गूँगे – रांगेय राघव
‘शकुंतला क्या नहीं जानती?’
‘कौन? शकुंतला! कुछ नहीं जानती!’
‘क्यों साहब? क्या नहीं जानती? ऐसा क्या काम है जो वह नहीं कर सकती?’
‘वह उस गूँगे को नहीं बुला सकती।’
‘अच्छा, बुला दिया तो?’
‘बुला दिया?’
बालिका ने एक बार कहनेवाली की ओर द्वेष से देखा और चिल्ला उठी, दूँदे!
गूँगे ने नहीं सुना। तमाम स्त्रियाँ खिलखिलाकर हँस पड़ीं। बालिका ने मुँह छिपा लिया।
जन्म से वज्र बहरा होने के कारण वह गूँगा है। उसने अपने कानों पर हाथ रखकर इशारा किया। सब लोगों को उसमें दिलचस्पी पैदा हो गई, जैसे तोते को राम—राम कहते सुनकर उसके प्रति हृदय में एक आनंद—मिश्रित कुतूहल उत्पन्न हो जाता है।
चमेली ने अंगुलियों से इंगित किया – फिर?
मुँह के आगे इशारा करके गूँगे ने बताया – भाग गई। कौन? फिर समझ में आया। जब छोटा ही था, तब ‘माँ’ जो घूँघट काढ़ती थी, छोड़ गई, क्योंकि ‘बाप’, अर्थात् बड़ी—बड़ी मूँछें, मर गया था। और फिर उसे पाला है – किसने? यह तो समझ में नहीं आया, पर वे लोग मारते बहुत हैं।
करुणा ने सबको घेर लिया। वह बोलने की कितनी ज़बर्दस्त कोशिश करता है। लेकिन नतीजा कुछ नहीं, केवल कर्कश काँय—काँय का ढेर! अस्फुट ध्वनियों का वमन, जैसे आदिम मानव अभी भाषा बनाने में जी—जान से लड़ रहा हो।
चमेली ने पहली बार अनुभव किया कि यदि गले में काकल तनिक ठीक नहीं हो तो मनुष्य क्या से क्या हो जाता है। कैसी यातना है कि वह अपने हृदय को उगल देना चाहता है, किंतु उगल नहीं पाता।
सुशीला ने आगे बढ़कर इशारा किया – ‘मुँह खोलो!’ और गूँगे ने मुँह खोल दिया – लेकिन उसमें कुछ दिखाई नहीं दिया। पूछा – ‘गले में कौआ है?’ गूँगा समझ गया। इशारे से ही बता दिया – ‘किसी ने बचपन में गला साफ़ करने की कोशिश में काट दिया’ और वह ऐसे बोलता है जैसे घायल पशु कराह उठता है, शिकायत करता है, जैसे कुत्ता चिल्ला रहा हो और कभी—कभी उसके स्वर में ज्वालामुखी के विस्फोट की—सी भयानकता थपेड़े मार उठती है। वह जानता है कि वह सुन नहीं सकता। और बता—बताकर मुसकराता है। वह जानता है कि उसकी बोली को कोई नहीं समझता फिर भी बोलता है।
सुशीला ने कहा – इशारे गज़ब के करता है। अकल बहुत तेज़ है। पूछा – ‘खाता क्या है, कहाँ से मिलता है?’
वह कहानी ऐसी है, जिसे सुनकर सब स्तब्ध बैठे हैं। हलवाई के यहाँ रात—भर लड्डू बनाए हैं, कड़ाही माँजी है, नौकरी की है, कपड़े धोए हैं, सबके इशारे हैं लेकिन – गूँगे का स्वर चीत्कार में परिणत हो गया। सीने पर हाथ मारकर इशारा किया – ‘हाथ फैलाकर कभी नहीं माँगा, भीख नहीं लेता’, भुजाओं पर हाथ रखकर इशारा किया – ‘मेहनत का खाता हूँ’ और पेट बजाकर दिखाया ‘इसके लिए, इसके लिए…’
अनाथाश्रम के बच्चों को देखकर चमेली रोती थी। आज भी उसकी आँखों में पानी आ गया। यह सदा से ही कोमल है। सुशीला से बोली – ‘इसे नौकर भी तो नहीं रखा जा सकता।’
पर गूँगा उस समय समझ रहा था। वह दूध ले आता है। कच्चा मँगाना हो, तो थन काढ़ने का इशारा कीजिए; औंटा हुआ मँगवाना हो, तो हलवाई जैसे एक बर्तनरांगेय राघव से दूध दूसरे बर्तन में उठाकर डालता है, वैसी बात कहिए। साग मँगवाना हो, तो गोल—गोल कीजिए या लंबी उँगली दिखाकर समझाइए, और भी… और भी…
और चमेली ने इशारा किया – ‘हमारे यहाँ रहेगा?’
गूँगे ने स्वीकार तो किया, किंतु हाथ से इशारा किया – ‘क्या देगी? खाना?’
‘हाँ, कुछ पैसे’ – चमेली ने सिर हिलाया। चार उँगलियाँ दिखा दीं। गूँगे ने सीने पर हाथ मारकर जैसे कहा – तैयार हैं। चार रुपये।
सुशीला ने कहा – ‘पछताओगी। भला यह क्या काम करेगा?’
