सुभद्रा कुमारी चौहान
सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म सन् 1904 में प्रयाग (इलाहाबाद) में हुआ। इनकी कविताओं तथा कहानियों पर देशभक्ति की भावना की गहरी छाप है। ये मध्य प्रदेश की विधान सभा (असेंबली) की सदस्या भी रहीं। सन् 1947 में मोटर दुर्घटना में इनका देहांत हो गया। इनकी ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी’ कविता उत्तर भारत के घर-घर में गाई जाती है। अपनी कहानियों में इन्होंने गरीब, पीड़ित, शोषित जनता के प्रति गहरी सहानुभूति प्रकट की है। इनकी कहानियाँ सीधी-सादी हैं, उनमें घटनाओं या विचारों का टेढ़ा-मेढ़ा, तोड़-मोड़ नहीं है, फिर भी इनकी कहानियाँ हृदय पर गहरा प्रभाव डालती हैं।
इनकी भाषा सरल एवं सुबोध है तथा पात्र सजीव हैं।
इनके कहानी संग्रह हैं- ‘बिखरे मोती’ एवं ‘सीधे-सादे चित्र’ जो कि अत्यधिक सराहनीय हैं। ‘मातृ मंदिर की ओर’ कविता आत्म-बलिदान की भावना से पूर्ण है।
मातृ मंदिर की ओर
व्यथित’ है मेरा हृदय – प्रदेश,
चलूँ, उसको बहलाऊँ आज।
बताकर अपना सुख-दुख उसे
हृदय का भार हटाऊँ आज॥
चलूँ माँ के पद-पंकज’ पकड़
नयन जल से नहलाऊँ आज।
मातृ-मंदिर में मैंने कहा…..
चलूँ दर्शन कर आऊँ आज॥
किंतु यह हुआ अचानक ध्यान
दीन हूँ, छोटी हूँ, अज्ञान।
मातृ-मंदिर का दुर्गम मार्ग
तुम्हीं बतला दो हे भगवान॥
मार्ग के बाधक पहरेदार
सुना है ऊँचे-से सोपान।
फिसलते हैं ये दुर्बल पैर
चढ़ा दो मुझको हे भगवान॥
अहा ! वे जगमग जगमग जगी
ज्योतियाँ दीख रही हैं वहाँ।
शीघ्रता करो वाद्य बज उठे
भला मैं कैसे जाऊँ वहाँ?
सुनाई पड़ता है कल-गान
मिला दूँ मैं भी अपनी तान।
शीघ्रता करो मुझे ले चलो,
मातृ मंदिर में हे भगवान॥
चलूँ मैं जल्दी से बढ़-चलूँ।
देख लूँ माँ की प्यारी मूर्ति।
अहा ! वह मीठी-सी मुसकान
जगा जाती है, न्यारी स्फूर्ति॥
उसे भी आती होगी याद?
उसे, हाँ आती होगी याद।
नहीं तो रूरूँगी मैं आज
सुनाऊँगी उसको फरियाद॥
कलेजा माँ का, मैं संतान
करेगी दोषों पर अभिमान।
मातृ-वेदी पर हुई पुकार,
चढ़ा दो मुझको, हे भगवान॥
सुनूँगी माता की आवाज़
रहूँगी मरने को तैयार।
कभी भी उस वेदी पर देव,
न होने दूँगी अत्याचार॥
न होने दूँगी अत्याचार
चलो, मैं हो जाऊँ बलिदान।
मातृ-मंदिर में हुई पुकार,
चढ़ा दो मुझको, हे भगवान॥
– सुभद्राकुमारी चौहान
कविता परिचय
