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सुखमय जीवन – चंद्रधर शर्मा गुलेरी

Sukhamay Jeevan By Chandradhar Sharma Guleri The Best Explanation

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चंद्रधर शर्मा गुलेरी का जन्म 7 जुलाई 1883 राजस्थान की वर्तमान राजधानी जयपुर में हुआ था। उनके पिता पंडित शिवराम शास्त्री मूलतः हिमाचल प्रदेश के गुलेर गाँव के निवासी थे। गुलेरी जी की एक रचना, वह भी छोटी विधा-कहानी लिखकर साहित्य जगत में अमर हो जानेवाले साहित्यकार हैं। ‘उसने कहा था’ कहानी के रचनाकार के रूप में गुलेरी जी हिंदी कथा साहित्य में अनिवार्य रूप से स्थान प्राप्त करते आए हैं। उन्होंने केवल तीन कहानियाँ लिखीं (1) सुखमय जीवन, (2) बुद्धू का काँटा, (3) उसने कहा था। गुलेरी जी अपने युग के प्रकांड विद्वान थे, अनेक विदेशी भाषाओं के ज्ञाता, कुशल संपादक और निबंधकार थे। उनकी ‘उसने कहा था’ कहानी कथा जगत की विशेष उपलब्धि है। सन् 1915 में प्रकाशित यह कहानी अपनी समसामयिक रचनाओं के कथ्य और शिल्प दोनों में अत्यंत भिन्न एवं उत्कृष्ट कलाकृति होने के कारण ध्यानाकर्षण का केंद्र बनी।

सुखमय जीवन – चंद्रधर शर्मा गुलेरी

परीक्षा देने के पीछे और उसके फल निकलने के पहले दिन किस बुरी तरह बीतते हैं, यह उन्हीं को मालूम है जिन्हें उन्हें गिनने का अनुभव हुआ है। सुबह उठते ही परीक्षा से आज तक कितने दिन गए, यह गिनते हैं और फिर ‘कहावती आठ हफ़्ते’ में कितने दिन घटते हैं, यह गिनते हैं। कभी-कभी उन आठ हफ़्तों पर कितने दिन चढ़ गए, यह भी गिनना पड़ता है। खाने बैठे हैं और डाकिए के पैर की आहट आई—कलेजा मुँह को आया। मुहल्ले में तार का चपरासी आया कि हाथ-पाँव काँपने लगे। न जागते चैन, न सोते। सपने में भी यह दिखता है कि परीक्षक साहब एक आठ हफ़्ते की लंबी छुरी लेकर छाती पर बैठे हुए हैं।

मेरा भी बुरा हाल था। एलएलबी का फल अबकी और भी देर से निकलने को था—न-मालूम क्या हो गया था, या तो कोई परीक्षक मर गया था, या उसको प्लेग हो गया था। उसके पर्चे किसी दूसरे के पास भेजे जाने को थे। बार-बार यही सोचता था कि प्रश्नपत्रों की जाँच किए पीछे सारे परीक्षकों और रजिस्ट्रारों को भले ही प्लेग हो जाए, अभी तो दो हफ़्ते माफ़ करें। नहीं तो परीक्षा के पहले ही उन सबको प्लेग क्यों न हो गया? रात-भर नींद नहीं आई थी, सिर घूम रहा था; अख़बार पढ़ने बैठा कि देखता क्या हूँ कि लिनोटाइप की मशीन ने चार-पाँच पंक्तियाँ उलटी छाप दी हैं। बस अब नहीं सहा गया—सोचा कि घर से निकल चलो; बाहर ही कुछ जी बहलेगा। लोहे का घोड़ा उठाया कि चल दिए।

तीन-चार मील जाने पर शांति मिली। हरे-हरे खेतों की हवा, कहीं पर चिड़ियों की चहचह और कहीं कुओं पर खेतों को सींचते हुए किसानों का सुरीला गाना, कहीं देवदार के पत्तों की सोंधी बास और कहीं उनमें हवा का सी-सी करके बजना—सबने मेरे परीक्षा के भूत की सवारी को हटा लिया। बाइसिकिल भी ग़ज़ब की चीज़ है। न दाना माँगे, न पानी, चलाए जाइए जहाँ तक पैरों में दम हो। सड़क में कोई था ही नहीं, कहीं-कहीं किसानों के लड़के और गाँव के कुत्ते पीछे लग जाते थे। मैंने बाइसिकिल को और भी हवा कर दिया। सोचा कि मेरे घर सितारपुर से पंद्रह मील पर कालानगर है—वहाँ की मलाई की बरफ़ अच्छी होती है और वहीं मेरे एक मित्र रहते हैं; वे कुछ सनकी हैं। कहते हैं कि जिसे पहले देख लेंगे, उससे विवाह करेंगे। उनसे कोई विवाह की चर्चा करता है, तो अपने सिद्धान्त के मंडन का व्याख्यान देने लग जाते हैं। चलो, उन्हीं से सिर ख़ाली करें।

ख़याल पर ख़याल बँधने लगा। उनके विवाह का इतिहास याद आया। उनके पिता कहते थे कि सेठ गणेशलाल की एकलौती बेटी से अब की छुट्टियों में तुम्हारा ब्याह कर देंगे। पड़ोसी कहते थे कि सेठजी की लड़की कानी और मोटी है और आठ ही वर्ष की है। पिता कहते थे कि लोग जलकर ऐसी बातें उड़ाते हैं; और लड़की वैसी हो भी तो क्या, सेठजी के कोई लड़का है नहीं; बीस-तीस हज़ार का गहना देंगे। मित्र महाशय मेरे साथ-साथ पहले डिबेटिंग क्लबों में बाल-विवाह और माता-पिता की ज़बरदस्ती पर इतने व्याख्यान झाड़ चुके थे कि अब मारे लज्जा के साथियों में मुँह नहीं दिखाते थे। क्योंकि पिताजी के सामने चीं करने की हिम्मत नहीं थी। व्यक्तिगत विचार से साधारण विचार उठने लगे। हिंदू-समाज ही इतना सड़ा हुआ है कि हमारे सद्विचार एक तरह के पशु हैं जिनकी बलि माता-पिता की ज़िद और हठ की वेदी पर चढ़ाई जाती है।…भारत का उद्धार तब नहीं हो सकता।

फिस्स्स्! एकदम अर्श से फ़र्श पर गिर पड़े। बाइसिकिल की फूँक निकल गई। कभी गाड़ी नाव पर, कभी नाव गाड़ी पर। पंप साथ नहीं था और नीचे देखा तो जान पड़ा कि गाँव के लड़कों ने सड़क पर ही काँटों की बाड़ लगाई है। उन्हें भी दो गालियाँ दी पर उससे तो पंक्चर सुधरा नहीं। कहाँ तो भारत का उद्धार हो रहा था और कहाँ अब कालानगर तक इस चरखे को खैंच ले जाने की आपत्ति से कोई निस्तार नहीं दिखता। पास के मील के पत्थर पर देखा कि कालानगर यहाँ से सात मील है। दूसरे पत्थर के आते-आते मैं बेदम हो लिया था। धूप जेठ की और कंकरीली सड़क, जिसमें लदी हुई बैलगाड़ियों की मार से छः-छः इंच शक्कर की-सी बारीक पिसी हुई सफ़ेद मिट्टी बिछी हुई! काले पेटेंट लेदर के जूतों पर एक-एक इंच सफ़ेद पालिश चढ़ गई। लाल मुँह को पोंछते-पोंछते रूमाल भीग गया और मेरा सारा आकार सभ्य विद्वान का-सा नहीं, वरन सड़क कूटने वाले मज़दूर का-सा हो गया। सवारियों के हम लोग इतने ग़ुलाम हो गए हैं कि दो-तीन मील चलते ही छठी का दूध याद आने लगता है!

