पाठ का सारांश
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित कविता ‘स्वर्ग बना सकते हैं’ उनके प्रसिद्ध महाकाव्य ‘कुरुक्षेत्र’ का अंश है। इसमें भीष्म पितामह युधिष्ठिर को शांति और समानता का संदेश दे रहे हैं।
प्रथम पद्यांश (First Stanza)
धर्मराज यह भूमि किसी की नहीं, क्रीत है दासी,
हैं जन्मना – समान परस्पर इसके सभी निवासी।
सबको मुक्त प्रकाश चाहिए, सबको मुक्त समीरण,
बाधा रहित विकास, मुक्त आशंकाओं से जीवन।
भावार्थ –
भीष्म पितामह धर्मराज युधिष्ठिर को समझाते हुए कहते हैं कि यह धरती किसी की खरीदी हुई दासी नहीं है। यहाँ रहने वाले सभी मनुष्य जन्म से एक समान हैं। प्रकृति पर सबका बराबर अधिकार है। हर मनुष्य को जीने के लिए खुला आकाश, प्रकाश, ताज़ी हवा और बिना किसी रुकावट के विकास करने का अवसर मिलना चाहिए। उनका जीवन डर और आशंकाओं से मुक्त होना चाहिए।
द्वितीय पद्यांश (Second Stanza)
लेकिन विघ्न अनेक अभी इस पथ पर पड़े हुए हैं,
मानवता की राह रोककर पर्वत अड़े हुए हैं।
न्यायोचित सुख सुलभ नहीं जब तक मानव-मानव को,
चैन कहाँ धरती पर तब तक शांति कहाँ इस भव को?
भावार्थ –
दिनकर जी कहते हैं कि समानता के इस मार्ग पर अभी बहुत सी बाधाएँ हैं। समाज में व्याप्त भेदभाव और स्वार्थ मानवता के रास्ते में पहाड़ बनकर खड़े हैं। जब तक हर मनुष्य को उसका ‘न्यायोचित’ अर्थात् न्याय के अनुसार उचित सुख प्राप्त नहीं होगा, तब तक इस धरती पर न तो चैन होगा और न ही इस संसार में शांति स्थापित हो पाएगी।
तृतीय पद्यांश (Third Stanza)
जब तक मनुज-मनुज का यह सुख-भाग नहीं सम होगा,
शमित न होगा कोलाहल संघर्ष नहीं कम होगा।
उसे भूल वह फँसा परस्पर ही, शंका में, भय में,
लगा हुआ केवल अपने में और भोग-संचय में।
भावार्थ –
जब तक समाज में सुख के संसाधनों का बँटवारा सभी मनुष्यों के बीच समान नहीं होगा, तब तक संसार का अशांति रूपी शोर शांत नहीं होगा और न ही मनुष्यों के बीच का आपसी संघर्ष कम होगा। विडंबना यह है कि मनुष्य इस सत्य को भूलकर आपसी शक, डर और केवल अपने लिए धन-संपत्ति जुटाने के स्वार्थ में लगा हुआ है।
चतुर्थ पद्यांश (Fourth Stanza)
प्रभु के दिए हुए सुख इतने हैं विकीर्ण धरती पर,
भोग सकें जो उन्हें, जगत में कहाँ अभी इतने नर?
