लेखक-परिचय – श्री सुदर्शन
जन्म 1895 में
मृत्युः 1967
हिंदी में उनकी पहली कहानी हार की जीत 1920 में ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुई थी।
हार की जीत के अतिरिक्त सुदर्शन की कमल की बेटी, कवि की स्त्री, तीर्थ-यात्रा, संसार की सबसे बड़ी कहानी आदि बहु चर्चित और सुप्रसिद्ध कहानियाँ हैं।
सामाजिक समस्याओं का समाधन, बुराई पर अच्छाई की या पाप पर पुण्य की विजय और परंपरागत मूल्यों की स्थापना आदि सुदर्शन की ऐसी विशेषताएँ हैं। मध्यवर्गीय और ग्राम्य जीवन जुड़े चरित्रों का चरित्रांकन करने में सुदर्शन विशेष रूप से सिद्धहस्त हैं।
हार की जीत
माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवद्-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान्। इसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे ‘सुलतान’ कहकर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। उन्होंने रुपया, माल, असबाब, ज़मीन आदि अपना सब-कुछ छोड़ दिया था, यहाँ तक कि उन्हें नगर के जीवन से भी घृणा थी। अब गाँव से बाहर एक छोटे से मंदिर में रहते और भगवान का भजन करते थे।” मैं, सुलतान बिना नहीं रह सकूँगा” , उन्हें ऐसी भ्रांति – सी हो गई थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते – ऐसा चलता है जैसे मोर घटा को देखकर नाच रहा हो। जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते उन्हें चैन न आता।
खड्गसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध डाकू था। लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे। होते- होते सुलतान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची। उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। वह एक दिन दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया।
बाबा भारती ने पूछा, “खड्गसिंह, क्या हाल है?”
खड्गसिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, “आपकी दया है।”
“कहो, इधर कैसे आ गए?”
“सुलतान की चाह खींच लाई।”
“विचित्र जानवर है। देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे।”
“मैंने भी बड़ी प्रशंसा सुनी है।”
“उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी।”
“कहते हैं, देखने में भी बड़ा सुंदर है।”
“क्या कहना। जो उसे एक बार देख लेता है, उसके हृदय पर उसकी छवि अंकित हो जाती है।”
“बहुत दिनों से अभिलाषा थी, आज उपस्थित हो सका हूँ।”
बाबा भारती और खड्गसिंह अस्तबल में पहुँचे। बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, खड्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से। उसने सहस्रों घोड़े देखे थे, परंतु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से कभी न गुज़रा था। सोचने लगा, भाग्य की बात है। ऐसा घोड़ा खड्गसिंह के पास होना चाहिए था। इस साधु को ऐसी चीज़ों से क्या लाभ। कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा। इसके पश्चात् उसके हृदय में हलचल होने लगी। बालकों की-सी अधीरता से बोला, “परंतु बाबाजी, इसकी चाल न देखी तो क्या !”
बाबाजी भी मनुष्य ही थे। अपनी वस्तु की प्रशंसा दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय अधीर हो गया। घोड़े को खोलकर बाहर गए। घोड़ा वायुवेग से उड़ने लगा। उसकी चाल देखकर खड्गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया। वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उसपर वह अपना अधिकार समझता था। उसके पास बाहुबल था और आदमी थे। जाते-जाते उसने कहा, “बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।”
बाबा भारती डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती। सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी। प्रतिक्षण खड्गसिंह का भय लगा रहता, परंतु कई मास बीत गए और वह न आया। यहाँ तक कि बाबा भारती कुछ असावधान हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नाई मिथ्या समझने लगे।
संध्या का समय था। बाबा भारती सुलतान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता। कभी घोड़े के शरीर को देखते, कभी उसके रंग को और मन में फूले न समाते थे।
सहसा एक ओर से आवाज़ आई, “ओ बाबा, इस कंगाले की सुनते जाना।”
आवाज़ में करुणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया। देखा, एक अपाहिज वृक्ष की छाया
में पड़ा कराह रहा है। बोले, “क्यों, तुम्हें क्या कष्ट है?”
अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा, “बाबा, मैं दुखिया हूँ। मुझपर दया करो। रामावाला यहाँ से तीन मील है, मुझे वहाँ जाना है। घोड़े पर चढ़ा लो, परमात्मा भला करेगा।”
“वहाँ तुम्हारा कौन है?”
“दुर्गादत्त वैद्य का नाम सुना होगा। उनका सौतेला भाई हूँ।
बाबा भारती ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे।
सहसा उन्हें एक झटका-सा लगा और लगाम हाथ से छूट गई। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज पीठ पर तनकर बैठा है और घोड़े को दौड़ाये लिए जा रहा है। उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख निकल गई। वह अपाहिज डाकू खड्गसिंह था।
बाबा भारती कुछ देर तक चुप रहे और इसके पश्चात् कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, “ज़रा ठहर जाओ।”
खड्गसिंह ने आवाज़ सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गर्दन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूँगा।”
“परंतु एक बात सुनते जाओ।”
खड्गसिंह ठहर गया। बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा कसाई की ओर देखता है, और कहा” यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका। मैं तुमसे इसे वापस करने के लिए न कहूँगा। परंतु खड्गसिंह, केवल एक प्रार्थना करता हूँ। उसे अस्वीकार न करना, नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा।”
“बाबाजी, आज्ञा कीजिए। मैं आपका दास हूँ, केवल यह घोड़ा न दूँगा।”
“अब घोड़े का नाम न लो। मैं तुमसे इसके विषय में कुछ न कहूँगा। मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।”
खड्गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसका विचार था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भारती ने स्वयं उससे कहा कि “इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? खड्गसिंह ने बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भारती के मुख पर गड़ा दीं और पूछा, “बाबाजी, इससे आपको क्या डर है?”
सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया, “लोगों को यदि इस घटना का पता लग गया तो वे किसी गरीब पर विश्वास न करेंगे।” यह कहते-कहते उन्होंने सुलतान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया जैसे उनका उससे कभी कोई संबंध ही नहीं रहा हो।
बाबा भारती चले गए, परंतु उनके शब्द खड्गसिंह के कानों में उसी प्रकार गूँज रहे थे। सोचता था, कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है ! उन्हें इस घोड़े से प्रेम था, इसे देखकर उनका मुख फूल की नाई खिल जाता था। कहते थे, “इसके बिना मैं रह न सकूँगा।” इसकी रखवाली में कई रात सोए नहीं। भजन भक्ति न कर रखवाली करते रहे। परंतु आज उनके मुख पर दुख की रेखा तक न दिखाई पड़ती थी। उन्हें केवल यह ख्याल था कि कहीं लोग गरीबों पर विश्वास करना न छोड़ दें। ऐसा मनुष्य, मनुष्य नहीं देवता है।
रात्रि के अंधकार में खड्गसिंह बाबा भारती के मंदिर में पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। थोड़ी दूर पर गाँवों के कुत्ते भूँक रहे थे। मंदिर के अंदर कोई शब्द सुनाई न देता था। खड्गसिंह सुलतान की भाग पकड़े हुए था। वह धीरे-धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुँचा। फाटक खुला पड़ा था। किसी समय वहाँ बाबा भारती स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे, परंतु आज उन्हें किसी चोरी, किसी डाके का भय न था। खड्गसिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया। इस समय उसकी आँखों में नेकी के आँसू थे।
