पाठ का सार
यह व्यंग्यपूर्ण पाठ ‘अतिथि देवो भव’ लेखक देवेंद्र वर्मा द्वारा लिखित है। इसमें आधुनिक जीवन की व्यस्तता, आर्थिक कठिनाइयों और बदलती जीवनशैली के बीच ‘अतिथि सत्कार’ की परंपरा की चुनौतियों को बड़ी ही रोचकता और कटाक्ष के साथ प्रस्तुत किया गया है।
- प्राचीन परंपरा और आधुनिक समय –
लेखक बचपन से सुनते आए हैं कि ‘अतिथि देवो भव’ अर्थात् अतिथि देवता के समान होता है। पुराणों में भी अतिथि सत्कार की बहुत महिमा है। लेकिन लेखक का मानना है कि पुराने समय में यातायात के साधन कम थे, अन्न की प्रचुरता थी और लोगों के पास समय था, इसलिए तब अतिथि का आना आनंददायक होता था। आज के भागदौड़ भरे जीवन में स्थिति बिल्कुल बदल गई है।
- ‘अतिथि’ बनाम ‘असमय’ –
लेखक ने अतिथियों के लिए एक नया शब्द गढ़ा है—’असमय’। अतिथि वह है जिसकी आने की तिथि निश्चित न हो, लेकिन लेखक के अनुसार ‘असमय’ वह है जिसका न आने का समय निश्चित हो और न ही जाने का। लेखक अतिथियों से नहीं, बल्कि उनके अनिश्चित समय तक रुकने और बिना सूचना के टपक पड़ने से घबराते हैं।
- आज की लाचारी –
आजकल लोग छोटे फ्लैटों में रहते हैं जहाँ सोने की जगह भी पर्याप्त नहीं है। महँगाई के इस दौर में अतिथि का सत्कार करना आर्थिक बोझ बन जाता है। साथ ही, ऑफिस की व्यस्तता के कारण मेहमानों के साथ बैठने और बातचीत करने का समय भी नहीं मिल पाता।
- एक रोचक अनुभव –
लेखक अपने एक ‘नियमित’ अतिथि का उदाहरण देते हैं। वे अतिथि महोदय भोजन के मामले में बहुत सावधान हैं और उन्हें दाल में सौ ग्राम ‘शुद्ध घी’ चाहिए, जबकि लेखक के घर में शुद्ध घी का चलन वर्षों से बंद है। लेखक व्यंग्य करते हैं कि आज के युग में शुद्ध घी मिलना इतिहास की बात हो गई है।
- अंतर्द्वंद्व और विडंबना –
लेखक की विडंबना यह है कि उनकी पत्नी बीमार है, नौकर छुट्टी पर है और महीने का आखिरी सप्ताह चल रहा है जब पैसे कम होते हैं, ऐसे में अतिथि का आगमन उनकी मुश्किलों को और बढ़ा देता है। अंत में लेखक एक आत्म-चिंतन भी करते हैं कि आखिर वे स्वयं भी तो कभी किसी के यहाँ अतिथि बनकर जाते ही होंगे।
मुख्य संदेश –
बदलती मूल्य-मर्यादा – समय के साथ पुरानी परंपराओं को निभाने का स्वरूप बदल गया है।
व्यवहारिकता – अतिथि सत्कार हमारी संस्कृति है, लेकिन आज की व्यस्तता और सीमित संसाधनों के कारण यह एक चुनौती बन गया है।
व्यंग्य – लेखक ने अतिथियों की उन आदतों पर चोट की है जो मेज़बान (Host) की परेशानियों को समझे बिना अपनी सुविधा देखते हैं।
कठिन शब्दार्थ
1 आगंतुक – आने वाला / मेहमान Visitor
2 नाज – गर्व / घमंड Pride
3 सौभाग्य – अच्छा भाग्य Good fortune
4 पराकाष्ठा – चरम सीमा Zenith / Peak
5 महिमा – गुणगान / गौरव Glory / Grandeur
6 अकरणीय – न करने योग्य Non-doable / Improper
7 समानांतर – बराबर / एक जैसा Parallel
8 अकस्मात – अचानक Suddenly
9 तात्पर्य – मतलब / अर्थ Meaning / Significance
10 शंकाकुल – संदेह से भरा Full of doubt
11 सिद्धांत – नियम Principle / Theory
12 आत्मीय – अपना / सगा Kin / Intimate
13 शाश्वत – सदा रहने वाला Eternal / Perpetual
14 कृपापात्र – जिस पर कृपा हो Beneficiary of grace
