ICSE, Class, IX and X, Sahitya Sagar, Chapter – Giridhar Ki Kundaliyan, Giridhar Kaviray, गिरिधर की कुंडलियाँ, गिरिधर कविराय

कवि परिचय गिरिधर कविराय

गिरिधर कविराय के जीवन के बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। श्री शिव सिंह ने उनका जन्म संवत् 1770 दिया है। उनका कविता – काल संवत् 1800 के उपरांत ही माना जा सकता है।

गिरिधर कवि ने नीति, वैराग्य और अध्यात्म को ही अपनी कविता का विषय बनाया है। जीवन के व्यावहारिक पक्ष का इनके काव्य में प्रभावशाली वर्णन मिलता है जिसकी पैठ जनमानस में बहुत गहरी है। इसीलिए इनकी नीति-संबंधी कुंडलियाँ जनमानस में बहुत लोकप्रिय हैं। इस लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण है बिल्कुल सरल, सहज, व्यावहारिक तथा सीधी-सादी भाषा में गंभीर तथा नीति परक तथ्यों का कथन। कुंडलियों में ही इन्होंने अपने समस्त काव्य की रचना की।

गिरिधर कविराय ग्रंथावली में इनकी पाँच सौ से अधिक कुंडलियाँ संकलित हैं।

 

