जगदीशचंद्र माथुर
जगदीशचंद्र माथुर का जन्म सन् 1917 में शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ और शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। वे इंडियन सिविल सर्विस में भी चयनित हुए। बिहार राज्य के शिक्षा सचिव, आकाशवाणी के महानिदेशक, सूचना और प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिव आदि प्रशासनिक पदों पर कार्य करते हुए वे आजीवन साहित्य-सृजन में सक्रिय रहे।
प्रयाग में अध्ययन के दौरान ही जगदीशचंद्र माथुर ने लेखन आरंभ कर दिया था। उस समय की चर्चित पत्रिकाओं चाँद और रूपाभ आदि में उनके लिखे नाटक-एकांकी छपने लगे थे। हिंदी नाटक और रंगमंच के विकास में उनके एकांकी व नाटकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐतिहासिक नाटकों के साथ- साथ उन्होंने सामाजिक समस्याओं से जुड़े एकांकी नाटक भी लिखे हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं— भोर का तारा, कोणार्क, ओ मेरे सपने, शारदीया, पहला राजा, दस तस्वीरें, जिन्होंने जीना जाना। इनकी संपूर्ण रचनाएँ जगदीशचंद्र माथुर रचनावली (चार खंड) में संकलित हैं। कोणार्क उनका सर्वाधिक चर्चित और मंचित नाटक है। सन् 1978 में उनका निधन हो गया।
रीढ़ की हड्डी – पाठ परिचय
‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी भारतीय समाज में परंपरागत विवाह की व्यवस्था और स्त्रियों की शिक्षा को लेकर रूढ़िगत सोच पर चोट करती है। इस एकांकी की रचना 1939 में की गई। उस समय भारतीय समाज में शिक्षा और अन्य कार्यक्षेत्रों में स्त्रियों को समान अवसर नहीं मिलते थे। इस एकांकी के माध्यम से विवाह के लिए कम पढ़ी-लिखी लड़कियों की माँग, विवाह में लेन-देन जैसी सामाजिक कुरीतियों को उजागर किया गया है। एकांकी की मुख्य पात्र उमा पढ़ी-लिखी सशक्त महिला का प्रतिनिधित्व करती है।
रीढ़ की हड्डी
पात्र परिचय
उमा – लड़की
रामस्वरूप – लड़की का पिता
प्रेमा – लड़की की माता
शंकर – लड़का
गोपालप्रसाद – लड़के का बाप
रतन – रामस्वरूप का नौकर
(मामूली तरह से सजा हुआ एक कमरा अंदर के दरवाजे में आते हुए जिन महाशय की पीठ नजर आती है वह अधेड़ उम्र के मालूम होते हैं। एक तख्त को पकड़े हुए पीछे की ओर चलते-चलते कमरे में आते हैं। तख्त का दूसरा सिरा उनके नौकर ने पकड़ रखा है।)
रामस्वरूप – अबे, धीरे-धीरे चल। अबे, तख्त को उधर मोड़ दे.. उधर। बस। (तख्त के रखे जाने की आवाज आती है।)
रतन – बिछा दूँ साहब?
रामस्वरूप – (जरा तेज आवाज़) और क्या करेगा? परमात्मा के यहाँ जब अक्ल बँट रही थी, तो तू देर से पहुँचा था क्या? बिछा दूँ साब… और ये पसीना किसलिए बहाया है?
रतन – (तख्ता बिछाता है।) ही ही ही।
रामस्वरूप – हँसता क्यों है? अबे, हमने भी जवानी में कसरत की है। कलसों से नहाता था लोटों की तरह। तख्त क्या चीज़ है? उसे सीधा कर यो बस और सुन, बहू जी से दरी माँग ला, इसके ऊपर बिछाने के लिए।… चद्दर भी, कल जो धोबी के यहाँ से आई है, वही
(रतन जाता है। बाबू साहब इस बीच में मेजपोश ठीक करते हैं। एक झाड़न से गुलदस्ता साफ करते कुर्सियों पर भी दो-चार हाथ लगाते हैं। सहसा घर की मालकिन प्रेमा का आना। गंदुमी रंग, छोटा कद, चेहरे की आवाज़ से ज़ाहिर होता है कि किसी काम में बहुत व्यस्त है। उनके पीछे-पीछे भीगी बिल्ली की तरह नौकर आ रहा है। खाली हाथ बाबू (रामस्वरूप) दोनों की तरफ देखने लगते हैं।)
प्रेमा – मैं कहती हूँ, तुम्हें इस वक्त धोती की क्या जरुरत पड़ गई? एक तो वैसे ही जल्दी-जल्दी में…..
रामस्वरूप – धोती?
प्रेमा – हाँ, अभी तो बदलकर आए हो और फिर न जाने किसलिए …..
रामस्वरूप – लेकिन धोती माँगी किसने?
प्रेमा – यही तो कह रहा था रतन?
रामस्वरूप – क्यों बे रतन, तेरे कानों में डाट लगी है? मैंने कहा था- धोबी के यहाँ से जो चादर आई है, उसे माँग ला। … अब तेरे लिए दिमाग कहाँ से लाऊँ। उल्लू कहीं का!
प्रेमा – अच्छा जा, पूजावाली कोठरी में लकड़ी के बाक्स के ऊपर धुले हुए कपड़े रखे हैं न, उन्हीं में से चद्दर उठा ला।
रतन – और दरी?
प्रेमा – दरी तो यहीं रखी है कोने में वह पड़ी तो है।
रामस्वरूप – (दरी उठाते हुए।) और बीबी के कमरे में से हारमोनियम उठा ला और सितार भी। जल्दी.. जा (रतन जाता है। पति-पत्नी तख्त पर दरी बिछाते हैं।)
प्रेमा – लेकिन वह तुम्हारी लाड़ली बेटी तो मुँह फुलाए पड़ी है।
रामस्वरूप – मुँह फुलाए? और तुम उसकी माँ किस मर्ज की दवा हो? जैसे-तैसे करके तो वे लोग पकड़ में आए हैं। अब तुम्हारी बेवकूफी से सारी मेहनत बेकार जाए, तो मुझे दोष मत देना।
प्रेमा – तो मैं ही क्या करूँ? सारे जतन करके हार गई। तुम्हीं ने उसे पढ़ा-लिखाकर इतना सर चढ़ा कर रखा है। मेरी समझ में तो ये पढ़ाई-लिखाई का जंजाल आता नहीं अपना जमाना अच्छा था। ‘आ’ ‘ई’ पढ़ ली, गिनती सीख ली और बहुत हुआ तो स्त्री-सुबोधिनी पढ़ ली। सच पूछो तो स्त्री-सुबोधिनी में ऐसी-ऐसी बातें लिखी हैं.. ऐसी बातें कि क्या तुम्हारी बी.ए. एम.ए की पढ़ाई में होगी और आजकल के लच्छन ही अनोखे हैं…
रामस्वरूप – ग्रामोफोन बाजा होता है न?
प्रेमा – क्यों
रामस्वरूप – दो तरह का होता है। एक तो आदमी का बनाया हुआ। उसे एक बार चलाकर चाहे रोक लो और दूसरा परमात्मा का बनाया हुआ। उसका रिकार्ड एक बार चढ़ा तो रुकने का नाम नहीं।
प्रेमा – हटो भी! तुम्हें ठिठोली सूझती रहती है। यह तो होता नहीं कि उस अपनी उमा को राह पर लाते। अब देर ही कितनी रही है उन लोगों के आने में?
रामस्वरूप – तो हुआ क्या?
प्रेमा – तुम्हीं ने तो कहा था कि जरा ठीक-ठीक करके नीचे लाना। आजकल तो लड़की कितनी ही सुंदर हो, बिना टीम-टाम के भला कौन पूछता है? इसी मारे मैंने तो पौडर – वौडर उसके सामने रखा था। पर उसे तो इन चीजों से न जाने किस जन्म की नफरत है। मेरा कहना था कि आँचल से मुँह लपेट लेट गई; भई मैं तो बाज आई तुम्हारी इस लड़की से।
रामस्वरूप – न जाने कैसे इसका दिमाग है। वरना आजकल की लड़कियों के सहारे तो पौडर का कारोबार चलता है।
प्रेमा – अरे, मैंने तो पहले ही कहा था इंट्रेंस ही पास करा लेते- लड़की अपने हाथ रहती और उतनी परेशानी उठानी न पड़ती। पर तुम तो …..
