ICSE, Class, IX and X, Sahitya Sagar, Chapter – Baat Athanni Ki, Sudarshan, The Best Solutions, बात अठन्नी की, सुदर्शन

लेखक परिचय – सुदर्शन

सुदर्शन जी का वास्तविक नाम बदरीनाथ था। इनका जन्म सियालकोट (वर्तमान पाकिस्तान) में सन् 1895 में हुआ था। इन्होंने उर्दू में प्रकाशित होने वाले दैनिक पत्र ‘आर्य–गजट’ के संपादक के रूप में कार्य किया। मुंबई में 16 दिसंबर 1967 को इनका निधन हो गया। इनका दृष्टिकोण सुधारवादी था।

इनकी पहली कहानी ‘हार की जीत’ थी, जो सन् 1920 में ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुई थी। ‘पुष्पलता’, ‘सुप्रभात’, ‘सुदर्शन सुधा’, ‘पनघट’ इनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह तथा ‘परिवर्तन’, ‘भागवंती’, ‘राजकुमार सागर’ प्रसिद्ध उपन्यास हैं।

सुदर्शन की भाषा सहज, स्वाभाविक, प्रभावी तथा मुहावरेदार है। सुदर्शन को गद्य और पद्य दोनों में महारत हासिल थी। आपने अनेक फिल्मों की पटकथा और गीत भी लिखे।

पाठ का सारांश

प्रसिद्ध कहानीकार सुदर्शन द्वारा रचित कहानी ‘बात अठन्नी की’ समाज के कड़वे सच और न्याय व्यवस्था के दोहरे मापदंडों पर करारा प्रहार करती है।

यह कहानी एक ईमानदार नौकर रसीला की है, जो इंजीनियर बाबू जगतसिंह के यहाँ ₹10 वेतन पर काम करता है। गरीबी के कारण वह अपने पड़ोसी मित्र, जिला मजिस्ट्रेट के चौकीदार रमजान से कर्ज लेता है। जब वह अपना कर्ज चुकाता है, तो केवल ‘अठन्नी’ अर्थात् केवल 50 पैसे बाकी रह जाते हैं। एक दिन वह अठन्नी बचाने के लालच में ₹5 की जगह साढ़े चार रुपए की मिठाई लाता है। इंजीनियर बाबू उसे पकड़ लेते हैं और बेरहमी से पीटकर पुलिस के हवाले कर देते हैं।

विडंबना यह है कि रिश्वतखोर इंजीनियर बाबू और भ्रष्ट मजिस्ट्रेट शेख सलीमुद्दीन जो खुद हजारों की रिश्वत लेते हैं, रसीला को उस अठन्नी की चोरी के लिए 6 महीने की सजा दिलवाते हैं। कहानी के अंत में रमजान की आँखों में खून उतर आता है, क्योंकि वह देखता है कि बड़े-बड़े अपराधी गद्दों पर सो रहे हैं और एक गरीब अठन्नी के लिए जेल की कालकोठरी में है।

 

पाठ का उद्देश्य और छात्रों के लिए सीख

उद्देश्य – लेखक का मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार और न्याय व्यवस्था के भेदभाव को उजागर करना है। यह दिखाना कि कानून केवल गरीबों के लिए कठोर है, जबकि अमीर अपनी दौलत के दम पर बड़े अपराध करके भी सुरक्षित रहते हैं।

सीख – ईमानदारी अनमोल है, लेकिन मजबूरी इंसान से गलतियाँ करा देती है।

न्याय निष्पक्ष होना चाहिए; छोटे और बड़े अपराध में भेद मानवता के आधार पर होना चाहिए।

सच्ची मित्रता अमीरी-गरीबी नहीं, बल्कि मुसीबत में साथ देना है जैसा रमजान ने किया।

 

