ICSE, Class, IX and X, Ekanki Sanchay, Chapter – Mahabharat Ki Ek Saanjh, Bharat Bhushan Agarwal, The Best Solutions,   महाभारत की एक साँझ, भारत भूषण अग्रवाल

भारत भूषण अग्रवाल – एकांकीकार का परिचय

भारत भूषण अग्रवाल बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे। इनका जन्म सन् 1910 में और मृत्यु सन् 1975 में हुई। मुख्य रूप से ये कवि थे। इन्होंने नाटक, एकांकी, उपन्यास, निबंध, आलोचना आदि सभी क्षेत्रों में रचनाएँ कीं।

भारत भूषण जी की भाषा-शैली अत्यंत प्रभावशाली तथा सरस है। ये विषय- वस्तु को अनूठे तथा सर्वथा नवीन ढंग से प्रस्तुत करने में सिद्धहस्त हैं।

एकांकी का कथानक

डॉ. रामकुमार वर्मा द्वारा रचित एकांकी ‘महाभारत की एक साँझ’ महाभारत युद्ध के अंतिम दिन की घटनाओं पर आधारित है। यह एकांकी परंपरागत इतिहास दृष्टि से हटकर दुर्योधन (सुयोधन) के दृष्टिकोण को प्रस्तुत करती है।

  1. सरोवर के किनारे द्वंद्व

महाभारत युद्ध के 18वें दिन, अपनी पराजय और सेना के विनाश को देखकर दुर्योधन द्वैत वन के सरोवर में जल-स्तंभ विद्या के सहारे छिप जाता है। पांडव उसे खोजते हुए वहाँ पहुँचते हैं। युधिष्ठिर और भीम उसे कायर कहकर ललकारते हैं और बाहर आकर युद्ध करने की चुनौती देते हैं।

  1. दुर्योधन का तर्क और विरक्ति

दुर्योधन जल से बाहर निकलता है। वह थका हुआ और निहत्था है। वह युधिष्ठिर से कहता है कि उसे अब राज्य की कोई लालसा नहीं है और वह सबकुछ पांडवों को सौंपकर वन में जाकर भक्ति करना चाहता है। वह पांडवों पर गुरुजनों और बंधु-बांधवों की हत्या का आरोप लगाता है।

  1. गदा युद्ध और भीम का अधर्म

युधिष्ठिर दुर्योधन को वीरता का अवसर देते हैं और उसे अस्त्र चुनकर किसी एक पांडव से लड़ने को कहते हैं। दुर्योधन गदा चुनता है और भीम के साथ उसका भीषण युद्ध होता है। युद्ध के दौरान, श्रीकृष्ण के इशारे पर भीम दुर्योधन की जंघा पर प्रहार करते हैं, जो गदा युद्ध के नियमों के विरुद्ध था। दुर्योधन आहत होकर गिर पड़ता है।

  1. युधिष्ठिर और दुर्योधन का संवाद

संध्या के समय युधिष्ठिर मरणासन्न दुर्योधन के पास जाते हैं। वे उसे ‘दुर्योधन’ कहते हैं, जिस पर वह आपत्ति करता है और स्वयं को ‘सुयोधन’ (अच्छा योद्धा) कहने को कहता है। यहाँ दोनों के बीच एक गहरा वैचारिक युद्ध छिड़ता है –

इतिहास का डर – दुर्योधन कहता है कि चूँकि पांडव विजेता हैं, वे इतिहास अपने पक्ष में लिखवाएँगे और उसे अर्थात् दुर्योधन को युगों-युगों तक खलनायक बनाकर रखेंगे।

राज्याधिकार का तर्क – दुर्योधन तर्क देता है कि उसके पिता धृतराष्ट्र अंधे होने के कारण राज्य संचालन नहीं कर सकते थे, इसलिए पांडु को राज्य मिला। अतः राज्य पर वास्तविक अधिकार उसका था, न कि पांडवों का।

न्याय का प्रश्न – वह भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य जैसे विद्वानों का उदाहरण देता है कि यदि वह अधर्मी होता, तो ये महान लोग उसकी ओर से युद्ध क्यों लड़ते?

  1. दुर्योधन का पश्चात्ताप और अंत

युधिष्ठिर उसे सांत्वना देने और उसके मन का बोझ हल्का करने का प्रयास करते हैं, लेकिन दुर्योधन का स्वाभिमान अंत तक नहीं झुकता। वह कहता है कि उसे अपने किसी कृत्य पर कोई पश्चात्ताप नहीं है क्योंकि उसने केवल अपनी रक्षा की और वीरों की भाँति लड़ा।

  1. अंतिम दुख

एकांकी के अंत में दुर्योधन अपनी मृत्यु की अंतिम घड़ियों में कहता है कि उसे केवल एक ही बात का दुख है— “उसके पिता अंधे क्यों हुए?” यदि वे अंधे न होते, तो वे स्वयं शासन करते और यह भीषण नरसंहार कभी नहीं होता। इसी के साथ दुर्योधन के प्राण पखेरू उड़ जाते हैं और एकांकी का समापन होता है।

एकांकी का संदेश

दृष्टिकोण का अंतर – कोई भी व्यक्ति पूर्णतः बुरा नहीं होता; उसकी परिस्थितियों और दृष्टिकोण को समझना आवश्यक है।

इतिहास और विजेता – विजेता हमेशा इतिहास को अपनी सुविधा के अनुसार लिखता है।

युद्ध की निरर्थकता – अंत में विजय प्राप्त करने वाले पांडवों के पास भी केवल शोक और विनाश ही शेष बचता है।

 

पात्रों की चारित्रिक विशेषताएँ

(क) दुर्योधन (सुयोधन)

