पाठ का सारांश
ठाकुर गोपालशरण सिंह द्वारा रचित कविता ‘सागर-लहरें’ प्रकृति के सुंदर और जीवंत रूप का वर्णन करती है। कवि ने लहरों का मानवीकरण (Personification) करते हुए उन्हें ‘जल-कन्याओं’ के रूप में चित्रित किया है।
प्रथम छंद (First Stanza)
सागर के उर पर नाच-नाच
करती हैं लहरें मधुर – गान!
जगती के मन को खींच-खींच,
निज छवि के रस से सींच-सींच,
जल-कन्याएँ भोली अजान,
सागर के उर पर नाच-नाच,
करती हैं लहरें मधुर गान!
व्याख्या: कवि कहते हैं कि सागर के हृदय पर लहरें निरंतर नाच रही हैं और उनके टकराने से उत्पन्न होने वाली आवाज़ ऐसी लगती है मानो वे मधुर गीत गा रही हों। ये लहरें संसार के मन को अपनी ओर खींचती हैं और अपनी सुंदरता के रस से सबको सराबोर कर देती हैं। कवि इन्हें भोली और नादान ‘जल-कन्याएँ’ कहते हैं जो सागर की छाती पर नृत्य कर रही हैं।
द्वितीय छंद (Second Stanza)
प्रातः समीर से हो अधीर,
छूकर पल-पल उल्लसित तीर,
कुसुमावलि-सी पुलकित महान,
सागर के उर पर नाच-नाच,
करती हैं लहरें मधुर गान!
व्याख्या: सुबह की ठंडी हवा के चलने पर ये लहरें व्याकुल अर्थात् अधीर होकर तेज़ी से उठने लगती हैं। वे बार-बार समुद्र के किनारे को छूकर अपनी खुशी प्रकट करती हैं। लहरों का समूह ऐसा प्रतीत होता है मानो फूलों की पंक्तियाँ खुशी से झूम रही हों।
तृतीय छंद (Third Stanza)
संध्या से पाकर रुचिर रंग,
करती-सी शत सुरचाप भंग,
हिलतीं नव तरु दल के समान,
सागर के उर पर नाच-नाच,
करती हैं लहरें मधुर गान।
व्याख्या: शाम के समय जब आकाश में रंग बदलते हैं, तो उन रंगों की परछाईं से लहरें भी सुंदर रंगों वाली हो जाती हैं। उनकी आभा देखकर ऐसा लगता है मानो वे सैकड़ों इंद्रधनुषों की चमक को भी मात दे रही हों। हवा के चलने पर ये लहरें नए वृक्षों के पत्तों की तरह हिलती और झूमती दिखाई देती हैं।
चतुर्थ छंद (Fourth Stanza)
करतलगत कर नभ की विभूति,
पाकर शशि से सुषमानुभूति,
तारावलि-सी मृदु दीप्तिमान,
सागर के उर पर नाच-नाच,
करती हैं लहरें मधुर गान।
व्याख्या: रात के समय ऐसा लगता है मानो लहरों ने आकाश की सारी संपत्ति अर्थात् चाँद-तारों की रोशनी को अपनी हथेलियों में समेट लिया है। चंद्रमा की किरणों से उन्हें अद्भुत सुंदरता प्राप्त होती है। लहरों पर तारों का प्रतिबिंब ऐसा लगता है जैसे वे स्वयं तारों की पंक्ति की तरह कोमल और चमकदार हो गई हों।
पंचम छंद (Fifth Stanza)
तन पर शोभित नीला दुकूल,
हैं छिपे हृदय में भाव-फूल,
आकर्षित करती हुई ध्यान,
सागर के उर पर नाच-नाच,
करती हैं लहरें मधुर गान।
व्याख्या: समुद्र का पानी नीला होने के कारण ऐसा लगता है कि लहरों ने अपने शरीर पर नीला रेशमी वस्त्र पहना हुआ है। उनके हृदय के भीतर भावनाओं के फूल छिपे हुए हैं। लहरों का यह आकर्षक रूप सहज ही सबका ध्यान अपनी ओर खींच लेता है।
छठा छंद (Sixth Stanza)
हैं कभी मुदित, हैं कभी खिन्न,
हैं कभी मिली, हैं कभी भिन्न,
एक सूत्र में बँधे प्राण,
सागर के उर पर नाच-नाच,
करती हैं लहरें मधुर गान।
