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गुंडा – जयशंकर प्रसाद

Gunda By Jayshankar Prasad The Best Explanation

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गुंडा

पचास वर्ष से ऊपर था। तब भी युवकों से अधिक बलिष्ठ और दृढ़ था। चमड़े पर झुर्रियाँ नहीं पड़ी थीं। वर्षा की झड़ी में, पूस की रात की छाया में, कड़कती हुई जेठ की धूप में, नंगे शरीर घूमने में वह सुख मानता था। उसकी चढ़ी मूँछें बिच्छू के डंक की तरह, देखने वालों को आँखों में चुभेती थीं। उसका साँवला रंग साँप की तरह चिकना और चमकीला था। उसकी नागपुरी घोती का लाल रेशमी किनारा दूर से भी ध्यान आकर्षित करता। कमर में बनारसी सेल्हे का फेंटा, जिसमें सीप की मूठ का बिछुआ खुसा रहता था। उसके घुँघराले बालों पर सुनहले पल्ले के साफे का छोर उसकी चौड़ी पीठ पर फैला रहता। ऊँचे कंधे पर टिका हुआा चौड़ी धार का गँड़ासा, यह थी उसकी धज। पंजों के बल जब वह चलता, तो उसकी नसें चटाचट बोलती थीं। वह गुंडा था।

ईसा की अठारहवीं शताब्दी के अंतिम भाग में वही काशी नहीं रह गई थी, जिसमें उपनिषद् के अजातशत्रु की परिषद् में ब्रह्म-विद्या सीखने के लिए विद्वान् ब्रह्मचारी आते थे। गौतमबुद्ध और शंकराचार्य के धर्म-दर्शन के वाद-विवाद कई शताब्दियों से लगातार मंदिरों और मठों के ध्वंस और तपस्वियों के वध के कारण, प्रायः बन्द से हो गए थे। यहाँ तक कि पवित्रता और छुआछूत में कट्टर वैष्णव धर्म भी उस विशृंखलता में नवागन्तुक धर्मोन्माद में, अपनी सफलता देखकर काशी में अधीर रूप धारण कर रहा था। उसी समय समस्त न्याय और बुद्धिवाद को शस्त्रबल के सामने झुकते देखकर काशी के विच्छिन्न और निराश नागरिक जीवन ने एक नवीन संप्रदाय की सृष्टि की। वीरता जिसका धर्म था। अपनी बात पर मिटना, सिंह-वृत्ति से जीविका ग्रहण करना, प्राण- भिक्षा माँगने वाले कायरों तथा चोट खाकर गिरे हुए प्रतिद्वन्द्वी पर शस्त्र न उठाना, सताये हुए निर्बलों को सहायता देना और प्रत्येक क्षण प्राणों को हथेली पर लिए घूमना उनका बाना था। उन्हें लोग काशी में गुंडा कहते थे।

जीवन की किसी अलभ्य अभिलाषा से वंचित होकर जैसे प्रायः लोग विरक्त हो जाते हैं, ठीक उसी तरह किसी मानसिक चोट से घायल होकर एक प्रतिष्ठित जमींदार का पुत्र होने पर भी, नन्हकूसिंह गुंडा हो गया था। दोनों हाथों से उसने अपनी संपत्ति लुटाई। नन्हकूसिंह ने बहुत-सा रुपया खर्च करके जैसा स्वाँग खेला था, उसे काशी वाले बहुत दिनों तक नहीं भूल सके। वसंत ऋतु में यह प्रहसनपूर्ण अभिनय खेलने के लिए उन दिनों प्रचुर धन, बल, निर्भीकता और उच्छृंखलता की आवश्यकता होती थी। एक बार नन्हकूसिंह ने भी एक पैर में नूपुर, एक हाथ में तोड़ा, एक आँख में काजल, एक कान में हजारों के मोती तथा दूसरे कान में फटे जूते का पल्ला लटका कर एक हाथ में जड़ाऊ मूठ की तलवार, दूसरा हाथ आभूषणों से लदी हुई अभिनय करने वाली प्रेमिका के कंधे पर रखकर गाया था।

‘कहीं बैंगन वाली मिले तो बुला देना’ !

प्राय – बनारस के बाहर की हरियालियों में, अच्छे पानी वाले कुओं पर, गंगा की धारा में मचलती हुई डोंगी पर वह दिखलाई पड़ता था। कभी- कभी जुआखाने से निकलकर जब वह चौक में आ जाता तो काशी की रंगीली वेश्याएँ मुस्कराकर उसका स्वागत करतीं और उसके दृढ़ शरीर को सस्पृह देखतीं। वह तमोली की ही दुकान पर बैठकर उनके गीत सुनता, ऊपर कभी नहीं जाता था। जुए की जीत का रुपया मुट्ठियों में भरकर उनकी खिड़की में वह इस तरह उछालता कि कभी-कभी समाजी लोग अपना सिर सहलाने लगते। तब वह ठठाकर हँस देता। जब कभी लोग कोठे के ऊपर चलने के लिए कहते तो उदासी की साँस खींचकर चुप हो जाता।

वह अभी बंशी के जुआखाने से निकला था। आज उसकी कौड़ी ने साथ दिया। सोलह परियों के नृत्य में उसका मन न लगा। मन्नू तमोली की दुकान पर बैठते हुए उसने कहा – “आज सायत अच्छी नहीं रही मन्नू।”

“क्यों मालिक! चिन्ता किस बात की है। हम लोग किस दिन के लिए हैं। सब आप ही का तो है।”

“अरे बुद्धू ही रहे तुम? नन्हकूसिंह जिस दिन किसी से लेकर जूआ खेलने लगे, उसी दिन समझना, वह मर गए। तुम जानते नहीं कि मैं जूआ खेलने कब जाता हूँ? जब मेरे पास एक पैसा नहीं रहता, उस दिन नाल पर पहुँचते ही जिधर बड़ी ढेरी रहती है, उसी को बढ़ता हूँ और फिर वही दाँव आता भी है। बाबा कीनाराम का यह वरदान है।”

“तब आज क्यों मालिक?”

“पहला दाँव तो आया ही, फिर दो-चार हाथ बदलने पर सब निकल गया, तब भी लो, यह पाँच रुपये बचे हैं। एक रुपया तो पान के लिए रख लो और चार दे दो मलूकी कथक को, कह दो दुलारी से गाने के लिए कह दे। हाँ, वही गीत – बिलमि बिदेस रहे।’

नन्हकूसिंह की बात सुनते ही मलूकी, जो अभी गाँजे की चिलम पर रखने के लिए अंगारा चूर कर रहा था, घबराकर उठ खड़ा हुआ। वह सीढ़ियों पर दौड़ता हुआ चढ़ गया। चिलम को देखते ही ऊपर चढ़ा, इसीलिए उसे चोट भी लगी। नन्हकूसिंह की भृकुटी देखने की शक्ति उसमें कहाँ? उसने नन्हकूसिंह की वह मूर्ति भूली न थी, जब इस पान की दुकान पर जूएखाने से जीता हुआ, रुपये से भरा तोड़ा लिए वह बैठा था। नन्हकू ने पूछा – “यह किसकी बारात है?”

“ठाकुर बोधीसिंह के लड़के की।” मन्नू के इतना कहते ही नन्हकू के ओंठ फड़कने लगे। उसने कहा – “मन्नू! यह नहीं हो सकता। आज इधर से बरात न जाएगी। बोधीसिंह हम से निपटकर तब बारात इधर से ले जा सकेंगे।” मन्नू ने कहा – “तब मालिक, मैं क्या करूँ?”

नन्हकू गँड़ासा कन्धे पर से और ऊँचा करके मलूक से बोला- “मलुकिया देखता है अभी, जा ठाकुर से कह दे कि बाबू नन्हकूसिंह आज यहीं लगाने के लिए खड़े हैं। समझकर आवें, लड़के की बारात है।”

मलुकिया काँपता हुआ ठाकुर बोधीसिंह के पास गया। बोधीसिंह और नन्हकूसिंह का पाँच वर्ष तक सामना नहीं हुआ है। किसी दिन नाल पर कुछ बातों में ही कहा-सुनी होकर, बीच-बचाव हो गया था। फिर सामना नहीं हो सका था।

आज नन्हकू जान पर खेलकर अकेले खड़ा है। बोधीसिंह भी उस आन को समझते थे। उन्होंने मलूकी से कहा, जा वे कह दे कि हमको क्या मालूम कि बाबू साहब वहाँ खड़े हैं? जब वह हैं ही तो दो समधी जाने का क्या काम है?