अत्यधिक स्वाभिमानी – दुर्योधन अंत समय तक हार नहीं मानता। वह स्वयं को ‘दुर्योधन’ (बुरा योद्धा) के बजाय ‘सुयोधन’ (अच्छा योद्धा) कहलाना पसंद करता है।

तार्किक और वाकपटु – वह युधिष्ठिर के ‘धर्मराज’ होने के दंभ को तर्कों से काटता है। वह भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य के उसके पक्ष में लड़ने को अपने ‘न्याय’ का प्रमाण मानता है।

निडर योद्धा – मृत्यु के अत्यंत निकट होने पर भी वह कायरों की तरह दया की भीख नहीं माँगता, बल्कि वीरता के साथ अपने प्राण त्यागता है।

इतिहास के प्रति सचेत – उसे इस बात का गहरा दुख है कि विजेता होने के नाते पांडव इतिहास को अपने पक्ष में लिखवाएंगे और उसे सदा के लिए खलनायक बना देंगे।

 

(ख) युधिष्ठिर

दयालु और क्षमाशील – युद्ध जीतने के बाद भी उनके मन में अपने भाई के प्रति दया है। वे उसके अंतिम समय में उसे सांत्वना देने और उसका मानसिक बोझ हल्का करने पहुँचते हैं।

आत्म-ग्लानि से भरे – वे युद्ध के भीषण नरसंहार से दुखी हैं। वे बार-बार यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि उन्होंने जो कुछ किया वह ‘न्याय’ के लिए था, न कि स्वार्थ के लिए।

मर्यादावादी – वे दुर्योधन को निहत्था पाकर उसे अस्त्र चुनने और बराबरी से लड़ने का अवसर देते हैं, जो उनकी धर्मनिष्ठा को दर्शाता है।

 

(ग) धृतराष्ट्र

पुत्र-मोह में अंधे – वे शारीरिक रूप से तो अंधे हैं ही, वैचारिक रूप से भी पुत्र-मोह में अंधे हैं। वे दुर्योधन के विनाश के लिए पांडवों को दोषी मानते हैं।

पश्चात्ताप और दुख – एकांकी के प्रारंभ में वे संजय से अपने कुल के विनाश पर विलाप करते हैं, जो उनकी असहाय स्थिति को दर्शाता है।

(घ) भीम

कठोर और प्रतिशोधी – भीम के मन में दुर्योधन के प्रति दया का कोई भाव नहीं है। वे उसे ‘पापी’ और ‘कपटी’ कहकर संबोधित करते हैं और युद्ध के नियमों की परवाह किए बिना उसे परास्त करने में विश्वास रखते हैं।

 

एकांकी का उद्देश्य

इस एकांकी के माध्यम से लेखक ने कई गहरे संदेश दिए हैं –

 

मानवीय दृष्टिकोण का चित्रण – लेखक का मुख्य उद्देश्य दुर्योधन को केवल एक ‘खलनायक’ के रूप में न दिखाकर, उसके पक्ष के न्याय और उसकी मानसिक वेदना को सामने लाना है। यह पाठकों को सोचने पर मजबूर करता है कि क्या दुर्योधन पूरी तरह गलत था?

इतिहास और विजेता का संबंध – एकांकी यह स्पष्ट करती है कि इतिहास हमेशा विजेताओं द्वारा लिखा जाता है। पराजित व्यक्ति का पक्ष अक्सर दबा दिया जाता है। दुर्योधन का यह डर कि उसे ‘दुर्योधन’ बनाकर पेश किया जाएगा, इसी कड़वे सच को दर्शाता है।

युद्ध की निरर्थकता – एकांकी कुरुक्षेत्र की उस ‘साँझ’ का वर्णन करती है जहाँ चारों ओर केवल सन्नाटा, मृत्यु और पछतावा है। यह संदेश देती है कि युद्ध में जीत किसी की भी हो, अंततः मानवता की हार होती है।

अधिकारों की व्याख्या – एकांकी राज्याधिकार और जन्माधिकार के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करती है। दुर्योधन के तर्कों के माध्यम से लेखक ने सत्ता और न्याय के संघर्ष को एक नई दिशा दी है।

मानवता और ईर्ष्या का द्वंद्व – यह रचना दिखाती है कि कैसे ईर्ष्या और अहंकार एक महान कुल का विनाश कर देते हैं।

निष्कर्ष

‘महाभारत की एक साँझ’ केवल एक पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के अंतर्मन में चलने वाले सही और गलत के द्वंद्व की कहानी है।

कठिन शब्दों के सरल अर्थ

1 – जन्मांध – जन्म से अंधा – Blind by birth

2 – विवरण – वृत्तांत / ब्यौरा – Description / Details

3 – जलाशय – तालाब / सरोवर – Reservoir / Pond

4 – आलाप – संगीत का प्रारंभिक स्वर – Prelude / Musical chant

5 – भीषण – डरावना / भयानक – Terrible / Dreadful

6 – विषफल – बुरा परिणाम – Poisonous result

7 – व्यर्थ – बेकार – Useless / Futile

8 – आत्मरक्षा – स्वयं की रक्षा – Self-defense

9 – महाबली – अत्यंत शक्तिशाली – Mighty / Very powerful

10 – जल स्तंभ – पानी की दीवार / खंभा – Water pillar

11 – तत्काल – तुरंत – Immediately

12 – अहेरी – शिकारी – Hunter

13 – चेष्टा – कोशिश / प्रयास – Effort / Attempt

14 – कल-कल – पानी की आवाज़ – Murmur of water

15 – दुरात्मा – दुष्ट / बुरी आत्मा – Evil soul / Wicked

16 – ललकार – चुनौती – Challenge / Defiance

17 – सहयोगी – साथी – Companion / Associate

18 – कलंक – दोष / दाग – Stigma / Blemish

19 – कायर – डरपोक – Coward

20 – अनहोनी – असंभव बात – Improbable / Impossible

21 – हिचकना – संकोच करना – To hesitate

22 – अपमानित – बेइज्जत – Insulted / Humiliated

23 – सव्यंग्य – ताने के साथ – Sarcastically

24 – गर्व – अभिमान / घमंड – Pride / Arrogance

25 – बखानना – वर्णन करना – To describe / Praise

26 – थोथी – खोखली / सारहीन – Hollow / Shallow

27 – स्वार्थ – अपना मतलब – Selfishness

28 – निर्ममता – निर्दयता – Cruelty / Ruthlessness

29 – वध – हत्या – Killing / Slaughter

30 – सत्ता – अधिकार / शासन – Power / Authority

31 – पराक्रम – वीरता – Valor / Bravery

32 – कालाग्नि – विनाश की आग – Fire of destruction

33 – घृत – घी – Clarified butter (Ghee)