कुंडलियाँ

लाठी में गुण बहुत हैं, सदा राखिये संग।

गहरि, नदी, नारी जहाँ, तहाँ बचावै अंग॥

तहाँ बचावे अंग, झपटि कुत्ता कहँ मारै।

दुश्मन दावागीर, होयँ तिनहूँ को झारै॥

कह ‘गिरिधर कविराय’ सुनो हो धूर के बाठी॥

सब हथियार न छाँड़ि, हाथ महँ लीजै लाठी॥1॥

कमरी’ थोरे दाम की, बहुतै आवै काम।

खासा मलमल वाफ्ता, उनकर राखै मान॥

उनकर राखै मान, बँद जहँ आड़े आवै॥

बकुचा बाँधे मोट, राति को झारि बिछावै॥

कह ‘गिरिधर कविराय’, मिलत है थोरे दमरी।

सब दिन राखै साथ, बड़ी मर्यादा कमरी॥2॥

गुन के गाहक सहस नर बिन गुन लहै न कोय।

जैसे कागा कोकिला, शब्द सुनै सब कोय॥

शब्द सुनै सब कोय, कोकिला सबै सुहावन।

दोऊ को एक रंग, काग सब भये अपावन।

कह ‘गिरिधर कविराय’, सुनो हो ठाकुर मन के॥

बिनु गुन लहै न कोय, सहस नर गाहक गुन के॥3॥

साँई सब संसार में, मतलब का व्यवहार।

जब लग पैसा गाँठ में, तब लग ताको यार॥

तब लग ताको यार, यार संग ही संग डोले।

पैसा रहे न पास, यार मुख से नहिं बोले॥

कह ‘गिरिधर कविराय’ जगत यहि लेखा भाई।

करत बेगरजी प्रीति, यार बिरला कोई साँई॥4॥

रहिए लटपट काटि दिन, बरु घामे माँ सोय।

छाँह न बाकी बैठिये, जो तरु पतरो होय॥

जो तरु पतारे होय, एक दिन धोखा दे हैं।

जा दिन है बयारि, टूटि तब जर से जैहैं॥  

कह ‘गिरिधर कविराय’ छाँह मोटे की गहिए।

पाती’ सब झरि जायँ, तऊ छाया में रहिए॥5॥  

पानी बाढ़ नाव में, घर में बाढ़े दाम।

दोऊ हाथ उलीचिए, यही सयानो काम॥

यही सयानो काम, राम को सुमिरन कीजै।

पर-स्वारथ के काज, शीश आगे धर दीजै॥

कह ‘गिरिधर कविराय’, बड़ेन की याही बानी।

चलिए चाल सुचाल, राखिए अपना पानी॥6॥

राजा के दरबार में, जैये समया पाय।

साँई तहाँ न बैठिये, जहँ कोउ देय उठाय॥

जहँ कोउ देय-उठाय, बोल अनबोले रहिए।

हँसिये नहीं हहाय, बात पूछे ते कहिए॥

कह ‘गिरिधर कविराय’ समय सों कीजै काजा।

अति आतुर नहिं होय, बहुरि अनखैहैं राजा॥ 7॥

गिरिधर कविराय

 

कुंडलियाँ – 01

लाठी में गुण बहुत हैं, सदा राखिये संग।

गहरि, नदी, नारी जहाँ, तहाँ बचावै अंग॥

तहाँ बचावे अंग, झपटि कुत्ता कहँ मारै।

दुश्मन दावागीर, होयँ तिनहूँ को झारै॥

कह ‘गिरिधर कविराय’ सुनो हो धूर के बाठी॥

सब हथियार न छाँड़ि, हाथ महँ लीजै लाठी॥1॥

व्याख्या – कवि गिरधर कहते हैं कि लाठी में बहुत गुण होते हैं, इसे सदा अपने पास रखना चाहिए। यह गहरी नदी या नाले को पार करने में सहारा देती है, कुत्ता झपटे तो उसे मारने के काम आती है और यदि कोई दुश्मन हमला करे तो लाठी के के प्रयोग से उसपर जीत हासिल की जा सकती है। इसलिए कवि गिरधर कहते हैं कि धूल पर चलने वाले लोगों सुनो सब हथियार छोड़कर  हाथ में लाठी धरण करो।

शब्दार्थ – नारी (Stream/गड्ढा – नली), दावागीर (Enemy/Opponent – दुश्मन), तिनहूँ (Them – उन्हें), झारै (Beat/Dust off – झाड़ देना)।

सीख – छोटी और साधारण दिखने वाली चीज़ भी मुसीबत में बहुत काम आती है।

 

कुंडलियाँ – 02

कमरी थोरे दाम की, बहुतै आवै काम।

खासा मलमल वाफ्ता, उनकर राखै मान॥

उनकर राखै मान, बँद जहँ आड़े आवै॥

बकुचा बाँधे मोट, राति को झारि बिछावै॥

कह ‘गिरिधर कविराय’, मिलत है थोरे दमरी।

सब दिन राखै साथ, बड़ी मर्यादा कमरी॥2॥

व्याख्या – कमरी अर्थात् कंबल सस्ते दाम में मिलती है पर इसके काम बहुत हैं। यह कीमती कपड़ों जैसे मखमल और वाफ्ता आदि को ढँककर उनकी रक्षा करती है। इसमें सामान बाँधकर मोटी गठरी बनाई जा सकती है और रात को इसे झाड़कर बिछाया भी जा सकता है और उस पर सोया भी जा सकता है। इसलिए कवि गिरधर कर रहे हैं कि कम दमरी अर्थात् कीमत में मिलने वाले इस कंबल को सदा अपने पास रखना चाहिए। 

शब्दार्थ – कमरी (Blanket – कंबल), खासा/मलमल (Expensive cloth – कीमती कपड़ा), बकुचा (Bundle – छोटी गठरी), मर्यादा (Value/Respect – मान)।

सीख – वस्तु की कीमत से अधिक उसकी उपयोगिता महत्त्वपूर्ण होती है।

 

कुंडलियाँ – 03

गुन के गाहक सहस नर बिन गुन लहै न कोय।

जैसे कागा कोकिला, शब्द सुनै सब कोय॥

शब्द सुनै सब कोय, कोकिला सबै सुहावन।

दोऊ को एक रंग, काग सब भये अपावन।

कह ‘गिरिधर कविराय‘, सुनो हो ठाकुर मन के॥

बिनु गुन लहै न कोय, सहस नर गाहक गुन के॥3॥

 

