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लाल पान की बेगम – फणीश्वरनाथ रेणु
‘क्यों बिरजू की माँ, नाच देखने नहीं जाएगी क्या?’
बिरजू की माँ शकरकंद उबाल कर बैठी मन-ही-मन कुढ़ रही थी अपने आँगन में। सात साल का लड़का बिरजू शकरकंद के बदले तमाचे खाकर आँगन में लोट-पोट कर सारी देह में मिट्टी मल रहा था। चंपिया के सिर भी चुड़ैल मँडरा रही है… आधे-आँगन धूप रहते जो गई है सहुआइन की दुकान छोवा-गुड़ लाने, सो अभी तक नहीं लौटी, दीया-बाती की बेला हो गई। आए आज लौटके ज़रा! बागड़ बकरे की देह में कुकुरमाछी लगी थी, इसलिए बेचारा बागड़ रह-रह कर कूद-फाँद कर रहा था। बिरजू की माँ बागड़ पर मन का ग़ुस्सा उतारने का बहाना ढूँढ़कर निकाल चुकी थी…पिछवाड़े की मिर्च की फूली गाछ! बागड़ के सिवा और किसने कलेवा किया होगा! बागड़ को मारने के लिए वह मिट्टी का छोटा ढेला उठा चुकी थी, कि पड़ोसिन मखनी फुआ की पुकार सुनाई पड़ी—‘क्यों बिरजू की माँ, नाच देखने नहीं जाएगी क्या?’
‘बिरजू की माँ के आगे नाथ और पीछे पगहिया न हो तब न, फुआ!’
गर्म ग़ुस्से में बुझी नुकीली बात फुआ की देह में धँस गई और बिरजू की माँ ने हाथ के ढेले को पास ही फेंक दिया—‘बेचारे बागड़ को कुकुरमाछी परेशान कर रही है। आ-हा, आय… आय! हर्र-र-र! आय-आय!’
बिरजू ने लेटे-ही-लेटे बागड़ को एक डंडा लगा दिया। बिरजू की माँ की इच्छा हुई कि जा कर उसी डंडे से बिरजू का भूत भगा दे, किंतु नीम के पास खड़ी पनभरनियों की खिलखिलाहट सुन कर रुक गई। बोली, ‘ठहर, तेरे बप्पा ने बड़ा हथछुट्टा बना दिया है तुझे! बड़ा हाथ चलता है लोगों पर। ठहर!’
मखनी फुआ नीम के पास झुकी कमर से घड़ा उतार कर पानी भर कर लौटती पनभरनियों में बिरजू की माँ की बहकी हुई बात का इंसाफ़ करा रही थी—‘ज़रा देखो तो इस बिरजू की माँ को! चार मन पाट (जूट) का पैसा क्या हुआ है, धरती पर पाँव ही नहीं पड़ते! निसाफ़ करो! ख़ुद अपने मुँह से आठ दिन पहले से ही गाँव की गली-गली में बोलती फिरी है, ‘हाँ, इस बार बिरजू के बप्पा ने कहा है, बैलगाड़ी पर बिठा कर बलरामपुर का नाच दिखा लाऊँगा। बैल अब अपने घर है, तो हज़ार गाड़ी मँगनी मिल जाएँगी।’ सो मैंने अभी टोक दिया, नाच देखने वाली सब तो औन-पौन कर तैयार हो रही हैं, रसोई-पानी कर रहे हैं। मेरे मुँह में आग लगे, क्यों मैं टोकने गई! सुनती हो, क्या जवाब दिया बिरजू की माँ ने?’
मखनी फुआ ने अपने पोपले मुँह के होंठों को एक ओर मोड़ कर ऐठती हुई बोली निकाली—‘अर्-र्रे-हाँ-हाँ! बि-र-र-ज्जू की मै…या के आगे नाथ औ-र्र पीछे पगहिया ना हो, तब ना-आ-आ!’
जंगी की पुतोहू बिरजू की माँ से नहीं डरती। वह ज़रा गला खोल कर ही कहती है, ‘फुआ-आ! सरबे सित्तलर्मिटी (सर्वे सेटलमेंट) के हाकिम के बासा पर फूलछाप किनारी वाली साड़ी पहन के तू भी भंटा की भेंटी चढ़ाती तो तुम्हारे नाम से भी दु-तीन बीघा धनहर ज़मीन का पर्चा कट जाता! फिर तुम्हारे घर भी आज दस मन सोनाबंग पाट होता, जोड़ा बैल ख़रीदता! फिर आगे नाथ और पीछे सैकड़ो पगहिया झूलती!’
जंगी की पुतोहू मुँहज़ोर है। रेलवे स्टेशन के पास की लड़की है। तीन ही महीने हुए, गौने की नई बहू होकर आई है और सारे कुर्मा टोली की सभी झगड़ालू सासों से एकाध मोर्चा ले चुकी है। उसका ससुर जंगी दाग़ी चोर है, सी-किलासी है। उसका ख़सम रंगी कुर्मा टोली का नामी लठैत। इसीलिए हमेशा सींग घुमाती फिरती है जंगी की पुतोहू!
बिरजू की माँ के आँगन में जंगी की पुतोहू की गला-खोल बोली ग़ुलेल की गोलियों की तरह दनदनाती हुई आई थी। बिरजू की माँ ने एक तीख़ा जवाब खोज कर निकाला, लेकिन मन मसोस कर रह गई।…गोबर की ढेरी में कौन ढेला फेंके!
जीभ के झाल को गले में उतार कर बिरजू की माँ ने अपनी बेटी चंपिया को आवाज़ दी—‘अरी चंपिया-या-या, आज लौटे तो तेरी मूड़ी मरोड़ कर चूल्हे में झोंकती हूँ! दिन-दिन बेचाल होती जाती है!…गाँव में तो अब ठेठर-बैसकोप का गीत गाने वाली पतुरिया-पुतोहू सब आने लगी हैं। कहीं बैठके ‘बाजे न मुरलिया’ सीख रही होगी ह-र-जा-ई-ई! अरी चंपिया-या-या!’
जंगी की पुतोहू ने बिरजू की माँ की बोली का स्वाद लेकर कमर पर घड़े को सँभाला और मटक कर बोली, ‘चल दिदिया, चल! इस मुहल्ले में लाल पान की बेगम बसती है! नहीं जानती, दोपहर-दिन और चौपहर-रात बिजली की बत्ती भक्-भक् कर जलती है!’
भक्-भक् बिजली-बत्ती की बात सुन कर न जाने क्यों सभी खिलखिला कर हँस पड़ीं। फुआ की टूटी हुई दंत-पंक्तियों के बीच से एक मीठी गाली निकली—‘शैतान की नानी!’
बिरजू की माँ की आँखों पर मानो किसी ने तेज़ टार्च की रौशनी डाल कर चौंधिया दिया।…भक्-भक् बिजली-बत्ती! तीन साल पहले सर्वे कैंप के बाद गाँव की जलन-ढाही औरतों ने एक कहानी गढ़ के फैलाई थी, चंपिया की माँ के आँगन में रात-भर बिजली-बत्ती भुकभुकाती थी! चंपिया की माँ के आँगन में नाकवाले जूते की छाप घोड़े की टाप की तरह।…जलो, जलो! और जलो! चंपिया की माँ के आँगन में चाँदी-जैसे पाट सूखते देख कर जलने वाली सब औरतें खलिहान पर सोनोली धान के बोझों को देख कर बैंगन का भुर्ता हो जाएँगी।
मिट्टी के बरतन से टपकते हुए छोवा-गुड़ को उँगलियों से चाटती हुई चंपिया आई और माँ के तमाचे खा कर चीख़ पड़ी—‘मुझे क्यों मारती है-ए-ए-ए! सहुआइन जल्दी से सौदा नहीं देती है-एँ-एँ-एँ-एँ!’
‘सहुआइन जल्दी सौदा नहीं देती की नानी! एक सहुआइन की दुकान पर मोती झरते हैं, जो जड़ गाड़ कर बैठी हुई थी! बोल, गले पर लात दे कर कल्ला तोड़ दूँगी हरजाई, जो फिर कभी ‘बाजे न मुरलिया’ गाते सुना! चाल सीखने जाती है टीशन की छोकरियों से!’
बिरजू के माँ ने चुप होकर अपनी आवाज़ अंदाज़ी कि उसकी बात जंगी के झोंपड़े तक साफ़-साफ़ पहुँच गई होगी।
बिरजू बीती हुई बातों को भूल कर उठ खड़ा हुआ था और धूल झाड़ते हुए बरतन से टपकते गुड़ को ललचाई निगाह से देखने लगा था।…दीदी के साथ वह भी दुकान जाता तो दीदी उसे भी गुड़ चटाती, ज़रुर! वह शकरकंद के लोभ में रहा और माँगने पर माँ ने शकरकंद के बदले…
‘ए मैया, एक अँगुली गुड़ दे दे बिरजू ने तलहथी फैलाई—दे ना मैया, एक रत्ती-भर!’
‘एक रत्ती क्यों, उठाके बरतन को फेंक आती हूँ पिछवाड़े में, जाके चाटना! नहीं बनेगी मीठी रोटी! …मीठी रोटी खाने का मुँह होता है बिरजू की माँ ने उबले शकरकंद का सूप रोती हुई चंपिया के सामने रखते हुए कहा, ‘बैठके छिलके उतार, नहीं तो अभी…!’
दस साल की चंपिया जानती है, शकरकंद छीलते समय कम-से-कम बारह बार माँ उसे बाल पकड़ कर झकझोरेगी, छोटी-छोटी खोट निकाल कर गालियाँ देगी—‘पाँव फैलाके क्यों बैठी है उस तरह, बेलज्जी!’ चंपिया माँ के ग़ुस्से को जानती है।
बिरजू ने इस मौक़े पर थोड़ी-सी ख़ुशामद करके देखा—’मैया, मैं भी बैठ कर शकरकंद छीलूँ?’
‘नहीं?’ माँ ने झिड़की दी, ‘एक शकरकंद छीलेगा और तीन पेट में! जाके सिद्धू की बहू से कहो, एक घंटे के लिए कड़ाही माँग कर ले गई तो फिर लौटाने का नाम नहीं। जा जल्दी!’
मुँह लटका कर आँगन से निकलते-निकलते बिरजू ने शकरकंद और गुड़ पर निगाहें दौड़ाई। चंपिया ने अपने झबरे केश की ओट से माँ की ओर देखा और नज़र बचा कर चुपके से बिरजू की ओर एक शकरकंद फेंक दिया।…बिरजू भागा।
‘सूरज भगवान डूब गए। दीया-बत्ती की बेला हो गई। अभी तक गाड़ी…
‘चंपिया बीच में ही बोल उठी—‘कोयरी टोले में किसी ने गाड़ी नहीं दी मैया! बप्पा बोले, माँ से कहना सब ठीक-ठाक करके तैयार रहें। मलदहिया टोली के मियाँजान की गाड़ी लाने जा रहा हूँ।’
सुनते ही बिरजू की माँ का चेहरा उतर गया। लगा, छाते की कमानी उतर गई घोड़े से अचानक। कोयरी टोले में किसी ने गाड़ी मँगनी नहीं दी! तब मिल चुकी गाड़ी! जब अपने गाँव के लोगों की आँख में पानी नहीं तो मलदहिया टोली के मियाँजान की गाड़ी का क्या भरोसा! न तीन में न तेरह में! क्या होगा शकरकंद छील कर! रख दे उठा के!…यह मर्द नाच दिखाएगा। बैलगाड़ी पर चढ़ कर नाच दिखाने ले जाएगा! चढ़ चुकी बैलगाड़ी पर, देख चुकी जी-भर नाच… पैदल जाने वाली सब पहुँच कर पुरानी हो चुकी होंगी।
बिरजू छोटी कड़ाही सिर पर औंधा कर वापस आया—‘देख दिदिया, मलेटरी टोपी! इस पर दस लाठी मारने पर भी कुछ नहीं होता।’
चंपिया चुपचाप बैठी रही, कुछ बोली नहीं, ज़रा-सी मुस्कराई भी नहीं। बिरजू ने समझ लिया, मैया का ग़ुस्सा अभी उतरा नहीं है पूरे तौर से।
मढ़ैया के अंदर से बागड़ को बाहर भगाती हुई बिरजू की माँ बड़बड़ाई—‘कल ही पँचकौड़ी क़साई के हवाले करती हूँ राकस तुझे! हर चीज़ में मुँह लगाएगा। चंपिया, बाँध दे बागड़ को। खोल दे गले की घंटी! हमेशा टुनुर-टुनुर! मुझे ज़रा नहीं सुहाता है!’
