सूरदास
हिंदी की कृष्ण भक्ति शाखा के कवियों में सूरदास का नाम सर्वोपरि है। सूरदास का जन्म सन् 1478 में मथुरा के निकट सनकता या रेणुका क्षेत्र में माना जाता है।
सूरदास महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य थे। इनका निधन पारसौली में सन् 1583 में माना जाता है। कुछ लोगों का मानना है कि सूरदास जन्मांध थे।
सूरदास के तीन ग्रंथों-‘सूरसागर’, ‘साहित्य लहरी’ और ‘सूर सारावली’ में सूरसागर सर्वाधिक प्रसिद्ध है जिसका आधार ‘श्रीमद्भावगत’ है।
सूरदास ने अपनी रचनाओं में कृष्ण की विविध लीलाओं का वर्णन किया है। सूरदास वात्सल्य रस के सम्राट माने जाते हैं।
सूरदास ने ब्रज की लोक प्रचलित भाषा को अपनी रचनाओं का आधार बनाया।
जसोदा हरि पालने झुलावै।
हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ सोइ कछु गावै॥
मेरे लाल को आउ निंदरिया, काहे न आनि सुवावै।
तू काहे नहिं बेगहिं आवै, तोको कान्ह बुलावै।
कबहुँ पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै।
सोवत जानि मौन है कै रहि, करि करि सैन बतावै॥
इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरै गावै।
जो सुख ‘सूर’ अमर मुनि दुरलभ, सो नंद भामिनी पावै॥
खीजत जात माखन खात।
अरुण लोचन, भौंह टेढ़ी, बार-बार जम्हात॥
कबहुँ रुनझुन, चलत घुटुरन, धूर धूसर गात।
कबहुँ झुक कें अलक खेंचत, नैन जल भर लात॥
कबहुँ तुतरे बोल बोलत, कबहुँ बोलत तात।
‘सूर’ हरि की निरखि सोभा, निमिख तजत न मात॥
मैया मेरी, चंद्र खिलौना लैहौं।
धौरी को पय पान न करिहौं, बेनी सिर न गुथैहौं।
मोतिन माल न धरिहौं उर पर, झंगुली कंठ न लैहौं॥
जैहों लोट अबहिं धरनी पर, तेरी गोद न ऐहौं।
लाल कहौं नंद बाबा को, तेरो सुत न कहैहौं।
कान लाय कछु कहत जसोदा, दाउहिं नाहिं सुनैहौं।
चंदा हूँ ते अति सुंदर तोहिं, नवल दुलहिया ब्यैहौं।
तेरी सौं मेरी सुन मैया, अबहीं ब्याहन जैहौं।
‘सूरदास’ सब सखा बराती, नूतन मंगल गैहौं॥
सूरदास
पदों की सप्रसंग व्याख्या
01
जसोदा हरि पालने झुलावै।
हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ सोइ कछु गावै॥
मेरे लाल को आउ निंदरिया, काहे न आनि सुवावै।
तू काहे नहिं बेगहिं आवै, तोको कान्ह बुलावै।
कबहुँ पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै।
सोवत जानि मौन है कै रहि, करि करि सैन बतावै॥
इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरै गावै।
जो सुख ‘सूर’ अमर मुनि दुरलभ, सो नंद भामिनी पावै॥
संदर्भ –
यह पद सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। इसमें माता यशोदा द्वारा बालक कृष्ण को सुलाने का वर्णन है।
प्रसंग –
यशोदा माँ कान्हा को पालने में झुलाते हुए लोरी गा रही हैं और नींद को बुला रही हैं।
व्याख्या –