34 – उभारना – भड़काना / तेज करना – To incite / Aggravate

35 – स्वाहा – भस्म हो जाना – Sacrificed / Consumed

36 – आहुति – बलिदान – Offering / Sacrifice

37 – तितर-बितर – बिखरा हुआ – Scattered / Dispersed

38 – शस्त्रास्त्र – हथियार और अस्त्र – Weapons and Arms

39 – क्षीण – कमजोर – Weak / Diminished

40 – अनायास – बिना परिश्रम के – Effortlessly

41 – आत्म-प्रवंचना – स्वयं को धोखा देना – Self-deception

42 – दंभ – पाखंड / घमंड – Deceit / Vanity

43 – स्मरण – याद – Remembrance / Memory

44 – पामर – नीच / दुष्ट – Wicked / Mean person

45 – महारथी – महान योद्धा – Great warrior

46 – ज्वाला – आग की लपट – Flame

47 – धिक्कार – धिक्कार / तिरस्कार – Scorn / Reproach

48 – हत्याकांड – नरसंहार – Massacre

49 – विरक्ति – वैराग्य / उदासीनता – Detachment / Apathy

50 – रक्तरंजित – खून से सना हुआ – Blood-stained

51 – कूटनीति – चालबाजी / राजनीति – Diplomacy / Strategy

52 – अप्रस्तुत – जो तैयार न हो – Unprepared

53 – आकांक्षा – तीव्र इच्छा – Strong desire / Aspiration

54 – पाखंडी – ढोंगी – Hypocrite

55 – तृप्त – संतुष्ट – Satisfied / Satiated

56 – सम्मुख – सामने – In front of / Opposite

57 – बधिक – हत्यारा / कसाई – Executioner / Killer

58 – दुराचारी – बुरे आचरण वाला – Sinner / Miscreant

59 – अनावश्यक – जिसकी जरूरत न हो – Unnecessary

60 – विफलता – हार / असफलता – Failure

61 – मरुस्थल – रेगिस्तान – Desert

62 – महत्त्वाकांक्षा – बड़ा बनने की इच्छा – Ambition

63 – जयस्तंभ – विजय का खंभा – Victory pillar

64 – पौरुष – मर्दानगी / शक्ति – Manliness / Valor

65 – विवश – मजबूर – Compelled / Helpless

66 – घमासान – भयानक (युद्ध) – Fierce / Intense

67 – वरन करना – चुनना / स्वीकारना – To choose / Accept

68 – जंघा – जांघ – Thigh

69 – चीत्कार – चिल्लाहट – Shriek / Scream

70 – उत्कट – तीव्र / बहुत अधिक – Intense / Excessive

71 – पोत – जहाज़ – Vessel / Ship

72 – कर्णधार – मल्लाह / नेता – Helmsman / Leader

73 – जयध्वनि – जीत का जयकारा – Cheers of victory

74 – शिविर – कैंप / तंबू – Camp / Tent

75 – प्रण – प्रतिज्ञा – Vow / Pledge

76 – कराह – दर्द भरी आवाज़ – Moan / Groan

77 – निस्सहाय – बेसहारा – Helpless

78 – निर्बल – कमजोर – Feeble / Weak

79 – संज्ञा – नाम / उपाधि – Title / Noun

80 – पश्चाताप – पछतावा – Remorse / Repentance

81 – व्यथा – पीड़ा / दुःख – Agony / Sorrow

82 – मिथ्याभिमानी – झूठा घमंडी – Vain / False pride

83 – षड्यंत्र – साजिश – Conspiracy / Plot

84 – खिल्ली उड़ाना – मज़ाक बनाना – To mock / Ridicule

85 – कृत्य – कार्य / कर्म – Deed / Act

86 – साक्षी – गवाह – Witness

87 – विजेता – जीतने वाला – Conqueror / Winner

88 – शोणित – रक्त / खून – Blood

89 – अबला – असहाय नारी – Frail woman

90 – दहलना – डर जाना – To be terrified

91 – आत्म-प्रशंसा – अपनी तारीफ – Self-praise

92 – तांडव नृत्य – विनाश का नाच – Dance of destruction

93 – सर्वसम्मत – सबकी सहमति से – Unanimous

94 – राज-नियम – राज्य का कानून – State law / Rules

95 – प्रतिष्ठा – स्थापना / सम्मान – Establishment / Prestige

96 – ध्वंस – विनाश – Destruction / Ruins

97 – सांत्वना – ढाढ़स / तसल्ली – Consolation

98 – सशक्त – मजबूत – Powerful / Strong

99 – प्रलाप – बेहूदा बात / विलाप – Delirium / Raving

100 – तिरस्कृत – अपमानित – Insulted / Rejected

101 – असंभाव्य – असंभव – Improbable

102 – प्रमाण – सबूत – Evidence / Proof

103 – निष्पक्ष – बिना पक्षपात के – Impartial / Unbiased

104 – वीरोचित – वीरों के योग्य – Heroic / Befitting a hero

105 – विवेचना – जाँच-परख – Analysis / Discussion

106 – चक्रांत – जाल / घेरा – Trap / Circle of plot

107 – मरणोन्मुख – मरने के करीब – Moribund / Dying

108 – अचूक – जो खाली न जाए – Unerring / Infallible

109 – ग्लानि – पछतावा / शर्म – Remorse / Self-reproach

110 – लुप्त – गायब – Vanished / Extinct

 

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

अवतरणों पर आधारित प्रश्न

(i) जो अपने सगे संबंधियों को गाजर-मूली की भाँति कटवा सकता है, जो अपने भाइयों को जीवित जलवा देने में भी नहीं हिचकता, जो आदमी अपनी भाभी को भरी सभा में अपमानित करने में आनंद ले सकता है, उसका लज्जा से क्या परिचय?

