10. Atithi Devo Bhava (Kahani) – Devendra Varma, Bhasha Mani, Class VII, The Best Solution

पाठ का सार

यह व्यंग्यपूर्ण पाठ ‘अतिथि देवो भव’ लेखक देवेंद्र वर्मा द्वारा लिखित है। इसमें आधुनिक जीवन की व्यस्तता, आर्थिक कठिनाइयों और बदलती जीवनशैली के बीच ‘अतिथि सत्कार’ की परंपरा की चुनौतियों को बड़ी ही रोचकता और कटाक्ष के साथ प्रस्तुत किया गया है।

  1. प्राचीन परंपरा और आधुनिक समय –

लेखक बचपन से सुनते आए हैं कि ‘अतिथि देवो भव’ अर्थात् अतिथि देवता के समान होता है। पुराणों में भी अतिथि सत्कार की बहुत महिमा है। लेकिन लेखक का मानना है कि पुराने समय में यातायात के साधन कम थे, अन्न की प्रचुरता थी और लोगों के पास समय था, इसलिए तब अतिथि का आना आनंददायक होता था। आज के भागदौड़ भरे जीवन में स्थिति बिल्कुल बदल गई है।

  1. ‘अतिथि’ बनाम ‘असमय’ –

लेखक ने अतिथियों के लिए एक नया शब्द गढ़ा है—’असमय’। अतिथि वह है जिसकी आने की तिथि निश्चित न हो, लेकिन लेखक के अनुसार ‘असमय’ वह है जिसका न आने का समय निश्चित हो और न ही जाने का। लेखक अतिथियों से नहीं, बल्कि उनके अनिश्चित समय तक रुकने और बिना सूचना के टपक पड़ने से घबराते हैं।

  1. आज की लाचारी –

आजकल लोग छोटे फ्लैटों में रहते हैं जहाँ सोने की जगह भी पर्याप्त नहीं है। महँगाई के इस दौर में अतिथि का सत्कार करना आर्थिक बोझ बन जाता है। साथ ही, ऑफिस की व्यस्तता के कारण मेहमानों के साथ बैठने और बातचीत करने का समय भी नहीं मिल पाता।

  1. एक रोचक अनुभव –

लेखक अपने एक ‘नियमित’ अतिथि का उदाहरण देते हैं। वे अतिथि महोदय भोजन के मामले में बहुत सावधान हैं और उन्हें दाल में सौ ग्राम ‘शुद्ध घी’ चाहिए, जबकि लेखक के घर में शुद्ध घी का चलन वर्षों से बंद है। लेखक व्यंग्य करते हैं कि आज के युग में शुद्ध घी मिलना इतिहास की बात हो गई है।

  1. अंतर्द्वंद्व और विडंबना –

लेखक की विडंबना यह है कि उनकी पत्नी बीमार है, नौकर छुट्टी पर है और महीने का आखिरी सप्ताह चल रहा है जब पैसे कम होते हैं, ऐसे में अतिथि का आगमन उनकी मुश्किलों को और बढ़ा देता है। अंत में लेखक एक आत्म-चिंतन भी करते हैं कि आखिर वे स्वयं भी तो कभी किसी के यहाँ अतिथि बनकर जाते ही होंगे।

मुख्य संदेश –

बदलती मूल्य-मर्यादा – समय के साथ पुरानी परंपराओं को निभाने का स्वरूप बदल गया है।

व्यवहारिकता – अतिथि सत्कार हमारी संस्कृति है, लेकिन आज की व्यस्तता और सीमित संसाधनों के कारण यह एक चुनौती बन गया है।

व्यंग्य – लेखक ने अतिथियों की उन आदतों पर चोट की है जो मेज़बान (Host) की परेशानियों को समझे बिना अपनी सुविधा देखते हैं।