व्याख्या: लहरें मानवीय स्वभाव की तरह हैं—वे कभी खुश (मुदित) होकर ऊपर उठती हैं, तो कभी उदास होकर शांत हो जाती हैं। वे कभी एक-दूसरे में मिल जाती हैं, तो कभी अलग-अलग दिखाई देती हैं। लेकिन इन सब विभिन्नताओं के बावजूद, वे सागर के साथ एक ही सूत्र अर्थात् प्राण में बँधी हुई हैं।
कठिन शब्दार्थ
1 – उर – हृदय / छाती – Chest / Heart
2 – जगती – संसार / दुनिया – The World
3 – निज – अपनी – One’s own
4 – छवि – सुंदरता / रूप – Beauty / Image
5 – अजान – अनभिज्ञ / नादान – Ignorant / Innocent
6 – अधीर – व्याकुल / बेचैन – Restless / Impatient
7 – उल्लसित – आनंदित / खुश – Joyful / Elated
8 – तीर – किनारा / तट – Shore / Bank
9 – पुलकित – रोमांचित / खुश – Thrilled / Delighted
10 – मुदित – प्रसन्न – Happy / Pleased
11 – खिन्न – दुखी / उदास – Sad / Distressed
12 – समीर – हवा / पवन – Breeze / Wind
13 – कुसुमावलि – फूलों की पंक्ति – Row of flowers
14 – रुचिर – सुंदर / मनमोहक – Pleasing / Beautiful
15 – सुरचाप – इंद्रधनुष – Rainbow
16 – तरु-दल – वृक्षों के पत्ते / समूह – Group of trees / Leaves
17 – नभ – आकाश – Sky
18 – विभूति – ऐश्वर्य / संपत्ति – Glory / Wealth
19 – शशि – चंद्रमा – Moon
20 – तारावलि – तारों का समूह – Galaxy of stars / Row of stars
21 – दीप्तिमान – प्रकाशमान / चमकता हुआ – Radiant / Luminous
22 – सींच-सींच – भिगोना / तृप्त करना – To drench / To irrigate
23 – करतलगत – हथेली में आया हुआ – In hand / Under possession
24 – सुषमानुभूति – सुंदरता का अनुभव – Feeling of beauty
25 – मृदु – कोमल – Soft / Gentle
26 – दुकूल – रेशमी वस्त्र – Fine silk cloth
27 – शोभित – सुशोभित / सुंदर लगना – Adorned / Looking beautiful
28 – भिन्न – अलग – Different / Separate
29 – एक सूत्र – एक धागा / एकता – Single thread / Unity
30 – प्राण – जीवन – Life / Vitality
मौखिक – 1. उच्चारण कीजिए –
कन्याएँ, अजान, प्रातः, उल्लसित, कुसुमावलि, संध्या, करतलगत, सुषमानुभूति, तारावलि दीप्तिमान, आकर्षित, खिन्न, प्राण
कन्याएँ – Kan-yaa-en
अजान – A-jaan
प्रातः – Praa-tah
उल्लसित – Ul-la-sit
कुसुमावलि – Ku-su-maa-va-li
संध्या – San-dhyaa
करतलगत – Kar-tal-gat
सुषमानुभूति – Sush-maa-nu-bhoo-ti
तारावलि – Taa-raa-va-li
दीप्तिमान – Deep-ti-maan
आकर्षित – Aa-kar-shit
खिन्न – Khinn
प्राण – Praan
- निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर बताइए –
(क) लहरें अपनी छवि के रस से क्या कर रही हैं?
उत्तर: लहरें अपनी छवि अर्थात् सुंदरता के रस से संसार के मन को सींच रही हैं और उसे अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं।
(ख) कवि ने लहरों के हिलने की तुलना किससे की है?
उत्तर: कवि ने हिलती हुई लहरों की तुलना नए वृक्षों के पत्तों अर्थात् नव तरु दलों के हिलने से की है।
(ग) लहरों ने हाथ में क्या ले रखा है?
उत्तर: लहरों ने अपने हाथों में आकाश की विभूति अर्थात् चाँद-तारों की चमक और सुंदरता को ले रखा है।
लिखित
(क) लहरें ‘मधुर-गान’ कहाँ कर रही हैं?