रामस्वरूप – (बात काटकर) चुप चुप (दरवाजे में झाँकते हुए) तुम्हें कतई अपनी जुबान पर काबू नहीं है। कल ही बता दिया था कि उन लोगों के सामने जिक्र और ही ढंग से होगा। मगर तुम तो अभी से सब कुछ उगले देती हो उनके आने तक तो न जाने क्या हाल करोगी।
प्रेमा – अच्छा बाबा, मैं न बोलूँगी, जैसी तुम्हारी मर्जी हो, करना। बस मुझे तो मेरा काम बता दो।
रामस्वरूप – तो उमा को जैसे-तैसे तैयार कर दो। न सही पाउडर। वैसे कौन बुरी है। पान लेकर भेज देना उसे और नाश्ता तो तैयार है न? (रतन का आना) आ गया रतन !. इधर ला इधर बाजा नीचे रख दे। चद्दर खोल पकड़ तो जरा उधर से (चद्दर बिछाते हैं।)
प्रेमा – नाश्ता तो तैयार है। मिठाई तो वे लोग ज्यादा खाएँगे नहीं। कुछ नमकीन चीजें बना दी हैं। फल रखे हैं ही। चाय तैयार है और टोस्ट भी। मगर हाँ मक्खन? मक्खन तो आया ही नहीं।
रामस्वरूप – क्या कहा? मक्खन नहीं आया? तुम्हें भी किस वक्त याद आई है। जानती हो कि मक्खनवाले की दुकान दूर है, पर तुम्हें तो ठीक वक्त पर कोई बात सुझती ही नहीं। अब बताओ रतन मक्खन लाए कि यहाँ का काम करे। दफ्तर के चपरासी से कहा था आने के लिए सो नखरों के मारे…
प्रेमा – यहाँ का काम कौन-सा ज्यादा है? कमरा तो सब ठीक-ठाक है ही, बाजा-सितार आ ही गया। नाश्ता यहाँ बराबरवाले कमरे में करना है- ट्रे में रखा हुआ है, सो तुम्हें पकड़ा दूँगी। एकाध चीज खुद ले आना। इतनी देर से रतन मक्खन ले ही आएगा। दो आदमी ही तो हैं।
रामस्वरूप – हाँ, एक तो बाबू गोपालप्रसाद और दूसरा खुद लड़का है। देखो, उमा से कह देना कि जरा करीने से आए। ये लोग जरा ऐसे ही हैं। गुस्सा तो मुझे बहुत आता है, इनके दकियानूसी ख्यालों पर। खुद पढ़े-लिखे हैं, वकील हैं, सभा-सोसाइटियों में जाते हैं, मगर लड़की चाहते हैं ऐसी कि ज्यादा पढ़ी-लिखी न हो।
प्रेमा – और लड़का?
रामस्वरूप – बताया तो था तुम्हें। बाप सेर है, तो लड़का सवा सेर। बी.एस.सी के बाद लखनऊ में ही तो पढ़ता है, मेडिकल कॉलेज में। कहता है कि शादी का सवाल दूसरा है तालीम का दूसरा। क्या करूँ मजबूरी है। मतलब अपना है, वरना इन लड़कों और बापों को ऐसी कोरी कोरी सुनाता कि ये भी…
रतन – (जो अब तक दरवाजे के पास चुपचाप खड़ा हुआ था, जल्दी-जल्दी) बाबूजी, बाबूजी!
रामस्वरूप – क्या है?
रतन – कोई आए हैं।
रामस्वरूप – (दरवाजे से बाहर झाँककर, जल्दी से मुँह अंदर करते हुए) अरे, ऐ प्रेमा, वे आ भी गए (नौकर पर नजर पड़ते ही) और तू यहीं खड़ा है, बेवकूफ! गया नहीं मक्खन लाने? सब चौपट कर दिया। अबे, उधर से, अंदर के दरवाजे से जा (नौकर अंदर जाता है) और तुम जल्दी करो। प्रेमा, उमा को समझा देना थोड़ा-सा गा देगी। (प्रेमा जल्दी से अंदर की तरफ जाती है। उसकी धोती जमीन पर रखे हुए बाजे से अटक जाती है।)
प्रेमा – उँह ! यह बाजा नीचे ही रख गया है। कम्बख्त।
रामस्वरूप – तुम जाओ, मैं रखे देता हूँ … जल्दी (प्रेमा जाती है। बाबू रामस्वरूप बाजा उठाकर रखते हैं। किवाड़ों पर दस्तक।)
रामस्वरूप – हँ हँ हँ। आइए, आइए। हँ-हँ-हँ।
(बाबू गोपालप्रसाद और उसके लड़के शंकर का आना आँखों से लोक चतुराई टपकती है। आवाज से मालूम होता है काफी अनुभवी और फितरती महाशय है। उनका लड़का कुछ खीसे निपोरनेवाले नौजवानों में से है, आवाज पतली है और खिसियाहट भरी झुकी कमर इसकी खासियत है।)
रामस्वरूप – (अपने दोनों हाथ मलते हुए) हँ.. हँ इधर तशरीफ लाइए, इधर (बाबूगोपालप्रसाद बैठते हैं मगर बेंत गिर पड़ता है।)
रामस्वरूप – यह बेंत ! लाइए मुझे दीजिए कोने में रख देता हूँ। (सब बैठते हैं।) हँ हँ ! (सब बैठते हैं।) हँ-हँ! मकान ढूँढ़ने में कुछ तकलीफ तो नहीं हुई?
गोपालप्रसाद – (खँखारकर) नहीं, ताँगेवाला जानता था। और फिर हमें तो यहाँ आना ही था, रास्ता मिलता कैसे नहीं?
रामस्वरूप – हँ-हँ-हँ, यह तो आपकी बड़ी मेहरबानी है। मैंने आपको तकलीफ तो दी।
गोपालप्रसाद – अरे नहीं साहब! जैसा मेरा काम, वैसा आपका काम आखिर लड़के की शादी तो करनी ही है। बल्कि यों कहिए कि मैंने आपके लिए खासी परेशानी कर दी।
रामस्वरूप – हँ हँ ! यह लीजिए, आप तो मुझे काँटों में घसीटने लगे। हम तो आपके हँ-हँ सेवक ही हैं। हँ-हँ (थोड़ी देर बाद लड़के की तरफ मुखातिब होकर) और कहिए, शंकर बाबू, कितने दिनों की छुट्टियाँ हैं?
शंकर – जी, कालेज की छुट्टियाँ नहीं हैं। वीक एंड में चला आया था।
रामस्वरूप – आपके कोर्स खत्म होने में तो अब साल भर रहा होगा?
शंकर – जी, यही कोई साल दो साल।
रामस्वरूप – साल दो साल?
शंकर – हँ-हँ हँ ! जी, एकाध साल का मार्जिन रखता हूँ।
गोपालप्रसाद – बात यह है साहब कि यह शंकर एक साल बीमार हो गया था। क्या बताएँ, इन लोगों को इसी उम्र में सारी बीमारियाँ सताती हैं। एक हमारा ज़माना था कि स्कूल से आकर दर्जनों कचौड़ियाँ उड़ा जाते थे, मगर फिर जो खाना खाने बैठते, तो वैसे की वैसी ही भूख।
रामस्वरूप – कचौड़ियाँ भी तो उस जमाने में पैसे की दो आती थीं।
गोपालप्रसाद – जनाब, यह हाल था कि चार पैसे में ढेर-सी मलाई आती थी और अकेले दो आने की हजम करने की ताकत थी, अकेले ! और अब तो बहुतेरे खेल वगैरह होते हैं स्कूलों में तब न वॉलीबॉल जानता था, न टेनिस, न बैडमिंटन। बस, कभी हॉकी या कभी क्रिकेट कुछ लोग खेला करते थे। मगर मजाल कि कोई कह जाए कि यह लड़का कमजोर है। (शंकर और रामस्वरूप खीसे निपोरते हैं।)
रामस्वरूप – जी हाँ, जी हाँ! उस जमाने की बात ही दूसरी थी। हँ-हँ…
गोपालप्रसाद – (जोशीली आवाज में) और पढ़ाई का यह हाल था कि एक बार कुर्सी पर बैठे कि बारह घंटे की सिटिंग हो गई, बारह घंटे ! जनाब, मैं सच कहता हूँ कि उस जमाने का मैट्रिक भी वह अंग्रेजी लिखता था फर्राटे की, कि आजकल के एम. ए. भी मुकाबला नहीं कर सकते।
रामस्वरूप – जी हाँ, जी हाँ! यह तो है ही।
गोपालप्रसाद – माफ कीजिएगा बाबू रामस्वरूप उस ज़माने की जब याद आती है, अपने को जब्त करना मुश्किल हो जाता है।
रामस्वरूप – हँ-हँ हँ ! जी हाँ, वह तो रंगीन ज़माना था, रंगीन जमाना! हँ-हँ-हँ (शंकर भी ही ही करता है।)
गोपालप्रसाद – (एक साथ अपनी आवाज़ और तरीका बदलते हुए) अच्छा तो साहब, फिर बिजिनेस की बातचीत हो जाए।
रामस्वरूप – (चौंककर) बिजनेस? बिज…. (समझकर) आह ! अच्छा-अच्छा! लेकिन जरा नाश्ता तो कर लीजिए। (उठते हैं।)
गोपालप्रसाद – यह सब आप क्यों तकल्लुफ करते हैं?
रामस्वरूप – हँ-हँ-हँ तकल्लुफ किस बात का है? हँ-हँ-हँ! यह तो मेरी बड़ी तकदीर है कि आप मेरे यहाँ तशरीफ लाए। वरना मैं किस काबिल हूँ। हँ-हँ! माफ कीजिएगा जरा। अभी हाजिर हुआ। (अंदर जाते हैं।)
गोपालप्रसाद – (थोड़ी देर बाद दबी आवाज़ में) आदमी तो भला है। मकान-वकान से हैसियत भी बुरी नहीं मालूम होती। पता चले, लड़की कैसी है?
शंकर – जी
(कुछ खखारकर इधर-उधर देखता है।)
गोपालप्रसाद – क्यों क्या हुआ?
शंकर – कुछ नहीं।
गोपालप्रसाद – झुककर क्यों बैठते हो? ब्याह तय करने आए, तो कमर सीधी करके बैठो। तुम्हारे दोस्त ठीक कहते हैं कि शंकर की बैक बोन. …
(इतने में बाबू रामस्वरूप आते हैं, हाथ में चाय की ट्रे लिए हुए मेज पर रख देते हैं।)
गोपालप्रसाद – आखिर आप माने नहीं।
रामस्वरूप – (चाय प्याले में डालते हुए) हँ-हँ-हँ? आपको विलायती चाय पसंद है या हिंदुस्तानी?