कठिन शब्दार्थ

1  आगंतुक – आने वाला / मेहमान  Visitor

 2  नाज – गर्व / घमंड  Pride

 3  सौभाग्य – अच्छा भाग्य  Good fortune

 4  पराकाष्ठा – चरम सीमा  Zenith / Peak

 5  महिमा – गुणगान / गौरव  Glory / Grandeur

 6  अकरणीय – न करने योग्य  Non-doable / Improper

 7  समानांतर – बराबर / एक जैसा  Parallel

 8  अकस्मात – अचानक  Suddenly

 9  तात्पर्य – मतलब / अर्थ  Meaning / Significance

 10  शंकाकुल – संदेह से भरा  Full of doubt

 11  सिद्धांत – नियम  Principle / Theory

 12  आत्मीय – अपना / सगा  Kin / Intimate

 13  शाश्वत – सदा रहने वाला  Eternal / Perpetual

 14  कृपापात्र – जिस पर कृपा हो  Beneficiary of grace

 15  दार्शनिक – दर्शन से संबंधित  Philosophical 

 16  फ़ुसरत – खाली समय  Leisure / Free time

 17  व्यस्तता – काम में लगा होना  Busyness

 18  समुन्नत – बहुत उन्नत / विकसित  Highly advanced

 19  सुलभ – आसानी से मिलने वाला  Easily available

 20  खाद्यान्न – खाने का अनाज  Food grains

 21  बाध्यता – मजबूरी  Compulsion / Obligation

 22  कृत्रिमता – दिखावा / बनावटीपन  Artificiality

 23  अनिवार्य – ज़रूरी  Essential / Mandatory

 24  लाज-संकोच – शर्म  Shyness / Hesitation

 25  पर्याप्त – काफी  Sufficient / Adequate

 26  अवकाश – छुट्टी / समय  Leisure / Break

 27  संलाप – बातचीत  Conversation / Dialogue

 28  लाचारी – बेबसी  Helplessness

 29  गौण – कम महत्त्वपूर्ण  Secondary / Minor

 30  वैयक्तिक – व्यक्तिगत  Personal / Individual

 31  पुराणों – प्राचीन धार्मिक ग्रंथ  Puranas / Ancient texts

 32  समावेश – शामिल करना  Inclusion

 33  समन्वय – तालमेल  Coordination / Harmony

 34  उत्तरोत्तर – लगातार बढ़ता हुआ  Progressively

 35  अनुगृहीत – आभारी  Grateful / Obliged

 36  खंडित – टूटा हुआ  Broken / Fragmented

 37  मर्यादा – सीमा / इज्जत  Dignity / Limit

 38  भग्न – नष्ट / टूटा  Shattered / Ruined

 39  नियमित – रोज़ाना वाला  Regular

 40  विशेषताओं – खूबियाँ  Characteristics

 41  उदाहरणार्थ – उदाहरण के लिए  For example

 42  प्रत्यक्ष – सामने दिखने वाला  Direct / Evident

 43  स्वयंसेवक – अपनी इच्छा से सेवा करने वाला  Volunteer

 44  लागू – अमल में आना  Applicable

 45  परिस्थिति – हालत  Circumstance

 46  छठे-छमासे – कभी-कभी  Occasionally

 47  यातायात – आवागमन  Transport

 48  विशाल – बहुत बड़ा  Vast / Huge

 49  उत्कंठा – तीव्र इच्छा  Eagerness

 50  पुरलुत्फ़ – आनंददायक  Enjoyable / Pleasing

 51  सावधान – सचेत  Careful

 52  चलन – रिवाज  Trend / Custom

 53  प्रमाण – सबूत  Evidence / Proof

 54  उपयोगी – काम का  Useful

 55  भोजन – खाना  Meal

 56  आगमन – आना  Arrival

 57  भयभीत – डरा हुआ  Terrified

 58  अन्न – अनाज  Grain

 59  भोग – प्रसाद / अर्पण  Offering