व्याख्या – कवि गिरधर कहते हैं कि संसार में गुणों की ही पूजा होती है। जिस प्रकार कौआ और कोयल दोनों का रंग काला होता है, पर कोयल की मीठी वाणी के कारण उसे सब पसंद करते हैं और कौआ अपनी कर्कश आवाज़ के कारण अपवित्र माना जाता है। अतः, हमें गुणों को अपने अंदर समाहित करना चाहिए ताकि लोग हमारी प्रशंसा करें। 

शब्दार्थ – गाहक (Customer/Seeker – प्रशंसक), कोकिला (Cuckoo – कोयल), सुहावन (Pleasant – अच्छा लगना), अपावन (Impure – अपवित्र)।

सीख – रंग-रूप से अधिक मनुष्य का गुण और वाणी मायने रखती है।

 

कुंडलियाँ – 04

साँई सब संसार में, मतलब का व्यवहार।

जब लग पैसा गाँठ में, तब लग ताको यार॥

तब लग ताको यार, यार संग ही संग डोले।

पैसा रहे न पास, यार मुख से नहिं बोले॥

कह ‘गिरिधर कविराय’ जगत यहि लेखा भाई।

करत बेगरजी प्रीति, यार बिरला कोई साँई॥4॥

व्याख्या – कवि गिरधर कहते हैं कि संसार में मित्रता अक्सर मतलब की होती है। जब तक आपके पास पैसा है, मित्र साथ घूमेंगे, पर पैसा खत्म होते ही वे बात करना भी छोड़ देते हैं। निःस्वार्थ प्रेम करने वाले बहुत कम होते हैं।

शब्दार्थ – साँई (Master/God – मित्र/ईश्वर), गाँठ (Pocket – जेब), बेगरजी (Unselfish – निःस्वार्थ), बिरला (Rare – दुर्लभ)।

सीख – हमें सच्चे और झूठे मित्र की पहचान होनी चाहिए।

 

कुंडलियाँ – 05

रहिए लटपट काटि दिन, बरु घामे माँ सोय।

छाँह न बाकी बैठिये, जो तरु पतरो होय॥

जो तरु पतारे होय, एक दिन धोखा दे हैं।

जा दिन है बयारि, टूटि तब जर से जैहैं॥  

कह ‘गिरिधर कविराय‘ छाँह मोटे की गहिए।

पाती सब झरि जायँ, तऊ छाया में रहिए॥5॥  

 

व्याख्या – कवि गिरधर कहते हैं कि भले ही गर्मी के मौसम में धूप में ही क्यों न बैठना पड़े पर पतले पेड़ की छाया में नहीं बैठना चाहिए क्योंकि तेज़ हवा चलने पर वह जड़ से उखड़ सकता है। हमेशा मज़बूत और मोटे तने वाले पेड़ का सहारा लेना चाहिए, भले ही उसके पत्ते झड़ जाएँ, पर उसकी टहनियाँ सुरक्षा देती हैं।

शब्दार्थ – लटपट – कठिनाई या अस्त-व्यस्त स्थिति में – Struggling / In a difficult state, काटि – बिताना (समय के संदर्भ में) – To spend / Pass (time), बरु – चाहे / भले ही – Rather / Even if, घामे – धूप में – In the sunshine / Heat, सोय – सो जाना – To sleep, छाँह – छाया – Shade / Shadow, तरु – पेड़ / वृक्ष – Tree, पतरो / पतारे – पतला या कमज़ोर – Thin / Weak, धोखा – छल / विश्वासघात – Deception / Betrayal, बयारि – तेज़ हवा / आँधी – Strong wind / Gale, जर – जड़ (मूल) – Root, जैहैं – जाएगा – Will go / Will happen, गहिए – पकड़ना या आश्रय लेना – To hold / To take refuge, पाती – पत्ते – Leaves, झरि जायँ – झड़ जाना / गिर जाना – To shed / To fall off, तऊ – फिर भी / तब भी – Still / Even then