बोधीसिंह लौट गए और मलूकी के कन्धे पर तोड़ा लादकर बाजे के आगे नन्हकूसिंह बारात लेकर गये, ब्याह में जो कुछ लगा, खर्च किया। ब्याह कराकर तब दूसरे दिन दुकान तक आकर रुक गए। लड़के को और उसकी बारात को उसके घर पर भेज दिया।

मलूकी को भी दस रुपया मिला था, उस दिन। फिर नन्हकूसिंह की बात सुनकर बैठे रहना यम को न्योता देना एक ही बात थी। उसने जाकर दुलारी से कहा- हम ठेका लगा रहे हैं, तुम गाओ तब तक बल्लू सारंगी पानी पीकर आता है।

“बाप रे? कोई आफत आई है क्या बाबू साहब? सलाम।” — कहकर दुलारी ने खिड़की से मुस्कराकर झाँका था कि नन्हकूसिंह उसके सलाम का जवाब देकर दूसरे एक आने वाले को देखने लगे।

हाथ में हरौती की पतली-सी छड़ी, आँखों में सुरमा, मुँह में पान, मेंहदी लगी हुई दाढ़ी, जिसकी सफेद जड़ें दिखलाई पड़ रही थीं, कुब्बेदार टोपी, छकलिया अँगरखा और साथ में लेसदार परतले वाले दो सिपाही। कोई मौलवी साहब हैं। नन्हकू हँस पड़ा। नन्हकू की ओर बिना देखे ही मौलवी ने एक सिपाही से कहा। “जाओ, दुलारी से कह दो कि आज रेजिडेण्ट साहब की कोठी पर मुजरा करना होगा, अभी चलें। देखो, तब तक हम जानअली से कुछ इत्र ले रहे हैं।”

सिपाही ऊपर चढ़ रहा था और मौलवी दूसरी ओर चले थे कि नन्हकू ने ललकार कर कहा – “दुलारी ! हम कब तक यहाँ बैठे रहें? क्या अभी सारंगिया नहीं आया?”

दुलारी ने कहा – “वाह, बाबू साहब ! आपही के लिए तो मैं यहाँ आ बैठी हूँ। सुनिए न। आप तो कभी ऊपर …….. “। मौलवी जल उठा।

उसने कड़ककर कहा— “चोबदार ! अभी वह सूअर की बच्ची उतरी नहीं? जाओ, कोतवाल के पास मेरा नाम लेकर कहो कि मौलवी अलाउद्दीन कुबरा ने बुलाया है। आकर इसकी मरम्मत करें। देखता हूँ, जब से नवाबी गई, इन काफिरों की मस्ती बढ़ गई है।”

कुबरा मौलवी! बाप रे – तमोली अपनी दुकान सँभालने लगा। पास ही एक दुकान पर बैठकर ऊँघता हुआ बजाज चौंककर सिर में चोट खा गया। इसी मौलवी ने तो महाराज चेतसिंह से साढ़े तीन सेर चींटी के सिर का तेल माँगा था। मौलवी अलाउद्दीन कुबरा। बाजार में हलचल मच गई। नन्हकूसिंह ने मन्नूसिंह से कहा – “क्यों चुपचाप बैठोगे नहीं?” दुलारी से कहा – “वहीं से बाई जी! इधर-उधर हिलने का काम नहीं। तुम गाओ। हमने ऐसे घसियारे बहुत से देखे हैं। अभी कल रमल के पाँसे फेंककर अधेला-अधेला माँगता था, आज चला है रौब गाँठने।”

अब कुबरा ने घूमकर उसकी ओर देखकर कहा- “कौन है यह पाजी?”

“तुम्हारे चाचा बाबू नन्हकूसिंह!” – के साथ ही पूरा बनारसी झापड़ पड़ा। कुबरा का सिर घूम गया। लैस के परतले वाले सिपाही दूसरी ओर भाग चले और मौलवी साहब चौंधियाकर जानअली की दुकान पर लड़- खड़ाते, गिरते पड़ते किसी तरह पहुँच गए।

जान अली ने मौलवी से कहा- “मौलवी साहब! भला आप भी उस गुंडे के मुँह लगने लगे। यह कहिये कि उसने गँड़ासा नहीं तौल दिया।” कुबरा के मुँह से बोली नहीं निकल रही थी। – “बिलमि विदेस रहे”…… गाना पूरा हुआ, कोई आया गया नहीं। तब नन्हकूसिंह धीरे-धीरे टहलता हुआ दूसरी ओर चला गया। थोड़ी देर में एक डोली रेशमी कपड़े से ढकी हुई आई। साथ में एक चौबदार था। उसने दुलारी को राजमाता की आज्ञा सुनाई।

दुलारी चुपचाप डोली पर जा बैठी। डोली धूल और संध्या काल के धुएँ से भरी हुई बनारस की तंग गलियों से होकर शिवालय घाट की ओर चली।

X X X

श्रावण का अंतिम सोमवार था। राजमाता पन्ना शिवालय में बैठकर पूजन कर रही थीं। दुलारी बाहर बैठी, कुछ अन्य गाने वालियों के साथ भजन गा रही थी। आरती हो जाने पर फूलों की अंजलि बिखेरकर पन्ना ने भक्ति भाव से देवता के चरणों में प्रणाम किया। फिर प्रसाद लेकर बाहर आते ही उन्होंने दुलारी को देखा। उसने खड़ी होकर हाथ जोड़ते हुए कहा – “मैं पहले ही पहुँच जाती। क्या करूँ? वह कुबरा मौलवी निगोड़ा आकर रेजिडेण्ट की कोठी पर ले जाने लगा। घन्टों इसी झंझट में बीत गया सरकार !”

“कुबरा मौलवी! जहाँ सुनती हूँ, उसी नाम की। सुना है कि उसने यहाँ भी आकर कुछ…..।” फिर न जाने क्या सोचकर बात बदलते हुए पन्ना कहा—

“हाँ, तब फिर क्या हुआ? तुस कैसे यहाँ आ सकीं?”

“बाबू नन्हकूसिंह उधर से आ गए। मैंने कहा- सरकार की पूजा पर मुझे भजन गाने को जाना है और यह जाने नहीं दे रहा है। उन्होंने मौलवी को ऐसा झापड़ लगाया कि उसकी हेकड़ी भूल गई और तब जाकर मुझे किसी तरह यहाँ आने की छुट्टी मिली।’

“कौन बाबू नन्हकूसिंह?”

दुलारी ने सिर नीचा करके कहा – “अरे, क्या सरकार को नहीं मालूम? बाबू निरंजनसिंह के लड़के। उस दिन जब मैं बहुत छोटी थी, आपकी बारी में झूला झूल रहीं थी। जब नवाब का हाथी बिगड़कर आ गया था, बाबू निरंजन सिंह के कुँवर ने ही तो उस दिन हम लोगों की रक्षा की थी।”

राजमाता का मुख उस प्राचीन घटना को स्मरण करके न जाने क्यों विवरण हो गया? फिर अपने को सँभाल कर उन्होंने पूछा – “तो बाबू नन्हकूसिंह उधर कैसे आ गए?”