(क) उपर्युक्त कथन किसने, किससे, किस संदर्भ में कहे हैं? अनहोनी बात से किस घटना की ओर संकेत है?

उत्तर – वक्ता युधिष्ठिर हैं और श्रोता भीम हैं। संदर्भ यह है कि जब पांडव द्वैत वन के जलाशय पर पहुँचते हैं और दुर्योधन को बाहर निकलने के लिए ललकारते हैं, तब भीम दुर्योधन की ‘लज्जा’ की बात करते हैं। युधिष्ठिर व्यंग्य में कहते हैं कि उस पापी को लज्जा कैसी? ‘अनहोनी बात’ से संकेत दुर्योधन के जल में छिपकर बैठने की घटना की ओर है, जो उसकी प्रकृति के विरुद्ध कायरतापूर्ण कार्य था।

(ख) ‘गाजर-मूली की तरह कटवाना’ का प्रयोग किस उद्देश्य से किया गया है और क्यों?

उत्तर – इस मुहावरे का प्रयोग दुर्योधन की निर्दयता को दर्शाने के लिए किया गया है। इसका अर्थ है—बिना किसी मोह या दया के इंसानों की हत्या करना, जैसे कोई तुच्छ सब्जी काट रहा हो। दुर्योधन ने अपने स्वार्थ के लिए भीषण युद्ध कराया जिसमें लाखों निर्दोष मारे गए।

(ग) किसने अपने भाइयों को जीवित जलवाने का प्रयास किया? घटना का उल्लेख कीजिए।

उत्तर – दुर्योधन ने अपने भाइयों अर्थात पांडवों को लाख का घर लाक्षागृह में जीवित जलवाने का प्रयास किया था। उसने वारणावत में पांडवों के लिए एक ऐसा महल बनवाया था जो ज्वलनशील पदार्थों से बना था, ताकि सोती अवस्था में उन्हें जलाकर मार दिया जाए।

(घ) अपनी भाभी को भरी सभा में अपमानित करने की घटना का उल्लेख कीजिए।

उत्तर – दुर्योधन ने भरी सभा में अपनी भाभी द्रौपदी को अपमानित किया था। जुए में हारने के बाद, दुशासन द्रौपदी को बालों से खींचकर सभा में लाया और दुर्योधन के आदेश पर उनका चीर-हरण का प्रयास किया गया तथा दुर्योधन ने उन्हें अपनी जंघा पर बैठने का भद्दा संकेत किया था।

(ii) अरे नीच ! अब भी तेरा गर्व चूर नहीं हुआ। यदि बल है तो आ न बाहर और हमको पराजित करके राज्य प्राप्त कर। वहाँ बैठा-बैठा क्या वीरता बखानता है ! तू क्या समझता है, हम तेरी थोथी बातों से डर जाएँगे?

(क) उपर्युक्त कथन किसने, किससे कहे हैं? किसका गर्व अभी चूर नहीं हुआ था? वक्ता ने ऐसा क्यों कहा है?

उत्तर – वक्ता युधिष्ठिर हैं और श्रोता दुर्योधन है। दुर्योधन का गर्व अभी चूर नहीं हुआ था। वक्ता ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि हारने और अकेले बच जाने के बाद भी दुर्योधन जल के भीतर से अपनी वीरता का बखान कर रहा था।

(ख) ‘यदि बल है तो आ न बाहर’ वक्ता ने किसे, कब तथा क्यों ललकारा है?

उत्तर – युधिष्ठिर ने दुर्योधन को ललकारा है। जब दुर्योधन सरोवर के भीतर छिपकर अपनी शक्ति की डींगें मार रहा था, तब युधिष्ठिर ने उसे बाहर आकर युद्ध करके राज्य प्राप्त करने की चुनौती दी।

(ग) ‘अरे नीच’ ! का संबोधन जिसके लिए प्रयोग किया गया है उसके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ बताइए।

उत्तर – वह अहंकारी, महत्त्वाकांक्षी, हठी और साहसी योद्धा है। उसमें कूटनीतिक समझ है और वह अपने पक्ष को सही सिद्ध करने के लिए प्रबल तर्क देता है। वह पराजय स्वीकार करने के बजाय वीरगति प्राप्त करना श्रेष्ठ समझता है।

(घ) वक्ता ने श्रोता की किन थोथी बातों का उल्लेख किया है और क्यों?

उत्तर – दुर्योधन जल के भीतर से कह रहा था कि उसकी भुजाओं का बल अभी नष्ट नहीं हुआ है और वह पांडवों की सत्ता स्वीकार नहीं करेगा। युधिष्ठिर इन्हें ‘थोथी’ बातें कहते हैं क्योंकि उसकी पूरी सेना नष्ट हो चुकी थी और वह अकेला असहाय था।

 

(iii) जिस कालाग्नि को तूने वर्षों घृत देकर उभारा है, लपटों में साथी तो स्वाहा हो गए। उसके घेरे से तू क्यों बचना चाहता है? अच्छी तरह समझ ले, ये तेरी आहुति लिए बिना शांत न होगा।

(क) ‘कालाग्नि’ शब्द का प्रयोग किस संदर्भ में हुआ है और क्यों?

