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माँ – मुंशी प्रेमचंद

Maa By Premchand The best Explanation

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माँ
1
आज बंदी छूटकर घर आ रहा है। करुणा ने एक दिन पहले ही घर लीप-पोत रखा था। इन तीन वर्षों में उसने कठिन तपस्या करके जो दस-पाँच रूपये जमा कर रखे थे, वह सब पति के सत्कार और स्वागत की तैयारियों में खर्च कर दिए। पति के लिए धोतियों का नया जोड़ा लाई थी, नए कुरते बनवाए थे, बच्चे के लिए नए कोट और टोपी की आयोजना की थी। बार-बार बच्चे को गले लगाती ओर प्रसन्न होती। अगर इस बच्चे ने सूर्य की भाँति उदय होकर उसके अँधेरे जीवन को प्रदीप्त न कर दिया होता, तो कदाचित् ठोकरों ने उसके जीवन का अंत कर दिया होता। पति के कारावास-दंड के तीन ही महीने बाद इस बालक का जन्म हुआ। उसी का मुँह देख-देखकर करूणा ने यह तीन साल काट दिए थे। वह सोचती- जब मैं बालक को उनके सामने ले जाऊँगी, तो वह कितने प्रसन्न होंगे! उसे देखकर पहले तो चकित हो जाएँगे, फिर गोद में उठा लेंगे और कहेंगे- करूणा, तुमने यह रत्न देकर मुझे निहाल कर दिया। कैद के सारे कष्ट बालक की तोतली बातों में भूल जाएँगे, उनकी एक सरल, पवित्र, मोहक दृष्टि दृदय की सारी व्यथाओं को धो डालेगी। इस कल्पना का आनंद लेकर वह फूली न समाती थी।
वह सोच रही थी- आदित्य के साथ बहुत-से आदमी होंगे। जिस समय वह द्वार पर पहुँचेंगे, जय-जयकार’ की ध्वनि से आकाश गूँज उठेगा। वह कितना स्वर्गीय दृश्य होगा! उन आदमियों के बैठने के लिए करूणा ने एक फटा-सा टाट बिछा दिया था, कुछ पान बना दिए थे ओर बार-बार आशामय नेत्रों से द्वार की ओर ताकती थी। पति की वह सुदृढ़ उदार तेजपूर्ण मुद्रा बार-बार आँखों में फिर जाती थी। उनकी वे बातें बार-बार याद आती थीं, जो चलते समय उनके मुख से निकलती थी, उनका वह धैर्य, वह आत्मबल, जो पुलिस के प्रहारों के सामने भी अटल रहा था, वह मुस्कराहट जो उस समय भी उनके अधरों पर खेल रही थी; वह आत्मभिमान, जो उस समय भी उनके मुख से टपक रहा था, क्या करूणा के हृदय से कभी विस्मृत हो सकता था! उसका स्मरण आते ही करुणा के निस्तेज मुख पर आत्मगौरव की लालिमा छा गई। यही वह अवलंब था, जिसने इन तीन वर्षों की घोर यातनाओं में भी उसके हृदय को आश्वासन दिया था। कितनी ही राते फाकों से गुजरीं, बहुधा घर में दीपक जलने की नौबत भी न आती थी, पर दीनता के आँसू कभी उसकी आँखों से न गिरे। आज उन सारी विपत्तियों का अंत हो जाएगा। पति के प्रगाढ़ आलिंगन में वह सब कुछ हँसकर झेल लेगी। वह अनंत निधि पाकर फिर उसे कोई अभिलाषा न रहेगी।
गगन-पथ का चिरगामी लपका हुआ विश्राम की ओर चला जाता था, जहाँ संध्या ने सुनहरा फर्श सजाया था और उज्ज्वल पुष्पों की सेज बिछा रखी थी। उसी समय करूणा को एक आदमी लाठी टेकता आता दिखाई दिया, मानो किसी जीर्ण मनुष्य की वेदना-ध्वनि हो। पग-पग पर रूककर खाँसने लगता थी। उसका सिर झुका हुआ था, करुणा उसका चेहरा न देख सकती थी, लेकिन चाल-ढाल से कोई बूढ़ा आदमी मालूम होता था; पर एक क्षण में जब वह समीप आ गया, तो करूणा पहचान गई। वह उसका प्यारा पति ही था, किंतु शोक! उसकी सूरत कितनी बदल गई थी। वह जवानी, वह तेज, वह चपलता, वह सुगठन, सब प्रस्थान कर चुका था। केवल हड्‌डियों का एक ढाँचा रह गया था। न कोई संगी, न साथी, न यार, न दोस्त। करूणा उसे पहचानते ही बाहर निकल आई, पर आलिंगन की कामना हृदय में दबकर रह गई। सारे मनसूबे धूल में मिल गए। सारा मनोल्लास आँसुओं के प्रवाह में बह गया,विलीन हो गया।
आदित्य ने घर में कदम रखते ही मुस्कराकर करूणा को देखा। पर उस मुस्कान में वेदना का एक संसार भरा हुआ था। करूणा ऐसी शिथिल हो गई, मानो हृदय का स्पंदन रूक गया हो। वह फटी हुई आँखों से स्वामी की ओर टकटकी बाँधे खड़ी थी, मानो उसे अपनी आँखों पर अब भी विश्वास न आता हो। स्वागत या दु -ख का एक शब्द भी उसके मुँह से न निकला। बालक भी गोद में बैठा हुआ सहमी आँखों से इस कंकाल को देख रहा था और माता की गोद में चिपटा जाता था।
आखिर उसने कातर स्वर में कहा- यह तुम्हारी क्या दशा है? बिल्कुल पहचाने नहीं जाते!
आदित्य ने उसकी चिंता को शांत करने के लिए मुस्कराने की चेष्टा करके कहा- कुछ नहीं, जरा दुबला हो गया हूँ। तुम्हारे हाथों का भोजन पाकर फिर स्वस्थ हो जाऊँगा।
करूणा- छी! सूखकर काँटा हो गए। क्या वहाँ भरपेट भोजन नहीं मिलता? तुम कहते थे, राजनैतिक आदमियों के साथ बड़ा अच्छा व्यवहार किया जाता है और वह तुम्हारे साथी क्या हो गए जो तुम्हें आठों पहर घेरे रहते थे और तुम्हारे पसीने की जगह खून बहाने को तैयार रहते थे?
आदित्य की त्योरियों पर बल पड़ गए। बोले- यह बड़ा ही कटु अनुभव है करूणा! मुझे न मालूम था कि मेरे कैद होते ही लोग मेरी ओर से यों आँखें फेर लेंगे, कोई बात भी न पूछेगा। राष्ट्र के नाम पर मिटनेवालों का यही पुरस्कार है, यह मुझे न मालूम था। जनता अपने सेवकों को बहुत जल्द भूल जाती है, यह तो मैं जानता था, लेकिन अपने सहयोगी ओर सहायक इतने बेवफा होते हैं, इसका मुझे यह पहला ही अनुभव हुआ। लेकिन मुझे किसी से शिकायत नहीं। सेवा स्वयं अपना पुरस्कार हैं। मेरी भूल थी कि मैं इसके लिए यश और नाम चाहता था।
करूणा- तो क्या वहाँ भोजन भी न मिलता था?
आदित्य- यह न पूछो करूणा, बड़ी करूण कथा है। बस, यही गनीमत समझो कि जीता लौट आया। तुम्हारे दर्शन बदे थे, नहीं कष्ट तो ऐसे-ऐसे उठाए कि अब तक मुझे प्रस्थान कर जाना चाहिए था। मैं जरा लेटूँगा। खड़ा नहीं रहा जाता। दिन-भर में इतनी दूर आया हूँ।
करूणा- चलकर कुछ खा लो, तो आराम से लेटो। (बालक को गोद में उठाकर) बाबूजी हैं बेटा, तुम्हारे बाबूजी। इनकी गोद में जाओ, तुम्हें प्यार करेंगे।
आदित्य ने आँसू-भरी आँखों से बालक को देखा और उनका एक-एक रोम उनका तिरस्कार करने लगा। अपनी जीर्ण दशा पर उन्हें कभी इतना दु -ख न हुआ था। ईश्वर की असीम दया से यदि उनकी दशा संभल जाती, तो वह फिर कभी राष्ट्रीय आन्दोलन के समीप न जाते। इस फूल-से बच्चे को यों संसार में लाकर दरिद्रता की आग में झोंकने का उन्हें क्या अधिकार था? वह अब लक्ष्मी की उपासना करेंगे और अपना क्षुद्र जीवन बच्चे के लालन-पालन के लिए अर्पित कर देंगे। उन्हें इस समय ऐसा ज्ञात हुआ कि बालक उन्हें उपेक्षा की दृष्टि से देख रहा है, मानो कह रहा है- ‘मेरे साथ आपने कौन-सा कर्तव्य-पालन किया?’ उनकी सारी कामना, सारा प्यार बालक को हृदय से लगा देने के लिए अधीर हो उठा, पर हाथ फैल न सके। हाथों में शक्ति ही न थी।
करूणा बालक को लिए हुए उठी और थाली में कुछ भोजन निकालकर लाई। आदित्य ने क्षुधापूर्ण, नेत्रों से थाली की ओर देखा, मानो आज बहुत दिनों के बाद कोई खाने की चीज सामने आई है। जानता था कि कई दिनों के उपवास के बाद और आरोग्य की इस गई-गुजरी दशा में उसे जबान को काबू में रखना चाहिए पर सब्र न कर सका, थाली पर टूट पड़ा और देखते-देखते थाली साफ कर दी। करूणा सशंक हो गई। उसने दोबारा किसी चीज के लिए न पूछा। थाली उठाकर चली गई, पर उसका दिल कह रहा था- इतना तो कभी न खाते थे।
करूणा बच्चे को कुछ खिला रही थी, कि एकाएक कानों में आवाज आई- करूणा!
करूणा ने आकर पूछा- क्या तुमने मुझे पुकारा है?
आदित्य का चेहरा पीला पड़ गया था और साँस जोर-जोर से चल रही थी। हाथों के सहारे वहीं टाट पर लेट गए थे। करूणा उनकी यह हालत देखकर घबरा गई। बोली- जाकर किसी वैद्य को बुला लाऊँ?
आदित्य ने हाथ के इशारे से उसे मना करके कहा- व्यर्थ है करूणा! अब तुमसे छिपाना व्यर्थ है, मुझे तपेदिक हो गया है। कई बार मरते-मरते बच गया हूँ। तुम लोगों के दर्शन बदे थे,इसलिए प्राण न निकलते थे। देखो प्रिये, रोओ मत।
करूणा ने सिसकियों को दबाते हुए कहा- मैं वैद्य को लेकर अभी आती हूँ।
आदित्य ने फिर सिर हिलाया- नहीं करूणा, केवल मेरे पास बैठी रहो। अब किसी से कोई आशा नहीं है। डाक्टरों ने जवाब दे दिया है। मुझे तो यह आश्चर्य है कि यहाँ पहुँच कैसे गया। न जाने कौन दैवी शक्ति मुझे वहाँ से खींच लाई। कदाचित् यह इस बुझते हुए दीपक की अंतिम झलक थी। आह! मैंने तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया। इसका मुझे हमेशा दु -ख रहेगा! मैं तुम्हें कोई आराम न दे सका। तुम्हारे लिए कुछ न कर सका। केवल सोहाग का दाग लगाकर और एक बालक के पालन का भार छोड़कर चला जा रहा हूँ। आह!
करूणा ने हृदय को दृढ़ करके कहा- तुम्हें कहीं दर्द तो नहीं है? आग बना लाऊँ? कुछ बताते क्यों नहीं?
आदित्य ने करवट बदलकर कहा- कुछ करने की जरूरत नहीं प्रिये! कहीं दर्द नहीं। बस, ऐसा मालूम हो रहा है कि दिल बैठा जाता है, जैसे पानी में डूबा जाता हूँ। जीवन की लीला समाप्त हो रही है। दीपक को बुझते हुए देख रहा हूँ। कह नहीं सकता, कब आवाज बंद हो जाए। जो कुछ कहना है, वह कह डालना चाहता हूँ, क्यों वह लालसा ले जाऊँ। मेरे एक प्रश्न का जवाब दोगी, पूछूँ?
करूणा के मन की सारी दुर्बलता, सारा शोक, सारी वेदना मानो लुप्त हो गई और उनकी जगह उस आत्मबल का उदय हुआ, जो मृत्यु पर हँसता है और विपत्ति के साँपों से खेलता है। रत्नजटित मखमली म्यान में जैसे तेज तलवार छिपी रहती है, जल के कोमल प्रवाह में जैसे असीम शक्ति छिपी रहती है, वैसे ही रमणी का कोमल हृदय साहस और धैर्य को अपनी गोद में छिपाए रहता है। क्रोध जैसे तलवार को बाहर खींच लेता है, विज्ञान जैसे जल-शक्ति का उद्घाटन कर लेता है, वैसे ही प्रेम रमणी के साहस और धैर्य को प्रदीप्त कर देता है।
करूणा ने पति के सिर पर हाथ रखते हुए कहा- पूछते क्यों नहीं प्यारे!
आदित्य ने करूणा के हाथों के कोमल स्पर्श का अनुभव करते हुए कहा- तुम्हारे विचार में मेरा जीवन कैसा था? बधाई के योग्य? देखो, तुमने मुझसे कभी पर्दा नहीं रखा। इस समय भी स्पष्ट कहना। तुम्हारे विचार में मुझे अपने जीवन पर हँसना चाहिए या रोना चाहिए?
करूणा ने उल्लास के साथ कहा- यह प्रश्न क्यों करते हो प्रियतम? क्या मैंने तुम्हारी उपेक्षा कभी की है? तुम्हारा जीवन देवताओं का-सा जीवन था, नि -स्वार्थ, निर्लिप्त और आदर्श! विघ्न-बाधाओं से तंग आकर मैंने तुम्हें कितनी ही बार संसार की ओर खींचने की चेष्टा की है; पर उस समय भी मैं मन में जानती थी कि मैं तुम्हें ऊँचे आसन से गिरा रही हूँ। अगर तुम माया-मोह में फँसे होते, तो कदाचित् मेरे मन को अधिक संतोष होता; लेकिन मेरी आत्मा को वह गर्व और उल्लास न होता, जो इस समय हो रहा है। मैं अगर किसी को बड़े-से-बड़ा आर्शीवाद दे सकती हूँ, तो वह यही होगा कि उसका जीवन तुम्हारे जैसा हो।
यह कहते-कहते करूणा का आभाहीन मुखमंडल जयोतिर्मय हो गया, मानो उसकी आत्मा दिव्य हो गई हो। आदित्य ने सगर्व नेत्रों से करूणा को देखकर कहा बस, अब मुझे संतोष हो गया, करूणा, इस बच्चे की ओर से मुझे कोई शंका नहीं है, मैं उसे इससे अधिक कुशल हाथों में नहीं छोड़ सकता। मुझे विश्वास है कि जीवन-भर यह ऊँचा और पवित्र आदर्श सदैव तुम्हारे सामने रहेगा। अब मैं मरने को तैयार हूँ।