कठिन शब्दों के सरल अर्थ

1 – वेतन – तनख्वाह – Salary

2 – भार – बोझ – Burden

3 – गुजारा – निर्वाह – Livelihood / Survival

4 – प्रार्थना – निवेदन – Request

5 – संदेह – शक – Suspicion

6 – आदर – सम्मान – Respect

7 – मैत्री – दोस्ती – Friendship

8 – शौकीन – रुचि रखने वाला – Fond of

9 – हठ – जिद – Stubbornness

10 – सौगंध – कसम – Oath / Vow

11 – पेशगी – एडवांस (अग्रिम धन) – Advance payment

12 – संकेत – इशारा – Signal / Hint

13 – कोठरी – छोटा कमरा – Small room / Cell

14 – ऋण – कर्ज – Debt / Loan

15 – अपमान – बेइज्जती – Insult

16 – हुजूर – स्वामी / मालिक – Master / Sir

17 – रिश्वत – घूस – Bribe

18 – शिकार – यहाँ अर्थ – फँसा हुआ व्यक्ति – Victim / Target

19 – गुनाह – पाप / अपराध – Sin / Crime

20 – कोठियों – बंगले – Mansions

21 – परिश्रम – मेहनत – Hard work

22 – अठन्नी – आठ आने (50 पैसे) – Fifty paise coin

23 – चौंकना – हैरान होना – To be startled

24 – रंग उड़ना – घबरा जाना – To turn pale (with fear)

25 – तमाचा – थप्पड़ – Slap

26 – निर्दयता – क्रूरता – Cruelty

27 – घसीटना – खींचना – To drag

28 – मुकदमा – केस – Lawsuit / Case

29 – कचहरी – न्यायालय – Court

30 – अपराध – कसूर – Offense / Crime

31 – स्वीकार – मानना – To accept / Confess

32 – साजिश – षड्यंत्र – Conspiracy

33 – साहस – हिम्मत – Courage

34 – न्यायप्रिय – इंसाफ करने वाला – Just / Justice-loving

35 – फैसला – निर्णय – Judgment / Decision

36 – खून उतरना – बहुत गुस्सा आना – To be enraged

37 – अंधेर नगरी – अन्याय की जगह – Place of injustice

38 – दासी – नौकरानी – Maid-servant

39 – इंसाफ – न्याय – Justice

40 – गद्दों – बिस्तरों – Mattresses

41 – पछतावा – अफसोस – Regret / Remorse

42 – खत – पत्र – Letter

43 – स्वस्थ – निरोगी – Healthy

44 – रकम – धन राशि – Amount

45 – मुफ़्त – बिना पैसे के – Free of cost

46 – गुरु – यहाँ अर्थ – बहुत चालाक – Expert / Mastermind

47 – तय होना – निश्चित होना – To be finalized

48 – हलवाई – मिठाई बनाने वाला – Confectioner

49 – जेल – कारागार – Prison

50 – तंग – संकरी – Narrow / Cramped

 

पाठ के स्मरणीय बिंदु

मुख्य पात्र – 

रसीला (ईमानदार पर मजबूर नौकर),

रमजान (सच्चा मित्र),

बाबू जगतसिंह (रिश्वतखोर इंजीनियर),

शेख सलीमुद्दीन (भ्रष्ट मजिस्ट्रेट)।

मुख घटना – रसीला द्वारा अठन्नी की चोरी और उसका पकड़ा जाना।

द्वंद्व – रसीला का अंतर्मन (धर्म न बिगाड़ने की सोच बनाम अठन्नी की मजबूरी)।

कटाक्ष – “अँधेर नगरी” – जहाँ रक्षक ही भक्षक हैं।

सजा – केवल 50 पैसे की हेराफेरी के लिए 6 महीने की जेल।

 

पात्र परिचय

  1. रसीला (मुख्य पात्र / नायक)