सुभद्राकुमारी चौहान की कविता ‘मातृ मंदिर की ओर’ देशभक्ति और आत्म-बलिदान की भावना से ओत-प्रोत है। इसमें कवयित्री ने अपनी व्याकुलता, संघर्ष और अंततः भारत माता के लिए मर-मिटने के संकल्प को एक धार्मिक यात्रा के रूपक के माध्यम से व्यक्त किया है।
01
व्यथित है मेरा हृदय-प्रदेश, चलूँ, उसको बहलाऊँ आज।
बताकर अपना सुख-दुख उसे हृदय का भार हटाऊँ आज॥
चलूँ माँ के पद-पंकज पकड़ नयन-जल से नहलाऊँ आज।
मातृ-मंदिर में मैंने कहा… चलूँ दर्शन कर आऊँ आज॥
संदर्भ –
प्रस्तुत पंक्तियाँ सुभद्राकुमारी चौहान द्वारा रचित कविता ‘मातृ मंदिर की ओर’ से उद्धृत हैं।
प्रसंग –
कवयित्री का मन देश की पराधीनता को देखकर दुखी है। वे अपनी पीड़ा को भारत माता के चरणों में समर्पित करना चाहती हैं।
व्याख्या –
कवयित्री कहती हैं कि मेरा हृदय बहुत दुखी है। अपने मन की शांति के लिए मैं आज भारत माता के मंदिर जाना चाहती हूँ। वहाँ पहुँचकर मैं अपने मन की सारी बातें माँ को बताऊँगी ताकि मेरे हृदय का बोझ हल्का हो सके। मैं माँ के कमल रूपी चरणों को पकड़ूँगी और अपनी आँखों के आँसुओं से उन्हें धो दूँगी। मेरा मन आज माँ के दर्शनों के लिए व्याकुल है।
शब्दार्थ –
व्यथित – दुखी/परेशान (Distressed)
पद-पंकज – कमल के समान पैर (Lotus-like feet)
नयन-जल – आँसू (Tears)
02
किंतु यह हुआ अचानक ध्यान, दीन हूँ, छोटी हूँ, अज्ञान।
मातृ-मंदिर का दुर्गम मार्ग, तुम्हीं बतला दो हे भगवान॥
मार्ग के बाधक पहरेदार, सुना है ऊँचे-से सोपान।
फिसलते हैं ये दुर्बल पैर, चढ़ा दो मुझको हे भगवान॥
प्रसंग –
मंदिर जाने की इच्छा के बीच कवयित्री अपनी अक्षमता और मार्ग की कठिनाइयों का वर्णन कर रही हैं।
व्याख्या –
जैसे ही कवयित्री ने चलने का विचार किया, उन्हें अपनी सीमाओं का आभास हुआ। वे कहती हैं कि मैं बहुत गरीब, असहाय और अज्ञानी हूँ। माँ के मंदिर का रास्ता बहुत कठिन है। मार्ग में विदेशी शासकों रूपी पहरेदार खड़े हैं जो बाधा पहुँचाते हैं और मंदिर की सीढ़ियाँ बहुत ऊँची हैं। मेरे पैर कमज़ोर हैं जो बार-बार फिसलते हैं। इसलिए वे ईश्वर से प्रार्थना करती हैं कि “हे प्रभु! मुझे शक्ति दो और इस मार्ग को पार करा दो।”
शब्दार्थ –
दीन – गरीब/असहाय (Humble/Poor)
दुर्गम – जहाँ पहुँचना कठिन हो (Difficult path)
सोपान – सीढ़ियाँ (Steps/Stairs)
बाधक – रुकावट (Obstacle)
03
अहा ! वे जगमग जगमग जगी ज्योतियाँ दीख रही हैं वहाँ।
शीघ्रता करो वाद्य बज उठे, भला मैं कैसे जाऊँ वहाँ?