2
सात वर्ष बीत गए।
बालक प्रकाश अब दस साल का रूपवान, बलिष्ठ, प्रसन्नमुख कुमार था, बल का तेज, साहसी और मनस्वी। भय तो उसे छू भी नहीं गया था। करूणा का संतप्त हृदय उसे देखकर शीतल हो जाता। संसार करूणा को अभागिनी और दीन समझे। वह कभी भाग्य का रोना नहीं रोती। उसने उन आभूषणों को बेच डाला, जो पति के जीवन में उसे प्राणों से प्रिय थे, और उस धन से कुछ गाएँ और भैंसे मोल ले लीं। वह कृषक की बेटी थी, और गो-पालन उसके लिए कोई नया व्यवसाय न था। इसी को उसने अपनी जीविका का साधन बनाया। विशुद्ध दूध कहाँ मयस्सर होता है? सब दूध हाथों-हाथ बिक जाता। करूणा को पहर रात से पहर रात तक काम में लगा रहना पड़ता, पर वह प्रसन्न थी। उसके मुख पर निराशा या दीनता की छाया नहीं, संकल्प और साहस का तेज है। उसके एक-एक अंग से आत्मगौरव की ज्योति-सी निकल रही है; आँखों में एक दिव्य प्रकाश है, गंभीर, अथाह और असीम। सारी वेदनाएँ-वैधव्य का शोक और विधि का निर्मम प्रहार-सब उस प्रकाश की गहराई में विलीन हो गया है।
प्रकाश पर वह जान देती है। उसका आनंद, उसकी अभिलाषा, उसका संसार उसका स्वर्ग सब प्रकाश पर न्यौछावर है; पर यह मजाल नहीं कि प्रकाश कोई शरारत करे और करूणा आँखें बंद कर ले। नहीं, वह उसके चरित्र की बड़ी कठोरता से देख-भाल करती है। वह प्रकाश की माँ नहीं, माँ-बाप दोनों हैं। उसके पुत्र-स्नेह में माता की ममता के साथ पिता की कठोरता भी मिली हुई है। पति के अंतिम शब्द अभी तक उसके कानों में गूँज रहे हैं। वह आत्मोल्लास, जो उनके चेहरे पर झलकने लगा था, वह गर्वमय लाली, जो उनकी आँखो में छा गई थी, अभी तक उसकी आँखों में फिर रही है। निरंतर पति-चिंतन ने आदित्य को उसकी आँखों में प्रत्यक्ष कर दिया है। वह सदैव उनकी उपस्थिति का अनुभव किया करती है। उसे ऐसा जान पड़ता है कि आदित्य की आत्मा सदैव उसकी रक्षा करती रहती है। उसकी यही हार्दिक अभिलाषा है कि प्रकाश जवान होकर पिता का पथगामी हो।
संध्या हो गई थी। एक भिखारिन द्वार पर आकर भीख माँगने लगी। करूणा उस समय गउओं को पानी दे रही थी। प्रकाश बाहर खेल रहा था। बालक ही तो ठहरा! शरारत सूझी। घर में गया और कटोरे में थोड़ा-सा भूसा लेकर बाहर निकला। भिखारिन ने अबकी झेली फैला दी। प्रकाश ने भूसा उसकी झोली में डाल दिया और जोर-जोर से तालियाँ बजाता हुआ भागा।
भिखारिन ने अग्निमय नेत्रों से देखकर कहा- वाह रे लाड़ले! मुझसे हँसी करने चला है! यही माँ-बाप ने सिखाया है! तब तो खूब कुल का नाम जगाओगे!
करूणा उसकी बोली सुनकर बाहर निकल आई और पूछा- क्या है माता? किसे कह रही हो?
भिखारिन ने प्रकाश की तरफ इशारा करके कहा- वह तुम्हारा लड़का है न। देखो, कटोरे में भूसा भरकर मेरी झोली में डाल गया है। चुटकी-भर आटा था, वह भी मिट्टी में मिल गया। कोई इस तरह दुखियों को सताता है? सबके दिन एक-से नहीं रहते! आदमी को घमंड न करना चाहिए।
करूणा ने कठोर स्वर में पुकारा- प्रकाश?
प्रकाश लज्जित न हुआ। अभिमान से सिर उठाए हुए आया और बोला- वह हमारे घर भीख क्यों माँगने आई है? कुछ काम क्यों नहीं करती?
करुणा ने उसे समझाने की चेष्टा करके कहा- शर्म नहीं आती, उल्टे और आँख दिखाते हो।
प्रकाश- शर्म क्यों आए? यह क्यों रोज भीख माँगने आती है? हमारे यहाँ क्या कोई चीज मुफ्त आती है?
करूणा- तुम्हें कुछ न देना था तो सीधे से कह देते; जाओ। तुमने यह शरारत क्यों की?
प्रकाश- उनकी आदत कैसे छूटती?
करूणा ने बिगड़कर कहा- तुम अब पिटोगे मेरे हाथों।
प्रकाश- पिटूँगा क्यों? आप जबरदस्ती पीटेंगी? दूसरे मुल्कों में अगर कोई भीख माँगे, तो कैद कर लिया जाए। यह नहीं कि उल्टे भिखमंगो को और शह दी जाए।
करूणा- जो अपंग है, वह कैसे काम करे?
प्रकाश- तो जाकर डूब मरे, ज़िंदा क्यों रहती है?
करूणा निरूत्तर हो गई। बुढ़िया को तो उसने आटा-दाल देकर विदा किया, किंतु प्रकाश का कुतर्क उसके हृदय में फोड़े के समान टीसता रहा। उसने यह धृष्टता, यह अविनय कहाँ सीखी? रात को भी उसे बार-बार यही ख्याल सताता रहा।
आधी रात के समीप एकाएक प्रकाश की नींद टूटी। लालटेन जल रही है और करुणा बैठी रो रही है। उठ बैठा और बोला- अम्माँ, अभी तुम सोई नहीं?
करूणा ने मुँह फेरकर कहा- नींद नहीं आई। तुम कैसे जग गए? प्यास तो नहीं लगी है?
प्रकाश- नही अम्माँ, न जाने क्यों आँख खुल गई। मुझसे आज बड़ा अपराध हुआ, अम्माँ !
करूणा ने उसके मुख की ओर स्नेह के नेत्रों से देखा।
प्रकाश- मैंने आज बुढ़िया के साथ बड़ी नटखट की। मुझे क्षमा करो, फिर कभी ऐसी शरारत न करूँगा।
यह कहकर रोने लगा। करूणा ने स्नेहार्द्र होकर उसे गले लगा लिया और उसके कपोलों का चुंबन करके बोली- बेटा, मुझे खुश करने के लिए यह कह रहे हो या तुम्हारे मन में सचमुच पछतावा हो रहा है?
प्रकाश ने सिसकते हुए कहा- नहीं अम्माँ, मुझे दिल से अफसोस हो रहा है। अबकी वह बुढ़िया आएगी, तो मैं उसे बहुत-से पैसे दूँगा।
करूणा का हृदय मतवाला हो गया। ऐसा जान पड़ा, आदित्य सामने खड़े बच्चे को आर्शीवाद दे रहे हैं और कह रहे हैं, करूणा, क्षोभ मत कर, प्रकाश अपने पिता का नाम रोशन करेगा। तेरी संपूर्ण कामनाएँ पूरी हो जाएँगी।