यशोदा माता बालक कृष्ण को पालने में झुला रही हैं। वे कभी पालने को हिलाती हैं, कभी प्यार करती हैं, कभी पुचकारती हैं और जो मन में आता है, वही गुनगुनाने लगती हैं। वे नींद को उलाहना देते हुए कहती हैं— “अरी निंदिया! तू मेरे लाल के पास क्यों नहीं आती? तू आकर इसे सुलाती क्यों नहीं? तू जल्दी क्यों नहीं आती, तुझे कान्हा बुला रहा है।”
इसी बीच कृष्ण कभी अपनी पलकें मूँद लेते हैं और कभी सो जाने के अभिनय में अपने होंठ फड़काते हैं। यशोदा उन्हें सोया हुआ जानकर चुप हो जाती हैं और दूसरों को भी इशारों से चुप रहने को कहती हैं। तभी अचानक कृष्ण व्याकुल होकर जाग जाते हैं और यशोदा फिर से मधुर गीत गाने लगती हैं। सूरदास जी कहते हैं कि जो सुख देवताओं और मुनियों के लिए भी दुर्लभ है, वह सुख नंद की पत्नी यशोदा सहज ही प्राप्त कर रही हैं।
कठिन शब्दार्थ –
हलरावै – हिलाना (To rock/shake)
मल्हावै – पुचकारना (To fondle/caress)
बेगहिं – शीघ्र/जल्दी (Quickly)
अधर – होंठ (Lips)
सैन – इशारा (Gesture/Sign)
भामिनी – पत्नी (Wife)
02
खीजत जात माखन खात।
अरुण लोचन, भौंह टेढ़ी, बार-बार जम्हात॥
कबहुँ रुनझुन, चलत घुटुरन, धूर धूसर गात।
कबहुँ झुक कें अलक खेंचत, नैन जल भर लात॥
कबहुँ तुतरे बोल बोलत, कबहुँ बोलत तात।
‘सूर’ हरि की निरखि सोभा, निमिख तजत न मात॥
संदर्भ –
यह पद सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। इसमें माता यशोदा द्वारा बालक कृष्ण के बाल सुलभ चेष्टाओं को देखा जा रहा है।
प्रसंग –
इस पद में बालक कृष्ण के माखन खाने और उनकी बाल-सुलभ चेष्टाओं का वर्णन है।
व्याख्या –
बालक कृष्ण चिढ़ते हुए माखन खा रहे हैं। माखन खाते समय उनकी आँखें लाल हैं, भौहें टेढ़ी हैं और वे नींद के कारण बार-बार जम्हाई ले रहे हैं। जब वे अपने नन्हे पैरों से घुटनों के बल चलते हैं, तो उनके पैरों की पैंजनी से ‘रुनझुन’ की ध्वनि आती है और उनका शरीर धूल से सना हुआ है। कभी वे अपनी ही परछाईं या बालों की लट को खींचने लगते हैं और दर्द होने पर उनकी आँखों में आँसू भर आते हैं। वे तोतली बोली में कभी कुछ बोलते हैं तो कभी ‘तात’ अर्थात् पिता पुकारते हैं। यशोदा माँ कृष्ण की इस शोभा को देखकर एक पल के लिए भी उनसे अपनी नज़र नहीं हटातीं।
कठिन शब्दार्थ –
खीजत – चिढ़ना (To get irritated)
लोचन – नेत्र/आँख (Eyes)
धूर धूसर गात – धूल से सना हुआ शरीर (Body covered in dust)
अलक – बालों की लट (Lock of hair)
निमिख – क्षण भर (A moment)
03
मैया मेरी, चंद्र खिलौना लैहौं।
धौरी को पय पान न करिहौं, बेनी सिर न गुथैहौं।
मोतिन माल न धरिहौं उर पर, झंगुली कंठ न लैहौं॥
जैहों लोट अबहिं धरनी पर, तेरी गोद न ऐहौं।
लाल कहौं नंद बाबा को, तेरो सुत न कहैहौं।
कान लाय कछु कहत जसोदा, दाउहिं नाहिं सुनैहौं।
चंदा हूँ ते अति सुंदर तोहिं, नवल दुलहिया ब्यैहौं।
तेरी सौं मेरी सुन मैया, अबहीं ब्याहन जैहौं।
‘सूरदास’ सब सखा बराती, नूतन मंगल गैहौं॥
संदर्भ –
यह पद सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। इसमें माता यशोदा बालक कृष्ण के बाल हठ और खिलौने के प्रति मोह को गहराई से देखती हैं।
