संप्रेषण की प्रक्रिया
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प्रेषक से प्राप्तकर्ता तक संदेश पहुँचने की प्रक्रिया को ही संप्रेषण कहते हैं। इस प्रकार संप्रेषण के तीन हिस्से होते हैं – प्रेषक, संदेश, प्राप्तकर्ता। पत्र इसका सबसे उत्तम उदाहरण है। आप अपने भाई को पत्र लिखते हैं। आप प्रेषक हुए। आप पत्र में कुछ लिखते हैं। यह संदेश हुआ। यह पत्र आपके भाई तक पहुँचता है। भाई उस पत्र को पढ़ता है। आपका भाई प्राप्तकर्ता है। इस प्रकार संप्रेषण पूरा होता है।
संप्रेषण प्रक्रिया में अधिकतम नौ तत्त्व और मुख्य रूप से सात तत्त्व शामिल होते हैं।
- स्रोत
- वक्तृत्व क्षमता (गौण)
- संदेश
- माध्यम
- प्राप्तकर्ता
- संदेश प्राप्ति
- प्रतिक्रिया
- संदर्भ (गौण)
- जीवन मूल्य और दृष्टकोण (गौण)
- शोर या नोइज़
स्रोत
किसी भी संदेश का जन्म स्रोत से होता है। यह स्रोत कोई भी व्यक्ति हो सकता है। वह स्रोत अर्थात् अपने विचारों को अभिव्यक्त करना चाहता है। इसके लिए वह अपने अनुभव और भाषा ज्ञान का उपयोग करता है। वह स्रोत या व्यक्ति अपने विचारों को शब्दों में ढालता है। मौखिक संप्रेषण के संदर्भ में इस स्रोत को वक्ता या लेखक कहते हैं।
वक्तृत्व क्षमता (गौण)
विचारों को भाषागत अभिव्यक्ति देने की कला को वक्तृत्व क्षमता कहते हैं। वक्ता की भाषा ऐसी होनी चाहिए जिसके जरिए वह अपने विचारों को स्पष्टता से अभिव्यक्त कर सके और श्रोता उसके संदेश को समझ सके।
संदेश
वक्ता के विचारों की अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति को संदेश कहते हैं। यह संदेश लिखित भी हो सकता है, मौखिक भी हो सकता है और अमौखिक या आंगिक भी हो सकता है। भाषा में शब्दों, वाक्यों, प्रतीकों, बिंबों आदि के माध्यम से संदेश प्रसारित किए जाते हैं। भाषा का अपना एक व्याकरण होता है। ‘राम ने श्याम को मारा’ और ‘श्याम ने राम को मारा’ का अर्थ बिल्कुल विपरीत है। व्याकरण के कारण संदेश का अर्थ बिल्कुल बदल जाता है। इसी प्रकार प्रत्येक भाषा का अपना मुहावरा होता है। भाषा किसी संस्कृति का हिस्सा होती है। किसी भाषा को बोलने और समझने के लिए भाषा के व्याकरण, मुहावरे और संस्कृति को समझना आवश्यक है। भाषा संदेश का आधार है। वस्तुतः भाषा के ज़रिए ही संदेश बनाए और समझे जाते हैं।
माध्यम
संदेश किसी माध्यम से प्रेषक से प्राप्तकर्ता तक पहुँचता है। मौखिक संप्रेषण में हवा माध्यम होता है। वक्ता से श्रोता तक संप्रेषण हवा के माध्यम से होता है। वक्ता द्वारा बोला हुआ संदेश हवा में तैरता हुआ श्रोता तक पहुँचता है। अब तो रेडियो तरंगों, सैटेलाइट आदि के माध्यम से संदेश को दूर-दूर तक फैलाया जा सकता है। जनसंचार माध्यम जैसे टेलीविज़न, रेडियो, इंटरनेट द्वारा इनका इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा लिखित संप्रेषण की स्थिति में लिपि माध्यम होती है जिसे हम आँखों से ग्रहण करते हैं।
प्राप्तकर्ता
वक्ता या स्रोत जिस तक अपना संदेश भेजना चाहता है उसे श्रोता या प्राप्तकर्ता कहते हैं। मौखिक संप्रेषण में श्रोता ही प्राप्तकर्ता होता है जो संदेश ग्रहण करता है। यह भी हो सकता है कि संदेश जिसके लिए तैयार किया गया हो उसके अतिरिक्त दूसरे श्रोता भी उस संदेश को सुन लें और उन पर उस संदेश का प्रभाव पड़ सकता है। मान लीजिए हम किसी दोस्त का हँसी में मज़ाक उड़ा रहे हों और वह हमारी बात सुन ले। जिस तक हम अपना संदेश नहीं पहुँचाना चाहते उस तक संदेश पहुँच गया और इससे दोस्ती खतरे में पड़ सकती है।
संदेश प्राप्ति