 

सीख – सामर्थ्यवान और अनुभवी व्यक्ति का ही आश्रय लेना चाहिए।

 

कुंडलियाँ – 06

पानी बाढ़ नाव में, घर में बाढ़े दाम।

दोऊ हाथ उलीचिए, यही सयानो काम॥

यही सयानो काम, राम को सुमिरन कीजै।

पर-स्वारथ के काज, शीश आगे धर दीजै॥

कह ‘गिरिधर कविराय’, बड़ेन की याही बानी।

चलिए चाल सुचाल, राखिए अपना पानी॥6॥

व्याख्या – यदि नाव में पानी बढ़ जाए या घर में धन बढ़ जाए, तो उसे दोनों हाथों से बाहर निकाल देना चाहिए अर्थात् दान कर देना ही समझदारी है। कवि गिरधर कहते हैं कि ईश्वर का नाम लें और परोपकार के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार रहें। इस तरह से ही अप अपनी इज्ज़त को बरकरार बनाए रख सकते हैं।

शब्दार्थ – उलीचिए (To throw water out – बाहर फेंकना), सयानो (Wise – समझदार), पर-स्वारथ (Others’ welfare – परोपकार), पानी (Honor – इज्जत)।

सीख – धन का सदुपयोग दान और सेवा में है।

 

कुंडलियाँ – 07

राजा के दरबार में, जैये समया पाय।

साँई तहाँ न बैठिये, जहँ कोउ देय उठाय॥

जहँ कोउ देय-उठाय, बोल अनबोले रहिए।

हँसिये नहीं हहाय, बात पूछे ते कहिए॥

कह ‘गिरिधर कविराय’ समय सों कीजै काजा।

अति आतुर नहिं होय, बहुरि अनखैहैं राजा॥ 7॥

व्याख्या – कवि गिरधर कहते हैं कि दरबार में सही समय पर जाना चाहिए। ऐसी जगह न बैठें जहाँ से कोई उठा दे। वहाँ चुप रहें, जब पूछा जाए तभी बोलें और अकारण ज़ोर से न हँसें। उतावलापन दिखाने से राजा क्रोधित हो सकते हैं। अतः हमें राज-दरबार की मर्यादा का पालन करना चाहिए।

शब्दार्थ – अनखैहैं (Get angry – क्रोधित होना), आतुर (Impatient – उतावला), हहाय (Loudly – ज़ोर-ज़ोर से)।

सीख – उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों के सामने शिष्टाचार का पालन करना चाहिए।

कुंडलियों पर आधारित प्रश्न

लाठी में गुण बहुत हैं, सदा राखिये संग।

गहरि, नदी, नारी जहाँ, तहाँ बचावै अंग॥

तहाँ बचावे अंग, झपटि कुत्ता कहँ मारै।

दुश्मन दावागीर, होयँ तिनहूँ को झारै॥

कह ‘गिरिधर कविराय’ सुनो हो धूर के बाठी॥

सब हथियार न छाँड़ि, हाथ महँ लीजै लाठी॥1॥

(क) गिरिधर कविराय ने लाठी के किन-किन गुणों की ओर संकेत किया है?

उत्तर- कवि ने लाठी के गुणों की ओर संकेत करते हुए कहा है कि यह नदी-नाले पार करने में सहायक है, कुत्तों से रक्षा करती है और दुश्मनों को धूल चटाती है।

(ख) लाठी हमारी किन-किन स्थितियों में सहायता करती है?