रसीला इस कहानी का केंद्रीय पात्र है, जो एक गरीब और ईमानदार नौकर है।

पद – वह इंजीनियर बाबू जगतसिंह के यहाँ ₹10 मासिक वेतन पर नौकर था।

चरित्र – वह स्वभाव से बहुत सीधा, परिश्रमी और ईमानदार है। उसने कई सालों तक जगतसिंह के यहाँ काम किया, लेकिन कभी एक पैसे की भी हेराफेरी नहीं की।

मजबूरी – गाँव में अपने बीमार बच्चों के इलाज के लिए उसने अठन्नी (50 पैसे) की चोरी की, जो उसके जीवन की पहली और आखिरी बड़ी गलती साबित हुई।

विशेषता – वह सत्यवादी है; अदालत में झूठ बोलने के बजाय वह अपना अपराध स्वीकार कर लेता है।

  1. रमजान (रसीला का मित्र)

रमजान जिला मजिस्ट्रेट शेख सलीमुद्दीन का चौकीदार है।

स्वभाव – वह एक सच्चा, संवेदनशील और दयालु मित्र है।

भूमिका – जब रसीला संकट में होता है, तो रमजान अपनी जमापूंजी से उसकी आर्थिक मदद करता है। वह रसीला के दुख को अपना दुख समझता है।

विचारधारा – कहानी के अंत में रमजान ही वह पात्र है जो समाज के ‘अंधेर’ और भ्रष्ट न्याय व्यवस्था पर कटाक्ष करता है। वह ‘गरीब के देवता’ के रूप में उभरता है।

  1. बाबू जगतसिंह (इंजीनियर)

यह पात्र समाज के उच्च और भ्रष्ट वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है।

व्यवसाय – वे एक सरकारी इंजीनियर हैं।

स्वभाव – वे अत्यंत कठोर, निर्दयी और कंजूस हैं। अपने वफादार नौकर का वेतन ₹1 भी नहीं बढ़ाते, लेकिन खुद छिपकर ₹500 जैसी बड़ी रिश्वत लेते हैं।

मानसिकता – वे छोटी सी चोरी के लिए रसीला को बेरहमी से पीटते हैं और पुलिस को रिश्वत देकर उसे कड़ी सजा दिलवाने का प्रयास करते हैं।

  1. शेख सलीमुद्दीन (जिला मजिस्ट्रेट)

शेख साहब कहानी के सबसे प्रभावशाली लेकिन पाखंडी पात्र हैं।

पद – वे एक जिला मजिस्ट्रेट हैं, जिनका काम न्याय करना है।

पाखंड – वे बाहर से बहुत ‘न्यायप्रिय’ और शरीफ दिखते हैं, लेकिन वास्तव में वे ₹1000 तक की रिश्वत लेते हैं।

न्याय – वे एक अठन्नी की चोरी के लिए रसीला को 6 महीने की कैद सुनाते हैं, जबकि वे खुद एक बड़े अपराधी हैं। उनके माध्यम से लेखक ने न्याय व्यवस्था के दोहरे चरित्र को दिखाया है।

संक्षिप्त प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर दीजिए-

(i) “अगर तुम्हें कोई ज़्यादा दे, तो अवश्य चले जाओ। मैं तनख्वाह नहीं बढ़ाऊँगा।”

(क) वक्ता कौन है? उसका परिचय दीजिए। उसने उपर्युक्त वाक्य किस संदर्भ में कहा है?

उत्तर – वक्ता – वक्ता बाबू जगतसिंह हैं। वे एक पेशेवर इंजीनियर हैं जो स्वभाव से कठोर और हृदयहीन हैं।

संदर्भ – रसीला द्वारा वेतन बढ़ाने की बार-बार की गई प्रार्थना के उत्तर में उन्होंने यह वाक्य कहा।

(ख) श्रोता कौन है? उसने तनख्वाह बढ़ाने की प्रार्थना क्यों की?

उत्तर- श्रोता रसीला है। उसने वेतन बढ़ाने की प्रार्थना की क्योंकि ₹10 में उसके परिवार पिता, पत्नी और तीन बच्चों का गुजारा नहीं हो पा रहा था।

(ग) वेतन न बढ़ने पर भी रसीला बाबू जगतसिंह की नौकरी क्यों नहीं छोड़ना चाहता था?