‘मुझे तो दया आती है बेचारे पर’, चमेली ने उत्तर दिया – ‘न ही, बच्चों की तबीयत बहलेगी।’
घर पर बुआ मारती थी, फूफा मारता था, क्योंकि उन्होंने उसे पाला था। वे चाहते थे कि बाज़ार में पल्लेदारी करे, बारह—चौदह आने कमाकर लाए और उन्हें दे दे, बदले में वे उसके सामने बाजरे और चने की रोटियाँ डाल दें। अब गूँगा घर भी नहीं जाता। यहीं काम करता है। बच्चे चिढ़ाते हैं। कभी नाराज़ नहीं होता। चमेली के पति सीधे—सादे आदमी हैं। पल जाएगा बेचारा, किंतु वे जानते हैं कि मनुष्य की करुणा की भावना उसके भीतर गूँगेपन की प्रतिच्छाया है, वह बहुत कुछ करना चाहता है, किंतु कर नहीं पाता। इस तरह दिन बीत रहे हैं।
चमेली ने पुकारा – ‘गूँगे।’
किंतु कोई उत्तर नहीं आया, उठकर ढूँढ़ा – ‘कुछ पता नहीं लगा।’
बसंता ने कहा – ‘मुझे तो कुछ नहीं मालूम।’
‘भाग गया होगा’, पति का उदासीन स्वर सुनाई दिया। सचमुच वह भाग गया था। कुछ भी समझ में नहीं आया। चुपचाप जाकर खाना पकाने लगी। क्यों भाग गया? नाली का कीड़ा! ‘एक छत उठाकर सिर पर रख दी’ फिर भी मन नहीं भरा। दुनिया हँसती है, हमारे घर को अब अजायबघर का नाम मिल गया है…किसलिए…
जब बच्चे और वह भी खाकर उठ गए तो चमेली बची रोटियाँ कटोरदान में रखकर उठने लगी। एकाएक द्वार पर कोई छाया हिल उठी। वह गूँगा था। हाथ से इशारा किया – ‘भूखा हूँ।’
‘काम तो करता नहीं, भिखारी।’ फेंक दी उसकी ओर रोटियाँ। रोष से पीठ मोड़कर खड़ी हो गई। किंतु गूँगा खड़ा रहा। रोटियाँ छुईं तक नहीं। देर तक दोनों चुप रहे। फिर न जाने क्यों, गूँगे ने रोटियाँ उठा लीं और खाने लगा। चमेली ने गिलासों में दूध भर दिया। देखा, गूँगा खा चुका है। उठी और हाथ में चिमटा लेकर उसके पास खड़ी हो गई।
‘कहाँ गया था?’ चमेली ने कठोर स्वर से पूछा।
कोई उत्तर नहीं मिला। अपराधी की भाँति सिर झुक गया। सड़ से एक चिमटा उसकी पीठ पर जड़ दिया। किंतु गूँगा रोया नहीं। वह अपने अपराध को जानता था। चमेली की आँखों से ज़मीन पर आँसू टपक गया। तब गूँगा भी रो दिया।
और फिर यह भी होने लगा कि गूँगा जब चाहे भाग जाता, फिर लौट आता। उसे जगह—जगह नौकरी करके भाग जाने की आदत पड़ गई थी और चमेली सोचती कि उसने उस दिन भीख ली थी या ममता की ठोकर को निस्संकोच स्वीकार कर लिया था।
बसंता ने कसकर गूँगे को चपत जड़ दी। गूँगे का हाथ उठा और न जाने क्यों अपने—आप रुक गया। उसकी आँखों में पानी भर आया और वह रोने लगा। उसका रुदन इतना कर्कश था कि चमेली को चूल्हा छोड़कर आना पड़ा। गूँगा उसे देखकर इशारों से कुछ समझाने लगा। देर तक चमेली उससे पूछती रही। उसकी समझ में इतना ही आया कि खेलते—खेलते बसंता ने उसे मार दिया था।
बसंता ने कहा – ‘अम्मा! यह मुझे मारना चाहता था।’
‘क्यों रे?’ चमेली ने गूँगे की ओर देखकर कहा। वह इस समय भी नहीं भूली थी कि गूँगा कुछ सुन नहीं सकता। लेकिन गूँगा भाव—भंगिमा से समझ गया। उसने चमेली का हाथ पकड़ लिया। एक क्षण को चमेली को लगा, जैसे उसी के पुत्र ने आज उसका हाथ पकड़ लिया था। एकाएक घृणा से उसने हाथ छुड़ा लिया। पुत्र के प्रति मंगल—कामना ने उसे ऐसा करने को मजबूर कर दिया।
कहीं उसका भी बेटा गूँगा होता तो वह भी ऐसे ही दुख उठाता! वह कुछ भी नहीं सोच सकी। एक बार फिर गूँगे के प्रति हृदय में ममता भर आई। वह लौटकररांगेय राघव चूल्हे पर जा बैठी, जिसमें अंदर आग थी, लेकिन उसी आग से वह सब पक रहा था जिससे सबसे भयानक आग बुझती है – पेट की आग, जिसके कारण आदमी गुलाम हो जाता है। उसे अनुभव हुआ कि गूँगे में बसंता से कहीं अधिक शारीरिक बल था। कभी भी गूँगे की भाँति शक्ति से बसंता ने उसका हाथ नहीं पकड़ा था। लेकिन फिर भी गूँगे ने अपना उठा हाथ बसंता पर नहीं चलाया।
रोटी जल रही थी। झट से पलट दी। वह पक रही थी, इसी से बसंता बसंताहै…गूँगा गूँगा है…
चमेली को विस्मय हुआ। गूँगा शायद यह समझता है कि बसंता मालिक का बेटा है, उस पर वह हाथ नहीं लगा सकता। मन—ही—मन थोड़ा विक्षोभ भी हुआ, किंतु पुत्र की ममता ने इस विषय पर चादर डाल दी और फिर याद आया कि उसने उसका हाथ पकड़ा था। शायद इसीलिए कि उसे बसंता को दंड देना ही चाहिए, यह उसको अधिकार है…।
