डॉ० रामकुमार वर्मा – एकांकीकार का परिचय
डॉ॰ रामकुमार वर्मा का जन्म 15 सितंबर, सन् 1905 को मध्य प्रदेश के सागर ज़िले में हुआ था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा सागर में तथा उच्च शिक्षा प्रयाग विश्वविद्यालय में हुई। नागपुर विश्वविद्यालय से इन्होंने पी एच०डी० की उपाधि प्राप्त की। वर्मा जी प्रयाग विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष भी रहे। सन् 1963 में भारत सरकार से इन्हें पद्म भूषण की उपाधि से अलंकृत किया।
छात्रावस्था से ही ये रंगमंच से जुड़ गए थे इसलिए इनके नाटकों तथा एकांकियों में अभिनेयता का गुण प्रचुर मात्रा में विद्यमान रहता है। आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। इन्होंने काव्य, नाटक, निबंध, आलोचना जैसी विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई। सन् 1990 में इनका निधन हो गया।
वर्मा जी को हिंदी नाटकों का जनक कहा जाता है। इनके अधिकांश नाटक ऐतिहासिक तथा सामाजिक समस्याओं से जुड़े होते हैं। इनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं- ‘पृथ्वीराज की आँखें’, ‘रेशमी टाई’, ‘सप्त किरण’, ‘कौमुदी महोत्सव’, ‘दीपदान’, ‘चित्र रेखा’, ‘जूही के फूल’, ‘जौहर’ आदि।
एकांकी का कथानक
डॉ. रामकुमार वर्मा द्वारा रचित ‘दीपदान’ एक अत्यंत मार्मिक और ऐतिहासिक एकांकी है। यह एकांकी त्याग, बलिदान और राजभक्ति की पराकाष्ठा को दर्शाती है।
इस एकांकी का कथानक राजस्थान के इतिहास की एक प्रसिद्ध घटना पर आधारित है, जिसका मुख्य केंद्र बिन्दु पन्ना धाय का अद्वितीय बलिदान है।
- उत्सव और षड्यंत्र का वातावरण
चित्तौड़ के राजमहल में रास-रंग और नाच-गाने का उत्सव मनाया जा रहा है। दासी-पुत्र बनवीर ने ‘मयूर पक्ष कुंड’ में ‘दीपदान’ के उत्सव का आयोजन किया है। उसका वास्तविक उद्देश्य इस नाच-गाने में सभी का ध्यान भटकाकर निष्कंटक राज्य प्राप्त करना और राजवंश के उत्तराधिकारी कुँवर उदय सिंह की हत्या करना है।
- पन्ना धाय की सतर्कता
पन्ना धाय, जो कुँवर उदय सिंह की संरक्षिका है, बनवीर की चाल को भांप लेती है। वह उदय सिंह को नाच देखने जाने से रोक देती है। बनवीर की कूटनीति के तहत ‘सोना’ (रावल सरूप सिंह की बेटी) पन्ना को लुभाने और उदय सिंह को साथ ले जाने आती है, लेकिन पन्ना उसे डांटकर भगा देती है।
- संकट की सूचना
अंतःपुर की परिचारिका सामली घबराती हुई आती है और पन्ना को सूचना देती है कि बनवीर ने महाराणा विक्रमादित्य की हत्या कर दी है और अब वह उदय सिंह को मारने आ रहा है। पूरे महल को सैनिकों ने घेर लिया है।
- कुँवर की रक्षा की युक्ति
पन्ना धाय उदय सिंह को बचाने का एक साहसी निर्णय लेती है। वह जूठी पत्तल उठाने वाले बारी कीरत की सहायता लेती है। उदय सिंह को एक बड़ी टोकरी में सुलाकर, ऊपर से जूठी पत्तलें ढककर कीरत उसे सुरक्षित महल से बाहर बेरिस नदी के किनारे ले जाता है।
- पुत्र का बलिदान (मार्मिक मोड़)
अब पन्ना के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बनवीर को कैसे धोखा दिया जाए। वह अपने कलेजे पर पत्थर रखकर अपने इकलौते पुत्र चंदन को उदय सिंह के वस्त्र पहनाकर राजकुमार की शैया पर सुला देती है। चंदन भी अपनी माँ की आज्ञा मानकर निडरता से सो जाता है। पन्ना का हृदय कांप रहा है, लेकिन उसकी राजभक्ति ममता से बड़ी है।
- बनवीर का आगमन और अंत
