ाई धीरे-धीरे कम होती जा रही थी।”
उपर्युक्त वाक्य में रेखांकित पद ‘धीरे-धीरे’ कम होना क्रिया की विशेषता बता रहा है। यहाँ कम होने की क्रिया धीमी गति से हो रही है।
जिस प्रकार संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्द ‘विशेषण’ कहलाते हैं, उसी प्रकार क्रिया की विशेषता बताने वाले शब्द ‘क्रिया – विशेषण’ कहलाते हैं। इस वाक्य में ‘धीरे-धीरे’ पद व्याकरणिक दृष्टि से क्रिया – विशेषण है।
नीचे दिए गए वाक्यों को ध्यानपूर्वक पढ़कर उनमें क्रिया-विशेषण पदों की पहचान कीजिए तथा दिए गए उदाहरण के अनुसार लिखिए।
भाग 1 – क्रिया-विशेषण की पहचान और रेखांकन
दिए गए उदाहरण के अनुसार तीनों वाक्यों का क्रिया-विशेषण विश्लेषण नीचे तालिका में दिया गया है –
क्र. सं. | वाक्य | क्रिया-विशेषण पद | क्रिया, जिसकी विशेषता बताई जा रही है |
(क) | बल खाती लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं। | कटती हुई | ‘आती थीं’ क्रिया की विशेषता (क्रिया के होने का ढंग/रीति) |
(ख) | यात्रियों की कितनी ही टोलियाँ उस दिशा में जा रही थीं। | उस दिशा में | ‘जा रही थीं’ क्रिया की विशेषता (स्थानवाचक क्रिया-विशेषण) |
(ग) | मैं देर तक भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देखता रहा। | देर तक | ‘देखता रहा’ क्रिया की विशेषता (कालवाचक क्रिया-विशेषण) |
आओ नए वाक्य बनाएँ
पाठ से चुनकर कुछ वाक्य नीचे तालिका में दिए गए हैं। इन वाक्यों में रेखांकित शब्दों का अर्थ बताते हुए उनसे नए वाक्य बनाइए।
वाक्य
तीनों तरफ से क्षितिज तक पानी – पानी था।
पीछे दाईं तरफ दूर-दूर हटकर नारियलों के झुरमुट नजर आ रहे थे।
दूर तक एक रेत की लंबी ढलान थी।
पच्छिमी तट के साथ-साथ सूखी पहाड़ियों की एक शृंखला दूर तक चली गई थी।
सामने फैली रेत के कारण बहुत रूखी, बीहड़ और वीरान लग रही थी।
यह मोहन राकेश के पाठ ‘आखिरी चट्टान तक’ के व्याकरण खंड “भाषा से संवाद – क्रिया-विशेषण की पहचान” और “आओ नए वाक्य बनाएँ” का संपूर्ण और सटीक हल है –
भाग 2 – शब्दार्थ और नए वाक्य निर्माण
पाठ से चुने गए महत्त्वपूर्ण शब्दों (पदों) के अर्थ और उनसे बने नए व्यावहारिक वाक्य नीचे दिए गए हैं –
- क्षितिज
अर्थ – वह काल्पनिक स्थान जहाँ धरती और आकाश आपस में मिलते हुए दिखाई देते हैं (Horizon)।
नया वाक्य – शाम के समय समुद्र किनारे खड़े होकर क्षितिज को देखना एक अत्यंत जादुई अनुभव होता है।
- झुरमुट
अर्थ – पेड़ों, पौधों या झाड़ियों का सघन झुंड या समूह (Cluster / Grove)।
नया वाक्य – हमारे गाँव के घर के पीछे बाँसों का एक घनेरा झुरमुट है, जहाँ दिन भर पक्षी चहचहाते हैं।
- ढलान
अर्थ – नीचे की ओर झुकी हुई भूमि या रास्ता, उतार (Slope / Descent)।
नया वाक्य – पहाड़ों पर गाड़ी चलाते समय तीव्र ढलान पर गति हमेशा धीमी रखनी चाहिए।
- शृंखला
अर्थ – कतार, क्रम, कड़ियों या पहाड़ों की लगातार जुड़ी हुई श्रेणी (Chain / Range)।
नया वाक्य – भारत के उत्तर में हिमालय पर्वत की एक विशाल शृंखला स्थित है, जो देश की रक्षा करती है।
- बीहड़ और वीरान
अर्थ – बीहड़ – ऊबड़-खाबड़, रूखा और डरावना रास्ता या जंगल (Rugged / Ravine)।
वीरान – सुनसान, निर्जन, जहाँ कोई आबादी न हो (Desolate)।
नया वाक्य – रास्ता भटक जाने के कारण हम रात के अँधेरे में एक बीहड़ और वीरान जंगल के बीच जा पहुँचे।
गतिविधियाँ
- कल्पना कीजिए कि आप अपने परिवार के साथ कहीं घूमने गए हैं। वहाँ आपकी भेंट एक ऐसे यात्री से होती है जिसे आपकी सहायता की आवश्यकता है लेकिन आप दोनों एक-दूसरे की भाषा से अपरिचित हैं। ऐसे में उस अनजान यात्री की सहायता आप कैसे करेंगे?