उत्तर – इसका प्रयोग महाभारत के भीषण युद्ध के संदर्भ में हुआ है। दुर्योधन की ईर्ष्या और हठ ने विनाश की ऐसी आग पैदा की जिसने पूरे कुरुवंश को भस्म कर दिया।

(ख) ‘घृत’ शब्द का प्रयोग किस लिए किया गया है? किसके साथी कब और क्यों स्वाहा हो गए?

उत्तर – घृत’ का अर्थ है—आग को भड़काने वाला तत्त्व। दुर्योधन की ईर्ष्या, छल और पांडवों के प्रति नफरत ने युद्ध की आग में घी का काम किया। दुर्योधन के सभी साथी भाई, मित्र और सेना)कुरुक्षेत्र के युद्ध में स्वाहा हो गए।

(ग) वक्ता कौन है? उसका परिचय दीजिए।

उत्तर – वक्ता भीम हैं। भीम पांडवों में शारीरिक रूप से सबसे बलशाली हैं और उन्होंने ही दुर्योधन के सौ भाइयों का वध करने की प्रतिज्ञा की थी। वे स्वभाव से उग्र और स्पष्टवादी हैं।

(घ) ‘तेरी आहुति लिए बिना शांत न होगा’ – वाक्य का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – इसका आशय है कि युद्ध की जिस आग को दुर्योधन ने शुरू किया था, वह तब तक शांत नहीं होगी जब तक उसमें स्वयं दुर्योधन का अंत न हो जाए।

 

(iv) अरे पामर ! तेरा धर्म तब कहाँ चला गया था, जब एक निहत्थे बालक को सात-सात महारथियों ने मिलकर मारा था, जब आधा राज्य तो दूर सूई की नोक के बराबर भी भूमि देना तुझे अनुचित लगा था। अपने अधर्म से इस पुण्य लोक भारत भूमि में द्वेष की ज्वाला धधकाकर अब तू धर्म की दुहाई देता है? धिक्कार है तेरे ज्ञान को धिक्कार है तेरी वीरता को।

(क) ‘पामर’ शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है? क्या आप इस संबोधन को उचित मानते हैं?

उत्तर – यह शब्द दुर्योधन के लिए प्रयोग किया गया है। इसका अर्थ ‘नीच’ या ‘अधर्मी’ है। वक्ता के अनुसार यह संबोधन उचित है क्योंकि दुर्योधन ने जीवन भर अधर्म का साथ दिया था।

(ख) निहत्था बालक कौन था? उसे सात महारथियों द्वारा कब और किस प्रकार मारा गया था? घटना का संकेत कीजिए।

उत्तर – वह बालक अभिमन्यु अर्जुन का पुत्र था। महाभारत युद्ध के 13वें दिन द्रोणाचार्य द्वारा रचित चक्रव्यूह में अभिमन्यु को फँसा लिया गया था और सात महारथियों जैसे द्रोण, कर्ण, दुर्योधन आदि ने मिलकर निहत्थे अभिमन्यु की छल से हत्या की थी।

(ग) वक्ता के अनुसार श्रोता को कौन-सी बात अनुचित लगी थी तथा कब?

उत्तर – दुर्योधन को पांडवों को उनका आधा राज्य देना अनुचित लगा था। यहाँ तक कि संधि के समय उसने पांडवों को सूई की नोक के बराबर भूमि देने से भी मना कर दिया था।

(घ) वक्ता के अनुसार श्रोता ने धर्म की दुहाई किस प्रकार दी

उत्तर – जब दुर्योधन थक गया और निहत्था हो गया, तब वह युधिष्ठिर से धर्म की बातें करने लगा कि एक थके हुए व्यक्ति को मारना अधर्म है। युधिष्ठिर उसे उसके पुराने पाप याद दिलाकर उसकी इस ‘धर्म की दुहाई’ को धिक्कारते हैं।

(v) पहले वीरता का दंभ और अंत में करुणा की भीख ! कायरों का यही नियम है। परंतु दुर्योधन ! कान खोलकर सुन लो। हम तुम्हें दया करके छोड़ेंगे भी नहीं और तुम्हारी भाँति अधर्म से हत्या कर बधिक भी न कहलाएँगे।

(क) वक्ता और श्रोता कौन हैं? वक्ता ने कायरों के किस नियम का उल्लेख किया है?

उत्तर – वक्ता युधिष्ठिर और श्रोता दुर्योधन हैं। वक्ता के अनुसार कायरों का नियम है कि जब तक शक्ति होती है, वे अहंकार दिखाते हैं और जब हारने लगते हैं, तो दया की भीख माँगने लगते हैं।

(ख) वक्ता के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर – वे न्यायप्रिय, मर्यादित और उदार हैं। वे अपने शत्रु को भी बराबरी का मौका देना चाहते हैं ताकि इतिहास उन्हें ‘बधिक’ या हत्यारा न कहे।

(ग) वक्ता के अनुसार उसने श्रोता से किस प्रकार का युद्ध करने की पेशकश की और क्यों?

उत्तर – युधिष्ठिर ने प्रस्ताव दिया कि दुर्योधन अपनी पसंद का कोई भी अस्त्र चुन ले और पाँचों भाइयों में से किसी भी एक व्यक्ति से युद्ध करे। यदि वह जीत गया, तो पांडव उसे पूरा राज्य लौटा देंगे। ऐसा उन्होंने ‘धर्म’ की रक्षा के लिए किया।

(घ) इस युद्ध का क्या परिणाम निकला?