नशे में धुत और हाथ में नंगी तलवार लिए बनवीर उदय सिंह के कक्ष में प्रवेश करता है। वह पन्ना को जागीर का लालच देता है, लेकिन पन्ना उसे धिक्कारती है। क्रोध में अंधा बनवीर शैया पर सोए हुए बालक (चंदन) को उदय सिंह समझकर उस पर तलवार से भीषण प्रहार करता है। अपनी आँखों के सामने अपने पुत्र की हत्या होते देख पन्ना चीख मारकर मूर्च्छित हो जाती है।
निष्कर्ष
एकांकी का शीर्षक ‘दीपदान’ अत्यंत सार्थक है। जहाँ नगर की स्त्रियाँ कुंड में मिट्टी के दीपक दान कर रही थीं, वहीं पन्ना धाय ने मेवाड़ के कुल-दीपक उदय सिंह की रक्षा के लिए अपने जीवन के एकमात्र दीपक अपने पुत्र चंदन का दान कर दिया।
एकांकी के प्रमुख बिंदु
पन्ना धाय का चरित्र – त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और वीरता का प्रतीक।
बनवीर का चरित्र – क्रूरता, विलासिता और विश्वासघात का प्रतीक।
उद्देश्य – राष्ट्रभक्ति और स्वामीभक्ति के लिए व्यक्तिगत सुखों और ममता का बलिदान।
पात्रों की चारित्रिक विशेषताएँ
(क) पन्ना धाय (मुख्य पात्र)
त्याग और बलिदान की प्रतिमूर्ति – पन्ना एकांकी की केंद्रबिंदु है। वह चित्तौड़ के राजवंश को बचाने के लिए अपने इकलौते पुत्र ‘चंदन’ का बलिदान दे देती है। उसका यह कृत्य विश्व इतिहास में अद्वितीय है।
अटल देशभक्ति और स्वामीभक्ति – उसके लिए उसका ‘नमक’ उसके ‘रक्त’ से बड़ा है। वह कहती है— “मेरे महाराणा का नमक मेरे रक्त से भी महान है।”
बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता – वह बनवीर की कूटनीति को पहले ही भांप लेती है। कीरत बारी की टोकरी में उदय सिंह को सुरक्षित बाहर भेजना उसकी सूझबूझ का प्रमाण है।
ममता और कर्तव्य का द्वंद्व – एक माँ होने के नाते उसका हृदय रोता है, लेकिन एक धाय माँ होने के नाते वह कर्तव्य को ऊपर रखती है।
(ख) बनवीर (प्रतिनायक/खलनायक)
क्रूर और सत्तालोलुप – वह सत्ता पाने के लिए अपने ही भाई के पुत्रों की हत्या करने पर उतारू है। उसने सोए हुए विक्रमादित्य की हत्या की।
षड्यंत्रकारी – वह ‘दीपदान’ जैसे उत्सव का आयोजन केवल लोगों का ध्यान भटकाने और हत्या के प्रयास को छिपाने के लिए करता है।
विलासी और नीच – वह पन्ना को जागीर का लालच देकर खरीदना चाहता है, जो उसकी घटिया मानसिकता को दर्शाता है।
(ग) चंदन (पन्ना का पुत्र)
पितृभक्त और साहसी – केवल तेरह वर्ष की आयु में वह अपनी माँ की आज्ञा मानकर राजकुमार की शैया पर निर्भय होकर सो जाता है।
राजवंश के प्रति समर्पित – वह अनजाने में ही सही, लेकिन एक राजकुमार की मौत मरकर इतिहास में अमर हो जाता है।
(घ) कुँवर उदय सिंह
भोला और निष्कपट – वह चौदह वर्ष का बालक है, जो राजनीति और षड्यंत्रों से अनजान है। वह केवल नाच-रंग और खेल में रुचि रखता है।
एकांकी का उद्देश्य
डॉ. रामकुमार वर्मा ने इस एकांकी के माध्यम से निम्नलिखित उद्देश्यों को स्पष्ट किया है –
राष्ट्रभक्ति और कर्तव्यबोध – एकांकी का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना है कि राष्ट्र और स्वामी की रक्षा के लिए व्यक्तिगत सुख, मोह और यहाँ तक कि अपनी संतान का बलिदान देना भी श्रेष्ठ धर्म है।
ऐतिहासिक गौरव का पुनरुद्धार – लेखक राजस्थान के गौरवशाली इतिहास और ‘पन्ना धाय’ जैसी महान नारियों के चरित्र को समाज के सामने लाना चाहते थे, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ प्रेरणा ले सकें।
सत्य और असत्य का संघर्ष – एकांकी यह दिखाती है कि भले ही अधर्म (बनवीर) तात्कालिक रूप से शक्तिशाली लगे, लेकिन अंततः जीत त्याग और सत्य (पन्ना) की ही होती है क्योंकि उदय सिंह बच जाते हैं और भविष्य में राजवंश को आगे बढ़ाते हैं।