- पधारो म्हारे देश
अपने क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थलों की एक सूची बनाइए और उनकी विशेषताओं को ध्यान में रखकर एक विवरणिका (ब्रॉशर) तैयार कीजिए।
भाषा संगम
“ऊँची-ऊँची लहरों से बचाते हुए मल्लाह नाव को ला रहे थे”
‘नाव’ शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कुछ भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची आगे दी गई है।
नाव (हिंदी); नौ, नौका (संस्कृत); बेड़ी (पंजाबी); किश्ती, नाव (उर्दू); नाव (कश्मीरी); बेड़ी, किश्ती (सिंधी); होड़ी, नाव (मराठी); नाव, होडी (गुजराती); बहड़ी (कोंकणी); नाउ, नौका, डुड्रा (नेपाली); नाओ, नौका (बांग्ला); नाओ (असमिया); हि (मणिपुरी); नौका, नाआ (ओड़िआ); पडव, नाव (तेलुगू); ओडम् (तमिल); तोणि (मलयालम); दोणि (कन्नड़)।
इनके अतिरिक्त यदि आप ‘नाव’ शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं तो उस भाषा में भी लिखिए।
उपर्युक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए।
https -//shabd.education.gov.in/lexicon.jsp
झरोखे से
आपने ‘आखिरी चट्टान तक’ रचना पढ़ी जो दक्षिण भारत की यात्रा पर आधारित है। आइए, अब पढ़ते हैं हिंदी के प्रसिद्ध रचनाकार निर्मल वर्मा का कुंभ मेले पर आधारित यात्रा-वृत्तांत का एक अंश-
प्रयाग – 1976
मुँह अँधेरे सीटी सुनाई देती है— घनी नींद में सुराख बनाती हुई। एक क्षण पता नहीं चलता, मैं कहाँ हूँ, किस जगह हूँ, कौन-सा समय है? आँखें खुलती हैं, तो ढेस-सा अँधेरा गटगट पीने लगती हैं, जैसे मुँह की प्यास आँखें बुझा रही हैं। याद आता है मेरे नीचे मेरा स्लीपिंग बैग है, मेरी यात्राओं और यातनाओं को ढोता हुआ। मैं जाग गया हूँ— लेकिन मेरी समूची देह गरमाई के घेरे में सो रही है।
कुछ देर बाद आँखें अँधेरे में टोहती हुई एक एक चीज पर ठहर जाती हैं— किताब, तिपाई, लालटेन, फूस का अधखुला दरवाजा, हवा में सरसराती छत। बाहर एक फुसफुसाता हुआ शोर है— रेंगती हुई आवाज़ों का रेला — जैसे हजारों पैर रेत को थपथपाते हुए चल रहे हैं। मैं हड़बड़ाकर अपना स्लीपिंग बैग समेटता हूँ। हाथों में रेत, मिट्टी, फूस के पत्तों को ठेलता हुआ दरवाजा खोलता हूँ, तो ठिठका-सा रह जाता।
चाँद दिखाई देता है। पूर्णिमा का पूरा चाँद, इलाहाबाद के किले पर ऊँघता हुआ। पिछली रात उसे गंगा के भीतर देखा था—एक सफेद परछाई, एक झिलमिला-सा स्वप्न- अब समूची रात की यात्रा में थका हुआ वह किले के माथे पर चिपका था, एक गोल, सफेद, मुरझाई बिंदी जिसे सिर्फ एक अँगुली से पोंछा जा सकता था।
“आप जाग गए?”