किंतु वह तब समझ नहीं सकी, और उसने सुना कि गूँगा कभी—कभी कराह उठता था। चमेली उठकर बाहर गई। कुछ सोचकर रसोई में लौट आई और रात की बासी रोटी लेकर निकली।
‘गूँगे!’ उसने पुकारा।
कान के न जाने किस पर्दे में कोई चेतना है कि गूँगा उसकी आवाज़ को कभी अनसुना नहीं कर सकता, वह आया। उसकी आँखों में पानी भरा था। जैसे उनमें एक शिकायत थी, पक्षपात के प्रति तिरस्कार था। चमेली को लगा कि लड़का बहुत तेज़ है। बरबस ही उसके होंठों पर मुस्कान छा गई। कहा – ‘ले खा ले।’ – और हाथ बढ़ा दिया।
गूँगा इस स्वर की, इस सबकी उपेक्षा नहीं कर सकता। वह हँस पड़ा। अगर उसका रोना एक अजीब दर्दनाक आवाज़ थी तो यह हँसना और कुछ नहीं – एक अचानक गुर्राहट—सी चमेली के कानों में बज उठी। उस अमानवीय स्वर को सुनकर वह भीतर—ही—भीतर काँप उठी। यह उसने क्या किया था? उसने एक पशु पाला था। जिसके हृदय में मनुष्यों की—सी वेदना थी।
घृणा से विक्षुब्ध होकर चमेली ने कहा – ‘क्यों रे, तूने चोरी की है?’ गूँगा चुप हो गया। उसने अपना सिर झुका लिया। चमेली एक बार क्रोध से काँप उठी, देर तक उसकी ओर घूरती रही। सोचा – मारने से यह ठीक नहीं हो सकता। अपराध को स्वीकार करा दंड न देना ही शायद कुछ असर करे और फिर कौन मेरा अपना है। रहना हो तो ठीक से रहे, नहीं तो फिर जाकर सड़क पर कुत्तों की तरह जूठन पर ज़िंदगी बिताए, दर—दर अपमानित और लांछित…।
आगे बढ़कर गूँगे का हाथ पकड़ लिया और द्वार की ओर इशारा करके दिखाया – निकल जा। गूँगा जैसे समझा नहीं। बड़ी—बड़ी आँखों को फाड़े देखता रहा। कुछ कहने को शायद एक बार होंठ खुले भी, किंतु कोई स्वर नहीं निकला। चमेली वैसे ही कठोर बनी रही। अब के मुँह से भी साथ—साथ कहा – ‘जाओ, निकल जाओ। ढंग से काम नहीं करना है तो तुम्हारा यहाँ कोई काम नहीं। नौकर की तरह रहना है रहो, नहीं तो बाहर जाओ। यहाँ तुम्हारे नखरे कोई नहीं उठा सकता। किसी को भी इतनी फुरसत नहीं है। समझे?’ और फिर चमेली आवेश में आकर चिल्ला उठी – ‘मक्कार, बदमाश! पहले कहता था, भीख नहीं माँगता, और सबसे भीख माँगता है। रोज़—रोज़ भाग जाता है, पत्ते चाटने की आदत पड़ गई है। कुत्ते की दुम क्या कभी सीधी होगी? नहीं। नहीं रखना है हमें, जा, तू इसी वक्त निकल जा…’
किंतु वह क्षोभ, वह क्रोध, सब उसके सामने निष्फल हो गए; जैसे मंदिर की मूर्ति कोई उत्तर नहीं देती, वैसे ही उसने भी कुछ नहीं कहा। केवल इतना समझ सका कि मालकिन नाराज़ है और निकल जाने को कह रही हैं। इसी पर उसे अचरज और अविश्वास हो रहा है।
चमेली अपने—आप लज्जित हो गई। कैसी मूर्खा है वह! बहरे से जाने क्या—क्या कह रही थी? वही क्या कुछ सुनता है?
हाथ पकड़कर ज़ोर से एक झटका दिया और उसे दरवाज़े के बाहर धकेलकर निकाल दिया। गूँगा धीरे—धीरे चला गया। चमेली देखती रही।
करीब घंटे—भर बाद शकुंतला और बसंता – दोनों चिल्ला उठे, ‘अम्मा! अम्मा!’रांगेय राघव ‘क्या है?’ चमेली ने ऊपर ही से पूछा।
‘गूँगा…’, बसंता ने कहा। किंतु कहने के पहले ही नीचे उतरकर देखा – गूँगा खून से भीग रहा था। उसका सिर फट गया था। वह सड़क के लड़कों से पिटकर आया था, क्योंकि गूँगा होने के नाते वह उनसे दबना नहीं चाहता था। दरवाज़े की दहलीज़ पर सिर रखकर वह कुत्ते की तरह चिल्ला रहा था।
और चमेली चुपचाप देखती रही, देखती रही कि इस मूक अवसाद में युगों का हाहाकार भरकर गूँज रहा है।
और ये गूँगे… अनेक—अनेक हो संसार में भिन्न—भिन्न रूपों में छा गए हैं – जो कहना चाहते हैं, पर कह नहीं पाते। जिनके हृदय की प्रतिहिंसा न्याय और अन्याय को परखकर भी अत्याचार को चुनौती नहीं दे सकती, क्योंकि बोलने के लिए स्वर होकर भी—स्वर में अर्थ नहीं है… क्योंकि वे असमर्थ हैं।
और चमेली सोचती है, आज दिन ऐसा कौन है जो गूँगा नहीं है। किसका हृदय समाज, राष्ट्र, धर्म और व्यक्ति के प्रति विद्वेष से, घृणा से नहीं छटपटाता, किंतु फिर भी कृत्रिम सुख की छलना अपने जालों में उसे नहीं फाँस देती – क्योंकि वह स्नेह चाहता है, समानता चाहता है!