नारी शक्ति का चित्रण – पन्ना के माध्यम से लेखक ने भारतीय नारी के उस रूप को प्रस्तुत किया है जो केवल कोमल ही नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर वज्र के समान कठोर निर्णय भी ले सकती है।
निष्कर्ष
‘दीपदान’ का अर्थ केवल मिट्टी के दीयों का दान नहीं है, बल्कि पन्ना द्वारा अपने कुल-दीपक पुत्र चंदन का बलिदान देकर उदय सिंह अर्थात् चित्तौड़ के कुल-दीपक को जलाए रखना है।
कठिन शब्दों के सरल अर्थ
1 – अंतःपुर – महल का भीतरी भाग (जनाना खाना) – Inner apartments / Harem
2 – उत्तराधिकारी – वारिस – Successor / Heir
3 – संरक्षण – देख-रेख – Protection / Guardianship
4 – नटखट – चंचल / शरारती – Naughty / Mischievous
5 – परिचारिका – सेविका – Maidservant / Attendant
6 – दासी-पुत्र – दासी की संतान – Son of a maid
7 – प्रहर – समय का एक भाग (3 घंटे) – A watch / Quarter of a day
8 – शैया – बिस्तर – Bed / Couch
9 – पार्श्व – बगल / बाजू – Side / Flank
10 – नेपथ्य – पर्दे के पीछे का स्थान – Backstage
11 – मृदंग – एक प्रकार का ढोल – A kind of drum
12 – कड़खा – वीरों की स्तुति गान – Heroic ballad / Eulogy
13 – रमक – झनकार / ताल – Rhythm / Vibration
14 – रंक – गरीब / कंगाल – Pauper / Beggar
15 – राव – राजा / सामंत – King / Chieftain
16 – ध्रम (धर्म) – कर्तव्य / धर्म – Duty / Religion
17 – त्रिया – स्त्री – Woman
18 – ताव – क्रोध / गर्मी – Anger / Heat
19 – म्यान – तलवार रखने का ढांचा – Scabbard / Sheath
20 – कुल-दीपक – वंश का चिराग – Light of the lineage
21 – मचलना – जिद करना – To be stubborn / Insist
22 – विश्राम – आराम – Rest
23 – उद्यत – तैयार – Ready / Prepared
24 – नूपुर – पायल / घुँघरू – Anklet
25 – अट्टहास – ज़ोर की हँसी – Loud laugh / Guffaw
26 – मातृत्व – ममता / माँ का भाव – Motherhood
27 – खोखला – खाली – Hollow
28 – अनुग्रह – कृपा – Grace / Favor
29 – भवसागर – दुनिया रूपी सागर – Ocean of existence
30 – थिरकना – नाचना – To quiver / Dance
31 – उमंग – उत्साह – Enthusiasm / Joy
32 – प्रवाह – बहाव – Flow
33 – मस्तक – माथा – Forehead / Head
34 – उषा – भोर / सुबह – Dawn
35 – मल्ल-क्रीड़ा – कुश्ती – Wrestling
36 – प्रलाप – बकवास / व्यर्थ की बातें – Delirium / Raving
37 – सामंत – दरबारी योद्धा – Feudal lord / Noble
38 – ईर्ष्या – जलन – Envy / Jealousy
39 – आगमन – आना – Arrival
40 – मौन – चुप – Silent
41 – सुगंधि – खुशबू – Fragrance
42 – पतंगा – शलभ (कीड़ा) – Moth
43 – कूटनीति – चालबाजी / राजनीति – Diplomacy / Strategy
44 – विद्रोह – बगावत – Rebellion / Revolt
45 – जौहर – सतीत्व की रक्षा हेतु अग्नि स्नान – Self-immolation (Jauhar)
46 – अतृप्त – जो संतुष्ट न हो – Unsatisfied
47 – चिनगारी – आग का कण – Spark
48 – किरकिरी – आँख में चुभने वाला कण – Grittiness / Irritant
49 – हवनकुंड – यज्ञ की वेदी – Sacrificial pit
50 – आत्म-बलिदान – स्वयं का त्याग – Self-sacrifice
51 – प्रतिध्वनि – गूंज – Echo
52 – गुमसुम – शांत / उदास – Quiet / Somber
53 – दर्शन – देखना (श्रद्धा भाव से) – Glimpse / Vision
54 – छलाँग – कूद – Leap / Jump
55 – धावा – हमला / आक्रमण – Raid / Attack
56 – भोला – मासूम – Innocent / Simple
57 – धमक – भारी आवाज़ – Thud / Vibration