 60  बिस्तर – लेटने की जगह  Bedding

 61  शंकाकुल – डरा हुआ  Apprehensive

 62  निर्वाह – गुज़ारा / पालन  Fulfillment / Sustenance

 63  आधमकना – बिना बताए आना  To drop in unannounced

 64  पराकाष्ठा – चरम सीमा  Ultimate point

 65  पूर्व – पहले  Previous / Prior

 66  तात्पर्य – अर्थ  Intent / Purpose

 67  बड़प्पन – महानता  Greatness

 68  साधन – ज़रिया  Means / Resource

 69  मूल – आधार  Root / Basis

 70  अप्रिय – जो प्यारा न हो  Unpleasant

 71  प्रियजन – करीबी लोग  Loved ones

 72  प्रस्थान – जाना  Departure

 73  कटाक्ष – व्यंग्य  Sarcasm

 74  विडंबना – विडंबना  Irony

 75  संसाधन – साधन  Resources

 76  आर्थिक – धन संबंधी  Financial

 77  अवरोध – रुकावट  Obstruction

 78  अभिमान – गर्व  Pride

 79  अनिश्चित – जो पक्का न हो  Uncertain

 80  टपकना – अचानक आना  To drop in

 81  ठिकाना – निश्चित जगह  Destination / Whereabouts

 82  अदृश्य – जो न दिखे  Invisible

 83  प्रकट – सामने आना  Apparent

 84  विनम्र – दयालु  Humble

 85  सौजन्य – कृपा  Courtesy

 

मौखिक – 1. उच्चारण कीजिए –

बताऊँगा, आगंतुक, कहानियाँ, समानांतर, काँपता, बताऊँ, शंकाकुल, महँगा, सिद्धांत, पहुँचने, अंग, संकोच, आनंद, स्वयं, संलाप, घंटा, कहाँ, जाएँ, उत्कंठा, संख्या, करूँ, खंडित, ग्रंथ, खूबियाँ, बंद, पसंद, आँखें, अंधा, बनूँ, पहुँचे, संत, स्वयं, अंतिम

सौभाग्य, कृपा, सत्कार, पराकाष्ठा, अकरणीय, तात्पर्य, व्यस्तता, बड़प्पन, स्थिति, स्वभावतः, समन्वय, समुन्नत, खाद्यान्न, बाध्यता, कृत्रिमता, प्रदर्शन, फ़्लैट, पृथ्वी, पर्याप्त, आत्मीय, अनुगृहीत, वैयक्तिक, भग्न, शाश्वत, पुरलुत्फ़, प्रत्यक्ष, दार्शनिक

 

बताऊँगा – Ba-taa-oon-gaa 

कहाँ – Ka-haan

आगंतुक – Aa-gan-tuk 

जाएँ – Jaa-ayn

कहानियाँ – Ka-haa-ni-yaan 

संख्या – Sankh-yaa

काँपता – Kaanp-taa 

खूबियाँ – Khoo-bi-yaan

शंकाकुल – Shan-ka-kul 

पसंद – Pa-sand

महँगा – Ma-han-gaa 

आँखें – Aan-khayn

पहुँचने – Pa-hunch-nay 

बनूँ – Ba-noon

अंग – Ang 

पहुँचे – Pa-hunch-ay

संकोच – San-koch 

अंतिम – An-tim

समानांतर – Sa-maa-naan-tar 

पर्याप्त – Par-yaapt

सिद्धांत – Sid-dhaant 

आत्मीय – Aat-mee-ya

संलाप – San-laap 

अनुगृहीत – Anu-gri-heet

उत्कंठा – Ut-kan-thaa 

वैयक्तिक – Vai-yak-tik

खंडित – Khan-dit 

भग्न – Bhag-na

ग्रंथ – Granth 

शाश्वत – Shaash-vat

पराकाष्ठा – Pa-raa-kaash-thaa 

प्रत्यक्ष – Prat-yak-sha

अकरणीय – A-ka-ra-nee-ya 

दार्शनिक – Daar-sha-nik

व्यस्तता – Vyas-ta-taa 

फ़्लैट – Flat

बड़प्पन – Ba-dap-pan 

पुरलुत्फ़ – Pur-lutf

समन्वय – Sa-man-vay 

सौभाग्य – Sau-bhaag-ya

समुन्नत – Sa-mun-nat 

सत्कार – Sat-kaar

खाद्यान्न – Khaad-yaan-na 

कृत्रिमता – Kri-trim-taa

बाध्यता – Baadh-ya-taa 

प्रदर्शन – Pra-dar-shan

 