दुलारी ने मुस्कराकर सिर नीचा कर लिया। दुलारी राजमाता पन्ना के पिता की जमींदारी में रहने वाली वेश्या की लड़की थी। उसके साथ ही कितनी बार झूले- हिंडोले अपने बचपन में पन्ना झूल चुकी थी। वह बचपन से ही गाने में सुरीली थी। सुन्दरी होने पर चंचल भी थी। पन्ना जब काशिराज की माता थी, तब दुलारी काशी की प्रसिद्ध गाने वाली थी। राजमहल में उसका गाना-बजाना हुआ ही करता। महाराज बलवन्तसिंह के समय से ही संगीत पन्ना के जीवन का आवश्यक अंग था। हाँ, तब प्रेम, दुःख ओर दर्द भरी विरह कल्पना के गीत की ओर रुचि थी। अब अधिक सात्त्विक भावपूर्णं भजन होता था। राजमाता पन्ना का वैधव्य से दीप्त शान्त मुख-मण्डल कुछ मलिन हो गया।

बड़ी रानी की सापत्न्य ज्वाला बलवन्तसिंह के मर जाने पर भी नहीं बुझी। अन्तःपुर कलह का रंगमंच बना रहता। इसी से प्रायः पन्ना काशी के राजमंदिर में आकर पूजापाठ में अपना मन लगाती। रामनगर में उसको चैन नहीं मिलता। नई रानी होने के कारण बलवन्तसिंह की प्रेयसी होने का गौरव तो उसे था ही, साथ में पुत्र उत्पन्न करने का सौभाग्य भी मिला, फिर भी असवर्णता का सामाजिक दोष उसके हृदय को व्यथित किया करता था। उसे अपने ब्याह की प्रारम्भिक चर्चा का स्मरण हो आया।

छोटे से मंच पर बैठी, गंगा की उमड़ती धारा को पन्ना अन्यमनस्क होकर देखने लगी। उस बात को, जो अतीत में एक बार हाथ से अनजान में खिसक जाने वाली वस्तु की तरह लुप्त हो गई हो, सोचने का कोई कारण नहीं। उससे कुछ बनता – बिगड़ता मी नहीं, परन्तु मानव स्वभाव हिसाब रखने की प्रथानुसार कभी-कभी कह भी बैठता है कि यदि वह बात हो गई होती तो? ठीक उसी तरह पन्ना भी राजा बलवन्तसिंह द्वारा बलपूर्वक रानी बनाई जाने के पहले की एक सम्भावना को सोचने लगी थी, तो भी बाबू नन्हकूसिंह का नाम सुन लेने पर। गेंदा मुँह लगी दासी थी। वह पन्ना के साथ उसी दिन से है, जिस दिन से पन्ना बलवन्तसिंह की प्रेयसी हुई। राज्य भर का अनुसन्धान उसी के द्वारा मिला करता और उसे न जाने कितनी जानकारी भी थी। उसने दुलारी का रंग उखाड़ने के लिए कुछ कहना आवश्यक समझा। “महारानी ! नन्हकूसिंह अपनी सब जमींदारी, स्वाँग, भैसों की लड़ाई, घुड़दौड़ और गाने बजाने में उड़ाकर अब डाकू हो गया है। जितने खून होते हैं, सब में उसी का हाथ रहता है। जितनी ..” उसे रोककर दुलारी ने कहा – “यह झूठ है। बाबू साहब के ऐसा धर्मात्मा तो कोई है ही नहीं। कितनी विधवाएँ उनकी दी हुई घोती से अपना तन ढकती हैं। कितनी लड़कियों की ब्याह – शादी होती है। कितने सताये हुए लोगों की उनके द्वारा रक्षा होती है।”

रानी पन्ना के हृदय में एक तरलता उद्वेलित हुई। उन्होंने हँसकर कहा – “दुलारी, वे तेरे यहाँ आते हैं न? इसी से तू उनकी बड़ाई …”।

“नहीं सरकार! शपथ खाकर कह सकती हूँ कि बाबू नन्हकूसिंह ने आज तक कभी मेरे कोठे पर पैर भी नहीं रखे।”

राजमाता जाने क्यों इस अद्भुत व्यक्ति को समझने के लिए चंचल हो उठी थीं। तब भी उसने दुलारी को आगे कुछ न कहने के लिए तीखी दृष्टि से देखा। वह चुप हो गई। पहले पहर की शहनाई बजने लगी। दुलारी छुट्टी माँगकर डोली पर बैठ गई। तब गेंदा ने कहा – “सरकार ! आजकल नगर की दशा बहुत बुरी है। दिनदहाड़े लोग लूट लिए जाते हैं। सैकड़ों जगह नाचघर जूए में लोग अपना सर्वस्व गँवाते हैं। बच्चे फुसलाये जाते हैं। गलियों में लाठियाँ और छुरे चलने के लिए टेढ़ी भौंहें कारण बन जाती हैं। उधर रेजिडेण्ट साहब से महाराज की अनबन चल रही है।” राजमाता चुप रहीं।

दूसरे दिन राजा चेतसिंह के पास रेजिडेण्ट मार्कहेम की चिट्ठी आई, जिममें नगर की दुर्व्यवस्था की कड़ी आलोचना थी। डाकुओं और गुण्डों को पकड़ने के लिए, उन पर कड़ा नियन्त्रण रखने की सम्मत्ति भी थी। कुबरा मौलवी वाली घटना का उल्लेख था। उधर हेस्टिंग्स के आने की भी सूचना थी। शिवालय घाट और रामनगर में हलचल मच गई। कोतवाल हिम्मत सिंह पागल की तरह, जिसके हाथ में लाठी, लोहाँगी, गँड़ास, बिछुआ और करौली देखते, उसी को पकड़ने लगे।

एक दिन नन्हकूसिंह सुम्मा के नाले के संगम पर ऊँचे से टीले की घनी हरियाली में अपने चुने हुए साथियों के साथ दूधिया छान रहे थे। गंगा में उनकी पतली डोंगी बड़की जटा से बँधी थी। कथकों का गाना हो रहा था। चार उलांकी इक्के कखे कसाये खड़े थे।

नन्हकूसिंह ने अकस्मात् कहा- “मलूकी ! गाना जमता नहीं है। उलांकी पर बैठकर जओ, दुलारी को बुला लाओ।” मलूकी वहाँ मजीरा बजा रहा था। दौड़कर इक्के पर जा बैठा। आज नन्हकूसिंह का मन उखड़ा था। बूटी कई बार छानने पर भी नशा नहीं। एक घंटे में दुलारी सामने आ गई। उसने मुस्कराकर पूछा – “क्या हुक्म है बाबू साहब?”

“दुलारी! आज गाना सुनने का मन कर रहा है।”

“इस जंगल में क्यों?” उसने सशंक हँसकर कुछ अभिप्राय से पूछा ! “तुम किसी तरह का खटका न करो।” – नन्हकूसिंह ने हँसकर कहा।

“यह तो मैं उस दिन महारानी से भी कह आई।”

“क्या, किससे?”

“राजमाता पन्ना देवी से” – फिर उस दिन गाना नहीं जमा। दुलारी ने आश्चर्य से देखा कि तानों में नन्हकूसिंह की आँखें तर हो जाती हैं। गाना बजाना समाप्त हो गया था। वर्षा की रात में झिलियों का स्वर उस झुरमुट में गूँज रहा था। मंदिर के समीप ही छोटे से कमरे में नन्हकूसिंह चिन्ता में निमग्न बैठा था। आँखों में नींद नहीं और सब लोग तो सोने लगे थे। दुलारी जाग रही थी। यह भी कुछ सोच रही थी। आज उसे अपने को रोकने के लिए कठिन प्रयत्न करना पड़ रहा था, किन्तु असफल होकर वह उठी और नन्हकूसिंह के समीप धीरे-धीरे चलती आई। कुछ आहट पाते ही चौंककर नन्हकूसिंह ने पास ही पड़ी हुई तलवार उठा ली। तब तक हँसकर दुलारी ने कहा – “बाबू साहब, यह क्या? स्त्रियों पर भी तलवार चलाई जाती है?”

छोटे से दीपक के प्रकाश में वासना भरी रमणी का मुख देखकर नन्हकू हँस पड़ा। उसने कहा – “क्यों बाई जी? क्या इसी समय जाने की पड़ी है? मौलवी ने फिर बुलाया है क्या?” दुलारी नन्हकू के पास बैठ गई। नन्हकू ने कहा – “क्या तुमको डर लग रहा है?”

“नहीं, मैं कुछ पूछने आई हूँ।”

“क्या?”

“क्या, ….. यही कि…. कभी तुम्हारे हृदय में……?”

“उसे न पूछो दुलारी! हृदय, मैं बेकार ही समझकर तो उस हाथ में लिए फिर रहा हूँ। कोई कुछ कर देता — कुचलता – चीरता – उछलता ! मर जाने के लिए सब कुछ तो करता हूँ, पर मरने नहीं पाती।”

“मरने के लिए भी कहीं खोजने जाना पड़ता है। आपको काशी का हाल क्या मालूम? न मालूम घड़ी भर में क्या हो जाय, उलट-पलट होने वाला है क्या, बनारस की गलियाँ जैसे काटने दौड़ती हैं?”

“कोई नई बात इघर हुई है क्या?”