उत्तर – दुर्योधन ने गदा चुनी और भीम के साथ उसका द्वंद्व हुआ। अंत में भीम ने उसकी जंघा पर प्रहार कर उसे परास्त किया।

 

(vi) विफलता के इस मरुस्थल में एक बूँद आएगी भी तो सूखकर खो जाएगी। यदि तुम्हें इसी में संतोष हो कि तुम्हारा महत्त्वाकांक्षा मेरी मृत देह पर ही अपना जयस्तंभ उठाए तो फिर यही सही।

(क) वक्ता कौन है? उपर्युक्त कथन का संदर्भ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – वक्ता दुर्योधन है। संदर्भ यह है कि जब युधिष्ठिर उसे एक व्यक्ति से युद्ध कर राज्य जीतने का मौका देते हैं, तब दुर्योधन निराशा में यह बात कहता है।

(ख) ‘विफलता के इस मरुस्थल में एक बूँद आएगी भी तो सूखकर खो जाएगी’ – आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – दुर्योधन का अर्थ है कि उसकी हार अब निश्चित है। विफलता के इस विशाल रेगिस्तान में जहाँ सब कुछ खत्म हो चुका है, अगर उसे जीत की एक बूँद मिल भी जाए, तो उसका कोई मोल नहीं रह जाएगा क्योंकि उसके पास उस राज्य का भोग करने के लिए न भाई बचे हैं, न मित्र।

(ग) ‘यदि तुम्हें इसी में संतोष हो ‘कथन का संदर्भ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – युधिष्ठिर की ‘महत्त्वाकांक्षा’ के संदर्भ में दुर्योधन कहता है कि यदि पांडवों को उसकी मृत्यु से ही संतोष मिलता है, तो वह मरने के लिए तैयार है।

(घ) ‘महाभारत की एक साँझ’ एकांकी के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।

उत्तर – ‘महाभारत की एक साँझ’ शीर्षक सार्थक है क्योंकि यह एकांकी युद्ध के अंतिम समय अर्थात् साँझ को दिखाती है। यह केवल दिन की साँझ नहीं, बल्कि दुर्योधन के जीवन और एक पूरे युग की साँझ का प्रतीक है।

(vii) पश्चातताप तो तुम्हें होना चाहिए। मैं क्यों पश्चाताप करूँगा? मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया है? मैंने अपने मन के भावों को गुप्त नहीं रखा, मैंने षड्यंत्र नहीं किया, मैंने गुरुजनों का वध नहीं किया?

(क) आपकी दृष्टि में ‘पश्चाताप’ किसे होना चाहिए था? वक्ता को या श्रोता को? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – नाटक के पारंपरिक दृष्टिकोण से दुर्योधन को पश्चात्ताप होना चाहिए, लेकिन इस एकांकी में दुर्योधन के तर्क इतने प्रबल हैं कि वे युधिष्ठिर को भी सोचने पर मजबूर कर देते हैं। वास्तव में, युद्ध के विनाश के लिए दोनों पक्ष किसी न किसी रूप में उत्तरदायी थे।

(ख) वक्ता ने अपने पक्ष में कौन-कौन-से तर्क रखे?

उत्तर – दुर्योधन कहता है कि उसने षड्यंत्र नहीं किया, उसने अपने मन के भावों को कभी नहीं छिपाया। वह खुलकर सामने लड़ा और उसने स्वयं गुरुजनों का वध नहीं किया जबकि पांडवों ने भीष्म और द्रोण को छल से मारा।

(ग) श्रोता के अनुसार वह वक्ता के पास किस उद्देश्य से आया था?

उत्तर – युधिष्ठिर दुर्योधन के पास उसे सांत्वना देने और उसकी पीड़ा बाँटने आए थे।

(घ) एकांकीकार ने एकांकी में किस पौराणिक घटना को नए संदर्भ में किस प्रकार प्रस्तुत किया है?

उत्तर – लेखक डॉ. रामकुमार वर्मा ने दुर्योधन को केवल एक खलनायक न दिखाकर एक तार्किक और आत्म-गौरव से भरे योद्धा के रूप में प्रस्तुत किया है, जो विजेता के लिखे इतिहास पर सवाल उठाता है।

 

(viii) मैं तुम्हारी आत्मप्रशंसा नहीं सुन सकता, इसे तुम अपने भक्तों के लिए ही रहने दो। तुम विजय की

डींग मार सकते हो, पर धर्म की दुहाई मत दो।

(क) युधिष्ठिर ने अपनी प्रशंसा में क्या-क्या कहा था?

उत्तर – युधिष्ठिर ने कहा था कि उन्होंने सदा न्याय किया है और न्याय के मार्ग पर चलने के लिए उन्होंने अपने सगे-संबंधियों की मृत्यु के दुख को भी शांत भाव से सहा है।

(ख) दुर्योधन के अनुसार राज्य पर युधिष्ठिर का अधिकार क्यों नहीं था?

उत्तर – दुर्योधन के अनुसार, राज्य वास्तव में उसके पिता धृतराष्ट्र का था। पांडु को राज्य केवल इसलिए मिला क्योंकि धृतराष्ट्र अंधे थे। अतः धृतराष्ट्र के बाद राज्य का उत्तराधिकारी दुर्योधन होना चाहिए था, न कि पांडु का पुत्र युधिष्ठिर।

(ग) युधिष्ठिर ने दुर्योधन की इस बात का किस प्रकार उत्तर दिया?

उत्तर – युधिष्ठिर ने तर्क दिया कि एक बार जब उनके पिता पांडु राजा बन गए, तो राजनियम के अनुसार उनके बाद उनके पुत्र का ही अधिकार बनता है।

(घ) ‘सबने मेरा हठ देखा, मेरे पक्ष का न्याय किसी ने न देखा’ – दुर्योधन ने इसका क्या कारण बताया?