 

2

बाबूजी, क्या बाइसिकिल में पंक्चर हो गया?

एक तो चश्मा, उस पर रेत की तह जमी हुई, उस पर ललाट से टपकती हुई पसीने की बूँदें; गर्मी की चिढ़ और काली रेत की-सी लंबी सड़क—मैंने देखा ही नहीं था कि दोनों ओर क्या है। यह शब्द सुनते ही सिर उठाया, तो देखा कि एक सोलह-सत्रह वर्ष की कन्या सड़क के किनारे खड़ी है।

हाँ, हवा निकल गई है और पंक्चर भी हो गया है। पंप मेरे पास है नहीं। कालानगर कुछ बहुत दूर तो है ही नहीं—अभी जा पहुँचता हूँ।

अंत का वाक्य मैंने केवल ऐंठ दिखाने के लिए कहा था। मेरा जी जानता था कि पाँच मील पाँच सौ मील के-से दिख रहे थे।

इस सूरत से आप कालानगर क्या कलकत्ते पहुँच जाएँगे! ज़रा भीतर चलिए, कुछ जल पीजिए। आपकी जीभ सूखकर तालू से चिपक गई होगी। चाचाजी की बाइसिकिल में पंप है और हमारा नौकर गोविंद पंक्चर सुधारना भी जानता है।

नहीं, नहीं।

नहीं, नहीं क्या, हाँ, हाँ।

यूँ कहकर बालिका ने मेरे हाथ से बाइसिकिल छीन ली और सड़क के एक तरफ़ हो ली। मैं भी उसके पीछे चला। देखा कि एक कँटीली बाड़ से घिरा बग़ीचा है जिसमें एक बँगला है। यहीं पर कोई ‘चाचाजी’ रहते होंगे परंतु यह बालिका कैसी!

मैंने चश्मा रूमाल से पोंछा और उसका मुँह देखा। पारसी चाल की एक गुलाबी साड़ी के नीचे चिकने काले बालों से घिरा हुआ उसका मुखमंडल दमकता था और उसकी आँखें मेरी ओर कुछ दया, हँसी और कुछ विस्मय से देख रही थीं। बस पाठक! ऐसी आँखें मैंने कभी नहीं देखी थीं। मानो वे मेरे कलेजे को घोलकर पी गईं। एक अद्भुत कोमल शांत ज्योति उनमें से निकल रही थी। कभी एक तीर में मारा जाना सुना है? कभी एक निगाह में हृदय बेचना पड़ा है? कभी तारामैत्रक और चक्षुमैत्र नाम आए हैं? मैंने एक सेकंड में सोचा और निश्चय कर लिया कि ऐसी सुंदर आँखें त्रिलोकी में न होंगी और यदि किसी स्त्री की आँखों को प्रेम-बुद्धि से कभी देखूँगा तो इन्हीं को।

आप सितारपुर से आए हैं। आपका नाम क्या है?

मैं जयदेवशरण वर्मा हूँ। आपके चाचाजी…?

“ओ हो, बाबू जयदेवशरण वर्मा, बी. ए.; जिन्होंने ‘सुखमय जीवन’ लिखा है! मेरा बड़ा सौभाग्य है कि आपके दर्शन हुए! मैंने आपकी पुस्तक पढ़ी है और चाचाजी तो उसकी प्रशंसा बिना किए एक दिन भी नहीं जाने देते। वे आपसे मिलकर बहुत प्रसन्न होंगे, बिना भोजन किए आपको न जाने देंगे और आपके ग्रंथ के पढ़ने से हमारा परिवार-सुख कितना बढ़ा है, इस पर कम-से-कम दो घंटे तक व्याख्यान देंगे।

स्त्री के सामने उसके नैहर की बड़ाई कर दें और लेखक के सामने उसके ग्रंथ की। यह प्रिय बनने का अमोघ मंत्र है। जिस साल मैंने बी.ए. पास किया था, उस साल कुछ दिन लिखने की धुन उठी थी। लॉ कॉलेज के फर्स्ट इयर में सेक्शन और कोड की परवाह न करके एक ‘सुखमय जीवन’ नामक पोथी लिख चुका था। समालोचकों ने आड़े हाथों लिया था और वर्ष-भर में सत्रह प्रतियाँ बिकी थीं। आज मेरी क़दर हुई कि कोई उसका सराहने वाला तो मिला!

इतने में हम लोग बरामदे में पहुँचे, जहाँ पर कनटोप पहने, पंजाबी ढंग की दाढ़ी रखे एक अधेड़ महाशय कुर्सी पर बैठे पुस्तक पढ़ रहे थे। बालिका बोली—

चाचाजी, आज आपके बाबू जयदेवशरण वर्मा बी. ए. को साथ लाई हूँ। इनकी बाइसिकिल बेकाम हो गई है। अपने प्रिय ग्रंथकार से मिलाने के लिए कमला को धन्यवाद मत दीजिए, दीजिए उनके पंप भूल आने को!

वृद्ध ने जल्दी ही चश्मा उतारा और दोनों हाथ बढ़ाकर मुझसे मिलने के लिए पैर बढ़ाए।

कमला, ज़रा अपनी माता को तो बुला ला। आइए बाबू साहब, आइए। मुझे आपसे मिलने की बड़ी उत्कंठा थी। मैं गुलाबराय वर्मा हूँ। पहले कमसेरियट में हेड क्लर्क था। अब पेंशन लेकर इस एकाक स्थान में रहता हूँ। दो गौ रखता हूँ और कमला तथा उसके भाई प्रबोध को पढ़ाता हूँ। मैं ब्रह्मसमाजी हूँ; मेरे यहाँ परदा नहीं है। कमला ने हिंदी मिडिल पास कर लिया है। हमारा समय शास्त्रों के पढ़ने में बीतता है। मेरी धर्मपत्नी भोजन बनाती और कपड़े सी लेती है; मैं उपनिषद और योगवासिष्ठ का तर्जुमा पढ़ा करता हूँ। स्कूल में लड़के बिगड़ जाते हैं, प्रबोध को इसलिए घर में पढ़ाता हूँ।

इतना परिचय दे चुकने पर वृद्ध ने श्वास लिया। मुझे इतना ज्ञान हुआ कि कमला के पिता मेरी जाति के ही हैं। जो कुछ उन्होंने कहा था, उसकी ओर मेरे कान नहीं थे—मेरे कान उधर थे, जिधर से माता को लेकर कमला आ रही थी।