गोपालप्रसाद – नहीं-नहीं साहब, मुझे आधा दूध और आधी चाय दीजिए और चीनी भी ज्यादा डालिएगा। मुझे तो भाई यह नया फैशन पसंद नहीं। एक तो वैसे ही चाय में पानी काफी होता है और फिर चीनी भी नाम के लिए डाली जाए, तो जायका क्या रहेगा?
रामस्वरूप – हँ हँ। कहते तो आप सही हैं। (प्याला पकड़ाते हुए)
शंकर – (खखारकर) सुना है, सरकार अब ज्यादा चीनी लेनेवालों पर टैक्स लगाएगी।
गोपालप्रसाद – (चाय पीते हुए) हूँ। सरकार जो चाहे सो कर ले, पर अगर आमदनी करनी है, तो सरकार को बस एक ही टैक्स लगाना चाहिए।
रामस्वरूप – (शंकर को प्याला पकड़ाते हुए) वह क्या?
गोपालप्रसाद – खूबसूरती पर टैक्स! (रामस्वरूप और शंकर हँस पड़ते हैं।) मजाक नहीं साहब, यह ऐसा टैक्स है जनाब कि देने वाली भी चूँ न करेंगी। बस शर्त यह है कि औरत पर यह छोड़ दिया जाए कि वह अपनी खूबसूरती के स्टैंडर्ड के माफ़िक अपने ऊपर टैक्स तय कर ले, फिर देखिए सरकार की कैसी आमदनी बढ़ती है।
रामस्वरूप – (जोर से हँसते हुए) वाह वाह ! खूब सोचा आपने। वाकई आजकल यह खूबसूरती का सवाल भी बेढब हो गया है। हम लोगों के जमाने में तो यह कभी उठता भी न था। (तश्तरी गोपालप्रसाद की तरफ बढ़ाते हैं।) लीजिए।
गोपालप्रसाद – (समोसा उठाते हुए) कभी नहीं साहब, कभी नहीं।
रामस्वरूप – (शंकर की तरफ मुखातिब होकर) आपका क्या ख्याल है, शंकर बाबू?
रामस्वरूप – किस मामले में?
रामस्वरूप – यही कि शादी तय करने में खूबसूरती का हिस्सा कितना होना चाहिए?
गोपालप्रसाद – (बीच में ही) यह बात दूसरी है कि बाबू रामस्वरूप, मैंने आपसे पहले ही कहा था, लड़की का खूबसूरत होना निहायत जरूरी है। कैसे भी हो, चाहे पौडर वगैरह लगाए, चाहे वैसे ही बात यह है कि हम आप मान भी जाएँ, मगर घर की औरतें तो राजी नहीं होतीं। आपकी लड़की तो ठीक है?
रामस्वरूप – जी हाँ, वह तो आप देख लीजिएगा।
गोपालप्रसाद – देखना क्या ! जब आपसे इतनी बातचीत हो चुकी है, तब तो यह रस्म ही समझिए।
रामस्वरूप – हँ-हँ, यह तो आपका मेरे ऊपर भारी अहसान है। हँ-हँ।
गोपालप्रसाद – और जायचा (जन्मपत्री) तो मिल ही गया होगा?
रामस्वरूप – जी, जायचे का मिलना क्या मुश्किल बात है। ठाकुर जी के चरणों में रख दिया। बस खुद-ब-खुद मिला हुआ समझिए।
गोपालप्रसाद – यह ठीक कहा आपने, बिल्कुल ठीक। (थोड़ी देर रुककर) लेकिन हाँ, यह जो मेरे कानों को भनक पड़ी है, यह गलत है न?
रामस्वरूप – (चौंककर) क्या?
गोपालप्रसाद – यह पढ़ाई-लिखाई के बारे में! जी हाँ, साफ बात है साहब, हमें ज्यादा पढ़ी लिखी लड़की नहीं चाहिए। मेम साहब तो रखनी नहीं, कौन भुगतेगा उनके नखरों को। बस, हद-से-हद मैट्रिक पास होनी चाहिए….. क्यों शंकर?
शंकर – जी हाँ, कोई नौकरी तो करनी नहीं।
रामस्वरूप – नौकरी का तो कोई सवाल ही नहीं उठता।
गोपालप्रसाद – और क्या साहब! देखिए कुछ लोग मुझसे कहते हैं कि जब आपने अपने लड़के को बी. ए. एम. ए. तक पढ़ाया है, तब उनकी बहुएँ भी ग्रेजुएट लीजिए। भला पूछिए इन अक्ल के ठेकेदारों से कि क्या लड़कों की पढ़ाई और लड़कियों की पढ़ाई एक बात है। अरे मर्दों का काम तो है ही पढ़ना और काबिल होना। अगर औरतें भी वही करने लगीं, अंग्रेजी अखबार पढ़ने लगीं और पॉलिटिक्स वगैरह पर बहस करने लगीं, तब तो हो चुकी गृहस्थी। जनाब मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं, शेर के बाल होते हैं, शेरनी के नहीं।
रामस्वरूप – जी हाँ, और मर्द की दाढ़ी होती है, औरतों की नहीं। हँ-हँ-हँ
(शंकर भी हँसता है, मगर गोपालप्रसाद गंभीर हो जाते हैं।)
गोपालप्रसाद – हाँ, हाँ वह भी सही है। कहने का मतलब यह है कि कुछ बातें दुनिया में ऐसी हैं, जो सिर्फ मर्दों के लिए हैं और ऊँची तालीम भी ऐसी चीजों में से एक है।
रामस्वरूप – (शंकर से) चाय और लीजिए।
शंकर – धन्यवाद, पी चुका।
रामस्वरूप – (गोपालप्रसाद से) आप?
गोपालप्रसाद – बस साहब, अब तो खत्म ही कीजिए।
रामस्वरूप – आपने तो कुछ खाया ही नहीं। चाय के साथ टोस्ट नहीं थे। क्या बताएँ, वह मक्खन…..
गोपालप्रसाद – नाश्ता ही तो करना था साहब, कोई पेट तो भरना था नहीं। और फिर टोस्ट वोस्ट मैं खाता ही नहीं।
रामस्वरूप – हँ-हँ (मेज को एक तरफ सरका देते हैं। फिर अंदर के दरवाजे की तरफ मुँह कर जरा जोर से) अरे, जरा पान भिजवा देना… सिगरेट मँगवाऊँ?
गोपालप्रसाद – जी नहीं।
(पान की तश्तरी हाथों में लिए उमा आती है। सादगी के कपड़े। गर्दन झुकी हुई। बाबू गोपालप्रसाद आँखें गड़ाकर और शंकर छिपकर उसे ताक रहे हैं
रामस्वरूप – हँ-हँ हँ-हँ, आपकी लड़की है? लाओ बेटी, पान मुझे दो।
(उमा पान की तश्तरी अपने पिता को दे देती है। उस समय उसका चेहरा ऊपर को उठ जाता है, नाक पर रखा हुआ सोने की रिमवाला चश्मा दिखता है। बाप-बेटे चौंक उठते हैं।)
रामस्वरूप – – (जरा सकपकाकर जी, वह तो वह पिछले महीने में इसकी आँखें आ गई थीं, सो कुछ दिनों के लिए चश्मा लगाना पड़ रहा है।
गोपालप्रसाद – पढ़ाई लिखाई की वजह से तो नहीं है कुछ?
रामस्वरूप – नहीं साहब, वह तो मैंने अर्ज किया न।
गोपालप्रसाद – हूँ। (संतुष्ट होकर कुछ कोमल स्वर में) बैठो बेटी !
रामस्वरूप – वहाँ बैठ जाओ उमा, उस तख्त पर अपने बाजे के पास (उमा बैठती है।)
गोपालप्रसाद – चाल में तो कुछ खराबी है नहीं। चेहरे पर भी छवि है। …..हाँ, कुछ गाना-बजाना सीखा है?
रामस्वरूप – जी हाँ, सितार भी और बाजा भी। सुनाओ तो उमा एकाध गीत सितार के साथ।
(उमा सितार उठाती है। थोड़ी देर बाद मीरा का मशहूर गीत, ‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई’ गाना शुरू कर देती है। स्वर से जाहिर है कि गाने का अच्छा ज्ञान है। उसकी आँखें शंकर की झेंपती-सी आँखों से मिल जाती हैं और वह गाते-गाते एकदम रुक जाती है।)
रामस्वरूप – क्यों, क्या हुआ? गाने को पूरा करो उमा !
गोपालप्रसाद – नहीं-नहीं साहब, काफी है। लड़की आपकी अच्छा गाती है।
(उमा सितार रखकर अंदर जाने को उठती है।)
गोपालप्रसाद – अभी ठहरो, बेटी।
रामस्वरूप – थोड़ा और बैठी रहो, उमा।
(उमा बैठती है।)
गोपालप्रसाद – (उमा से) तो तुमने पेंटिंग भी सीखी है.
उमा – (चुप)।
रामस्वरूप – हाँ, वह तो मैं आपको बताना भूल ही गया। यह जो तस्वीर टँगी हुई है, कुत्तेवाली, इसी ने खींची है और वह उस दीवार पर भी।
गोपालप्रसाद – हूँ। यह तो बहुत अच्छा है। और सिलाई वगैरह?
रामस्वरूप – सिलाई तो सारे घर की इसी के जिम्मे रहती है, यहाँ तक कि मेरी कमीजें भी, हँ-हँ हँ।
गोपालप्रसाद – ठीक है। लेकिन, हाँ बेटी, तुमने कुछ इनाम जीते हैं?
(उमा चुप। रामस्वरूप इशारे के लिए खाँसते हैं, लेकिन उमा चुप है, उस तरह गर्दन झुकाए। गोपालप्रसाद अधीर हो उठते हैं और रामस्वरूप सकपकाते हैं।)
रामस्वरूप – जवाब दो उमा (गोपालप्रसाद से) हँ हँ जरा शरमाती है। इनाम तो इसने…..