  1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर बताइए-

(क) अतिथि का क्या अर्थ है?

उत्तर – ‘अतिथि’ का अर्थ है—जिसके आने की कोई तिथि या तारीख निश्चित न हो, अर्थात् जो बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक आ जाए।

(ख) लेखक ने आजकल के बड़प्पन दिखाने के किस साधन की ओर संकेत किया है?

उत्तर – लेखक ने आजकल यह कहने को बड़प्पन का साधन माना है कि— “क्या बताएँ साहब, हमें तो खाना खाने तक की फुर्सत नहीं मिलती।”

(ग) अतिथियों की वैयक्तिक विशेषताओं का वर्णन करने से महाभारत की संख्या एक से दो हो जाएगी—लेखक ने ऐसा क्यों कहा है?

उत्तर – लेखक ने यह व्यंग्य में कहा है क्योंकि उनके अतिथियों की विशेषताएँ और उनसे जुड़ी कहानियाँ इतनी लंबी और विचित्र हैं कि उन पर महाभारत जैसा ही एक विशाल ग्रंथ लिखा जा सकता है।

 

लिखित

  1. सही उत्तर पर लगाइए-

(क) लेखक ने अपना सौभाग्य किसे कहा है?

(i) उन्हें कभी अकेले भोजन नहीं करना पड़ता।

(ii) किसी-न-किसी को भोजन कराते रहते हैं।

(iii) दूसरों के घर अतिथि बन कर जाते रहते हैं।

(iv) उनके घर अतिथि कृपा करते रहते हैं।

(ख) लेखक ने पुराने समय में अतिथियों के ‘छठे-छमासे’ आने का क्या कारण बताया?

(i) खाद्यान्न की कमी होना।

(ii) काम पर पहुँचने की बाध्यता होना।

(iii) यातायात के साधन समुन्नत और सुलभ न होना।

(iv) कहीं जाने में संकोच करना।

 

  1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

(क) अतिथि के लिए लेखक ने दूसरा कौन-सा शब्द गढ़ा है और क्यों?

उत्तर – लेखक ने अतिथि के लिए ‘असमय’ शब्द गढ़ा है क्योंकि अतिथि न केवल आने में अनिश्चित होते हैं, बल्कि जाने में भी अनिश्चित होते हैं। वे कब तक रहेंगे, इसका कोई ठिकाना नहीं होता।

(ख) आजकल अतिथि सत्कार में किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है?

उत्तर – आजकल छोटे फ्लैटों में सोने की जगह की कमी, महँगाई के कारण अन्न का बढ़ता खर्च और दफ्तर के काम की व्यस्तता के कारण मेहमानों के साथ बैठने के लिए समय का न होना जैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

(ग) लेखक ने भोजन के मामले में सावधान अतिथि की क्या विशेषता बताई है?