सुनाई पड़ता है कल-गान, मिला दूँ मैं भी अपनी तान।
शीघ्रता करो मुझे ले चलो, मातृ मंदिर में हे भगवान॥
प्रसंग –
दूर से मंदिर की हलचल को देखकर कवयित्री की व्याकुलता और बढ़ गई है।
व्याख्या –
कवयित्री को दूर से ही स्वतंत्रता की ज्योतियाँ जगमगाती दिख रही हैं। वहाँ आज़ादी के नगाड़े बज उठे हैं। वे कहती हैं कि मुझे देशभक्ति के मधुर गीत सुनाई दे रहे हैं, और मेरी भी इच्छा है कि मैं अपना स्वर उन गीतों में मिला सकूँ। वे भगवान से विनती करती हैं कि वे उन्हें जल्दी वहाँ ले चलें ताकि वे भी इस उत्सव में शामिल हो सकें।
शब्दार्थ –
कल-गान – मधुर गीत (Sweet songs/melodious chanting)
तान – स्वर (Tune/Musical note)
04
चलूँ मैं जल्दी से बढ़ चलूँ, देख लूँ माँ की प्यारी मूर्ति।
अहा ! वह मीठी-सी मुसकान जगा जाती है, न्यारी स्फूर्ति॥
उसे भी आती होगी याद? उसे, हाँ आती होगी याद।
नहीं तो रूहूँगी मैं आज, सुनाऊँगी उसको फरियाद॥
प्रसंग –
माँ के दर्शन की लालसा और माँ-बेटी के संबंध का भावुक वर्णन।
व्याख्या –
कवयित्री जल्दी से मंदिर पहुँचना चाहती हैं ताकि वे भारत माता की प्यारी मूरत देख सकें। वे कहती हैं कि माँ की वह मधुर मुस्कान उनके भीतर एक नई शक्ति और स्फूर्ति भर देती है। उन्हें विश्वास है कि माँ को भी अपनी इस संतान की याद ज़रूर आती होगी। यदि माँ ने उन्हें नहीं पहचाना, तो वे रो-रोकर अपनी व्यथा उन्हें सुनाएँगी।
शब्दार्थ –
स्फूर्ति – जोश/ऊर्जा (Energy/Vitality)
फरियाद – प्रार्थना/शिकायत (Appeal/Plea)
03
कलेजा माँ का, मैं संतान, करेगी दोषों पर अभिमान।
मातृ-वेदी पर हुई पुकार, चढ़ा दो मुझको, हे भगवान॥
सुनूँगी माता की आवाज़, रहूँगी मरने को तैयार।
कभी भी उस वेदी पर देव, न होने दूँगी अत्याचार॥
न होने दूँगी अत्याचार, चलो, मैं हो जाऊँ बलिदान।
मातृ-मंदिर में हुई पुकार, चढ़ा दो मुझको, हे भगवान॥
प्रसंग –
देशभक्ति की पराकाष्ठा और आत्म-बलिदान का संकल्प।
व्याख्या –
कवयित्री कहती हैं कि माँ का हृदय बहुत विशाल होता है, वे अपनी संतान की गलतियों को भुलाकर उन पर गर्व करती हैं। अब मातृभूमि की रक्षा की वेदी से पुकार आई है। वे भगवान से प्रार्थना करती हैं कि वे उन्हें उस वेदी पर ‘बलि’ के रूप में चढ़ा दें। वे अपने देश की पुकार सुनकर हर अत्याचार का सामना करने और मर-मिटने के लिए तैयार हैं। वे संकल्प लेती हैं कि वे जीते-जी भारत माता की वेदी पर कभी अत्याचार नहीं होने देंगी और इसके लिए वे स्वयं को बलिदान कर देंगी।
शब्दार्थ –
अभिमान – गर्व (Pride)
मातृ-वेदी – बलिदान का स्थान (Altar of the Motherland)
बलिदान – न्योछावर करना (Sacrifice)
कविता की सीख
यह कविता हमें देशभक्ति, साहस और अन्याय के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा देती है। यह सिखाती है कि हमारी मातृभूमि का सम्मान सर्वोपरि है और इसकी रक्षा के लिए हमें अपना सब कुछ, यहाँ तक कि अपने प्राण भी न्योछावर करने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए।
अवतरणों पर आधारित प्रश्न
निम्नलिखित प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर दीजिए –
(i) व्यथित है मेरा हृदय प्रदेश,
चलूँ, उसको बहलाऊँ आज।
बताकर अपना सुख-दुख उसे
हृदय का भार हटाऊँ आज॥
चलूँ माँ के पद पंकज पकड़
नयन जल से नहलाऊँ आज।
मातृ मंदिर में मैंने कहा….
चलूँ दर्शन कर आऊँ आज॥
(क) कविता की रचयित्री कौन हैं? ये पंक्तियाँ उनकी किस कविता से ली गई हैं? उसके हृदय के व्यथित होने का क्या कारण है?
उत्तर – इस कविता की रचयित्री सुभद्राकुमारी चौहान हैं। उनके हृदय के व्यथित होने का मुख्य कारण देश की पराधीनता और भारत माता के कष्ट हैं।
(ख) कवयित्री ने अपने मन को बहलाने का कौन-सा उपाय ढूँढ़ा?