58 – सर्वनाश – पूरी तरह विनाश – Complete destruction
59 – त्रिशूल – तीन नोक वाला अस्त्र – Trident
60 – कुशल – खैरियत – Well-being
61 – अवसर – मौका – Opportunity
62 – शंका – शक – Doubt / Suspicion
63 – निष्कंटक – बिना बाधा के – Thorny-less / Unobstructed
64 – अत्याचारी – ज़ुल्म करने वाला – Oppressor / Tyrant
65 – असंतुष्ट – नाखुश – Dissatisfied
66 – भैरवी – काली का रूप (भयानक) – Goddess Bhairavi
67 – नराधम – नीच मनुष्य – Wicked person
68 – जीभ – जिह्वा – Tongue
69 – चरन लागों – पैर छूना (प्रणाम) – Bowing at feet
70 – अन्नदाता – मालिक / राजा – Provider / Master
71 – पैसारा (प्रवेश) – प्रवेश / घुसना – Entry
72 – बारी – पत्तल उठाने वाली जाति – Leaf-plate cleaner
73 – ब्यारू – रात का भोजन – Supper / Dinner
74 – जुग-जुग – लंबे समय तक – For ages
75 – उजियारा – प्रकाश – Light / Brightness
76 – बंदगी – सेवा / अभिवादन – Worship / Service
77 – हाज़िर – उपस्थित – Present / Ready
78 – तिरबाचा – तीन बार की कसम – Triple-vow
79 – बाल भी बाँका न होना – ज़रा भी नुकसान न होना – Not to be harmed at all
80 – हुकुम – आदेश – Order / Command
81 – तरकीब – उपाय / युक्ति – Trick / Method
82 – बेखटके – निडर होकर – Without hesitation
83 – दुशाला – कीमती ओढ़नी – Expensive shawl
84 – जस (यश) – कीर्ति – Fame / Glory
85 – तकलीफ – कष्ट – Trouble / Pain
86 – श्मशान – मुर्दा जलाने की जगह – Crematorium
87 – मुकुट – ताज – Crown
88 – बेहोश (मूर्च्छित) – अचेत – Unconscious
89 – भिक्षा – दान / भीख – Alms / Begging
90 – दैत्य – राक्षस – Demon
91 – वज्र – कठोर (इंद्र का शस्त्र) – Thunderbolt / Hard
92 – प्रलय – विनाश – Doomsday / Catastrophe
93 – रोम – शरीर के बाल – Body hair / Pore
94 – मर्यादा – सीमा / इज्जत – Dignity / Limit
95 – झरोखा – खिड़की – Window / Balcony
96 – आखेट – शिकार – Hunt
97 – जागीर – रियासत / जमीन – Fief / Estate
98 – स्मरण – याद – Memory / Recall
99 – शूल – कांटा / तेज दर्द – Thorn / Sharp pain
100 – आज्ञा – आदेश – Command
101 – पँखेरुआ – पक्षी – Bird
102 – वाटड़ली (बाट) – रास्ता / प्रतीक्षा – Path / Waiting
103 – बाँधना – पट्टी करना – To tie / Dress (wound)
104 – सेज – बिस्तर – Bedding
105 – कपट – छल – Deceit / Fraud
106 – अभागिनी – बदकिस्मत – Unfortunate woman
107 – कल्याण – भलाई – Welfare / Prosperity
108 – अट्टहास – ठहाका – Roaring laughter
109 – प्रहार – चोट / हमला – Blow / Strike
110 – अबोध – नादान – Innocent / Ignorant
अवतरणों पर आधारित प्रश्न
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(i) धाय माँ, देखो न कितनी सुंदर-सुंदर लड़कियाँ नाच रही हैं। गीत गाती हुई तुलजा भवानी के सामने नाच रही हैं। चलो देखो न।
(क) वक्ता एवं श्रोता कौन-कौन हैं? वक्ता का परिचय दीजिए।
उत्तर – वक्ता कुँवर उदय सिंह हैं और श्रोता पन्ना धाय हैं। उदय सिंह चित्तौड़ के स्वर्गीय महाराणा सांगा के सबसे छोटे पुत्र और राज्य के वास्तविक उत्तराधिकारी हैं। उनकी आयु चौदह वर्ष है।
(ख) धाय माँ कौन है? उसका परिचय दीजिए।
उत्तर – धाय माँ पन्ना हैं। वे खीची जाति की एक राजपूतानी हैं। वे कुँवर उदय सिंह का पालन-पोषण अपनी संतान की तरह करती हैं और उनके प्रति पूर्णतः समर्पित हैं।
(ग) सुंदर-सुंदर लड़कियाँ कहाँ नाच रही थीं और क्यों?