सच्चे महाराज का चौकीदार मुझे देखकर कुछ हैरान-सा हो जाता है। दरअसल जब से मैं आया हूँ, वह मुझ पर हैरान है। वह उन्नीस-बीस वर्ष का युवक, जो शायद बचपन में ही आश्रम में बस गया था। मैं जहाँ कहीं भी होता हूँ, वह अपनी फैली फटी-फटी आँखों से मुझे निहारता है— मैं क्या हूँ, यह वह नहीं समझ पाता, न मैं तीर्थयात्री लगता हूँ, न कल्पवासी- मैं उसे आधा हिप्पी, आधा जिप्सी- सा दिखाई देता हूँगा जो अपने पाप-पुण्यों को एक डफल बैग में समेटकर कुंभ मेले में भटकता है।
“आप भी संगम जाएँगे?”
उसने संदेह से मेरी ओर देखा।
“हाँ, इसीलिए आया हूँ” मैंने कहा।”यह सीटी कौन बजा रहा है?”
“पुलिस” उसने कहा।”यात्रियों को रास्ता दिखाना पड़ता है— बेचारे अँधेरे में भटक जाते हैं।”
दबी ठिठुरती आवाज़ें, भजन की कुछ पंक्तियाँ ठंडी रेत और भूरी चाँदनी पर उठती हैं, किसी बूढ़े स्नानार्थी का काँपता स्वर हवा में बहुत दूर तक रिरियाता रहता है। मैं पंप को ढूँढ़ता हुआ आश्रम का चक्कर लगाता हूँ। लगता है सब सो रहे हैं। हवा में खाली झोपड़ों के दरवाजे सरसराते हैं, खुलते हैं, बंद हो जाते हैं। सब कुटियों से अलग सच्चे महाराज की यज्ञशाला दिखाई देती है— पीले फूल के मंडप, एक छत पर दूसरी छत – जैसे कोई जापानी पैगोड़ा चाँदनी में चमक रहा हो।
कुंभ मेले के वृत्तांत का यह अंश आपको रोचक लगा? अब इस यात्रा-वृत्तांत को इंटरनेट, पुस्तकालय से ढूँढ़कर पूरा पढ़िए।
खोजबीन
इस यात्रा-वृत्तांत में उल्लिखित ‘आखिरी चट्टान’ को ‘विवेकानंद चट्टान’ के नाम से भी जाना जाता है। युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत के रूप में विवेकानंद के जन्मदिवस 12 जनवरी को भारत में ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ तथा ‘राष्ट्रीय युवा सप्ताह’ के रूप में मनाया जाता है। राष्ट्रीय युवा सप्ताह के एक हिस्से के रूप में भारत सरकार द्वारा प्रत्येक वर्ष ‘राष्ट्रीय युवा महोत्सव’ का आयोजन किया जाता है। विवेकानंद के जीवन, लेखन और सामाजिक कार्यों के विषय में पुस्तकालय और इंटरनेट से खोजकर पढ़िए और कक्षा में चर्चा कीजिए। कुछ लिंक नीचे दिए गए हैं।
स्वामी विवेकानंद युवाओं के लिए सच्चे आदर्श और मार्गदर्शक
https -//haryanarajbhavan.gov.in/hi/publication/
स्वामी विवेकानंद — आध्यात्मिक वैज्ञानिक – प्रेस सूचना ब्यूरो, भारत सरकार
https -//www.pib.gov.in
कठिन शब्द अर्थ
- स्याह – काला / गहरा कृष्ण वर्ण, Jet black / Dark
- पृष्ठभूमि – पीछे का दृश्य / आधार, Background
- संगम – मिलन स्थल / मिलन, Confluence / Junction
- समाधिस्थ – ध्यानमग्न / समाधि में लीन, In a state of deep meditation / Trance-like
- बलखाती – लहराती हुई / टेढ़ी-मेढ़ी चलती हुई, Twisting / Undulating
- नुकीली – पैनी / तीक्ष्ण धार वाली, Sharp / Pointed
- चेतना – होश / आंतरिक बोध या समझ, Consciousness / Awareness
- क्षितिज – जहाँ धरती और आकाश मिलते दिखाई देते हैं, Horizon
- अपेक्षित / अपेक्षया – तुलनात्मक रूप से / तुलना में, Comparatively / Relatively