पाठ का सार
‘गूँगे’ कहानी का विस्तृत सारांश
‘गूँगे’ कहानी रांगेय राघव द्वारा रचित एक मार्मिक कथा है, जो समाज में शारीरिक रूप से अक्षम (दिव्यांग) और अनाथ व्यक्ति के प्रति व्याप्त करुणा, उपेक्षा और क्रूरता के द्वंद्व को दर्शाती है।
गूँगे का परिचय और अतीत
कहानी का केंद्रीय पात्र एक जन्म से वज्र बहरा और गूँगा युवक है, जो केवल कर्कश चीत्कार जैसी ध्वनियाँ निकाल सकता है। लोगों के इशारे पर वह बताता है कि उसके पिता की मृत्यु हो चुकी है और उसकी माँ बचपन में ही उसे छोड़कर भाग गई थी। उसे पालने वाले बुआ और फूफा भी उसे बहुत मारते थे और चाहते थे कि वह पल्लेदारी करके पैसे लाकर उन्हें दे। वह मेहनत से कमाकर खाने में विश्वास रखता है और भीख माँगने को घृणा की दृष्टि से देखता है।
चमेली के घर आश्रय
जब गूँगा गाँव की स्त्रियों से बातचीत करता है, तो चमेली, जो स्वभाव से दयालु है, उससे प्रभावित होती है। गूँगे की इशारों की तेज़ अकल और उसकी दयनीयता को देखकर चमेली उसे नौकर रखने का फैसला करती है। वह सोचती है कि उसे आश्रय मिल जाएगा और उसके घर के बच्चों का मन बहल जाएगा। गूँगे को इसके बदले खाना और चार रुपये मिलते हैं।
संघर्ष और दुर्भावना का आरंभ
गूँगा अपने काम में मेहनती है और इशारों से दूध, साग जैसी चीज़ें आसानी से मँगा लेता है, लेकिन उसके बार-बार भाग जाने की आदत बनी रहती है, क्योंकि वह जगह-जगह काम करके भाग जाने का आदी था।
बच्चों (बसंता और शकुंतला) द्वारा चिढ़ाए जाने पर वह नाराज़ नहीं होता। एक दिन बसंता गूँगे को चपत जड़ देता है। क्रोध में गूँगे का हाथ उठता है, पर वह उसे रोक लेता है, क्योंकि उसे लगता है कि बसंता मालिक का बेटा है और उसे उस पर हाथ उठाने का अधिकार नहीं है। चमेली, जो यह सब देखती है, उसे अपने बेटे के लिए घृणा और ममता दोनों का अनुभव होता है। उसे डर होता है कि कहीं उसका बेटा भी गूँगा न हो जाए, इसलिए वह गूँगे से एक क्षण के लिए हाथ छुड़ा लेती है।
करुणा और क्रोध का द्वंद्व
एक बार गूँगा काम छोड़कर भाग जाता है। जब चमेली और बच्चे खाकर उठ जाते हैं, तो वह लौटकर द्वार पर खड़ा हो जाता है और इशारे से भूखा होने का संकेत देता है। चमेली को गुस्सा आता है और वह उसे मक्कार और भिखारी कहकर रोटियाँ उसकी ओर फेंक देती है। वह उसे कुत्ते की दुम कहती है, जो कभी सीधी नहीं हो सकती। क्रोध में चमेली उसे चिमटा भी जड़ देती है, पर गूँगा रोता नहीं, बल्कि अपराध स्वीकार कर लेता है। चमेली की आँखों से आँसू गिरते देख, गूँगा भी रो पड़ता है।
बाद में, चमेली उसे दंडित करने के बजाय, उसे घर से निकाल देने का कठोर फैसला करती है और द्वार की ओर इशारा करके उसे बाहर कर देती है।
अंतिम त्रासदी और सामाजिक संदेश
बाहर निकाले जाने के कुछ देर बाद, बच्चे चिल्लाते हैं। चमेली देखती है कि गूँगा खून से भीग रहा है, उसका सिर फट गया है। सड़क के लड़कों ने उसे पीटा है क्योंकि वह गूँगा होने के बावजूद उनसे दबना नहीं चाहता था। वह दहलीज़ पर सिर रखकर कुत्ते की तरह चिल्ला रहा है।
इस दृश्य को देखकर चमेली को एहसास होता है कि गूँगे का यह मूक अवसाद केवल उसकी अपनी पीड़ा नहीं है, बल्कि युगों का हाहाकार है। लेखक निष्कर्ष निकालते हैं कि आज समाज में अनेक-अनेक गूँगे हैं—वे लोग जो अन्याय और अत्याचार को परखकर भी अपनी असमर्थता के कारण बोल नहीं पाते, जिनका हृदय विद्वेष और घृणा से छटपटाता है, पर जिन्हें कृत्रिम सुख की छलना चुप करा देती है।
कठिन शब्दार्थ
शब्द (Word) | हिंदी अर्थ (Hindi Meaning) | தமிழ் அர்த்தம் (Tamil Meaning) | English Meaning |
वज्र बहरा | पूरी तरह बहरा (जन्म से) | முற்றிலும் செவிடு | Completely deaf (congenital) |
कुतूहल | जिज्ञासा या आश्चर्य | ஆர்வம் | Curiosity |
अस्फुट | अस्पष्ट या धुंधला | தெளிவில்லாத | Indistinct or unclear |
वमन | उल्टी करना | வாந்தி | Vomiting |
काकल | गले की आवाज या स्वर | குரல் | Voice or throat sound |
यातना | पीड़ा या कष्ट | வேதனை | Torment or suffering |
चीत्कार | जोर की चीख | கூக்குரல் | Scream or shriek |
विक्षोभ | उत्तेजना या क्षोभ | கொந்தளிப்பு | Agitation or turmoil |
प्रतिच्छाया | प्रतिबिंब या छाया | பிரதிபிம்பம் | Reflection or shadow |
मूक अवसाद | मौन उदासी | ஊமை மனத்தாழ்வு | Silent depression |
हाहाकार | करुण क्रंदन या विलाप | புலம்பல் | Wail or lamentation |
प्रतिहिंसा | बदला या प्रतिकार | பழிவாங்கல் | Retaliation |
छलना | धोखा या कपट | ஏமாற்று | Deception or illusion |
निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर पूरे वाक्यों में लिखिए।
- गूँगे ने अपना परिचय लोगों को कैसे दिया?
उत्तर – गूँगे ने अपना परिचय इशारों के माध्यम से दिया, जिससे लोगों को उसमें जिज्ञासा पैदा हो गई।
- गूँगे को बचपन में क्या हुआ?