उत्तर- लाठी गहरी नदी में संतुलन बनाने, हिंसक पशुओं से बचने और शत्रु द्वारा किए गए आक्रमण का जवाब देने में सहायता करती है।

(ग) कवि सब हथियारों को छोड़कर अपने साथ लाठी रखने की बात कह रहे हैं। क्या आप उनकी बात से सहमत हैं? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- हाँ, तत्कालीन समय के अनुसार यह सही था क्योंकि लाठी एक सुलभ और बहुउद्देशीय सुरक्षा साधन थी। आज के संदर्भ में इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति को अपनी सुरक्षा के प्रति हमेशा सचेत रहना चाहिए।

(घ) शब्दार्थ लिखिए-

नारी, दावागीर, तिनहूँ, छाँड़ि

उत्तर- नारी – नाली/छोटा गड्ढा; दावागीर – शत्रु; तिनहूँ – उन्हें; छाँड़ि – छोड़कर।

(ii) कमरी थोरे दाम की, बहुतै आवै काम।

खासा मलमल वाफ्ता, उनकर राखै मान॥

उनकर राखै मान, बँद जहँ आड़े आवै।

बकुचा बाँधे मोट, राति को झारि बिछावै॥

कह ‘गिरिधर कविराय’, मिलत है थोरे दमरी।

सब दिन राखै साथ, बड़ी मर्यादा कमरी॥  

(क) छोटी-सी कमरी हमारे किस-किस काम आ सकती है?

उत्तर- छोटी-सी कमरी ओढ़ने, बिछाने और कीमती कपड़ों को धूल-मिट्टी से बचाने के काम आती है।

(ख) गिरिधर कविराय के अनुसार कमरी में कौन-कौन-सी विशेषताएँ होती हैं?

उत्तर- गिरिधर कविराय के अनुसार कमरी सस्ती होती है, हल्की होती है और यात्रा के दौरान सामान बाँधने के लिए गठरी का काम भी करती है।

(ग) ‘बकुचा बाँधे मोट, राति को झारि बिछावै’- पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- इसका आशय है कि कंबल में भारी सामान बाँधकर यात्रा की जा सकती है और रात को उसे झाड़कर बिछाया जा सकता है।

(घ) ‘खासा मलमल वाफ़्ता, उनकर राखै मान’ – पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहते हैं?

उत्तर- कवि कहना चाहते हैं कि कीमती कपड़ों को कमरी में लपेटकर रखने से उनका मान सुरक्षित रहता है अर्थात् वे खराब नहीं होते।

 

(iii) गुन के गाहक सहस नर, बिन गुन लहै न कोय।

जैसे कागा कोकिला, शब्द सुनै सब कोय॥

शब्द सुनै सब कोय, कोकिला सबै सुहावन।

दोऊ को एक रंग, काग सब भए अपावन॥

कह ‘गिरिधर कविराय’ सुनो हो ठाकुर मन के।

बिनु गुन लहै न कोय, सहस नर गाहक गुन के॥  

(क) ‘गुन के गाहक सहस नर’ को स्पष्ट करने के लिए कविराय ने कौन-सा उदाहरण दिया और क्यों?

उत्तर- कवि ने कौआ और कोयल का उदाहरण दिया है क्योंकि दोनों का रंग काला होने के बावजूद गुणों अर्थात् अपनी-अपनी वाणी के कारण कोयल का सम्मान होता है और कौआ तिरस्कृत।

(ख) कागा और कोकिला में कौन-सी बात समान है और कौन-सी असमान? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- कागा और कोकिला, दोनों का रंग एक जैसा अर्थात् काला होता है और असमानता की बात करें तो  कोयल की आवाज़ मीठी है, जबकि कौवे की आवाज़ कर्कश होती है।

(ग) ‘बिनु गुन लहै न कोय, सहस नर गाहक गुन के’ – पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- इसका भाव है कि समाज में हज़ारों लोग गुणों के प्रशंसक हैं। बिना गुणों के व्यक्ति को कोई महत्त्व नहीं मिलता।

(घ) उपर्युक्त कुंडलियाँ का केंद्रीय भाव स्पष्ट कीजिए तथा बताइए कि इस कुंडलियाँ द्वारा क्या संदेश दिया गया है?