‘टुनुर-टुनुर’ सुनते ही बिरजू को सड़क से जाती हुई बैलगाड़ियों की याद हो आई—‘अभी बबुआन टोले की गाड़ियाँ नाच देखने जा रही थीं… झुनुर-झुनुर बैलों की झुमकी, तुमने सु…’
‘बेसी बक-बक मत करो!’ बागड़ के गले से झुमकी खोलती बोली चंपिया।
‘चंपिया, डाल दे चूल्हे में पानी! बप्पा आवे तो कहना कि अपने उड़नजहाज़ पर चढ़ कर नाच देख आएँ! मुझे नाच देखने का सौख नहीं!…मुझे जगाइयो मत कोई! मेरा माथा दुख रहा है।’
मढ़ैया के ओसारे पर बिरजू ने फिसफिसा के पूछा, ‘क्यों दिदिया, नाच में उड़नजहाज़ भी उड़ेगा?’
चटाई पर कथरी ओढ़कर बैठती हुई चंपिया ने बिरजू को चुपचाप अपने पास बैठने का इशारा किया, मुफ़्त में मार खाएगा बेचारा!
बिरजू ने बहन की कथरी में हिस्सा बाँटते हुए चुक्की-मुक्की लगाई। जाड़े के समय इस तरह घुटने पर ठुड्डी रख कर चुक्की-मिक्की लगाना सीख चुका है वह। उसने चंपिया के कान के पास मुँह ले जा कर कहा, ‘हम लोग नाच देखने नहीं जाएँगे?…गाँव में एक पंछी भी नहीं है। सब चले गए।’
चंपिया को तिल-भर भी भरोसा नहीं। संझा तारा डूब रहा है। बप्पा अभी तक गाड़ी लेकर नहीं लौटे। एक महीना पहले से ही मैया कहती थी, बलरामपुर के नाच के दिन मीठी रोटी बनेगी, चंपिया छींट की साड़ी पहनेगी, बिरजू पैंट पहनेगा, बैलगाड़ी पर चढ़ कर…
चंपिया की भीगी पलकों पर एक बूँद आँसू आ गया।
बिरजू का भी दिल भर आया। उसने मन-ही-मन में इमली पर रहने वाले जिनबाबा को एक बैंगन कबूला, गाछ का सबसे पहला बैंगन, उसने ख़ुद जिस पौधे को रोपा है!…जल्दी से गाड़ी लेकर बप्पा को भेज दो, जिनबाबा!
मढ़ैया के अंदर बिरजू की माँ चटाई पर पड़ी करवटें ले रही थी। उँह, पहले से किसी बात का मनसूबा नहीं बाँधना चाहिए किसी को! भगवान ने मनसूबा तोड़ दिया। उसको सबसे पहले भगवान से पूछना है, यह किस चूक का फल दे रहे हो भोला बाबा! अपने जानते उसने किसी देवता-पित्तर की मान-मनौती बाक़ी नहीं रखी। सर्वे के समय ज़मीन के लिए जितनी मनौतियाँ की थीं… ठीक ही तो! महाबीर जी का रोट तो बाक़ी ही है। हाय रे दैव!… भूल-चूक माफ़ करो महाबीर बाबा! मनौती दूनी करके चढ़ाएगी बिरजू की माँ!…
बिरजू की माँ के मन में रह-रह कर जंगी की पुतोहू की बातें चुभती हैं, भक्-भक् बिजली-बत्ती!… चोरी-चमारी करने वाली की बेटी-पुतोहू जलेगी नहीं! पाँच बीघा ज़मीन क्या हासिल की है बिरजू के बप्पा ने, गाँव की भाईखौकियों की आँखों में किरकिरी पड़ गई है। खेत में पाट लगा देख कर गाँव के लोगों की छाती फटने लगी, धरती फोड़ कर पाट लगा है, बैसाखी बादलों की तरह उमड़ते आ रहे हैं पाट के पौधे! तो अलान, तो फलान! इतनी आँखों की धार भला फ़सल सहे! जहाँ पंद्रह मन पाट होना चाहिए, सिर्फ़ दस मन पाट काँटा पर तौल के ओजन हुआ रब्बी भगत के यहाँ।…
‘इसमें जलने की क्या बात है भला!…बिरजू के बप्पा ने तो पहले ही कुर्मा टोली के एक-एक आदमी को समझा के कहा, ज़िंदगी-भर मज़दूरी करते रह जाओगे। सर्वे का समय आ रहा है, लाठी कड़ी करो तो दो-चार बीघे ज़मीन हासिल कर सकते हो। सो गाँव की किसी पुतखौकी का भतार सर्वे के समय बाबूसाहेब के ख़िलाफ़ खाँसा भी नहीं।…बिरजू के बप्पा को कम सहना पड़ा है! बाबूसाहेब ग़ुस्से से सरकस नाच के बाघ की तरह हुमड़ते रह गए। उनका बड़ा बेटा घर में आग लगाने की धमकी देकर गया।…आख़िर बाबूसाहेब ने अपने सबसे छोटे लड़के को भेजा। बिरजू की माँ को ‘मौसी’ कहके पुकारा—यह ज़मीन बाबू जी ने मेरे नाम से ख़रीदी थी। मेरी पढ़ाई-लिखाई इसी ज़मीन की उपज से चलती है।…और भी कितनी बातें। ख़ूब मोहना जानता है उत्ता ज़रा-सा लड़का। ज़मींदार का बेटा है कि…’
‘चंपिया, बिरजू सो गया क्या? यहाँ आ जा बिरजू, अंदर। तू भी आ जा, चंपिया!… भला आदमी आए तो एक बार आज!’
बिरजू के साथ चंपिया अंदर चली गई।
‘ढिबरी बुझा दे।… बप्पा बुलाएँ तो जवाब मत देना। खपच्ची गिरा दे।’
‘भला आदमी रे, भला आदमी! मुँह देखो ज़रा इस मर्द का!…बिरजू की माँ दिन-रात मंझा न देती रहती तो ले चुके थे ज़मीन! रोज़ आकर माथा पकड़ के बैठ जाएँ, मुझे ज़मीन नहीं लेनी है बिरजू की माँ, मजूरी ही अच्छी।…जवाब देती थी बिरजू की माँ ख़ूब सोच-समझके, छोड़ दो, जब तुम्हारा कलेजा ही स्थिर नहीं होता है तो क्या होगा? जोरु-ज़मीन ज़ोर के, नहीं तो किसी और के!…’
बिरजू के बाप पर बहुत तेज़ी से ग़ुस्सा चढ़ता है। चढ़ता ही जाता है।…बिरजू की माँ का भाग ही ख़राब है, जो ऐसा गोबरगणेश घरवाला उसे मिला। कौन-सा सौख-मौज दिया है उसके मर्द ने? कोल्हू के बैल की तरह खट कर सारी उम्र काट दी इसके यहाँ, कभी एक पैसे की जलेबी भी लाकर दी है उसके खसम ने!…पाट का दाम भगत के यहाँ से ले कर बाहर-ही-बाहर बैल-हट्टा चले गए। बिरजू की माँ को एक बार नमरी लोट देखने भी नहीं दिया आँख से।…बैल ख़रीद लाए। उसी दिन से गाँव में ढिंढोरा पीटने लगे, बिरजू की माँ इस बार बैलगाड़ी पर चढ़ कर जाएगी नाच देखने!…दूसरे की गाड़ी के भरोसे नाच दिखाएगा!…
अंत में उसे अपने-आप पर क्रोध हो आया। वह ख़ुद भी कुछ कम नहीं! उसकी जीभ में आग लगे! बैलगाड़ी पर चढ़ कर नाच देखने की लालसा किस कुसमय में उसके मुँह से निकली थी, भगवान जाने! फिर आज सुबह से दोपहर तक, किसी-न-किसी बहाने उसने अठारह बार बैलगाड़ी पर नाच देखने की चर्चा छेड़ी है।…लो, ख़ूब देखो नाच! कथरी के नीचे दुशाले का सपना!…कल भोरे पानी भरने के लिए जब जाएगी, पतली जीभवाली पतुरिया सब हँसती आएँगी, हँसती जाएँगी।…सभी जलते है उससे, हाँ भगवान, दाढ़ी-जार भी! दो बच्चों की माँ होकर भी वह जस-की-तस है। उसका घरवाला उसकी बात में रहता है। वह बालों में गरी का तेल डालती है। उसकी अपनी ज़मीन है। है किसी के पास एक घूर ज़मीन भी अपने इस गाँव में! जलेंगे नहीं, तीन बीघे में धान लगा हुआ है, अगहनी। लोगों की बिखदीठ से बचे, तब तो!
बाहर बैलों की घंटियाँ सुनाई पड़ीं। तीनों सतर्क हो गए। उत्कर्ण होकर सुनते रहे।
‘अपने ही बैलों की घंटी है, क्यों री चंपिया?’
चंपिया और बिरजू ने प्राय – एक ही साथ कहा, ‘हूँ-ऊँ-ऊँ!’
‘चुप बिरजू की माँ ने फिसफिसा कर कहा, शायद गाड़ी भी है, घड़घड़ाती है न?’
‘हूँ-ऊँ-ऊँ!’ दोनों ने फिर हुँकारी भरी।
‘चुप! गाड़ी नहीं है। तू चुपके से टट्टी में छेद करके देख तो आ चंपी! भागके आ, चुपके-चुपके।’
चंपिया बिल्ली की तरह हौले-हौले पाँव से टट्टी के छेद से झाँक आई—‘हाँ मैया, गाड़ी भी है!’
बिरजू हड़बड़ा कर उठ बैठा। उसकी माँ ने उसका हाथ पकड़ कर सुला दिया—‘बोले मत!’
चंपिया भी गुदड़ी के नीचे घुस गई।
बाहर बैलगाड़ी खोलने की आवाज़ हुई। बिरजू के बाप ने बैलों को ज़ोर से डाँटा—‘हाँ-हाँ! आ गए घर! घर आने के लिए छाती फटी जाती थी!’
बिरजू की माँ ताड़ गई, ज़रुर मलदहिया टोली में गाँजे की चिलम चढ़ रही थी, आवाज़ तो बड़ी खनखनाती हुई निकल रही है।
‘चंपिया-ह!’ बाहर से पुकार कर कहा उसके बाप ने, ‘बैलों को घास दे दे, चंपिया-ह!’
अंदर से कोई जवाब नहीं आया। चंपिया के बाप ने आँगन में आकर देखा तो न रोशनी, न चराग़, न चूल्हे में आग।…बात क्या है! नाच देखने, उतावली होकर, पैदल ही चली गई क्या…!
बिरजू के गले में खसखसाहट हुई और उसने रोकने की पूरी कोशिश भी की, लेकिन खाँसी जब शुरु हुई तो पूरे पाँच मिनट तक वह खाँसता रहा।
‘बिरजू! बेटा बिरजमोहन!’ बिरजू के बाप ने पुचकार कर बुलाया, मैया ग़ुस्से के मारे सो गई क्या?…अरे अभी तो लोग जा ही रहे हैं।’
बिरजू की माँ के मन में आया कि कस कर जवाब दे, नहीं देखना है नाच! लौटा दो गाड़ी!