सब हो सकते तुष्ट, एक सा सब सुख पा सकते हैं,
चाहें तो पल में धरती को स्वर्ग बना सकते हैं।
भावार्थ –
कवि कहते हैं कि ईश्वर ने इस धरती पर सुख के इतने साधन बिखेर रखे हैं कि यदि सब मिल-बाँटकर उपयोग करें, तो भी वे कम नहीं पड़ेंगे। धरती पर अभी इतने मनुष्य नहीं हैं जितने संसाधन उपलब्ध हैं। यदि मनुष्य लालच छोड़ दे, तो संसार के सभी लोग संतुष्ट हो सकते हैं और सबको एक समान सुख मिल सकता है। यदि हम सब समानता और भाईचारे से रहें, तो हम इसी धरती को एक पल में ‘स्वर्ग’ बना सकते हैं।
कठिन शब्दार्थ
1 – धर्मराज – युधिष्ठिर का एक नाम (धर्म के रक्षक) – King of Justice (Yudhishthira)
2 – क्रीत – खरीदी हुई – Purchased / Bought
3 – दासी – सेविका / नौकरानी – Slave / Maid-servant
4 – जन्मना – जन्म से – By birth
5 – परस्पर – आपस में / एक-दूसरे के साथ – Mutually / Each other
6 – मुक्त – स्वतंत्र / खुला – Free / Unrestricted
7 – समीरण – हवा / पवन – Air / Breeze
8 – विघ्न – बाधा / रुकावट – Obstacles / Hurdles
9 – न्यायोचित – न्याय के अनुसार उचित – Justified / Equitable
10 – सुलभ – आसानी से मिलने वाला – Easily available
11 – भव – संसार / दुनिया – World / Universe
12 – मनुज – मनुष्य / मानव – Human / Man
13 – सम – समान / बराबर – Equal / Balanced
14 – शमित – शांत होना / दबा हुआ – Suppressed / Quieted
15 – कोलाहल – शोर-शराबा – Noise / Tumult
16 – शंका – शक / संदेह – Doubt / Suspicion
17 – भोग-संचय – सुख की वस्तुओं को इकट्ठा करना – Accumulation of luxuries
18 – विकीर्ण – फैला हुआ / बिखरा हुआ – Scattered / Spread
19 – जगत – संसार – World
20 – तुष्ट – संतुष्ट / प्रसन्न – Satisfied / Content
मौखिक – 1. उच्चारण कीजिए –
धर्मराज, क्रीत, जन्मना, परस्पर, मुक्त, प्रकाश, आशंकाओं, विघ्न, पर्वत, न्यायोचित, कोलाहल, संघर्ष, फँसा, संचय, प्रभु, विकीर्ण, तुष्ट
धर्मराज – Dharm-raaj
पर्वत – Par-vat
क्रीत – Kreet
न्यायोचित – Nyaa-yo-chit
जन्मना – Jan-ma-naa
कोलाहल – Ko-laa-hal
परस्पर – Pa-ras-par
संघर्ष – San-gharsh
मुक्त – Mukt
फँसा – Phan-saa (नाक से गूँज)
प्रकाश – Pra-kaash
संचय – San-chay
आशंकाओं – Aa-shan-kaa-on
प्रभु – Prab-hu
विघ्न – Vigh-na
विकीर्ण – Vi-keern
तुष्ट – Tusht
- निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर बताइए-
(क) विकास के मार्ग में कौन-कौन से विघ्न हैं?
उत्तर – विकास के मार्ग में स्वार्थ, ईर्ष्या, आपसी भेदभाव, शंका और भय जैसे अनेक विघ्न हैं, जो पर्वत की तरह मानवता का रास्ता रोके हुए हैं।
(ख) संसार में प्रत्येक व्यक्ति क्या चाहता है?
उत्तर – संसार में प्रत्येक व्यक्ति मुक्त प्रकाश, ताजी हवा (समीरण), बाधा रहित विकास और आशंकाओं से मुक्त जीवन चाहता है।
(ग) कवि के अनुसार धरती पर शांति के लिए क्या-क्या आवश्यक है?
उत्तर – धरती पर शांति के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक मानव को उसका न्यायोचित सुख प्राप्त हो और संसाधनों का बँवारा सभी मनुष्यों में समान रूप से हो।
लिखित
1. सही उत्तर पर ✓ लगाइए–
(क) पर्वत कहाँ अड़े हुए हैं?
उत्तर – (iii) मानवता की राह में ✓
(ख) जीवन का कोलाहल और संघर्ष कब कम होगा?
उत्तर – (iv) सभी मनुष्यों का सुख-भाग समान होने पर ✓
- निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
(क) क्रीत दासी किसे कहा गया है और क्यों?
उत्तर – कविता में भूमि (धरती) को क्रीत दासी न होने की बात कही गई है। इसका अर्थ है कि यह धरती किसी के द्वारा खरीदी हुई दासी नहीं है; इस पर सभी मनुष्यों का जन्मजात समान अधिकार है।
(ख) कविता में मनुष्य के संघर्ष करने का क्या-क्या कारण बताया है?
उत्तर – मनुष्य के संघर्ष का मुख्य कारण सुख के संसाधनों का असमान वितरण है। जब तक कुछ लोग ‘भोग-संचय’ अर्थात् लालच में लगे रहेंगे और दूसरों को उनके हिस्से का न्यायोचित सुख नहीं मिलेगा, तब तक संघर्ष कम नहीं होगा।
(ग) भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को ‘धर्मराज’ क्यों कहा?