‘आपका ग्रंथ बड़ा ही अपूर्व है। दांपत्य सुख चाहने वालों के लिए लाख रुपए से भी अनमोल है। धन्य है आपको! स्त्री को कैसे प्रसन्न रखना, घर में कलह कैसे नहीं होने देना, बाल-बच्चों को क्योंकर सच्चरित्र बनाना, इन सब बातों में आपके उपदेश पर चलने वाला पृथ्वी पर ही स्वर्ग-सुख भोग सकता है। पहले कमला की माँ और मेरे बीच कभी-कभी खटपट हो जाया करती थी। उसके ख़याल अभी पुराने ढंग के हैं। पर जब से मैं रोज़ भोजन के पीछे उसे आध घंटे तक आपकी पुस्तक का पाठ सुनाने लगा हूँ, तब से हमारा जीवन हिंडोले की तरह झूलते-झूलते बीतता है।

मुझे कमला की माँ पर दया आई, जिसको वह कूड़ा-करकट रोज़ सुनना पड़ता होगा। मैंने सोचा कि हिंदी के पत्र-संपादकों में यह बूढ़ा क्यों न हुआ? यदि होता तो आज मेरी तूती बोलने लगती।

आपको गृहस्थ जीवन का कितना अनुभव है! आप सब कुछ जानते हैं! भला, इतना ज्ञान कभी पुस्तकों से मिलता है? कमला की माँ कहा करती थी कि आप केवल किताबों के कीड़े हैं, सुनी-सुनाई बातें लिख रहे हैं। मैं बार-बार यह कहता था कि इस पुस्तक के लिखने वाले को परिवार का ख़ूब अनुभव है। धन्य है आपकी सहधर्मिणी! आपका और उसका जीवन कितने सुख से बीतता होगा! और जिन बालकों के आप पिता हैं, वे कैसे बड़भागी हैं कि सदा आपकी शिक्षा में रहते हैं; आप जैसे पिता का उदाहरण देखते हैं।”

कहावत है कि वेश्या अपनी अवस्था कम दिखाना चाहती है और साधु अपनी अवस्था अधिक दिखाना चाहता है। भला, ग्रंथकार का पद इन दोनों में किसके समान है? मेरे मन में आया कि कह दूँ कि अभी मेरा पचीसवाँ वर्ष चल रहा है, कहाँ का अनुभव और कहाँ का परिवार? फिर सोचा कि ऐसा कहने से ही मैं वृद्ध महाशय की निगाहों से उतर जाऊँगा और कमला की माँ सच्ची हो जाएगी कि बिना अनुभव के छोकरे ने गृहस्थ के कर्तव्य धर्मों पर पुस्तक लिख मारी है। यह सोचकर मैं मुस्कुरा दिया और इस तरह मुँह बनाने लगा कि वृद्ध समझा कि अवश्य मैं संसार-समुद्र में गोते मार-मारकर नहाया हुआ हूँ।

 

3

वृद्ध ने उस दिन मुझे जाने नहीं दिया। कमला की माता ने प्रीति के साथ भोजन कराया और कमला ने पान लाकर दिया। न मुझे अब कालानगर की मलाई की बरफ़ याद रही और न सनकी मित्र की। चाचाजी की बातों में फ़ी सैकड़े सत्तर तो मेरी पुस्तक और उसके रामबाण लाभों की प्रशंसा थी, जिसको सुनते-सुनते मेरे कान दुख गए। फ़ी सैकड़े पचीस वह मेरी प्रशंसा और मेरे पति-जीवन और पितृ-जीवन की महिमा गा रहे थे। काम की बात बीसवाँ हिस्सा थी जिससे मालूम पड़ा कि अभी कमला का विवाह नहीं हुआ है, उसे अपनी फूलों की क्यारी को सँभालने का बड़ा प्रेम है, वह ‘सखी’ के नाम से ‘महिला मनोहर’ मासिक पत्र में लेख भी दिया करती है।

सायंकाल को मैं बग़ीचे में टहलने निकला। देखता क्या हूँ कि एक कोने में केले के झाड़ों के नीचे मोतिए और रजनीगंधा की क्यारियाँ हैं और कमला उनमें पानी दे रही है। मैंने सोचा कि यही समय है। आज मरना है या जीना है। उसको देखते ही मेरे हृदय में प्रेम की अग्नि जल उठी थी और दिन-भर वहाँ रहने से वह धधकने लग गई थी। दो ही पहर में मैं बालक से युवा हो गया था। अंग्रेज़ी-महाकाव्यों में, प्रेममय उपन्यासों में और कोर्स के संस्कृत-नाटकों में जहाँ-जहाँ प्रेमिका-प्रेमिक का वार्तालाप पढ़ा था, वहाँ-वहाँ के वाक्यों को खोज रहा था, पर यह निश्चय नहीं कर सका कि इतने थोड़े परिचय पर भी बात कैसे करनी चाहिए। अंत में अंग्रेज़ी पढ़ने वाले की धृष्टता ने आर्यकुमार की शालीनता पर विजय पाई और चपलता कहिए, बेसमझी कहिए, ढीठपन कहिए, पागलपन कहिए, मैंने दौड़कर कमला का हाथ पकड़ लिया। उसके चेहरे पर सुर्खी दौड़ गई और डोलची उसके हाथ से गिर पड़ी। मैं उसके कान में कहने लगा—

आपसे एक बात कहनी है।

क्या? यहाँ कहने की कौन-सी बात है?

जब से आपको देखा है तबसे…”

बस, चुप करो। ऐसी घृष्टता!

अब मेरा वचन-प्रवाह उमड़ चुका था। मैं स्वयं नहीं जानता था कि मैं क्या कह रहा हूँ, पर लगा बकने, “प्यारी कमला, तुम मुझे प्राणों से बढ़कर हो; प्यारी कमला, मुझे अपना भ्रमर बनने दो! मेरा जीवन तुम्हारे बिना मरुस्थल है, उसमें मंदाकिनी बनकर बहो। मेरे जलते हुए हृदय में अमृत की पट्टी बन जाओ। जब से तुम्हें देखा है, मेरा मन मेरे अधीन नहीं है। मैं तब तक शांति न पाऊँगा तब तक तुम…”

कमला ज़ोर से चीख़ उठी और बोली—आपको ऐसी बातें कहते लज्जा नहीं आती? धिक्कार है आपकी शिक्षा को और धिक्कार है आपकी विद्या को! इसी को आपने सभ्यता मान रखा है कि अपरिचित कुमारी से एकांत ढूँढकर ऐसा घृणित प्रस्ताव करें! तुम्हारा यह साहस कैसे हो गया? तुमने मुझे क्या समझ रखा है? ‘सुखमय जीवन’ का लेखक और ऐसा घृणित चरित्र! चिल्लू-भर पानी में डूब मरो। अपना काला मुँह मुझे मत दिखाओ। अभी चाचाजी को बुलाती हूँ।

मैं सुनता जा रहा था। क्या मैं स्वप्न देख रहा हूँ? यह अग्निवर्षा मेरे किस अपराध पर? तो भी मैंने हाथ नहीं छोड़ा। कहने लगा, सुनो कमला, यदि तुम्हारी कृपा हो जाए, तो सुखमय जीवन…”