प्राप्तकर्ता द्वारा संदेश को विचारों में ढालने की प्रक्रिया को संदेश प्राप्ति या कूटवाचन कहते हैं। अंग्रेज़ी में इसे decoding कहा जाता है। सम्प्रेषण की सर्वोत्तम स्थिति वह होती है जिसमें श्रोता वक्ता द्वारा भेजे गए संदेश को उसी तरह समझता है जिस तरह वक्ता कहना चाहता है। श्रोता एवं वक्ता की भूमिका बदलती रहती है। अर्थात् श्रोता वक्ता की भूमिका निभाने लगता है और वक्ता श्रोता बन जाता है। टेलीफोन पर बातचीत करते समय ध्यान दीजिए। जब आप वक्ता होते हैं तो दूसरे छोर पर टेलीफोन सुन रहा व्यक्ति श्रोता की भूमिका निभा रहा होता है। फिर जब वह आपकी बात का जवाब देने लगता है तो आप श्रोता बन जाते हैं।
प्रतिक्रिया
वक्ता और श्रोता के बीच संवाद या आपसी बातचीत से ही संप्रेषण अपनी प्रक्रिया पूरी करता है। बड़ी मशहूर कहावत है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती। संप्रेषण या पूर्ण संप्रेषण पर भी यही बात लागू होती है। श्रोता द्वारा वक्ता को भेजे गए संदेश को ‘प्रतिक्रिया’ या ‘फीडबैक’ कहते हैं। आमने-सामने के संप्रेषण में, जैसे कक्षा में पढ़ाते शिक्षक और व्याख्यान सुनते विद्यार्थियों के बीच यह प्रतिक्रिया तुरंत हो जाती है। दूर शिक्षा पद्धति के अध्ययन में यह प्रतिक्रिया तत्काल नहीं हो पाती। परंतु आज दूरस्थ शिक्षा में टेलीकांफ्रेंसिंग, ई-मेल, इंटरनेट आदि जैसी आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग हो रहा है जिसके ज़रिए दूर बैठे विद्यार्थी भी अपने शिक्षकों को अपनी प्रतिक्रिया तुरंत भेज सकते हैं। यह भी जान लेना आवश्यक है कि प्रतिक्रिया सकारात्मक भी हो सकती है और नकारात्मक भी।
संदर्भ (गौण)
कोई भी संप्रेषण किसी न किसी संदर्भ से जुड़ा होता है। यह संदर्भ शारीरिक भी हो सकता है, मनोवैज्ञानिक भी और सांस्कृतिक भी। उदाहरण के लिए यदि आप दीवार में कील ठोक रहे हों और हथौड़ा आपकी उंगली पर लग जाए और वहाँ कोई न हो तो आपके मुँह से अपशब्द भी निकल सकता है। परंतु यदि वहाँ आपकी माँ या पिता मौजूद हों तो शायद अपशब्द आपके मुँह से न निकलें और आप कह बैठे…. ओ माँ, या बाबू जी….। इस समय आप केवल अपने आपसे ही बात नहीं कर रहे होते हैं। बल्कि आप अपने माता-पिता को भी संदेश पहुँचा रहे होते हैं। इसी प्रकार मित्र से बात करते समय, सहकर्मी से बात करते समय, शहर में अपने पड़ोसी से बात करते हुए, गाँव में अपने किसी संबंधी से बात करते हुए, आपके संदेश का स्वरूप एक-सा नहीं रहता। हर परिवेश में संदेश को अलग-अलग ढंग से संप्रेषित किया जाता है।
जीवन मूल्य और दृष्टिकोण (गौण)
संप्रेषण की प्रक्रिया में सहायक जिन तत्त्वों की चर्चा की गई वे आधारभूत तत्त्व हैं। इनके अलावा वक्ता के जीवन मूल्य और दृष्टिकोण का भी उसके विषय के चुनाव, शब्दों के चुनाव आदि पर असर पड़ता है। इसी प्रकार श्रोता के जीवन मूल्य और दृष्टिकोण का असर भी उसके संदेश को समझने और व्याख्यायित करने पर पड़ता है।
शोर या नोइज़
संप्रेषण प्रक्रिया में आने वाली कोई भी रुकावट जो संदेश को सही ढंग से पहुँचने या समझने में बाधा डालती है उसे तकनीकी भाषा में शोर या नोइज़ कहते हैं। यह मुख्य रूप से तीन स्तरों पर देखने को मिलती है-
भौतिक बाधाएँ – भौतिक बाधाओं में मुख्य रूप से दूरी, कोलाहल, तकनीकी समस्या, विभिन्न समय क्षेत्र,
मनोवैज्ञानिक बाधाएँ – मनोवैज्ञानिक बाधाओं में मुख्य रूप से पूर्वसंकल्पित विचार preoccupied mind, श्रवण शक्ति की क्षीणता, संवेगिक अवस्था Emotional state, नकारात्मक आत्म-छवि का भय।
भाषा संबंधी बाधाएँ – भाषा संबंधी बाधाओं में मुख्य रूप से भाषा पर हल्की पकड़ या शब्दों का सही चयन न करना आदि शामिल हैं।
सांस्कृतिक बाधाएँ – विभिन्न संस्कृतियाँ भी संप्रेषण में बाधा का काम करती हैं, जैसे – अँगूठा दिखाना एक संस्कृति में उत्तम प्रदर्शन के समर्थन स्वरूप प्रयोग में लाया जाता है तो दूसरी संस्कृति में इसके नकारात्मक अर्थ भी प्राप्त होते हैं।