(i) जगती के मन में
(ii) अपनी ही छवि में
(iii) सागर के उर पर ✓
(iv) प्रात: समीर में
(ख) लहरों के हृदय में क्या छिपा हुआ है?
(i) मधुर गान
(ii) खिन्नता
(iii) प्रसन्नता
(iv) भाव-फूल ✓
- निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
(क) सुबह की हवा द्वारा अधीर किए जाने पर लहरें क्या करती हैं?
उत्तर: सुबह की हवा (समीर) से अधीर होकर लहरें खुशी से झूम उठती हैं और बार-बार समुद्र के किनारे (तीर) को छूकर अपनी प्रसन्नता प्रकट करती हैं।
(ख) हिलती हुई लहरों पर संध्या के रंग पड़ने की तुलना कवि ने किससे की है?
उत्तर: कवि ने इसकी तुलना सैकड़ों इंद्रधनुषों (शत सुरचाप) के टूटने या उनकी आभा से की है, जो वृक्षों के पत्तों की तरह हिलती प्रतीत होती हैं।
(ग) लहरों को चाँद और तारों से क्या प्राप्त हो रहा है?
उत्तर: लहरों को चंद्रमा से सुंदरता का अनुभव (सुषमानुभूति) और तारों से कोमल चमक (मृदु दीप्ति) प्राप्त हो रही है।
(घ) कवि ने लहरों के शरीर पर नीले वस्त्र की कल्पना क्यों की है?
उत्तर: सागर के जल का रंग नीला होता है, इसलिए जब लहरें ऊपर उठती हैं, तो ऐसा लगता है मानो उन्होंने नीले रंग का रेशमी वस्त्र (नीला दुकूल) पहन रखा हो।
- कविता की पंक्तियों का सही अंश से मिलान कीजिए-
(क) जगती के मन को खींच-खींच — निज छवि के रस से सींच-सींच
(ख) संध्या से पाकर रुचिर रंग — करती सी शत सुरचाप भंग
(ग) प्रातः समीर से हो अधीर — छू कर पल-पल उल्लसित तीर
(घ) तन पर शोभित नीला दुकूल — हैं छिपे हृदय में भाव-फूल
(ङ) करतल-गत कर नभ की विभूति — पाकर शशि से सुषमानुभूति
जीवन मूल्यपरक प्रश्न
- सागर में उठती – गिरती लहरों से क्या सीखा जा सकता है?
उत्तर – सागर की लहरों से हम निरंतर गतिशीलता, विपरीत परिस्थितियों में भी नृत्य करने अर्थात् खुश रहने और उतार-चढ़ाव के बावजूद अपने मूल से जुड़े रहने की सीख ले सकते हैं।
- आज के व्यस्त जीवन में प्रकृति की सुंदरता देखकर मन पर कैसा प्रभाव पड़ता है?
उत्तर – प्रकृति की सुंदरता व्यस्त जीवन के तनाव को कम करती है, मन को शांति देती है और हमारे भीतर नई ऊर्जा का संचार करती है।
भाषा ज्ञान
- सही विकल्प पर सही का निशान लगाइए-
(क) ‘भोली’ का विलोम रूप क्या होगा?
(i) ज्ञानी
(ii) मूर्ख
(iii) चतुर ✓
(iv) अनजान
(ख) कौन सा शब्द ‘दुकूल’ का पर्यायवाची नहीं है?