उत्तर – सुंदर-सुंदर लड़कियाँ महल के ‘मयूर पक्ष कुंड’ के पास तुलजा भवानी के सामने नाच रही थीं। वे बनवीर द्वारा आयोजित ‘दीपदान’ उत्सव के उपलक्ष्य में नाच रही थीं।
(घ) धाय माँ लड़कियों का नृत्य देखने क्यों नहीं जाना चाहती थी?
उत्तर – पन्ना को आभास हो गया था कि यह उत्सव केवल एक षड्यंत्र है। उनका मन किसी अनहोनी की आशंका से व्याकुल था, इसलिए वे कुँवर की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रही थीं।
(ii) नहीं कुँवर ! तुम कभी रात में अकेले नहीं जाओगे। चारों तरफ़ जहरीले सर्प घूम रहे हैं। किसी समय भी तुम्हें डँस सकते हैं।
(क) कुँवर कौन है तथा उनसे बात करने वाला कौन है?
उत्तर – कुँवर उदय सिंह हैं और उनसे बात करने वाली उनकी धाय माँ पन्ना हैं।
(ख) ‘ज़हरीले सर्प’ से वक्ता का संकेत किनकी ओर है और क्यों?
उत्तर – ‘ज़हरीले सर्प’ से वक्ता का संकेत बनवीर और उसके षड्यंत्रकारी साथियों की ओर है। जिस प्रकार सर्प घात लगाकर डसता है, उसी प्रकार बनवीर भी धोखे से उदय सिंह की हत्या करना चाहता था।
(ग) बनवीर कौन था? वह उदय सिंह को क्यों मारना चाहता था?
उत्तर – बनवीर महाराणा सांगा के भाई पृथ्वीराज का दासी-पुत्र था। वह चित्तौड़ का निष्कंटक शासक बनना चाहता था, इसलिए वह मार्ग के अंतिम काँटे उदय सिंह को मारना चाहता था।
(घ) सोना कौन थी? उसका परिचय दीजिए।
उत्तर – सोना रावल सरूप सिंह की बेटी थी। वह अत्यंत रूपवती, नटखट और कुशल नर्तकी थी। वह उदय सिंह के साथ खेलती थी और पन्ना को बातों में उलझाकर उदय सिंह को नाच दिखाने ले जाना चाहती थी।
(iii) दिन में तो तुम चित्तौड़ के सूरज हो, कुँवर ! और रात में तुम राजवंश के दीपक हो, महाराणा साँगा के कुल – दीपक।
(क) किसने, किसे चित्तौड़ का सूरज कहा और क्यों
उत्तर – पन्ना ने उदय सिंह को चित्तौड़ का सूरज कहा क्योंकि उनके जन्म से मेवाड़ का भविष्य सुरक्षित था और वे राजवंश के आशा की किरण थे।
(ख) ‘रात में तुम राजवंश के दीपक हो’ से वक्ता का क्या आशय है?
उत्तर – इसका आशय है कि उदय सिंह अपने कुल के एकमात्र जीवित उत्तराधिकारी और मर्यादा के रक्षक हैं। जैसे दीपक अँधेरे को दूर करता है, वैसे ही वे वंश को आगे बढ़ाएँगे।
(ग) कुँवर वक्ता की किस बात से रूठ गए? उसने वक्ता से क्या कहा और वक्ता ने क्या उत्तर दिया?
उत्तर – कुँवर पन्ना द्वारा नाच देखने जाने से मना करने पर रूठ गए। उन्होंने कहा कि वे न उदय सिंह बनेंगे और न कुल-दीपक। पन्ना ने उत्तर दिया कि रूठने से राजवंश नहीं चलते, उन्हें विश्राम करना चाहिए।
(घ) वक्ता ने तलवार के संबंध में क्या कहा?