उत्तर- रसीला को यहाँ काम करते हुए कई साल बीत चुके थे। उसे डर था कि कहीं और ₹11-12 मिल भी जाएँ, पर यहाँ जैसा विश्वास और आदर शायद ही कहीं मिले।

(घ) रसीला को रुपयों की आवश्यकता क्यों थी? उसकी सहायता किसने की? सहायता करने वाले के संबंध में उसने क्या विचार किया?

उत्तर- रसीला के बच्चे बीमार थे और उनके इलाज के लिए उसे रुपयों की आवश्यकता थी। उसकी सहायता उसके मित्र रमजान जो पड़ोस के घर में चौकीदार था उसने अपनी जमापूँजी से की। रसीला ने सोचा कि बाबू साहब तो अमीर होकर भी पत्थर दिल हैं, जबकि रमजान गरीब होकर भी देवता है।

(ii) ‘बाबू साहब की मैंने इतनी सेवा की, पर दुख में उन्होंने साथ नहीं दिया।’

(क) बाबू साहब कौन थे? उनका परिचय दीजिए।

उत्तर- बाबू साहब इंजीनियर जगतसिंह थे। वे समाज के उच्च वर्ग के प्रतिनिधि हैं जो नौकरों के प्रति संवेदना नहीं रखते और अंदरूनी तौर पर रिश्वतखोर हैं।

(ख) वक्ता को कितना वेतन मिलता था? उसमें उसका गुज़ारा क्यों नहीं हो पाता था?

उत्तर- वक्ता अर्थात् रसीला को ₹10 वेतन मिलता था। उसके परिवार की जिम्मेदारी बड़ी थी जिसमें बुजुर्ग पिता, पत्नी और तीन बच्चे थे, इसलिए इस छोटी राशि में गुजारा असंभव था।

(ग) बाबू साहब द्वारा वक्ता का वेतन न बढ़ाए जाने पर भी वह कहीं और नौकरी क्यों नहीं करना चाहता था?

उत्तर- रसीला को अपने मालिक पर और मालिक को रसीला पर अटूट विश्वास था। वह नए स्थान पर जाने से डरता था क्योंकि वहाँ उसे ‘चोर’ या ‘संदिग्ध’ की नजर से देखा जा सकता था।

(घ) वक्ता की परेशानी को किसने, किस प्रकार हल किया? इससे उसके चरित्र की किस विशेषता का पता चलता है?

उत्तर- रसीला की परेशानी को रमजान ने अपनी कोठरी से रुपए लाकर हल किया। इससे रमजान के निस्वार्थ प्रेम, मानवता और सच्ची मित्रता का पता चलता है।

(iii) ‘बस पाँच सौ ! इतनी-सी रकम देकर आप मेरा अपमान कर रहे हैं।”हुज़ूर मान जाइए। आप समझें आपने मेरा काम मुफ़्त किया है।’

(क) वक्ता और श्रोता कौन-कौन हैं? उनके कथन का संदर्भ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- वक्ता बाबू जगतसिंह हैं और श्रोता वह व्यक्ति है जो उन्हें रिश्वत देने आया है। संदर्भ यह है कि जगतसिंह किसी काम के बदले ₹500 की रिश्वत को कम बताकर अपना अपमान मान रहे हैं।

(ख) रसीला उनकी बातचीत को सुनकर क्या समझ गया और क्या सोचने लगा?