‘चंपिया-ह! उठती क्यों नहीं? ले, धान की पँचसीस रख दे। धान की बालियों का छोटा झब्बा झोंपड़े के ओसरे पर रख कर उसने कहा, ‘दीया बालो!’
बिरजू की माँ उठकर ओसारे पर आई—‘डेढ़ पहर रात को गाड़ी लाने की क्या ज़रुरत थी? नाच तो अब ख़त्म हो रहा होगा।’
ढिबरी की रौशनी में धान की बालियों का रंग देखते ही बिरजू की माँ के मन का सब मैल दूर हो गया।…धानी रंग उसकी आँखों से उतर कर रोम-रोम में घुल गया।
‘नाच अभी शुरू भी नहीं हुआ होगा। अभी-अभी बलमपुर के बाबू की सम्पनी गाड़ी मोहनपुर होटिल-बँगला से हाकिम साहब को लाने गई है। इस साल आख़िरी नाच है।…पँचसीस टट्टी में खोंस दे, अपने खेत का है।’
‘अपने खेत का? हुलसती हुई बिरजू की माँ ने पूछा, पक गए धान?’
‘नहीं, दस दिन में अगहन चढ़ते-चढ़ते लाल हो कर झुक जाएँगी सारे खेत की बालियाँ!…मलदहिया टोली पर जा रहा था, अपने खेत में धान देख कर आँखें जुड़ा गईं। सच कहता हूँ, पँचसीस तोड़ते समय उँगलियाँ काँप रही थीं मेरी!’
बिरजू ने धान की एक बाली से एक धान ले कर मुँह में डाल लिया और उसकी माँ ने एक हल्की डाँट दी—‘कैसा लुक्क्ड़ है तू रे!…इन दुश्मनों के मारे कोई नेम-धरम बचे!’
‘क्या हुआ, डाँटती क्यों है?’
‘नवान्न के पहले ही नया धान जुठा दिया, देखते नहीं?’
‘अरे, इन लोगों का सब कुछ माफ़ है। चिरई-चुरमुन हैं यह लोग! दोनों के मुँह में नवान्न के पहले नया अन्न न पड़े?’
इसके बाद चंपिया ने भी धान की बाली से दो धान लेकर दाँतों-तले दबाए—‘ओ मैया! इतना मीठा चावल!’
‘और गमकता भी है न दिदिया?’ बिरजू ने फिर मुँह में धान लिया।
‘रोटी-पोटी तैयार कर चुकी क्या?’ बिरजू के बाप ने मुस्कुराकर पूछा।
‘नहीं!’ मान-भरे सुर में बोली बिरजू की माँ, ‘जाने का ठीक-ठिकाना नहीं… और रोटी बनाती!’
‘वाह! ख़ूब हो तुम लोग!…जिसके पास बैल है, उसे गाड़ी मँगनी नहीं मिलेगी भला? गाड़ीवालों को भी कभी बैल की ज़रुरत होगी।…पूछूँगा तब कोयरी-टोला वालों से!…ले, जल्दी से रोटी बना ले।’
‘देर नहीं होगी!’
‘अरे, टोकरी भर रोटी तो तू पलक मारते बना देती है, पाँच रोटियाँ बनाने में कितनी देर लगेगी!’
अब बिरजू की माँ के होंठों पर मुस्कुराहट खुल कर खिलने लगी। उसने नज़र बचा कर देखा, बिरजू का बप्पा उसकी ओर एकटक निहार रहा है।…चंपिया और बिरजू न होते तो मन की बात हँस कर खोलने में देर न लगती। चंपिया और बिरजू ने एक-दूसरे को देखा और ख़ुशी से उनके चेहरे जगमगा उठे—‘मैया बेकार ग़ुस्सा हो रही थी न!’
‘चंपी! ज़रा घैलसार में खड़ी होकर मखनी फुआ को आवाज़ दे तो!’
‘ऐ फू-आ-आ! सुनती हो फूआ-आ! मैया बुला रही है!’
फुआ ने कोई जवाब नहीं दिया, किंतु उसकी बड़बड़ाहट स्पष्ट सुनाई पड़ी—‘हाँ! अब फुआ को क्यों गुहारती है? सारे टोले में बस एक फुआ ही तो बिना नाथ-पगहियावाली है।’
‘अरी फुआ!’ बिरजू की माँ ने हँस कर जवाब दिया, ‘उस समय बुरा मान गई थी क्या? नाथ-पगहियावाले को आकर देखो, दोपहर रात में गाड़ी लेकर आया है! आ जाओ फुआ, मैं मीठी रोटी पकाना नहीं जानती।’
फुआ काँखती-खाँसती आई—‘इसी के घड़ी-पहर दिन रहते ही पूछ रही थी कि नाच देखने जाएगी क्या? कहती, तो मैं पहले से ही अपनी अँगीठी यहाँ सुलगा जाती।’
बिरजू की माँ ने फुआ को अँगीठी दिखला दी और कहा, ‘घर में अनाज-दाना वग़ैरह तो कुछ है नहीं। एक बागड़ है और कुछ बरतन-बासन, सो रात-भर के लिए यहाँ तंबाकू रख जाती हूँ। अपना हुक्का ले आई हो न फुआ?’
फुआ को तंबाकू मिल जाए, तो रात-भर क्या, पाँच रात बैठ कर जाग सकती है। फुआ ने अँधेरे में टटोल कर तंबाकू का अंदाज़ किया…ओ-हो! हाथ खोल कर तंबाकू रखा है बिरजू की माँ ने! और एक वह है सहुआइन! राम कहो! उस रात को अफ़ीम की गोली की तरह एक मटर-भर तंबाकू रख कर चली गई ग़ुलाब-बाग़ मेले और कह गई कि डिब्बी-भर तंबाकू है।
बिरजू की माँ चूल्हा सुलगाने लगी। चंपिया ने शकरकंद को मसल कर गोले बनाए और बिरजू सिर पर कड़ाही औंधा कर अपने बाप को दिखलाने लगा—‘मलेटरी टोपी! इस पर दस लाठी मारने पर भी कुछ नहीं होगा!’
सभी ठठा कर हँस पड़े। बिरजू की माँ हँस कर बोली, ‘ताखे पर तीन-चार मोटे शकरकंद हैं, दे दे बिरजू को चंपिया, बेचारा शाम से ही…’
‘बेचारा मत कहो मैया, ख़ूब सचारा है’ अब चंपिया चहकने लगी, ‘तुम क्या जानो, कथरी के नीचे मुँह क्यों चल रहा था बाबू साहब का!’
‘ही-ही-ही!’
बिरजू के टूटे दूध के दाँतो की फाँक से बोली निकली, ‘बिलैक-मारटिन में पाँच शकरकंद खा लिया! हा-हा-हा!’
सभी फिर ठठाकर हँस पड़े। बिरजू की माँ ने फुआ का मन रखने के लिए पूछा, ‘एक कनवाँ गुड़ है। आधा दूँ फुआ?’
फुआ ने गदगद होकर कहा, ‘अरी शकरकंद तो ख़ुद मीठा होता है, उतना क्यों डालेगी?’
जब तक दोनों बैल दाना-घास खाकर एक-दूसरे की देह को जीभ से चाटें, बिरजू की माँ तैयार हो गई। चंपिया ने छींट की साड़ी पहनी और बिरजू बटन के अभाव में पैंट पर पटसन की डोरी बँधवाने लगा।
बिरजू के माँ ने आँगन से निकल गाँव की ओर कान लगा कर सुनने की चेष्टा की—‘उँहुँ, इतनी देर तक भला पैदल जाने वाले रुके रहेंगे?’
पूर्णिमा का चाँद सिर पर आ गया है।…बिरजू की माँ ने असली रुपा का मँगटिक्का पहना है आज, पहली बार। बिरजू के बप्पा को हो क्या गया है, गाड़ी जोतता क्यों नहीं, मुँह की ओर एकटक देख रहा है, मानो नाच की लालपान की…
गाड़ी पर बैठते ही बिरजू की माँ की देह में एक अजीब गुदगुदी लगने लगी। उसने बाँस की बल्ली को पकड़ कर कहा, ‘गाड़ी पर अभी बहुत जगह है।…ज़रा दाहिनी सड़क से गाड़ी हाँकना।’
बैल जब दौड़ने लगे और पहिया जब चूँ-चूँ करके घरघराने लगा तो बिरजू से नहीं रहा गया—‘उड़नजहाज़ की तरह उड़ाओ बप्पा!’
गाड़ी जंगी के पिछवाड़े पहुँची। बिरजू की माँ ने कहा, ‘ज़रा जंगी से पूछो न, उसकी पुतोहू नाच देखने चली गई क्या?’
गाड़ी के रुकते ही जंगी के झोंपड़े से आती हुई रोने की आवाज़ स्पष्ट हो गई। बिरजू के बप्पा ने पूछा, ‘अरे जंगी भाई, काहे कन्न-रोहट हो रहा है आँगन में?’
जंगी घूर ताप रहा था, बोला, ‘क्या पूछते हो, रंगी बलरामपुर से लौटा नहीं, पुतोहिया नाच देखने कैसे जाए! आसरा देखते-देखते उधर गाँव की सभी औरतें चली गई।’
‘अरी टीशनवाली, तो रोती है काहे!’ बिरजू की माँ ने पुकार कर कहा, ‘आ जा झट से कपड़ा पहन कर। सारी गाड़ी पड़ी हुई है! बेचारी!…आ जा जल्दी!’
बग़ल के झोंपड़े से राधे की बेटी सुनरी ने कहा, ‘काकी, गाड़ी में जगह है? मैं भी जाऊँगी।’
बाँस की झाड़ी के उस पार लरेना खवास का घर है। उसकी बहू भी नहीं गई है। गिलट का झुमकी-कड़ा पहन कर झमकती आ रही है।
‘आ जा! जो बाक़ी रह गई हैं, सब आ जाएँ जल्दी!’
जंगी की पुतोहू, लरेना की बीवी और राधे की बेटी सुनरी, तीनों गाड़ी के पास आई। बैल ने पिछला पैर फेंका। बिरजू के बाप ने एक भद्दी गाली दी—‘साला! लताड़ मार कर लँगड़ी बनाएगा पुतोहू को!’
सभी ठठाकर हँस पड़े। बिरजू के बाप ने घूँघट में झुकी दोनों पुतोहूओं को देखा। उसे अपने खेत की झुकी हुई बालियों की याद आ गई।
जंगी की पुतोहू का गौना तीन ही मास पहले हुआ है। गौने की रंगीन साड़ी से कड़वे तेल और लठवा-सिंदूर की गंध आ रही है। बिरजू की माँ को अपने गौने की याद आई। उसने कपड़े की गठरी से तीन मीठी रोटियाँ निकाल कर कहा, ‘खा ले एक-एक करके। सिमराहा के सरकारी कूप में पानी पी लेना।’
गाड़ी गाँव से बाहर होकर धान के खेतों के बग़ल से जाने लगी। चाँदनी, कातिक की!…खेतों से धान के झरते फूलों की गंध आती है। बाँस की झाड़ी में कहीं दुद्धी की लता फूली है। जंगी की पुतोहू ने एक बीड़ी सुलगा कर बिरजू की माँ की ओर बढ़ाई। बिरजू की माँ को अचानक याद आई चंपिया, सुनरी, लरेना की बीवी और जंगी की पुतोहू, ये चारों ही गाँव में बैसकोप का गीत गाना जानती हैं।…ख़ूब!
गाड़ी की लीक धन-खेतों के बीच होकर गई। चारों ओर गौने की साड़ी की खसखसाहट-जैसी आवाज़ होती है।…बिरजू की माँ के माथे के मँगटिक्के पर चाँदनी छिटकती है।
‘अच्छा, अब एक बैसकोप का गीत गा तो चंपिया!…डरती है काहे? जहाँ भूल जाओगी, बग़ल में मासटरनी बैठी ही है!’