गोपालप्रसाद – (जरा रुखी आवाज में) जरा मुँह भी तो खोलना चाहिए।
रामस्वरूप – उमा, देखो आप क्या कह रहे हैं? जवाब दो न….
उमा – (हल्की, लेकिन मजबूत आवाज में) क्या जवाब दूँ बाबू जी ! जब कुर्सी, मेज बिकती है, तब दुकानदार कुर्सी, मेज से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीददार को दिखला देता है, पसंद आ गई तो अच्छा है वरना…..
रामस्वरूप – (चौककर खड़े हो जाते हैं) उमा, उमा !
उमा – अब मुझे कह लेने दो बाबू जी ! ये जो महाशय मेरे खरीददार बनकर आए हैं, उनसे जरा पूछिए कि क्या लड़कियों के दिल नहीं होते? क्या उनको चोट नहीं लगती है? क्या वे बेबस भेड़-बकरियाँ हैं? जिन्हें कसाई अच्छी तरह देख-भालकर खरीदते हैं?
गोपालप्रसाद – (ताव में आकर) बाबू रामस्वरूप, आपने मेरी इज्जत उतारने के लिए मुझे यहाँ बुलाया था?
उमा – (तेज आवाज में) हाँ, और हमारी बेइज्जती नहीं होती, जो आप इतनी देर से नाप तौल कर रहे हैं? और जरा अपने इन साहबजादे से पूछिए कि अभी पिछले फरवरी में ये लड़कियों के हॉस्टल के इर्द-गिर्द क्यों घूम रहे थे, और वहाँ से क्यों भगाए गए थे?
शंकर – बाबू जी चलिए।
गोपालप्रसाद – लड़कियों के हॉस्टल में? क्या तुम कॉलेज में पढ़ी हो?
(रामस्वरूप चुप)
उमा – जी हाँ, मैं कॉलेज में पढ़ी हूँ। मैंने बी.ए. पास किया है कोई पाप नहीं किया, कोई चोरी नहीं की और न आपके पुत्र की तरह ताक-झाँककर कायरता दिखाई है। मुझे अपनी इज्जत, अपने मान का ख्याल तो है, लेकिन इनसे पूछिए कि ये किस तरह नौकरानी के पैरों पड़कर अपना मुँह छिपाकर भागे थेI
रामस्वरूप – उमा, उमा?
गोपालप्रसाद – (खड़े होकर गुस्से में) बस हो चुका। बाबू रामस्वरूप आपने मेरे साथ दगा किया। आपकी लड़की बी. ए. पास है, आपने मुझसे कहा था कि सिर्फ मैट्रिक तक पढ़ी है। लाइए मेरी छड़ी कहाँ है? मैं चलता हूँ! (बेंत ढूँढ़कर उठाते हैं।) बी. ए. पास! उफ्फोह! गजब हो जाता! झूठ का भी कुछ ठिकाना है, आओ, बेटे, चलो…. (दरवाजे की ओर बढ़ते हैं।)
उमा – जी हाँ, जाइए, लेकिन घर जाकर जरा यह पता लगाइएगा कि आपके लाड़ले बेटे की रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं- यानी बैकबोन बैकबोन।
(बाबू गोपालप्रसाद के चेहरे पर बेबसी का गुस्सा है। उनके लड़के के रुआँसापन। दोनों बाहर चले जाते हैं। बाबू रामस्वरूप कुर्सी पर धम से बैठ जाते हैं। उमा सहसा चुप हो जाती है, लेकिन उसकी हँसी सिसकियों में तब्दील हो जाती है। प्रेमा का घबराहट की हालत में आना।)
प्रेमा – उमा, उमा …… रो रही है।
(यह सुनकर रामस्वरूप खड़े होते हैं। रतन आता है।)
रतन – बाबू जी मक्खन।
(सब रतन की तरफ देखते हैं और परदा गिरता है।)
‘रीढ़ की हड्डी’ – सारांश
जगदीश चंद्र माथुर द्वारा लिखित एकांकी ‘रीढ़ की हड्डी’ भारतीय समाज में स्त्री-शिक्षा और विवाह से जुड़ी रूढ़िवादी मानसिकता पर कड़ा प्रहार करती है।
1. घर की साज-सज्जा और तैयारी
कहानी की शुरुआत बाबू रामस्वरूप के घर से होती है, जहाँ उनकी बेटी उमा को देखने के लिए कुछ मेहमान आने वाले हैं। रामस्वरूप और उनका नौकर रतन कमरे को सजाने और तख्त बिछाने में व्यस्त हैं। उनकी पत्नी प्रेमा बताती हैं कि उमा इस दिखावे से नाराज है और उसने मुँह फुला रखा है। वह पाउडर लगाने या सजने-सँवरने को तैयार नहीं है।
2. शिक्षा को छिपाने का प्रयास
एकांकी का मुख्य मोड़ तब आता है जब पता चलता है कि उमा बी.ए. पास है, लेकिन लड़के वाले (गोपालप्रसाद) चाहते हैं कि लड़की ज्यादा पढ़ी-लिखी न हो। वे दकियानूसी ख्यालों के हैं और मानते हैं कि उच्च शिक्षा सिर्फ पुरुषों के लिए है। रामस्वरूप अपनी बेटी के विवाह के खातिर गोपालप्रसाद से झूठ बोलते हैं कि उमा केवल मैट्रिक (दसवीं) पास है।
3. मेहमानों का आगमन और दकियानूसी बातें
बाबू गोपालप्रसाद अपने बेटे शंकर के साथ आते हैं। गोपालप्रसाद पेशे से वकील हैं और उनका बेटा मेडिकल की पढ़ाई कर रहा है, फिर भी उनकी सोच अत्यंत पिछड़ी हुई है। वे विवाह को एक ‘बिजनेस’ समझते हैं। बातों-बातों में वे अपने पुराने जमाने की तारीफ करते हैं और स्त्री-शिक्षा का मजाक उड़ाते हैं। वे तर्क देते हैं कि “शेर के बाल होते हैं, शेरनी के नहीं” और “मर्दों के दाढ़ी होती है, औरतों की नहीं,” जिसका अर्थ है कि कुछ चीज़ें केवल पुरुषों के लिए ही बनी हैं।
4. उमा का स्वाभिमान और सच्चाई
जब उमा चाय और पान लेकर आती है, तो गोपालप्रसाद उसकी चाल, चेहरा और चश्मे के बारे में बारीकी से छानबीन करते हैं। वे उमा से एक गाना भी गवाते हैं और गाना गाने के दौरान उमा शंकर का चेहरा देख लेती है और गाना तत्काल बंद कर देती है। इसके बाद वे उमा से उसकी शिक्षा, पेंटिंग और सिलाई के बारे में सवाल करते हैं। जब वे उमा को बोलने के लिए मजबूर करते हैं, तो उमा का सब्र टूट जाता है। वह अत्यंत आत्मविश्वास और मजबूती से कहती है कि लड़कियाँ कोई कुर्सी-मेज या भेड़-बकरी नहीं हैं जिन्हें दुकानदार की तरह दिखाया जाए।
5. शंकर की पोल खुलना
उमा केवल अपना पक्ष ही नहीं रखती, बल्कि गोपालप्रसाद के बेटे शंकर की असलियत भी सबके सामने ला देती है। वह बताती है कि शंकर पिछली फरवरी में लड़कियों के हॉस्टल के पास ताक-झाँक करते हुए पकड़ा गया था और अपमानित होकर वहाँ से भागा था। वह बताती है कि जिसे वे ‘सुयोग्य वर’ समझ रहे हैं, उसका अपना कोई चरित्र नहीं है।
6. शीर्षक की सार्थकता – ‘रीढ़ की हड्डी’
उमा कटाक्ष करती है कि गोपालप्रसाद अपने बेटे की ‘रीढ़ की हड्डी’ (Backbone) की जाँच करें। इसके दो अर्थ निकलते हैं –
शारीरिक – शंकर झुककर चलता है, उसकी शारीरिक बनावट सही नहीं है।
नैतिक/सांकेतिक – शंकर का अपना कोई व्यक्तित्व या स्वाभिमान नहीं है। वह अपने पिता के इशारों पर चलने वाला एक रीढ़-विहीन अर्थात् चरित्रहीन युवक है।
7. निष्कर्ष
सच्चाई सामने आने पर गोपालप्रसाद गुस्से में अपनी छड़ी उठाकर वहाँ से चले जाते हैं। रामस्वरूप हताश होकर बैठ जाते हैं और उमा समाज की इस विद्रूपता को देखकर रोने लगती है। अंत में नौकर रतन मक्खन लेकर आता है, जो एक व्यंग्यात्मक मोड़ पर कहानी को समाप्त करता है।
मुख्य संदेश – यह एकांकी समाज को यह संदेश देती है कि बेटियों को उच्च शिक्षा देना अपराध नहीं है। विवाह के नाम पर लड़कियों की ‘खरीद-फरोख्त’ और उनकी गरिमा से खिलवाड़ करना गलत है। शिक्षित और जागरूक लड़कियाँ ही समाज की वास्तविक ‘रीढ़ की हड्डी’ हैं।
‘रीढ़ की हड्डी’ – समस्या
‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी में जगदीश चंद्र माथुर ने समाज की कई गहरी समस्याओं को उजागर किया है। स्त्री-शिक्षा के प्रति संकुचित मानसिकता – समाज में फैली यह सोच कि लड़कियों को अधिक नहीं पढ़ाना चाहिए क्योंकि इससे वे तर्क करने लगती हैं और घर के नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं।
दोहरा मापदंड (Double Standards) – गोपालप्रसाद जैसे लोग खुद तो वकील हैं और अपने बेटे को डॉक्टर बना रहे हैं, लेकिन बहू अनपढ़ या कम पढ़ी-लिखी चाहते हैं। यह शिक्षित समाज के पाखंड को दर्शाता है।
विवाह को व्यापार समझना – गोपालप्रसाद विवाह को ‘बिजनेस’ कहते हैं। इसमें लड़की के गुणों और भावनाओं से ज्यादा उसकी ‘नुमाइश’ और ‘दहेज’ जैसी औपचारिकताओं को महत्त्व दिया जाता है।
लड़कियों को ‘वस्तु’ समझना – उमा के माध्यम से लेखक ने दिखाया है कि कैसे विवाह के बाजार में लड़कियों को मेज-कुर्सी या भेड़-बकरी की तरह परखा जाता है, जैसे उनका अपना कोई दिल या स्वाभिमान न हो।
युवा पीढ़ी का चरित्रहीन होना – शंकर जैसे युवाओं की समस्या, जिनका अपना कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व या चरित्र (Moral Backbone) नहीं है। वे अपने माता-पिता के गलत फैसलों में मूक बने रहते हैं और नैतिक रूप से कमजोर होते हैं।
सामाजिक दबाव और झूठ – एक पिता (रामस्वरूप) का अपनी शिक्षित बेटी की पढ़ाई को छिपाना यह दर्शाता है कि समाज में एक अच्छी लड़की की परिभाषा कितनी संकीर्ण है।
निष्कर्ष – यह एकांकी मुख्य रूप से स्त्री के आत्मसम्मान की रक्षा और समाज की पितृसत्तात्मक (Patriarchal) जड़ता को सबसे बड़ी समस्या के रूप में प्रस्तुत करती है।
‘रीढ़ की हड्डी’ – उद्देश्य
जगदीश चंद्र माथुर द्वारा लिखित ‘रीढ़ की हड्डी’ एक अत्यंत उद्देश्यपूर्ण एकांकी है। इसका मुख्य लक्ष्य समाज की उन सड़ी-गली परंपराओं और पुरुष प्रधान मानसिकता पर कड़ा प्रहार करना है, जो स्त्रियों को केवल उपभोग की वस्तु या ‘सजावटी सामान’ मानती हैं।
1. स्त्री-शिक्षा के महत्त्व को रेखांकित करना
एकांकी का सबसे बड़ा उद्देश्य यह दिखाना है कि शिक्षा केवल पुरुषों का अधिकार नहीं है। उमा के माध्यम से लेखक ने यह सिद्ध किया है कि शिक्षित स्त्री न केवल अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती है, बल्कि वह कठिन समय में समाज और परिवार को सही आईना भी दिखा सकती है।
2. संकुचित और दोहरी मानसिकता का पर्दाफाश
लेखक ने गोपालप्रसाद और उनके बेटे शंकर के माध्यम से समाज के उस वर्ग को बेनकाब किया है, जो खुद तो शिक्षित हैं लेकिन बहू अनपढ़ या कम पढ़ी-लिखी चाहते हैं। यह दोहरी मानसिकता (Double Standards) समाज के विकास में बाधक है, जिसे बदलना इस पाठ का उद्देश्य है।
3. स्त्रियों के आत्मसम्मान और गरिमा की रक्षा
एकांकी यह संदेश देती है कि लड़कियों का अपना स्वतंत्र अस्तित्व, पसंद-नापसंद और भावनाएँ होती हैं। उमा का यह कथन— “क्या लड़कियों के दिल नहीं होते? क्या उन्हें चोट नहीं लगती?”—पाठकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि विवाह के नाम पर लड़कियों की ‘नुमाइश’ करना उनके मानवीय अधिकारों का हनन है।
4. युवाओं के चरित्र निर्माण की प्रेरणा
‘रीढ़ की हड्डी’ शीर्षक के माध्यम से लेखक ने युवाओं को यह संदेश दिया है कि केवल डिग्री लेना काफी नहीं है, बल्कि व्यक्ति का नैतिक चरित्र और व्यक्तित्व मजबूत होना चाहिए। शंकर जैसे युवक, जिनका अपना कोई स्टैंड नहीं है, समाज के लिए बोझ के समान हैं।
5. विवाह के बाजारीकरण का विरोध
विवाह को ‘बिजनेस’ कहना और लड़की को सामान की तरह ‘देखना-परखना’ एक सामाजिक बुराई है। लेखक इस कुप्रथा को समाप्त कर विवाह को दो व्यक्तित्वों के सम्मानजनक मिलन के रूप में स्थापित करना चाहते हैं।
निष्कर्ष –
संक्षेप में, इस एकांकी का उद्देश्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहाँ स्त्रियों को शिक्षा, सम्मान और समानता प्राप्त हो। लेखक यह बताना चाहते हैं कि जिस प्रकार शरीर को खड़ा रहने के लिए रीढ़ की हड्डी की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए शिक्षित और स्वाभिमानी नारी का होना अनिवार्य है।
अभ्यास
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
- एकांकी रीढ़ की हड्डी‘ का शीर्षक किसका प्रतीक है?
(क) शरीर के एक आवश्यक अंग का
(ख) व्यक्ति की ऊँचाई के आधार का
(ग) आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का
(घ) शारीरिक शक्ति और परिश्रम का
उत्तर – (ग) आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का
रीढ़ की हड्डी शरीर को सीधा रखती है, वैसे ही स्वाभिमान व्यक्ति के व्यक्तित्व को अडिग रखता है। उमा का स्वाभिमान ही उसे झुकने नहीं देता।
- ‘रीढ़ की हड्डी‘ एकांकी में किस पर व्यंग्य किया गया है?
(क) पात्रों की निर्धनता और लाचारी पर
(ख) पात्रों की भाषा और हास्य पर
(ग) विवाह और अशिक्षा पर
(घ) समाज की अनुचित मान्यताओं पर
उत्तर – (घ) समाज की अनुचित मान्यताओं पर
यह एकांकी उन रूढ़िवादी मान्यताओं पर प्रहार करती है जो लड़कियों की शिक्षा को गलत मानती हैं और उन्हें वस्तु की तरह परखती हैं।
- “घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं” यह वाक्य शंकर की किस छवि को उजागर करता है?
(क) नैतिक साहस की कमी और चारित्रिक दुर्बलता
(ख) अनुभव और विवेक की कमी
(ग) चारित्रिक दृढ़ता और शारीरिक दुर्बलता
(घ) उदासीनता और एकाकीपन
उत्तर – (क) नैतिक साहस की कमी और चारित्रिक दुर्बलता
उमा यह कहकर शंकर के व्यक्तित्वहीन होने और उसके हॉस्टल वाली गलत कारनामों की ओर संकेत करती है।
- “जी हाँ, मैं कॉलेज में पढ़ी हूँ। मैंने बी. ए. पास किया है।” उमा की दृष्टि में शिक्षा प्राप्त करने का सही अर्थ है?
(क) बड़ी-बड़ी डिग्री प्राप्त करना
(ख) कॉलेज में पढ़ना और नौकरी पाना
(ग) माता-पिता और पति को प्रसन्न रखना
(घ) आत्मबल और स्वतंत्र विचार रखना
उत्तर – (घ) आत्मबल और स्वतंत्र विचार रखना
उमा के लिए शिक्षा का अर्थ केवल डिग्री नहीं, बल्कि सही-गलत का भेद करने की शक्ति और अपनी बात मजबूती से रखने का साहस है।
- गोपालप्रसाद और रामस्वरूप में क्या-क्या समानताएँ हैं?
(क) दोनों प्रगतिशील हैं और रूढ़ियों को नकारते हैं।
(ख) दोनों दिखावे और परंपरा के शिकार हैं।
(ग) दोनों शिक्षा और रूढ़ियों के समर्थक हैं।
(घ) दोनों संगीत और स्वादिष्ट भोजन के प्रेमी हैं।
उत्तर – (ख) दोनों दिखावे और परंपरा के शिकार हैं।
रामस्वरूप आधुनिकता का ढोंग करते हैं पर बेटी की शिक्षा छिपाते हैं, और गोपालप्रसाद शिक्षित होकर भी दकियानूसी परंपराओं को ढो रहे हैं।
- इस एकांकी की संवाद शैली मुख्यत – कैसी है?