उत्तर- रसीला समझ गया कि भीतर रिश्वत ली जा रही है। वह सोचने लगा कि अमीर लोग कितनी आसानी से रुपया कमा लेते हैं, जबकि उसे महीने भर की कड़ी मेहनत के बाद सिर्फ ₹10 मिलते हैं।

(ग) ‘आप मेरा अपमान कर रहे हैं।’ -कथन से वक्ता का क्या संकेत था? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- ‘अपमान’ शब्द से वक्ता का संकेत था कि उनका पद और काम बड़ा है, इसलिए रिश्वत की रकम भी बड़ी अर्थात् कम से कम ₹1000 होनी चाहिए।

(घ) उपर्युक्त पंक्तियों में समाज में व्याप्त किस बुराई की ओर संकेत किया गया है? इस बुराई का समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर- यहाँ समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी की बुराई की ओर संकेत है। इसका प्रभाव यह पड़ता है कि ईमानदार व्यक्ति पिसता है और अनैतिक लोग अमीर होते जाते हैं।

(iv) बस इतनी-सी बात ! हमारे शेख साहब तो उनके भी गुरु हैं।

(क) वक्ता और श्रोता कौन-कौन हैं? दोनों का परिचय दीजिए।

उत्तर- वक्ता रमजान है और श्रोता रसीला है। रमजान जिला मजिस्ट्रेट का चौकीदार है और रसीला इंजीनियर का नौकर। दोनों गहरे मित्र हैं।

(ख) ‘बस इतनी-सी बात’- पंक्ति का व्यंग्य स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- ‘बस इतनी-सी बात’ का व्यंग्य यह है कि ₹500 की रिश्वत रमजान की नजर में बहुत छोटी थी, क्योंकि उसके मालिक (शेख साहब) इससे कहीं बड़ी रकमें वसूलते थे।

(ग) ‘शेख साहब तो उनके भी गुरु हैं’- वाक्य में ‘शेख साहब’ और ‘उनके’ शब्दों का प्रयोग किस- किसके लिए किया गया है? ‘उनके भी गुरु हैं’- पंक्ति द्वारा क्या व्यंग्य किया गया है?

उत्तर- ‘शेख साहब’ शब्द मजिस्ट्रेट सलीमुद्दीन के लिए और ‘उनके’ शब्द इंजीनियर जगतसिंह के लिए प्रयुक्त है। ‘उनके भी गुरु हैं’ का अर्थ है कि शेख साहब रिश्वत लेने के मामले में इंजीनियर से भी अधिक माहिर और बड़े अपराधी हैं।

(घ) वक्ता ने ‘शेख साहब’ के संदर्भ में श्रोता से अपनी विवशता के संबंध में क्या-क्या कहा?

उत्तर- रमजान ने कहा कि वे लोग परिश्रम करने के बावजूद खाली हाथ रहते हैं, जबकि ये लोग ‘गुनाह’ (रिश्वत) की कमाई से बड़ी-बड़ी कोठियों में ऐश करते हैं।

(v) “भैया, गुनाह का फल मिलेगा या नहीं, यह तो भगवान जाने, पर ऐसी ही कमाई से कोठियों में रहते हैं और एक हम हैं कि परिश्रम करने पर भी हाथ में कुछ नहीं आता।”

(क) उपर्युक्त कथन किसने, किससे, कब और क्यों कहा है?

उत्तर- यह कथन रमजान ने रसीला से तब कहा जब रसीला ने उसे इंजीनियर साहब द्वारा रिश्वत लिए जाने की बात बताई। वह सामाजिक असमानता पर दुख प्रकट कर रहा था।

(ख) वक्ता का संकेत किस ‘गुनाह’ की ओर है? वह ‘गुनाह’ किसने किया था और कैसे?

उत्तर- वक्ता का संकेत रिश्वतखोरी की ओर है। यह गुनाह इंजीनियर जगतसिंह और शेख सलीमुद्दीन जैसे रसूखदार लोग चोरी-छिपे कर रहे थे।

(ग) ‘ऐसी ही कमाई’ द्वारा वक्ता समाज की किस बुराई पर क्या व्यंग्य कर रहा है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- ‘ऐसी ही कमाई’ से तात्पर्य अनैतिक और हराम की कमाई से है। व्यंग्य यह है कि समाज में जो जितना बड़ा अपराधी है, वह उतना ही अधिक सम्मानजनक जीवन वो भी बड़ी-बड़ी कोठियों में जीते हैं।

(घ) वक्ता की यह बात सुनकर श्रोता के मन में क्या विचार आए और क्यों?