रात्रि का तीसरा पहर बीत चुका था। चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया। उसके पश्चात् इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो, उनके पाँव अस्तबल की ओर बढ़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई। साथ घोर निराशा ने पाँवों को मन-मन भर का भारी बना दिया। वे वहीं रुक गए।
घोड़े ने अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और ज़ोर से हिनहिनाया।
अब बाबा भारती आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर घुसे और अपने प्यारे घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे मानो कोई पिता बहुत दिन के बिछुड़े हुए पुत्र से मिल रहा हो। बार-बार उसकी पीठ पर हाथ फेरते, बार-बार उसके मुँह पर थपकियाँ देते।
फिर वे संतोष से बोले, “अब कोई गरीबों की सहायता से मुँह न मोड़ेगा।”
पाठ का सारांश
बाबा भारती एक त्यागी साधु थे जो गाँव के बाहर मंदिर में रहते और भगवान का भजन करते थे। उनका एकमात्र सांसारिक लगाव सुंदर, बलवान घोड़ा ‘सुलतान’ था, जिसे वे पुत्रवत् प्यार करते थे। इलाके के डाकू खड्गसिंह ने सुलतान की प्रशंसा सुनी, देखा और अपाहिज बनकर चुरा लिया। बाबा ने घोड़ा खोया, किंतु खड्गसिंह से प्रार्थना की कि घटना किसी को न बताना, वरना लोग गरीबों पर विश्वास करना छोड़ देंगे। बाबा के ऊँचे विचारों से प्रभावित होकर खड्गसिंह रात में घोड़ा वापस बाँध आया। इस प्रकार बाबा की हार (घोड़ा खोना) से अच्छाई की जीत हुई और डाकू में सुधार आया। कहानी दया, त्याग और नैतिकता की शक्ति दिखाती है।
कठिन शब्दार्थ
शब्द (Word) | हिंदी अर्थ (Hindi Meaning) | तமிழ் அர்த்தம் (Tamil Meaning) | English Meaning |
लहलहाते | हरे-भरे और लहराते हुए | பசுமையாக அலைவிடும் | Waving lushly (green and flourishing) |
अर्पण | समर्पण करना | அர்ப்பணம் செய்தல் | Dedication or offering |
भ्रांति | गलत धारणा या भ्रम | தவறான நம்பிக்கை | Illusion or misconception |
लट्टू | मोहित या दीवाना | மயங்கியவர் | Fascinated or enchanted |
कीर्ति | प्रसिद्धि या यश | புகழ் | Fame or reputation |
अधीर | बेचैन या उतावला | பொறுமையற்ற | Impatient or restless |
बाँका | सुंदर और बलवान | அழகும் வலிமையும் உடைய | Handsome and strong |
बाहुबल | भुजाओं की शक्ति | தோள்வலிமை | Arm strength or physical power |
अपाहिज | विकलांग या अंगहीन | ஊனமுற்றவர் | Disabled or handicapped |
करुणा | दया या सहानुभूति | இரக்கம் | Compassion or pity |
झटका | आकस्मिक धक्का | திடீர் அதிர்ச்சி | Sudden jerk or shock |
विस्मय | आश्चर्य | ஆச்சரியம் | Amazement or wonder |
निराशा | हताशा या उदासी | ஏமாற்றம் | Despair or disappointment |
प्रकट | प्रकट करना या खोलना | வெளிப்படுத்துதல் | Reveal or disclose |
प्रयोजन | उद्देश्य या लाभ | நோக்கம் | Purpose or benefit |
पवित्र | शुद्ध या पावन | தூய்மையான | Pure or holy |
नेकी | अच्छाई या धर्म | நன்மை | Goodness or virtue |
हिनहिनाया | घोड़े की आवाज़ | கனைத்தல் | Neighed (horse sound) |
संतोष | तृप्ति या खुशी | திருப்தி | Satisfaction or contentment |
कुटिया | छोटी झोपड़ी | குடிசை | Hut or small cottage |
I निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर पूरे वाक्यों में लिखिए।
- सुदर्शन की पहली कहानी क्या थी किसमें प्रकाशित हुई?
उत्तर – सुदर्शन की पहली कहानी ‘हार की जीत’ थी, जो 1920 में ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।
- सुदर्शन की प्रमुख रचनाओं का नाम लिखिए।
उत्तर – सुदर्शन की प्रमुख रचनाएँ हैं: ‘हार की जीत’, ‘कमल की बेटी’, ‘कवि की स्त्री’, ‘तीर्थ-यात्रा’, और ‘संसार की सबसे बड़ी कहानी’।
- बाबा भारती को किसे देखकर आनंद होता था?