3
लेकिन प्रकाश के कर्म और वचन में मेल न था और दिनों के साथ उसके चरित्र का अंग प्रत्यक्ष होता जाता था। जहीन था ही, विश्वविद्यालय से उसे वजीफे मिलते थे, करूणा भी उसकी यथेष्ट सहायता करती थी, फिर भी उसका खर्च पूरा न पड़ता था। वह मितव्ययता और सरल जीवन पर विद्वत्ता से भरे हुए व्याख्यान दे सकता था, पर उसका रहन-सहन फैशन के अंधभक्तों से जौ-भर घटकर न था। प्रदर्शन की धुन उसे हमेशा सवार रहती थी। उसके मन और बुद्धि में निरंतर द्वंद्व होता रहता था। मन जाति की ओर था, बुद्धि अपनी ओर। बुद्धि मन को दबाए रहती थी। उसके सामने मन की एक न चलती थी। जाति-सेवा ऊसर की खेती है, वहाँ बड़े-से-बड़ा उपहार जो मिल सकता है, वह है गौरव और यश; पर वह भी स्थायी नहीं, इतना अस्थिर कि क्षण में जीवन-भर की कमाई पर पानी फिर सकता है। अतएव उसका अंत -करण अनिवार्य वेग के साथ विलासमय जीवन की ओर झुकता था। यहाँ तक कि धीरे-धीरे उसे त्याग और निग्रह से घृणा होने लगी। वह दुरवस्था और दरिद्रता को हेय समझता था। उसके हृदय न था, भाव न थे, केवल मस्तिष्क था। मस्तिष्क में दर्द कहाँ? वहाँ तो तर्क हैं, मनसूबे हैं।
सिंध में बाढ़ आई। हजारों आदमी तबाह हो गए। विद्यालय ने वहाँ एक सेवा समिति भेजी। प्रकाश के मन में द्वंद्व होने लगा- जाऊँ या न जाऊँ? इतने दिनों अगर वह परीक्षा की तैयारी करे, तो प्रथम श्रेणी में पास हो। चलते समय उसने बीमारी का बहाना कर दिया। करूणा ने लिखा, तुम सिंध न गए, इसका मुझे दुख है। तुम बीमार रहते हुए भी वहाँ जा सकते थे। समिति में चिकित्सक भी तो थे! प्रकाश ने पत्र का उत्तर न दिया।
उड़ीसा में अकाल पड़ा। प्रजा मक्खियों की तरह मरने लगी। कांग्रेस ने पीड़ितो के लिए एक मिशन तैयार किया। उन्हीं दिनों विद्यालयों ने इतिहास के छात्रों को ऐतिहासिक खोज के लिए लंका भेजने का निश्चय किया। करूणा ने प्रकाश को लिखा-तुम उड़ीसा जाओ। किंतु प्रकाश लंका जाने को लालायित था। वह कई दिन इसी दुविधा में रहा। अंत को सीलोन ने उड़ीसा पर विजय पाई। करुणा ने अबकी उसे कुछ न लिखा। चुपचाप रोती रही।
सीलोन से लौटकर प्रकाश छुट्टियों में घर गया। करुणा उससे खिंची-खिंची रहीं। प्रकाश मन में लज्जित हुआ और संकल्प किया कि अबकी कोई अवसर आया, तो अम्माँ को अवश्य प्रसन्न करूँगा। यह निश्चय करके वह विद्यालय लौटा। लेकिन यहाँ आते ही फिर परीक्षा की फिक्र सवार हो गई। यहाँ तक कि परीक्षा के दिन आ गए; मगर इम्तहान से फुरसत पाकर भी प्रकाश घर न गया। विद्यालय के एक अध्यापक काश्मीर सैर करने जा रहे थे। प्रकाश उन्हीं के साथ काश्मीर चल खड़ा हुआ। जब परीक्षा-फल निकला और प्रकाश प्रथम आया, तब उसे घर की याद आई! उसने तुरंत करूणा को पत्र लिखा और अपने आने की सूचना दी। माता को प्रसन्न करने के लिए उसने दो-चार शब्द जाति-सेवा के विषय में भी लिखे- अब मैं आपकी आज्ञा का पालन करने को तैयार हूँ। मैंने शिक्षा-संबंधी कार्य करने का निश्चय किया है इसी विचार से मैंने वह विशिष्ट स्थान प्राप्त किया है। हमारे नेता भी तो विद्यालयों के आचार्यों ही का सम्मान करते हैं। अभी तक इन उपाधियों के मोह से वे मुक्त नहीं हुए हैं। हमारे नेता भी योग्यता, सदुत्साह, लगन का उतना सम्मान नहीं करते, जितना उपाधियों का! अब मेरी इज्जत करेंगे और जिम्मेदारी का काम सौपेंगें, जो पहले माँगे भी न मिलता।
करूणा की आस फिर बँधी।

4
विद्यालय खुलते ही प्रकाश के नाम रजिस्ट्रार का पत्र पहुँचा। उन्होंने प्रकाश को इंग्लैंड जाकर विद्याभ्यास करने के लिए सरकारी वजीफे की मंजूरी की सूचना दी थी। प्रकाश पत्र हाथ में लिए हर्ष के उन्माद में जाकर माँ से बोला- अम्माँ, मुझे इंग्लैंड जाकर पढ़ने के लिए सरकारी वजीफा मिल गया।
करूणा ने उदासीन भाव से पूछा- तो तुम्हारा क्या इरादा है?
प्रकाश- मेरा इरादा? ऐसा अवसर पाकर भला कौन छोड़ता है!
करूणा- तुम तो स्वयंसेवकों में भरती होने जा रहे थे?
प्रकाश- तो आप समझती हैं, स्वयंसेवक बन जाना ही जाति-सेवा है? मैं इंग्लैंड से आकर भी तो सेवा-कार्य कर सकता हूँ और अम्माँ, सच पूछो, तो एक मजिस्ट्रेट अपने देश का जितना उपकार कर सकता है, उतना एक हजार स्वयंसेवक मिलकर भी नहीं कर सकते। मैं तो सिविल सर्विस की परीक्षा में बैठूँगा और मुझे विश्वास है कि सफल हो जाऊँगा।
करूणा ने चकित होकर पूछा- तो क्या तुम मजिस्ट्रेट हो जाओगे?
प्रकाश- सेवा-भाव रखनेवाला एक मजिस्ट्रेट कांग्रेस के एक हजार सभापतियों से ज्यादा उपकार कर सकता है। अखबारों में उसकी लंबी-लंबी तारीफें न छपेंगी, उसकी वक्तृताओं पर तालियाँ न बजेंगी, जनता उसके जुलूस की गाड़ी न खींचेगी और न विद्यालयों के छात्र उसको अभिनंदन-पत्र देंगे; पर सच्ची सेवा मजिस्ट्रेट ही कर सकता है।
करूणा ने आपत्ति के भाव से कहा- लेकिन यही मजिस्ट्रेट तो जाति के सेवकों को सजाएँ देते हें, उन पर गोलियाँ चलाते हैं?
प्रकाश- अगर मजिस्ट्रेट के हृदय में परोपकार का भाव है, तो वह नरमी से वही काम करता है, जो दूसरे गोलियाँ चलाकर भी नहीं कर सकते।
करूणा- मैं यह नहीं मानूँगी। सरकार अपने नौकरों को इतनी स्वाधीनता नहीं देती। वह एक नीति बना देती है और हर एक सरकारी नौकर को उसका पालन करना पड़ता है। सरकार की पहली नीति यह है कि वह दिन-दिन अधिक संगठित और दृढ़ हों। इसके लिए स्वाधीनता के भावों का दमन करना जरूरी है; अगर कोई मजिस्ट्रेट इस नीति के विरूद्ध काम करता है, तो वह मजिस्ट्रेट न रहेगा। वह हिंदुस्तानी था, जिसने तुम्हारे बाबूजी को जरा-सी बात पर तीन साल की सजा दे दी। इसी सजा ने उनके प्राण लिए बेटा, मेरी इतनी बात मानो। सरकारी पदों पर न गिरो। मुझे यह मंजूर है कि तुम मोटा खाकर और मोटा पहनकर देश की कुछ सेवा करो, इसके बदले कि तुम हाकिम बन जाओ और शान से जीवन बिताओ। यह समझ लो कि जिस दिन तुम हाकिम की कुरसी पर बैठोगे, उस दिन से तुम्हारा दिमाग हाकिमों का-सा हो जाएगा। तुम यही चाहेगे कि अफसरों में तुम्हारी नेकनामी और तरक्की हो। एक गँवारू मिसाल लो। लड़की जब तक मैके में क्वाँरी रहती है, वह अपने को उसी घर की समझती है, लेकिन जिस दिन ससुराल चली जाती है, वह अपने घर को दूसरों का घर समझने लगती है। माँ-बाप, भाई-बंद सब वही रहते हैं, लेकिन वह घर अपना नहीं रहता। यही दुनिया का दस्तूर है।
प्रकाश ने खीझकर कहा- तो क्या आप यही चाहती हैं कि मैं जिंदगी-भर चारों तरफ ठोकरें खाता फिरूँ?
करुणा कठोर नेत्रों से देखकर बोली- अगर ठोकर खाकर आत्मा स्वाधीन रह सकती है, तो मैं कहूँगी, ठोकर खाना अच्छा है।
प्रकाश ने निश्चयात्मक भाव से पूछा- तो आपकी यही इच्छा है?
करूणा ने उसी स्वर में उत्तर दिया- हाँ, मेरी यही इच्छा है।
प्रकाश ने कुछ जवाब न दिया। उठकर बाहर चला गया और तुरंत रजिस्ट्रार को इनकारी-पत्र लिख भेजा; मगर उसी क्षण से मानों उसके सिर पर विपत्ति ने आसन जमा लिया। विरक्त और विमन अपने कमरें में पड़ा रहता, न कहीं घूमने जाता, न किसी से मिलता। मुँह लटकाए भीतर आता और फिर बाहर चला जाता, यहाँ तक महीना गुजर गया। न चेहरे पर वह लाली रही, न वह ओज; आँखें अनाथों के मुख की भाँति याचना से भरी हुई, ओठ हँसना भूल गए, मानों उस इनकारी-पत्र के साथ उसकी सारी सजीवता, और चपलता, सारी सरलता बिदा हो गई। करूणा उसके मनोभाव समझती थी और उसके शोक को भुलाने की चेष्टा करती थी, पर रूठे देवता प्रसन्न न होते थे।
आखिर एक दिन उसने प्रकाश से कहा- बेटा, अगर तुमने विलायत जाने की ठान ही ली है, तो चले जाओ। मना न करूँगी। मुझे खेद है कि मैंने तुम्हें रोका। अगर मैं जानती कि तुम्हें इतना आघात पहुँचेगा, तो कभी न रोकती। मैंने तो केवल इस विचार से रोका था कि तुम्हें जाति-सेवा में मग्न देखकर तुम्हारे बाबूजी की आत्मा प्रसन्न होगी। उन्होंने चलते समय यही वसीयत की थी।
प्रकाश ने रूखाई से जवाब दिया- अब क्या जाऊँगा! इनकारी-खत लिख चुका। मेरे लिए कोई अब तक बैठा थोड़े ही होगा। कोई दूसरा लड़का चुन लिया होगा और फिर करना ही क्या है?जब आपकी मर्जी है कि गाँव-गाँव की खाक छानता फिरूँ, तो वही सही।
करूणा का गर्व चूर-चूर हो गया। इस अनुमति से उसने बाधा का काम लेना चाहा था; पर सफल न हुई। बोली- अभी कोई न चुना गया होगा। लिख दो, मैं जाने को तैयार हूँ।
प्रकाश ने झुँझलाकर कहा- अब कुछ नहीं हो सकता। लोग हँसी उड़ाएँगे। मैने तय कर लिया है कि जीवन को आपकी इच्छा के अनुकूल बनाऊँगा।
करूणा- तुमने अगर शुद्ध मन से यह इरादा किया होता, तो यों न रहते। तुम मुझसे सत्याग्रह कर रहे हो; अगर मन को दबाकर, मुझे अपनी राह का काँटा समझकर तुमने मेरी इच्छा पूरी भी की, तो क्या? मैं तो जब जानती कि तुम्हारे मन में आप-ही-आप सेवा का भाव उत्पन्न होता। तुम आज ही रजिस्ट्रार साहब को पत्र लिख दो।
प्रकाश- अब मैं नहीं लिख सकता।
‘तो इसी शोक में तने बैठे रहोगे?’
‘लाचारी है।’
करूणा ने और कुछ न कहा। जरा देर में प्रकाश ने देखा कि वह कहीं जा रही है; मगर वह कुछ बोला नहीं। करूणा के लिए बाहर आना-जाना कोई असाधारण बात न थी; लेकिन जब संध्या हो गई और करुणा न आई, तो प्रकाश को चिंता होने लगी। अम्मा कहाँ गईं? यह प्रश्न बार-बार उसके मन में उठने लगा।
प्रकाश सारी रात द्वार पर बैठा रहा। भाँति-भाँति की शंकाएँ मन में उठने लगीं। उसे अब याद आया, चलते समय करूणा कितनी उदास थी; उसकी आँखें कितनी लाल थीं। यह बातें प्रकाश को उस समय क्यों न नजर आई? वह क्यों स्वार्थ में अंधा हो गया था?
हाँ, अब प्रकाश को याद आया- माता ने साफ-सुथरे कपड़े पहने थे। उनके हाथ में छतरी भी थी। तो क्या वह कहीं बहुत दूर गई हैं? किससे पूछे? अनिष्ट के भय से प्रकाश रोने लगा।
श्रावण की अँधेरी भयानक रात थी। आकाश में श्याम मेघमालाएँ, भीषण स्वप्न की भाँति छाई हुई थीं। प्रकाश रह-रहकर आकाश की ओर देखता था, मानो करूणा उन्हीं मेघमालाओं में छिपी बैठी हो। उसने निश्चय किया, सवेरा होते ही माँ को खोजने चलूँगा और अगर….
किसी ने द्वार खटखटाया। प्रकाश ने दौड़कर खोला, तो देखा, करूणा खड़ी है। उसका मुख-मंडल इतना खोया हुआ, इतना करूण था, जैसे आज ही उसका सोहाग उठ गया है, जैसे संसार में अब उसके लिए कुछ नहीं रहा, जैसे वह नदी के किनारे खड़ी अपनी लदी हुई नाव को डूबते देख रही है और कुछ कर नहीं सकती।
प्रकाश ने अधीर होकर पूछा- अम्माँ कहाँ चली गई थीं? बहुत देर लगाई?
करूणा ने भूमि की ओर ताकते हुए जवाब दिया- एक काम से गई थी। देर हो गई।
यह कहते हुए उसने प्रकाश के सामने एक बंद लिफाफा फेंक दिया। प्रकाश ने उत्सुक होकर लिफाफा उठा लिया। ऊपर ही विद्यालय की मुहर थी। तुरंत ही लिफाफा खोलकर पढ़ा। हलकी-सी लालिमा चेहरे पर दौड़ गई। पूछा- यह तुम्हें कहाँ मिल गया अम्मा?
करूणा- तुम्हारे रजिस्ट्रार के पास से लाई हूँ।
‘क्या तुम वहाँ चली गई थी?’
‘और क्या करती।’
‘कल तो गाड़ी का समय न था?’
‘मोटर ले ली थी।’
प्रकाश एक क्षण तक मौन खड़ा रहा, फिर कुंठित स्वर में बोला- जब तुम्हारी इच्छा नहीं है तो मुझे क्यों भेज रही हो?
करूणा ने विरक्त भाव से कहा- इसलिए कि तुम्हारी जाने की इच्छा है। तुम्हारा यह मलिन वेश नहीं देखा जाता। अपने जीवन के बीस वर्ष तुम्हारी हितकामना पर अर्पित कर दिए; अब तुम्हारी महत्त्वाकांक्षा की हत्या नहीं कर सकती। तुम्हारी यात्रा सफल हो, यही हमारी हार्दिक अभिलाषा है।
करूणा का कंठ रूँध गया और कुछ न कह सकी।