उत्तर – पन्ना ने कहा कि चित्तौड़ में कोई तलवार से नहीं डरता। वीरों के हाथों में तलवार वैसे ही खिलती है जैसे लता में फूल। उन्होंने उदय सिंह को भविष्य में तलवार के साथ सोने अर्थात् युद्ध के लिए तैयार रहने की बात कही।
(iv) उन्होंने कहा, महल में धाय माँ अरावली पहाड़ बनकर बैठ गई है। अरावली पहाड़ (हँसती है) तो तुम लोग बनास नदी बनकर बहो न ! खूब नाचो, गाओ। यों आज कोई उत्सव का दिन नहीं था, फिर भी उन्होंने कहा, मेरे बनवाये हुए मयूर पक्ष कुंड में दीपदान करो।
(क) ‘उन्होंने’ शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है? उसका परिचय दीजिए।
उत्तर – यह शब्द बनवीर के लिए प्रयुक्त है। वह क्रूर, विलासी और सत्ता का भूखा व्यक्ति है जिसने महाराणा विक्रमादित्य की हत्या की।
(ख) नाच-गायन तथा दीपदान का आयोजन किसने तथा किस उद्देश्य से करवाया?
उत्तर – दीपदान का आयोजन बनवीर ने किया था। उसका उद्देश्य नगरवासियों और सैनिकों को नाच-गाने में उलझाकर चुपके से उदय सिंह की हत्या करना था।
(ग) पन्ना की कर्त्तव्यनिष्ठा एवं स्वामिभक्ति पर प्रकाश डालिए।
उत्तर – पन्ना की स्वामिभक्ति अतुलनीय है। उन्होंने अपने पुत्र चंदन की बलि देकर राजकुँवर के प्राण बचाए। उनके लिए कर्तव्य और राज्य की रक्षा अपने व्यक्तिगत प्रेम से ऊपर थी।
(घ) बनास नदी का प्रयोग किस संदर्भ में किया गया है और क्यों?
उत्तर – इसका प्रयोग सोना के संदर्भ में हुआ है। बनवीर ने कहा था कि यदि पन्ना ‘पहाड़’ अर्थात् अटल और कठोर है, तो अन्य लड़कियों को ‘नदी’ अर्थात् चंचल और नाचने वाली बनकर बहना चाहिए।
(v) मैं ही क्या सारे नगर-निवासी यह त्योहार मना रहे हैं, नहीं मना रही हो तो तुम ! पहाड़ बनने से क्या होगा? राजमहल पर बोझ बनकर जाओगी, बोझ। और नदी बनो तो तुम्हारा बहता हुआ बोझ पत्थर भी अपने सिर पर धारण करेंगे, पत्थर भी। आनंद और मंगल तुम्हारे किनारे होंगे, जीवन का प्रवाह होगा, उमंगों की लहरें होंगी जो उठने में गीत गाएँगी, गिरने में नाच नाचेंगी।
(क) वक्ता और श्रोता कौन हैं? नगर निवासी कौन-सा त्योहार मना रहे हैं और क्यों?
उत्तर – इस संवाद की वक्ता सोना रावल सरूप सिंह की पुत्री है और श्रोता पन्ना धाय है। नगर निवासी ‘दीपदान’ का त्योहार मना रहे हैं। यह त्योहार तुलजा भवानी की पूजा के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था, जिसमें लोग नाच-गाने के साथ कुंड में दीपक प्रवाहित कर रहे थे।
(ख) उस त्योहार का आयोजन किसने, किस उद्देश्य से किया था?
उत्तर – इस त्योहार का आयोजन बनवीर ने किया था। उसका मुख्य उद्देश्य एक षड्यंत्र रचना था। वह चाहता था कि पूरी जनता, सामंत और सैनिक नाच-गाने और उत्सव में व्यस्त रहें, ताकि वह महल में बिना किसी बाधा के प्रवेश कर महाराणा विक्रमादित्य और कुँवर उदय सिंह की हत्या कर सके और स्वयं निष्कंटक राज्य प्राप्त कर सके।
(ग) ‘धाय माँ तुम्हारे पहाड़ बनने से क्या होगा।’- वक्ता के इस कथन का क्या आशय था?