(क) औपचारिक और शुष्क
(ख) स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण
(ग) काव्यात्मक और प्रश्नात्मक
(घ) भावुक और संक्षिप्त
उत्तर – (ख) स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण
संवाद बहुत ही सहज हैं और उनमें समाज की विद्रूपताओं पर गहरा व्यंग्य छिपा हुआ है।
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-
- बाबू रामस्वरूप समाज में आधुनिक व्यवहार का दिखावा करते हैं, जबकि उनके विचार रूढ़िवादी हैं। इस अंतर्द्वद्व के उदाहरण एकांकी में से खोजकर लिखिए।
(संकेत- उमा के साथ उनका व्यवहार, विवाह के लिए दिखावे करना किंतु इन प्रयासों को छिपाने की चेष्टा करना आदि।)
उत्तर – रामस्वरूप के चरित्र में आधुनिकता और रूढ़िवादिता का टकराव साफ दिखता है। वे अपनी बेटी को बी.ए. तक पढ़ाते हैं जो उनके आधुनिक व्यवहार को दिखाता है, लेकिन शादी के लिए उसे केवल मैट्रिक पास बताते हैं जो उनकी रूढ़िवादी सोच को प्रकट करता है।
वे घर में ग्रामोफोन और मेजपोश जैसे आधुनिक साजो-सामान रखते हैं, लेकिन अपनी पत्नी से कहते हैं कि उमा को ‘टीम-टाम’ अर्थात् सजावट के साथ नीचे लाना ताकि वह लड़के वालों को पसंद आ जाए। वे अपनी बेटी के वास्तविक सुंदरता से ज्यादा उसकी ‘दिखावट’ पर ध्यान देते हैं।
- ‘रीढ़ की हड्डी‘ का संदर्भ दो अलग-अलग पात्रों के लिए भिन्न-भिन्न अर्थों में आया है, उनकी पहचान कीजिए और लिखिए।
उत्तर – शंकर के संदर्भ में इसका अर्थ ‘चरित्र और व्यक्तित्व’ से है। शंकर की अपनी कोई पहचान नहीं है, वह अपने पिता के पीछे चलता है और नैतिक रूप से कमजोर है। जबकि उमा के संदर्भ में इसका अर्थ ‘स्वाभिमान और आधार’ से है। उमा समाज की वह ‘रीढ़’ है जो शिक्षित और सशक्त है, जिसके बिना एक मजबूत समाज की कल्पना नहीं की जा सकती।
- “मेरी समझ में तो ये पढ़ाई-लिखाई के जंजाल आते नहीं।” प्रेमा की इस सोच से उस समय की स्त्री-शिक्षा की स्थिति के विषय में क्या पता चलता है?
उत्तर – प्रेमा की सोच दर्शाती है कि उस समय स्त्री-शिक्षा को एक ‘जंजाल’ या मुसीबत माना जाता था। समाज का मानना था कि लड़कियों के लिए ‘स्त्री-सुबोधिनी’ जैसी किताबें पढ़ना और थोड़ी बहुत गिनती सीख लेना ही पर्याप्त है। उच्च शिक्षा को गृहस्थी के लिए खतरा माना जाता था, जिससे लड़कियों में विद्रोह की भावना पैदा हो सकती थी।
- लेखक ने ‘रीढ़ की हड्डी‘ शब्द को एकांकी के शीर्षक के रूप में क्यों चुना होगा? यदि आप इस एकांकी का दूसरा शीर्षक रखना चाहें, जो इसकी मुख्य बात को दर्शाए, तो वह क्या होगा और क्यों?
उत्तर – लेखक शीर्षक के रूप में ‘रीढ़ की हड्डी’ को इसलिए चुना क्योंकि जिस प्रकार इस हड्डी के बिना शरीर खड़ा नहीं हो सकता, उसी प्रकार स्वाभिमान और चरित्र के बिना मनुष्य का कोई वजूद नहीं है। इस पाठ का दूसरा शीर्षक – “उमा का विद्रोह” या “समाज का खोखलापन” हो सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि “उमा का विद्रोह” पूरी एकांकी का चरम बिंदु है। उमा का समाज की गलत बातों के खिलाफ आवाज उठाना बिलकुल सही है। “समाज का खोखलापन” इसलिए क्योंकि यह शिक्षित लोगों की पिछड़ी सोच को उजागर करता है।
विधा से संवाद
एकांकी की पड़ताल
आप जानते ही हैं कि ‘रीढ़ की हड्डी’ एक एकांकी है। एकांकी में भी एक कहानी ही होती है, लेकिन एकांकी की रूपरेखा कहानी से थोड़ी अलग होती है।
आगे ‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी से संबंधित कुछ बिंदु दिए गए हैं। एकांकी में से इन बिंदुओं से संबंधित एक-एक उदाहरण ढूँढ़कर लिखिए।
क्र.सं. | बिंदु | ‘रीढ़ की हड्डी’ से संबंधित उदाहरण |
1 | एकांकी का नाम | रीढ़ की हड्डी |
2 | लेखक का नाम | जगदीश चंद्र माथुर |
3 | पात्र | उमा, रामस्वरूप, प्रेमा, शंकर, गोपालप्रसाद और रतन। |
4 | परिवेश / देश-काल | मध्यवर्गीय भारतीय परिवार का घर, समय—मेहमानों के आने की तैयारी का वक्त (लगभग 1950-60 के दशक का परिवेश)। |
5 | रंग-निर्देश | (मामूली तरह से सजा हुआ एक कमरा… तख्त का दूसरा सिरा उनके नौकर ने पकड़ रखा है।) — यह कोष्ठक में दी गई जानकारी मंच की सजावट बताती है। |
6 | संवाद-निर्देश | पात्र के बोलने का ढंग, जैसे – रामस्वरूप – (जरा तेज आवाज़ में) या गोपालप्रसाद – (खँखारकर)। |
7 | समस्या | शिक्षित लड़की के विवाह में आने वाली अड़चनें और समाज की दकियानूसी (पुरानी) सोच। |
8 | संवाद | उमा – “क्या लड़कियों के दिल नहीं होते? क्या उन्हें चोट नहीं लगती है?” |
9 | मुख्य विचार | नारी शिक्षा का महत्त्व, स्त्री का आत्मसम्मान और युवाओं के चरित्र (नैतिक रीढ़) की मजबूती। |
10 | समाधान / परिणाम | उमा द्वारा सच्चाई का उद्घाटन करना और गोपालप्रसाद का अपमानित होकर चले जाना; यह साबित करना कि स्वाभिमान ही सबसे बड़ी जीत है। |
रंग-निर्देश
एकांकी की शुरुआत कुछ इस तरह से होती है—
(मामूली तरह से सजा हुआ एक कमरा। अंदर के दरवाजे से आते हुए जिन महाशय की पीठ नजर आ रही है, वे अधेड़ उम्र के मालूम होते हैं। एक तख्त को पकड़े हुए पीछे की ओर चलते-चलते कमरे में आते हैं। तख्त का दूसरा सिरा रतन ने पकड़ रखा है।)
इस रंग-निर्देश द्वारा एकांकी की पृष्ठभूमि की रचना की गई है, जहाँ से एकांकी आगे बढ़ती है। एकांकी में स्थान, परिवेश, सामाजिक स्थिति आदि के विषय में पाठक और निर्देशक को सटीक जानकारी देने के लिए एकांकीकार/नाटककार प्रायः ऐसे रंग-निर्देशों का प्रयोग करता है। मंचन के समय निर्देशक के पास यह छूट होती है कि वह देश-काल और वातावरण के अनुसार मंच सज्जा, प्रकाश, पात्रों के वस्त्र आदि में आवश्यक परिवर्तन कर सकता है।
अब इस एकांकी को कक्षा में प्रस्तुत करने का समय है। अपने समूह के साथ मिलकर एकांकी के किसी एक दृश्य का चुनाव कीजिए। उसकी तैयारी कीजिए और कक्षा में उसे प्रस्तुत कीजिए।
(संकेत- (i) समूह बनाइए और उचित हाव-भाव द्वारा उस दृश्य का अभिनय कीजिए।
(ii) आप अपनी आवश्यकता के अनुसार दिए गए रंग-निर्देश में परिवर्तन भी कर सकते हैं।)
छात्र इसे अपने शिक्षक की सहायता से पूरा करें।
मेरी टिप्पणी
“जी हाँ, जाइए, जरूर चले जाइए। लेकिन घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं— यानी बैकबोन, बैकबोन!”
उपर्युक्त वाक्य को ध्यान से पढ़िए। यह वाक्य उमा द्वारा शंकर पर की गई एक टिप्पणी है जो एक व्यंग्य की तरह है।
अब आप उमा द्वारा शंकर के लिए कही गई उपर्युक्त बात पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए इस पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर – उमा द्वारा शंकर पर की गई यह टिप्पणी केवल एक संवाद नहीं, बल्कि पूरे एकांकी का वैचारिक केंद्र है। उमा का यह कथन शंकर के चरित्रहीन व्यक्तित्व और नैतिक खोखलेपन पर एक तीखा प्रहार है। यहाँ ‘बैकबोन’ (रीढ़ की हड्डी) न होने का अर्थ केवल शारीरिक बनावट नहीं, बल्कि शंकर के स्वाभिमान और साहस का अभाव है। यह टिप्पणी स्पष्ट करती है कि जो युवक अपने जीवन के निर्णयों के लिए पूरी तरह दूसरों पर निर्भर है और जिसका आचरण अनैतिक है, वह समाज का आधार बनने के योग्य नहीं है। उमा ने इस एक वाक्य से ‘खरीददार’ बनकर आए पुरुषों के अहंकार को ध्वस्त कर दिया है।
विषयों से संवाद
तुलना और विचार
- “गोपालप्रसाद – भला पूछिए इन अक्ल के ठेकेदारों से कि क्या लड़कों की पढ़ाई और लड़कियों की पढ़ाई एक बात है।”
एकांकी में उन पंक्तियों को खोजिए जहाँ एकांकी के पात्रों के व्यवहार में लड़कियों तथा लड़कों के प्रति भिन्न-भिन्न दृष्टि अभिव्यक्त हुई है। अब यह भी लिखिए कि आप इस भिन्नता को किस प्रकार समझते हैं?