15 दार्शनिक – दर्शन से संबंधित Philosophical
16 फ़ुसरत – खाली समय Leisure / Free time
17 व्यस्तता – काम में लगा होना Busyness
18 समुन्नत – बहुत उन्नत / विकसित Highly advanced
19 सुलभ – आसानी से मिलने वाला Easily available
20 खाद्यान्न – खाने का अनाज Food grains
21 बाध्यता – मजबूरी Compulsion / Obligation
22 कृत्रिमता – दिखावा / बनावटीपन Artificiality
23 अनिवार्य – ज़रूरी Essential / Mandatory
24 लाज-संकोच – शर्म Shyness / Hesitation
25 पर्याप्त – काफी Sufficient / Adequate
26 अवकाश – छुट्टी / समय Leisure / Break
27 संलाप – बातचीत Conversation / Dialogue
28 लाचारी – बेबसी Helplessness
29 गौण – कम महत्त्वपूर्ण Secondary / Minor
30 वैयक्तिक – व्यक्तिगत Personal / Individual
31 पुराणों – प्राचीन धार्मिक ग्रंथ Puranas / Ancient texts
32 समावेश – शामिल करना Inclusion
33 समन्वय – तालमेल Coordination / Harmony
34 उत्तरोत्तर – लगातार बढ़ता हुआ Progressively
35 अनुगृहीत – आभारी Grateful / Obliged
36 खंडित – टूटा हुआ Broken / Fragmented
37 मर्यादा – सीमा / इज्जत Dignity / Limit
38 भग्न – नष्ट / टूटा Shattered / Ruined
39 नियमित – रोज़ाना वाला Regular
40 विशेषताओं – खूबियाँ Characteristics
41 उदाहरणार्थ – उदाहरण के लिए For example
42 प्रत्यक्ष – सामने दिखने वाला Direct / Evident
43 स्वयंसेवक – अपनी इच्छा से सेवा करने वाला Volunteer
44 लागू – अमल में आना Applicable
45 परिस्थिति – हालत Circumstance
46 छठे-छमासे – कभी-कभी Occasionally
47 यातायात – आवागमन Transport
48 विशाल – बहुत बड़ा Vast / Huge
49 उत्कंठा – तीव्र इच्छा Eagerness
50 पुरलुत्फ़ – आनंददायक Enjoyable / Pleasing
51 सावधान – सचेत Careful
52 चलन – रिवाज Trend / Custom
53 प्रमाण – सबूत Evidence / Proof
54 उपयोगी – काम का Useful
55 भोजन – खाना Meal
56 आगमन – आना Arrival
57 भयभीत – डरा हुआ Terrified
58 अन्न – अनाज Grain
59 भोग – प्रसाद / अर्पण Offering
60 बिस्तर – लेटने की जगह Bedding
61 शंकाकुल – डरा हुआ Apprehensive
62 निर्वाह – गुज़ारा / पालन Fulfillment / Sustenance
63 आधमकना – बिना बताए आना To drop in unannounced
64 पराकाष्ठा – चरम सीमा Ultimate point
65 पूर्व – पहले Previous / Prior
66 तात्पर्य – अर्थ Intent / Purpose
67 बड़प्पन – महानता Greatness
68 साधन – ज़रिया Means / Resource
69 मूल – आधार Root / Basis
70 अप्रिय – जो प्यारा न हो Unpleasant
71 प्रियजन – करीबी लोग Loved ones
72 प्रस्थान – जाना Departure
73 कटाक्ष – व्यंग्य Sarcasm
74 विडंबना – विडंबना Irony
75 संसाधन – साधन Resources
76 आर्थिक – धन संबंधी Financial
77 अवरोध – रुकावट Obstruction
78 अभिमान – गर्व Pride
79 अनिश्चित – जो पक्का न हो Uncertain
80 टपकना – अचानक आना To drop in
81 ठिकाना – निश्चित जगह Destination / Whereabouts
82 अदृश्य – जो न दिखे Invisible
83 प्रकट – सामने आना Apparent
84 विनम्र – दयालु Humble
85 सौजन्य – कृपा Courtesy
मौखिक – 1. उच्चारण कीजिए –
