ICSE, Class, IX and X, Sahitya Sagar, Chapter – Sakhi, Kabirdas, साखी, कबीरदास

कवि परिचय – कबीरदास

हिंदी के संत कवियों में कबीरदास का सर्वोच्च स्थान है। कबीर हिंदी की संत काव्यधारा की ज्ञानाश्रयी निर्गुण शाखा के प्रमुख कवि हैं। इनका जन्म संवत् 1455 (सन् 1398) को माना जाता है। इनकी मृत्यु के विषय में भी विवाद है, किंतु अधिकतर विद्वानों ने इसे सन् 1495 माना है।

कबीर ने प्रसिद्ध वैष्णव संत स्वामी रामानंद से दीक्षा ली। कुछ लोग इन्हें सूफी संत शेख तकी का शिष्य भी मानते हैं।

कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे। उनके पदों और साखियों में एक समाज- सुधारक का निर्भीक स्वर सुनाई पड़ता है। कबीर निर्गुण तथा निराकार ईश्वर के उपासक थे, इसीलिए इन्होंने मूर्ति पूजा, कर्मकांड तथा बाहरी आडंबरों का खुलकर विरोध किया। इन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता का नारा भी बुलंद किया तथा दोनों ही संप्रदायों में व्याप्त रूढ़ियों तथा धार्मिक-कुरीतियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई तथा राम रहीम की एकता में विश्वास पैदा करने का बीड़ा उठाया।

कबीर की वाणी का संग्रह- ‘बीजक’ नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग हैं- साखी, सबद और रमैनी।

संकलित साखियों (दोहों) में कबीर ने हमें विभिन्न प्रकार की सीख दी हैं। इनकी भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ या ‘पंचमेल खिचड़ी’ भाषा कहा जाता है।

साखी

  1. गुरु गोबिंद दोऊ खड़े काके लागू पायँ।

बलिहारी गुरु आपनो, जिन गोबिंद दियो बताय॥

  1. जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहि।

प्रेम गली अति साँकरी, तामे दो न समाहि॥

  1. काँकर’ पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय।

ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥

  1. पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहार।

ताते ये चाकी भली, पीस खाय संसार॥

  1. सात समंद की मसि करौं लेखनि सब बनराय।

सब धरती कागद करौं, हरि गुन लिखा न जाय॥

– कबीरदास

 

दोहों की सप्रसंग व्याख्या

  1. गुरु गोबिंद दोऊ खड़े काके लागू पायँ।

बलिहारी गुरु आपनो, जिन गोबिंद दियो बताय॥

 

प्रसंग: प्रस्तुत साखी में कबीर ने गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया है।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि यदि मेरे सामने गुरु और साक्षात् ईश्वर अर्थात् गोबिंद दोनों खड़े हों, तो मैं पहले किसके चरण स्पर्श करूँ? ऐसी स्थिति में मैं अपने गुरु पर बलिहारी अर्थात् न्योछावर हो जाता हूँ, क्योंकि गुरु ने ही अपनी शिक्षा के माध्यम से मुझे ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बताया है।

शब्दार्थ: दोऊ (Both – दोनों), काके (Whose – किसके), पायँ (Feet – चरण), बलिहारी (Sacrifice – न्योछावर), बताय (To show – बताया)।

सीख: गुरु का स्थान सर्वोपरि है क्योंकि वे ही ज्ञान के दाता हैं।

 

  1. जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहि।

प्रेम गली अति साँकरी, तामे दो न समाहि॥

प्रसंग: यहाँ कबीर अहंकार और भक्ति के संबंध को स्पष्ट कर रहे हैं।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि जब तक मेरे भीतर ‘मैं’ अर्थात् अहंकार था, तब तक हृदय में ईश्वर अर्थात् हरि का निवास नहीं था। अब जब मुझे ईश्वर मिल गए हैं, तो मेरा अहंकार मिट गया है। प्रेम की गली अत्यंत तंग होती है, इसमें अहंकार और ईश्वर दोनों एक साथ नहीं रह सकते।

शब्दार्थ: मैं (Ego – अहंकार), हरि (God – ईश्वर), साँकरी (Narrow – तंग), समाहि (To fit – समाना)।

सीख: ईश्वर को पाने के लिए अहंकार का त्याग अनिवार्य है।

 

  1. काँकर’ पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय।

ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय॥

प्रसंग: कबीर ने इस साखी में धार्मिक बाह्य आडंबरों अर्थात् दिखावे पर करारा व्यंग्य किया है।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि कंकड़ और पत्थर जोड़कर मस्जिद तो बना ली गई है, जिस पर चढ़कर मुल्ला ज़ोर से अज़ान देता है। कबीर पूछते हैं कि क्या खुदा बहरा हो गया है जो उसे पुकारने के लिए चिल्लाने की ज़रूरत है? वह तो अंतर्यामी है।