5
प्रकाश उसी दिन से यात्रा की तैयारियाँ करने लगा। करूणा के पास जो कुछ था, वह सब खर्च हो गया। कुछ ऋण भी लेना पड़ा। नए सूट बने, सूटकेस लिए गए। प्रकाश अपनी धुन में मस्त था। कभी किसी चीज की फरमाइश लेकर आता, कभी किसी चीज की।
करूणा इस एक सप्ताह में इतनी दुर्बल हो गई है, उसके बालों पर कितनी सफेदी आ गई है, चेहरे पर कितनी झुर्रियाँ पड़ गई हैं, यह उसे कुछ न नजर आता। उसकी आँखों में इंगलैंड के दृश्य समाए हुए थे। महत्त्वाकांक्षा आँखों पर परदा डाल देती है।
प्रस्थान का दिन आया। आज कई दिनों के बाद धूप निकली थी। करूणा स्वामी के पुराने कपड़ों को बाहर निकाल रही थी। उनकी गाढ़े की चादरें, खद्दर के कुरते, पाजामें और लिहाफ अभी तक संदूक में संचित थे। प्रतिवर्ष वे धूप में सुखाए जाते और झाड़-पोंछकर रख दिए जाते थे। करूणा ने आज फिर उन कपड़ो को निकाला, मगर सुखाकर रखने के लिए नहीं गरीबों में बाँट देने के लिए। वह आज पति से नाराज है। वह लुटिया, डोर और घड़ी, जो आदित्य की चिरसंगिनी थीं और जिनकी बीस वर्ष से करूणा ने उपासना की थी, आज निकालकर आँगन में फेंक दी गई; वह झोली जो बरसों आदित्य के कंधों पर आरूढ़ रह चुकी थी, आप कूड़े में डाल दी गई; वह चित्र जिसके सामने बीस वर्ष से करूणा सिर झुकाती थी, आज वही निर्दयता से भूमि पर डाल दिया गया। पति का कोई स्मृति-चिह्न वह अब अपने घर में नहीं रखना चाहती। उसका अंत -करण शोक और निराशा से विदीर्ण हो गया है और पति के सिवा वह किस पर क्रोध उतारे? कौन उसका अपना हैं? वह किससे अपनी व्यथा कहे? किसे अपनी छाती चीरकर दिखाए? वह होते तो क्या प्रकाश दासता की जंजीर गले में डालकर फूला न समाता? उसे कौन समझाए कि आदित्य भी इस अवसर पर पछताने के सिवा और कुछ न कर सकते।
प्रकाश के मित्रों ने आज उसे विदाई का भोज दिया था। वहाँ से वह संध्या समय कई मित्रों के साथ मोटर पर लौटा। सफर का सामान मोटर पर रख दिया गया, तब वह अंदर आकर माँ से बोला- अम्मा, जाता हूँ। बंबई पहूँचकर पत्र लिखूँगा। तुम्हें मेरी कसम, रोना मत और मेरे खतों का जवाब बराबर देना।
जैसे किसी लाश को बाहर निकालते समय संबंधियों का धैर्य छूट जाता है, रूके हुए आँसू निकल पड़ते हैं और शोक की तरंगें उठने लगती हैं, वही दशा करूणा की हुई। कलेजे में एक हाहाकार हुआ, जिसने उसकी दुर्बल आत्मा के एक-एक अणु को कँपा दिया। मालूम हुआ, पाँव पानी में फिसल गया है और वह लहरों में बही जा रही है। उसके मुख से शोक या आर्शीवाद का एक शब्द भी न निकला। प्रकाश ने उसके चरण छुए, अश्रु-जल से माता के चरणों को पखारा, फिर बाहर चला। करूणा पाषाण मूर्ति की भाँति खड़ी थी।
सहसा ग्वाले ने आकर कहा- बहूजी, भइया चले गए। बहुत रोते थे।
तब करूणा की समाधि टूटी। देखा, सामने कोई नहीं है। घर में मृत्यु का-सा सन्नाटा छाया हुआ है, और मानो हृदय की गति बंद हो गई है।
सहसा करूणा की दृष्टि ऊपर उठ गई। उसने देखा कि आदित्य अपनी गोद में प्रकाश की निर्जीव देह लिए खड़े हो रहे हैं। करूणा पछाड़ खाकर गिर पड़ी।

6
करूणा जीवित थी, पर संसार से उसका कोई नाता न था। उसका छोटा-सा संसार, जिसे उसने अपनी कल्पनाओं के हृदय में रचा था, स्वप्न की भाँति अनंत में विलीन हो गया था। जिस प्रकाश को सामने देखकर वह जीवन की अँधेरी रात में भी हृदय में आशाओं की संपत्ति लिए जी रही थी, वह बुझ गया और संपत्ति लुट गई। अब न कोई आश्रय था और न उसकी जरूरत। जिन गउओं को वह दोनों वक्त अपने हाथों से दाना-चारा देती और सहलाती थी, वे अब खूँटे पर बँधी निराश नेत्रों से द्वार की ओर ताकती रहती थीं। बछड़ों को गले लगाकर पुचकारने वाला अब कोई न था, जिसके लिए दूध दुहे, मट्ठा निकाले। खानेवाला कौन था? करूणा ने अपने छोटे-से संसार को अपने ही अंदर समेट लिया था।
किंतु एक ही सप्ताह में करूणा के जीवन ने फिर रंग बदला। उसका छोटा-सा संसार फैलते-फैलते विश्वव्यापी हो गया। जिस लंगर ने नौका को तट से एक केंद्र पर बाँध रखा था, वह उखड़ गया। अब नौका सागर के अशेष विस्तार में भ्रमण करेगी, चाहे वह उद्दाम तरंगों के वक्ष में ही क्यों न विलीन हो जाए।
करूणा द्वार पर आ बैठती और मुहल्ले-भर के लड़कों को जमा करके दूध पिलाती। दोपहर तक मक्खन निकालती और वह मक्खन मुहल्ले के लड़के खाते। फिर भाँति-भाँति के पकवान बनाती और कुत्तों को खिलाती। अब यही उसका नित्य का नियम हो गया। चिड़ियाँ, कुत्ते, बिल्लियाँ चींटे-चीटियाँ सब अपने हो गए। प्रेम का वह द्वार अब किसी के लिए बंद न था। उस अंगुल-भर जगह में, जो प्रकाश के लिए भी काफी न थी, अब समस्त संसार समा गया था।
एक दिन प्रकाश का पत्र आया। करूणा ने उसे उठाकर फेंक दिया। फिर थोड़ी देर के बाद उसे उठाकर फाड़ डाला और चिड़ियों को दाना चुगाने लगी; मगर जब निशा-योगिनी ने अपनी धूनी जलाई और वेदनाएँ उससे वरदान माँगने के लिए विकल हो-होकर चलीं, तो करूणा की मनोवेदना भी सजग हो उठी- प्रकाश का पत्र पढ़ने के लिए उसका मन व्याकुल हो उठा। उसने सोचा, प्रकाश मेरा कौन है? मेरा उससे क्या प्रयोजन? हाँ, प्रकाश मेरा कौन है? हाँ, प्रकाश मेरा कौन है? हृदय ने उत्तर दिया, प्रकाश तेरा सर्वस्व है, वह तेरे उस अमर प्रेम की निशानी है, जिससे तू सदैव के लिए वंचित हो गई। वह तेरा प्राण है, तेरे जीवन-दीपक का प्रकाश, तेरी वंचित कामनाओं का माधुर्य, तेरे अश्रु-जल में विहार करने वाला करने वाला हंस। करूणा उस पत्र के टुकड़ों को जमा करने लगी, माना उसके प्राण बिखर गए हों। एक-एक टुकड़ा उसे अपने खोए हुए प्रेम का एक पदचिह्न-सा मालूम होता था। जब सारे पुरजे जमा हो गए, तो करूणा दीपक के सामने बैठकर उसे जोड़ने लगी, जैसे कोई वियोगी हृदय प्रेम के टूटे हुए तारों को जोड़ रहा हो। हाय री ममता! वह अभागिन सारी रात उन पुरजों को जोड़ने में लगी रही। पत्र दोनों ओर लिखा था, इसलिए पुरजों को ठीक स्थान पर रखना और भी कठिन था। कोई शब्द, कोई वाक्य बीच में गायब हो जाता। उस एक टुकड़े को वह फिर खोजने लगती। सारी रात बीत गई, पर पत्र अभी तक अपूर्ण था।
दिन चढ़ आया, मुहल्ले के लौंडे मक्खन और दूध की चाह में एकत्र हो गए, कुत्तों ओर बिल्लियों का आगमन हुआ, चिड़ियाँ आ-आकर आँगन में फुदकने लगीं, कोई ओखली पर बैठी,कोई तुलसी के चौतरे पर, पर करूणा को सिर उठाने तक की फुरसत नहीं।
दोपहर हुआ, करुणा ने सिर न उठाया। न भूख थी, न प्यास। फिर संध्या हो गई। पर वह पत्र अभी तक अधूरा था। पत्र का आशय समझ में आ रहा था- प्रकाश का जहाज कहीं-से-कहीं जा रहा है। उसके हृदय में कुछ उठा हुआ है। क्या उठा हुआ है, यह करुणा न सोच सकी? करूणा पुत्र की लेखनी से निकले हुए एक-एक शब्द को पढ़ना और उसे हृदय पर अंकित कर लेना चाहती थी।
इस भाँति तीन दिन गुजर गए। संध्या हो गई थी। तीन दिन की जागी आँखें जरा झपक गई। करूणा ने देखा, एक लंबा-चौड़ा कमरा है, उसमें मेजें और कुर्सियाँ लगी हुई हैं, बीच में ऊँचे मंच पर कोई आदमी बैठा हुआ है। करूणा ने ध्यान से देखा, प्रकाश था।
एक क्षण में एक कैदी उसके सामने लाया गया, उसके हाथ-पाँव में जंजीर थी, कमर झुकी हुई, यह आदित्य थे।
करूणा की आँखें खुल गईं। आँसू बहने लगे। उसने पत्र के टुकड़ों को फिर समेट लिया और उसे जलाकर राख कर डाला। राख की एक चुटकी के सिवा वहाँ कुछ न रहा, जो उसके हृदय में विदीर्ण किए डालती थी। इसी एक चुटकी राख में उसका गुड़ियोंवाला बचपन, उसका संतप्त यौवन और उसका तृष्णामय वैधव्य सब समा गया।
प्रात -काल लोगों ने देखा, पक्षी पिंजड़े से उड़ चुका था! आदित्य का चित्र अब भी उसके शून्य हृदय से चिपटा हुआ था। भग्नहृदय पति की स्नेह-स्मृति में विश्राम कर रहा था और प्रकाश का जहाज योरप चला जा रहा था।