उत्तर – एकांकी में कई स्थानों पर लड़कों और लड़कियों के प्रति भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण दिखाई देता है –
गोपालप्रसाद का तर्क – “मर्दों का काम तो है ही पढ़ना और काबिल होना… मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं।”
शिक्षा पर पाबंदी – “हमें ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए। मेम साहब तो रखनी नहीं, कौन भुगतेगा उनके नखरों को।”
शंकर की छूट बनाम उमा की कैद – शंकर का मेडिकल कॉलेज में पढ़ना और लड़कियों के हॉस्टल के आसपास घूमना उसके पिता के लिए सामान्य है, लेकिन उमा का बी.ए. पास होना एक ‘अपराध’ की तरह छिपाया जाता है।
मेरी समझ और दृष्टि में यह भिन्नता समाज की पितृसत्तात्मक मानसिकता को दर्शाती है। यहाँ लड़के को ‘वंश’ और ‘अधिकार’ का प्रतीक माना गया है, जबकि लड़की को केवल एक ‘सेवा करने वाली वस्तु’ या ‘सजावटी सामान’ समझा गया है। यह सोच शिक्षा जैसे मौलिक अधिकार को भी लिंग के आधार पर बाँट देती है, जो समाज के संतुलित विकास में सबसे बड़ी बाधा है।
- “मुझे अपनी इज्जत, अपने मान का खयाल तो है। लेकिन इनसे पूछिए कि ये किस तरह अपना मुँह छिपाकर भागे थे।”
एकांकी में उमा अपने अधिकार और विचार खुलकर व्यक्त करती है। इससे उमा के व्यक्तित्व के विषय में क्या-क्या पता चलता है? आपके विचार से उसके व्यक्तित्व में ये विशेषताएँ कैसे आई होंगी?
(संकेत- शिक्षा, परिवार का व्यवहार आदि)
उत्तर – उमा के संवादों से उसके व्यक्तित्व के निम्नलिखित गुण स्पष्ट होते हैं –
साहसी और निर्भीक – वह गोपालप्रसाद जैसे प्रभावी व्यक्ति के सामने भी सच बोलने से नहीं डरती।
स्वाभिमानी – उसे अपनी शिक्षा और गरिमा पर गर्व है, वह खुद को ‘बेबस भेड़-बकरी’ नहीं मानती।
तार्किक – वह अपनी बात को बहुत ही सटीक उदाहरणों, जैसे- कुर्सी-मेज वाले उदाहरण से स्पष्ट करती है।
जागरूक – वह न केवल अपने अधिकारों के प्रति सजग है, बल्कि समाज में शंकर के चरित्र की बुराइयों को पहचानने की क्षमता रखती है।
उमा के व्यक्तित्व में ये विशेषताएँ शिक्षा, आत्म-अध्ययन, पिता का समर्थन आदि से आईं होंगी।
सृजन
एकांकी का विस्तार
“रतन – बाबूजी, मक्खन!
(सब रतन की तरफ देखते हैं और परदा गिरता है।)”
1.. एकांकी के अंत में रतन कहता है – “बाबूजी, मक्खन …” और परदा गिर जाता है। लेखक ने इस संवाद से एकांकी का अंत क्यों किया होगा?
(संकेत- हास्य, व्यंग्य, टिप्पणी आदि)
उत्तर – लेखक ने इस संवाद से एकांकी का अंत गहरा व्यंग्य, परिस्थिति का विरोधाभास, दिखावे की निरर्थकता और पाठकों पर प्रभाव डालने के लिए किया होगा। यह अंत पाठक को ठगा-सा छोड़ देता है, जिससे वह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि क्या सच में समाज में ‘मक्खन’ अर्थात् चापलूसी और दिखावा ही सब कुछ है?
- एकांकी में यदि परदा दोबारा उठ जाए तो अगला दृश्य क्या होगा? अनुमान लगाइए और लिखिए।
उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर करें।
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
मेरे शब्द
एकांकी में पाँच ऐसे शब्द चुनकर रेखांकित कर लीजिए जो आपके लिए बिल्कुल नए थे। उन शब्दों वाले वाक्य अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए। अब उन शब्दों के अर्थ अपने अनुमान से लिखिए। इसके बाद उनके अर्थ शब्दकोश में से देखकर लिखिए।
शब्द | एकांकी का वाक्य | अनुमानित अर्थ | शब्दकोश के अनुसार अर्थ |
1. अधेड़ | “जो महाशय नजर आते हैं वे अधेड़ उम्र के मालूम होते हैं।” | पुरानी उम्र | जिसकी आधी उम्र बीत चुकी हो (40-50 वर्ष)। |
2. तशरीफ़ | “हँ-हँ इधर तशरीफ़ लाइए, इधर।” | बैठना | उपस्थिति या पधारना (सम्मानजनक शब्द)। |
3. दकियानूसी | “गुस्सा तो मुझे बहुत आता है, इनके दकियानूसी ख्यालों पर।” | बेकार ख्याल | पुराने या पिछड़े विचारों वाला (Orthodox)। |
4. तकल्लुफ़ | “यह सब आप क्यों तकल्लुफ़ करते हैं?” | दिखावा | शिष्टाचार या औपचारिकता (Formality)। |
5. तालीम | “शादी का सवाल दूसरा है, तालीम का दूसरा।” | जानकारी | शिक्षा या प्रशिक्षण (Education)। |
भाषा में मुहावरे
एकांकी में से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। इन वाक्यों में जहाँ-जहाँ मुहावरे आए हैं, उन्हें पहचानकर रेखांकित कीजिए। इन मुहावरों का प्रयोग करते हुए नए वाक्य बनाकर लिखिए—
- “उनके पीछे-पीछे भीगी बिल्ली की तरह रतन आ रहा है— खाली हाथ।”
- “लेकिन वह तुम्हारी लाडली बेटी तो मुँह फुलाए पड़ी है।”
- “और तुम उसकी माँ, किस मर्ज की दवा हो?”
- “तुम्हीं ने उसे पढ़ा-लिखाकर इतना सिर चढ़ा रखा है।”
- “मगर तुम तो अभी से सब कुछ उगले देती हो।”
- “यह लीजिए, आप तो मुझे काँटों में घसीटने लगे।”
- “बाबू रामस्वरूप, आपने मेरी इज्जत उतारने के लिए मुझे यहाँ बुलाया था?”
- “लेकिन इनसे पूछिए कि ये किस तरह अपना मुँह छिपाकर भागे थे।”
उत्तर – भीगी बिल्ली की तरह – (डर कर रहना)
नया वाक्य – गलती पकड़े जाने पर छोटा भाई माँ के सामने भीगी बिल्ली बन गया।
मुँह फुलाना – (नाराज़ होना)
नया वाक्य – खिलौना न मिलने पर बच्चा सारा दिन मुँह फुलाए बैठा रहा।
किस मर्ज की दवा होना – (काम न आना/उपयोगिता न होना)
नया वाक्य – अगर तुम इस मुश्किल में मेरी मदद नहीं कर सकते, तो आखिर तुम किस मर्ज की दवा हो?
सिर चढ़ाना – (ज्यादा छूट देना)
नया वाक्य – रामू ने अपने इकलौते बेटे को बहुत सिर चढ़ा रखा है, इसलिए वह किसी की बात नहीं सुनता।
उगल देना – (राज खोल देना)
नया वाक्य – पुलिस की थोड़ी सी सख्ती पर चोर ने सारा सच उगल दिया।
काँटों में घसीटना – (मुसीबत में डालना या शर्मिंदा करना)
नया वाक्य – मेरी पुरानी गलतियों का जिक्र करके आप मुझे काँटों में क्यों घसीट रहे हैं?
इज्जत उतारना – (अपमानित करना)
नया वाक्य – भरी सभा में किसी की इज्जत उतारना अच्छी बात नहीं है।
मुँह छिपाकर भागना – (शर्मिंदा होकर भागना)
नया वाक्य – परीक्षा में नकल करते पकड़े जाने पर छात्र को वहाँ से मुँह छिपाकर भागना पड़ा।
संदर्भ में शब्द
“बाप सेर है तो लड़का सवा सेर।”
एकांकी में इस कहावत का प्रयोग रामस्वरूप द्वारा गोपालप्रसाद और शंकर की नकारात्मक प्रवृत्ति का उल्लेख करने के लिए किया गया है। लेकिन इस कहावत का प्रयोग सकारात्मक अर्थ में भी किया जा सकता है। अब आप इस नए प्रयोग से वाक्य बनाकर लिखिए।
उत्तर – कहावत – “बाप सेर है तो लड़का सवा सेर।”
सकारात्मक अर्थ – जब बेटा अपने पिता से भी अधिक गुणी, बुद्धिमान या कुशल निकले।
नया प्रयोग (वाक्य) –
“शास्त्री जी बहुत बड़े गणितज्ञ थे, लेकिन उनका बेटा तो गणित की गुत्थियाँ उनसे भी जल्दी सुलझा लेता है; सच ही कहा गया है कि बाप सेर है तो लड़का सवा सेर।”
गतिविधियाँ
आप भी संवाददाता
- मान लीजिए कि आप एक संवाददाता हैं और आपको उमा की कहानी का पता चलता है। अब आप उमा तथा अन्य पात्रों का साक्षात्कार लेकर उनका पक्ष दर्शकों के सामने प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर – संवाददाता – उमा, आपने समाज की बनी-बनाई रीतियों को चुनौती दी, आपको कैसा लग रहा है?
उमा – मुझे गर्व है। शिक्षा ने मुझे चुप रहना नहीं, बल्कि अपनी गरिमा के लिए लड़ना सिखाया है। लड़कियाँ कोई वस्तु नहीं हैं।
संवाददाता – गोपालप्रसाद जी, आप तो वकील हैं, फिर उमा की शिक्षा से आपको क्या समस्या थी?
गोपालप्रसाद – (गुस्से में) साहब, यह सभ्यता के खिलाफ है! औरतों का काम घर संभालना है, राजनीति और डिग्री झाड़ना नहीं।
संवाददाता – रामस्वरूप जी, आपने अपनी बेटी का सच क्यों छिपाया?