उत्तर – बाबा भारती को अपना घोड़े सुलतान को देखकर आनंद आता था।
- हार की जीत कैसे हुई?
उत्तर – हार की जीत नैतिकता और सद्भाव की विजय के रूप में हुई, जब बाबा भारती ने घोड़े को वापस न माँगते हुए डाकू खड्गसिंह से केवल यह प्रार्थना की कि वह इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करे ताकि लोग गरीबों पर विश्वास करना न छोड़ दें; बाबा भारती के इस ऊँचे विचार से प्रभावित होकर खड्गसिंह ने चुपचाप घोड़ा वापस अस्तबल में बाँध दिया।
II निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर पाँच वाक्यों में लिखिए।
- खड्गसिंह कौन था? उसने क्या किया?
उत्तर – खड्गसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध और भयंकर डाकू था, जिसका नाम सुनकर लोग डर से काँपते थे। उसने बाबा भारती के घोड़े ‘सुलतान’ की बहुत प्रशंसा सुनी थी और उसे देखने की तीव्र इच्छा से वह बाबा भारती के पास आया। घोड़े को देखकर वह इतना प्रभावित हुआ कि उसने उसे हथियाने का निश्चय कर लिया। एक दिन संध्या के समय, उसने अपाहिज का वेश बनाकर बाबा भारती को धोखा दिया और घोड़े पर सवार होकर उसे भगा ले गया। बाद में, बाबा भारती की पवित्र भावना से प्रभावित होकर, उसने घोड़े को चुपचाप वापस अस्तबल में बाँध दिया।
- खड्गसिंह के मन परिवर्तन का कारण क्या था?
उत्तर – खड्गसिंह के मन परिवर्तन का मुख्य कारण बाबा भारती का परोपकारी और निःस्वार्थ व्यवहार था। घोड़ा चुराए जाने के बाद, जब बाबा भारती ने उसे रोका, तो खड्गसिंह को लगा कि वह घोड़े को वापस करने के लिए कहेंगे। लेकिन, बाबा भारती ने घोड़े को वापस करने के लिए न कहकर केवल यह प्रार्थना की कि वह इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करे। उन्होंने कहा कि यदि लोगों को इस घटना का पता लग गया, तो वे गरीबों और दुखियों पर विश्वास करना छोड़ देंगे, जिससे समाज को हानि होगी। बाबा भारती के इन ऊँचे विचारों और पवित्र भाव ने डाकू खड्गसिंह को गहराई से प्रभावित किया, और उसने अपनी गलती को समझते हुए घोड़े को चुपचाप अस्तबल में वापस बाँध दिया, जिससे उसका मन परिवर्तन हो गया।
बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर
बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर किसके समान आनंद आता था?
a) माँ को बेटे से
b) किसान को खेत से
c) दोनों a और b
d) व्यापारी को धन से
उत्तर: c (कहानी की पहली पंक्ति में स्पष्ट उल्लेख है।)
बाबा भारती घोड़े को क्या नाम से पुकारते थे?
a) राजा
b) सुलतान
c) वीर
d) बलवान
उत्तर: b (कहानी में बार-बार ‘सुलतान’ कहा गया है।)
खड्गसिंह इलाके का क्या था?
a) वैद्य
b) किसान
c) प्रसिद्ध डाकू
d) साधु
उत्तर: c (लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे।)
बाबा भारती ने घोड़े की चाल की तुलना किससे की?
a) शेर से
b) मोर से
c) हिरण से
d) हाथी से
उत्तर: b (मोर घटा को देखकर नाच रहा हो।)
खड्गसिंह घोड़े को देखकर क्या सोचने लगा?
a) इसे बेच देना चाहिए
b) ऐसा घोड़ा उसके पास होना चाहिए
c) इसे दान कर देना चाहिए
d) इसे मार देना चाहिए
उत्तर: b (डाकू होने के कारण अधिकार समझता था।)
खड्गसिंह ने अपाहिज बनकर बाबा से क्या माँगा?