प्रसंग –
यहाँ कृष्ण की ‘बाल-हठ’ का वर्णन है, जहाँ वे चंद्रमा को खिलौने के रूप में पाने की ज़िद कर रहे हैं।
व्याख्या –
कृष्ण अपनी माँ से हठ करते हैं— “मैया, मैं तो वही चंद्रमा वाला खिलौने लूँगा। यदि तुमने वह नहीं दिया, तो न मैं सफ़ेद गाय का दूध पियूँगा, न सिर पर चोटी गुँथवाऊँगा। मैं मोतियों की माला और झंगुली अर्थात् ढीला कुर्ता भी नहीं पहनूँगा।” वे आगे कहते हैं— “मैं अभी जमीन पर लोट जाऊँगा और तुम्हारी गोद में नहीं आऊँगा। मैं नंद बाबा का बेटा कहलाऊँगा, तुम्हारा पुत्र नहीं बनूँगा।”
यशोदा उन्हें मनाने के लिए उनके कान में धीरे से कहती हैं— “कान्हा, यह बात बलराम अर्थात् बलदाऊ को मत सुनाना। मैं तेरे लिए चंद्रमा से भी सुंदर ‘नवल दुलहिया’ अर्थात् नयी दुल्हन लाऊँगी और तेरा विवाह कराऊँगी।” यह सुनते ही कृष्ण खुश हो जाते हैं और कहते हैं— “मैया, फिर तो मैं अभी ब्याह करने जाऊँगा। मेरी सौगंध, मुझे अभी ले चलो।” सूरदास जी कहते हैं कि कृष्ण की इस बात पर सभी सखा बराती बनेंगे और उत्सव के गीत गाए जाएँगे।
पदों की सप्रसंग व्याख्या
01
जसोदा हरि पालने झुलावै।
हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ सोइ कछु गावै॥
मेरे लाल को आउ निंदरिया, काहे न आनि सुवावै।
तू काहे नहिं बेगहिं आवै, तोको कान्ह बुलावै।
कबहुँ पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै।
सोवत जानि मौन है कै रहि, करि करि सैन बतावै॥
इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरै गावै।
जो सुख ‘सूर’ अमर मुनि दुरलभ, सो नंद भामिनी पावै॥
संदर्भ –
यह पद सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। इसमें माता यशोदा द्वारा बालक कृष्ण को सुलाने का वर्णन है।
प्रसंग –
यशोदा माँ कान्हा को पालने में झुलाते हुए लोरी गा रही हैं और नींद को बुला रही हैं।
व्याख्या –
यशोदा माता बालक कृष्ण को पालने में झुला रही हैं। वे कभी पालने को हिलाती हैं, कभी प्यार करती हैं, कभी पुचकारती हैं और जो मन में आता है, वही गुनगुनाने लगती हैं। वे नींद को उलाहना देते हुए कहती हैं— “अरी निंदिया! तू मेरे लाल के पास क्यों नहीं आती? तू आकर इसे सुलाती क्यों नहीं? तू जल्दी क्यों नहीं आती, तुझे कान्हा बुला रहा है।”
इसी बीच कृष्ण कभी अपनी पलकें मूँद लेते हैं और कभी सो जाने के अभिनय में अपने होंठ फड़काते हैं। यशोदा उन्हें सोया हुआ जानकर चुप हो जाती हैं और दूसरों को भी इशारों से चुप रहने को कहती हैं। तभी अचानक कृष्ण व्याकुल होकर जाग जाते हैं और यशोदा फिर से मधुर गीत गाने लगती हैं। सूरदास जी कहते हैं कि जो सुख देवताओं और मुनियों के लिए भी दुर्लभ है, वह सुख नंद की पत्नी यशोदा सहज ही प्राप्त कर रही हैं।
कठिन शब्दार्थ –
हलरावै – हिलाना (To rock/shake)
मल्हावै – पुचकारना (To fondle/caress)
बेगहिं – शीघ्र/जल्दी (Quickly)