दोनों पुतोहुओं ने तो नहीं, किंतु चंपिया और सुनरी ने खखासकर कर गला साफ़ किया।
बिरजू के बाप ने बैलों को ललकारा—‘चल भैया! और ज़रा ज़ोर से!…गा रे चंपिया, नहीं तो मैं बैलों को धीरे-धीरे चलने को कहूँगा।’
जंगी की पुतोहू ने चंपिया के कान के पास घूँघट ले जा कर कुछ कहा और चंपिया ने धीमे से शुरु किया—‘चंदा की चाँदनी…’
बिरजू को गोद में लेकर बैठी उसकी माँ की इच्छा हुई कि वह भी साथ-साथ गीत गाए। बिरजू की माँ ने जंगी की पुतोहू को देखा, धीरे-धीरे गुनगुना रही है वह भी। कितनी प्यारी पुतोहू है! गौने की साड़ी से एक ख़ास क़िस्म की गंध निकलती है। ठीक ही तो कहा है उसने! बिरजू की माँ बेगम है, लालपान की बेगम! यह तो कोई बुरी बात नहीं। हाँ, वह सचमुच लाल पान की बेगम है!
बिरजू की माँ ने अपनी नाक पर दोनों आँखों को केंद्रित करने की चेष्टा करके अपने रुप की झाँकी ली, लाल साड़ी की झिलमिल किनारी, मँगटिक्का पर चाँद।…बिरजू की माँ के मन में अब और कोई लालसा नहीं। उसे नींद आ रही है।
‘लाल पान की बेगम’ – परिचय
‘लाल पान की बेगम’ महान आंचलिक कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की एक कालजयी कहानी है। यह कहानी ग्रामीण परिवेश में एक निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार की आर्थिक उन्नति, स्वाभिमान और मानवीय संवेदनाओं का जीवंत चित्रण करती है जो 1957 में प्रकाशित हुई थी।
कहानी की मुख्य पात्र ‘बिरजू की माँ’ है, जिसे उसकी संपन्नता और तेवर के कारण गाँव की औरतें व्यंग्य में ‘लाल पान की बेगम’ कहती हैं। पूरी कथा बलरामपुर का ‘नाच’ देखने जाने की उत्सुकता और उसमें आने वाली बाधाओं के इर्द-गिर्द घूमती है। कहानी ग्रामीण समाज की ईर्ष्या, वर्ग-संघर्ष और स्त्री मनोविज्ञान को गहराई से उकेरती है।
रेणु जी ने दिखाया है कि कैसे एक साधारण परिवार के लिए अपनी बैलगाड़ी होना प्रतिष्ठा का विषय है। अंततः, कहानी व्यक्तिगत मनमुटाव को भुलाकर सामूहिक खुशहाली और उदारता का संदेश देती है, जहाँ बिरजू की माँ अपने विरोधियों को भी साथ लेकर ‘नाच’ देखने निकलती है।
पात्र-परिचय
- बिरजू की माँ (मुख्य पात्र)
स्वभाव – अत्यंत स्वाभिमानी, थोड़ी तुनकमिज़ाज लेकिन भीतर से कोमल हृदय वाली। वह अपने परिवार की आर्थिक उन्नति जैसे तीन-चार बीघा ज़मीन और नए बैलों को लेकर गर्व महसूस करती है।
विशेषता – उसे गाँव की औरतें ‘लाल पान की बेगम’ कहती हैं। वह शुरू में पड़ोसियों से चिढ़ी हुई है, लेकिन कहानी के अंत में उसका उदार पक्ष सामने आता है जब वह सबको अपनी गाड़ी में बिठाकर नाच दिखाने ले जाती है।
भूमिका – पूरी कहानी उसी के इर्द-गिर्द घूमती है। उसका द्वंद्व अपनी प्रतिष्ठा और परिवार की खुशी के बीच है।
- बिरजू के बापू (बिरजू का पिता)
स्वभाव – सीधा-सादा, मेहनती और थोड़ा ‘गोबरगणेश’ अर्थात् भोला। वह अपनी पत्नी से दबता है लेकिन उससे प्रेम भी बहुत करता है।
विशेषता – वह एक कुशल किसान है जिसने संघर्ष करके अपनी ज़मीन हासिल की है। वह अपनी पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए देर रात तक गाड़ी का इंतज़ाम करने में लगा रहता है।
भूमिका – वह परिवार का सहारा है और उसकी मेहनत ही परिवार की समृद्धि का आधार है।
- चंपिया
परिचय – बिरजू की बड़ी बहन (लगभग 10 साल की)।
स्वभाव – समझदार और सहमी हुई। वह अपनी माँ के ग़ुस्से को पहचानती है और अपने छोटे भाई बिरजू का ख्याल रखती है। उसे ‘बैसकोप’ (सिनेमा) के गाने गाने का शौक है।
विशेषता – वह माँ और भाई के बीच एक सेतु (Bridge) का काम करती है।
- बिरजू
परिचय – सात साल का छोटा बालक।
स्वभाव – चंचल, शरारती और खाने का शौकीन (विशेषकर शकरकंद और गुड़)। वह अपनी माँ की डाँट और तमाचे खाकर भी जल्दी भूल जाता है।
विशेषता – वह बाल-सुलभ जिज्ञासा का प्रतीक है, जिसे बस नाच देखने और ‘उड़नजहाज़’ देखने की उत्सुकता है।
- जंगी की पुतोहू (बहू)
स्वभाव – मुँहज़ोर, आधुनिक और निडर। वह रेलवे स्टेशन के पास की रहने वाली है, इसलिए थोड़ी तेज़-तर्रार है।
भूमिका – वही बिरजू की माँ को ‘लाल पान की बेगम’ कहकर चिढ़ाती है। हालाँकि, बाद में वह बिरजू की माँ के साथ गाड़ी में बैठकर नाच देखने जाती है, जो ग्रामीण समाज में कड़वाहट के बाद होने वाले मिलन को दर्शाता है।
- मखनी फुआ
परिचय – गाँव की एक बुजुर्ग महिला (विधवा), जिसके आगे-पीछे कोई नहीं है।
स्वभाव – बातूनी और थोड़ी ईर्ष्यालु, लेकिन तंबाकू की शौकीन। वह गाँव की खबरों को इधर-उधर करने का काम करती है।
भूमिका – वह कहानी में ग्रामीण परिवेश के उस हिस्से को दर्शाती है जहाँ बुढ़ापे में व्यक्ति दूसरों के सहारे और बातचीत पर निर्भर होता है।
प्रतीकात्मकता
फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियों में प्रतीकात्मकता (Symbolism) बहुत गहरी होती है। ‘लाल पान की बेगम’ में प्रयुक्त प्रमुख प्रतीक और उनके अर्थ नीचे दिए गए हैं –
- लाल पान की बेगम (The Queen of Hearts)
यह कहानी का सबसे सशक्त प्रतीक है।
अर्थ – ताश के खेल में यह पत्ता सुंदर, मूल्यवान और सत्ता का प्रतीक माना जाता है।
महत्त्व – शुरुआत में यह ‘व्यंग्य’ का प्रतीक है, जिससे गाँव की औरतें बिरजू की माँ को चिढ़ाती हैं। लेकिन अंत में, यह उसके आत्मसम्मान, गौरव और उदारता का प्रतीक बन जाता है। वह केवल नाम की नहीं, बल्कि अपने विशाल हृदय के कारण भी ‘बेगम’ सिद्ध होती है।
- बैलगाड़ी (The Bullock Cart)
बैलगाड़ी यहाँ मात्र वाहन नहीं है।
अर्थ – यह आर्थिक उन्नति और वर्ग-परिवर्तन का प्रतीक है।
महत्त्व – बिरजू के परिवार का अपनी गाड़ी होना यह दर्शाता है कि वे अब ‘मज़दूर’ से ‘किसान’ (मालिक) बन गए हैं। यह ग्रामीण समाज में उनकी बढ़ती प्रतिष्ठा और ‘मर्यादा’ का प्रतीक है। गाड़ी का पहिया उनके जीवन के बदलते भाग्य का भी संकेत देता है।
- नया धान और पँचसीस (The New Harvest)
बिरजू के बापू द्वारा खेत से लाई गई धान की बालियाँ।
अर्थ – यह मेहनत के फल और खुशहाली का प्रतीक है।
महत्त्व – धान का ‘धानी रंग’ बिरजू की माँ के गुस्से को शांत कर देता है। यह मिट्टी से जुड़ाव और जीवन की सार्थकता का प्रतीक है। ‘नवान्न’ (नया अन्न) का जुठा होना बच्चों की मासूमियत और जीवन के नए आरंभ को दर्शाता है।
- शकरकंद और गुड़ (Sweet Potato and Jaggery)
कहानी में इनका बार-बार उल्लेख होता है।
अर्थ – ये ग्रामीण अभाव और छोटी खुशियों के प्रतीक हैं।
महत्त्व – बिरजू जैसे बच्चों के लिए ये किसी शाही दावत से कम नहीं हैं। ये वस्तुएँ दर्शाती हैं कि एक साधारण ग्रामीण परिवार की खुशियाँ बहुत बड़ी चीज़ों में नहीं, बल्कि इन्हीं छोटी और सुलभ चीज़ों में बसी होती हैं।
- बिजली की बत्ती और नाकवाले जूते (Flashlight and Leather Shoes)
सर्वे कैंप के दौरान फैली अफवाहें।
अर्थ – ये शहरी सभ्यता और बाहरी हस्तक्षेप के प्रतीक हैं।
महत्त्व – गाँव के लोग जब किसी की प्रगति को नहीं समझ पाते, तो वे उसे बाहरी या अनैतिक प्रभाव (जैसे हाकिम का आना) से जोड़ देते हैं। यह समाज की संकीर्ण मानसिकता और ‘कैरक्टर एसेसिनेशन’ का प्रतीक है।
- मलेटरी टोपी (The Military Cap)
बिरजू का कड़ाही को सिर पर ओढ़ना।
अर्थ – यह सुरक्षा और बाल-कल्पना का प्रतीक है।
महत्त्व – यह दिखाता है कि बच्चे बड़ों के तनावपूर्ण माहौल में भी अपनी कल्पना की दुनिया बना लेते हैं। कड़ाही को ‘मलेटरी टोपी’ कहना उनके भीतर के निडर और साहसी मन को दर्शाता है।
‘लाल पान की बेगम’ – सार
फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘लाल पान की बेगम’ ग्रामीण जीवन के मनोविज्ञान, आपसी रिश्तों की खटास और अंततः मानवीय संवेदनाओं की मिठास को दर्शाती है।
- नाच देखने की उत्सुकता और तनाव
कहानी की शुरुआत बिरजू की माँ के गुस्से और चिड़चिड़ेपन से होती है। बलरामपुर में नाच (थिएटर) होने वाला है और बिरजू के पिता ने वादा किया था कि वे इस बार अपनी बैलगाड़ी से पूरे परिवार को नाच दिखाने ले जाएँगे। शाम ढल चुकी है, गाँव के अन्य लोग पैदल या अपनी गाड़ियों से निकल चुके हैं, लेकिन बिरजू के पिता अब तक गाड़ी लेकर घर नहीं लौटे हैं।
- पड़ोसियों से तनातनी
बिरजू की माँ अपनी समृद्धि जैसे हाल ही में खरीदी गई ज़मीन और बैल को लेकर गर्व महसूस करती है, जिससे गाँव की अन्य औरतें उससे जलती हैं। जंगी की पुतोहू (बहू) उसे चिढ़ाने के लिए ‘लाल पान की बेगम’ कहती है। मखनी फुआ और अन्य महिलाओं के साथ बिरजू की माँ की तीखी नोकझोंक होती है। वह अपना सारा गुस्सा अपने बच्चों, चंपिया और बिरजू पर निकालती है।
- आर्थिक स्वावलंबन का गर्व
रेणु जी ने दिखाया है कि कैसे बिरजू के पिता ने कड़ी मेहनत और संघर्ष से ज़मीन हासिल की है। बिरजू की माँ को इस बात का गर्व है कि वे अब मज़दूर नहीं, बल्कि किसान हैं। वह मन ही मन अपनी नई साड़ी, मँगटिक्का और अपनी गाड़ी पर चढ़कर जाने के वैभव का सपना बुनती है, लेकिन गाड़ी न आने पर उसका यह सपना टूटता हुआ-सा लगता है।