देखा तेरा सुखमय जीवन! आस्तीन के साँप! पापात्मा!! मैंने साहित्य-सेवी जानकर और ऐसे उच्च विचारों का लेखक समझकर तुझे अपने घर में घुसने दिया था और तेरा विश्वास और सत्कार किया था। प्रच्छन्नपापिन! वकदांभिक! बिड़ाल व्रतिक! मैंने तेरी सारी बातें सुन ली हैं। – चाचाजी आकर लाल-लाल आँखें दिखाते हुए, क्रोध से काँपते हुए कहने लगे, शैतान, तुझे यहाँ आकर माया-जाल फैलाने का स्थान मिला। ओफ़। मैं तेरी पुस्तक से छला गया। पवित्र जीवन की प्रशंसा में फ़ार्मों के फ़ार्म काले करने वाले, तेरा ऐसा हृदय! कपटी! विष के घड़े…‘

उनका धाराप्रवाह बंद ही नहीं होता था, पर कमला की गालियाँ और थीं और चाचाजी की और। मैंने भी ग़ुस्से में आकर कहा, बाबू साहब, ज़बान सँभालकर बोलिए। आपने अपनी कन्या को शिक्षा दी है और सभ्यता सिखाई है, मैंने भी शिक्षा पाई है और कुछ सभ्यता सीखी है। आप धर्म-सुधारक हैं। यदि मैं उसके गुणों और रूप पर आसक्त हो गया, तो अपना पवित्र प्रणय उसे क्यों न बताऊँ? पुराने ढर्रे के पिता दुराग्रही होते सुने गए हैं। आपने क्यों सुधार का नाम लजाया है?

तुम सुधार का नाम मत लो। तुम तो पापी हो। ‘सुखमय जीवन’ के कर्ता होकर…

भाड़ में जाए ‘सुखमय जीवन’! उसी के मारे नाकों दम है! ‘सुखमय जीवन’ के कर्ता ने क्या यह शपथ खा ली है कि जनम-भर क्वाँरा रहे? क्या उसे प्रेमभाव नहीं हो सकता? क्या उसमें हृदय नहीं होता?

हें, जनम-भर क्वाँरा?

हें काहे की? मैं तो आपकी पुत्री से निवेदन कर रहा था कि जैसे उसने मेरा हृदय हर लिया है वैसे यदि अपना हाथ मुझे दे, तो उसके साथ ‘सुखमय जीवन’ के उन आदर्शों को प्रत्यक्ष अनुभव करूँ, जो अभी तक मेरी कल्पना में हैं। पीछे हम दोनों आपकी आज्ञा माँगने आते। आप तो पहले ही दुर्वासा बन गए।

तो क्या आपका विवाह नहीं हुआ? आपकी पुस्तक से तो जान पड़ता है कि आप कई वर्षों से गृहस्थ-जीवन का अनुभव रखते हैं। तो कमला की माता ही सच्ची थीं।

इतनी बातें हुई थीं, पर न-मालूम क्यों मैंने कमला का हाथ नहीं छोड़ा था। इतनी गर्मी के साथ शास्त्रार्थ हो चुका था, परंतु वह हाथ, जो क्रोध के कारण लाल हो गया था, मेरे हाथ में ही पकड़ा हुआ था। अब उसमें सात्विक भाव का पसीना आ गया था और कमला ने लज्जा से आँखें नीची कर ली थीं। विवाह के पीछे कमला कहा करती है कि न-मालूम विधाता की किस कला से उस समय मैंने तुम्हें झटककर अपना हाथ नहीं खेंच लिया। मैंने कमला के दोनों हाथ खैंचकर अपने हाथों के संपुट में ले लिए (और उसने उन्हें हटाया नहीं!) और इस तरह चारों हाथ जोड़कर वृद्ध से कहा—

चाचाजी, उस निकम्मी पोथी का नाम मत लीजिए। बेशक कमला की माँ सच्ची है। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ अधिक पहचान सकती हैं कि कौन अनुभव की बातें कर रहा है और कौन हाँक रहा है। आपकी आज्ञा हो, तो कमला और मैं दोनों सच्चे सुखमय जीवन का आरंभ करें। दस वर्ष पीछे मैं जो पोथी लिखूँगा, उसमें किताबी बातें न होंगी, केवल अनुभव की बातें होंगी।

वृद्ध ने जेब से रूमाल निकालकर चश्मा पोंछा और अपनी आँखें पोंछीं। आँखों पर कमला की माता की विजय होने के क्षोभ के आँसू थे, या घर बैठे पुत्री को योग्य पात्र मिलने के हर्ष के आँसू, राम जाने।

उन्होंने मुस्कराकर कमला से कहा, दोनों मेरे पीछे-पीछे चले आओ। कमला! तेरी माँ ही सच कहती थी। वृद्ध बँगले की ओर चलने लगे। उनकी पीठ फिरते ही कमला ने आँखें मूँदकर मेरे कंधे पर सिर रख दिया।

 

 

पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा रचित कहानी ‘सुखमय जीवन’ का मुख्य भाव ‘अनुभवहीनता बनाम यथार्थ’ और ‘किताबी ज्ञान बनाम व्यावहारिक जीवन’ के द्वंद्व पर आधारित है। लेखक ने अत्यंत रोचक और व्यंग्यात्मक शैली में यह स्पष्ट किया है कि जीवन की वास्तविक पाठशाला अनुभवों से बनती है, केवल पुस्तकों से नहीं।

  • कोरे सिद्धांतों का खोखलापन – कहानी का नायक जयदेवशरण ‘सुखमय जीवन’ नामक एक ऐसी पुस्तक लिखता है जिसमें उसने गृहस्थ जीवन के ऊँचे-ऊँचे आदर्श प्रस्तुत किए हैं, जबकि वह स्वयं कुँवारा है और उसे दांपत्य का कोई अनुभव नहीं है। लेखक यह दिखाना चाहते हैं कि बिना अनुभव के लिखे गए सिद्धांत समाज के लिए ‘निकम्मी पोथी’ के समान होते हैं।

सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार

इस अंश की मुख्य संवेदना बाल-विवाह और मेल न खाने वाले विवाहों (Mismatch marriages) पर प्रहार करना है। सेठ की बेटी का ‘कानी’ या ‘मोटी’ होना उतना बड़ा मुद्दा नहीं है, जितना उसका मात्र ‘आठ वर्ष’ की बच्ची होना है। गुलेरी जी  यहाँ दिखाते हैं कि कैसे समाज में बच्चों के भविष्य का सौदा बचपन में ही कर दिया जाता है।

कथनी और करनी का अंतर (वैचारिक खोखलापन)

गद्यांश में लेखक के मित्र का चरित्र उन शिक्षित युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है जो डिबेटिंग क्लबों में तो ‘बाल-विवाह’ और ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ पर लंबे-चौड़े भाषण देते हैं, लेकिन जब स्वयं पर बात आती है, तो वे अपने माता-पिता के सामने खड़े होने का साहस नहीं जुटा पाते। यह मध्यम वर्ग के दोहरे चरित्र और मानसिक दासता को दर्शाता है।

  • मध्यमवर्गीय पाखंड पर व्यंग्य – कहानी में चाचा गुलाबराय जैसे पात्रों के माध्यम से मध्यमवर्गीय समाज पर चोट की गई है जो सिद्धांतों के इतने अंधे भक्त हो जाते हैं कि वे वास्तविकता को देख ही नहीं पाते। वे जयदेव को एक अनुभवी दार्शनिक मान लेते हैं, जबकि वह केवल एक काल्पनिक लेखक है।
  • स्त्री-दृष्टि की श्रेष्ठता – कहानी में कमला की चाची का यह मानना कि जयदेव केवल ‘किताबों का कीड़ा’ है, यह सिद्ध करता है कि स्त्रियाँ पुरुषों की तुलना में जीवन के यथार्थ और अनुभवों को अधिक सूक्ष्मता से पहचानती हैं।
  • सच्चे प्रेम की सहजता – जयदेव का किताबी शब्दावली (भ्रमर, मंदाकिनी) में प्रेम व्यक्त करना हास्यास्पद लगता है, जबकि अंत में अपनी भूल स्वीकार कर सहजता से हाथ माँगना ही उनके सच्चे प्रेम को सिद्ध करता है।