बताऊँगा, आगंतुक, कहानियाँ, समानांतर, काँपता, बताऊँ, शंकाकुल, महँगा, सिद्धांत, पहुँचने, अंग, संकोच, आनंद, स्वयं, संलाप, घंटा, कहाँ, जाएँ, उत्कंठा, संख्या, करूँ, खंडित, ग्रंथ, खूबियाँ, बंद, पसंद, आँखें, अंधा, बनूँ, पहुँचे, संत, स्वयं, अंतिम
सौभाग्य, कृपा, सत्कार, पराकाष्ठा, अकरणीय, तात्पर्य, व्यस्तता, बड़प्पन, स्थिति, स्वभावतः, समन्वय, समुन्नत, खाद्यान्न, बाध्यता, कृत्रिमता, प्रदर्शन, फ़्लैट, पृथ्वी, पर्याप्त, आत्मीय, अनुगृहीत, वैयक्तिक, भग्न, शाश्वत, पुरलुत्फ़, प्रत्यक्ष, दार्शनिक
बताऊँगा – Ba-taa-oon-gaa
कहाँ – Ka-haan
आगंतुक – Aa-gan-tuk
जाएँ – Jaa-ayn
कहानियाँ – Ka-haa-ni-yaan
संख्या – Sankh-yaa
काँपता – Kaanp-taa
खूबियाँ – Khoo-bi-yaan
शंकाकुल – Shan-ka-kul
पसंद – Pa-sand
महँगा – Ma-han-gaa
आँखें – Aan-khayn
पहुँचने – Pa-hunch-nay
बनूँ – Ba-noon
अंग – Ang
पहुँचे – Pa-hunch-ay
संकोच – San-koch
अंतिम – An-tim
समानांतर – Sa-maa-naan-tar
पर्याप्त – Par-yaapt
सिद्धांत – Sid-dhaant
आत्मीय – Aat-mee-ya
संलाप – San-laap
अनुगृहीत – Anu-gri-heet
उत्कंठा – Ut-kan-thaa
वैयक्तिक – Vai-yak-tik
खंडित – Khan-dit
भग्न – Bhag-na
ग्रंथ – Granth
शाश्वत – Shaash-vat
पराकाष्ठा – Pa-raa-kaash-thaa
प्रत्यक्ष – Prat-yak-sha
अकरणीय – A-ka-ra-nee-ya
दार्शनिक – Daar-sha-nik
व्यस्तता – Vyas-ta-taa
फ़्लैट – Flat
बड़प्पन – Ba-dap-pan
पुरलुत्फ़ – Pur-lutf
समन्वय – Sa-man-vay
सौभाग्य – Sau-bhaag-ya
समुन्नत – Sa-mun-nat
सत्कार – Sat-kaar
खाद्यान्न – Khaad-yaan-na
कृत्रिमता – Kri-trim-taa
बाध्यता – Baadh-ya-taa
प्रदर्शन – Pra-dar-shan
- निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर बताइए-
(क) अतिथि का क्या अर्थ है?
उत्तर – ‘अतिथि’ का अर्थ है—जिसके आने की कोई तिथि या तारीख निश्चित न हो, अर्थात् जो बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक आ जाए।
(ख) लेखक ने आजकल के बड़प्पन दिखाने के किस साधन की ओर संकेत किया है?
उत्तर – लेखक ने आजकल यह कहने को बड़प्पन का साधन माना है कि— “क्या बताएँ साहब, हमें तो खाना खाने तक की फुर्सत नहीं मिलती।”
(ग) अतिथियों की वैयक्तिक विशेषताओं का वर्णन करने से महाभारत की संख्या एक से दो हो जाएगी—लेखक ने ऐसा क्यों कहा है?
उत्तर – लेखक ने यह व्यंग्य में कहा है क्योंकि उनके अतिथियों की विशेषताएँ और उनसे जुड़ी कहानियाँ इतनी लंबी और विचित्र हैं कि उन पर महाभारत जैसा ही एक विशाल ग्रंथ लिखा जा सकता है।
लिखित
- सही उत्तर पर ✓ लगाइए-
(क) लेखक ने अपना सौभाग्य किसे कहा है?
(i) उन्हें कभी अकेले भोजन नहीं करना पड़ता। ✓
(ii) किसी-न-किसी को भोजन कराते रहते हैं।
(iii) दूसरों के घर अतिथि बन कर जाते रहते हैं।
(iv) उनके घर अतिथि कृपा करते रहते हैं।
(ख) लेखक ने पुराने समय में अतिथियों के ‘छठे-छमासे’ आने का क्या कारण बताया?
(i) खाद्यान्न की कमी होना।
(ii) काम पर पहुँचने की बाध्यता होना।
(iii) यातायात के साधन समुन्नत और सुलभ न होना। ✓
(iv) कहीं जाने में संकोच करना।
- निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
(क) अतिथि के लिए लेखक ने दूसरा कौन-सा शब्द गढ़ा है और क्यों?