उत्तर – भोजन के मामले में सावधान अतिथि की विशेषता यह है कि उन्हें दाल में कम-से-कम सौ ग्राम शुद्ध घी चाहिए होता है, जो आज के मिलावटी युग में मिलना कठिन है।

 

अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न

निम्नलिखित पाठांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

“…मेरे घर में घी का चलन वर्षों से बंद है। कुछ इसलिए नहीं कि मुझे घी पसंद नहीं, बल्कि मैं जान चुका हूँ कि शुद्ध घी का युग इतिहास का युग बन गया। भगवान ने आँखें दी हैं देखने को और बुद्धि दी है समझने को। इनके रहते मैं अंधा बनूँ यह मुझे स्वीकार नहीं। अतः जब कोई कहता है कि वह बाज़ार से खरीदकर शुद्ध घी खाता है तो पहुँचे हुए संत की तरह मैं चुप रह जाता हूँ या कभी हल्के मुसकरा देता हूँ। अब मैं एक ही प्रमाण पर विश्वास करता हूँ और वह है प्रत्यक्ष। शेष प्रमाण दार्शनिक चर्चा के लिए ही उपयोगी है। पत्नी बीमार है, नौकर एक हफ़्ते की छुट्टी लेकर घर गया। तीन महीने हो गए। जब तक वह नहीं आता तब तक स्वयंसेवक बनकर रहना है। महीने का अंतिम सप्ताह है। और मैंने जो कहा वह क्या मुझ पर भी उतना ही लागू नहीं है? आखिर मैं भी तो किसी का अतिथि होता हूँ।

(क) लेखक के अनुसार क्या इतिहास का युग बन गया?

उत्तर – लेखक के अनुसार शुद्ध घी का मिलना अब इतिहास का युग बन गया है।

(ख) लेखक को अंधा बनना क्यों स्वीकार नहीं है?

उत्तर – लेखक को अंधा बनना इसलिए स्वीकार नहीं है क्योंकि भगवान ने उन्हें देखने के लिए आँखें और समझने के लिए बुद्धि दी है, जिससे वे मिलावट को पहचान सकते हैं।

(ग) किस बात को सुनकर लेखक हल्के से मुसकरा देते हैं?

उत्तर – जब कोई कहता है कि वह बाज़ार से खरीदकर शुद्ध घी खाता है, तो लेखक हल्के से मुसकरा देते हैं।

(घ) लेखक के घर में क्या-क्या परेशानियाँ हैं?

उत्तर – लेखक की पत्नी बीमार है, नौकर तीन महीने से छुट्टी पर है और महीने का अंतिम सप्ताह (आर्थिक तंगी) चल रहा है।

 

भाषा ज्ञान

  1. छात्र स्वयं करें।
  2. छात्र स्वयं करें।

 

  1. निम्नलिखित शब्दों का बहुवचन रूप लिखिए-

(क) कहानी – कहानियाँ

(ख) लाचारी – लाचारियाँ

(ग) खूबी – खूबियाँ

(घ) याद – यादें

(ङ) तिथि – तिथियाँ

(च) छुट्टी – छुट्टियाँ

(छ) आँख – आँखें

(ज) ज़रूरत – ज़रूरतें

  1. निम्नलिखित मुहावरों का अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए-

(क) जान खाना – जब मेहमान घंटों बिना मतलब की बातें करते हैं, तो वे मेज़बान की जान खाते हैं।

(ख) लाले पड़ना – भारी महंगाई के कारण आज के समय में गरीबों को दो वक्त की रोटी के भी लाले पड़े हैं।

(ग) छठे छमासे होना – पुराने ज़माने में यातायात की कमी के कारण रिश्तेदार छठे छमासे ही घर आते थे।

(घ) टपक पड़ना – कल शाम जब मैं दफ्तर के काम में व्यस्त था, तभी अचानक एक पुराने मित्र टपक पड़े।

 

  1. निम्नलिखित उपसर्गों को जोड़कर नए शब्द बनाइए-

(क) अ + तिथि = अतिथि

(ख) प्र + दर्शन = प्रदर्शन

(ग) ला + चारी = लाचारी

(घ) उप + योगी = उपयोगी

 

