देख, मुझसे यह न कहना अब कि,
हम बस दोस्त बनकर रह सकते हैं।
मेरी आँखों के सामने
तू किसी और की हो जाए,
यह दर्द भला हम कैसे
सह सकते हैं?
क्या मेरी आँखों की नमी की वजह,
तू कभी समझ न पाएगी?
मेरी ज़िंदगी में जो तेरी कमी होगी,
क्या तू जान न पाएगी?
मेरी हसरतें जो सिर्फ तेरे लिए थीं,
उन्हें अब दफ़न करना ज़रूरी हो गया है।
एक हसीन मोड़ देकर इस दास्ताँ को,
यहीं ख़त्म करना ज़रूरी हो गया है।
किस्मत कभी हमें मिलाएगी,
तो हम भी नज़रें मिलाएँगे।
दोस्त बनकर मिलेंगे
सबकी नज़रों में भले ही,
पर तेरी नज़रों में
हम अधूरे आशिक़ ही कहलाएँगे।
मुस्कान ओढ़ लेंगे हम भी,
दर्द को दिल में छुपाकर,
तुम्हारी ख़ुशी की ख़ातिर
ख़ुद से हर रोज़ लड़कर।
तुम पूरी कहानी बन जाना,
हम अधूरा ख़्वाब ही रह जाएँगे।
अविनाश रंजन गुप्ता