उत्तर – लेखक ने अतिथि के लिए ‘असमय’ शब्द गढ़ा है क्योंकि अतिथि न केवल आने में अनिश्चित होते हैं, बल्कि जाने में भी अनिश्चित होते हैं। वे कब तक रहेंगे, इसका कोई ठिकाना नहीं होता।
(ख) आजकल अतिथि सत्कार में किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है?
उत्तर – आजकल छोटे फ्लैटों में सोने की जगह की कमी, महँगाई के कारण अन्न का बढ़ता खर्च और दफ्तर के काम की व्यस्तता के कारण मेहमानों के साथ बैठने के लिए समय का न होना जैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
(ग) लेखक ने भोजन के मामले में सावधान अतिथि की क्या विशेषता बताई है?
उत्तर – भोजन के मामले में सावधान अतिथि की विशेषता यह है कि उन्हें दाल में कम-से-कम सौ ग्राम शुद्ध घी चाहिए होता है, जो आज के मिलावटी युग में मिलना कठिन है।
अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न
निम्नलिखित पाठांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
“…मेरे घर में घी का चलन वर्षों से बंद है। कुछ इसलिए नहीं कि मुझे घी पसंद नहीं, बल्कि मैं जान चुका हूँ कि शुद्ध घी का युग इतिहास का युग बन गया। भगवान ने आँखें दी हैं देखने को और बुद्धि दी है समझने को। इनके रहते मैं अंधा बनूँ यह मुझे स्वीकार नहीं। अतः जब कोई कहता है कि वह बाज़ार से खरीदकर शुद्ध घी खाता है तो पहुँचे हुए संत की तरह मैं चुप रह जाता हूँ या कभी हल्के मुसकरा देता हूँ। अब मैं एक ही प्रमाण पर विश्वास करता हूँ और वह है प्रत्यक्ष। शेष प्रमाण दार्शनिक चर्चा के लिए ही उपयोगी है। पत्नी बीमार है, नौकर एक हफ़्ते की छुट्टी लेकर घर गया। तीन महीने हो गए। जब तक वह नहीं आता तब तक स्वयंसेवक बनकर रहना है। महीने का अंतिम सप्ताह है। और मैंने जो कहा वह क्या मुझ पर भी उतना ही लागू नहीं है? आखिर मैं भी तो किसी का अतिथि होता हूँ।
(क) लेखक के अनुसार क्या इतिहास का युग बन गया?
उत्तर – लेखक के अनुसार शुद्ध घी का मिलना अब इतिहास का युग बन गया है।
(ख) लेखक को अंधा बनना क्यों स्वीकार नहीं है?
उत्तर – लेखक को अंधा बनना इसलिए स्वीकार नहीं है क्योंकि भगवान ने उन्हें देखने के लिए आँखें और समझने के लिए बुद्धि दी है, जिससे वे मिलावट को पहचान सकते हैं।
(ग) किस बात को सुनकर लेखक हल्के से मुसकरा देते हैं?
उत्तर – जब कोई कहता है कि वह बाज़ार से खरीदकर शुद्ध घी खाता है, तो लेखक हल्के से मुसकरा देते हैं।
(घ) लेखक के घर में क्या-क्या परेशानियाँ हैं?