- बापू का आगमन और खुशियों की वापसी
रात गहराने पर जब उम्मीद लगभग खत्म हो जाती है, तभी बिरजू के बापू गाड़ी लेकर पहुँचते हैं। वे देर इसलिए हुए क्योंकि वे अपने खेत से नए धान की बालियाँ अर्थात् पँचसीस तोड़कर लाए थे। धान की खुशबू और पति का प्रेम देखकर बिरजू की माँ का सारा गुस्सा काफूर हो जाता है। घर में उत्सव का माहौल हो जाता है, मीठी रोटियाँ बनती हैं और सब तैयार होने लगते हैं।
- उदारता और मेल-मिलाप (चरमोत्कर्ष)
कहानी का सबसे सुंदर मोड़ अंत में आता है। जब बिरजू की माँ अपनी बैलगाड़ी पर शान से बैठती है, तो उसका मन उदार हो जाता है। वह अपना पिछला सारा मनमुटाव भूल जाती है। वह देखती है कि जंगी की पुतोहू, लरेना की बहू और अन्य औरतें जो उसे चिढ़ा रही थीं, वे किसी कारणवश नाच देखने नहीं जा पाई हैं। वह आवाज़ देकर उन सबको अपनी गाड़ी में बिठा लेती है।
- निष्कर्ष – असली ‘लाल पान की बेगम’
गाड़ी में बैठकर जाते समय सब मिलकर गीत गाते हैं। बिरजू की माँ को अब ‘लाल पान की बेगम’ कहलाने में बुरा नहीं लगता, बल्कि वह गर्व महसूस करती है। वह समझ जाती है कि असली खुशी अकेले में नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने में है।
कहानी का संदेश
मानवीय संवेदना – ग्रामीण समाज में झगड़े अस्थायी होते हैं, मुसीबत या खुशी के समय सब एक हो जाते हैं।
स्त्री मनोविज्ञान – कहानी एक स्त्री के मान-सम्मान, उसकी छोटी-छोटी इच्छाओं और उसके ममतामयी स्वभाव को बखूबी उकेरती है।
परिवर्तन – यह कहानी बदलते ग्रामीण परिवेश और निम्न वर्ग के उभरते आर्थिक स्तर की भी झाँकी है।
‘लाल पान की बेगम’ का केंद्रबिंदु
फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘लाल पान की बेगम’ का केंद्रबिंदु केवल एक नाच देखने की घटना नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में कई गहरे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलू हैं।
- स्त्री का आत्म-सम्मान और गौरव
कहानी का मुख्य केंद्रबिंदु बिरजू की माँ का व्यक्तित्व है। वह एक ऐसी ग्रामीण महिला है जो अपनी मेहनत से अर्जित समृद्धि जैसे कि अपनी ज़मीन, नए बैल और अच्छी फ़सल के कारण स्वयं को गौरवान्वित महसूस करती है। वह समाज में दबकर नहीं, बल्कि सिर उठाकर जीना चाहती है। उसका ‘लाल पान की बेगम’ की तरह सज-धज कर बैलगाड़ी पर बैठना, उसकी इसी आर्थिक और मानसिक स्वतंत्रता का प्रतीक है।
- ग्रामीण समाज का बदलता ढाँचा
कहानी उस समय को दर्शाती है जब निम्न वर्ग के किसान (जैसे बिरजू के बापू) मेहनत करके ज़मीन हासिल कर रहे थे। यह बदलाव गाँव के पुराने रईसों या ईर्ष्यालु पड़ोसियों को चुभता है। कहानी का केंद्रबिंदु इस सामाजिक बदलाव और उससे उत्पन्न होने वाली ईर्ष्या व संघर्ष को बखूबी दिखाता है।
- मानवीय संबंधों की सहजता और उदारता
कहानी का सबसे मार्मिक केंद्रबिंदु है—मनुष्य का भीतर से कोमल होना। शुरुआत में जो बिरजू की माँ कड़वी बातें करती है और पड़ोसियों से लड़ती है, वही अंत में उदार बनकर उन्हीं विरोधियों को अपनी गाड़ी में बिठा लेती है। यह दिखाता है कि ग्रामीण जीवन में मनमुटाव ऊपरी होता है, लेकिन भीतर संवेदना और भाईचारा ज़िंदा रहता है।
- छोटी-छोटी खुशियों का मनोविज्ञान
रेणु जी ने दिखाया है कि एक साधारण ग्रामीण परिवार के लिए बैलगाड़ी पर चढ़कर नाच देखने जाना कितनी बड़ी घटना है। कहानी का केंद्रबिंदु साधारण मनुष्य की छोटी-छोटी आकांक्षाओं, उनकी व्याकुलता और उनकी पूर्णता पर टिका है। एक मीठी रोटी, एक नई साड़ी और अपनी गाड़ी का सुख—यही उनके जीवन के सबसे बड़े उत्सव हैं।
- आंचलिकता और परिवेश
कहानी का केंद्र उस मिट्टी की सोंधी गंध, खेतों की हरियाली और लोक-संस्कृति में बसा है। धान के पौधों की गंध, बैलगाड़ी के पहियों की चूँ-चूँ और ‘बाजे न मुरलिया’ जैसे लोकगीत इस कहानी की आत्मा हैं।
‘लाल पान की बेगम’ का मनोवैज्ञानिक पक्ष
फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे पात्रों के बाहरी क्रियाकलापों से कहीं ज्यादा उनके भीतर के उतार-चढ़ाव को चित्रित करते हैं। ‘लाल पान की बेगम’ का मनोवैज्ञानिक पक्ष बहुत गहरा और सूक्ष्म है, जिसे हम निम्नलिखित बिंदुओं में समझ सकते हैं –
- अभाव से उपजा ‘अहम’ और गौरव
बिरजू की माँ का चरित्र मनोवैज्ञानिक रूप से बहुत जटिल है। लंबे समय तक अभाव और मज़दूरी में रहने के बाद जब उसके पास अपनी ज़मीन और बैल आते हैं, तो उसके भीतर एक प्रकार का रक्षात्मक गर्व (Defensive Pride) पैदा हो जाता है। वह बात-बात पर चिढ़ती है क्योंकि वह यह साबित करना चाहती है कि अब वह किसी से कम नहीं है। उसका ‘लाल पान की बेगम’ की तरह व्यवहार करना उसके इसी नए आर्थिक आत्मविश्वास का परिणाम है।
- दमित इच्छाओं का विस्फोट (Psychology of Frustration)
कहानी के शुरुआती हिस्से में बिरजू की माँ का बच्चों पर चिल्लाना, बागड़ बकरे को मारने दौड़ना और मखनी फुआ को जली-कटी सुनाना उसके कुंठित मन (Frustrated Mind) का परिचायक है। उसकी नाच देखने जाने की इच्छा में बाधा पड़ते ही उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। यह मनोविज्ञान का सामान्य सिद्धांत है कि जब व्यक्ति अपनी मुख्य समस्या (गाड़ी न आना) का समाधान नहीं कर पाता, तो वह अपना गुस्सा कमज़ोरों (बच्चों और जानवर) पर निकालता है।
- ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा (Peer Jealousy)
गाँव की अन्य महिलाओं, जैसे – जंगी की पुतोहू का व्यवहार ग्रामीण ईर्ष्या के मनोविज्ञान को दर्शाता है। जब कोई अपने समूह से आगे निकल जाता है, तो समूह के अन्य सदस्य उसे ‘ताना’ मारकर नीचे खींचने की कोशिश करते हैं। ‘लाल पान की बेगम’ नाम देना इसी ईर्ष्या का मनोवैज्ञानिक हथियार है, जिसका उद्देश्य बिरजू की माँ को यह अहसास दिलाना है कि वह अपनी औकात से ज्यादा दिखावा कर रही है।
- पुरुष और स्त्री मनोविज्ञान का द्वंद्व
स्त्री पक्ष – बिरजू की माँ के लिए नाच देखने जाना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक ‘सोशल स्टेटमेंट’ अर्थात् सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय है। वह चाहती है कि पूरा गाँव उसे अपनी गाड़ी में जाते हुए देखे।
पुरुष पक्ष – बिरजू के बापू का मनोविज्ञान सीधा है। उनके लिए काम और खेत की फसल पहली प्राथमिकता है। वे देर से आते हैं क्योंकि वे खेत में फसल देखने चले गए थे। उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि उनकी इस देरी का उनकी पत्नी के मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक प्रतिष्ठा पर क्या असर पड़ रहा होगा।
- हृदय परिवर्तन और उदात्तीकरण
कहानी का अंत मनोवैज्ञानिक शुद्धीकरण (Catharsis) है। जैसे ही पति गाड़ी लेकर आता है और प्रेम से बात करता है, बिरजू की माँ का सारा नकारात्मक आवेग खत्म हो जाता है। वह ‘अहम’ (Ego) से ऊपर उठकर ‘परहित’ (Altruism) की स्थिति में पहुँच जाती है। वह अपने उन विरोधियों को भी साथ ले लेती है जिन्होंने उसे चिढ़ाया था। यह दर्शाता है कि मानवीय मन मूलतः उदार होता है, बस परिस्थितियाँ उसे कठोर बना देती हैं।
- बाल मनोविज्ञान (Child Psychology)
रेणु जी ने बिरजू और चंपिया के माध्यम से बाल मन का सटीक चित्रण किया है –
- बिरजू का थप्पड़ खाकर भी गुड़ और शकरकंद के लिए ललचाना।
- गाली सुनकर भी मन-ही-मन कल्पनाओं में खोए रहना।
- माँ के गुस्से को भाँपकर चुपचाप दुबक जाना और मौका मिलते ही शरारत करना।
यह दिखाता है कि बच्चों का संसार बड़ों के ईर्ष्या-द्वेष से मुक्त और केवल वर्तमान की खुशियों पर केंद्रित होता है।
निष्कर्ष –
कहानी का मनोवैज्ञानिक पक्ष यह संदेश देता है कि मनुष्य का व्यवहार उसकी आर्थिक स्थिति और सामाजिक सुरक्षा से सीधा जुड़ा होता है। बिरजू की माँ का कड़वापन उसकी असुरक्षा थी और उसकी उदारता उसकी संपन्नता का प्रमाण है।
‘लाल पान की बेगम’ शीर्षक की सार्थकता
फणीश्वरनाथ रेणु की इस प्रसिद्ध कहानी का शीर्षक ‘लाल पान की बेगम’ अत्यंत प्रतीकात्मक, व्यंग्यात्मक और सार्थक है। बिरजू की माँ को लाल पान अर्थात् बीड़ी पीने की आदत के कारण यह नाम दिया गया है। इस तथ्य के अतिरिक्त इस शीर्षक की सार्थकता को हम निम्नलिखित आधारों पर परख सकते हैं –
- ताश के पत्ते का प्रतीक
ताश के खेल में ‘लाल पान की बेगम’ एक महत्त्वपूर्ण और सुंदर पत्ता माना जाता है। कहानी में बिरजू की माँ का रूप-रंग और उसका दबदबा कुछ ऐसा ही है। वह अपने टोले की सबसे संपन्न और प्रभावशाली महिला बनकर उभरती है। जिस तरह खेल में यह पत्ता अपनी एक विशेष सत्ता रखता है, वैसे ही बिरजू की माँ भी गाँव के सामाजिक परिवेश में अपना एक विशिष्ट स्थान बना चुकी है।
- मान-सम्मान और स्वाभिमान का प्रतीक