शब्दार्थ: काँकर (Pebbles – कंकड़), पाथर (Stones – पत्थर), बाँग (Call to prayer – अज़ान), खुदाय (God – ईश्वर)।

सीख: भक्ति मन से होनी चाहिए, दिखावे या शोर-शराबे से नहीं।

 

  1. पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहार।

ताते ये चाकी भली, पीस खाय संसार॥

प्रसंग: कबीर ने मूर्ति पूजा के अंधविश्वास पर चोट की है।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि यदि पत्थर पूजने से भगवान मिल जाते, तो मैं पूरे पहाड़ की पूजा कर लेता। पत्थर की उस मूर्ति से तो वह चक्की कहीं बेहतर है, जिससे पिसे हुए अनाज को खाकर सारा संसार अपनी भूख मिटाता है।

शब्दार्थ: पाहन (Stone – पत्थर), पहार (Mountain – पहाड़), चाकी (Grinding stone – चक्की), संसार (World – दुनिया)।

सीख: निर्जीव पत्थर की पूजा से बेहतर कर्मकांड और सेवा है।

 

  1. सात समंद की मसि करौं लेखनि सब बनराय।

सब धरती कागद करौं, हरि गुन लिखा न जाय॥

प्रसंग: ईश्वर या गुरु के अनंत गुणों का वर्णन।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि यदि मैं सातों समुद्रों के जल को स्याही बना लूँ, सारे वनों की लकड़ियों को कलम बना लूँ और पूरी धरती को कागज़ बना लूँ, तो भी ईश्वर या गुरु के अनंत गुणों का बखान करना असंभव है।

शब्दार्थ: समंद (Sea – समुद्र), मसि (Ink – स्याही), लेखनि (Pen – कलम), बनराय (Forests – जंगल), कागद (Paper – कागज़)।

सीख: ईश्वर की महिमा असीम और शब्दों से परे है।

साखियों पर आधारित प्रश्न

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

(i) गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागू पायँ।

बलिहारी गुरु आपनो, जिन गोबिंद दियौ बताय।।

(क) संत कबीर ने गुरु और ईश्वर की तुलना किस प्रकार की है तथा इस दोहे के माध्यम से क्या सीख दी है?

उत्तर- कबीर ने गुरु को ईश्वर से श्रेष्ठ बताया है। इस दोहे से सीख मिलती है कि गुरु ही वह माध्यम है जो अज्ञानता दूर कर हमें परमात्मा से मिलाता है।

(ख) ‘गुरु’ और ‘भगवान’ को अपने सामने पाकर कबीर के सामने कौन-सी समस्या उत्पन्न हुई? कबीर ने उसका हल किस प्रकार निकाला और क्यों?

उत्तर- कबीर के सामने यह समस्या उत्पन्न हुई कि गुरु और ईश्वर दोनों साथ खड़े हैं, तो पहले किसके पैर छुएँ? उन्होंने गुरु के चरण स्पर्श कर हल निकाला क्योंकि गुरु के बिना उन्हें ईश्वर का ज्ञान ही नहीं होता।

(ग) ‘बलिहारी गुरु आपनो’ कबीर ने ऐसा क्यों कहा है?

उत्तर- कबीर ने ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि गुरु ने स्वयं कष्ट उठाकर शिष्य को ज्ञान दिया और ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता दिखाया।

(घ) ‘गुरु गोबिंद दोऊ खड़े’ – शीर्षक साखी के आधार पर गुरु का महत्त्व प्रतिपादित कीजिए।

उत्तर- गुरु अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला मार्गदर्शक है। ईश्वर की प्राप्ति गुरु की कृपा के बिना संभव नहीं है, अतः गुरु का महत्त्व ईश्वर से भी अधिक है।

(ii) जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहि।

प्रेम गली अति साँकरी, तामे दो न समाहि।।

(क) ‘जब ‘मैं’ था तब हरि नहीं’- दोहे में ‘मैं’ शब्द का प्रयोग किस अर्थ में किया गया है? ‘जब था तब हरि नहीं’- पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- ‘मैं’ शब्द का प्रयोग ‘अहंकार’ के अर्थ में किया गया है। आशय यह है कि जब तक मनुष्य के मन में घमंड रहता है, वहाँ ईश्वर का वास नहीं हो सकता।

(ख) कबीर के अनुसार प्रेम की गली की क्या विशेषता है? प्रेम की गली में कौन-सी दो बातें एक साथ नहीं रह सकतीं और क्यों?

उत्तर- प्रेम की गली बहुत सँकरी है। इसमें ‘अहंकार’ और ‘ईश्वर’ साथ नहीं रह सकते क्योंकि अहंकार ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण में बाधक है।

(ग) उपर्युक्त साखी द्वारा कबीर क्या संदेश देना चाहते हैं?