उत्तर – दुर्योधन ने कहा कि लोग युधिष्ठिर के गुणों से प्रभावित थे और उनकी वीरता से डरते थे, इसलिए किसी ने दुर्योधन के पक्ष के न्याय को नहीं देखा और सब उसे ‘हठ’ कहते रहे।

(ix) ‘तभी तो कहता हूँ युधिष्ठिर ! कि स्वार्थ ने तुम्हें अंधा बना दिया, अन्यथा इतनी छोटी-सी बात क्या तुम्हें दिखाई न पड़ जाती कि जितने धार्मिक और न्यायी व्यक्ति थे, सबने इस युद्ध में मेरा साथ दिया है।’

(क) गुरुजनों पर तुम व्यर्थ ही कायरता का आरोप लगा रहे हो – युधिष्ठिर ने अपने कथन के समर्थन में

उत्तर – युधिष्ठिर ने अपने कथन के समर्थन में यह तर्क दिया कि पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य और विदुर जैसे गुरुजन कायर नहीं थे। यदि पांडवों का पक्ष अधर्म पर होता, तो ये विद्वान कभी भी पांडवों को राज्य देने की माँग न करते। उन्होंने सदा सत्य का साथ दिया, इसलिए वे पांडवों के अधिकारों के पक्षधर थे।

(ख) दुर्योधन ने क्यों कहा कि स्वार्थ ने तुम्हें अंधा बना दिया।

उत्तर – दुर्योधन ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि उसके अनुसार युधिष्ठिर अपनी महत्त्वाकांक्षा के कारण यह बुनियादी सत्य नहीं देख पा रहे थे कि राज्य पर वास्तविक अधिकार धृतराष्ट्र का था। दुर्योधन का मानना था कि युधिष्ठिर केवल अपने लाभ की बात सोच रहे हैं, इसलिए उन्हें न्याय दिखाई नहीं दे रहा।

(ग) दुर्योधन ने किन-किन धार्मिक और न्यायी व्यक्तियों के नाम लिए जो युद्ध में अपनी ओर से लड़े? सब मेरी ओर से लड़े, दुर्योधन ने ऐसा क्यों कहा?

उत्तर – दुर्योधन ने भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य और अश्वत्थामा के नाम लिए। उसने कहा कि ये सभी उसकी ओर से लड़े, जो इस बात का प्रमाण है कि न्याय वास्तव में दुर्योधन की ओर था। दुर्योधन का तर्क था कि इतने महान और धर्मनिष्ठ लोग जान-बूझकर अधर्म का साथ नहीं दे सकते थे।

(घ) ‘कृष्ण’ के संबंध में दुर्योधन ने क्या कहा?

उत्तर – दुर्योधन ने कृष्ण को ‘चतुर’ कहा। उसने आरोप लगाया कि कृष्ण ने दोनों पक्षों से मैत्री बनाए रखने के लिए अपनी नारायणी सेना तो दुर्योधन को दे दी, लेकिन स्वयं पांडवों के साथ रहे। दुर्योधन के अनुसार, कृष्ण ने भी यह समझा था कि न्याय का पलड़ा दुर्योधन की ओर है, इसलिए उन्होंने पूरी तरह पांडवों का साथ नहीं दिया।

 

(x) सत्य को ढँकने का प्रयत्न न करो युधिष्ठिर! उसे निष्पक्ष होकर जाँचो। मेरे पास प्रमाणों की कमी नहीं है।

(क) दुर्योधन ने पुरोचन और द्रुपद के संबंध में किस तथ्य को प्रकट किया?

उत्तर – दुर्योधन ने आरोप लगाया कि पांडवों ने पुरोचन को कपट से मार दिया। उसके बाद वे पंचाल देश गए और वहां के राजा द्रुपद को अपनी ओर मिला लिया ताकि वे अपना सैन्य बल बढ़ा सकें और कुरुवंश पर दबाव बना सकें।

(ख) अपने पिता जी द्वारा युधिष्ठिर को आधा राज्य दे दिए जाने का क्या कारण बताया?

उत्तर – दुर्योधन के अनुसार, धृतराष्ट्र ने पांडवों को आधा राज्य प्रेमवश नहीं, बल्कि उनकी बढ़ती शक्ति को देखकर और संभावित युद्ध के डर से दिया था। जब पांडवों ने द्रुपद के साथ गठबंधन कर लिया, तब पिता जी को सुरक्षा की दृष्टि से यह निर्णय लेना पड़ा।

(ग) ‘आधा राज्य पाकर भी तुमने चैन न लिया’ – इस संबंध में दुर्योधन ने युधिष्ठिर पर क्या आरोप लगाए?

उत्तर – दुर्योधन ने आरोप लगाया कि आधा राज्य मिलने के बाद भी युधिष्ठिर शांत नहीं बैठे। उन्होंने अर्जुन को चारों ओर ‘दिग्विजय’ के लिए भेजा और राजसूय यज्ञ के बहाने जरासंध और शिशुपाल जैसे राजाओं को समाप्त कर दिया, जो वास्तव में युद्ध की तैयारी थी।

(घ) जुए के खेल के संबंध में दुर्योधन ने युधिष्ठिर से क्या कहा?

उत्तर – दुर्योधन ने कहा कि युधिष्ठिर ने जुए में अपनी ईर्ष्या के कारण दाँव लगाया था। उन्होंने सोचा था कि यदि वे जीत गए, तो उन्हें दुर्योधन का राज्य बिना किसी युद्ध के मिल जाएगा। दुर्योधन के अनुसार, जुए में राज्य हारना युधिष्ठिर की अपनी हार थी, कोई साजिश नहीं।

(xi) ‘सत्य को विचित्र मानकर उड़ा नहीं सकते युधिष्ठिर ! अपने ही कृत्य से वनवास पाकर भी उसका दोष मेरे ही मत्थे मढ़ा गया।’

(क) दुर्योधन ने पांडवों के वनवास के लिए युधिष्ठिर को ज़िम्मेदार क्यों ठहराया?