a) धन
b) भोजन
c) घोड़े पर सवारी
d) दवा
उत्तर: c (रामावाला जाने के लिए।)
बाबा भारती ने खड्गसिंह से घटना छिपाने की प्रार्थना क्यों की?
a) अपना अपमान छिपाने के लिए
b) लोग गरीबों पर विश्वास न छोड़ें
c) घोड़ा वापस लेने के लिए
d) डाकू को बचाने के लिए
उत्तर: b (कहानी के क्लाइमेक्स में स्पष्ट।)
खड्गसिंह ने घोड़ा वापस लाकर क्या किया?
a) बेच दिया
b) अस्तबल में बाँध दिया
c) मार दिया
d) छिपा दिया
उत्तर: b (रात्रि में चुपके से।)
बाबा भारती ने घोड़ा वापस पाकर क्या कहा?
a) डाकू को मार डालूँगा
b) कोई गरीबों की सहायता से मुँह न मोड़ेगा
c) घोड़ा बेच दूँगा
d) मंदिर छोड़ दूँगा
उत्तर: b (कहानी के अंत में।)
सुदर्शन की कहानियों की मुख्य विशेषता क्या है?
a) रोमांस
b) बुराई पर अच्छाई की विजय
c) युद्ध
d) व्यापार
उत्तर: b (लेखक-परिचय में उल्लेख।)
बाबा भारती कहाँ रहते थे?
a) नगर में
b) गाँव से बाहर मंदिर में
c) जंगल में
d) महल में
उत्तर: b (नगर जीवन से घृणा थी।)
खड्गसिंह घोड़े को देखकर कितने देर चुप रहा?
a) कुछ पल
b) कुछ देर तक
c) पूरी रात
d) एक घंटा
उत्तर: b (आश्चर्य से।)
बाबा भारती ने घोड़े की रखवाली में क्या त्याग किया?
a) भोजन
b) नींद और भजन
c) धन
d) यात्रा
उत्तर: b (रातें जागकर।)
अपाहिज ने खुद को किसका भाई बताया?
a) बाबा भारती का
b) दुर्गादत्त वैद्य का
c) खड्गसिंह का
d) राजा का
उत्तर: b (सौतेला भाई।)
खड्गसिंह के आँसुओं में क्या था?
a) दुख
b) नेकी
c) क्रोध
d) भय
उत्तर: b (घोड़ा वापस करते समय।)
बाबा भारती सुबह क्या करते थे?
a) भोजन
b) ठंडे जल से स्नान
c) यात्रा
d) व्यापार
उत्तर: b (चौथा पहर आरंभ होते ही।)
घोड़े ने स्वामी को कैसे पहचाना?
a) आँखों से
b) पाँवों की चाप से
c) आवाज़ से
d) गंध से
उत्तर: b (हिनहिनाया।)
सुदर्शन का जन्म कब हुआ?
a) 1900
b) 1895
c) 1920
d) 1967
उत्तर: b (लेखक-परिचय।)
कहानी का मुख्य विषय क्या है?
a) डकैती
b) अच्छाई की जीत
c) घोड़ा चोरी
d) यात्रा
उत्तर: b (शीर्षक ‘हार की जीत’ से स्पष्ट।)
बाबा भारती ने घोड़े से मुँह क्यों मोड़ा?
a) क्रोध से
b) संबंध तोड़ने जैसे
c) भय से
d) खुशी से
उत्तर: b (जैसे कभी संबंध न रहा हो।)
अति लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- प्रश्न: कहानी “हार की जीत” के लेखक कौन हैं?
उत्तर: कहानी “हार की जीत” के लेखक श्री सुदर्शन हैं। - प्रश्न: श्री सुदर्शन का जन्म कब हुआ था?
उत्तर: श्री सुदर्शन का जन्म सन् 1895 में हुआ था। - प्रश्न: कहानी “हार की जीत” पहली बार कहाँ प्रकाशित हुई थी?
उत्तर: कहानी “हार की जीत” सन् 1920 में ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। - प्रश्न: बाबा भारती अपने किस घोड़े से बहुत प्रेम करते थे?