अधर – होंठ (Lips)
सैन – इशारा (Gesture/Sign)
भामिनी – पत्नी (Wife)
02
खीजत जात माखन खात।
अरुण लोचन, भौंह टेढ़ी, बार-बार जम्हात॥
कबहुँ रुनझुन, चलत घुटुरन, धूर धूसर गात।
कबहुँ झुक कें अलक खेंचत, नैन जल भर लात॥
कबहुँ तुतरे बोल बोलत, कबहुँ बोलत तात।
‘सूर’ हरि की निरखि सोभा, निमिख तजत न मात॥
संदर्भ –
यह पद सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। इसमें माता यशोदा द्वारा बालक कृष्ण के बाल सुलभ चेष्टाओं को देखा जा रहा है।
प्रसंग –
इस पद में बालक कृष्ण के माखन खाने और उनकी बाल-सुलभ चेष्टाओं का वर्णन है।
व्याख्या –
बालक कृष्ण चिढ़ते हुए माखन खा रहे हैं। माखन खाते समय उनकी आँखें लाल हैं, भौहें टेढ़ी हैं और वे नींद के कारण बार-बार जम्हाई ले रहे हैं। जब वे अपने नन्हे पैरों से घुटनों के बल चलते हैं, तो उनके पैरों की पैंजनी से ‘रुनझुन’ की ध्वनि आती है और उनका शरीर धूल से सना हुआ है। कभी वे अपनी ही परछाईं या बालों की लट को खींचने लगते हैं और दर्द होने पर उनकी आँखों में आँसू भर आते हैं। वे तोतली बोली में कभी कुछ बोलते हैं तो कभी ‘तात’ अर्थात् पिता पुकारते हैं। यशोदा माँ कृष्ण की इस शोभा को देखकर एक पल के लिए भी उनसे अपनी नज़र नहीं हटातीं।
कठिन शब्दार्थ –
खीजत – चिढ़ना (To get irritated)
लोचन – नेत्र/आँख (Eyes)
धूर धूसर गात – धूल से सना हुआ शरीर (Body covered in dust)
अलक – बालों की लट (Lock of hair)
निमिख – क्षण भर (A moment)
03
मैया मेरी, चंद्र खिलौना लैहौं।
धौरी को पय पान न करिहौं, बेनी सिर न गुथैहौं।
मोतिन माल न धरिहौं उर पर, झंगुली कंठ न लैहौं॥
जैहों लोट अबहिं धरनी पर, तेरी गोद न ऐहौं।
लाल कहौं नंद बाबा को, तेरो सुत न कहैहौं।
कान लाय कछु कहत जसोदा, दाउहिं नाहिं सुनैहौं।
चंदा हूँ ते अति सुंदर तोहिं, नवल दुलहिया ब्यैहौं।
तेरी सौं मेरी सुन मैया, अबहीं ब्याहन जैहौं।
‘सूरदास’ सब सखा बराती, नूतन मंगल गैहौं॥
संदर्भ –
यह पद सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ से लिया गया है। इसमें माता यशोदा बालक कृष्ण के बाल हठ और खिलौने के प्रति मोह को गहराई से देखती हैं।
प्रसंग –
यहाँ कृष्ण की ‘बाल-हठ’ का वर्णन है, जहाँ वे चंद्रमा को खिलौने के रूप में पाने की ज़िद कर रहे हैं।
व्याख्या –
कृष्ण अपनी माँ से हठ करते हैं— “मैया, मैं तो वही चंद्रमा वाला खिलौने लूँगा। यदि तुमने वह नहीं दिया, तो न मैं सफ़ेद गाय का दूध पियूँगा, न सिर पर चोटी गुँथवाऊँगा। मैं मोतियों की माला और झंगुली अर्थात् ढीला कुर्ता भी नहीं पहनूँगा।” वे आगे कहते हैं— “मैं अभी जमीन पर लोट जाऊँगा और तुम्हारी गोद में नहीं आऊँगा। मैं नंद बाबा का बेटा कहलाऊँगा, तुम्हारा पुत्र नहीं बनूँगा।”