उत्तर- उपर्युक्त कुंडलियाँ का केंद्रीय भाव गुणों की महत्ता की कद्र करना है। इसमें हमें यह संदेश दिया गया है कि हमें अपने स्वभाव और गुणों को निखारना चाहिए क्योंकि बाहरी रूप से अधिक आंतरिक गुण पूजे जाते हैं।

 

(iv) साँई सब संसार में, मतलब का व्यवहार।

जब लग पैसा गाँठ में, तब लग ताको यार॥

तब लग ताको यार, यार संग ही संग डोले।

पैसा रहे न पास, यार मुख से नहिं बोले॥

कह ‘गिरिधर कविराय’ जगत यहि लेखा भाई।

करत बेगरजी प्रीति, यार बिरला कोई साँई।

(क) कवि के अनुसार इस संसार में किस प्रकार का व्यवहार प्रचलित है?

उत्तर- कवि के अनुसार इस संसार में स्वार्थ और मतलब का व्यवहार प्रचलित है। लोग लाभ देखकर ही मित्रता करते हैं।

(ख) ‘साँई सब संसार में’- शीर्षक कुंडलियाँ से मिलने वाले संदेश पर प्रकाश डालिए।

उत्तर- ‘साँई सब संसार में’- शीर्षक कुंडलियाँ से मिलने वाला संदेश यह है कि धन के लालच में की गई मित्रता सच्ची नहीं होती। हमें संकट के समय साथ देने वाले निस्वार्थ मित्र की पहचान करनी चाहिए।

(ग) उपर्युक्त कुंडलियाँ में सच्चे एवं झूठे मित्र की क्या पहचान बताई गई है?

उत्तर- उपर्युक्त कुंडलियाँ में झूठा मित्र धन होने पर साथ रहता है, धन न होने पर मुँह फेर लेता है। सच्चा मित्र निःस्वार्थ भाव से प्रेम और सहयोग करता है।

(घ) उपर्युक्त कुंडलियाँ का प्रतिपाद्य लिखिए।

उत्तर- उपर्युक्त कुंडलियाँ का प्रतिपाद्य संसार की स्वार्थपरता का चित्रण और सच्चे मानवीय संबंधों की दुर्लभता को दर्शाना है।

(v) रहिए लटपट काटि दिन, बरु घामे माँ सोय।

छाँह न बाकी बैठिये, जो तरु पतरो होय॥

जो तरु पतरो होय, एक दिन धोखा देहैं।

जा दिन बहै बयारि, टूटि तब जर से जैहैं।

कह ‘गिरिधर कविराय’, छाँह मोटे की गहिए।

पाती सब झरि जायँ, तऊ छाया में रहिए॥

(क) कवि के अनुसार हमें किस प्रकार के पेड़ की छाया में नहीं बैठना चाहिए और क्यों?

उत्तर- कवि के अनुसार हमें पतले पेड़ की छाया में नहीं बैठना चाहिए क्योंकि वह तेज़ हवा में टूटकर गिर सकता है और जान-माल का नुकसान पहुँचा सकता है।

(ख) ‘छाँह मोटे की गहिए’- पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहते हैं?

उत्तर- कवि कहना चाहते हैं कि हमेशा सामर्थ्यवान और शक्तिशाली व्यक्ति का आश्रय लेना चाहिए जो मुसीबत में हमें सुरक्षा दे सके।

(ग) उपर्युक्त कुंडलियाँ द्वारा कवि क्या संदेश दे रहे हैं?

उत्तर- उपर्युक्त कुंडलियाँ द्वारा कवि संदेश दे रहे हैं कि आधार या सहारा हमेशा मज़बूत और विश्वसनीय होना चाहिए।

(घ) कवि के अनुसार एक दिन कौन धोखा देगा तथा कब? उससे बचने के लिए हमें क्या करना चाहिए?