(i) वस्त्र
(ii) पट
(iii) कपड़ा
(iv) किनारा ✓
- निम्नलिखित शब्दों के लिए कविता में प्रयुक्त विशेषण छाँटकर लिखिए-
(क) भोली अजान जल कन्याएँ
(ख) मधुर गान
(ग) नीला दुकूल
(घ) उल्लसित तीर
(ङ) नव तरुदल
(च) रुचिर रंग
- जानें- जहाँ प्रकृति या अन्य बेजान वस्तुओं को जीवित मनुष्यों की तरह व्यवहार करते हुए दिखाया जाता है वहाँ मानवीकरण अलंकार होता है। इस कविता में लहरों को मनुष्य की तरह व्यवहार करते हुए दिखाया गया है।
कविता से छाँटकर तीन ऐसी पंक्तियाँ लिखिए जिनमें लहरों को मनुष्य के समान कार्य करते हुए दिखाया गया है-
(क) सागर के उर पर नाच-नाच।
(ख) जल-कन्याएँ भोली अजान।
(ग) करती हैं लहरें मधुर गान।
- निम्नलिखित शब्दों में प्रत्यय लगाकर नए शब्द बनाइए-
(क) उल्लास + इत – उल्लसित
(ख) पुलक + इत – पुलकित
(ग) आकर्षण + इत – आकर्षित
(घ) सम्मान + इत – सम्मानित
(ङ) पुष्प + इत – पुष्पित
(च) हर्ष + इत – हर्षित
- प्रत्येक के लिए दो-दो पर्यायवाची शब्द लिखिए-
(क) सागर: समुद्र, जलधि
(ख) समीर: हवा, पवन
(ग) कुसुम: फूल, पुष्प
(घ) तरु: वृक्ष, पेड़
(ङ) शशि: चाँद, चंद्रमा
(च) मुदित: प्रसन्न, खुश
रोचक क्रियाकलाप
- ‘एक दिन लहरों ने मुझसे कहा।’ इसे आधार बनाकर अनुच्छेद लिखिए।
उत्तर – एक शाम जब मैं समुद्र किनारे बैठा था, तब अचानक एक ऊँची लहर मेरे करीब आई और मधुर स्वर में बोली, “मुझसे जीवन की गतिशीलता सीखो।” लहरों ने मुझसे कहा कि जैसे हम निरंतर उठती-गिरती रहती हैं, वैसे ही जीवन में भी सुख और दुख का चक्र चलता रहता है। गिरना अंत नहीं है, बल्कि फिर से उठने की तैयारी है। लहरों ने मुझे सिखाया कि किनारे से टकराकर टूट जाने के बाद भी हम अपनी ऊर्जा नहीं खोतीं, बल्कि पुनः सागर की गहराई में समाकर नई शक्ति के साथ वापस आती हैं। उस दिन मैंने जाना कि बाधाओं से घबराना नहीं, बल्कि उनके साथ तालमेल बिठाकर आगे बढ़ना ही वास्तविक जीवन है।
- ‘तन पर शोभित…….’ से कविता के अंत तक के अंश को गद्य के रूप में लिखिए।
उत्तर – लहरों के नीले जल को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो उन्होंने अपने शरीर पर नीला रेशमी वस्त्र (दुकूल) धारण किया हुआ हो। उनके हृदय में प्रेम और कोमलता के भाव-रूपी फूल छिपे हुए हैं, जो अपनी सुंदरता से सबका ध्यान अपनी ओर खींच लेते हैं। ये लहरें सागर के हृदय पर नृत्य करते हुए मधुर गीत गाती हैं। ये लहरें मानवीय स्वभाव की तरह ही परिवर्तनशील हैं; ये कभी बहुत प्रसन्न (मुदित) दिखाई देती हैं, तो कभी उदास और खिन्न जान पड़ती हैं। कभी ये आपस में मिल जाती हैं, तो कभी एक-दूसरे से अलग होकर भिन्न दिखाई देती हैं। परंतु, इन तमाम भिन्नताओं के बावजूद ये सभी एक ही जीवन-सूत्र में बँधी हुई हैं। ये लहरें निरंतर सागर के हृदय पर थिरकती हुई मधुर गान करती रहती हैं।
- प्रकृति सौंदर्य पर आधारित कुछ कविताएँ एकत्र करके कक्षा में एक कवि गोष्ठी का आयोजन कीजिए
उत्तर – छात्र शिक्षक की सहायता से इसे करें।
गृहकार्य
- जानें- दो शब्दों को जोड़कर नया शब्द बनाने को संधि करना कहते हैं। संधि किए गए शब्दों को फिर से अलग करके लिखने को संधि-विच्छेद करना कहते हैं।
निम्नलिखित शब्दों की संधि करके लिखिए-
(क) कुसुम + अवलि – कुसुमावलि
(ख) सुषमा + अनुभूति – सुषमानुभूति
(ग) तारा + अवलि – तारावलि
(घ) परम + आत्मा – परमात्मा
(ङ) हिम + आलय — हिमालय
(च) छात्र + आवास छात्रावास
- निम्नलिखित द्वित्व वर्णों से तीन-तीन शब्द बनाकर लिखिए-
(क) ल्ल – उल्लसित पल्लव, गुल्लक, बिल्ली
(ख) न्न – खिन्न प्रसन्न, अन्न, पन्ना