गाँव की औरतें, विशेषकर जंगी की पुतोहू, बिरजू की माँ को चिढ़ाने के लिए उसे ‘लाल पान की बेगम’ कहती हैं। उनके लिए यह एक व्यंग्य (Sarcasm) है कि देखो, ज़रा सी ज़मीन क्या हो गई, यह तो अपने आप को बेगम समझने लगी है। लेकिन बिरजू की माँ के लिए यह उसके स्वाभिमान का प्रतीक बन जाता है। वह इस नाम को एक चुनौती की तरह स्वीकार करती है और अंत में सचमुच एक बेगम की तरह उदारता दिखाकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर देती है।
- व्यक्तित्व का चित्रण
बिरजू की माँ का स्वभाव ‘बेगम’ जैसा ही है—
मिज़ाज – वह थोड़ी तुनकमिज़ाज है, आदेश देना जानती है और अपनी बात मनवाने का दम रखती है।
सज्जा – कहानी के अंत में जब वह रूपा का मँगटिक्का और नई साड़ी पहनकर गाड़ी पर बैठती है, तो वह शारीरिक रूप से भी उस शीर्षक को चरितार्थ करती है।
- ईर्ष्या और सामाजिक बदलाव
यह शीर्षक उस सामाजिक परिवर्तन को भी दर्शाता है जहाँ एक साधारण मज़दूर परिवार मेहनत करके संपन्न बनता है। गाँव के लोग जब किसी की उन्नति सहन नहीं कर पाते, तो उसे ऐसे ही नाम देते हैं। ‘लाल पान की बेगम’ शीर्षक उस ईर्ष्या को भी समेटे हुए है जो गाँव की अन्य महिलाओं के मन में बिरजू की माँ के प्रति है।
- चरित्र का उदात्तीकरण
कहानी के अंत में जब बिरजू की माँ अपने विरोधियों और चिढ़ाने वाली औरतों को अपनी बैलगाड़ी में जगह देती है, तब वह शीर्षक व्यंग्य से बदलकर सम्मान में बदल जाता है। यहाँ वह केवल नाम की बेगम नहीं रहती, बल्कि अपने ‘बड़े दिल’ के कारण सचमुच की बेगम बन जाती है। वह सबको साथ लेकर चलती है, जो एक बेगम या रानी का वास्तविक गुण है।
शब्दार्थ
समूह 1 – ग्रामीण वस्तुएँ और परिवेश
क्र.सं. | शब्द | हिंदी अर्थ | अंग्रेज़ी अर्थ |
1 | पगहिया | पशु को बाँधने वाली रस्सी | Tethering rope |
2 | मढ़ैया | फूस की झोंपड़ी | Thatched hut |
3 | ओसारा | घर के आगे का बरामदा | Verandah / Porch |
4 | ढिबरी | मिट्टी के तेल का छोटा दीया | Small oil lamp |
5 | कथरी | पुराने कपड़ों से बनी गुदड़ी | Quilt made of rags |
6 | टट्टी | बाँस की फट्टियों का पर्दा | Bamboo screen/fence |
7 | घैलसार | जहाँ पानी के घड़े रखे जाते हैं | Place for water pots |
8 | ताखा | दीवार में बना आला/शेल्फ | Niche in a wall / Shelf |
9 | कड़ाही | खाना पकाने का गहरा बर्तन | Cauldrons / Wok |
10 | खपच्ची | बाँस की पतली पट्टी | Bamboo slat |
11 | अँगीठी | कोयले या लकड़ी का चूल्हा | Brazier |
12 | सूप | अनाज साफ करने का उपकरण | Winnowing basket |
13 | मँगनी | उधार माँगकर लाया हुआ | Borrowed |
14 | बैलगाड़ी | सांडों द्वारा खींची जाने वाली गाड़ी | Bullock cart |
15 | लीक | गाड़ी के पहियों का रास्ता | Rut / Cart track |
16 | बाँस की झाड़ी | बाँस का झुंड | Bamboo grove |
17 | पिछवाड़ा | घर के पीछे का हिस्सा | Backyard |
18 | खलिहान | फसल काटने के बाद रखने का स्थान | Threshing floor |
19 | गठरी | कपड़ों का बंडल | Bundle |
20 | सरकारी कूप | सरकारी कुआँ | Government well |
समूह 2 – कृषि और पशुपालन
क्र.सं. | शब्द | हिंदी अर्थ | अंग्रेज़ी अर्थ |
21 | पाट | जूट या पटसन | Jute |
22 | अगहनी | नवंबर-दिसंबर की फसल | Winter crop |
23 | पँचसीस | धान की पाँच बालियों का गुच्छा | Bunch of five grain ears |
24 | नवान्न | नए अनाज का उपभोग | New harvest ritual |
25 | बागड़ | बकरा | He-goat |
26 | कुकुरमाछी | पशुओं को तंग करने वाली मक्खी | Cattle fly |
27 | झुमुकी | बैलों के गले का आभूषण | Jingle bells for cattle |
28 | जोड़ा बैल | दो बैलों की जोड़ी | Pair of oxen |
29 | धान की बालियाँ | धान का ऊपरी हिस्सा | Ears of paddy |
30 | गाछ | पेड़ या पौधा | Tree / Plant |
31 | बीघा | ज़मीन की एक नाप | Bigha (unit of land) |
32 | धनहर | उपजाऊ धान का खेत | Paddy land |
33 | परचा/पर्चा | ज़मीन का कानूनी कागज़ | Land title document |
34 | खेत की मेड़ | खेत की सीमा | Field boundary |
35 | मजूरी | मज़दूरी | Manual labour / Wages |
36 | जोतता | हल चलाना / गाड़ी जोड़ना | To yoke / plow |
37 | सोनाबंग | उत्तम प्रकार का जूट | High quality jute |
38 | पँचकौड़ी | एक नाम / मामूली कीमत | Pertaining to five shells |
39 | कसाई | पशु काटने वाला | Butcher |
40 | दाना-घास | पशुओं का आहार | Fodder / Feed |
समूह 3 – मानवीय भाव और स्वभाव
क्र.सं. | शब्द | हिंदी अर्थ | अंग्रेज़ी अर्थ |
41 | कुढ़ना | ईर्ष्या या दुख से जलना | To fret / be vexed |
42 | ग़ुस्सा | क्रोध | Anger |
43 | मुँहज़ोर | बहुत अधिक बोलने वाला/ढीठ | Impudent / Insolent |
44 | हथछुट्टा | मारपीट करने वाला | Prone to hitting |
45 | जलन-ढाही | दूसरों से जलने वाली | Envious / Jealous |
46 | मान-मनौती | भगवान से मन्नत माँगना | Making vows |
47 | मनसूबा | इरादा या योजना | Intention / Plan |
48 | बड़बड़ाना | धीरे-धीरे गुस्से में बोलना | To mutter / grumble |
49 | ललचाई | लालच भरी | Longing / Greedy |
50 | सतर्क | सावधान | Alert / Vigilant |
51 | हड़बड़ाना | घबरा जाना | To be flustered |
52 | मसोस कर रह जाना | इच्छा दबा लेना | To suppress one’s feelings |
53 | उतावली | जल्दबाज़ी | Impatience / Haste |
54 | खिलखिलाहट | हँसने की आवाज़ | Giggles / Laughter |
55 | भय | डर | Fear |
56 | उत्साह | जोश | Enthusiasm |
57 | व्याकुलता | बेचैनी | Restlessness |
58 | अभिमान | गर्व | Pride / Ego |
59 | कोमल | मुलायम/नाजुक | Tender / Soft |
60 | निर्दयी | जिसमें दया न हो | Merciless |
समूह 4 – स्थानीय अपशब्द और विशेषण
क्र.सं. | शब्द | हिंदी अर्थ | अंग्रेज़ी अर्थ |
61 | हरजाई | आवारा या दुष्ट | Wayward / Wicked |
62 | बेचाल | जिसका व्यवहार बुरा हो | Ill-behaved |
63 | बेलज्जी | जिसे शर्म न हो | Shameless |
64 | राकस | राक्षस | Demon / Monster |
65 | गोबरगणेश | बुद्धू या मूर्ख | Simpleton / Blockhead |
66 | दाढ़ी-जार | एक ग्रामीण गाली | An abusive term |
67 | पुतखौकी | गाली (बेटे को खाने वाली) | Abusive term (son-eater) |
68 | भाईखौकी | भाइयों से जलने वाली | Jealous of kinsmen |
69 | मुँह झोंकना | आग में डालना (गुस्से में) | To thrust into fire |
70 | चुड़ैल | प्रेतनी (गाली के रूप में) | Witch |
71 | मटक कर | इतरा कर चलना | To swagger / strut |
72 | पोपले मुँह | बिना दाँत वाला मुँह | Toothless mouth |
73 | कर्कश | कड़वी (आवाज़) | Harsh / Grating |
74 | नुकीली बात | चुभने वाली बात | Sharp/Piercing remark |
75 | झबरा | घने बालों वाला | Shaggy / Bushy |
76 | दाग़ी चोर | पुराना अपराधी | Habitual thief |
77 | नामचीन | प्रसिद्ध (अक्सर बुरे अर्थ में) | Notorious / Famous |
78 | अजीब | विचित्र | Strange / Weird |
79 | भोला | सीधा-सादा | Innocent / Naive |
80 | तीखा | तेज़ / कड़वा | Pungent / Sharp |
समूह 5 – भोजन और माप
क्र.सं. | शब्द | हिंदी अर्थ | अंग्रेज़ी अर्थ |
81 | शकरकंद | मीठा आलू | Sweet potato |
82 | छोवा-गुड़ | तरल गुड़/सीरा | Molasses / Liquid jaggery |
83 | मीठी रोटी | गुड़ वाली रोटी | Sweet bread |
84 | कलेवा | सुबह का नाश्ता | Breakfast |
85 | कनवाँ | एक माप (लगभग 50 ग्राम) | A small measure of weight |
86 | मन (चार मन) | वजन की एक इकाई | Maund (approx. 40kg) |
87 | रत्ती-भर | बहुत थोड़ा | A tiny bit |
88 | सूप | एक बर्तन/माप | Winnowing basket (measure) |
89 | भंटा | बैंगन | Eggplant / Brinjal |
90 | जलपान | नाश्ता | Refreshments |
91 | ढिबरी | रोशनी का साधन | Lamp |
92 | सहुआइन का सौदा | परचून का सामान | Grocery items |
93 | उबालना | गरम पानी में पकाना | To boil |
94 | छिलका उतारना | छीलना | To peel |
95 | दाँतों तले दबाना | चबाना | To chew / press with teeth |
96 | मसलना | हाथों से दबाना | To mash |
97 | अनाज | अन्न | Grain |
98 | तंबाकू | खैनी | Tobacco |
99 | हुक्का | धूम्रपान का यंत्र | Hookah / Water pipe |
100 | भुरता | मैश की हुई सब्जी | Mashed dish |
समूह 6 – क्रियाएँ और गतिविधियाँ
क्र.सं. | शब्द | हिंदी अर्थ | अंग्रेज़ी अर्थ |
101 | लोट-पोट करना | ज़मीन पर लेटना | To roll on the ground |
102 | मँडराना | चक्कर लगाना | To hover |
103 | दीया-बाती | शाम का समय | Twilight / Evening prayer time |
104 | कूद-फाँद | उछल-कूद | Romping / Jumping |
105 | ठिठकना | अचानक रुक जाना | To stop short |
106 | इंसाफ़ करना | न्याय करना | To judge / give justice |
107 | टोकना | बीच में बोलना | To interrupt |
108 | धँस जाना | अंदर चले जाना | To penetrate / sink in |
109 | झिड़कना | डाँटना | To snub / rebuke |
110 | पुचकारना | प्यार से बुलाना | To coax / caress |
111 | खुशामद करना | चापलूसी करना | To flatter |
112 | करवट लेना | बगल बदलना | To toss and turn |