उत्तर – दुर्योधन ने युधिष्ठिर को इसलिए ज़िम्मेदार ठहराया क्योंकि युधिष्ठिर ने अपनी महत्त्वाकांक्षा के कारण जुआ खेला और अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया। दुर्योधन का मानना था कि वनवास युधिष्ठिर के अपने गलत कृत्यों का फल था, न कि दुर्योधन का अन्याय।

(ख) दुर्योधन के अनुसार पांडवों ने वनवास का एक-एक क्षण किस प्रकार युद्ध की तैयारी में लगाया?

उत्तर – दुर्योधन के अनुसार पांडवों ने वनवास का समय तपस्या में नहीं, बल्कि हथियारों को जुटाने में बिताया। अर्जुन ने तपस्या के माध्यम से दिव्य शस्त्रास्त्र प्राप्त किए और राजा विराट से मैत्री कर नए शक्तिशाली संबंध बनाए।

(ग) दुर्योधन के अनुसार युधिष्ठिर ने द्रौपदी का किस प्रकार अपमान किया था?

उत्तर – दुर्योधन ने तर्क दिया कि युधिष्ठिर ने स्वयं द्रौपदी को जुए में दाँव पर लगाया था, जो स्वयं में द्रौपदी का अपमान था। दुर्योधन के अनुसार, जब द्रौपदी सभा में आई, तो वह जुए में जीती हुई एक दासी थी, और उसके साथ वैसा ही व्यवहार किया गया।

(घ) दुर्योधन के अनुसार अभिमन्यु के विवाह के बहाने पांडवों ने कौन-सी चाल चली?

उत्तर – दुर्योधन के अनुसार, अभिमन्यु का विवाह मात्र एक उत्सव नहीं था, बल्कि वह एक बहाना था जिसके जरिए पांडवों ने विभिन्न राजाओं को आमंत्रित किया और उन्हें युद्ध के लिए अपनी ओर एकत्रित किया।

(xii) ‘अंतर्यामी भी जानते हैं कि मैंने कोई बुरा आचरण नहीं करना चाहा। मैंने एकमात्र अपनी रक्षा की।’

(क) अपने कथन के समर्थन में दुर्योधन ने क्या तर्क दिया?

उत्तर – दुर्योधन ने तर्क दिया कि उसने जो कुछ किया, अपनी रक्षा के लिए किया। उसने तब तक आक्रमण नहीं किया जब तक उसे विवश नहीं किया गया।

(ख) ‘क्या अभिमन्यु वध वीरोचित था? युधिष्ठिर द्वारा यह प्रश्न पूछे जाने पर दुर्योधन ने क्या उत्तर दिया?

उत्तर – दुर्योधन ने उत्तर दिया कि यदि भीष्म, द्रोण और कर्ण का वध जो छल से किया गया था, वीरोचित हो सकता है, तो अभिमन्यु का वध क्यों नहीं? उसने भीम द्वारा अपनी जंघा पर किए गए प्रहार को भी अधर्म बताया।

(ग) भीमसेन और अपने युद्ध के बारे में दुर्योधन ने क्या कहा?

उत्तर – दुर्योधन ने कहा कि भीम ने उसे गदा युद्ध के नियमों के विरुद्ध जाकर पराजित किया है, जो किसी भी तरह से वीरता नहीं कही जा सकती।

(घ) दुर्योधन ने महाभारत के नरसंहार के लिए क्या कारण बताया?

उत्तर – दुर्योधन ने युधिष्ठिर की महत्त्वाकांक्षा को ही इस भीषण रक्तपात का मूल कारण बताया।

 

(xiii) सब तुम्हारे गुणों से प्रभावित थे, सब तुम्हारी वीरता से डरते थे। कायरों की भाँति रक्तपात से बचने के प्रयत्न में वे न्याय और सत्य का बलिदान कर बैठे। वे यह समझ नहीं पाए कि भय जिसका आधार हो, वह शांति स्थायी नहीं हो सकती।

(क) वक्ता और श्रोता कौन-कौन हैं? कथन का संदर्भ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – वक्ता दुर्योधन और श्रोता युधिष्ठिर हैं। संदर्भ दुर्योधन के उस तर्क का है जहाँ वह बताता है कि क्यों दुनिया उसे गलत मानती है।

(ख) ‘सब’ शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है? क्या आप दुर्योधन के कथन से सहमत हैं?

उत्तर – ‘सब’ शब्द का प्रयोग पितामह भीष्म, द्रोण, विदुर और कृपाचार्य जैसे बुजुर्गों के लिए प्रयोग किया गया है। दुर्योधन के अनुसार ये लोग सत्य जानते हुए भी पांडवों के पक्ष में झुके रहे।

(ग) दुर्योधन के अनुसार ‘न्याय’ एवं ‘सच’ क्या था? क्या आप उससे सहमत हैं

उत्तर – दुर्योधन के अनुसार न्याय यह था कि अंधे पिता के बाद पुत्र को राज्य मिले। पाठक के रूप में हम आंशिक रूप से सहमत हो सकते हैं कि सत्ता का संघर्ष जटिल था, लेकिन दुर्योधन के तरीके, जैसे चीर-हरण आदि कृत्य अनैतिक थे।

(घ) ‘भय जिसका आधार हो वह शांति स्थायी नहीं हो सकती।’- कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – दुर्योधन का आशय है कि जो शांति ‘भय’ या ‘शक्ति’ के बल पर स्थापित की जाती है, वह कभी स्थायी नहीं होती। पांडवों ने जो राज्य बलपूर्वक लिया है, वह वास्तविक शांति नहीं ला पाएगा।

 

 

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