चंद्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा रचित कहानी ‘सुखमय जीवन’ हिंदी साहित्य की एक कालजयी रचना है। इस कहानी में लेखक ने संयोग, हास्य और प्रेम का बहुत ही सुंदर ताना-बाना बुना है।

  1. जयदेवशरण वर्मा (नायक और कथावाचक)

जयदेव इस कहानी के केंद्रीय पात्र हैं, जो एल.एल.बी. के छात्र हैं और ‘सुखमय जीवन’ नामक पुस्तक के लेखक हैं।

  • कल्पनाशील और आदर्शवादी – उन्होंने गृहस्थ जीवन पर एक पुस्तक लिखी है, जबकि उन्हें स्वयं इसका कोई अनुभव नहीं है। वे किताबी ज्ञान को ही यथार्थ मान बैठते हैं।
  • संवेदनशील और भावुक – प्रकृति के सौंदर्य और कमला की आँखों को देखकर वे तुरंत प्रेम पाश में बँध जाते हैं। वे एक ही नज़र में अपना हृदय हार बैठने वाले व्यक्ति हैं।
  • साहसी और स्पष्टवक्ता – अपनी पुस्तक की कमियों को अंत में स्वीकार कर लेते हैं और कमला के प्रति अपने प्रेम का इजहार करने में हिचकिचाते नहीं हैं।
  • मध्यमवर्गीय चिंताओं से ग्रस्त – परीक्षा के परिणाम की चिंता और भविष्य के प्रति अनिश्चितता उनके स्वभाव में एक प्रकार की व्याकुलता पैदा करती है।
  1. कमला (नायिका)

कमला एक आधुनिक, शिक्षित और गरिमामय युवती है।

  • बुद्धिमती और स्पष्टवादिनी – वह जयदेव की मदद करती है लेकिन उनके अनुचित व्यवहार (हाथ पकड़ने) पर उन्हें कड़ी फटकार भी लगाती है। वह नैतिकता और शिष्टाचार को महत्त्व देती है।
  • साहित्य अनुरागी – वह शिक्षित है और ‘सखी’ नाम से लेख लिखती है। वह जयदेव की पुस्तक की प्रशंसक है, जिससे उसकी साहित्यिक रुचि का पता चलता है।
  • संस्कारशील – वह अपने चाचा का सम्मान करती है और घर आए अतिथि का सत्कार करना जानती है।
  • लज्जाशील और कोमल – अंत में जयदेव के सच्चे प्रेम और विवाह के प्रस्ताव को जानकर वह लज्जा का अनुभव करती है, जो उसके चरित्र की कोमलता को दर्शाता है।
  1. गुलाबराय वर्मा (चाचाजी)

गुलाबराय जी एक सेवानिवृत्त (पेंशनभोगी) सरकारी कर्मचारी हैं जो अब शांति से अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

  • सिद्धांतवादी और सरल – वे ब्रह्मसमाजी हैं और परदा प्रथा के विरोधी हैं। वे खुले विचारों वाले व्यक्ति हैं लेकिन नैतिक मूल्यों के प्रति बहुत सख्त हैं।
  • पुस्तक प्रेमी – वे जयदेव की पुस्तक ‘सुखमय जीवन’ के अंधभक्त हैं और उसे अपने जीवन का आधार मानते हैं।
  • क्रोधी परंतु क्षमाशील – जयदेव की धृष्टता पर वे अत्यधिक क्रोधित होते हैं (दुर्वासा बन जाते हैं), लेकिन सच्चाई और जयदेव के कुँवारेपन का पता चलने पर वे तुरंत शांत होकर उन्हें आशीर्वाद दे देते हैं।
  • भावुक अभिभावक – अपनी भतीजी कमला के लिए एक सुयोग्य वर मिलने पर उनकी आँखों में हर्ष के आँसू आ जाते हैं।
  1. कमला की माँ (गौण पात्र – परोक्ष उपस्थिति)

हालाँकि वे कहानी में प्रत्यक्ष रूप से कम आती हैं, लेकिन उनकी चर्चा महत्त्वपूर्ण है।

  • यथार्थवादी और अनुभवी – वे जयदेव की पुस्तक को ‘किताबी कीड़ा’ और ‘बिना अनुभव की बातें’ मानती हैं। उनका मानना है कि किताबी ज्ञान और जीवन के यथार्थ अनुभव में बड़ा अंतर होता है। अंत में उनकी यह बात सच साबित होती है।

क्र.सं.

शब्द (Hindi Word)

हिंदी अर्थ (Meaning in Hindi)

English Meaning

1

व्यग्रता

बेचैनी, व्याकुलता

Restlessness / Anxiety

2

अहट

चलने की आवाज़

Footfall / Sound of footsteps

3

परीक्षक

परीक्षा लेने वाला

Examiner

4

पर्चा

प्रश्न-पत्र

Question paper

5

रजिस्ट्रार

कुलसचिव

Registrar

6

सोंधी बास

मिट्टी की खुशबू

Earthy fragrance

7

मंडन

समर्थन करना

To justify / Affirm

8

व्याख्यान

भाषण

Lecture / Discourse

9

लज्जा

शर्म

Shame / Bashfulness

10

सद्विचार

अच्छे विचार

Virtuous thoughts

11

अर्श

आकाश

Sky / Zenit

12

फ़र्श

ज़मीन

Floor / Ground

13

निस्तार

छुटकारा

Relief / Rescue

14

जेठ

गर्मी का एक महीना

Peak summer month

15

छठी का दूध याद आना

बहुत कष्ट होना

To be in a tight spot

16

ललाट

माथा

Forehead

17

ऐंठ

अकड़, घमंड

Arrogance / Vanity

18

दमकना

चमकना

To glow / Shine

19

विस्मय

आश्चर्य

Amazement / Wonder

20

त्रिलोकी

तीनों लोक

The three worlds

21

सौभाग्य

अच्छा भाग्य

Good fortune

22

अमोघ

अचूक (जो खाली न जाए)