“कोई हेस्टिंग्स साहब आया है। सुना है कि उसने शिवालय घाट पर तिलंगों की कम्पनी का पहरा बैठा दिया है। राजा चेतसिंह और राजमाता पन्ना वहीं हैं। कोई-कोई कहता है कि उनको पकड़कर कलकत्ता भेजने…”

“क्या पन्ना भी ……. रनवास भी वहीं है।” नन्हकू अधीर हो उठा था। ‘“क्यों बाबू साहब आज रानी का नाम सुनकर आपकी आँखों में आँसू क्यों आ गए?”

सहसा नन्हकू का मुख भयानक हो उठा। उसने कहा – “चुप रहो, तुम उसको जानकर क्या करोगी।” वह उठ खड़ा हुआ। उद्विग्न की तरह न जाने क्या खोजने लगा? फिर स्थिर होकर उसने कहा – ” दुलारी !”

 

जीवन में आज यह पहला ही दिन है कि एकान्त रात में एक स्त्री मेरे पलंग पर आकर बैठ गई है। मैं चिरकुमार अपनी एक प्रतिज्ञा का निर्वाह करने के लिए सैकड़ों असत्य, अपराध करता फिरता रहा हूँ। क्यों? तुम जानती हो? मैं स्त्रियों का घोर विद्रोही हूँ और पन्ना। ……किन्तु उसका क्या अपराध? अत्याचारी बलवन्तसिंह के कलेजे में बिछुआ मैं न उतार सका। किन्तु पन्ना ! उसे पकड़कर गोरे कलकत्ते भेज देंगे। वहीं “

नन्हकूसिंह उन्मत्त हो उठा था। दुलारी ने देखा, नन्हकू अन्धकार में ही वट वृक्ष के नीचे पहुँचा और गंगा की उमड़ती हुई धारा में डोंगी खोल दी — उसी घने अन्धकार में। दुलारी का हृदय काँप उठा।

 

16 अगस्त सन् 1981 को काशी डावाँडोल हो रही थी। शिवालय घाट में राजा चेतसिंह लेफ्टिनेण्ट इस्टाकर के पहरे में थे। नगर में आतंक था। दूकानें बन्द थीं। घरों में बच्चे अपनी माँ से पूछते थे – “माँ, आज हलुए वाला नहीं आया।” वह कहती – “चुप बेटे !” सड़कें सूनी पड़ी थीं। तिलगों की कम्पनी के आगे-आगे कुबरा मौलवी कभी-कभी आता-जाता दिखलाई पड़ता था। उस समय खुली हुई खिड़कियाँ भी बन्द हो जाती थीं। भय और सन्नाटे का राज्य था। चौक में चिथरूसिंह की हवेली अपने भीतर काशी की वीरता को बन्दी किए कोतवाली का अभिनय कर रही थी। इसी समय किसी ने पुकारा – “हिम्मतसिंह !” खिड़की में से सिर निकालकर हिम्मतसिंह ने पूछा- “कौन?”

“बाबू नन्हकूसिंह ! “

“अच्छा, तुम अब तक बाहर ही रहे?”

“पागल ! राजा कैद हो गए हैं। छोड़ दो इन सब बहादुरों को। हम एक बार इनको लेकर शिवालय घाट पर जायें।”

“ठहरो” – कहकर हिम्मतसिंह ने कुछ आज्ञा दी। सिपाही बाहर निकले। नन्हकू की तलवार चमक उठी। सिपाही भीतर मागे। नन्हकू ने कहा – “नमक हरामो ! चूड़ियाँ पहन लो।” लोगों के देखते-देखते नन्हकूसिंह चला गया। कोतवाली के सामने फिर सन्नाटा हो गया। नन्हकू उन्मत्त था। उसके थोड़े से साथी उसकी आज्ञा पर जान देने के लिए तुले थे। वह नहीं जानता था कि राजा चेतसिंह का क्या राजनैतिक अपराध है? उसने कुछ सोचकर अपने थोड़े से साथियों को फाटक पर गड़बड़ मचाने के लिए भेज दिया। इधर अपनी डोंगी लेकर शिवालय की खिड़की के नीचे धारा काटता हुआ पहुँचा। किसी तरह निकले हुए पत्थर में रस्सी अटकाकर उस चंचल डोंगी को उसने स्थिर किया और बन्दर की तरह उछलकर खिड़की के भीतर हो रहा। उस समय वहाँ राजमाता पन्ना और युवक राजा चेतसिंह से बाबू मनियारसिंह कह रहे थे –  “आपके यहाँ रहने से, हम लोग क्या करें। यह समझ में नहीं आता? “पूजा-पाठ समाप्त करके आप रामनगर चली गई होतीं, तो यह………”

तेजस्विनी पन्ना ने कहा – “अब मैं रामनगर कैसे चली जाऊँ?” मनियारसिंह दुःखी होकर बोले – “कैसे बताऊँ? मेरे सिपाही तो बन्दी हैं?”

इतने में फाटक पर कोलाहल मचा। राज-परिवार अपनी मन्त्रणा में डूबा था कि नन्हकूसिंह का आना उन्हें मालूम हुआ। सामने का द्वार बन्द था। नन्हकूसिंह ने एक बार गंगा की धारा को देखा – उसमें एक नाव घाट पर लगने के लिए लहरों से लड़ रही थी। वह प्रसन्न हो उठा। इसकी प्रतीक्षा में वह रुका था। उसने जैसे सबको सचेत करते हुए, कहा- “महारानी कहाँ हैं?”

सबने घूमकर देखा – एक अपरिचित वीरमूर्ति शस्त्रों से लदा हुआ पूरा देव !

चेतनसिंह ने पूछा – “तुम कौन हो?”

“राज-परिवार को एक बिना दाम का सेवक!”

पन्ना के मुँह से हलकी-सी एक साँस निकलकर रह गई। उसने पहचान लिया। इतने वर्षों के बाद! वह नन्हकूसिंह।  

मनियारसिंह से पूछा – “तुम क्या कर सकते हो?”-

“मैं मर सकता हूँ। पहले महारानी को दूसरी डोंगी पर बिठाइए। नीचे डोंगी पर अच्छे मल्लाह हैं। फिर बात कीजिए।” मनियारसिंह ने देखा, जनानी ड्योढ़ी का दरोगा।

राजा की एक डोंगी पर चार मल्लाहों के साथ खिड़की से नाव सटाकर प्रतीक्षा में है। उन्होंने पन्ना से कहा – “चलिए, मैं साथ चलता हूँ।”

“अरे……” – चेतसिंह को देखकर, पुत्र- वत्सला ने संकेत से एक प्रश्न किया। उसका उत्तर किसी के पास न था। मनियारसिंह ने कहा – “तब मैं यहीं?” नन्हकूसिंह ने हँसकर कहा – “मेरे मालिक, आप नाव पर बैठें। जब तक राजा भी नाव पर न बैठ जाएँगे, तब तक सत्रह गोली खाकर भी नन्हकूसिंह जीवित रहने की प्रतिज्ञा करता है।”

पन्ना ने नन्हकू को देखा। एक क्षण के लिए चारों आँखें मिलीं, जिनमें जन्म-जन्म का विश्वास ज्योति की तरह जल रहा था। फाटक बलपूर्वक खोला जा रहा था। नन्हकू ने उन्मत्त होकर कहा – “मालिक ! जल्दी कीजिए।”

दूसरे क्षण पन्ना डोंगी पर थी और नन्हकूसिंह फाटक पर इस्टाकर के साथ। चेतराम ने आकर एक चिट्ठी मनियारसिंह के हाथ में दी। लेफ्टिनेण्ट ने कहा – “आपके आदमी गड़बड़ मचा रहे हैं। अब मैं अपने सिपाहियों को गोली चलाने से नहीं रोक सकता। “मेरे सिपाही यहाँ कहाँ हैं साहब?” — मनियारसिंह ने हँलकर कहा। बाहर कोलाहल बढ़ने लगा था।

चेतराम ने कहा – “पहले चेतसिंह को कैद कीजिए।”

“कौन ऐसी हिम्मत करता है?” कड़कर कहते हुए बाबू मनियारसिंह ने तलवार खींच ली ! अभी बात पूरी न हो सकी थी कि कुबरा मौलवी वहाँ पहुँचा। यहाँ मौलवी साहब की कलम नहीं चल सकती थी और न ये बाहर ही जा सकते थे। उन्होंने कहा- “देखते क्या हो चेतराम?”