उत्तर – यहाँ वक्ता सोना का आशय पन्ना की गंभीरता और अटल स्वभाव पर व्यंग्य करना है। सोना के अनुसार, पन्ना अरावली पर्वत की तरह एक जगह स्थिर और उदास बैठी रहती है। वह पन्ना को समझाना चाहती है कि खुशियों और उत्सव के समय कठोर या स्थिर रहने से केवल जीवन नीरस हो जाता है और व्यक्ति दूसरों के लिए भी भार बन जाता है।
(घ) ‘और नदी बनो…………. नाच नाचेंगी।’ – कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – इस कथन का आशय यह है कि मनुष्य को नदी की तरह गतिशील, प्रसन्न और उमंगों से भरा होना चाहिए। सोना का तर्क है कि यदि पन्ना नदी की तरह बहती, तो कठोर हृदय वाले लोग भी उसे सम्मान देते। जिस प्रकार नदी के किनारे खुशहाली होती है, वैसे ही जीवन में गीत और नृत्य होने से दुख भी सुख में बदल जाते हैं और जीवन में आनंद का संचार होता है।
(vi) विलासी और अत्याचारी राजा कभी निष्कंटक राज्य नहीं कर सकता।
(क) वक्ता और श्रोता कौन-कौन है? परिचय दीजिए और कथन का संदर्भ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – वक्ता पन्ना है और श्रोता परिचारिका सामली है। पन्ना धाय माँ है और सामली महल की सेविका है। संदर्भ यह है कि बनवीर ने छल से सत्ता हथिया ली है।
(ख) विलासी और अत्याचारी राजा से किसकी ओर संकेत किया गया है? ऐसे व्यक्ति को राजगद्दी पर क्यों बिठाया गया था?
उत्तर – संकेत बनवीर की ओर है। उसे विक्रमादित्य की अयोग्यता और सामंतों की नाराजगी का लाभ उठाकर राज्य की देखभाल के लिए नियुक्त किया गया था, पर उसने सत्ता हथिया ली।
(ग) उसने अपनी इच्छा को पूरी करने के लिए कौन-सी चाल चली?
उत्तर – उसने दीपदान और रास-रंग का आयोजन किया ताकि उत्सव के शोर में वह बिना किसी विरोध के हत्या कर सके।
(घ) ‘निष्कंटक’ का क्या अर्थ है? यह शब्द किसके संदर्भ में और क्यों प्रयोग किया गया है?
उत्तर – इसका अर्थ है ‘बिना किसी बाधा या कांटे के’। यह बनवीर के संदर्भ में प्रयोग हुआ है क्योंकि वह उदय सिंह को अपने रास्ते का कांटा मानता था और उसे हटाकर बेरोक-टोक राज करना चाहता था।
(vii) राजा की हत्या करने के बाद दासी पुत्र मनुष्य है? वह जंगली पशु से भी गया-बीता है।
(क) वक्ता और श्रोता कौन-कौन हैं?
उत्तर – वक्ता सामली है और श्रोता पन्ना है।
(ख) उपर्युक्त कथन में किस राजा की हत्या की बात कही गई है?
उत्तर – यहाँ महाराणा विक्रमादित्य की हत्या की बात कही गई है।
(ग) हत्या किसने की? उसने हत्या करने से पूर्व क्या षड्यंत्र रचा? उसे जंगली पशु से भी गया-बीता क्यों कहा गया है?
उत्तर – हत्या बनवीर ने की। उसने नगर में उत्सव मनवाया ताकि सब व्यस्त रहें। उसे जंगली पशु से गया-बीता इसलिए कहा गया क्योंकि उसने सोए हुए और निहत्थे राजा की हत्या की और अब एक अबोध बालक को मारना चाहता था।
(घ) पन्ना ने कुँवर उदय सिंह के प्राणों की रक्षा के लिए क्या योजना बनाई?
उत्तर – पन्ना ने कीरत बारी की टोकरी में उदय सिंह को छिपाकर महल से बाहर भेजने और उनकी जगह अपने पुत्र चंदन को सुलाने की योजना बनाई।
(viii) अन्नदाता! प्यार कहने में जबान पर कैसे आए? वो तो दिल की बात है। मौके पे ही देखा जाता है। और कहने को तो मैं कही चुका हूँ कि उनके लिए अपनी जान तक हाज़िर कर सकता हौं।
(क) वक्ता और श्रोता कौन-कौन हैं, दोनों का परिचय दीजिए। वक्ता ने अन्नदाता शब्द का प्रयोग किसके लिए किया है?