Infallible

23

समालोचक

आलोचक

Critic / Reviewer

24

कनटोप

कान ढंकने वाली टोपी

Ear-muff cap

25

उत्कंठा

तीव्र इच्छा

Eagerness / Longing

26

एकाकी

अकेला

Solitary / Secluded

27

तर्जुमा

अनुवाद

Translation

28

अपूर्व

अनोखा / नया

Unprecedented / Unique

29

दांपत्य

पति-पत्नी का संबंध

Conjugal / Marital

30

अनमोल

जिसका मूल्य न हो

Priceless

31

कलह

झगड़ा

Discord / Quarrel

32

सच्चरित्र

अच्छे आचरण वाला

Of good character

33

सहधर्मिणी

पत्नी

Wife

34

बड़भागी

भाग्यशाली

Highly fortunate

35

महिमा

गौरव / बड़ाई

Glory / Grandeur

36

धृष्टता

ढीठपन / गुस्ताखी

Impudence / Audacity

37

आसक्त

मोहित होना

Infatuated / Attached

38

शालीनता

सभ्यता / विनम्रता

Decency / Modesty

39

भ्रमर

भौंरा

Bumblebee

40

मरुस्थल

रेगिस्तान

Desert

41

मंदाकिनी

आकाश गंगा / नदी

Celestial river

42

घृणित

नफरत के योग्य

Despicable / Loathsome

43

प्रच्छन्नपापी

छिपकर पाप करने वाला

Hidden sinner

44

वकदांभिक

बगुला भगत / ढोंगी

Hypocrite

45

बिड़ाल व्रतिक

कपटी व्यक्ति

Deceitful / Sly

46

विष

ज़हर

Poison / Venom

47

दुराग्रही

ज़िद करने वाला

Obstinate

48

सात्विक

शुद्ध / पवित्र

Pure / Virtuous

49

संपुट

जुड़ी हुई हथेलियाँ

Hollow of joined palms

50

क्षोभ

दुख / व्याकुलता

Agitation / Sorrow

  1. अर्श से फ़र्श पर गिरना – अचानक ऊँचाई से बहुत नीचे गिर जाना (कहानी में – बड़ी-बड़ी बातों से अचानक वास्तविकता पर आना)।
  2. नाक में दम करना – बहुत अधिक परेशान करना।
  3. तिलोकी में न होना – अत्यधिक सुंदर या दुर्लभ होना।
  4. तूती बोलना – बहुत अधिक प्रभाव होना या नाम होना।
  5. चिल्लू भर पानी में डूब मरना – अत्यंत लज्जित होना।

1. परीक्षा का तनाव और पलायन

कहानी की शुरुआत नायक जयदेवशरण वर्मा की मानसिक स्थिति से होती है। जयदेव एल.एल.बी. (LLB) की परीक्षा दे चुके हैं और परिणाम का इंतज़ार कर रहे हैं। परीक्षा के फल की प्रतीक्षा में वे बेहद तनाव में हैं। उन्हें हर समय डाकिया या चपरासी के आने का डर सताता है। इस मानसिक बोझ से राहत पाने के लिए वे अपनी बाइसिकिल उठाते हैं और सैर के लिए निकल पड़ते हैं।

2. बाइसिकिल का पंक्चर और कमला से भेंट

रास्ते में जयदेव प्रकृति के सौंदर्य का आनंद लेते हैं। वे अपने एक सनकी मित्र से मिलने कालानगर की ओर बढ़ते हैं। तभी अचानक उनकी बाइसिकिल पंक्चर हो जाती है। जेठ की चिलचिलाती धूप में वे थककर चूर हो जाते हैं। तभी उन्हें एक मीठी आवाज़ सुनाई देती है— “बाबूजी, क्या बाइसिकिल में पंक्चर हो गया?” यह आवाज़ कमला की थी, जो एक सोलह-सत्रह वर्ष की सुंदर कन्या थी। कमला उन्हें अपने चाचा के घर आमंत्रित करती है जहाँ पंक्चर सुधारने की सुविधा थी। जयदेव उसकी आँखों की चमक और सादगी देखकर पहली ही नज़र में अपना दिल हार बैठते हैं।

3. ‘सुखमय जीवन’ का रहस्य और लेखक का सम्मान

जब कमला को पता चलता है कि यह ‘सुखमय जीवन’ पुस्तक के लेखक जयदेवशरण वर्मा हैं, तो वह बहुत प्रसन्न होती है। वह बताती है कि उसके चाचा इस पुस्तक के बहुत बड़े प्रशंसक हैं। कमला के चाचा गुलाबराय वर्मा जयदेव का बहुत गर्मजोशी से स्वागत करते हैं। गुलाबराय जी का मानना है कि जयदेव को गृहस्थ जीवन का बहुत गहरा अनुभव है, क्योंकि उन्होंने पुस्तक में पति-पत्नी के संबंधों को बहुत आदर्श रूप में प्रस्तुत किया है।

यहाँ व्यंग्य यह है कि जयदेव ने वह पुस्तक बिना किसी व्यक्तिगत अनुभव के केवल कल्पना और किताबी ज्ञान के आधार पर लिखी थी। कमला की माँ (चाचीजी) हालाँकि इस पुस्तक को ‘किताबों का कीड़ा’ और ‘बिना अनुभव की बातें’ कहती हैं, पर गुलाबराय जी जयदेव को एक अनुभवी गृहस्थ मानकर उनका बहुत सत्कार करते हैं।

4. प्रेम का इजहार और विवाद

जयदेव दिन भर वहीं रुकते हैं। शाम को बग़ीचे में उन्हें कमला अकेले फूल चुनती हुई दिखती है। जयदेव अपने प्रेम को रोक नहीं पाते और अंग्रेज़ी उपन्यासों के प्रभाव में आकर आवेश में कमला का हाथ पकड़ लेते हैं और प्रेम का प्रस्ताव रखते हैं। कमला इस धृष्टता पर बहुत क्रोधित होती है। वह जयदेव को उनके ‘घृणित चरित्र’ के लिए धिक्कारती है और कहती है कि ‘सुखमय जीवन’ जैसा पवित्र ग्रंथ लिखने वाला व्यक्ति इतना गिरा हुआ कैसे हो सकता है? वह चिल्लाकर अपने चाचा को बुला लेती है।

5. अंत – वास्तविकता और मिलन

चाचा गुलाबराय जी भी आग-बबूला हो जाते हैं। वे जयदेव को ‘कपटी’ और ‘शैतान’ कहते हैं। तब जयदेव साहस बटोरकर स्पष्ट करते हैं कि वे कोई विवाहित व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि कुँवारे हैं और कमला से विवाह करना चाहते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि उनकी पुस्तक केवल कल्पना थी और वे कमला के साथ मिलकर ‘वास्तविक सुखमय जीवन’ का अनुभव प्राप्त करना चाहते हैं।

यह सुनकर चाचा का क्रोध शांत हो जाता है और उन्हें खुशी होती है कि उनकी भतीजी के लिए एक सुयोग्य और विद्वान वर मिल गया है। कमला भी अपनी लज्जा और सहमति प्रकट करती है। अंत में, जयदेव स्वीकार करते हैं कि कमला की माँ ही सच कहती थीं—अनुभव के बिना ज्ञान अधूरा है। वे निश्चय करते हैं कि अब वे दस साल बाद अनुभव के आधार पर नई पुस्तक लिखेंगे।

  1. ‘सुखमय जीवन’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – कहानी का शीर्षक ‘सुखमय जीवन’ व्यंग्यात्मक और सार्थक है। नायक जयदेव ने इसी नाम से एक पुस्तक लिखी है, जिसमें उसने बिना किसी अनुभव के गृहस्थ जीवन के आदर्शों और सुखों का वर्णन किया है। कहानी का अंत यह सिद्ध करता है कि वास्तविक ‘सुमय जीवन’ किताबी उपदेशों से नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, सच्चाई और यथार्थ अनुभवों से शुरू होता है। जब जयदेव अंत में कमला के साथ जीवन की नई शुरुआत करता है, तब वह स्वीकार करता है कि उसकी पुस्तक केवल कल्पना थी। अतः शीर्षक पुस्तक के झूठे आदर्शों और जीवन की वास्तविक सुखद शुरुआत, दोनों को बखूबी दर्शाता है।