उत्तर – कवयित्री ने ‘मातृ मंदिर’ अर्थात् भारत माता के मंदिर में जाकर उनके दर्शन करने और अपना दुख-सुख साझा करने का उपाय ढूँढ़ा। उन्हें विश्वास है कि माँ के चरणों में पहुँचकर उनके हृदय का भार हल्का हो जाएगा।
(ग) ‘चलूँ माँ के पद पंकज पकड़ नयन जल से नहलाऊँ आज ‘- पंक्ति का भावार्थ लिखिए।
उत्तर – इसका भाव यह है कि कवयित्री भारत माता के कमल रूपी चरणों को स्पर्श करना चाहती हैं और अपनी भक्ति तथा वेदना के आँसुओं से उन्हें धोना चाहती हैं। यह उनके गहरे समर्पण को दर्शाता है।
(घ) उपर्युक्त पंक्तियों द्वारा कवयित्री क्या प्रेरणा दे रही है?
उत्तर – कवयित्री देशप्रेम और अपनी मातृभूमि के प्रति गहरी आत्मीयता रखने की प्रेरणा दे रही हैं। वे सिखाती हैं कि संकट के समय हमें अपनी धरती और देश की शरण में जाना चाहिए।
(ii) किंतु यह हुआ अचानक ध्यान
दीन हूँ, छोटी हूँ, अज्ञान।
मातृ मंदिर का दुर्गम मार्ग
तुम्हीं बतला दो हे भगवान।
मार्ग के बाधक पहरेदार
सुना है ऊँचे-से सोपान।
फिसलते हैं ये दुर्बल पैर
चढ़ा दो मुझको हे भगवान॥
(क) कवयित्री को अचानक क्या ध्यान आया? उसने भगवान से क्या प्रार्थना की?
उत्तर – कवयित्री को अचानक अपनी सीमाओं का ध्यान आया कि वे बहुत निर्धन, असहाय और अज्ञानी हैं। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि वे उन्हें उस कठिन मार्ग को पार करने का रास्ता दिखाएँ।
(ख) ‘मार्ग के बाधक पहरेदार’ से कवयित्री का क्या तात्पर्य है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – इससे तात्पर्य उन विदेशी शासकों और उनके सहायकों से है जो स्वतंत्रता के मार्ग में रुकावट बने हुए थे। वे देशवासियों को अपनी मातृभूमि की सेवा करने से रोकते थे।
(ग) कवयित्री ने मातृ मंदिर के मार्ग को दुर्गम क्यों कहा है? वह भगवान से क्या प्रार्थना करती हैं?
उत्तर – मार्ग दुर्गम इसलिए है क्योंकि वहाँ कड़े पहरेदार हैं और आज़ादी की सीढ़ियाँ बहुत ऊँची हैं। कवयित्री प्रार्थना करती हैं कि उनके दुर्बल पैरों को सहारा देकर उन्हें मंज़िल तक पहुँचा दें।
(घ) शब्दार्थ लिखिए- दीन, दुर्गम, बाधक, सोपान।
उत्तर – दीन – असहाय/गरीब।
दुर्गम – जहाँ पहुँचना बहुत कठिन हो।
बाधक – रुकावट डालने वाला।
सोपान – सीढ़ियाँ।
(iii) अहा ! वे जगमग जगमग जगी
ज्योतियाँ दीख रही हैं वहाँ।
शीघ्रता करो वाद्य बज उठे
भला मैं कैसे जाऊँ वहाँ?
सुनाई पड़ता है कल-गान
मिला दूँ मैं भी अपनी तान।
शीघ्रता करो मुझे ले चलो,
मातृ मंदिर में हे भगवान॥
(क) ‘ज्योतियाँ दीख रही हैं वहाँ’- पंक्ति द्वारा कवयित्री का संकेत किस ओर है।
उत्तर – यहाँ ‘ज्योतियाँ’ स्वतंत्रता के लिए जलने वाली मशालों या चेतना की लौ की प्रतीक हैं। कवयित्री को दूर से आज़ादी के आंदोलन की हलचल दिखाई दे रही है।
(ख) ‘वाद्य बज उठे’ से कवयित्री का क्या अभिप्राय है? उनकी ध्वनि सुनकर उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है?
उत्तर – इसका अभिप्राय स्वतंत्रता संग्राम के शंखनाद या बिगुल बजने से है। इसकी ध्वनि सुनकर कवयित्री व्याकुल हो जाती हैं कि वे भी जल्दी से वहाँ पहुँचकर अपना योगदान दें।
(ग) ‘कल गान’ से कवयित्री का क्या आशय है? इस संदर्भ में कवयित्री अपनी क्या अभिलाषा व्यक्त करती है?