उत्तर- कबीर संदेश देना चाहते हैं कि यदि परमात्मा को पाना है, तो अपने स्वार्थ और अहंकार को पूरी तरह मिटाना होगा।

(घ) ‘प्रेम गली अति साँकरी’ – पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- इसका अर्थ है कि भक्ति का मार्ग अत्यंत सूक्ष्म है, यहाँ केवल शुद्ध प्रेम रह सकता है, घमंड के लिए कोई स्थान नहीं है।

 

(iii) काँकर पाथर जोरि कै, मसजिद लई बनाय।

ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।।

(क) कबीरदास ने मसजिद की क्या-क्या विशेषताएँ बताई हैं?

उत्तर- कबीर ने बताया है कि मस्जिद कंकड़-पत्थरों से बनी एक भौतिक इमारत है, जिस पर मुल्ला चढ़कर ज़ोर से चिल्लाता है।

(ख) उपर्युक्त पंक्तियों में निहित व्यंग्य स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- व्यंग्य यह है कि ईश्वर बहरा नहीं है जो उसे चिल्लाकर बुलाया जाए; वह तो मनुष्य की धड़कन और खामोश प्रार्थना भी सुनता है।

(ग) उपर्युक्त दोहे के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि कबीर बाह्य आडंबरों के विरोधी थे।

उत्तर- कबीर बाह्य आडंबरों के विरोधी थे क्योंकि वे मानते थे कि ईश्वर को पाने के लिए किसी विशेष इमारत या शोर की नहीं, बल्कि शुद्ध मन की आवश्यकता है।

(घ) उपर्युक्त पंक्तियों द्वारा कबीर क्या संदेश देना चाहते हैं?

उत्तर- वे संदेश देते हैं कि धर्म के नाम पर दिखावा बंद करना चाहिए और ईश्वर की सत्ता को अपने भीतर खोजना चाहिए।

 

(iv) पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहार।

ताते ये चाकी भली, पीस खाय संसार।।

(क) कबीर हिंदुओं की मूर्ति पूजा पर किस प्रकार व्यंग्य कर रहे हैं?

उत्तर- कबीर व्यंग्य करते हैं कि यदि पत्थर में ही भगवान होते, तो पहाड़ पूजने से बहुत जल्दी मिल जाते। वे निर्जीव पूजा को व्यर्थ मानते हैं।

(ख) ‘ताते ये चाकी भली’- पंक्ति द्वारा कबीर क्या कहना चाहते हैं?

उत्तर- कबीर कहना चाहते हैं कि पत्थर की उस मूरत से चक्की श्रेष्ठ है क्योंकि वह लोगों का पेट भरने के काम आती है। अर्थात् कर्म प्रधान है।

(ग) ‘कबीर एक समाज सुधारक थे’- उपर्युक्त पंक्तियों के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए तथा बताइए कि हर पंक्तियों द्वारा वे क्या संदेश दे रहे हैं?

उत्तर- कबीर ने समाज में व्याप्त अंधविश्वासों पर प्रहार किया। वे संदेश देते हैं कि लोक-कल्याण और व्यावहारिक उपयोगिता, पत्थर की जड़ पूजा से कहीं बढ़कर है।

(घ) कबीर की भाषा पर टिप्पणी कीजिए।

उत्तर- कबीर की भाषा ‘सधुक्कड़ी’ या ‘खिचड़ी’ भाषा है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, पंजाबी और अरबी-फ़ारसी के शब्दों का सहज मिश्रण है। यह भाषा आम आदमी के करीब है।

 

(v) सब धरती कागद करौं लेखनि सव वनराय।

सात समंद की मसि करौं गुरु गुन लिखा न जाय।।

(क) ‘गुरु के गुण अनंत हैं’- कबीर ने यह बात किस प्रकार स्पष्ट की है?

उत्तर- कबीर ने गुरु के गुणों को लिखने के लिए पूरी पृथ्वी, सातों समुद्र और समस्त वनों को भी कम बताकर उनकी अनंतता स्पष्ट की है।

(ख) कबीर की भक्ति भावना पर प्रकाश डालिए।

उत्तर- कबीर की भक्ति अनन्य और पूर्ण समर्पण वाली है। वे ईश्वर को निराकार मानते हैं और उनकी महिमा को अवर्णनीय अर्थात् जिसका वर्णन न किया जा सके, ऐसा मानते हैं।

(ग) कबीर ने भगवान के गुणों का बखान करने के लिए किन-किन वस्तुओं की कल्पना की है? वे इस कार्य के लिए पर्याप्त क्यों नहीं हैं?

उत्तर- उन्होंने धरती को कागज़, जंगल को कलम और समुद्र को स्याही की कल्पना की है। ये पर्याप्त नहीं हैं क्योंकि ईश्वर की महिमा असीम है और ये वस्तुएँ सीमित हैं।

(घ) ‘लेखनि सब बनराय’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- इसका अर्थ है—”सारे वनों की लकड़ियों को कलम बना लूँ।”

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