रामस्वरूप – समाज के डर से। मुझे डर था कि बी.ए. पास बेटी से कोई शादी नहीं करेगा। पर आज मुझे मेरी बेटी पर गर्व है।
- मान लीजिए कि आप उमा के घर से रिपोर्टिंग कर रहे हैं जब उसके घर में शंकर आया था। इस पूरे घटनाक्रम को जीवंत प्रसारण (लाइव रिपोर्ट) की तरह प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर – “नमस्कार, मैं हूँ अविनाश रंजन गुप्ता। इस वक्त मैं खड़ा हूँ बाबू रामस्वरूप के घर में, जहाँ अभी-अभी एक हाई-वोल्टेज ड्रामा खत्म हुआ है। मेरे पीछे आप देख सकते हैं, मेज पर चाय की ट्रे और नाश्ता वैसे ही पड़ा है। अभी कुछ मिनट पहले, उमा नाम की एक साहसी लड़की ने लड़के वालों के अहंकार को मिट्टी में मिला दिया।
लड़के वाले, जो खुद को बहुत रसूखदार समझ रहे थे, उमा की डिग्रियों और उसके तीखे सवालों के सामने टिक नहीं पाए। उमा ने न केवल अपनी पढ़ाई का सच बताया, बल्कि लड़के शंकर के पिछले कारनामों की पोल भी खोल दी। इस वक्त लड़के वाले गुस्से में यहाँ से जा चुके हैं और घर में एक अजीब सी खामोशी है, लेकिन यह खामोशी एक बड़े बदलाव की आहट है। उमा ने साबित कर दिया है कि वह समाज की ‘रीढ़ की हड्डी’ है।”
कैमरामैन रतन के साथ, मैं संवाददाता, न्यूज़ ओड़िशा के लिए।
कठिन शब्दों के सरल अर्थ
1 – अधेड़ – ढलती उम्र का (40-50 वर्ष) – Middle-aged
2 – तख्त – लकड़ी की बड़ी चौकी – Wooden plank/bedstead
3 – परमात्मा – ईश्वर/भगवान – Almighty/God
4 – अक्ल – बुद्धि – Wisdom/Intelligence
5 – कसरत – व्यायाम – Exercise
6 – कलसा – पानी का बड़ा पात्र/घड़ा – Large metal pot
7 – मेजपोश – मेज पर बिछाने वाला कपड़ा – Tablecloth
8 – झाड़न – धूल साफ करने का कपड़ा – Duster
9 – गुलदस्ता – फूलों का गुच्छा – Flower bouquet
10 – सहसा – अचानक – Suddenly
11 – गंदुमी – गेहुँआ रंग – Wheaties complexion
12 – व्यस्त – काम में लगा हुआ – Busy
13 – भीगी बिल्ली – डरपोक/सहमा हुआ – Coward/Terrified
14 – डाट – कान बंद करने वाली चीज़ – Plug/Stopper
15 – कोठरी – छोटा कमरा – Small room/Cell
16 – लाड़ली – प्यारी – Beloved/Darling
17 – मर्ज – बीमारी – Disease/Illness
18 – जतन – कोशिश/प्रयत्न – Effort/Attempt
19 – जंजाल – झंझट/मुसीबत – Mess/Complication
20 – सुबोधिनी – आसानी से समझ आने वाली – Easy to understand
21 – लच्छन (लक्षण) – तौर-तरीके/गुण – Characteristics/Traits
22 – अनोखे – विचित्र/अजीब – Unique/Strange
23 – ठिठोली – मजाक – Jest/Joke
24 – राह पर लाना – सुधारना – To bring on track
25 – टीम-टाम – बनाव-श्रृंगार – Show-off/Decoration
26 – नफरत – घृणा – Hatred
27 – कारोबार – व्यापार – Business
28 – जिक्र – चर्चा/बातचीत – Mention/Discussion
29 – काबू – नियंत्रण – Control
30 – उगलना – राज बता देना – To spill/reveal
31 – चूँ – विरोध की आवाज – Whimper/Complaint
32 – दकियानूसी – पुराने ख्यालों वाला – Orthodox/Old-fashioned
33 – तालीम – शिक्षा – Education
34 – मजबूरी – विवशता – Compulsion
35 – कोरी सुनाना – खरी-खरी सुनाना – To speak bluntly
36 – चौपट – नष्ट/बर्बाद – Ruined
37 – कम्बख्त – अभागा/बुरा – Wretched/Unfortunate
38 – दस्तक – दरवाजा खटखटाना – Knocking
39 – चतुराई – होशियारी – Cleverness/Shrewdness
40 – फितरती – चालाक/स्वभाव से – Cunning/By nature
41 – खिसियाहट – शर्मिंदगी/चिड़चिड़ापन – Embarrassment/Irritation
42 – खासियत – विशेषता – Speciality/Trait
43 – तशरीफ – उपस्थिति/स्वयं – Presence/Honor (to be)
44 – मेहरबानी – कृपा – Kindness/Favor
45 – तकल्लुफ – औपचारिकता – Formality
46 – हैसियत – सामर्थ्य/औकात – Status/Capacity
47 – खँखारना – गला साफ करना – To clear throat
48 – मार्जिन – अंतर/गुंजाइश – Margin/Gap
49 – सताना – परेशान करना – To torture/trouble
50 – हजम – पचाना – Digestion
51 – बहुतेरे – बहुत से – Many/Numerous
52 – मजाल – साहस/हिम्मत – Audacity/Daring
53 – फर्राटे की – बहुत तेज/प्रवाहपूर्ण – Fluent/Fast
54 – जब्त करना – काबू पाना/रोकना – To control/restrain
55 – रंगीन – खुशमिजाज/चमकदार – Colourful/Vibrant
56 – तकदीर – भाग्य – Luck/Fate
57 – काबिल – योग्य – Capable/Competent
58 – जायका – स्वाद – Taste/Flavour
59 – आमदनी – कमाई – Income
60 – बेढब – भद्दा/अजीब – Awkward/Clumsy
61 – तश्तरी – छोटी प्लेट – Saucer/Small plate
62 – मुखातिब – संबोधित होना – Addressing
63 – निहायत – अत्यंत – Extremely
64 – राजी – सहमत – Agreed
65 – रस्म – प्रथा – Ceremony/Custom
66 – अहसान – उपकार – Favor/Obligation
67 – जायचा – जन्मकुंडली – Horoscope
68 – भनक पड़ना – सुनाई देना (उड़ती खबर) – To get wind of/hint
69 – ग्रेजुएट – स्नातक – Graduate
70 – गृहस्थी – घर-परिवार – Household
71 – अर्ज़ करना – निवेदन करना – To request/state
72 – सकपकाना – घबरा जाना – To be startled/confused
73 – झेंपना – शरमाना/लजाना – To feel shy/embarrassed
74 – खरीदार – ग्राहक – Buyer/Customer
75 – ताव में आना – जोश या गुस्से में आना – To get enraged
76 – बेइज्जती – अपमान – Insult/Humiliation
77 – इर्द-गिर्द – चारों ओर – Around/Surrounding
78 – कायरता – डरपोकपन – Cowardice
79 – दगा – धोखा – Deceit/Betrayal
80 – रुआँसा – रोने जैसा चेहरा – Tearful/On the verge of crying
81 – सिसकियाँ – रोने की दबी आवाज – Sobbing
82 – तब्दील – बदलना – Transformed/Changed
83 – अधर्म – पाप – Sin/Impiety
84 – मर्यादा – सीमा/इज्जत – Dignity/Limit
85 – ढोंग – पाखंड – Hypocrisy
86 – जहालत – अज्ञानता – Ignorance
87 – वजूद – अस्तित्व – Existence
88 – मिसाल – उदाहरण – Example
89 – नखरे – चोंचले – Tantrums
90 – मुआयना – निरीक्षण – Inspection
91 – तालीम – शिक्षण – Training/Education
92 – शिष्टाचार – अच्छा व्यवहार – Etiquette
93 – नुमाइश – प्रदर्शनी – Exhibition/Show
94 – जलील – अपमानित – Humiliated/Degraded
95 – बेबस – लाचार – Helpless
96 – कसाई – पशु काटने वाला – Butcher
97 – धौंस – धमकी – Threat/Bullying
98 – रजामंदी – सहमति – Consent
99 – दकियानूस – लकीर का फकीर – Conservative
100 – बैकबोन – रीढ़ की हड्डी – Backbone
101 – खामोश – शांत – Silent
102 – हिदायत – निर्देश – Instruction
103 – अक्ल के ठेकेदार – खुद को समझदार मानने वाले – Self-proclaimed wise
104 – रुखी – कठोर – Harsh/Blunt
105 – बेढंगी – बेतरतीब – Awkward/Clumsy
106 – मलाई – क्रीम – Cream
107 – लोटों की तरह – बहुत अधिक – In huge quantity
108 – पाउंडर (पाउडर) – सौंदर्य प्रसाधन – Face powder
109 – टीम-टाम – दिखावा – Pomp/Show
110 – ऊँची तालीम – उच्च शिक्षा – Higher Education
111 – मार्जिन – गुंजाइश – Margin
112 – फर्राटे – तेजी से – Fluently
113 – ठिठोली – मजाक – Joking
114 – मुँह फुलाना – नाराज होना – To sulk
115 – भीगी बिल्ली – डरा हुआ – Like a scared cat
116 – चौपट – खत्म – Ruined
117 – सादगी – सरलता – Simplicity
118 – बेबसी – लाचारी – Helplessness
119 – सकपकाना – हिचकिचाना – To hesitate/fumble
120 – बिजीनेस – व्यापार – Business
121 – तशरीफ लाना – पधारना – To grace with presence
122 – खीस निपोरना/खीस निकालना – इस तरह हँसना कि दाँत दिखाई दें, बेढंगी हँसी हँसना