माँ कहानी का सारांश

मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित कहानी ‘माँ’ एक अत्यंत मार्मिक और भावनात्मक कहानी है, जो एक माँ के त्याग, आदर्शों और उसके पुत्र की महत्त्वाकांक्षा के बीच के द्वंद्व को दर्शाती है।

  1. करुणा का त्याग और पति का आगमन

कहानी की नायिका करुणा है, जिसके पति आदित्य एक स्वतंत्रता सेनानी थे और तीन साल से जेल में थे। करुणा ने इन तीन वर्षों को अत्यंत गरीबी और कष्ट में काटा, लेकिन अपने पुत्र प्रकाश के सहारे वह जीवित रही। जब आदित्य जेल से छूटकर घर आते हैं, तो करुणा उनके स्वागत की भारी तैयारी करती है।

परंतु, घर लौटने वाला आदित्य वह ओजस्वी पुरुष नहीं था जो जेल गया था। जेल की यातनाओं ने उन्हें तपेदिक (TB) का रोगी और हड्डियों का ढाँचा बना दिया था। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में आदित्य को ग्लानि होती है कि उन्होंने अपने परिवार को दरिद्रता में छोड़ दिया। वे करुणा से पूछते हैं कि क्या उनका जीवन सफल था? करुणा उन्हें ढाँढस बँधाती है कि उनका जीवन ‘देवताओं जैसा आदर्श’ था। आदित्य अपने पुत्र प्रकाश को करुणा के हाथों में सौंपकर शांति से प्राण त्याग देते हैं।

  1. प्रकाश का चरित्र और वैचारिक द्वंद्व

आदित्य की मृत्यु के बाद करुणा ने मेहनत-मजदूरी और गौ-पालन करके प्रकाश को पढ़ाया-लिखाा। प्रकाश बुद्धिमान था, लेकिन उसके विचार अपने पिता के बिल्कुल विपरीत थे। जहाँ पिता ने देश के लिए प्राण दे दिए, वहीं प्रकाश विलासिता, पद और प्रतिष्ठा का भूखा था। वह ‘जाति-सेवा’ (देश सेवा) को ‘ऊसर की खेती’ समझता था, जिसमें केवल कष्ट थे।

करुणा चाहती थी कि प्रकाश अपने पिता के पदचिह्नों  पर चले, लेकिन प्रकाश अपनी बुद्धि का प्रयोग केवल स्वार्थ के लिए करता था। वह बाढ़ और अकाल के समय सेवा करने के बजाय अपनी परीक्षा और सैर-सपाटे को महत्त्व देता था। एक दिन प्रकाश को इंग्लैंड जाकर पढ़ने के लिए सरकारी वजीफा (Scholarship) मिलता है। वह बहुत खुश होता है और इसे ‘मजिस्ट्रेट’ बनकर सेवा करने का सुनहरा अवसर बताता है।

  1. माँ का संघर्ष और दुःखद अंत

करुणा प्रकाश के सरकारी नौकरी (सिविल सर्विस) में जाने के विचार का कड़ा विरोध करती है। उसका मानना था कि जिस सरकार ने उसके पति की जान ली, उसी की गुलामी करना उसके पति के बलिदान का अपमान होगा। वह प्रकाश से कहती है, “अगर ठोकर खाकर आत्मा स्वाधीन रह सकती है, तो ठोकर खाना अच्छा है।”

प्रकाश माँ के विरोध से उदास हो जाता है। करुणा पुत्र के दुःख को देख नहीं पाती और भारी मन से खुद जाकर रजिस्ट्रार से वजीफा स्वीकार करने का पत्र ले आती है। प्रकाश खुशी-खुशी इंग्लैंड जाने की तैयारी करता है। वह माँ के बुढ़ापे और उसकी गिरती सेहत को नजरअंदाज कर देता है। जिस दिन प्रकाश विदा होता है, करुणा अपने पति की पुरानी यादों और स्मृतियों को नष्ट कर देती है क्योंकि उसे लगता है कि उसके पति का आदर्श हार गया।

प्रकाश के जाने के बाद करुणा का संसार सूना हो जाता है। वह मोहल्ले के बच्चों और पशु-पक्षियों में अपना मन लगाती है। अंत में, वह एक स्वप्न देखती है जिसमें उसका पुत्र प्रकाश (एक मजिस्ट्रेट के रूप में) अपने ही पिता (एक कैदी के रूप में) को सजा सुना रहा है। यह दृश्य करुणा के हृदय को तोड़ देता है। प्रकाश का जहाज यूरोप की ओर बढ़ रहा होता है और यहाँ करुणा अपने पति के चित्र को छाती से लगाए इस संसार को त्याग देती है।

 

कहानी के प्रमुख बिंदु (Key Highlights) –

  • आदर्शवाद बनाम यथार्थवाद – आदित्य का बलिदान आदर्श है, जबकि प्रकाश का नजरिया स्वार्थपूर्ण यथार्थवाद है।
  • माँ की ममता – करुणा अंत तक अपने सिद्धांतों और पुत्र-मोह के बीच पिसती रहती है।
  • नैतिक पतन – प्रकाश का मजिस्ट्रेट बनना करुणा की नजर में उसके पिता के बलिदान की हत्या थी।

 

 

‘माँ’ के प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण

  1. करुणा (मुख्य पात्र और माँ)

करुणा इस कहानी की धुरी है। वह भारतीय नारी के धैर्य, त्याग और उच्च आदर्शों का प्रतिनिधित्व करती है।

  • आदर्शवादी और स्वाभिमानी – करुणा के लिए उसके पति का त्याग और स्वाभिमान सर्वोपरि है। वह गरीबी स्वीकार कर लेती है, लेकिन सरकार की गुलामी उसे मंजूर नहीं।
  • ममतामयी पर कठोर – वह अपने पुत्र प्रकाश से अगाध प्रेम करती है, लेकिन उसके चरित्र के निर्माण के लिए वह पिता की तरह कठोर भी बन जाती है। वह नहीं चाहती कि उसका बेटा अपने पिता के बलिदान को भूलकर स्वार्थी बने।
  • द्वंद्व का शिकार – वह माँ की ममता और पत्नी के कर्तव्य के बीच पिसती रहती है। अंततः वह पुत्र की खुशी के लिए उसे विदेश जाने की अनुमति दे देती है, भले ही वह उसके सिद्धांतों के खिलाफ हो।
  • करुणा और सेवा की प्रतिमूर्ति – कहानी के अंत में जब उसका अपना बेटा उसे छोड़कर चला जाता है, तो वह अपना प्रेम पूरे विश्व (मुहल्ले के बच्चों, पशु-पक्षियों) में बाँट देती है।
  1. प्रकाश (पुत्र)

प्रकाश नई पीढ़ी के उस वर्ग का प्रतीक है जो अपनी जड़ों और आदर्शों से कटकर केवल व्यक्तिगत सफलता और विलासिता को महत्त्व देता है।

  • महत्त्वाकांक्षी और बुद्धिमान – वह पढ़ने में बहुत तेज है और विश्वविद्यालय में प्रथम आता है, लेकिन उसकी बुद्धि केवल अपने स्वार्थ के लिए चलती है।
  • तार्किक और स्वार्थी – वह देश सेवा को ‘ऊसर की खेती’ कहता है। वह कुतर्क करता है कि एक मजिस्ट्रेट बनकर वह समाज का ज्यादा भला कर सकता है, जबकि उसका असली मकसद सत्ता और आराम पाना है।
  • संवेदनाहीन – वह अपनी माँ के गिरते स्वास्थ्य और उसके मानसिक कष्ट को नहीं देख पाता। उसकी आँखों पर ‘महत्त्वाकांक्षा का पर्दा’ पड़ा हुआ है।
  • पिता के आदर्शों का विरोधी – वह अपने पिता के कष्टपूर्ण जीवन को व्यर्थ मानता है और उसी व्यवस्था का हिस्सा बनना चाहता है जिसने उसके पिता के प्राण लिए।
  1. आदित्य (पति)

यद्यपि आदित्य कहानी के प्रारंभिक भाग में ही मर जाते हैं, लेकिन उनका व्यक्तित्व पूरी कहानी पर छाया रहता है।

  • सच्चे देशभक्त – उन्होंने देश की आज़ादी के लिए जेल की यातनाएँ सहीं और अपना स्वास्थ्य गँवा दिया।
  • निस्वार्थ सेवक – वे अंत समय में भी यह जानना चाहते हैं कि क्या उनका जीवन सफल था। वे यश या धन के भूखे नहीं थे।
  • आदर्श पिता – वे मरते समय अपने बेटे के भविष्य के लिए चिंतित थे, लेकिन वे उसे गलत हाथों में नहीं, बल्कि करुणा के ‘कुशल हाथों’ में छोड़कर जाते हैं।

निष्कर्ष –

यह कहानी इन तीन पात्रों के माध्यम से बलिदान (आदित्य), संस्कार (करुणा) और स्वार्थ (प्रकाश) के बीच के संघर्ष को दिखाती है। अंत में प्रकाश की भौतिक जीत होती है, लेकिन नैतिक रूप से वह हार जाता है।

 

 

‘माँ’ – मूल संवेदना

मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘माँ’ की मूल संवेदना आदर्शवाद और यथार्थवाद (स्वार्थ) के बीच का महासंघर्ष है। प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से यह दिखाया है कि कैसे एक ही परिवार की दो पीढ़ियाँ जीवन के मूल्यों को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखती हैं।

  1. सिद्धांतों और ममता का द्वंद्व

कहानी की सबसे गहरी संवेदना करुणा के हृदय में छिपी है। वह एक ऐसी माँ है जो अपने पुत्र से अगाध प्रेम करती है, लेकिन उसके लिए अपने पति के ‘आदर्शों’ की बलि नहीं चढ़ा सकती। वह चाहती है कि उसका बेटा अपने पिता की तरह देशप्रेमी और स्वाभिमानी बने, न कि उस व्यवस्था का हिस्सा बने जिसने उसके पिता के प्राण लिए। यहाँ ममता (पुत्र मोह) और सिद्धांत (पति के प्रति निष्ठा) के बीच का संघर्ष ही कहानी का प्राण है।

  1. देशभक्ति बनाम व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा

कहानी दो विरोधी जीवन-दर्शनों को आमने-सामने खड़ा करती है –

  • आदित्य का दर्शन – देश सेवा, त्याग और कष्ट झेलकर भी आत्म-गौरव बनाए रखना।
  • प्रकाश का दर्शन – व्यक्तिगत सफलता, उच्च पद, विलासिता और तर्कपूर्ण स्वार्थ।

प्रकाश का मजिस्ट्रेट बनना उस नई पीढ़ी की मानसिकता को दर्शाता है जो ‘देश सेवा’ को घाटे का सौदा और ‘सरकारी गुलामी’ को प्रगति मानती है।

  1. नैतिक पतन की त्रासदी

कहानी की मूल संवेदना इस बात में भी है कि शिक्षा केवल मस्तिष्क को बढ़ाती है, हृदय को नहीं। प्रकाश बहुत बुद्धिमान है, वह विश्वविद्यालय में प्रथम आता है, लेकिन उसके भीतर अपने पिता के बलिदान के प्रति कोई सम्मान नहीं है। वह अपनी माँ की वेदना को नहीं समझ पाता। उसका सरकारी वजीफा पाकर खुश होना और अपनी माँ को अकेले छोड़कर विदेश चले जाना उसके नैतिक पतन को दर्शाता है।