113 | झाँकना | चोरी से देखना | To peep |
114 | बुझाना | आग शांत करना | To extinguish |
115 | निहारना | गौर से देखना | To gaze / stare |
116 | ललकारना | चुनौती देना | To challenge / shout out |
117 | गुनगुनाना | धीरे से गाना | To hum |
118 | तौलना | वजन करना | To weigh |
119 | मरोड़ना | ऐंठना | To twist |
120 | झोंकना | फेंक देना | To thrust / fling |
समूह 7 – वस्त्र और आभूषण
क्र.सं. | शब्द | हिंदी अर्थ | अंग्रेज़ी अर्थ |
121 | मँगटिक्का | माथे का जेवर | Forehead ornament |
122 | छीट की साड़ी | प्रिंटेड साड़ी | Printed saree |
123 | फूलछाप किनारी | फूलों के डिजाइन वाला बॉर्डर | Floral border |
124 | गौने की साड़ी | विदाई के समय की साड़ी | Wedding/Consummation saree |
125 | मलेटरी टोपी | सैनिक टोपी | Military cap |
126 | झुमुकी-कड़ा | कान और हाथ का गहना | Earrings & Bracelet |
127 | पटसन की डोरी | जूट की रस्सी | Jute string |
128 | किनारी | बॉर्डर | Border / Lace |
129 | असली रूपा | शुद्ध चाँदी | Pure silver |
130 | बटन का अभाव | बटन की कमी | Lack of buttons |
131 | रंगीन | रंगों वाली | Colorful |
132 | मैली | गंदी | Dirty / Soiled |
133 | दुशाला | कीमती ऊनी चादर | Expensive shawl |
134 | कथरी | गुदड़ी | Rag-quilt |
135 | साड़ी पहनना | परिधान पहनना | To drape a saree |
136 | सजना | तैयार होना | To dress up |
137 | लठवा-सिंदूर | एक विशेष सिंदूर | A type of vermillion |
138 | अंगिया | चोली | Bodice |
139 | ढकना | कवर करना | To cover |
140 | मखमल | कोमल कपड़ा | Velvet |
समूह 8 – सामाजिक और आंचलिक शब्द
क्र.सं. | शब्द | हिंदी अर्थ | अंग्रेज़ी अर्थ |
141 | बैसकोप | बायोस्कोप/सिनेमा | Bioscope / Cinema |
142 | टीशन | स्टेशन | Station |
143 | पतुरिया | नाचने वाली/वेश्या | Dancing girl (derogatory) |
144 | कुर्मा टोली | एक विशेष जाति का मोहल्ला | Kurmi community block |
145 | हाकिम | अफसर | Officer / Ruler |
146 | बासा | रहने का स्थान / डेरा | Lodging / Camp |
147 | सरबे (सर्वे) | भूमि पैमाइश | Land survey |
148 | सित्तलर्मिटी | सेटलमेंट (ज़मीन का) | Land settlement |
149 | नाच | लोक नाटक/थिएटर | Folk theater / Dance |
150 | नवान्न | नया भोजन उत्सव | Harvest festival meal |
151 | पगहिया | नियंत्रण (रस्सी) | Control / Tether |
152 | मियाँजान | एक मुस्लिम संबोधन | A respectful Muslim title |
153 | भोंपू | हॉर्न | Horn / Trumpet |
154 | खलिहान | फसल क्षेत्र | Threshing yard |
155 | बिरादरी | समुदाय | Community / Brotherhood |
156 | टोला | मोहल्ला | Hamlet / Quarter |
157 | चौपाल | बैठने की जगह | Village assembly place |
158 | रैया | प्रजा / ग्रामीण | Subjects / Villagers |
159 | मूर्ख | बेवकूफ | Foolish |
160 | नमरी लोट | करेंसी नोट | Currency note |
समूह 9 – विविध
क्र.सं. | शब्द | हिंदी अर्थ | अंग्रेज़ी अर्थ |
161 | भक्-भक् | चमक के साथ | Flashingly |
162 | धुआँ | स्मोक | Smoke |
163 | दीया-बाती | साँझ | Twilight |
164 | पैर फेंकना | लात मारना | To kick |
165 | हौले-हौले | धीरे-धीरे | Slowly / Softly |
166 | फिसफिसाना | फुसफुसाना | To whisper |
167 | मुरलिया | बाँसुरी | Flute |
168 | झुँझलाहट | चिढ़ | Irritation |
169 | कलेजा काँपना | डरना | To tremble with fear |
170 | अफीम की गोली | नशा | Opium pill |
171 | भद्दी गाली | गंदा शब्द | Filthy abuse |
172 | खुली हवा | ताजी हवा | Fresh air |
173 | चाँदनी रात | पूर्णिमा की रात | Moonlit night |
174 | खसखसाहट | सरसराहट | Rustling sound |
175 | उड़नजहाज़ | हवाई जहाज़ | Airplane |
176 | आसरा देखना | इंतज़ार करना | To wait for someone |
177 | गमकना | महकना | To be fragrant |
178 | अनोखा | निराला | Unique |
179 | कठिन | मुश्किल | Difficult |
180 | बेगम | रानी | Queen / Lady |
‘लाल पान की बेगम’ दीर्घ उत्तरीय प्रश्न और उत्तर
- बिरजू की माँ के चरित्र की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
बिरजू की माँ कहानी की केंद्रीय पात्र है। वह एक स्वाभिमानी, साहसी और थोड़ी तुनकमिज़ाज ग्रामीण महिला है। उसके व्यक्तित्व में एक प्रकार का गर्व है, जो उसके परिवार की आर्थिक उन्नति (अपनी ज़मीन और बैल) से उपजा है। वह समाज में दबकर रहने के बजाय अपनी पहचान बनाना चाहती है, इसलिए गाँव की औरतें उसे ‘लाल पान की बेगम’ कहती हैं। हालांकि वह बाहर से कठोर और गुस्सैल दिखती है, लेकिन भीतर से वह अत्यंत उदार और ममतामयी है। अंत में उसका अपनी ईर्ष्यालु पड़ोसिनों को भी गाड़ी में बैठा लेना उसके विशाल हृदय और मानवीय संवेदना को प्रकट करता है।
- कहानी में ‘बैलगाड़ी’ किस बात का प्रतीक है?
इस कहानी में बैलगाड़ी केवल परिवहन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतीक है। बिरजू के परिवार के लिए अपनी बैलगाड़ी होना एक बड़े सपने के सच होने जैसा है। यह उनके मज़दूर से किसान बनने की यात्रा को दर्शाता है। बिरजू की माँ के लिए गाड़ी पर चढ़कर नाच देखने जाना अपनी संपन्नता का सार्वजनिक प्रदर्शन है। गाँव के अन्य लोगों के लिए यह ईर्ष्या का कारण है। अंत में, यही गाड़ी आपसी मनमुटाव को मिटाने और सामाजिक समरसता का माध्यम बनती है, जब बिरजू की माँ सबको साथ लेकर चलती है।
- ‘लाल पान की बेगम’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
शीर्षक ‘लाल पान की बेगम’ अत्यंत व्यंग्यात्मक और सटीक है। ताश के खेल में यह पत्ता अपनी विशिष्टता के लिए जाना जाता है। गाँव की औरतें बिरजू की माँ के दबदबे और उसके सजीले व्यवहार के कारण उसे चिढ़ाने के लिए यह नाम देती हैं। शुरू में यह शीर्षक उसके ‘अहम’ और ईर्ष्या का प्रतीक लगता है, लेकिन कहानी के अंत में यह उसके गौरवपूर्ण व्यक्तित्व और उदारता को दर्शाता है। जब वह अपनी नई साड़ी और मँगटिक्का पहनकर शान से गाड़ी पर बैठती है और सबको साथ ले जाती है, तो वह वास्तव में बेगम की तरह व्यवहार करती है।
- जंगी की पुतोहू और बिरजू की माँ के बीच विवाद का क्या कारण था?
दोनों के बीच विवाद का मुख्य कारण सामाजिक ईर्ष्या और एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ है। जंगी की पुतोहू नई बहू है और शहर (स्टेशन) के पास की होने के कारण थोड़ी मुँहज़ोर है। वह बिरजू की माँ की आर्थिक उन्नति को सहन नहीं कर पाती और उसे ‘लाल पान की बेगम’ कहकर उसका मज़ाक उड़ाती है। वहीं बिरजू की माँ उसे ‘बाजे न मुरलिया’ गाने वाली और आवारा समझती है। यह विवाद ग्रामीण समाज में दो पीढ़ियों और दो अलग-अलग स्वभाव वाली महिलाओं के बीच के मानसिक संघर्ष और वर्चस्व की लड़ाई को दर्शाता है।
- कहानी के अंत में बिरजू की माँ का हृदय परिवर्तन कैसे होता है?
कहानी का अंत मानवीय उदारता का उत्कृष्ट उदाहरण है। पूरे दिन गुस्से में रहने और पड़ोसियों को बुरा-भला कहने वाली बिरजू की माँ, जैसे ही अपनी बैलगाड़ी पर बैठती है, उसका सारा तनाव दूर हो जाता है। अपनी सफलता और संपन्नता का सुख उसे दयालु बना देता है। जब वह देखती है कि जिन महिलाओं ने उसे चिढ़ाया था, वे नाच देखने नहीं जा सकी हैं, तो उसका गुस्सा ममता और सहानुभूति में बदल जाता है। वह अपना बड़प्पन दिखाते हुए सबको गाड़ी में आमंत्रित करती है, जो उसके मानसिक परिष्कार और सहृदयता को सिद्ध करता है।
- इस कहानी में ग्रामीण परिवेश और आंचलिकता का वर्णन कीजिए।
फणीश्वरनाथ रेणु आंचलिक कथाकार हैं और यह कहानी बिहार के ग्रामीण जीवन की जीवंत झाँकी प्रस्तुत करती है। इसमें खेतों की मेड़, जूट (पाट) की खेती, शकरकंद उबालना, गोबर की ढेरी और बैलगाड़ियों का घरघराना जैसे दृश्य परिवेश को वास्तविक बनाते हैं। पात्रों की भाषा में ‘टीशन’, ‘बैसकोप’ और ‘सित्तलर्मिटी’ जैसे शब्दों का प्रयोग आंचलिक रंग भरता है। लोकगीत ‘बाजे न मुरलिया’ और कार्तिक की चाँदनी रात का वर्णन ग्रामीण संस्कृति और लोक-जीवन की सोंधी महक पैदा करता है। यह परिवेश पात्रों के मनोविज्ञान को गढ़ने में मुख्य भूमिका निभाता है।
- बिरजू के बापू का चरित्र चित्रण कीजिए।
बिरजू के बापू एक सीधे-सादे, परिश्रमी और धैर्यवान किसान हैं। वे अपनी पत्नी (बिरजू की माँ) के तेज़ स्वभाव को जानते हैं और शांति बनाए रखने के लिए अक्सर चुप रहते हैं। वे एक आदर्श किसान हैं, जिनके लिए उनकी ज़मीन और फसल ही सर्वस्व है। वे नाच देखने के लिए गाड़ी का प्रबंध करने में दिन-रात एक कर देते हैं। उनके चरित्र में दिखावा नहीं है; वे अपने खेत के नए धान की बालियाँ लाकर अपनी खुशी व्यक्त करते हैं। वे एक स्नेही पिता और समर्पित पति हैं, जो परिवार की छोटी-छोटी खुशियों के लिए कड़ी मेहनत करते हैं।
- कहानी में बाल-मनोविज्ञान का चित्रण किस प्रकार किया गया है?