उत्तर: बाबा भारती अपने घोड़े सुलतान से बहुत प्रेम करते थे। - प्रश्न: बाबा भारती किस प्रकार के व्यक्ति थे?
उत्तर: बाबा भारती एक धार्मिक, दयालु और ईमानदार व्यक्ति थे, जो संसार से विरक्त होकर भगवान का भजन करते थे। - प्रश्न: बाबा भारती को सुलतान से इतना प्रेम क्यों था?
उत्तर: सुलतान बहुत सुंदर, बलवान और तेज़ चाल वाला घोड़ा था, इसलिए बाबा भारती उसे अपने पुत्र के समान प्यार करते थे। - प्रश्न: खड्गसिंह कौन था?
उत्तर: खड्गसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध और भयभीत करने वाला डाकू था। - प्रश्न: खड्गसिंह बाबा भारती के पास क्यों आया?
उत्तर: खड्गसिंह बाबा भारती के घोड़े सुलतान को देखने की इच्छा से उनके पास आया था। - प्रश्न: जब खड्गसिंह ने सुलतान को देखा तो उसके मन में क्या आया?
उत्तर: सुलतान को देखकर खड्गसिंह के मन में उसे पाने की तीव्र इच्छा उत्पन्न हुई। - प्रश्न: खड्गसिंह ने सुलतान को कैसे छीना?
उत्तर: खड्गसिंह ने अपाहिज बनकर धोखे से सुलतान को ठगा और घोड़ा लेकर भाग गया। - प्रश्न: जब सुलतान छीन लिया गया तो बाबा भारती ने क्या किया?
उत्तर: बाबा भारती बहुत दुखी हुए, परंतु उन्होंने खड्गसिंह से केवल एक प्रार्थना की कि वह इस घटना को किसी को न बताए। - प्रश्न: बाबा भारती ने खड्गसिंह से क्या प्रार्थना की?
उत्तर: बाबा भारती ने प्रार्थना की कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना ताकि लोग गरीबों पर से विश्वास न खो दें। - प्रश्न: बाबा भारती ने घोड़ा वापस क्यों नहीं माँगा?
उत्तर: बाबा भारती ने घोड़ा वापस इसलिए नहीं माँगा क्योंकि वे चाहते थे कि खड्गसिंह स्वयं अपनी गलती समझे। - प्रश्न: खड्गसिंह को बाबा भारती की बात सुनकर कैसा लगा?
उत्तर: बाबा भारती की महानता और उदारता देखकर खड्गसिंह बहुत प्रभावित हुआ और उसे पश्चाताप हुआ। - प्रश्न: खड्गसिंह ने बाद में क्या किया?
उत्तर: खड्गसिंह ने रात में सुलतान को वापस बाबा भारती के अस्तबल में बाँध दिया। - प्रश्न: जब बाबा भारती सुबह उठे तो उन्होंने क्या देखा?
उत्तर: सुबह उठकर बाबा भारती ने देखा कि सुलतान वापस अस्तबल में बँधा हुआ है। - प्रश्न: सुलतान को देखकर बाबा भारती की क्या प्रतिक्रिया थी?
उत्तर: सुलतान को देखकर बाबा भारती खुशी और आश्चर्य से रो पड़े और उसे गले लगाकर दुलारने लगे। - प्रश्न: कहानी “हार की जीत” का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: कहानी का मुख्य संदेश है कि सच्ची हार वही है जो किसी का विश्वास तोड़े, और सच्ची जीत वही है जिसमें अच्छाई बुराई पर विजय पाती है। - प्रश्न: कहानी में “हार” किसकी और “जीत” किसकी मानी जा सकती है?
उत्तर: बाहरी रूप से बाबा भारती हारे, लेकिन नैतिक रूप से उन्होंने खड्गसिंह के मन को जीत लिया, इसलिए अंततः हार की जीत हुई। - प्रश्न: इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर: इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि सच्ची महानता क्षमा, दया और विश्वास बनाए रखने में है।
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- प्रश्न – बाबा भारती अपने घोड़े को किस नाम से पुकारते थे और क्यों?