  1. माँ की पराजय और अकेलेपन का दुःख

कहानी का अंत अत्यंत दुखद है, जो यह संवेदना देता है कि अंततः आदर्श हार जाता है और स्वार्थ जीत जाता है। करुणा का अपनी यादों (पति के कपड़ों और चित्रों) को नष्ट करना इस बात का प्रतीक है कि उसके जीवन का आधार ही टूट गया है। उसका अंत में यह सपना देखना कि उसका बेटा (हाकिम) अपने पिता (कैदी) को सजा दे रहा है, समाज की सबसे बड़ी विडंबना (Irony) है।

निष्कर्ष –

‘माँ’ कहानी की मूल संवेदना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या भौतिक प्रगति और ऊँचे पद वास्तव में जीवन की सफलता हैं? प्रेमचंद यह संदेश देते हैं कि जिस सफलता के पीछे अपनों का खून और आदर्शों की हत्या हो, वह सफलता वास्तव में एक बहुत बड़ी हार है।

 

 

पाठ से प्राप्त सीखें

मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘माँ’ केवल एक माँ और पुत्र की कहानी नहीं है, बल्कि यह जीवन के गहरे मूल्यों और सामाजिक विडंबनाओं का आईना है। इस कहानी से मिलने वाली प्रमुख सीखें (Learning Outcomes) निम्नलिखित हैं –

1. आदर्शों का मूल्य भौतिक सुख से ऊपर है

कहानी यह सिखाती है कि सच्चा आत्म-गौरव महलों या ऊँचे पदों में नहीं, बल्कि अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने में है। आदित्य ने जेल की यातनाएँ सहीं और गरीबी में प्राण त्याग दिए, लेकिन उनका मन शांत था क्योंकि वे अपने आदर्शों पर खरे उतरे।

2. शिक्षा का अर्थ केवल बौद्धिक विकास नहीं, चारित्रिक विकास है

प्रकाश बहुत बुद्धिमान था, वह विश्वविद्यालय में प्रथम आया और उसे विदेशी वजीफा भी मिला, लेकिन उसमें ‘संवेदना’ और ‘चरित्र’ की कमी थी। यह कहानी हमें सिखाती है कि हृदयविहीन शिक्षा व्यक्ति को स्वार्थी और अहंकारी बना देती है। सच्चा शिक्षित वही है जो अपनों के दर्द और देश के प्रति अपने कर्तव्य को समझे।

3. स्वाधीनता और आत्म-सम्मान का महत्त्व

करुणा का यह कथन—“अगर ठोकर खाकर आत्मा स्वाधीन रह सकती है, तो ठोकर खाना अच्छा है”—जीवन की बहुत बड़ी सीख है। कहानी हमें चेतावनी देती है कि ऊँचे सरकारी पद और सुख-सुविधाएँ यदि मानसिक गुलामी और अपनों के अपमान की कीमत पर मिलें, तो वे व्यर्थ हैं।

4. महत्त्वाकांक्षा की अंधी दौड़ के प्रति चेतावनी

प्रकाश का चरित्र यह दिखाता है कि जब व्यक्ति केवल व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा (Ambition) के पीछे भागता है, तो वह अंधा हो जाता है। वह अपनी माँ की वृद्धावस्था, उसके बलिदान और पिता के सपनों को पैरों तले कुचल देता है। यह सीख मिलती है कि सफलता की ऊँचाइयों को छूते समय अपनी जड़ों को नहीं भूलना चाहिए।

5. माँ के त्याग और उसकी दूरदर्शिता का सम्मान

कहानी दर्शाती है कि एक माँ केवल संतान का पेट नहीं भरती, बल्कि वह उसके भविष्य की ‘नैतिक ढाल’ भी होती है। करुणा ने प्रकाश को हाकिम बनने से इसलिए रोका क्योंकि वह जानती थी कि वह पद उसे उसके पिता के हत्यारों का हिस्सा बना देगा। यह सीख मिलती है कि बड़ों की सलाह के पीछे अक्सर गहरा अनुभव और दूरगामी हित छिपे होते हैं।

6. देशप्रेम और सामाजिक उत्तरदायित्व

प्रेमचंद यह संदेश देते हैं कि देश की सेवा करना केवल कुछ लोगों का काम नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक का नैतिक उत्तरदायित्व है। व्यक्तिगत लाभ के लिए देश के हितों का सौदा करना या राष्ट्रीय आंदोलनों से मुँह मोड़ना नैतिक पतन की निशानी है।

निष्कर्ष –

‘माँ’ कहानी हमें सिखाती है कि “इंसानियत और सिद्धांतों की हार पर खड़ी सफलता वास्तव में एक शर्मनाक पराजय है।” यह कहानी हमें एक संवेदनशील इंसान और एक सजग नागरिक बनने की प्रेरणा देती है।

केंद्र बिंदु

प्रेमचंद की कहानी ‘माँ’ का केंद्र बिंदु “पारिवारिक संस्कारों और व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा के बीच का संघर्ष” है। लेखक ने इस कहानी के माध्यम से यह दिखाया है कि कैसे एक ही घर में ‘त्याग’ और ‘स्वार्थ’ की दो धाराएँ साथ-साथ बहती हैं।

कहानी के केंद्र बिंदु को हम निम्नलिखित तीन मुख्य आयामों में देख सकते हैं –

1. आदर्शवाद बनाम अवसरवाद (Idealism vs. Opportunism)

कहानी का सबसे प्रमुख केंद्र बिंदु पिता (आदित्य) के बलिदान और पुत्र (प्रकाश) के स्वार्थ के बीच का अंतर है। आदित्य ने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन और स्वास्थ्य न्यौछावर कर दिया। इसके विपरीत, उनका पुत्र प्रकाश उसी दमनकारी व्यवस्था का हिस्सा (मजिस्ट्रेट) बनना चाहता है जिसने उसके पिता की जान ली। यह ‘सिद्धांतों की राजनीति’ और ‘सुविधा की राजनीति’ के बीच का टकराव है।

2. शिक्षा और संवेदना का अभाव

कहानी इस सत्य को केंद्र में रखती है कि डिग्रियाँ और पदक व्यक्ति को बुद्धिमान तो बना सकते हैं, लेकिन महान नहीं। प्रकाश विश्वविद्यालय का टॉपर है, लेकिन वह अपनी माँ के आँसुओं और पिता के संघर्ष के प्रति पूरी तरह संवेदनहीन है। प्रेमचंद यह संदेश देना चाहते हैं कि वह शिक्षा व्यर्थ है जो मनुष्य को अपने परिवार और समाज की पीड़ा से काट दे।

3. माँ की नैतिक पराजय और मानसिक पीड़ा

कहानी का नाम ‘माँ’ है क्योंकि इसका केंद्र बिंदु करुणा (माँ) का वह मानसिक कष्ट है, जहाँ वह अपने पुत्र को सफल होते हुए तो देख रही है, लेकिन उसे नैतिक रूप से गिरते हुए भी देख रही है। करुणा के लिए प्रकाश की ‘मजिस्ट्रेट’ वाली सफलता वास्तव में उसके पति के बलिदान की ‘हत्या’ है। अंत में उसका यह सपना देखना कि उसका बेटा अपने ही पिता को सजा दे रहा है, इस कहानी की सबसे गहरी कचोट और केंद्र बिंदु है।

4. स्वाधीनता का असली अर्थ

कहानी का एक केंद्र बिंदु ‘स्वाधीनता’ की परिभाषा भी है। करुणा के अनुसार, स्वाधीनता का अर्थ गरीबी में भी अपना सिर ऊँचा रखना है, जबकि प्रकाश के लिए स्वाधीनता का अर्थ ऊँचा पद और सरकारी अधिकार प्राप्त करना है।

 

 

सृजन की प्रेरणा

प्रेमचंद की कहानी ‘माँ’ के लेखन के पीछे की प्रेरणा तत्कालीन भारतीय स्वाधीनता संग्राम और समाज में तेजी से बदल रहे जीवन मूल्यों में निहित है। प्रेमचंद केवल एक कथाकार नहीं थे, वे एक ‘युगद्रष्टा’ थे।

1. स्वाधीनता संग्राम का नैतिक पक्ष

कहानी उस समय लिखी गई जब भारत में स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम पर था। प्रेमचंद यह देख रहे थे कि अनेक देशभक्तों ने देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया (जैसे कहानी में आदित्य)। लेखक की प्रेरणा उन परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करना था जिन्होंने देश के लिए बलिदान दिया, लेकिन समाज और उनकी अगली पीढ़ी ने उनके उन आदर्शों को भुला दिया।

2. अंग्रेजी शिक्षा और ‘मैकाले साहब’ की मानसिकता

लॉर्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति ने भारत में एक ऐसा वर्ग पैदा कर दिया था जो शरीर से तो भारतीय था, पर विचारों से अंग्रेज (जैसे कहानी में प्रकाश)। प्रेमचंद की प्रेरणा इस ‘नौकरशाही मानसिकता’ पर चोट करनी थी, जो अपने ही देशवासियों के विरुद्ध दमनकारी नीतियों का हिस्सा बनने को सफलता मानती थी।

3. ‘हृदय परिवर्तन’ और पारिवारिक संस्कार

प्रेमचंद हमेशा से ही ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ (Idealistic Realism) के पक्षधर रहे हैं। उनके लेखन की बड़ी प्रेरणा यह दिखानी थी कि माँ केवल संतान को जन्म नहीं देती, बल्कि वह संस्कारों की रक्षक भी होती है। वे समाज को यह संदेश देना चाहते थे कि माँ के संस्कारों और पुत्र की महत्त्वाकांक्षा के बीच जब टकराव होता है, तो समाज का कितना बड़ा नैतिक पतन होता है।

4. मध्यमवर्गीय स्वार्थ पर व्यंग्य

प्रेमचंद ने देखा कि मध्यमवर्ग का एक बड़ा हिस्सा देशभक्ति की बातें तो करता है, लेकिन मौका मिलते ही व्यक्तिगत लाभ और सरकारी पद के लिए अपने आदर्शों का सौदा कर लेता है। प्रकाश का चरित्र इसी मध्यमवर्गीय दोहरेपन (Double Standards) को उजागर करने की प्रेरणा से रचा गया है।

5. बलिदानों की विस्मृति

कहानी के माध्यम से प्रेमचंद यह याद दिलाना चाहते थे कि जिन सुख-सुविधाओं में आज की युवा पीढ़ी जी रही है, उसके पीछे पिछली पीढ़ी का खून-पसीना और बलिदान है। जब प्रकाश अपने पिता के बलिदान को ‘व्यर्थ’ समझता है, तो यह उस समय के उन तमाम युवाओं के लिए एक चेतावनी थी जो इतिहास और विरासत के प्रति संवेदनहीन हो रहे थे।

 

 

क्र.सं.