उत्तर – युधिष्ठिर सदैव धर्म और न्याय के मार्ग पर चलते थे, इसलिए उन्हें ‘धर्मराज’ कहा गया। मेरे विचार से, भीष्म उन्हें यह याद दिलाना चाहते थे कि एक राजा (धर्मराज) का परम कर्तव्य समाज में न्याय और समानता स्थापित करना है।
जीवन मूल्यपरक प्रश्न
- कविता के अनुसार पृथ्वी का कोलाहल कब शांत हो सकेगा?
उत्तर – जब समाज में मनुष्य-मनुष्य के बीच सुख का भाग समान होगा और स्वार्थ की भावना समाप्त होगी, तब कोलाहल शांत हो सकेगा।
- धरती को स्वर्ग बनाने के लिए मनुष्य क्या-क्या कर सकता है?
उत्तर – मनुष्य लालच छोड़कर, संसाधनों को मिल-बाँटकर उपयोग करके और सभी के प्रति प्रेम व समानता का भाव रखकर धरती को स्वर्ग बना सकता है।
भाषा ज्ञान
- सही उत्तर पर सही का निशान लगाइए-
(क) ‘सुख-भाग’ का समास विग्रह क्या होगा?
(i) सुख के लिए भाग
(ii) सुख में भाग
(iii) सुख से भाग
(iv) सुख का भाग ✓
(ख) किस शब्द में ‘र’ के (नीचे पदेन) रूप का प्रयोग नहीं होगा?
(i) क्रीत
(ii) संघ्रष ✓
(iii) प्रभु
(iv) प्रकाश
- सही भाववाचक संज्ञा चुनकर रिक्त स्थान में भरिए-
विघ्न, आशंकाओं, बाधाओं, सुख, शांति
(क) राह में आई बाधाओं का सामना करके आगे बढ़ो।
(ख) सभी का जीवन आशंकाओं से मुक्त होना चाहिए।
(ग) मार्ग के विघ्न बाधाओं से घबराना नहीं चाहिए।
(घ) गुरु जी के प्रवचन आरंभ करते ही हॉल में शांति छा गई।
(ङ) संसार में सभी का सुख पर समान अधिकार है।
- सही भाववाचक संज्ञा चुनकर रिक्त स्थान में भरिए-
विघ्न, आशंकाओं, बाधाओं, सुख, शांति
(क) समीर – अनल (x) (अनल का अर्थ आग है)
(ख) स्वतंत्र – स्वराज्य (x)
(ग) बाधा – भूगोल (x)
(घ) भव – अवरोध (x)
- निम्नलिखित शब्दों के समानार्थक शब्द कविता से चुनकर लिखिए-
(क) पृथ्वी – भूमि
(ख) आज़ाद – मुक्त
(ग) बाधा – विघ्न
(घ) प्रसन्न – तुष्ट
(ङ) मनुष्य – मनुज / मानव / नर
(च) संसार – भव / जगत
रोचक क्रियाकलाप
- सोचकर लिखिए कि भीष्म पितामह का उपदेश सुनकर यदि युधिष्ठिर दुर्योधन से बात करते तो उससे क्या कहते?
उत्तर – युधिष्ठिर दुर्योधन से कहते— “भाई दुर्योधन, यह धरती किसी की खरीदी हुई दासी नहीं है। ईश्वर ने यहाँ असीम सुख बिखेरे हैं। यदि हम मोह और लालच छोड़कर न्याय के साथ संसाधनों को बाँट लें, तो युद्ध की आवश्यकता नहीं होगी और प्रजा भी सुखी रहेगी।”
- यदि आपका मित्र आपसे आपकी प्रिय वस्तु छीनने का प्रयास करे तो आप क्या करेंगे और क्यों? इसे आधार बनाकर एक अनुच्छेद लिखिए।
उत्तर – यदि मेरा कोई प्रिय मित्र मुझसे मेरी पसंदीदा वस्तु छीनने का प्रयास करता है, तो मेरी पहली प्रतिक्रिया क्रोध या झगड़ा करने की नहीं होगी। मैं शांत रहकर उसे समझाने का प्रयास करूँगा कि छीनने और माँगने में बहुत बड़ा अंतर होता है। मित्रता का आधार विश्वास और सम्मान होता है, बल-प्रयोग नहीं। मैं उससे पूछूँगा कि उसे वह वस्तु क्यों चाहिए? यदि उसे उसकी वास्तव में आवश्यकता है, तो मैं खुशी-खुशी उसे वह वस्तु दे दूँगा या उसे साझा (share) करूँगा। किंतु, यदि उसका उद्देश्य केवल मुझे परेशान करना या अपना प्रभुत्व दिखाना है, तो मैं दृढ़ता से उसे मना करूँगा। ऐसा करना इसलिए आवश्यक है ताकि हमारी मित्रता में समानता और मर्यादा बनी रहे। सच्ची मित्रता छीनने से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की भावनाओं को समझने से और मिल-बाँटकर खुश रहने से मजबूत होती है। ‘स्वर्ग बना सकते हैं’ कविता भी हमें यही सिखाती है कि परस्पर सहयोग और समानता से ही सुख बढ़ता है।