रेणु जी ने बिरजू और चंपिया के माध्यम से बच्चों की सहज मासूमियत और उनकी इच्छाओं का सुंदर चित्रण किया है। बिरजू सात साल का बच्चा है, जो माँ की डाँट और तमाचे खाकर भी शकरकंद और गुड़ के लोभ में सब भूल जाता है। उसकी पूरी दुनिया नाच देखने और ‘उड़नजहाज़’ की कल्पना के इर्द-गिर्द घूमती है। चंपिया अपनी माँ के गुस्से को समझते हुए भी भाई का साथ देती है। बच्चों का यह व्यवहार दिखाता है कि बड़ों के आपसी झगड़े और ईर्ष्या का उन पर कोई स्थाई प्रभाव नहीं पड़ता; वे केवल वर्तमान की खुशियों में जीना जानते हैं।
- ‘लाल पान की बेगम’ कहानी के माध्यम से समाज में बदलते आर्थिक संबंधों को समझाइए।
यह कहानी उस दौर को दिखाती है जब समाज में परंपरागत ज़मींदारी व्यवस्था कमजोर हो रही थी और मेहनतकश मज़दूर अपनी ज़मीन हासिल कर रहे थे। बिरजू के बापू का ज़मीन खरीदना और बैल लेना एक बड़े आर्थिक बदलाव का प्रतीक है। यह बदलाव गाँव के पुराने रईसों और ईर्ष्यालु पड़ोसियों को खटकता है। कहानी दिखाती है कि आर्थिक संपन्नता के साथ व्यक्ति का सामाजिक स्तर और व्यवहार भी बदलता है। बिरजू की माँ का आत्मसम्मान इसी आर्थिक स्वतंत्रता पर टिका है, जो उसे समाज में सिर उठाकर जीने की शक्ति प्रदान करती है।
- कहानी में लोकगीतों और संस्कृति की क्या भूमिका है?
कहानी में लोकगीत और संस्कृति ग्रामीण जीवन की आत्मा के रूप में मौजूद हैं। ‘बाजे न मुरलिया’ जैसे गीतों का उल्लेख न केवल पात्रों की पसंद को दर्शाता है, बल्कि ग्रामीण उत्सवों के प्रति उनके आकर्षण को भी प्रकट करता है। नाच (थिएटर) देखने जाने की परंपरा गाँव के सामूहिक मनोरंजन और सांस्कृतिक जुड़ाव का हिस्सा है। नवान्न (नए अनाज का भोग) और कार्तिक की पूर्णिमा की चाँदनी जैसे सांस्कृतिक संदर्भ कहानी में एक विशेष वातावरण तैयार करते हैं। ये तत्त्व कहानी को केवल एक घटना न बनाकर इसे लोक-जीवन का दस्तावेज़ बना देते हैं।
- बिरजू की माँ के गुस्से के पीछे क्या कारण थे?
बिरजू की माँ के गुस्से के पीछे कई कारण थे। पहला, उसके पति का समय पर बैलगाड़ी लेकर न आना, जिससे उसे लगा कि उसकी प्रतिष्ठा दाँव पर लगी है। दूसरा, गाँव की महिलाओं (खासकर जंगी की पुतोहू) द्वारा उसे चिढ़ाया जाना। उसे डर था कि अगर वह नाच देखने नहीं गई, तो पूरा गाँव उसका मज़ाक उड़ाएगा। तीसरा, बच्चों की शरारत और काम में देरी भी उसके चिड़चिड़ेपन को बढ़ा रही थी। उसका गुस्सा वास्तव में उसकी असुरक्षा और अपनी प्रतिष्ठा को बचाने की तड़प का परिणाम था, जो गाड़ी आते ही शांत हो गया।
- ‘लाल पान की बेगम’ कहानी हमें क्या संदेश देती है?
यह कहानी संदेश देती है कि आपसी मनमुटाव और ईर्ष्या अस्थायी होते हैं, जबकि मानवीय करुणा और सहयोग शाश्वत हैं। कहानी सिखाती है कि सच्ची सफलता और संपन्नता वह है जो दूसरों के साथ साझा की जाए। बिरजू की माँ का चरित्र यह बताता है कि स्वाभिमान होना अच्छी बात है, लेकिन उसे अहंकार नहीं बनना चाहिए। अंत में सबका साथ मिलकर नाच देखने जाना ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना और ग्रामीण एकता को दर्शाता है। यह कहानी अभावों में भी खुशियाँ ढूँढने और भेदभाव मिटाकर साथ चलने की प्रेरणा देती है।
‘लाल पान की बेगम’ के महत्त्वपूर्ण अंशों की सप्रसंग व्याख्या
- “क्यों बिरजू की माँ, नाच देखने नहीं जाएगी क्या?”
प्रसंग – कहानी के आरंभ में पड़ोसिन मखनी फुआ, बिरजू की माँ से यह प्रश्न पूछती है। बिरजू की माँ गाड़ी न आने के कारण पहले से ही कुढ़ रही है।
व्याख्या – यह अंश कहानी के मुख्य संघर्ष को प्रकट करता है। बिरजू की माँ के लिए नाच देखना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक सामाजिक प्रतिष्ठा है। फुआ का यह प्रश्न उसके घाव पर नमक छिड़कने जैसा है। वह अपनी संपन्नता का प्रदर्शन करना चाहती है, लेकिन गाड़ी में देरी उसे अपमानित महसूस करा रही है। यह ग्रामीण परिवेश में महिलाओं के बीच की सूक्ष्म ईर्ष्या और मान-सम्मान की भावना को चित्रित करता है।
- “बिरजू की माँ के आगे नाथ और पीछे पगहिया न हो तब न, फुआ!”
प्रसंग – जब फुआ नाच के बारे में पूछती है, तो बिरजू की माँ तंज कसते हुए अपनी स्वतंत्रता और मर्यादा की तुलना करती है।
व्याख्या – यहाँ ‘नाथ’ और ‘पगहिया’ का मुहावरेदार प्रयोग नियंत्रण और जिम्मेदारी को दर्शाता है। बिरजू की माँ यह जताना चाहती है कि वह एक गृहस्थ और जिम्मेदार महिला है, कोई आवारा नहीं। यह उसकी स्वाभिमानी प्रकृति का परिचायक है। वह अपनी स्थिति को लेकर गर्वित है और फुआ को यह अहसास कराती है कि उसकी व्यस्तता और गरिमा दूसरों से अलग और ऊँची है।
- “चलो दिदिया, चलो! इस मुहल्ले में लाल पान की बेगम बसती है!”
प्रसंग – जंगी की पुतोहू (बहू) बिरजू की माँ के गर्व पर चोट करते हुए उसे ‘लाल पान की बेगम’ का नाम देती है।
व्याख्या – यह शीर्षक की सार्थकता का बिंदु है। यहाँ यह नाम एक व्यंग्य (Sarcasm) के रूप में प्रयुक्त हुआ है। जंगी की बहू शहर के करीब की होने के कारण तेज़-तर्रार है। वह बिरजू की माँ की नई संपन्नता और उसके दबदबे का मज़ाक उड़ाती है। यह अंश ग्रामीण समाज में नई और पुरानी पीढ़ी के बीच के द्वंद्व और भाषाई कटाक्ष को बहुत प्रभावी ढंग से उजागर करता है।
- “भक्-भक् बिजली-बत्ती! तीन साल पहले सर्वे कैंप के बाद गाँव की जलन-ढाही औरतों ने एक कहानी गढ़ के फैलाई थी…”
प्रसंग – बिरजू की माँ बिजली की बत्ती वाली बात सुनकर पुरानी ईर्ष्या और आरोपों को याद करती है।
व्याख्या – यह अंश ग्रामीण समाज की संकीर्ण मानसिकता और ‘कैरक्टर एसेसिनेशन’ (चरित्र हनन) को दर्शाता है। जब बिरजू के परिवार ने ज़मीन हासिल की, तो गाँव के लोगों ने उनकी उन्नति को स्वीकार करने के बजाय उन पर झूठे लांछन लगाए। यह मनुष्य की उस प्रवृत्ति को दिखाता है जहाँ वह दूसरों की सफलता को बर्दाश्त नहीं कर पाता और उसे गलत तरीके से बदनाम करने की कोशिश करता है।
- “मैया, एक अँगुली गुड़ दे दे… दे ना मैया, एक रत्ती-भर!”
प्रसंग – बिरजू अपनी माँ के गुस्से के बीच गुड़ के लिए गिड़गिड़ाता है। माँ गुस्से में उसे झिड़क देती है।
व्याख्या – यह अंश बाल-मनोविज्ञान और ग्रामीण अभाव का मार्मिक चित्रण है। बिरजू को माँ के गुस्से से ज्यादा गुड़ की मिठास की चिंता है। यहाँ गुड़ और शकरकंद ग्रामीण जीवन की छोटी-छोटी खुशियों के प्रतीक हैं। माँ का गुस्सा उसके तनाव का परिणाम है, जो उसके बच्चों पर निकलता है। रेणु जी ने यहाँ बहुत सूक्ष्मता से दिखाया है कि बड़ों के मानसिक संघर्षों का बच्चों पर कैसा प्रभाव पड़ता है।
- “अरे, इन लोगों का सब कुछ माफ़ है। चिरई-चुरमुन हैं यह लोग!”
प्रसंग – जब बिरजू नवान्न (नए अन्न) के पहले ही नया धान चख लेता है, तो बिरजू के बापू उसे मासूमियत से बचाते हैं।
व्याख्या – यह अंश बिरजू के बापू के उदार और वात्सल्यपूर्ण (पिता का प्रेम) स्वभाव को दिखाता है। उनके लिए नियम-धर्म से ऊपर बच्चों की खुशी है। वे बच्चों की तुलना पक्षियों से करते हैं जो स्वतंत्र और निष्पाप होते हैं। यह ग्रामीण जीवन की सरलता और एक पिता के हृदय की कोमलता को दर्शाता है, जो अपनी मेहनत की फसल को सबसे पहले अपने बच्चों के मुँह में देखना चाहता है।
- “सब ठीक-ठाक करके तैयार रहें। मलदहिया टोली के मियाँजान की गाड़ी लाने जा रहा हूँ।”
प्रसंग – बिरजू के बापू का यह संदेश उनकी संघर्षशीलता को दिखाता है जब गाँव में कोई उन्हें गाड़ी नहीं देता।
व्याख्या – यह अंश ग्रामीण राजनीति और भाईचारे के अभाव को दर्शाता है। जब कोयरी टोला के लोग ईर्ष्या के कारण गाड़ी देने से मना कर देते हैं, तो बिरजू के बापू दूसरी टोली (मियाँजान) से मदद लेते हैं। यह दिखाता है कि मानवता और सहयोग किसी भी जाति या टोले से ऊपर है। यह उनके हार न मानने वाले जज्बे और परिवार की खुशी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का भी प्रमाण है।
- “आ जा! जो बाक़ी रह गई हैं, सब आ जाएँ जल्दी! जंगी की पुतोहू, लरेना की बीवी…”
प्रसंग – अंत में जब गाड़ी आ जाती है, तो बिरजू की माँ अपनी सारी कड़वाहट भूलकर उन औरतों को भी बुला लेती है जो उसे चिढ़ा रही थीं।
व्याख्या – यह कहानी का उदात्त अंत (Noble ending) है। बिरजू की माँ का चरित्र ईर्ष्या से ऊपर उठकर उदारता की ओर बढ़ता है। वह सचमुच ‘बेगम’ की तरह व्यवहार करती है। उसकी संपन्नता उसे अहंकारी बनाने के बजाय दयालु बना देती है। यह ग्रामीण संस्कृति की उस एकता को दर्शाता है जहाँ सामूहिक उत्सव के समय व्यक्तिगत झगड़े और रंजिशें भुला दी जाती हैं।