- भूला रहा – सुध-बुध खो देना / भूल जाना, Lost in thought / Forgot oneself
- दर्शक – देखने वाला / अवलोकनकर्ता, Spectator / Viewer
- सिहर गया – काँप उठना / भय या ठंड से काँपना, Shivered / Thrilled with fear
- उमड़ते – तेजी से आगे बढ़ते हुए / बढ़ना, Surging / Overflowing
- विस्तार – फैलाव / फैले होने की अवस्था, Expanse / Extension
- पच्छिमी – पश्चिमी, Western
- तट रेखा – समुद्र का किनारा, Coastline
- टीला – रेत या मिट्टी का ऊँचा ढेर / पहाड़ी, Mound / Sand dune
- टोली / टोलियाँ – समूह / झुंड, Groups / Batches
- सैंड हिल – रेत का टीला, Sand dune
- बैरे – होटल या गेस्ट हाउस के सेवक / वेटर, Waiters / Stewards
- कैनवस – चित्रकारी का पर्दा या पृष्ठभूमि, Canvas
- छिटके हुए – बिखरे हुए, Scattered
- स्थिर – शांत / जो हिले-डुले नहीं, Motionless / Stable
- ओट – आड़ / परदा या छिपाव, Screen / Shelter / Hiding
- घसीटता – पैर रगड़ कर चलना / खींचना, Dragging
- सार्थकता – उपयोगिता / अर्थपूर्ण होना, Meaningfulness / Success
- संतुष्ट – तृप्त / जिसे संतोष हो, Satisfied / Contented
- चोटी – शिखर / सबसे ऊँचा भाग, Peak / Summit
- सर किया – जीत लिया / पार किया, Conquered / Scaled
- झुरमुट – पेड़ों या झाड़ियों का झुंड, Cluster / Grove
- गूँजती – प्रतिध्वनित होती हुई, Resounding / Echoing
- टहनियाँ – शाखाएँ / डालियाँ, Twigs / Branches
- शृंखला – कतार / पंक्ति, Chain / Range
- रूखी – नीरस / सूखी, Dry / Arid / Harsh
- बीहड़ – ऊबड़-खाबड़ / डरावना, Rugged / Wilderness
- वीरान – सुनसान / निर्जन, Desolate / Abandoned
- सतह – ऊपरी भाग / तल, Surface
- सुनहली – सोने के रंग जैसी / चमकीली, Golden
- निर्माण – बनावट / रचना, Creation / Construction
- उड़ेला गया – पलटा गया / डाला गया, Poured out
- निशान / निशानों – चिह्न / छाप, Marks / Footprints
- उदासी – खिन्नता / दुख का भाव, Melancholy / Sadness
- ढुल आया – फैल गया / बिखर गया, Spilled over / Spread
- असंभव – जो मुमकिन न हो, Impossible
- बेबसी – लाचारी / विवशता, Helplessness
- लावा – पिघला हुआ गर्म पदार्थ, Lava
- लहू – खून / रक्त, Blood
- बैज़नी – बैंगनी रंग का, Violet / Purple
- दृश्यपट – देखने का पर्दा / पूरा दृश्य, Scenery / Landscape
- स्याही – कालापन / अंधकार, Darkness / Ink-like blackness
- सिर धुनना – पछताना / दुखी होना, Mourning / Beating the head
- हाथ-पैर पटकना – छटपटाना, Flailing arms and legs / Struggling
- मुट्ठियाँ भींचना – हाथ बंद करना (क्रोध या दृढ़ता में), Clenching fists
- कँपकँपी – थरथराहट / सिहरन, Shivering / Trembling
- धुँधले – जो साफ़ न दिखे / अस्पष्ट, Blurry / Dim
- आकृतियाँ – बनावट / रूप या आकार, Figures / Shapes
- भटकता – रास्ता भूल जाना, Wandering / Lost
- निर्णय – फैसला, Decision
- फिसल गया – सरकना / रपट जाना, Slipped / Slid down