उत्तर – जन्म से वज्र बहरा होने के कारण वह गूँगा था, और बचपन में ही उसकी माँ उसे छोड़कर भाग गई थी क्योंकि उसका बाप मर गया था।
- गूँगे से काम कैसे लेना चाहिए?
उत्तर – गूँगे से काम लेने के लिए इशारों का सहारा लेना पड़ता था, जैसे दूध के लिए थन काढ़ने का इशारा या साग के लिए गोल-गोल या लंबी उँगली दिखाकर समझाना।
- मनुष्य की करुणा की भावना किसकी प्रतिच्छाया है?
उत्तर – मनुष्य की करुणा की भावना उसके भीतर के गूँगेपन की प्रतिच्छाया है, जिसका अर्थ है कि वह बहुत कुछ करना चाहता है, किंतु कर नहीं पाता।
- चमेली गूँगे से किस प्रकार काम लेती थी?
उत्तर – चमेली गूँगे से दूध और साग मँगवाने जैसे छोटे-मोटे घरेलू काम लेती थी, जिसके बदले में उसे खाना और चार रुपये मिलते थे।
- परिवार के लोगों का बर्ताव गूंगे के साथ कैसा था?
उत्तर – चमेली और उसके पति दयावश उसे अपने यहाँ रखते थे, किंतु बच्चों (बसंता) द्वारा उसे चिढ़ाया जाता था, और अंततः चमेली स्वयं उस पर गुस्सा करती और उसे मारती भी थी।
II निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर पाँच वाक्यों में लिखिए।
- गूँगे का परिचय दीजिए?
उत्तर – गूँगा जन्म से वज्र बहरा है, जिसके कारण वह बोल नहीं पाता, केवल कर्कश काँय-काँय या अस्फुट ध्वनियाँ ही निकाल पाता है।बचपन में ही उसकी माँ उसे छोड़कर चली गई थी, और उसे पालने वाले बुआ-फूफा उसे पल्लेदारी करवाकर मारते थे।वह भीख नहीं लेता था, बल्कि अपनी भुजाओं पर हाथ रखकर इशारा करता था कि वह मेहनत का खाता है।वह इशारे करने में बहुत तेज़ और अकलमंद है, जो अपनी भावनाओं को उगलना चाहता है, किंतु गले की समस्या के कारण नहीं कर पाता।उसे जगह-जगह नौकरी करके भाग जाने की आदत पड़ गई थी।
- चमेली का चरित्र चित्रण कीजिए।
उत्तर – चमेली का हृदय स्वभाव से कोमल और करुणामय है, जो अनाथ बच्चों को देखकर रोती है और गूँगे को दयावश अपने यहाँ नौकर रखती है।उसमें पुत्र की ममता का भाव प्रबल है, जिसके कारण वह बेटे को गूँगे से दूर रखने के लिए घृणावश हाथ छुड़ा लेती है।वह गुस्से वाली भी है, जो गूँगे के भाग जाने या चोरी करने पर उसे चिमटा जड़ देती है और कठोर शब्द बोलकर घर से निकाल देती है।वह बहुत भावुक है, गूँगे के रोने पर उसकी आँखों से भी आँसू टपक जाते हैं, और वह उसके प्रति ममता और पश्चात्ताप महसूस करती है।अंत में, वह समाज के उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है जो गूँगा है—जो बहुत कुछ कहना चाहता है, किंतु कह नहीं पाता और मजबूरी में अत्याचार को स्वीकार कर लेता है।
- चोट खाकर गूँगे ने क्या किया?
उत्तर – एक बार खेलने-खेलते बसंता ने गूँगे को चपत जड़ दी, जिसके बाद गूँगे का हाथ उठा, किंतु न जाने क्यों अपने आप रुक गया।बसंता को मारकर बदला लेने की बजाय, उसकी आँखों में पानी भर आया और वह रोने लगा।उसका रुदन इतना कर्कश था कि चमेली को चूल्हा छोड़कर आना पड़ा।बाद में, सड़क के लड़कों से पिटकर जब वह लौटा, तो उसका सिर फट गया था और वह खून से भीग रहा था। दहलीज़ पर सिर रखकर वह कुत्ते की तरह चिल्ला रहा था, लेकिन यह उसका रुदन युगों के हाहाकार से भरा मूक अवसाद था, जो समाज के अत्याचार को चुनौती नहीं दे सकता था।
- गूँगे कहानी की विशेषता लिखिए।
उत्तर – इस कहानी की विशेषता यह है कि यह शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे व्यक्ति (गूँगे) की दयनीयता और सामाजिक उपेक्षा को दर्शाती है।कहानी करुणा और क्रूरता के द्वंद्व पर आधारित है, जहाँ चमेली की दया भावना अंततः उसके क्रोध और स्वार्थ के आगे हार मान लेती है।कहानी यह दर्शाती है कि गूँगा मेहनत का खाता है, भीख नहीं लेता, फिर भी समाज उसे अपमानित करता है।इसका सबसे बड़ा संदेश यह है कि ‘गूँगे’ अनेक-अनेक हैं—वे लोग जिनके पास बोलने के लिए स्वर होकर भी अर्थ नहीं है, और जो असमर्थता के कारण सामाजिक अन्याय के प्रति अपनी प्रतिहिंसा व्यक्त नहीं कर पाते।यह कहानी पाठक को मानवीय संवेदना और सामाजिक व्यवस्था पर गंभीर विचार करने को मजबूर करती है।
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
कहानी के लेखक कौन है?
a) प्रेमचंद
b) रांगेय राघव
c) जैनेंद्र
d) यशपाल
उत्तर: b (रांगेय राघव।)
गूँगा जन्म से क्यों बहरा-गूँगा है?
a) दुर्घटना से
b) वज्र बहरा
c) बीमारी से
d) जादू से
उत्तर: b (जन्म से वज्र बहरा।)
स्त्रियाँ गूँगे को देखकर क्या महसूस करती हैं?