उत्तर – लेखक की पत्नी बीमार है, नौकर तीन महीने से छुट्टी पर है और महीने का अंतिम सप्ताह (आर्थिक तंगी) चल रहा है।
भाषा ज्ञान
- छात्र स्वयं करें।
- छात्र स्वयं करें।
- निम्नलिखित शब्दों का बहुवचन रूप लिखिए-
(क) कहानी – कहानियाँ
(ख) लाचारी – लाचारियाँ
(ग) खूबी – खूबियाँ
(घ) याद – यादें
(ङ) तिथि – तिथियाँ
(च) छुट्टी – छुट्टियाँ
(छ) आँख – आँखें
(ज) ज़रूरत – ज़रूरतें
- निम्नलिखित मुहावरों का अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए-
(क) जान खाना – जब मेहमान घंटों बिना मतलब की बातें करते हैं, तो वे मेज़बान की जान खाते हैं।
(ख) लाले पड़ना – भारी महंगाई के कारण आज के समय में गरीबों को दो वक्त की रोटी के भी लाले पड़े हैं।
(ग) छठे छमासे होना – पुराने ज़माने में यातायात की कमी के कारण रिश्तेदार छठे छमासे ही घर आते थे।
(घ) टपक पड़ना – कल शाम जब मैं दफ्तर के काम में व्यस्त था, तभी अचानक एक पुराने मित्र टपक पड़े।
- निम्नलिखित उपसर्गों को जोड़कर नए शब्द बनाइए-
(क) अ + तिथि = अतिथि
(ख) प्र + दर्शन = प्रदर्शन
(ग) ला + चारी = लाचारी
(घ) उप + योगी = उपयोगी
रोचक क्रियाकलाप
- किसी के घर जाने पर आप कैसा व्यवहार करते हैं- अनुच्छेद के रूप में लिखिए।
उत्तर – किसी के घर जाने पर व्यवहार (अनुच्छेद) –
जब मैं किसी के घर अतिथि बनकर जाता हूँ, तो मैं इस बात का विशेष ध्यान रखता हूँ कि मेरी वजह से मेज़बान को कोई असुविधा न हो। मैं जाने से पूर्व सूचना अवश्य देता हूँ और अपनी पसंद-नापसंद थोपने के बजाय जो भी प्यार से परोसा जाए, उसे ग्रहण करता हूँ। मैं उनके घरेलू काम और व्यस्तता में बाधक नहीं बनता और समय रहते विदा लेने का प्रयास करता हूँ।
- सुमित अपने घर आए अतिथि से परेशान है। वह इस विषय में अपने मित्र रणविजय से बात कर रहा है। दोनों मित्रों के बीच हुई बातचीत को संवाद के रूप में लिखिए।
उत्तर – स्थान – सुमित के घर के बाहर बरामदा। सुमित थका हुआ और थोड़ा परेशान लग रहा है।
सुमित – (लंबी साँस भरते हुए) यार रणविजय, मैं तो बहुत धर्मसंकट में फँस गया हूँ।
रणविजय – क्यों भाई, क्या बात हो गई? चेहरे पर इतनी हवाइयाँ क्यों उड़ रही हैं?
सुमित – अरे भाई, घर पर अतिथि पधारे हैं। एक हफ़्ता हो गया, पर जाने का नाम ही नहीं ले रहे।
रणविजय – (हँसते हुए) तो इसमें क्या बुराई है? हमारे यहाँ तो कहा जाता है—’अतिथि देवो भव’।
सुमित – भाई, यह सिद्धांत सुनने में अच्छा है, पर एक छोटे से फ़्लैट में जब ‘देवता’ जम जाएँ, तो इंसान का जीना मुश्किल हो जाता है। ऊपर से दफ़्तर में काम का पहाड़ है और घर में शांति का नामोनिशान नहीं।
रणविजय – मैं तुम्हारी बात समझ सकता हूँ। आज के समय में बिना बताए लंबे समय के लिए रुकना मेज़बान के लिए भारी पड़ता है। पर क्या तुमने उनसे जाने के बारे में पूछा?
सुमित – कैसे पूछूँ? सभ्यता और संकोच आड़े आ जाते हैं। वे बड़े प्रेम से दाल में शुद्ध घी और सुबह-शाम नए पकवानों की माँग करते हैं। अब उन्हें कौन समझाए कि महीने का आखिरी हफ़्ता चल रहा है!
रणविजय – धैर्य रखो दोस्त! कुछ दिन और अपनी परंपरा का निर्वाह कर लो। शायद वे खुद ही जल्दी विदा ले लें। अगली बार उन्हें पहले ही अपनी व्यस्तता के बारे में संकेत दे देना।
सुमित – हाँ भाई, अब तो बस यही दुआ कर रहा हूँ कि ‘अतिथि देव’ अब अपने धाम प्रस्थान करें!
गृहकार्य
- पाठ में आपने ‘ऋ’ के प्रयोगवाले शब्द – कृपा, हृदय पढ़े हैं। ‘ऋ’ की मात्रा का प्रयोग करके पाँच शब्द बनाइए-
(i) वृक्ष (ii) मृग (iii) गृह (iv) धृत (v) तृण
- निम्नलिखित पंक्तियों को उत्तर मानकर उनके लिए प्रश्न बनाइए-
(क) कुछ लोगों के बारे में सुना है कि वे खाना अकेले नहीं खाते।
आपने कुछ बड़े लोगों के बारे में क्या सुना है?
(ख) अतिथि से नहीं पर असमय से अवश्य घबराता हूँ।
लेखक किससे नहीं घबराता पर किससे अवश्य काँपता है?
(ग) अतिथि देव ने पत्र लिखा कि उन्हें लेखक से मिले बहुत दिन हो गए हैं।