- सुरमई – काजल के रंग जैसा / गहरा सलेटी, Dark grey / Slate-colored
- खाकी – धूल जैसे रंग का / मटमैला, Khaki / Dusty brown
- अनाम – जिसका कोई नाम न हो, Nameless / Anonymous
- सम्मिश्रण – अच्छी तरह मिलना / मिश्रण, Blend / Mixture
- अतिरिक्त – अलावा / छोड़कर, Besides / Apart from
- मसलकर – रगड़कर / दबाकर, Crushing / Rubbing
- बटोरूँगा – इकट्ठा करूँगा, Will collect / Will gather
- सहसा – अचानक / एकाएक, Suddenly / Abruptly
- एहसास – महसूस होना / अनुभव, Realization / Feeling
- दीवार – भित्ति / रुकावट, Wall
- बेकार – व्यर्थ / जिसका उपयोग न हो, Useless / Futile
- लपेट – घेरा / पकड़, Clutch / Swirl
- बाँह / बाँहों – भुजाएँ, Arms
- खरोंच – रगड़ का निशान, Scratch
- चोट – आघात / ज़ख्म, Injury / Hurt
- साहस – हिम्मत / वीरता, Courage / Bravery
- अपेक्षा – तुलना में, In comparison to
- सुरक्षित – जो खतरे से दूर हो, Safe / Secure
- मजाक – उपहास / परिहास, Joke / Prank
- फैलाव – विस्तार, Expanse / Stretch
- मद्धिम – धीमी / हल्की, Dim / Faint
- रोशनी – प्रकाश, Light
- भौगोलिक सीमा – भूगोल के अनुसार तय की गई सरहद, Geographical boundary
- मल्लाह – नाविक / कश्ती चलाने वाला, Boatmen / Sailors
- मछुआ नाव – मछली पकड़ने की छोटी डोंगी, Fishing boat
- तना / तनों – पेड़ का मुख्य धड़, Tree trunks
- चेष्टा – कोशिश / प्रयास, Attempt / Effort
- स्थगित – रोक देना / कुछ समय के लिए टालना, Suspended / Postponed
- दिखावटी – कृत्रिम / केवल प्रदर्शन के लिए, Showy / Artificial
- उदासीऩता – विरक्ति / कोई रुचि न होना, Indifference / Apathy
- ढक रखना – छिपाना, To cover / To conceal
- ग्रेजुएट – स्नातक (जिसने कॉलेज की पढ़ाई पूरी की हो), Graduate
- शिक्षित – पढ़ा-लिखा, Educated
- बेकार (बेरोज़गार) – जिसके पास काम न हो, Unemployed
- धंधा – व्यवसाय / रोज़गार, Profession / Occupation
- अर्जी / अर्जियाँ – आवेदन पत्र, Applications
- बहस – तर्क-वितर्क / वाद-विवाद, Argument / Discussion
- सीपियों – समुद्र की कौड़ियाँ या सीप, Shells
- गूदा – आंतरिक कोमल भाग, Pulp / Inner flesh
- दार्शनिक – दर्शनशास्त्र से संबंधित / गंभीर, Philosophical
- सिद्धांत / सिद्धांतों – नियम / स्थापित विचार, Principles / Theories
- प्रेरणा – आगे बढ़ने का उत्साह / सीख, Inspiration
- परमानंद / आनंद – परम सुख, Bliss / Deep Joy
- झिलमिलाकर – चमककर / टिमटिमाकर, Glimmering / Sparkling
- अर्घ्य – सूर्य को जल चढ़ाने की क्रिया, Libation / Ritual offering of water
- एकत्रित – जमा / इकट्ठे, Gathered / Assembled
- मेहमान / मेहमानों – अतिथि, Guests
- बाइनाक्यूलर्ज – दूरबीन, Binoculars
- आँकड़े – सांख्यिकी संख्या / डेटा, Statistics / Data
- कडल-काक – समुद्री पक्षी विशेष, Sea gulls / Cormorants
- बे-लाग – तटस्थ / निष्पक्ष / अलग, Indifferent / Detached