चेतराम ने राजा के ऊपर हाथ रखा ही था कि नन्हकू के सधे हुए हाथ ने उसकी भुजा उड़ा दी। इस्टाकर आगे बढ़े, मौलवी साहब चिल्लाने लगे। नन्हकूसिंह ने देखते-देखते इस्टाकर और उसके कई साथियों को धराशायी किया। फिर मौलवी साहब कैसे बचते? नन्हकूसिंह ने कहा – क्यों, उस दिन के झापड़ ने तुमको समझाया नहीं? ले पाजी !!” कहकर साफ जनेवा मारा कि कुबरा ढेर हो गया। कुछ ही क्षण में यह भीषण घटना हो गई, जिसके लिए अभी प्रस्तुत न था।

नन्हकूसिंह ने ललकार कर चेतसिंह से कहा – “आप देखते क्या हैं? उतरिए डोंगी पर।” उसके घावों से रक्त के फुहारे छूट रहे थे। उधर फाटक से तिलंगे भीतर आने लगे थे। चेतसिंह ने खिड़की से उतरते हुए देखा कि बीसों तिलंगों की संगीनों में वह अविचल खड़ा होकर तलवार चला रहा है। नन्हकू के चट्टान सदृश शरीर से गैरिक की तरह रक्त की धारा बह रही है। गुंडे का एक-एक अंग कटकर वहीं गिरने लगा। वह काशी का गुंडा था।

—(‘इन्द्रजाल’ से)

 

गुंडा – सारांश

जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कहानी ‘गुंडा’ हिंदी साहित्य की एक कालजयी रचना है। यह कहानी 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध की काशी के सामाजिक और राजनीतिक परिवेश को चित्रित करती है।

  1. काशी के गुंडासंप्रदाय का स्वरूप

कहानी की शुरुआत काशी के विशिष्ट ‘गुंडा’ संप्रदाय के परिचय से होती है। उस समय काशी में ‘गुंडा’ शब्द का अर्थ आज की तरह अपराधी नहीं था। ये वे लोग थे जिनके लिए वीरता ही धर्म था। अपनी बात पर मर मिटना, निर्बलों की रक्षा करना, शरणागत को अभय देना और प्राणों को हथेली पर लेकर चलना इनका बाना था। नन्हकूसिंह इसी परंपरा का एक प्रतिष्ठित प्रतिनिधि था।

  1. नन्हकूसिंह का व्यक्तित्व और अतीत

नन्हकूसिंह एक जमींदार का पुत्र था, जो किसी मानसिक चोट अर्थात् प्रेम में असफलता के कारण विरक्त होकर गुंडा बन गया था। 50 वर्ष की आयु में भी वह अत्यंत बलिष्ठ था। उसकी वेशभूषा—लाल किनारे वाली लंगोटी, बनारसी साफा और कंधे पर गँड़ासा—उसकी धाक जमाती थी। वह जुआ खेलता था, लेकिन केवल तब जब उसके पास एक पैसा न हो। वह वेश्याओं के कोठे पर गीत सुनने तो जाता था, लेकिन कभी ऊपर नहीं चढ़ता था, जो उसके चारित्रिक संयम को दर्शाता है।

  1. कुबरा मौलवी और नन्हकूसिंह का टकराव

कहानी में मुख्य मोड़ तब आता है जब मौलवी अलाउद्दीन कुबरा जो अंग्रेजों का पिट्ठू था, जबरन प्रसिद्ध गायिका दुलारी को रेजिडेंट की कोठी पर ले जाने की कोशिश करता है। नन्हकूसिंह को यह अत्याचार बर्दाश्त नहीं होता और वह मौलवी को एक जोरदार ‘बनारसी झापड़’ जड़ देता है। यह घटना नन्हकूसिंह के विद्रोही और रक्षक स्वभाव को प्रकट करती है।

  1. राजमाता पन्ना और नन्हकूसिंह का गुप्त संबंध

दुलारी के माध्यम से पता चलता है कि नन्हकूसिंह का अतीत राजमाता पन्ना से जुड़ा है। बचपन में नन्हकूसिंह ने पन्ना की रक्षा की थी। पन्ना भी मन ही मन नन्हकूसिंह को चाहती थी, लेकिन राजा बलवंतसिंह ने उसे बलपूर्वक अपनी रानी बना लिया। नन्हकूसिंह ने पन्ना के प्रति अपने उसी पवित्र प्रेम को निभाने के लिए आजीवन अविवाहित रहने और उसकी परोक्ष रूप से रक्षा करने का व्रत ले लिया था।

  1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विद्रोह (1781)

वह समय वारेन हेस्टिंग्स और राजा चेतसिंह के बीच संघर्ष का था। अंग्रेजों ने राजा चेतसिंह को उनके ही महल अर्थात् शिवालय घाट में कैद कर लिया था। पूरी काशी में आतंक था। जब नन्हकूसिंह को पता चला कि राजमाता पन्ना और राजा चेतसिंह खतरे में हैं, तो उसका सोता हुआ राष्ट्रप्रेम और व्यक्तिगत कर्तव्य जाग उठा।

  1. अंतिम बलिदान और वीरगति

नन्हकूसिंह अकेले ही अपनी डोंगी लेकर शिवालय घाट पहुँचता है। वह अत्यंत चतुरता और वीरता से राजमाता पन्ना और राजा चेतसिंह को खिड़की के रास्ते नाव पर बिठाकर सुरक्षित निकाल देता है। वह अंग्रेजों और कुबरा मौलवी की सेना से अकेला लड़ता है।

अंतिम दृश्य में, वह मरते दम तक अंग्रेजों को रोके रखता है ताकि राजा सुरक्षित निकल सकें। वह कुबरा मौलवी और अंग्रेज अधिकारी इस्टाकर को मौत के घाट उतार देता है। अंततः बीसों संगीन वार सहते हुए, लहूलुहान होकर वह वहीं गिर पड़ता है।

कहानी के मुख्य संदेश (Themes) –

पवित्र प्रेम – नन्हकूसिंह का पन्ना के प्रति प्रेम वासना रहित और बलिदानकारी है।

नैतिकता – एक गुंडा कहलाने वाला व्यक्ति भी ऊँचे नैतिक आदर्श (स्त्रियों का सम्मान, निर्बलों की रक्षा) रख सकता है।

देशप्रेम – निजी दुखों को भूलकर काशी और उसके सम्मान के लिए प्राण न्योछावर करना।

यथार्थवाद – प्रसाद जी ने 18वीं सदी की काशी की तंग गलियों, जुआखानों और वहाँ की संस्कृति का सजीव चित्रण किया है।

निष्कर्ष – ‘गुंडा’ कहानी एक ऐसे उपेक्षित पात्र की कथा है जो समाज की नज़रों में बुरा है, लेकिन अंततः अपने बलिदान से सिद्ध कर देता है कि वीरता और शराफत का चोला ओढ़ने वालों से कहीं बेहतर एक ‘ईमानदार गुंडा’ है।

 

पात्र परिचय

जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’ के पात्र केवल साधारण मनुष्य नहीं हैं, बल्कि वे उस समय की काशी की संस्कृति, वीरता और नैतिक द्वंद्व के प्रतीक हैं।

  1. नन्हकूसिंह (मुख्य पात्र/नायक)

नन्हकूसिंह कहानी का केंद्र है। वह एक ‘गुंडा’ है, लेकिन उसके चरित्र में एक महान नायक के गुण हैं।

अतीत – वह एक प्रतिष्ठित ज़मींदार का पुत्र था, जो प्रेम में असफलता अर्थात् राजमाता पन्ना से विवाह न हो पाने के कारण विरक्त होकर इस रास्ते पर चल पड़ा।

व्यक्तित्व – 50 वर्ष की आयु में भी अत्यंत बलशाली, साहसी और स्वाभिमानी। उसकी मूँछें बिच्छू के डंक की तरह और शरीर साँप की तरह चिकना था।

नैतिकता – वह वेश्याओं के यहाँ जाता था पर कभी कोठे पर नहीं चढ़ा। वह जुए की जीत का रुपया गरीबों और विधवाओं में बाँट देता था।

बलिदान – अंत में वह अपने पुराने प्रेम और अपने राजा चेतसिंह की रक्षा के लिए अकेले बीसों अंग्रेजों से लड़ते हुए वीरगति प्राप्त करता है।