रोचक क्रियाकलाप

  1. किसी के घर जाने पर आप कैसा व्यवहार करते हैं- अनुच्छेद के रूप में लिखिए।

उत्तर – किसी के घर जाने पर व्यवहार (अनुच्छेद) –

जब मैं किसी के घर अतिथि बनकर जाता हूँ, तो मैं इस बात का विशेष ध्यान रखता हूँ कि मेरी वजह से मेज़बान को कोई असुविधा न हो। मैं जाने से पूर्व सूचना अवश्य देता हूँ और अपनी पसंद-नापसंद थोपने के बजाय जो भी प्यार से परोसा जाए, उसे ग्रहण करता हूँ। मैं उनके घरेलू काम और व्यस्तता में बाधक नहीं बनता और समय रहते विदा लेने का प्रयास करता हूँ।

  1. सुमित अपने घर आए अतिथि से परेशान है। वह इस विषय में अपने मित्र रणविजय से बात कर रहा है। दोनों मित्रों के बीच हुई बातचीत को संवाद के रूप में लिखिए।

उत्तर – स्थान – सुमित के घर के बाहर बरामदा। सुमित थका हुआ और थोड़ा परेशान लग रहा है।

सुमित – (लंबी साँस भरते हुए) यार रणविजय, मैं तो बहुत धर्मसंकट में फँस गया हूँ।

रणविजय – क्यों भाई, क्या बात हो गई? चेहरे पर इतनी हवाइयाँ क्यों उड़ रही हैं?

सुमित – अरे भाई, घर पर अतिथि पधारे हैं। एक हफ़्ता हो गया, पर जाने का नाम ही नहीं ले रहे।

रणविजय – (हँसते हुए) तो इसमें क्या बुराई है? हमारे यहाँ तो कहा जाता है—’अतिथि देवो भव’।

सुमित – भाई, यह सिद्धांत सुनने में अच्छा है, पर एक छोटे से फ़्लैट में जब ‘देवता’ जम जाएँ, तो इंसान का जीना मुश्किल हो जाता है। ऊपर से दफ़्तर में काम का पहाड़ है और घर में शांति का नामोनिशान नहीं।

रणविजय – मैं तुम्हारी बात समझ सकता हूँ। आज के समय में बिना बताए लंबे समय के लिए रुकना मेज़बान के लिए भारी पड़ता है। पर क्या तुमने उनसे जाने के बारे में पूछा?

सुमित – कैसे पूछूँ? सभ्यता और संकोच आड़े आ जाते हैं। वे बड़े प्रेम से दाल में शुद्ध घी और सुबह-शाम नए पकवानों की माँग करते हैं। अब उन्हें कौन समझाए कि महीने का आखिरी हफ़्ता चल रहा है!

रणविजय – धैर्य रखो दोस्त! कुछ दिन और अपनी परंपरा का निर्वाह कर लो। शायद वे खुद ही जल्दी विदा ले लें। अगली बार उन्हें पहले ही अपनी व्यस्तता के बारे में संकेत दे देना।

सुमित – हाँ भाई, अब तो बस यही दुआ कर रहा हूँ कि ‘अतिथि देव’ अब अपने धाम प्रस्थान करें!

गृहकार्य

  1. पाठ में आपने ‘ऋ’ के प्रयोगवाले शब्द – कृपा, हृदय पढ़े हैं। ‘ऋ’ की मात्रा का प्रयोग करके पाँच शब्द बनाइए-

(i) वृक्ष (ii) मृग (iii) गृह (iv) धृत (v) तृण

  1. निम्नलिखित पंक्तियों को उत्तर मानकर उनके लिए प्रश्न बनाइए-

(क) कुछ लोगों के बारे में सुना है कि वे खाना अकेले नहीं खाते।

आपने कुछ बड़े लोगों के बारे में क्या सुना है?

(ख) अतिथि से नहीं पर असमय से अवश्य घबराता हूँ।

लेखक किससे नहीं घबराता पर किससे अवश्य काँपता है?

(ग) अतिथि देव ने पत्र लिखा कि उन्हें लेखक से मिले बहुत दिन हो गए हैं।

अतिथि देव ने पत्र में क्या लिखा?

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