  1. जयदेवशरण वर्मा का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर – जयदेव कहानी के नायक और एक शिक्षित मध्यमवर्गीय युवक हैं। वे कल्पनाशील हैं, जिसका प्रमाण उनकी पुस्तक ‘सुखमय जीवन’ है। वे भावुक स्वभाव के हैं, जो कमला को पहली नज़र में देखते ही अपना हृदय हार बैठते हैं। उनमें नैतिक साहस भी है; जब उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है, तो वे स्वीकार करते हैं कि उनकी पुस्तक अनुभवहीनता का परिणाम थी। वे चंचल और थोड़े उतावले भी हैं, जैसा कि उनके द्वारा कमला का हाथ पकड़ने के प्रसंग से झलकता है। अंततः वे एक ईमानदार प्रेमी के रूप में उभरते हैं जो सत्य को स्वीकार करने से नहीं डरता।

  1. कमला के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तर – कमला कहानी की नायिका है और वह एक शिक्षित, शालीन और स्पष्टवादी युवती है। वह जयदेव की विद्वत्ता का सम्मान करती है, लेकिन जब जयदेव मर्यादा लांघकर उसका हाथ पकड़ते हैं, तो वह दृढ़ता से उसका विरोध करती है। यह उसके आत्म-सम्मान और मज़बूत नैतिक चरित्र को दर्शाता है। वह केवल एक पारंपरिक लड़की नहीं है, बल्कि साहित्य प्रेमी भी है और ‘सखी’ नाम से लेख लिखती है। अंत में, जब उसे जयदेव के सच्चे प्रेम और उनके कुंवारे होने का पता चलता है, तो वह लज्जा और सहमति के साथ उन्हें स्वीकार कर लेती है।

  1. गुलाबराय वर्मा (चाचाजी) का व्यक्तित्व कैसा है?

उत्तर – गुलाबराय जी एक सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी और ब्रह्मसमाजी विचारों वाले व्यक्ति हैं। वे अनुशासनप्रिय और आदर्शवादी हैं। वे जयदेव की पुस्तक के इतने बड़े प्रशंसक हैं कि उसे अपने परिवार की सुख-शांति का आधार मानते हैं। वे अतिथि सत्कार में विश्वास रखते हैं, लेकिन नैतिकता के मामले में अत्यंत कठोर हैं। जब उन्हें जयदेव की धृष्टता का पता चलता है, तो वे क्रोधित होकर ‘दुर्वासा’ बन जाते हैं। हालांकि, सच्चाई जानने पर वे अपनी गलती सुधारते हैं और उदारता दिखाते हुए जयदेव और कमला के मिलन को आशीर्वाद देते हैं।

  1. कहानी में ‘किताबी ज्ञान’ और ‘व्यावहारिक अनुभव’ के बीच क्या द्वंद्व दिखाया गया है?

उत्तर – गुलेरी जी ने इस कहानी के माध्यम से यह संदेश दिया है कि व्यावहारिक अनुभव के बिना किताबी ज्ञान अधूरा और कभी-कभी हास्यास्पद होता है। जयदेव ने गृहस्थी पर किताब तो लिख दी, लेकिन उसे स्वयं दांपत्य जीवन का कोई ज्ञान नहीं था। कमला की माँ का यह कहना कि “वह केवल किताबी कीड़ा है”, यथार्थ को दर्शाता है। जयदेव को अंत में यह स्वीकार करना पड़ता है कि जो बातें उन्होंने पन्नों पर लिखी थीं, वे केवल कल्पना थीं। वास्तविक सुखमय जीवन की शुरुआत अनुभव से होती है, जिसे जयदेव ने कहानी के अंत में महसूस किया।

  1. जयदेव और कमला के बीच बग़ीचे में हुए विवाद का क्या महत्त्व है?

उत्तर – बग़ीचे का दृश्य कहानी का महत्त्वपूर्ण ‘मोड़’ (Climax) है। यहाँ जयदेव का किताबी रोमांस और कमला की व्यावहारिक नैतिकता टकराते हैं। जयदेव का हाथ पकड़ना उनके उतावलेपन को दिखाता है, जबकि कमला की डांट जयदेव के ‘लेखक’ वाले मुखौटे को उतार देती है। यह विवाद जयदेव को अपनी वास्तविकता स्वीकार करने पर मजबूर करता है। इसी घटना के कारण यह रहस्य खुलता है कि जयदेव विवाहित नहीं हैं। यह दृश्य कहानी के उद्देश्य को स्पष्ट करता है कि प्रेम और विवाह सिद्धांतों से नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और सच्चाई से चलते हैं।

  1. कहानी के प्रारंभ में जयदेव की मानसिक स्थिति का वर्णन कीजिए।

उत्तर – कहानी की शुरुआत में जयदेव अत्यधिक तनाव और व्याकुलता में हैं। एल.एल.बी. की परीक्षा देने के बाद वे परिणाम (Result) का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं। उन्हें हर आहट में डाकिए या तार वाले का भ्रम होता है। उनकी नींद उड़ चुकी है और वे परीक्षा के ‘भूत’ से पीछा छुड़ाना चाहते हैं। यह मानसिक बोझ इतना बढ़ जाता है कि वे शांति की तलाश में अपनी बाइसिकिल उठाकर शहर से दूर निकल जाते हैं। यह स्थिति एक छात्र की परीक्षा के प्रति घबराहट और अनिश्चितता का जीवंत चित्रण करती है।

  1. गुलेरी जी ने कहानी में हास्य और व्यंग्य का प्रयोग कैसे किया है?

उत्तर – गुलेरी जी की भाषा-शैली हास्य और सूक्ष्म व्यंग्य से भरपूर है। सबसे बड़ा व्यंग्य ‘सुखमय जीवन’ पुस्तक पर है, जिसे पढ़कर चाचाजी अपना जीवन सुधार रहे हैं, जबकि उसका लेखक स्वयं अनुभवहीन है। बाइसिकिल का पंक्चर होना और जयदेव का धूल से लथपथ होकर मज़दूर जैसा दिखना हास्य पैदा करता है। साथ ही, जयदेव का अंग्रेज़ी उपन्यासों की भाषा में प्रेम-प्रलाप करना और कमला का उन्हें ‘चिल्लू भर पानी में डूब मरने’ की नसीहत देना, स्थिति को मनोरंजक बनाता है। लेखक ने मध्यमवर्गीय पाखंड और दिखावे पर तीखा प्रहार किया है।

  1. कमला की माँ (चाचीजी) की टिप्पणी “वह किताबों का कीड़ा है” का क्या अर्थ है?

उत्तर – कमला की माँ कहानी का वह पात्र है जो बिना सामने आए भी यथार्थ का प्रतिनिधित्व करती है। उनकी यह टिप्पणी जयदेव की पुस्तक की जड़ों पर प्रहार करती है। उनका मानना था कि दांपत्य जीवन के नियम और बच्चों के पालन-पोषण की बातें उपदेशों से नहीं, बल्कि जीवन जीने से समझ आती हैं। वे जयदेव को केवल एक ऐसा ‘छोकरा’ मानती थीं जिसने सुनी-सुनाई बातें लिख दी हैं। अंत में जयदेव स्वयं स्वीकार करते हैं कि चाचीजी ही सबसे अधिक सच्ची थीं, क्योंकि पुरुषों की तुलना में स्त्रियाँ अनुभव को बेहतर पहचानती हैं।

  1. कहानी के अंत में जयदेव द्वारा ‘दस वर्ष बाद अनुभव की पोथी’ लिखने की बात क्यों कही गई?