a) डर
b) कुतूहल (जैसे तोते को राम-राम कहते)
c) प्रेम
d) घृणा
उत्तर: b (आनंद-मिश्रित कुतूहल।)
गूँगे की माँ क्यों चली गई?
a) धन के लिए
b) बाप की मृत्यु के बाद
c) यात्रा पर
d) बीमार होकर
उत्तर: b (बाप मर गया था।)
गूँगे का बोलना कैसा है?
a) मधुर
b) कर्कश काँय-काँय, अस्फुट ध्वनियाँ
c) स्पष्ट
d) गीत जैसा
उत्तर: b (कर्कश काँय-काँय का ढेर।)
गूँगे ने गले में क्या होने का इशारा किया?
a) कौआ
b) बचपन में काट दिया गया
c) पत्थर
d) रस्सी
उत्तर: b (गला साफ करने की कोशिश में काट दिया।)
गूँगा खाने के लिए क्या करता है?
a) भीख माँगता
b) मेहनत (लड्डू बनाना, कपड़े धोना)
c) चोरी
d) सोता
उत्तर: b (हाथ फैलाकर कभी नहीं माँगा।)
चमेली गूँगे को कितने रुपये देती है?
a) दस
b) चार
c) बीस
d) पचास
उत्तर: b (चार उँगलियाँ दिखाई।)
गूँगा घर क्यों नहीं जाता?
a) दूर है
b) बुआ-फूफा मारते थे
c) भूल गया
d) नौकरी मिली
उत्तर: b (पल्लेदारी करवाते थे।)
गूँगा भागकर क्यों लौट आता है?
a) भूख से
b) आदत और ममता
c) डर से
d) खेलने
उत्तर: b (भीख ली या ममता की ठोकर स्वीकार।)
बसंता ने गूँगे को क्या मारा?
a) लाठी
b) चपत
c) पत्थर
d) जूता
उत्तर: b (कसकर चपत जड़ दी।)
चमेली को गूँगे का हाथ पकड़ना कैसा लगा?
a) डरावना
b) जैसे अपना पुत्र
c) गंदा
d) ठंडा
उत्तर: b (उसी के पुत्र ने पकड़ लिया।)
चमेली ने गूँगे पर क्या आरोप लगाया?
a) आलसी होना
b) चोरी
c) झूठ बोलना
d) सोना
उत्तर: b (क्यों रे, तूने चोरी की है?)
चमेली ने गूँगे को कैसे निकाला?
a) प्यार से
b) झटका देकर धकेला
c) चिट्ठी से
d) पुलिस से
उत्तर: b (हाथ पकड़कर झटका दिया।)
गूँगा लौटा तो कैसा था?
a) खुश
b) खून से लथपथ, सिर फटा
c) नया कपड़ा पहने
d) खाना लेकर
उत्तर: b (सड़क के लड़कों से पिटा।)
कहानी में ‘गूँगे’ किसके प्रतीक हैं?
a) अमीर
b) मूक पीड़ित, असमर्थ लोग
c) नेता
d) बच्चे
उत्तर: b (कहना चाहते हैं पर कह नहीं पाते।)
चमेली की अंतिम भावना क्या है?
a) खुशी
b) पछतावा और करुणा
c) क्रोध
d) उदासीनता
उत्तर: b (मूक अवसाद में हाहाकार।)
गूँगे की हँसी कैसी है?
a) मधुर
b) गुर्राहट-सी
c) हल्की
d) रोने जैसी
उत्तर: b (अचानक गुर्राहट-सी।)
गूँगा बसंता पर हाथ क्यों नहीं चलाता?
a) डर से
b) मालिक का बेटा समझता है
c) कमजोर है
d) भूल गया
उत्तर: b (शायद मालिक का बेटा।)
कहानी का मुख्य विषय क्या है?
a) प्रेम
b) मानवीय करुणा, असहायता और समाज की संवेदनहीनता
c) धन
d) यात्रा
उत्तर: b (गूँगे की यातना और चमेली का पश्चाताप।)
अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- प्रश्न: कहानी ‘गूँगे’ के लेखक कौन हैं?
उत्तर: कहानी ‘गूँगे’ के लेखक रांगेय राघव हैं। - प्रश्न: कहानी का मुख्य पात्र कौन है?
उत्तर: कहानी का मुख्य पात्र गूँगा है। - प्रश्न: गूँगा जन्म से किस दोष से पीड़ित था?
उत्तर: गूँगा जन्म से बहरा था। - प्रश्न: गूँगे की माँ उसे क्यों छोड़ गई थी?
उत्तर: गूँगे की माँ उसके पिता की मृत्यु के बाद उसे छोड़कर चली गई थी। - प्रश्न: गूँगे का पालन-पोषण किसने किया?
उत्तर: गूँगे का पालन-पोषण उसके बुआ और फूफा ने किया था। - प्रश्न: गूँगा किस प्रकार की नौकरियाँ करता था?
उत्तर: गूँगा हलवाई की दुकान पर काम करता था, कड़ाही माँजता और मेहनत के काम करता था। - प्रश्न: गूँगा भीख क्यों नहीं माँगता था?
उत्तर: गूँगा मेहनत से काम करके खाने में विश्वास रखता था, इसलिए वह भीख नहीं माँगता था। - प्रश्न: चमेली ने गूँगे को अपने घर क्यों रखा?
उत्तर: चमेली को उस पर दया आ गई थी, इसलिए उसने उसे अपने घर रखा। - प्रश्न: सुशीला गूँगे के बारे में क्या कहती है?
उत्तर: सुशीला कहती है कि गूँगे की अकल बहुत तेज़ है और वह अच्छे इशारे करता है। - प्रश्न: गूँगे के गले की क्या स्थिति थी?
उत्तर: बचपन में किसी ने उसका गला काट दिया था, इसलिए वह बोल नहीं पाता था। - प्रश्न: गूँगा जब भाग गया था तो वह क्यों लौटा?