उत्तर- कवि के अनुसार एक दिन पतला पेड़ धोखा देगा जब तेज़ हवा चलेगी। इससे बचने के लिए हमें मज़बूत अर्थात् मोटे पेड़ या अनुभवी व्यक्ति का साथ चुनना चाहिए।

(vi) पानी बाढ़ नाव में, घर में बाढ़े दाम।

दोऊ हाथ उलीचिए, यही सयानो काम॥  

यही सयानो काम, राम को सुमिरन कीजै।

पर स्वारथ के काज, शीश आगे धर दीजै॥  

कह ‘गिरिधर कविराय, ‘ बड़ेन की याही बानी।

चलिए चाल सुचाल, राखिए अपना पानी॥  

(क) ‘दोऊ हाथ उलीचिए, यही सयानो काम’ – पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- भाव यह है कि जैसे नाव को डूबने से बचाने के लिए पानी बाहर फेंकना ज़रूरी है, वैसे ही घर की सुख-शांति के लिए बढ़े हुए अतिरिक्त धन का दान करना समझदारी है।

(ख) ‘पर-स्वारथ के काज, शीश आगे धर दीजै’- पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- इसका आशय है कि दूसरों के हित के लिए यदि प्राणों की बाजी भी लगानी पड़े, तो पीछे नहीं हटना चाहिए।

(ग) उपर्युक्त कुंडलियाँ में ‘बड़ों की किस वाणी’ की चर्चा की गई है तथा क्यों?

उत्तर- बड़ों की वाणी यह है कि मनुष्य को सदैव सुमार्ग पर चलना चाहिए और अपनी प्रतिष्ठा अर्थात् पानी को बचाकर रखना चाहिए।

(घ) उपर्युक्त कुंडलियाँ का प्रतिपाद्य लिखिए।

उत्तर- उपर्युक्त कुंडलियाँ का प्रतिपाद्य परोपकार, त्याग और मर्यादापूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देना है।

(vii) राजा के दरबार में, जैये समया पाय।

साँई तहाँ न बैठिये, जहँ कोउ देय उठाय॥  

जहँ कोड देय उठाय, बोल अनबोले रहिए।

हँसिए नहि हहाय, बात पूछे ते कहिए॥  

कह ‘गिरिधर कविराय’ समय सों कीजै काजा।

अति आतुर नहिं होय, बहुरि अनखैहैं राजा॥  

(क) राजा के दरबार में कब जाना चाहिए, कहाँ नहीं बैठना चाहिए और क्यों?

उत्तर- राजा के दरबार में उचित अवसर या निमंत्रण मिलने पर जाना चाहिए। ऐसी जगह नहीं बैठना चाहिए जहाँ से कोई अपमानित करके उठा दे क्योंकि इससे प्रतिष्ठा कम होती है।

(ख) कवि ने दरबार में कब बोलने और कब न बोलने की सलाह दी है?

उत्तर- कवि के अनुसार दरबार में तभी बोलना चाहिए जब पूछा जाए और बिना बात के बीच में नहीं बोलना चाहिए।

(ग) ‘हँसिए नहीं हहाय, बात पूछे ते कहिए’- पंक्ति द्वारा कवि क्या स्पष्ट करना चाहते हैं

उत्तर- कवि स्पष्ट करना चाहते हैं कि गंभीर सभाओं में अकारण ठहाके मारना असभ्यता है। केवल संतुलित और मर्यादित व्यवहार ही शोभा देता है।

(घ) उपर्युक्त कुंडलियाँ से क्या शिक्षा मिलती है?

उत्तर- उपर्युक्त कुंडलियाँ से समय की पहचान और शिष्टाचारपूर्ण व्यवहार ही व्यक्ति को समाज और शासन में सम्मान दिलाता है।

 

 

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