- समय निकालकर ‘महाभारत’ की कथा पढ़िए।
उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर करें।
गृहकार्य
- कक्षा में यदि कोई साथी आपके साथ क्रोध में दुर्व्यवहार करता है तो आप उसका क्रोध शांत करने के लिए जो करेंगे उसे आधार बनाकर एक अनुच्छेद लिखिए।
उत्तर – यदि कक्षा में कोई साथी मेरे साथ क्रोध में दुर्व्यवहार करता है, तो मैं तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय धैर्य और शांतिसे काम लूँगा। मैं जानता हूँ कि क्रोध का उत्तर क्रोध से देने पर स्थिति और अधिक बिगड़ सकती है। सबसे पहले, मैं उसे शांति से बोलने के लिए कहूँगा और उसके गुस्से का कारण जानने का प्रयास करूँगा। यदि उसकी कोई गलतफहमी होगी, तो मैं उसे दूर करूँगा। यदि उस समय वह सुनने की स्थिति में नहीं होगा, तो मैं वहाँ से चुपचाप हट जाऊँगा ताकि माहौल और अधिक गर्म न हो। बाद में, जब उसका मन शांत होगा, तब मैं उससे बात करूँगा। मेरा उद्देश्य झगड़ा करना नहीं, बल्कि समानता और भाईचारे से समस्या का समाधान निकालना होगा, जैसा कि हमने ‘स्वर्ग बना सकते हैं’ कविता में सीखा है।
- अपनी दादी माँ/नानी माँ को पत्र लिखकर बताइए कि आपने इस कविता को पढ़कर क्या सीखा?
उत्तर – दिनांक – 13 जुलाई , 20XX
घर संख्या – W – 414 टीसीआई
राउरकेला, ओड़िशा
आदरणीय दादी माँ / नानी माँ,
(सादर चरण स्पर्श)
आशा है कि आप घर पर स्वस्थ और सानंद होंगी। हम सब भी यहाँ कुशलता से हैं।
आज मैंने अपनी हिंदी की कक्षा में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की एक बहुत ही सुंदर कविता पढ़ी, जिसका शीर्षक है— ‘स्वर्ग बना सकते हैं’। इस कविता को पढ़कर मैंने जो कुछ सीखा, वह मैं आपको पत्र के माध्यम से बताना चाहता हूँ।
दादी माँ, इस कविता में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को उपदेश देते हुए कहते हैं कि यह धरती किसी की खरीदी हुई दासी नहीं है, बल्कि यहाँ रहने वाले सभी मनुष्य जन्म से एक समान हैं। मैंने सीखा कि भगवान ने इस धरती पर सुख के इतने साधन दिए हैं कि यदि हम लालच और स्वार्थ को त्याग दें, तो हर व्यक्ति सुखी हो सकता है।
सबसे बड़ी बात जो मुझे समझ आई, वह यह है कि जब तक हम आपस में भेदभाव करेंगे और एक-दूसरे के हक को छीनने की कोशिश करेंगे, तब तक दुनिया में शांति नहीं हो सकती। यदि हम मिल-बाँटकर रहें और सबको समान अधिकार दें, तो हम इसी धरती को ‘स्वर्ग’ जैसा सुंदर बना सकते हैं।
आप भी तो हमेशा यही कहती हैं कि मिल-जुलकर रहने में ही सुख है। आज कविता पढ़कर आपकी बातें और भी स्पष्ट हो गईं। मैं भी अब अपने जीवन में इसी समानता और भाईचारे के मार्ग पर चलने की कोशिश करूँगा।
दादा जी/नाना जी को मेरा प्रणाम कहिएगा। आपके पत्र के इंतज़ार में।
आपका लाड़ला पोता/नवासा
अवि