उत्तर- वक्ता रमजान की यह बात सुनकर श्रोता रसीला के मन में विचार आया कि उसने आज तक कभी ईमानदारी नहीं छोड़ी, वरना वह भी बहुत पैसे बना सकता था। उसे अपनी ईमानदारी पर गर्व और व्यवस्था पर दुख हुआ।

(vi) ‘रसीला ने तुरंत अपना अपराध स्वीकार कर लिया। उसने कोई बहाना नहीं बनाया।’

(क) रसीला का मुकदमा किस की अदालत में पेश हुआ? उनका परिचय दीजिए।

उत्तर- रसीला का मुकदमा शेख सलीमुद्दीन की अदालत में पेश हुआ। वे जिला मजिस्ट्रेट थे, लेकिन स्वयं भ्रष्ट और रिश्वतखोर थे।

(ख) रसीला का क्या अपराध था? उसने उसे तुरंत स्वीकार कर लिया, इससे उसके चरित्र की किस

उत्तर- रसीला का अपराध अठन्नी अर्थात् 50 पैसे की हेराफेरी करना था। उसने इसे तुरंत स्वीकार कर लिया क्योंकि वह स्वभाव से ईमानदार और सत्यवादी था। उसे झूठ बोलकर अपना ‘धर्म’ नहीं बिगाड़ना था।

(ग) रसीला क्या-क्या बहाने बनाकर अपने को बेकसूर साबित कर सकता था, पर उसने ऐसा क्यों नहीं किया?

उत्तर- रसीला कह सकता था कि यह हलवाई की साजिश है या उसे फँसाया जा रहा है। उसने ऐसा इसलिए नहीं किया क्योंकि उसका अंतर्मन उसे और अधिक पाप करने से रोक रहा था।

(घ) रसीला को कितनी सजा हुई? न्याय-व्यवस्था पर टिप्पणी कीजिए।

उत्तर- रसीला को छह महीने की जेल हुई। यह न्याय-व्यवस्था पर एक बड़ा तमाचा है कि जहाँ हजारों के रिश्वतखोर न्याय कर रहे हैं, वहाँ एक अठन्नी के मजबूर चोर को कड़ी सजा दी गई।

 

(vii) ‘फ़ैसला सुनकर रमज़ान की आँखों में खून उतर आया।’

(क) रमज़ान कौन था? उसका परिचय दीजिए।

उत्तर- रमजान जिला मजिस्ट्रेट का चौकीदार और रसीला का सच्चा मित्र था। वह एक संवेदनशील और जागरूक इंसान था।

(ख) फ़ैसला किसने सुनाया था? उसकी चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तर- फैसला शेख सलीमुद्दीन ने सुनाया। वे ऊपर से न्यायप्रिय दिखते थे, लेकिन वास्तव में भ्रष्ट, हृदयहीन और पाखंडी थे।

(ग) फ़ैसला सुनकर रमज़ान क्या सोचने लगा?

उत्तर- फ़ैसला सुनकर रमजान सोचने लगा कि यह ‘न्याय नगरी’ नहीं बल्कि ‘अँधेर नगरी’ है। यहाँ अठन्नी का चोर जेल में है और हजारों की चोरी करनेवाले इंजीनियर और मजिस्ट्रेट महलों में मीठी नींद सो रहे हैं।

(घ) ‘बात अठन्नी की’ कहानी द्वारा लेखक ने क्या संदेश दिया है?

उत्तर- लेखक ने संदेश दिया है कि न्याय व्यवस्था अमीरों की दासी बन गई है। समाज में नैतिकता का पतन हो चुका है और ‘इंसाफ’ केवल एक दिखावा मात्र रह गया है।

 

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