शब्द (Hindi Word)

अर्थ (Meaning in Hindi)

English Meaning

1

प्रदीप्त

चमकता हुआ / प्रकाशित

Illuminated / Radiant

2

कारावास

जेल

Imprisonment / Jail

3

निहाल

बहुत प्रसन्न / कृतार्थ

Overjoyed / Blissful

4

व्यथा

पीड़ा / दुख

Agony / Pain

5

स्वर्गीय

दिव्य / स्वर्ग जैसा

Heavenly / Divine

6

उदार

बड़े दिल वाला

Generous / Magnanimous

7

मुद्रा

चेहरा / भाव

Posture / Expression

8

अटल

जो टले नहीं

Firm / Unshakeable

9

विस्मृत

भूला हुआ

Forgotten

10

अवलंब

सहारा

Support / Reliance

11

यातना

कष्ट / प्रताड़ना

Torment / Torture

12

प्रगाढ़

बहुत गहरा

Profound / Deep

13

आलिंगन

गले मिलना

Embrace / Hug

14

निधि

खजाना

Treasure

15

चिरगामी

सदैव चलने वाला

Ever-moving

16

जीर्ण

पुराना / जर्जर

Decayed / Feeble

17

मनसूबे

इच्छाएँ / इरादे

Intentions / Plans

18

मनोल्लास

मन की खुशी

Heartfelt joy

19

शिथिल

ढीला / सुस्त

Limp / Feeble

20

त्योरियाँ

भौहें (गुस्से में)

Frown / Eyebrows

21

कटु

कड़वा

Bitter

22

सहयोगी

साथ देने वाला

Colleague / Associate

23

गनीमत

संतोष की बात

A blessing / Consolation

24

तिरस्कार

अपमान

Scorn / Disdain

25

असीम

जिसकी सीमा न हो

Boundless / Infinite

26

क्षुद्र

छोटा / तुच्छ

Mean / Petty

27

उपेक्षा

ध्यान न देना

Neglect / Disregard

28

क्षुधापूर्ण

भूख से भरा

Ravenous / Hungry

29

तपेदिक

टी.बी. की बीमारी

Tuberculosis (TB)

30

लालसा

तीव्र इच्छा

Yearning / Longing

31

रत्नजटित

रत्नों से जड़ा हुआ

Studded with gems

32

उद्घाटन

प्रकटीकरण / खोलना

Unveiling / Revelation

33

निर्लिप्त

मोह-माया से दूर

Detached / Uninvolved

34

ज्योतिर्मय

प्रकाश से भरा

Luminous / Radiant

35

कुशल

निपुण / अच्छे

Skillful / Safe

36

बलिष्ठ

ताकतवर

Robust / Strong

37

मनस्वी

बुद्धिमान / दृढ़ इच्छाशक्ति वाला

Strong-minded / Wise

38

संतप्त

दुखी / जला हुआ

Afflicted / Distressed

39

वैधव्य

विधवापन

Widowhood

40

निर्मम

निर्दयी

Ruthless / Cruel

41

ममता

माँ का प्यार

Maternal love / Affection

42

शरारत

नटखटपन

Mischief

43

अपंग

विकलांग

Crippled / Disabled

44

धृष्टता

ढिठाई / बदतमीजी

Audacity / Impudence

45

कुतर्क

गलत तर्क

Sophistry / Bad logic

46

पछतावा

अफ़सोस

Remorse / Regret

47

क्षोभ

गुस्सा / दुःख

Agitation / Resentment

48

मितव्ययता

कम खर्च करना

Frugality / Economy

49

व्याख्यान

भाषण

Lecture / Oration

50

निग्रह

आत्म-संयम

Self-restraint

51

अकाल

भुखमरी

Famine

52

लालायित

बहुत इच्छुक

Eager / Craving

53

अभिनंदन

स्वागत / सम्मान

Felicitations / Welcome

54

वजीफा

छात्रवृत्ति

Scholarship

55

उन्माद

पागलपन / जोश

Mania / Frenzy

56

मजिस्ट्रेट

न्यायाधीश

Magistrate

57

वक्तृता

बोलने की कला

Elocution / Speech

58

अभिनंदन-पत्र

सम्मान पत्र

Citation / Welcome address

59

दमन

दबाना

Suppression

60

स्वाधीनता

आजादी

Independence

61

वसीयत

इच्छापत्र

Will / Testament

62

विरक्त

उदासीन

Dispassionate / Detached

63

सत्याग्रह

सत्य के लिए आग्रह

Passive resistance

64

असाधारण

जो आम न हो

Extraordinary

65

अनिष्ट

बुरा / अमंगल

Harm / Evil

66

महत्त्वाकांक्षा

बड़ी इच्छा

Ambition

67

स्मृति-चिह्न

यादगारी

Memento / Souvenir

68

विदीर्ण

फटा हुआ / दुखी

Lacerated / Heart-broken

69

भोज

दावत

Banquet / Feast

70

पाषाण

पत्थर

Stone

71

अशेश

अंतहीन

Endless / Infinite

72

प्रयोजन

मतलब

Purpose / Aim

73

निशा-योगिनी

रात रूपी योगिनी

Night as a yogini (Metaphor)

74

वंचित

जिसे न मिला हो

Deprived

75

भग्नहृदय

टूटा हुआ दिल

Broken-hearted

76

आर्तनाद

दुख भरी पुकार

Cry of distress

77

गगन-पथ

आकाश का रास्ता

Sky path

78

अधरों

होठों पर

On the lips

79

दीनता

गरीबी / बेबसी

Poverty / Meakness

80

अहसास

महसूस करना

Realization

81

व्यर्थ

बेकार

Useless / Vain

82

अविस्मरणीय

न भूलने वाला

Unforgettable

83

सजग

सतर्क

Alert / Awake

84

कुंठा

निराशा

Frustration

85

विलीन

गायब हो जाना

Merged / Vanished

86

आत्मीयता

अपनापन

Intimacy / Closeness

87

अंतरात्मा

मन की आवाज

Conscience

88

विवशता

मजबूरी

Compulsion / Helplessness

89

पवित्रता

शुद्धता

Purity / Holiness

90

अंधेरे

अंधकार

Darkness

91

प्रशंसा

तारीफ

Praise / Appreciation

92

उत्तरदायित्व

जिम्मेदारी

Responsibility

93

दुर्लभ

जो मुश्किल से मिले

Rare

94

स्वार्थ

अपना फायदा

Selfishness

95

यथाशीघ्र

जितनी जल्दी हो सके

As soon as possible

96

प्रतीक्षा

इंतजार

Waiting

97

सराहना

प्रशंसा करना

To appreciate

98

उत्साह

जोश

Enthusiasm

99

निरंतर

लगातार

Continuous

100

संकोच

हिचकिचाहट

Hesitation

महत्त्वपूर्ण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न और उत्तर

1. कहानी के प्रारंभ में करुणा की मानसिक स्थिति का वर्णन कीजिए।

उत्तर – कहानी के प्रारंभ में करुणा अत्यंत उत्साहित और आशामय है। उसका पति आदित्य तीन साल की जेल काटकर घर लौट रहा है। करुणा ने उसके स्वागत के लिए घर को लीप-पोतकर सजाया है, नए कपड़े बनवाए हैं और अपनी जमापूँजी खर्च कर दी है। वह कल्पना करती है कि उसका पति उसके तीन साल के बेटे को देखकर निहाल हो जाएगा और जेल के सारे कष्ट भूल जाएगा। वह पति के गौरव और आत्मबल को याद कर आत्मविभोर है, परंतु उसके मन में एक आशंका भी है कि गरीबी और विछोह के दिन अब समाप्त हो जाएंगे।

2. जेल से लौटने के बाद आदित्य की शारीरिक और मानसिक दशा कैसी थी?

उत्तर – जेल से लौटने पर आदित्य की दशा अत्यंत दयनीय थी। वह ओजस्वी और सुगठित युवक के बजाय केवल ‘हड्डियों का ढाँचा’ रह गया था। जेल की यातनाओं और खराब भोजन ने उसे तपेदिक (TB) का रोगी बना दिया था। मानसिक रूप से वह आहत था क्योंकि उसके पुराने साथियों और जनता ने उसे भुला दिया था। उसे इस बात का गहरा दुख था कि उसने अपने परिवार को दरिद्रता के दलदल में छोड़ दिया। अंत समय में उसे केवल अपनी पत्नी और बच्चे के प्रति अपने कर्तव्य को पूरा न कर पाने का पछतावा था।

3. ‘माँ’ कहानी के माध्यम से प्रेमचंद ने किस सामाजिक विडंबना पर चोट की है?

उत्तर – प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से मध्यमवर्गीय स्वार्थ और नई पीढ़ी की नैतिक संवेदनहीनता पर चोट की है। विडंबना यह है कि जिस व्यवस्था (ब्रिटिश सरकार) ने देशभक्त आदित्य के प्राण लिए, उसी व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए उसका पुत्र प्रकाश लालायित है। यह कहानी दिखाती है कि कैसे आधुनिक शिक्षा व्यक्ति को केवल ‘मस्तिष्क’ (तर्क) देती है, ‘हृदय’ (संवेदना) नहीं। समाज में आदर्शवाद हार रहा है और अवसरवाद जीत रहा है, यही इस कहानी की मुख्य विडंबना है।

4. प्रकाश का जीवन दर्शन उसके पिता के दर्शन से किस प्रकार भिन्न था?

उत्तर – आदित्य और प्रकाश के जीवन दर्शन में जमीन-आसमान का अंतर है। आदित्य का दर्शन ‘त्याग, निस्वार्थ सेवा और आत्म-सम्मान’ पर आधारित था, जिसके लिए उन्होंने गरीबी और मृत्यु को गले लगाया। इसके विपरीत, प्रकाश का दर्शन ‘व्यक्तिगत सफलता, विलासिता और तर्कपूर्ण स्वार्थ’ पर आधारित है। वह देश सेवा को ‘ऊसर की खेती’ समझता है। उसके लिए मजिस्ट्रेट का पद महत्त्वपूर्ण है, चाहे वह गुलामी ही क्यों न हो। जहाँ पिता ने राष्ट्र के लिए स्वयं को मिटा दिया, वहीं पुत्र राष्ट्र की कीमत पर स्वयं को बनाना चाहता है।

5. करुणा ने प्रकाश के इंग्लैंड जाने का विरोध क्यों किया?

उत्तर – करुणा एक स्वाभिमानी महिला थी। उसका विरोध केवल विदेश जाने से नहीं, बल्कि उस ‘सरकारी वजीफे’ और ‘सिविल सर्विस’ से था जो उसे ब्रिटिश सरकार का गुलाम बना देता। करुणा का मानना था कि जिस तंत्र ने उसके पति को तड़पा-तड़पा कर मारा, उसी तंत्र में मजिस्ट्रेट की कुर्सी पर बैठना उसके पति के बलिदान का अपमान होगा। वह चाहती थी कि प्रकाश मोटा खाकर और मोटा पहनकर देश की सेवा करे, बजाय इसके कि वह हाकिम बनकर अपनों पर ही जुल्म ढाए।

6. करुणा ने स्वयं जाकर प्रकाश का वजीफा क्यों स्वीकार कर लिया?

उत्तर – करुणा एक माँ थी और उसकी ममता उसके सिद्धांतों पर भारी पड़ गई। जब उसने देखा कि उसका बेटा वजीफा न मिलने के शोक में ‘मरे हुए व्यक्ति’ जैसा हो गया है, उसकी आँखों का तेज गायब हो गया है और वह जीवन से विरक्त हो गया है, तो करुणा का हृदय पिघल गया। वह अपने पुत्र की महत्त्वाकांक्षा की हत्या नहीं देख सकी। यद्यपि यह उसके आदर्शों की हार थी, लेकिन पुत्र के प्राण और खुशी बचाने के लिए उसने स्वयं जाकर रजिस्ट्रार से पत्र लिया और अपनी बलि दे दी।

7. प्रकाश की इंग्लैंड यात्रा की तैयारियों के दौरान करुणा की दशा का वर्णन करें।

उत्तर – प्रकाश की यात्रा की तैयारियों के दौरान करुणा शारीरिक और मानसिक रूप से टूट गई थी। वह अंदर से अत्यंत दुखी और उपेक्षित महसूस कर रही थी। प्रकाश अपनी धुन में मस्त था, उसे माँ की झुर्रियाँ और सफ़ेद बाल नजर नहीं आ रहे थे। करुणा को लग रहा था कि उसका बीस वर्षों का तप व्यर्थ हो गया। वह इतनी दुखी थी कि उसने पति की बीस साल पुरानी स्मृतियों (कपड़े, चित्र, लुटिया) को भी नष्ट कर दिया। उसे लगने लगा कि अब उसके जीवन का कोई अर्थ नहीं बचा है।

8. कहानी के अंत में करुणा के स्वप्न का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?

उत्तर – कहानी के अंत में करुणा एक भयानक स्वप्न देखती है जिसमें उसका पुत्र प्रकाश मजिस्ट्रेट बनकर अपने ही पिता (कैदी आदित्य) को सजा सुना रहा है। यह स्वप्न इस सच्चाई का प्रतीक है कि प्रकाश जिस व्यवस्था का हिस्सा बनने जा रहा है, वह अनिवार्य रूप से उन आदर्शों का दमन करेगी जिनके लिए उसके पिता ने जान दी। यह स्वप्न नैतिक मूल्यों की हत्या और पीढ़ियों के बीच के भयानक वैचारिक अंतर को दर्शाता है। यह दिखाता है कि स्वार्थ अंधा होता है और वह अपनी जड़ों पर भी प्रहार कर सकता है।

9. प्रकाश को ‘हृदयविहीन मस्तिष्क’ कहना कहाँ तक उचित है?