  1. राजमाता पन्ना (नायिका)

पन्ना काशी के राजा बलवन्तसिंह की पत्नी और राजा चेतसिंह की माता है।

अतीत – वह नन्हकूसिंह के पिता की ज़मींदारी में रहने वाली एक साधारण युवती थी जिसे नन्हकू प्रेम करता था, पर राजा बलवन्तसिंह ने उसे बलपूर्वक अपनी रानी बना लिया।

स्वभाव – वह शांत, धार्मिक और स्वाभिमानी स्त्री है। वह अपने अतीत को भूली नहीं है, लेकिन अपनी मर्यादा का पालन करती है।

महत्त्व – नन्हकूसिंह के जीवन की सारी हलचल और उसके अंत का मुख्य कारण पन्ना के प्रति उसका निष्काम प्रेम ही है।

  1. राजा चेतसिंह

काशी के तत्कालीन राजा थे।

स्थिति – वे अंग्रेज वारेन हेस्टिंग्स के कूटनीतिक जाल में फँस गए थे और उन्हें उनके ही महल ‘शिवालय घाट’ में कैद कर लिया गया था।

भूमिका – वे संघर्ष और संकट की स्थिति में हैं, जिन्हें बचाने के लिए नन्हकूसिंह अपना बलिदान देता है।

  1. कुबरा मौलवी – खलनायक

मौलवी अलाउद्दीन कुबरा कहानी का नकारात्मक पात्र है।

चरित्र – वह अंग्रेजों का मुखबिर और चाटुकार है। वह अपनी सत्ता के नशे में चूर होकर गायिका दुलारी पर अत्याचार करता है।

महत्त्व – वह नन्हकूसिंह के क्रोध का केंद्र बनता है। नन्हकू उसे ‘बनारसी झापड़’ मारकर उसकी हेकड़ी निकाल देता है और अंत में उसे मौत के घाट उतार देता है।

  1. दुलारी

काशी की एक प्रसिद्ध वेश्या और गायिका।

भूमिका – वह पन्ना की बचपन की सखी की बेटी है। वह नन्हकूसिंह के अच्छे कामों की गवाह है और राजमाता पन्ना को नन्हकू के बारे में सारी जानकारी वही देती है।

 

  1. वारेन हेस्टिंग्स (Warren Hastings) –

भारत के इतिहास में एक अत्यंत प्रभावशाली और विवादास्पद ब्रिटिश अधिकारी थे। वे बंगाल के प्रथम गवर्नर जनरल थे। जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’ में वर्णित है कि हेस्टिंग्स ने बनारस के राजा चेतसिंह से अत्यधिक धन की माँग की और ऐसा न होने पर उन्हें शिवालय घाट पर नजरबंद कर दिया, जिससे काशी में भीषण विद्रोह हुआ।

अन्य गौण पात्र

मन्नू तमोली – पान की दुकान चलाने वाला, जो नन्हकूसिंह का सम्मान करता है और काशी की खबरों का केंद्र है।

बाबू मनियारसिंह – राजा चेतसिंह के सेनापति/मंत्री, जो संकट के समय राजपरिवार के साथ हैं।

मलूकी और मलूक – नन्हकूसिंह के साथी और संदेशवाहक।

हिम्मतसिंह – काशी का कोतवाल जो अंग्रेजों के दबाव में है, पर नन्हकूसिंह की धाक से डरता है।

 

पात्रों का प्रतीकात्मक महत्त्व

नन्हकूसिंह  त्याग, वीरता और निष्काम प्रेम का प्रतीक।

पन्ना  गरिमा और समय के चक्र में फँसी विवशता का प्रतीक।

कुबरा मौलवी  चाटुकारिता और सत्ता के दुरुपयोग का प्रतीक।

चेतसिंह  तत्कालीन कमजोर भारतीय राजसत्ता का प्रतीक।

कहानी का ऐतिहासिक पक्ष

जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’ केवल एक काल्पनिक कथा नहीं है, बल्कि यह 16 अगस्त 1781 को काशी अर्थात् बनारस में हुए वास्तविक ऐतिहासिक विद्रोह की पृष्ठभूमि पर आधारित है। प्रसाद जी ने इतिहास के सूखे तथ्यों में अपनी कल्पना का रंग भरकर उसे जीवंत कर दिया है

  1. वारेन हेस्टिंग्स और राजा चेतसिंह का संघर्ष

18वीं शताब्दी के अंत में भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी अपना विस्तार कर रही थी।

ऐतिहासिक तथ्य – बंगाल के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने काशी के राजाचेतसिंह से पांच लाख रुपये और सैनिक सहायता की अनुचित माँग की थी।

कहानी में संदर्भ – राजा चेतसिंह द्वारा असमर्थता जताने पर हेस्टिंग्स स्वयं सेना लेकर काशी आया और राजा को उनके ही महल ‘शिवालय घाट’ में कैद कर लिया। कहानी का अंतिम और सबसे रोमांचक हिस्सा इसी घटना पर आधारित है।

  1. 1781 का काशी विद्रोह

जब काशी की जनता को पता चला कि उनके राजा को कैद कर लिया गया है, तो पूरी काशी सड़कों पर उतर आई।

जन-विद्रोह – यह अंग्रेजों के खिलाफ भारत के पहले जन-आंदोलनों में से एक था। काशी के घाटों और तंग गलियों में भयंकर युद्ध हुआ।

नन्हकूसिंह की भूमिका – कहानी में नन्हकूसिंह इसी जन-आक्रोश का चेहरा बनकर उभरता है। वह किसी सेना का सिपाही नहीं, बल्कि जनता का ‘गुंडा’ अर्थात् रक्षक है, जो अपनी मातृभूमि और राजपरिवार के सम्मान के लिए लड़ता है।

  1. ‘शिवालय घाट’ की घेराबंदी

कहानी का चरमोत्कर्ष शिवालय घाट पर घटित होता है।

लेफ्टिनेंट इस्टाकर – कहानी में उल्लेखित ‘लेफ्टिनेंट इस्टाकर’ और ‘चेतराम’ वास्तविक ऐतिहासिक पात्र हैं। इतिहास गवाह है कि इसी विद्रोह के दौरान कई अंग्रेज अधिकारी मारे गए थे और हेस्टिंग्स को जान बचाकर रात के अँधेरे में चुनार के किले भागना पड़ा था।

कहावत – इसी घटना के बाद काशी में यह मशहूर कहावत बनी थी —”घोड़े पर हौदा और हाथी पर जीन, चुपके से भागा वारेन हेस्टिंग्स!”

  1. तत्कालीन काशी का सामाजिक परिवेश

प्रसाद जी ने उस दौर की काशी का सजीव चित्रण किया है –

राजनीतिक अस्थिरता – नवाबों की गिरती सत्ता और अंग्रेजों का बढ़ता हस्तक्षेप।

सांस्कृतिक पतन – कहानी बताती है कि वह उपनिषदों और बुद्ध की शांति वाली काशी नहीं रह गई थी। वहाँ तलवारों और ‘गुंडा’ संप्रदाय का उदय हो चुका था क्योंकि “न्याय शस्त्रबल के सामने झुक रहा था।”

  1. राजमाता पन्ना का पात्र

राजमाता पन्ना का उल्लेख इतिहास में राजा बलवंतसिंह की पत्नी और चेतसिंह की माता के रूप में मिलता है। प्रसाद जी ने उनके और नन्हकूसिंह के बीच एक काल्पनिक ‘मूक प्रेम’ की कड़ी जोड़कर इतिहास को साहित्यिक संवेदनशीलता प्रदान की है।

निष्कर्ष

‘गुंडा’ कहानी हमें यह बताती है कि इतिहास केवल राजाओं और संधियों का लेखा-जोखा नहीं होता, बल्कि इसमें उन गुमनाम नायकों नन्हकूसिंह जैसे ‘गुंडों’ का भी योगदान होता है, जो किसी सरकारी रिकॉर्ड में नहीं मिलते, लेकिन लोक-चेतना में हमेशा जीवित रहते हैं।

कहानी की मूल संवेदना

जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’ की मूल संवेदना अत्यंत गहरी और बहुआयामी है। यह कहानी केवल एक व्यक्ति के साहस की गाथा नहीं है, बल्कि यह अतीत के गौरव, निष्काम प्रेम और समय के साथ बदलते सामाजिक मूल्यों का एक जीवंत दस्तावेज़ है।

