Meri Rachnayen

उसका अंतर्मन

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उसके रूप-लावण्य पर मैं मोहित न हुआ,

मैं सम्मोहित हुआ उसके अंतस की पवित्रता से।

अंग-प्रत्यंगों में भले थी स्निग्धता की न्यूनता,

पर था प्राचुर्य आत्मीयता का उसके धवल चरित्र में।

भ्रातृ और पितृ सम सम्मान देने वाली उस शुचि में,

स्वयं को देखा मैंने— जैसे सवित्री में सत्यवान ने।

उससे पाणिग्रहण की अतीव अभिलाषा है मेरी,

ईश्वर! बस इतनी सी मनःकामना पूर्ण हो मेरी।

वंश-वृद्धि के पथ पर मैं जनक, वह जननी बने,

यौवन से जरावस्था की यात्रा हम संग करें।

कल-कवलित के क्रम में भी दोनों संग रहें।

पुनर्जन्म यदि सत्य कथा है तो भी यही मनाऊँ,

योनि मिले कोई भी लेकिन साथ तुम्हारा ही पाऊँ।

अविनाश रंजन गुप्ता

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