उत्तर – बाबा भारती अपने घोड़े को ‘सुलतान’ कहकर पुकारते थे। वह घोड़ा बहुत सुंदर, बलवान और इलाके भर में बेजोड़ था। बाबा भारती उसे देखकर बहुत प्रसन्न होते थे और अपना सारा समय उसी की सेवा में लगाते थे।
- प्रश्न – भगवद्-भजन से बचे समय को बाबा भारती कैसे उपयोग करते थे?
उत्तर – बाबा भारती भगवद्-भजन से जो समय बचता था, वह घोड़े की देखभाल और सेवा में अर्पण कर देते थे। वह अपने हाथ से खरहरा करते, उसे दाना खिलाते और हर संध्या उस पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर लगाए बिना उन्हें चैन नहीं आता था।
- प्रश्न – डाकू खड्गसिंह का हृदय सुलतान को देखने के लिए क्यों अधीर हो उठा?
उत्तर – खड्गसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध डाकू था। होते-होते सुलतान की कीर्ति (प्रशंसा) उसके कानों तक पहुँची। उसने घोड़े की सुंदरता और चाल के बारे में इतना सुना कि उसका हृदय उसे देखने के लिए बेचैन हो उठा।
- प्रश्न – सुलतान की चाल देखकर खड्गसिंह के मन में क्या विचार आया?
उत्तर – सुलतान की वायुवेग-सी चाल देखकर खड्गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया। एक डाकू होने के नाते, उसने सोचा कि ऐसा बाँका घोड़ा इस साधु के पास नहीं, बल्कि उसके पास होना चाहिए, और उसने उसे छीन लेने का निश्चय कर लिया।
- प्रश्न – घोड़ा ले जाने से पहले खड्गसिंह ने बाबा भारती को क्या धमकी दी थी?
उत्तर – घोड़ा देखने के बाद, खड्गसिंह ने जाते-जाते बाबा भारती से कहा, “बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।” इस धमकी के बाद, बाबा भारती को रातों की नींद हराम हो गई और वह घोड़े की रखवाली में लगे रहते थे।
- प्रश्न – बाबा भारती ने खड्गसिंह का भय मानना कब बंद कर दिया था?
उत्तर – खड्गसिंह की धमकी के बाद बाबा भारती कई महीनों तक अस्तबल की रखवाली करते रहे, पर जब वह नहीं आया, तो बाबा भारती कुछ असावधान हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नाई मिथ्या (झूठा) समझने लगे।
- प्रश्न – खड्गसिंह ने बाबा भारती को किस प्रकार धोखा दिया?
उत्तर – खड्गसिंह ने एक अपाहिज का वेश धारण किया और वृक्ष की छाया में कराहता हुआ मिला। उसने बाबा भारती से प्रार्थना की कि उसे घोड़े पर बैठाकर रामावाला पहुँचा दें। जैसे ही बाबा भारती ने उसे घोड़े पर बैठाया, वह झटका देकर लगाम छुड़ाकर भाग गया।
- प्रश्न – घोड़ा चुराने के बाद बाबा भारती ने खड्गसिंह से क्या प्रार्थना की?
उत्तर – बाबा भारती ने घोड़े को वापस न माँगते हुए खड्गसिंह से केवल यह एक प्रार्थना की कि वह इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करे। उन्होंने कहा कि यह घटना लोगों का गरीबों पर से विश्वास उठा देगी।
- प्रश्न – बाबा भारती को किस बात का भय था कि घोड़ा चुराने की घटना लोगों को पता चलने पर क्या होगा?
उत्तर – बाबा भारती को यह भय था कि अगर इस घटना का पता लोगों को लग गया, तो वे यह सोचेंगे कि अपाहिज का वेश बनाकर धोखा दिया गया है, और इस कारण वे भविष्य में किसी भी गरीब या दुखियारे पर विश्वास नहीं करेंगे।
- प्रश्न – घोड़ा वापस अस्तबल में बाँधने के बाद बाबा भारती ने संतोष से क्या कहा?