  1. बाह्य गुंडापन बनाम आंतरिक सात्त्विकता

कहानी की सबसे बड़ी संवेदना यह है कि मनुष्य का बाहरी आवरण उसके वास्तविक चरित्र का परिचायक नहीं होता। ‘नन्हकूसिंह’ समाज की नज़रों में एक गुंडा, जुआरी और उच्छृंखल व्यक्ति है, लेकिन उसके भीतर एक ‘धर्मात्मा’ और ‘कोमल हृदय’ छिपा है।

वह जुए में जीता पैसा गरीबों में बाँट देता है।

वह वेश्याओं के यहाँ जाता है, पर चारित्रिक मर्यादा कभी नहीं लाँघता।

लेखक यह संदेश देते हैं कि “शराफत” का चोला ओढ़ने वाले मौलवी कुबरा जैसे लोग वास्तव में ‘गुंडे’ हैं, जबकि समाज जिसे ‘गुंडा’ कहता है, वही असली ‘इंसान’ है।

  1. निष्काम और उदात्त प्रेम

नन्हकूसिंह के ‘गुंडा’ बनने के पीछे एक मानसिक चोट है—राजमाता पन्ना के प्रति उसका प्रेम।

उसका प्रेम वासनापूर्ण नहीं, बल्कि समर्पित है।

पन्ना का विवाह राजा बलवन्तसिंह से हो जाने के बाद भी नन्हकू ने उसके प्रति अपनी श्रद्धा को कम नहीं होने दिया।

वह पूरे जीवन एक ‘रक्षक’ की भूमिका में रहा, बिना यह जताए कि वह पन्ना से प्रेम करता है। कहानी का चरम बिंदु उनके प्रेम की इसी ‘मूक और पवित्र’ परिणति को दर्शाता है।

  1. राष्ट्रवाद और ऐतिहासिक गौरव

यह कहानी उस समय की है जब भारत में ब्रिटिश सत्ता पैर पसार रही थी।

मूल संवेदना – निजी दुखों से ऊपर उठकर राष्ट्र और समाज के लिए बलिदान देना।

नन्हकूसिंह को राजा चेतसिंह के राजनीतिक अपराधों से मतलब नहीं है, उसे मतलब है ‘काशी की आन’ और ‘राजमाता के सम्मान’ से।

वह अकेला ही अंग्रेजों अर्थात् तिलंगों की संगीनों के सामने खड़ा हो जाता है, जो उसके भीतर की प्रखर देशभक्ति को दर्शाता है।

  1. तत्कालीन काशी का यथार्थ चित्रण

प्रसाद जी ने 18वीं सदी की काशी के सांस्कृतिक पतन की संवेदना को भी उकेरा है।

वह काशी जो कभी ‘ब्रह्म-विद्या’ और ‘शास्त्रार्थ’ के लिए जानी जाती थी, अब ‘शस्त्रबल’ और ‘अराजकता’ का केंद्र बन गई थी।

न्याय को जब बलपूर्वक कुचला जाने लगा, तब ‘गुंडा संप्रदाय’ जैसे विद्रोही समूहों का जन्म हुआ। यह समाज की विवशता की संवेदना है।

  1. अंततः ‘वीरगति’ और सार्थकता

कहानी का अंत दुखांत है, लेकिन यह मृत्यु नन्हकूसिंह के जीवन को सार्थकता प्रदान करती है।

नन्हकू मरकर भी अमर हो जाता है क्योंकि उसका बलिदान स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि परमार्थ के लिए था।

“वह काशी का गुंडा था”—यह अंतिम वाक्य गर्व और करुणा की मिली-जुली संवेदना पैदा करता है।

निष्कर्ष

‘गुंडा’ कहानी की मूल संवेदना “मनुष्यता की खोज” है। यह बताती है कि एक तिरस्कृत और उपेक्षित व्यक्ति के भीतर भी महानता के बीज हो सकते हैं, जो सही अवसर आने पर आत्म-बलिदान के रूप में प्रस्फुटित होते हैं।

महत्त्वपूर्ण अंशों की व्याख्या

  1. काशी के ‘गुंडा’ संप्रदाय का परिचय

“वीरता जिसका धर्म था। अपनी बात पर मिटना… सताये हुए निर्बलों को सहायता देना और प्रत्येक क्षण प्राणों को हथेली पर लिए घूमना उनका बाना था। उन्हें लोग काशी में गुंडा कहते थे।”

व्याख्या – लेखक स्पष्ट करते हैं कि 18वीं सदी की काशी में ‘गुंडा’ शब्द अपराधी के लिए नहीं, बल्कि एक विशिष्ट नागरिक संप्रदाय के लिए प्रयुक्त होता था। जब समाज में न्याय व्यवस्था शस्त्रबल के सामने झुकने लगी, तब इस वर्ग का जन्म हुआ। इनका जीवन सिद्धांतों पर टिका था—कायरों पर हाथ न उठाना और मजलूमों की रक्षा करना। यह अंश नन्हकूसिंह की जीवनशैली का नैतिक आधार प्रस्तुत करता है।

  1. नन्हकूसिंह का शारीरिक वैभव

“पचास वर्ष से ऊपर था। तब भी युवकों से अधिक बलिष्ठ और दृढ़ था… उसकी चढ़ी मूँछें बिच्छू के डंक की तरह, देखने वालों को आँखों में चुभेती थीं।”

व्याख्या – यह अंश नन्हकूसिंह के अदम्य पौरुष का वर्णन करता है। उम्र के इस पड़ाव पर भी वह प्रकृति की मार (धूप, ठंड, वर्षा) सहने में सुख मानता था। उसका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली और आक्रामक था कि लोग उसे देखकर सहम जाते थे। यह उसके भीतर की अटूट शक्ति और विद्रोही स्वभाव का भौतिक चित्रण है।

  1. ‘बैंगन वाली’ और स्वाँग का प्रसंग

“नन्हकूसिंह ने बहुत-सा रुपया खर्च करके जैसा स्वाँग खेला था… एक पैर में नूपुर, एक आँख में काजल… गाया था – ‘कहीं बैंगन वाली मिले तो बुला देना’!”

व्याख्या – यह अंश नन्हकूसिंह के अक्खड़पन और उच्छृंखलता को दर्शाता है। वह एक ज़मींदार का पुत्र था, लेकिन किसी मानसिक चोट (पन्ना से वियोग) के कारण उसने अपनी संपत्ति लुटा दी। उसका यह अजीबोगरीब स्वाँग समाज के प्रति उसकी विरक्ति और उसके भीतर छिपे गहरे खालीपन का एक ‘प्रहसनपूर्ण’ प्रदर्शन था।

  1. कुबरा मौलवी को ‘बनारसी झापड़’

“तुम्हारे चाचा बाबू नन्हकूसिंह! – के साथ ही पूरा बनारसी झापड़ पड़ा। कुबरा का सिर घूम गया।”

व्याख्या – यह कहानी का एक महत्त्वपूर्ण मोड़ (Turning Point) है। कुबरा मौलवी, जो अंग्रेजों का चाटुकार और अहंकारी था, जब दुलारी पर रौब गाँठता है, तब नन्हकूसिंह उसे सबक सिखाता है। यह ‘झापड़’ केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि उस समय की भ्रष्ट व्यवस्था और सत्ता के नशे में चूर चाटुकारों के मुँह पर तमाचा था।

  1. नन्हकूसिंह और पन्ना का मूक संबंध

“पन्ना ने नन्हकू को देखा। एक क्षण के लिए चारों आँखें मिलीं, जिनमें जन्म-जन्म का विश्वास ज्योति की तरह जल रहा था।”

व्याख्या – यह अंश नन्हकूसिंह के पूरे जीवन का ‘रहस्य’ खोल देता है। बरसों बाद पन्ना और नन्हकूसिंह का आमना-सामना होता है। यहाँ शब्द कम हैं और अनुभूतियाँ अधिक। नन्हकूसिंह ने जिस पन्ना के लिए अपना सब कुछ लुटा दिया था, उसे संकट में देखकर वह देवदूत की तरह आ खड़ा होता है। यह उनके पवित्र और निष्काम प्रेम की पराकाष्ठा है।