उत्तर – जयदेव का यह कथन उनके पश्चाताप और परिपक्वता को दर्शाता है। उन्हें अहसास होता है कि उन्होंने ‘सुखमय जीवन’ लिखकर जो किताबी आदर्श प्रस्तुत किए थे, वे ठोस नहीं थे। कमला से विवाह के प्रस्ताव और चाचाजी से आशीर्वाद मिलने के बाद, वे जीवन के वास्तविक धरातल पर खड़े होते हैं। वे अनुभव करते हैं कि अब वे वास्तव में गृहस्थ जीवन की बारीकियों को समझेंगे। दस वर्ष का समय उन्होंने स्वयं को अनुभवी बनाने के लिए माँगा है, ताकि उनकी अगली पुस्तक कल्पना नहीं, बल्कि जीवन का सत्य हो।

1. परीक्षा के तनाव का चित्रण

“परीक्षा देने के पीछे और उसके फल निकलने के पहले दिन किस बुरी तरह बीतते हैं, यह उन्हीं को मालूम है जिन्हें उन्हें गिनने का अनुभव हुआ है। सुबह उठते ही परीक्षा से आज तक कितने दिन गए, यह गिनते हैं… खाने बैठे हैं और डाकिए के पैर की आहट आई—कलेजा मुँह को आया।”

  • संदर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा रचित कहानी ‘सुखमय जीवन’ से ली गई हैं।
  • प्रसंग – कहानी के प्रारंभ में लेखक ने परीक्षा दे चुके एक विद्यार्थी (जयदेव) की मानसिक व्याकुलता और परिणाम की प्रतीक्षा में होने वाले तनाव का वर्णन किया है।
  • व्याख्या – लेखक कहते हैं कि परीक्षा समाप्त होने और परिणाम आने के बीच का समय किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं होता। विद्यार्थी हर दिन उँगलियों पर गिनता है। डर का आलम यह होता है कि सामान्य सी आहट, जैसे डाकिए के आने की आवाज़ भी हृदय की धड़कन बढ़ा देती है। उसे लगता है कि शायद उसका परीक्षा फल आ गया है और वह असफल न हो जाए। यहाँ लेखक ने छात्रों की मनोवैज्ञानिक स्थिति का अत्यंत सजीव चित्रण किया है।

 

2. किताबी ज्ञान बनाम अनुभव (चाचाजी का कथन)

“आपका ग्रंथ बड़ा ही अपूर्व है। दांपत्य सुख चाहने वालों के लिए लाख रुपए से भी अनमोल है… पहले कमला की माँ और मेरे बीच कभी-कभी खटपट हो जाया करती थी… पर जब से मैं रोज़ भोजन के पीछे उसे आध घंटे तक आपकी पुस्तक का पाठ सुनाने लगा हूँ, तब से हमारा जीवन हिंडोले की तरह झूलते-झूलते बीतता है।”

  • संदर्भ – पूर्ववत्।
  • प्रसंग – जब जयदेव बाइसिकिल पंक्चर होने के कारण गुलाबराय (चाचाजी) के घर रुकते हैं, तब चाचाजी उनके ग्रंथ ‘सुखमय जीवन’ की प्रशंसा करते हैं।
  • व्याख्या – चाचाजी जयदेव को एक अनुभवी विद्वान मानकर कहते हैं कि उनकी पुस्तक गृहस्थ जीवन के लिए स्वर्ग का मार्ग है। वे अपना उदाहरण देते हैं कि कैसे पहले उनके और उनकी पत्नी के बीच झगड़े होते थे, लेकिन जयदेव की पुस्तक के उपदेशों ने उनके जीवन में मधुरता भर दी है। यहाँ लेखक ने गहरा व्यंग्य किया है—चाचाजी जिस पुस्तक को जीवन का आधार मान रहे हैं, वह एक ऐसे युवक ने लिखी है जिसे विवाह का कोई अनुभव ही नहीं है। यह ‘सिद्धांत’ और ‘व्यवहार’ के बीच के अंतर को दर्शाता है।

 

3. प्रेम का आवेग और शब्दावली

“प्यारी कमला, तुम मुझे प्राणों से बढ़कर हो; प्यारी कमला, मुझे अपना भ्रमर बनने दो! मेरा जीवन तुम्हारे बिना मरुस्थल है, उसमें मंदाकिनी बनकर बहो। मेरे जलते हुए हृदय में अमृत की पट्टी बन जाओ।”

  • संदर्भ – पूर्ववत्।
  • प्रसंग – जयदेव बग़ीचे में कमला को अकेला पाकर उत्तेजित हो जाते हैं और विदेशी उपन्यासों तथा नाटकों की भाषा में अपने प्रेम का प्रस्ताव रखते हैं।
  • व्याख्या – जयदेव यहाँ एक काल्पनिक प्रेमी की तरह बात कर रहे हैं। वे ऐसी उपमाओं का प्रयोग कर रहे हैं (जैसे मरुस्थल, मंदाकिनी, भ्रमर) जो उन्होंने किताबों में पढ़ी हैं। उनके प्रेम में वास्तविकता से अधिक नाटकीयता है। वे कमला को अपने जीवन की रक्षक और शीतलता प्रदान करने वाली ‘अमृत की पट्टी’ बताते हैं। यह अंश जयदेव के किताबी रोमांस और उनके चरित्र के उतावलेपन को उजागर करता है।

 

4. सत्य की स्वीकारोक्ति और अंत

“चाचाजी, उस निकम्मी पोथी का नाम मत लीजिए। बेशक कमला की माँ सच्ची है। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ अधिक पहचान सकती हैं कि कौन अनुभव की बातें कर रहा है और कौन हाँक रहा है… दस वर्ष पीछे मैं जो पोथी लिखूँगा, उसमें किताबी बातें न होंगी, केवल अनुभव की बातें होंगी।”

  • संदर्भ – पूर्ववत्।
  • प्रसंग – कहानी के अंत में जब जयदेव की असलियत सामने आती है कि वे कुंवारे हैं, तब वे अपनी ही पुस्तक की कमियों को स्वीकार करते हैं।
  • व्याख्या – जयदेव को अंत में बोध होता है कि गृहस्थी पर लिखी उनकी पुस्तक ‘निकम्मी’ थी क्योंकि वह अनुभवहीनता पर आधारित थी। वे स्वीकार करते हैं कि कमला की माँ (चाचीजी) सही थीं, जो उनकी पुस्तक को केवल ‘कोरी बातें’ मानती थीं। वे कहते हैं कि अब वे पहले जीवन का अनुभव प्राप्त करेंगे और फिर दस वर्ष बाद जो पुस्तक लिखेंगे, वह यथार्थ पर आधारित होगी। यह अंश ‘अनुभव’ को ‘ज्ञान’ से श्रेष्ठ सिद्ध करता है।

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