उत्तर – ‘कल गान’ का अर्थ है स्वतंत्रता के मधुर गीत। कवयित्री की अभिलाषा है कि वे भी अपनी आवाज़ (तान) उन गीतों में मिला सकें, अर्थात् वे भी स्वतंत्रता संग्राम का सक्रिय हिस्सा बनें।
(घ) उपर्युक्त पंक्तियों का मूलभाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – इन पंक्तियों का मूलभाव देश की स्वतंत्रता के प्रति अटूट उत्साह और उसमें सम्मिलित होने की तीव्र तड़प है।
(iv) चलूँ मैं जल्दी से बढ़ चलूँ।
देख लूँ माँ की प्यारी मूर्ति।
अहा ! वह मीठी-सी मुसकान
जगा जाती है, न्यारी स्फूर्ति॥
उसे भी आती होगी याद?
उसे, हाँ आती होगी याद।
नहीं तो रूहूँगी मैं आज
सुनाऊँगी उसको फरियाद॥
(क) उपर्युक्त पंक्तियों के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि कवयित्री की क्या इच्छा है?
उत्तर – कवयित्री की इच्छा है कि वे बिना देर किए जल्दी से आगे बढ़ें और भारत माता की उस ममतामयी मूर्ति के दर्शन कर सकें।
(ख) ‘मीठी-सी मुसकान’ का संदर्भ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – यहाँ ‘मीठी मुसकान’ भारत माता की उस छवि का प्रतीक है जो अपने कष्ट झेलते बच्चों को साहस और सांत्वना प्रदान करती है।
(ग) ‘जगा जाती है, न्यारी स्फूर्ति’- पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – ‘जगा जाती है, न्यारी स्फूर्ति’- पंक्ति का आशय है कि भारत माता की छवि का ध्यान मात्र करने से कवयित्री के भीतर एक नया जोश, ऊर्जा और साहस भर जाता है, जो उन्हें कठिन मार्ग पर चलने की शक्ति देता है।
(घ) उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्थ लिखिए।
उत्तर – कवयित्री कहती हैं कि यदि माँ ने उन्हें याद नहीं किया, तो वे रो-रोकर अपनी फरियाद सुनाएँगी क्योंकि वे माँ की संतान हैं और संतान का माँ पर पूरा अधिकार होता है।
(v) कलेजा माँ का, मैं संतान
करेगी दोषों पर अभिमान।
मातृ-वेदी पर हुई पुकार,
चढ़ा दो मुझको, हे भगवान॥
सुनूँगी माता की आवाज़
रहूँगी मरने को तैयार।
कभी भी उस वेदी पर देव,
न होने दूँगी अत्याचार॥
न होने दूँगी अत्याचार
चलो, मैं हो जाऊँ बलिदान।
मातृ-मंदिर में हुई पुकार,
चढ़ा दो मुझको, हे भगवान॥
(क) उपर्युक्त पंक्तियों में ‘माँ’ की किस विशेषता का उल्लेख किया गया है और क्यों?
उत्तर – यहाँ माँ की क्षमाशीलता और वात्सल्य का उल्लेख है। माँ अपने बच्चों के दोषों को भी गर्व के साथ स्वीकार कर लेती है और उन्हें माफ़ कर देती है।
(ख) ‘मातृ-वेदी पर हुई पुकार’ का संदर्भ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – इसका संदर्भ देश की रक्षा के लिए किए जा रहे आवाहन से है। यह वह पुकार है जो देश के युवाओं से बलिदान की माँग करती है।
(ग) कौन किस पर तथा किस प्रकार अत्याचार कर रहा था? अत्याचार के विरोध में कवयित्री अपनी क्या इच्छा व्यक्त करती है?
उत्तर – विदेशी अंग्रेज शासक भारत माता पर अत्याचार कर रहे थे। कवयित्री इच्छा व्यक्त करती हैं कि वे उस अत्याचार को रोकने के लिए स्वयं को ‘बलिदान’ करने को तैयार हैं।
(घ) उपर्युक्त पंक्तियों द्वारा कवयित्री क्या प्रेरणा दे रही है?
उत्तर – कवयित्री देश की रक्षा के लिए वीरता, निडरता और आत्म-बलिदान की प्रेरणा दे रही हैं। वे संदेश देती हैं कि अन्याय के विरुद्ध झुकने के बजाय प्राण न्योछावर करना कहीं श्रेष्ठ है।