यशोदा उन्हें मनाने के लिए उनके कान में धीरे से कहती हैं— “कान्हा, यह बात बलराम अर्थात् बलदाऊ को मत सुनाना। मैं तेरे लिए चंद्रमा से भी सुंदर ‘नवल दुलहिया’ अर्थात् नयी दुल्हन लाऊँगी और तेरा विवाह कराऊँगी।” यह सुनते ही कृष्ण खुश हो जाते हैं और कहते हैं— “मैया, फिर तो मैं अभी ब्याह करने जाऊँगा। मेरी सौगंध, मुझे अभी ले चलो।” सूरदास जी कहते हैं कि कृष्ण की इस बात पर सभी सखा बराती बनेंगे और उत्सव के गीत गाए जाएँगे।
पदों पर आधारित प्रश्न
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संक्षेप में दीजिए-
(i) जसोदा हरि पालने झुलावै।
हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ सोइ कछु गावै॥
मेरे लाल को आउ निंदरिया, काहे न आनि सुवावै।
तू काहे नहिं बेगहिं आवै, तोको कान्ह बुलावै।
कबहुँ पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै।
सोवत जानि मौन है कै रहि, करि करि सैन बतावै॥
इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरै गावै।
जो सुख ‘सूर’ अमर मुनि दुरलभ, सो नंद भामिनी पावै॥
(क) यशोदा बालकृष्ण को सुलाने के लिए क्या-क्या करती है?
उत्तर- यशोदा कृष्ण को पालने में झुलाती हैं, उन्हें थपकी देकर पुचकारती और दुलार करती हैं। वे मन में जो आता है वही मधुर गीत अर्थात् लोरी गाती हैं और नींद को उलाहना देती हैं कि वह आकर उनके लाल को सुलाती क्यों नहीं।
(ख) बालकृष्ण पालने में झूलते समय क्या-क्या चेष्टाएँ कर रहे हैं?
उत्तर- झूलते समय कृष्ण कभी अपनी पलकें मूँद लेते हैं और कभी अपने होंठ फड़काने लगते हैं, जिससे लगता है कि वे सो गए हैं। किंतु कुछ ही देर बाद वे अकुलाकर अर्थात् कुल होकर जाग जाते हैं।
(ग) ‘जो सुख ‘सूर’ अमर मुनि दुरलभ, सो नंद भामिनी पावै’ – कवि ने ऐसा क्यों कहा है?
उत्तर- कवि के अनुसार, साक्षात् ईश्वर को अपने पुत्र के रूप में पाकर उन्हें खिलाने और सुलाने का जो सुख यशोदा को मिल रहा है, वह बड़े-बड़े मुनियों और देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। यह भक्ति और वात्सल्य का सर्वोच्च सुख है।
(घ) यशोदा द्वारा कृष्ण को पालने में झुलाने का दृश्य अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर- माँ यशोदा बड़े प्रेम से कान्हा को पालने में झुला रही हैं। वे बीच-बीच में चुप हो जाती हैं और दूसरों को भी शांत रहने का इशारा करती हैं ताकि कान्हा की नींद न खुले। जैसे ही कृष्ण जागते हैं, वे फिर से लोरी गाने लगती हैं। यह दृश्य माँ की ममता और समर्पण का सुंदर उदाहरण है।
(ii) खीजत जात माखन खात।
अरुण लोचन, भौंह टेढ़ी, बार-बार जम्हात॥
कबहुँ रुनझुन, चलत घुटुरन, धूर धूसर गात।
कबहुँ झुक कें अलक खेंचत, नैन जल भर लात॥
कबहुँ तुतरे बोल बोलत, कबहुँ बोलत तात।
‘सूर’ हरि की निरखि सोभा, निमिख तजत न मात॥
(क) माखन खाते समय बालकृष्ण की चेष्टाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर- माखन खाते समय कृष्ण थोड़े चिढ़े हुए हैं। वे बार-बार जम्हाई ले रहे हैं, उनके नेत्र लाल हैं और भौहें टेढ़ी हैं। वे घुटनों के बल चल रहे हैं जिससे उनके पैरों की पैंजनी रुनझुन बज रही है।