उत्तर – प्रकाश को ‘हृदयविहीन मस्तिष्क’ कहना पूरी तरह उचित है। वह अत्यंत बुद्धिमान है, तर्क देता है और विश्वविद्यालय में प्रथम आता है, लेकिन उसमें सहानुभूति और संवेदना का अभाव है। वह बाढ़ और अकाल के समय पीड़ितों की सेवा करने के बजाय अपनी परीक्षा और काश्मीर की सैर को चुनता है। वह अपनी माँ के विरह और कष्ट को भी नहीं समझ पाता। उसके जीवन में भावनाओं का स्थान केवल तर्क और पद-प्रतिष्ठा ने ले लिया है, जो उसे एक मशीन की तरह बना देता है।

10. क्या करुणा एक असफल माँ थी? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर – करुणा को एक ‘असफल माँ’ कहना गलत होगा। उसने अपने पुत्र को श्रेष्ठ संस्कार देने का हर संभव प्रयास किया। उसने गरीबी में भी उसे ऊँची शिक्षा दिलाई और नैतिक मूल्यों की सीख दी। उसकी ‘असफलता’ समाज और समय की है, जहाँ भौतिकतावादी शिक्षा माँ के संस्कारों पर भारी पड़ गई। अंत में उसका हार मानना उसकी ममता की जीत और सिद्धांतों की दुखद हार थी। वह एक महान माँ थी जिसने पुत्र की खुशी के लिए अपने प्राणों से प्रिय आदर्शों का बलिदान कर दिया।

11. ‘माँ’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – ‘माँ’ शीर्षक पूरी तरह सार्थक है क्योंकि यह कहानी करुणा के मातृत्व, उसके संघर्ष और उसके बलिदान के इर्द-गिर्द घूमती है। कहानी दिखाती है कि माँ केवल जन्म देने वाली नहीं, बल्कि संस्कारों की रक्षक भी होती है। करुणा का पूरा जीवन अपने पुत्र के भविष्य निर्माण और उसे सही राह दिखाने में बीतता है। अंत में वह जो पीड़ा सहती है और जिस तरह अपने पुत्र के विरह में प्राण त्यागती है, वह ‘माँ’ शब्द की गरिमा और उसकी असीम ममता को परिभाषित करता है।

12. कहानी के अंत में करुणा का विश्वव्यापी प्रेम क्या दर्शाता है?

उत्तर – प्रकाश के जाने के बाद करुणा का प्रेम अपने संकुचित घेरे (पुत्र) से निकलकर विश्वव्यापी हो गया। वह मुहल्ले के बच्चों को दूध-मक्खन खिलाने लगी और पशु-पक्षियों की सेवा करने लगी। यह दर्शाता है कि जब एक माँ का अपना केंद्र (संतान) उसे छोड़ देता है, तो उसकी ममता नष्ट नहीं होती, बल्कि वह पूरे संसार में समा जाती है। यह करुणा के चरित्र की ऊँचाई को दिखाता है कि उसने अपने दुख को घृणा में नहीं, बल्कि ‘लोक-सेवा’ और ‘जीव-दया’ में बदल दिया।

महत्त्वपूर्ण और मर्मस्पर्शी अंशों की ससंदर्भ व्याख्या

  1. पुत्र के प्रति करुणा की आशा

“अगर इस बच्चे ने सूर्य की भाँति उदय होकर उसके अँधेरे जीवन को प्रदीप्त न कर दिया होता, तो कदाचित् ठोकरों ने उसके जीवन का अंत कर दिया होता।”

  • संदर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित कहानी ‘माँ’ से ली गई हैं।
  • प्रसंग – पति के जेल जाने के बाद करुणा के जीवन में आए संघर्ष और उसके पुत्र ‘प्रकाश’ के महत्त्व का वर्णन है।
  • व्याख्या – लेखक कहते हैं कि पति के कारावास के दौरान करुणा ने घोर दरिद्रता और सामाजिक उपेक्षा झेली। इन विकट परिस्थितियों में वह शायद टूट जाती या आत्महत्या कर लेती, लेकिन उसका छोटा पुत्र प्रकाश उसके लिए आशा की किरण बनकर आया। जैसे सूर्य अंधकार को मिटा देता है, वैसे ही प्रकाश के मुख को देखकर करुणा अपने सारे दुख भूल जाती थी। वही उसके जीने का एकमात्र सहारा था।

 

  1. सेवा का सच्चा पुरस्कार

“राष्ट्र के नाम पर मिटनेवालों का यही पुरस्कार है, यह मुझे न मालूम था। जनता अपने सेवकों को बहुत जल्द भूल जाती है… लेकिन सेवा स्वयं अपना पुरस्कार है।”

  • संदर्भ – पूर्ववत्।
  • प्रसंग – जेल से जर्जर अवस्था में लौटे आदित्य का अपनी उपेक्षा पर दुख प्रकट करना।
  • व्याख्या – स्वतंत्रता सेनानी आदित्य जब जेल से लौटते हैं, तो वे देखते हैं कि समाज और उनके साथी उन्हें भूल चुके हैं। वे कड़वाहट के साथ कहते हैं कि जो देश के लिए मरते हैं, उन्हें अंत में अकेलापन ही मिलता है। लेकिन तुरंत ही वे अपने आदर्शवादी स्वभाव के कारण कहते हैं कि निस्वार्थ भाव से की गई सेवा का फल किसी की प्रशंसा में नहीं, बल्कि मन की शांति में होता है। सेवा करना ही अपने आप में सबसे बड़ा इनाम है।

 

  1. माँ की ममता और पिता की कठोरता

“वह प्रकाश की माँ नहीं, माँ-बाप दोनों हैं। उसके पुत्र-स्नेह में माता की ममता के साथ पिता की कठोरता भी मिली हुई है।”

  • संदर्भ – पूर्ववत्।
  • प्रसंग – पति की मृत्यु के बाद करुणा द्वारा प्रकाश के पालन-पोषण का वर्णन।
  • व्याख्या – पति के देहांत के बाद करुणा ने अकेले ही प्रकाश को बड़ा किया। वह उसे केवल लाड़-प्यार ही नहीं देती थी, बल्कि उसके चरित्र निर्माण के लिए अनुशासन भी रखती थी। वह चाहती थी कि प्रकाश अपने पिता के पदचिह्नों पर चले, इसलिए वह उसकी गलतियों पर एक पिता की तरह सख्त रुख भी अपनाती थी। वह उसे एक सुसंस्कृत नागरिक बनाना चाहती थी।

 

  1. बुद्धि बनाम हृदय का द्वंद्व

“उसके सामने मन की एक न चलती थी। जाति-सेवा ऊसर की खेती है… उसका अंत -करण अनिवार्य वेग के साथ विलासमय जीवन की ओर झुकता था।”

  • संदर्भ – पूर्ववत्।
  • प्रसंग – प्रकाश के बढ़ते हुए स्वार्थ और उसकी सुख-सुविधाओं के प्रति लालसा का चित्रण।
  • व्याख्या – प्रकाश बहुत बुद्धिमान था, लेकिन उसका मस्तिष्क उसके हृदय पर हावी था। वह तर्क देता था कि देश की सेवा (जाति-सेवा) करना बंजर भूमि में खेती करने जैसा है, जहाँ मेहनत बहुत है पर फल अनिश्चित। उसकी बुद्धि उसे हमेशा आराम और ऊँचे पद की ओर प्रेरित करती थी। उसने त्याग और निस्वार्थ सेवा के बजाय विलासिता पूर्ण जीवन को अपना लक्ष्य बना लिया था।

 

  1. स्वाधीनता और आत्मा का गौरव

“अगर ठोकर खाकर आत्मा स्वाधीन रह सकती है, तो मैं कहूँगी, ठोकर खाना अच्छा है।”

  • संदर्भ – पूर्ववत्।
  • प्रसंग – करुणा द्वारा प्रकाश को मजिस्ट्रेट बनने से रोकने के लिए दी गई सलाह।
  • व्याख्या – जब प्रकाश कहता है कि वह मजिस्ट्रेट बनकर समाज का भला करेगा, तो करुणा उसे आईना दिखाती है। वह कहती है कि सरकारी नौकरी में व्यक्ति को सरकार की दमनकारी नीतियों का हिस्सा बनना पड़ता है। उसके अनुसार, गुलामी की मखमली कुर्सी पर बैठने से कहीं बेहतर है कि इंसान संघर्ष करे और ठोकरें खाए, लेकिन उसकी आत्मा स्वतंत्र और स्वाभिमानी रहे। वह उसे ‘हाकिम’ बनने के बजाय ‘इंसान’ बने रहने की सीख देती है।

 

  1. महत्त्वाकांक्षा का परदा

“महत्त्वाकांक्षा आँखों पर परदा डाल देती है।”

  • संदर्भ – पूर्ववत्।
  • प्रसंग – प्रकाश के विलायत (इंग्लैंड) जाने की तैयारियों और माँ की अनदेखी का वर्णन।
  • व्याख्या – प्रकाश विदेश जाने की खुशी में इतना अंधा हो गया था कि उसे अपनी बूढ़ी माँ का दुख दिखाई नहीं दे रहा था। लेखक कहते हैं कि जब व्यक्ति के मन में ऊँचे पद और सफलता की लालसा (Ambition) चरम पर होती है, तो उसे अपनों की भावनाओं और उनके त्याग का अहसास नहीं होता। प्रकाश को माँ की झुर्रियाँ और उसकी गिरती सेहत नजर नहीं आई, उसे बस अपना सुनहरा भविष्य दिख रहा था।

 

  1. पुत्र के विरह में माँ की व्याकुलता (ममता की जीत)

“हाय री ममता! वह अभागिन सारी रात उन पुरजों को जोड़ने में लगी रही… एक-एक टुकड़ा उसे अपने खोए हुए प्रेम का एक पदचिह्न-सा मालूम होता था।”

  • संदर्भ – पूर्ववत्।
  • प्रसंग – प्रकाश के चले जाने के बाद करुणा द्वारा उसके फटे हुए पत्र को जोड़ने का प्रयास।
  • व्याख्या – यद्यपि करुणा प्रकाश के व्यवहार से आहत थी और उसने गुस्से में उसका पत्र फाड़ दिया था, लेकिन अंततः उसकी ममता जाग उठी। वह पूरी रात प्रकाश के पत्र के टुकड़ों को जोड़ने में बिता देती है। वह फटे हुए कागज उसके लिए कागज नहीं, बल्कि उसके पुत्र के प्यार की निशानियाँ थे। यह दृश्य माँ के अटूट प्रेम और उसकी विवशता को दर्शाता है कि बेटा चाहे कैसा भी हो, माँ का दिल उसके लिए हमेशा धड़कता है।

 

  1. विडंबनापूर्ण स्वप्न और अंत

“बीच में ऊँचे मंच पर कोई आदमी बैठा हुआ है… प्रकाश था। एक क्षण में एक कैदी उसके सामने लाया गया… यह आदित्य थे।”

  • संदर्भ – पूर्ववत्।
  • प्रसंग – कहानी के अंत में करुणा का वह भयानक स्वप्न जिसके बाद उसके प्राण निकल जाते हैं।
  • व्याख्या – करुणा एक सांकेतिक सपना देखती है जहाँ उसका बेटा प्रकाश मजिस्ट्रेट (हाकिम) बनकर अपने ही देशभक्त पिता आदित्य को सजा दे रहा है। यह स्वप्न कहानी की सबसे बड़ी विडंबना है। यह दिखाता है कि प्रकाश ने जिस मार्ग को चुना है, वह अंततः उन सभी मूल्यों और बलिदानों के विरुद्ध है जिनके लिए उसके पिता ने जान दी थी। यह मानसिक प्रताड़ना करुणा के हृदय को तोड़ देती है और वह इस संसार को त्याग देती है।

 

 

 

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