उत्तर – रात्रि के तीसरे पहर जब बाबा भारती अस्तबल में पहुँचे और घोड़े को हिनहिनाते हुए सुनकर पाया, तो उन्होंने सुलतान को गले लगाया और संतोष से कहा, “अब कोई गरीबों की सहायता से मुँह न मोड़ेगा।”
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- प्रश्न – कहानी ‘हार की जीत’ में बाबा भारती के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता क्या थी, और यह किस घटना से सिद्ध होती है?
उत्तर – बाबा भारती के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उच्च नैतिकता और मानवीय सद्भाव थी। यह तब सिद्ध होती है जब घोड़ा चोरी होने के बावजूद, उनका एकमात्र डर यह था कि लोग गरीबों पर विश्वास करना न छोड़ दें। उन्होंने अपने प्रिय घोड़े से अधिक सामाजिक मूल्यों को महत्व दिया, जो उनकी महानता को दर्शाता है और खड्गसिंह के मन को परिवर्तित करता है।
- प्रश्न – बाबा भारती को खड्गसिंह की धमकी के बाद भी घोड़े की चिंता करना क्यों बंद कर दिया? उनके असावधान होने का क्या परिणाम हुआ?
उत्तर – खड्गसिंह की धमकी के बाद बाबा भारती ने कई महीनों तक सावधानीपूर्वक घोड़े की रखवाली की। लेकिन जब बहुत समय बीत गया और डाकू नहीं आया, तो उन्होंने इस भय को झूठा समझकर कुछ असावधान होना शुरू कर दिया। उनके इसी असावधान होने का परिणाम हुआ कि डाकू खड्गसिंह ने एक दिन अपाहिज का वेश बनाकर उन्हें धोखा दिया और उनका प्रिय घोड़ा सुलतान चुरा लिया।
- प्रश्न – खड्गसिंह ने सुलतान को वापस क्यों कर दिया, जबकि वह एक डाकू था और घोड़े को अपना अधिकार समझता था?
उत्तर – खड्गसिंह ने सुलतान को इसलिए वापस कर दिया क्योंकि वह बाबा भारती की निःस्वार्थ प्रार्थना से अत्यंत प्रभावित हुआ। बाबा भारती ने घोड़े की परवाह न करते हुए, केवल सामाजिक कल्याण के लिए यह घटना गुप्त रखने को कहा, ताकि गरीब लोगों पर से विश्वास न उठे। डाकू ने सोचा कि ऐसा मनुष्य, मनुष्य नहीं, देवता है, और इस पवित्र भावना ने उसका हृदय बदलकर घोड़े को वापस अस्तबल में बाँधने को प्रेरित किया।
- प्रश्न – ‘हार की जीत’ शीर्षक की सार्थकता कहानी के अंत में किस प्रकार सिद्ध होती है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – ‘हार की जीत’ शीर्षक पूरी तरह सार्थक है क्योंकि बाबा भारती ने घोड़ा खोकर भी नैतिकता और मानवता की जीत हासिल की। उन्होंने भौतिक वस्तु (घोड़ा) को त्यागकर, अपने पवित्र विचार से डाकू खड्गसिंह के हृदय परिवर्तन को संभव बनाया। खड्गसिंह का घोड़ा लौटाना यह सिद्ध करता है कि पाप पर पुण्य की विजय हुई है, और बाबा भारती की नैतिक हार ही वास्तव में मानवता की सबसे बड़ी जीत बनी।
- प्रश्न – खड्गसिंह के मन परिवर्तन के बाद रात के अंधकार में उसके व्यवहार का वर्णन कीजिए।
उत्तर – मन परिवर्तन के बाद, खड्गसिंह उसी रात्रि के अंधकार में सुलतान की लगाम पकड़े हुए बाबा भारती के मंदिर पहुँचा। उसने देखा कि अस्तबल का फाटक खुला पड़ा है, क्योंकि बाबा भारती को अब चोरी का कोई भय नहीं था। खड्गसिंह ने सावधानी से सुलतान को उसके स्थान पर बाँधा और फाटक बंद कर दिया।