उत्तर – वक्ता कीरत बारी जूठी पत्तल उठाने वाला है और श्रोता पन्ना धाय है। कीरत एक ईमानदार और स्वामीभक्त सेवक है। उसने ‘अन्नदाता’ शब्द पन्ना के लिए सम्मानपूर्वक प्रयोग किया है।
(ख) वक्ता ने श्रोता की कौन-सी बात सुनकर उपर्युक्त कथन कहा?
उत्तर – पन्ना ने जब पूछा कि क्या वह कुँवर से प्यार करता है और उन्हें बचाने के लिए अपनी जान दे सकता है, तब कीरत ने यह कहा।
(ग) वक्ता ने श्रोता की क्या सहायता की, कब और कैसे?
उत्तर – कीरत ने उदय सिंह को अपनी टोकरी में पत्तलों के नीचे छिपाकर पहरेदारों की नज़रों से बचाते हुए महल से बाहर पहुँचाया।
(घ) पन्ना ने कुँवर उदय सिंह के प्राणों की रक्षा किस प्रकार की
उत्तर – पन्ना ने अपने पुत्र चंदन को राजकुमार के पलंग पर सुला दिया ताकि बनवीर उसे उदय सिंह समझकर मार दे और वास्तविक राजकुमार बच जाए।
(ix) ‘चली गई। ऐसा मैं नहीं सुन सकूँगी। जो मुझे करना है वह सामली सुन भी न सकेगी। भवानी तुमने मेरे हृदय को कैसा कर दिया? मुझे बल दो कि मैं राजवंश की रक्षा में अपना रक्त दे सकूँ।’
(क) उपर्युक्त कथन किसने, किस संदर्भ में कहा है?
उत्तर – यह पन्ना का आत्म-संवाद है जब सामली यह सुनकर चली जाती है कि पन्ना अपने बेटे चंदन की बलि देने वाली है।
(ख) ‘मुझे जो करना है, वह सामली सुन भी न सकेगी’ – वक्ता क्या करना चाहता था
उत्तर – पन्ना अपने पुत्र चंदन को उदय सिंह की शैया पर सुलाकर उसकी बलि चढ़ाना चाहती थी ताकि राजवंश का उत्तराधिकारी सुरक्षित रहे।
(ग) पन्ना ने राजवंश की रक्षा किस प्रकार की?
उत्तर – पन्ना ने व्यक्तिगत ममता का त्याग किया और चंदन को कुँवर उदय सिंह की रक्षा हेतु मौत के मुँह में धकेल दिया।
(घ) पन्ना का बलिदान अभूतपूर्व कैसे था?
उत्तर – यह बलिदान इसलिए महान है क्योंकि संसार में कोई भी माँ जानबूझकर अपने बच्चे को हत्यारे की तलवार के नीचे नहीं सुलाती। पन्ना ने राष्ट्र के लिए अपने मातृत्व का बलिदान कर दिया।
(x) आज मैंने भी दीपदान किया है। दीपदान। अपने जीवन का दीप मैंने रक्त की धारा पर तैरा दिया है। ऐसा दीपदान भी किसी ने किया है? एक बार तुम्हारा मुख देख लूँ। कैसा सुंदर और भोला मुख है। (सिसकियाँ लेती है)।
(क) वक्ता कौन है? उसकी मार्मिक वेदना को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – वक्ता पन्ना है। उनकी वेदना असहनीय है क्योंकि उन्होंने अभी-अभी अपने बेटे को अपनी आँखों के सामने मरते देखा है। उनके ‘जीवन का दीप’ अर्थात् उसका पुत्र चंदन अब बुझ चुका है।
(ख) बनवीर एवं पन्ना के दीपदान में क्या अंतर था? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – बनवीर का दीपदान दिखावा और रक्तपात का साधन था, जबकि पन्ना का दीपदान त्याग और कर्तव्य की पराकाष्ठा थी। बनवीर ने दूसरों को मारा, पन्ना ने अपना सर्वस्व दान कर दिया।
(ग) ‘दीपदान’ एकांकी द्वारा एकांकीकार ने क्या संदेश दिया है?
उत्तर – एकांकी संदेश देती है कि राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए मनुष्य को बड़े से बड़ा व्यक्तिगत बलिदान देने के लिए तैयार रहना चाहिए।
(घ) ‘दीपदान’ एकांकी के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर – शीर्षक अत्यंत सार्थक है। जहाँ अन्य लोग मिट्टी के दीये दान कर रहे थे, पन्ना ने अपने कुल के ‘दीपक’ अपने पुत्र चंदन का दान देकर मेवाड़ के राजवंशीय ‘दीपक’ को बुझने से बचा लिया।