(ख) बालकृष्ण के सौंदर्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर- कृष्ण का शरीर धूल से सना हुआ है। उनके चेहरे पर माखन लगा है। उनके सिर की लटें उनके चेहरे पर झूल रही हैं, जिन्हें खींचने पर उनकी आँखों में जल भर आता है। वे अपनी तोतली बोली में ‘तात’ कहकर पुकारते हैं।
(ग) ‘सूर वात्सल्य रस के सम्राट् थे’- उपर्युक्त पद के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- सूरदास ने बालक की सूक्ष्म क्रियाओं, जैसे – जम्हाई लेना, घुटनों के बल चलना, तोतली बोली का इतना स्वाभाविक और सजीव वर्णन किया है कि पाठक के सामने चित्र खिंच जाता है। इसी मनोवैज्ञानिक चित्रण के कारण उन्हें वात्सल्य रस का सम्राट कहा जाता है।
(घ) शब्दार्थ लिखिए- खीजत, अरुण लोचन, जम्हात, अलक, निमिख, तुतरे।
उत्तर- खीजत – चिढ़ना
अरुण लोचन – लाल आँखें
जम्हात – जम्हाई लेना
अलक – बालों की लट
निमिख – क्षण भर (पल भर)
तुतरे – तोतले (बोली)
(iii) मैया मेरी, चंद्र खिलौना लैहौं।
धौरी को पय पान न करिहौं, बेनी सिर न गुथैहौं।
मोतिन माल न धरिहौं उर पर, झंगुली कंठ न लैहौं॥
जैहों लोट अबहिं धरनी पर, तेरी गोद न ऐहौं।
लाल कहौं नंद बाबा को, तेरो सुत न कहैहौं।
कान लाय कछु कहत जसोदा, दाउहिं नाहिं सुनैहौं।
चंदा हूँ ते अति सुंदर तोहिं, नवल दुलहिया ब्यैहौं।
तेरी सौं मेरी सुन मैया, अबहीं ब्याहन जैहौं।
‘सूरदास’ सब सखा बराती, नूतन मंगल गैहौं॥
(क) बालकृष्ण क्या लेने की जिद कर रहे हैं? माँ यशोदा उनकी ज़िद पूरी करने में क्यों असमर्थ है?
उत्तर- बालक कृष्ण आकाश के चंद्रमा को खिलौने के रूप में लेने की ज़िद कर रहे हैं। माँ यशोदा असमर्थ हैं क्योंकि चंद्रमा आकाश में बहुत दूर है और उसे धरती पर खिलौने की तरह लाना असंभव है।
(ख) अपनी ज़िद को पूरी करवाने के लिए बालकृष्ण माँ से क्या-क्या कह रहे हैं?
उत्तर- वे कहते हैं कि यदि खिलौना नहीं मिला तो वे दूध नहीं पिएँगे, चोटी नहीं गुँथवाएँगे, गहने नहीं पहनेंगे और अभी जमीन पर लोटने लग जाएँगे। वे यह भी कहते हैं कि वे केवल नंद बाबा के बेटे कहलाएँगे, यशोदा के नहीं।
(ग) माँ यशोदा ने बालकृष्ण को बहकाने के लिए क्या प्रयास किया? उस पर बालकृष्ण की क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तर- माँ यशोदा ने उनके कान में कहा कि वे उनके लिए चंद्रमा से भी सुंदर दुल्हन लाएँगी। यह सुनकर कृष्ण तुरंत खुश हो गए और अपनी ज़िद छोड़कर अभी ब्याह करने जाने की तैयारी करने लगे।
(घ) सूरदास के बाल वर्णन की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर- सूरदास का बाल वर्णन अत्यंत मनोवैज्ञानिक और यथार्थ है। वे बाल-हठ, भोलेपन, माता-पुत्र के संवाद और बालक की रूठने-मनाने की कला को बहुत बारीकी से चित्रित करते हैं। उनकी भाषा ब्रज है जो वात्सल्य के लिए अत्यंत मधुर है।