उत्तर: गूँगा भूख से पीड़ित होकर वापस लौटा था। - प्रश्न: चमेली ने जब गूँगे को देखा तो उसे क्या महसूस हुआ?
उत्तर: चमेली को लगा जैसे उसका अपना पुत्र उसके सामने खड़ा है। - प्रश्न: बसंता कौन था?
उत्तर: बसंता, चमेली का बेटा था। - प्रश्न: बसंता ने गूँगे के साथ क्या किया?
उत्तर: बसंता ने गूँगे को मार दिया था। - प्रश्न: गूँगे ने बसंता पर हाथ क्यों नहीं उठाया?
उत्तर: गूँगे ने समझा कि बसंता मालिक का बेटा है, इसलिए उसने उस पर हाथ नहीं उठाया। - प्रश्न: गूँगा जब लौटकर आया तो उसके चेहरे पर क्या भाव थे?
उत्तर: उसके चेहरे पर शिकायत और तिरस्कार का भाव था। - प्रश्न: चमेली ने गूँगे पर चोरी का आरोप क्यों लगाया?
उत्तर: चमेली को संदेह हुआ कि गूँगे ने कुछ चुराया है, इसलिए उसने आरोप लगाया। - प्रश्न: गूँगे ने जब कुछ नहीं कहा, तो चमेली ने क्या किया?
उत्तर: चमेली ने गूँगे को घर से निकाल दिया। - प्रश्न: गूँगे की मृत्यु कैसे हुई?
उत्तर: सड़क के लड़कों ने गूँगे को पीट दिया, जिससे उसका सिर फट गया और वह खून से भीग गया। - प्रश्न: चमेली ने गूँगे को मरा देखकर कैसी प्रतिक्रिया दी?
उत्तर: चमेली चुपचाप उसे देखती रही और भीतर से बहुत व्यथित हो गई। - प्रश्न: लेखक ने “गूँगे” शब्द का प्रतीकात्मक अर्थ क्या बताया है?
उत्तर: लेखक ने “गूँगे” को उन लोगों का प्रतीक बताया है जो कहना चाहते हैं पर कह नहीं पाते। - प्रश्न: कहानी में समाज का कौन-सा पक्ष उजागर होता है?
उत्तर: कहानी में समाज का अमानवीय, संवेदनहीन और शोषणकारी पक्ष उजागर होता है। - प्रश्न: गूँगे के प्रति चमेली के मन में क्या परिवर्तन आता है?
उत्तर: पहले वह दया दिखाती है, फिर क्रोधित होती है, और अंत में ममता से भर जाती है। - प्रश्न: गूँगे की मेहनत को देखकर सबको क्या महसूस हुआ?
उत्तर: सबको उसके परिश्रम और आत्मसम्मान पर गर्व और करुणा दोनों महसूस हुए। - प्रश्न: कहानी का अंत किस भावना के साथ होता है?
उत्तर: कहानी का अंत करुणा और आत्ममंथन की भावना के साथ होता है। - प्रश्न: लेखक ने गूँगे के माध्यम से कौन-सा संदेश दिया है?
उत्तर: लेखक ने संदेश दिया है कि समाज में बहुत से लोग ‘गूँगे’ हैं जो अन्याय सहते हैं पर बोल नहीं पाते। - प्रश्न: चमेली को क्यों लगा कि गूँगा पशु है?
उत्तर: गूँगे की गुर्राहट जैसी हँसी सुनकर उसे लगा कि उसने एक पशु को पाला है। - प्रश्न: कहानी में “गूँगेपन” का क्या प्रतीकात्मक अर्थ है?
उत्तर: “गूँगापन” उन असहाय मनुष्यों का प्रतीक है जो समाज में अत्याचार देखकर भी मौन रहते हैं। - प्रश्न: लेखक ने समाज के किस वर्ग का प्रतिनिधित्व गूँगे के माध्यम से किया है?
उत्तर: लेखक ने समाज के शोषित, उपेक्षित और पीड़ित वर्ग का प्रतिनिधित्व किया है। - प्रश्न: कहानी “गूँगे” का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: कहानी का मुख्य संदेश है कि संवेदनहीनता और अन्याय के विरुद्ध मौन रहना भी एक प्रकार का गूँगापन है।
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- प्रश्न – गूँगे ने अपनी माँ के बारे में लोगों को क्या बताया था?
उत्तर – गूँगे ने इशारे से बताया कि उसकी माँ घूँघट काढ़ती थी, पर जब वह छोटा ही था, तब उसके बाप (बड़ी-बड़ी मूँछों वाले) के मर जाने के बाद वह उसे छोड़कर भाग गई थी।
- प्रश्न – चमेली ने पहली बार गूँगे को देखकर क्या अनुभव किया?
उत्तर – गूँगे के बोलने के जबरदस्त किंतु असफल प्रयास को देखकर चमेली ने पहली बार अनुभव किया कि यदि गले में काकल (स्वर यंत्र) ठीक न हो तो मनुष्य का जीवन कितना दुखद हो जाता है और वह अपने हृदय को उगल नहीं पाता।
- प्रश्न – गूँगे की बोली सुनने में कैसी लगती थी?
उत्तर – गूँगे की बोली कर्कश काँय-काँय का ढेर और अस्फुट ध्वनियों का वमन जैसी थी। कभी-कभी यह घायल पशु के कराहने या कुत्ते के चिल्लाने जैसी लगती थी, और कभी इसमें ज्वालामुखी के विस्फोट की-सी भयानकता होती थी।
- प्रश्न – गूँगे ने भीख न माँगने के बारे में क्या इशारा किया?
उत्तर – गूँगे का स्वर चीत्कार में बदल गया। उसने सीने पर हाथ मारकर इशारा किया कि वह हाथ फैलाकर कभी नहीं माँगा, और अपनी भुजाओं पर हाथ रखकर बताया कि वह मेहनत का खाता है।
- प्रश्न – चमेली ने गूँगे को क्यों नौकर रखा था?
उत्तर – चमेली को गूँगे पर दया आती थी, क्योंकि वह बहुत कोमल हृदय की थी। उसने सोचा कि इसे खाना और थोड़े पैसे देकर आश्रय मिल जाएगा, साथ ही घर में बच्चों का मन बहल जाएगा।
- प्रश्न – बुआ और फूफा गूँगे से क्या काम करवाना चाहते थे और क्यों?
उत्तर – बुआ और फूफा चाहते थे कि गूँगा बाज़ार में पल्लेदारी करे और बारह-चौदह आने कमाकर उन्हें दे दे, क्योंकि उन्होंने उसे पाला था। बदले में वे उसे बाजरे और चने की रोटियाँ देते थे।
- प्रश्न – जब गूँगा चोरी करके लौटा, तब चमेली ने उसके साथ कैसा व्यवहार किया?
उत्तर – काम न करने पर भीख माँगकर लौटने पर चमेली ने गुस्से में उसे भिखारी कहकर पुकारा और रोटियाँ उसकी ओर फेंक दीं। बाद में, पश्चाताप होने पर उसने गिलासों में दूध भरकर उसे पीने को दिया।
- प्रश्न – बसंता द्वारा पीटे जाने पर गूँगे ने अपने उठे हाथ को क्यों रोक लिया?
उत्तर – बसंता द्वारा पीटे जाने पर भी गूँगे ने अपना हाथ इसलिए रोक लिया क्योंकि चमेली को लगा कि वह शायद यह समझता है कि बसंता मालिक का बेटा है और उस पर हाथ लगाना उसका अधिकार नहीं है, इसलिए उसने क्रोध पर नियंत्रण रखा।
- प्रश्न – गूँगे को घर से बाहर निकाले जाने पर उसके मन में क्या भाव आया?
उत्तर – चमेली द्वारा बाहर धकेल दिए जाने पर भी गूँगा अचरज और अविश्वास से उसे देखता रहा। वह मालकिन की नाराज़गी समझ रहा था, लेकिन यह स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि उसे निकाल दिया गया है।
- प्रश्न – सड़क के लड़कों ने गूँगे को क्यों पीटा और उसका क्या परिणाम हुआ?
उत्तर – सड़क के लड़कों ने गूँगे को इसलिए पीटा क्योंकि वह गूँगा होने के नाते उनसे दबना नहीं चाहता था। पिटाई के कारण उसका सिर फट गया और वह खून से भीगकर दहलीज़ पर सिर रखकर कुत्ते की तरह चिल्लाने लगा।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- प्रश्न – चमेली ने गूँगे को घर से क्यों निकाला? उसके क्रोध के पीछे का मूल कारण क्या था?
उत्तर – चमेली ने गूँगे को इसलिए निकाला क्योंकि वह बार-बार भाग जाता था और उसे लगा कि वह भीख माँगकर चोरी कर रहा है। उसके क्रोध का मूल कारण यह था कि गूँगा उसकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता था। इसके अलावा, गूँगे के अमानवीय स्वर को सुनकर उसे लगा कि उसने पशु पाला है, जिससे वह घृणा से विक्षुब्ध होकर उसे निकालना चाहती थी।
- प्रश्न – लेखक ने ‘गूँगे’ को समाज के एक व्यापक वर्ग का प्रतीक क्यों माना है?
उत्तर – लेखक ने गूँगे को उन अनेक-अनेक लोगों का प्रतीक माना है जो संसार में भिन्न-भिन्न रूपों में छा गए हैं। ये वे लोग हैं जिनके पास बोलने के लिए स्वर होकर भी स्वर में अर्थ नहीं है, और जो असमर्थता के कारण न्याय-अन्याय को परखकर भी अत्याचार को चुनौती नहीं दे सकते। यह उन लोगों का प्रतीक है जो स्नेह और समानता चाहते हैं, पर समाज की कृत्रिम सुख की छलना में फँस जाते हैं।
- प्रश्न – चोट खाने के बावजूद गूँगे का हाथ बसंता पर न उठना उसके चरित्र की किस विशेषता को दर्शाता है?
उत्तर – बसंता द्वारा चपत जड़ दिए जाने पर गूँगे का हाथ उठकर भी रुक जाता है। यह उसके चरित्र की शांत सहनशीलता और मालिक के प्रति वफादारी को दर्शाता है। वह शायद यह समझता था कि बसंता मालिक का बेटा है और उस पर हाथ उठाने का उसे अधिकार नहीं है। यह उसकी विवेकशीलता और सामाजिक व्यवस्था के प्रति उसकी मौन स्वीकृति को भी दर्शाता है।
- प्रश्न – गूँगे के रुदन को लेखक ने ‘मूक अवसाद में युगों का हाहाकार’ क्यों कहा है?
उत्तर – गूँगे का रुदन केवल शारीरिक पीड़ा का चीत्कार नहीं था। वह जन्म से असमर्थ होने, माँ द्वारा त्यागे जाने, पालन-पोषण में प्रताड़ित होने, और समाज द्वारा अपमानित होने के कारण हुए युगों के संचित दुख की अभिव्यक्ति था। उसके रुदन में उन सभी असमर्थ और पीड़ित लोगों का अवसाद भरा था, जो अपनी व्यथा को शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते।
- प्रश्न – चमेली के मन में गूँगे के प्रति ममता और घृणा के भाव एक साथ क्यों उत्पन्न होते थे?
उत्तर – चमेली के मन में ममता का भाव गूँगे की दयनीयता और अपनी कोमल हृदयता के कारण आता था। वहीं, घृणा का भाव तब आता था जब वह उसे झूठा, मक्कार या चोर समझती थी, या जब उसे लगा कि गूँगा उसके बेटे बसंता को छू रहा है। पुत्र के प्रति मंगल-कामना और अंधविश्वास ने भी उसे घृणा करने को मजबूर किया, क्योंकि वह गूँगेपन की परछाईं से डरती थी।