  1. दुलारी का नन्हकू के प्रति बचाव

“यह झूठ है। बाबू साहब के ऐसा धर्मात्मा तो कोई है ही नहीं। कितनी विधवाएँ उनकी दी हुई धोती से अपना तन ढकती हैं।”

व्याख्या – समाज और राजदरबारी गेंदा जहाँ नन्हकूसिंह को ‘डाकू’ और ‘खूनी’ कहते हैं, वहीं दुलारी उसका वास्तविक चेहरा दुनिया को दिखाती है। यह अंश स्थापित करता है कि नन्हकूसिंह का ‘गुंडापन’ केवल बाहरी कवच है, भीतर से वह अत्यंत दयालु और समाज का रक्षक है।

  1. कोतवाली के सामने ललकार

“नमक हरामो ! चूड़ियाँ पहन लो।”

व्याख्या – जब अंग्रेजों ने राजा चेतसिंह को कैद कर लिया और काशी के रक्षक (कोतवाल और सिपाही) डर के मारे छिपे बैठे थे, तब नन्हकूसिंह की यह ललकार उनकी कायरता पर करारी चोट करती है। वह अकेला ही व्यवस्था को चुनौती देता है और सोई हुई वीरता को जगाने का प्रयास करता है।

  1. अंतिम बलिदान – ‘काशी का गुंडा’

“बीसों तिलंगों की संगीनों में वह अविचल खड़ा होकर तलवार चला रहा है… गुंडे का एक-एक अंग कटकर वहीं गिरने लगा। वह काशी का गुंडा था।”

व्याख्या – कहानी का उपसंहार (Climax) नन्हकूसिंह की शहादत है। वह राजमाता और राजा को सुरक्षित निकाल देता है और स्वयं बीसों सैनिकों का मुकाबला करते हुए कट मरता है। यहाँ ‘गुंडा’ शब्द अपने अर्थ की गरिमा प्राप्त कर लेता है। वह एक उपेक्षित व्यक्ति था, जिसे समाज ने ठुकराया, लेकिन अंततः वही समाज और राष्ट्र की आन के लिए शहीद हुआ।

कठिन शब्दों के सरल अर्थ

बलिष्ठ – शक्तिशाली / मजबूत, Robust / Strong

दृढ़ – कठोर / मजबूत, Firm / Solid

झुर्रियाँ – त्वचा पर पड़ने वाली लकीरें, Wrinkles

धज – वेशभूषा / ठाठ-बाट, Appearance / Attire style

फेंटा – कमर में बाँधने वाला कपड़ा, Waist-band / Sash

साफा – पगड़ी, Turban

बिछुआ – एक प्रकार का छोटा खंजर, A small dagger

पल्ला – साफे या धोती का किनारा, Edge of a cloth

धोती – पारंपरिक वस्त्र, Loincloth

नूपुर – घुँघरू, Anklets

सुरमा – काजल जैसा पदार्थ, Antimony / Kohl

अँगरखा – एक पुराना पहनावा, Tunic / Long coat

परतला – तलवार की पेटी, Sword-belt

साँवला – गहरे रंग का, Swarthy / Dusky

चौड़ी धार – चौड़ा फलक, Broad-edged

शताब्दी – सौ वर्षों का समय, Century

परिषद् – सभा / गोष्ठी, Assembly / Council

ब्रह्म-विद्या – ईश्वरीय ज्ञान, Divine Knowledge

ध्वंस – विनाश / बर्बादी, Destruction / Demolition

विशृंखलता – अव्यवस्था, Disorder / Chaos

नवागन्तुक – नया आने वाला, Newcomer

धर्मोन्माद – धर्म के प्रति पागलपन, Religious Frenzy / Fanaticism

सिंह-वृत्ति – शेर जैसा स्वभाव, Lion-like nature / Brave nature

प्रहसनपूर्ण – हास्य से भरा, Farcical / Humorous

सात्त्विक – शुद्ध और पवित्र, Virtuous / Pure

वैधव्य – विधवापन, Widowhood

सापत्न्य – सौतन से संबंधित, Related to a co-wife

असवर्णता – अलग जाति का होना, Different caste status

मन्त्रणा – गुप्त विचार-विमर्श, Deliberation / Secret meeting

तिलंगे – देशी पैदल सैनिक, Native infantry soldiers

अलभ्य – जो प्राप्त न हो सके, Unattainable

अभिलाषा – इच्छा, Desire / Wish

विरक्त – विरक्त होना / उदासीन, Detached / Indifferent

निर्भीकता – निडरता, Fearlessness

उच्छृंखलता – अनुशासनहीनता, Disorderliness / Indiscipline

सस्पृह – इच्छा के साथ, Desirously / Longingly

उद्विग्न – व्याकुल / परेशान, Agitated / Restless

उन्मत्त – पागल जैसा / उत्तेजित, Frenzied / Intoxicated

अधीर – व्याकुल / बेचैन, Impatient / Restless

भृकुटी – भौहें, Eyebrows

हेकड़ी – घमंड, Arrogance

आफत – मुसीबत, Calamity / Trouble

मलीन – उदास / गंदा, Gloomy / Dirty

अन्यमनस्क – जिसका मन कहीं और हो, Absent-minded

प्रसन्न – खुश, Delighted

गँड़ासा – एक बड़ा कुल्हाड़ा, Poleaxe / Cleaver

शस्त्रबल – हथियारों की ताकत, Armed force

प्रतिद्वन्द्वी – विरोधी, Rival / Opponent

मूठ – तलवार का हत्था, Hilt of a sword

जड़ाऊ – कीमती पत्थर जड़ा हुआ, Studded / Inlaid

ललकार – चुनौती देना, Challenge / Battle cry

धराशायी – जमीन पर गिर जाना, Fallen / Slain

संगीन – बन्दूक के आगे की छूरी, Bayonet

कवच – रक्षात्मक आवरण, Armor

आघात – चोट, Blow / Strike

पहरा – निगरानी, Guard / Vigil

विप्लव – विद्रोह, Revolt / Rebellion

घोर विद्रोही – बड़ा बागी, Extreme Rebel

प्राण-भिक्षा – जान की भीख, Begging for life

नमक हराम – विश्वासघाती, Treacherous / Ungrateful

हरियाली – हरा-भरा क्षेत्र, Greenery

डोंगी – छोटी नाव, Canoe / Small boat

पूस की रात – सर्दी की रात, A cold winter night

जेठ की धूप – भीषण गर्मी, Intense summer heat

झुरमुट – झाड़ियों का समूह, Thicket / Bushes

सन्नाटा – खामोशी, Silence / Stillness

झिलियों का स्वर – कीटों की आवाज, Sound of crickets

दूधिया छानना – नशीला पेय बनाना, Preparing a milky intoxicant

नाला – छोटी जलधारा, Stream / Drain

अन्धकार – अंधेरा, Darkness

अट्टालिका – महल (कोठा), Mansion / Balcony

बजाज – कपड़े का व्यापारी, Cloth merchant

तमोली – पान बेचने वाला, Betel-leaf seller

मठ – आश्रम, Monastery

परिषद् – गोष्ठी, Assembly

कोतवाली – थाना, Police Station

रेजिडेण्ट – ब्रिटिश अधिकारी, Resident Officer

राजमाता – राजा की माँ, Queen Mother

चोबदार – छड़ी लेकर चलने वाला सेवक, Mace-bearer

मुजरा – नाच-गाना, Musical performance

अधिया/अधेला – पुराना सिक्का, An old small coin

सायत – शुभ समय, Auspicious moment

तोड़ा – रुपयों की थैली, Bag of money

नाल – जुए का अड्डा, Gambling den

प्रसाद – ईश्वर का चढ़ावा, Divine offering

अंजलि – दोनों हाथों को जोड़ना, Cupped hands

अनुसन्धान – खोज/जानकारी, Investigation / Research

दुर्व्यवस्था – बुरी व्यवस्था, Mismanagement

सम्मत – राय/सलाह, Opinion / Advice

साक्ष्य – प्रमाण, Evidence

विच्छिन्न – अलग किया हुआ, Severed / Separated

सिंह-वृत्ति – साहसी आचरण, Brave-heartedness

अलभ्य – अप्राप्य, Rare / Unobtainable

उच्छृंखलता – बेलगाम होना, Unruliness

विवरण – चेहरा पीला पड़ना, Turning pale

सापत्न्य – सौतिया, Rivalry between co-wives

असवर्णता – असमान जाति, Caste difference

उद्वेलित – हिलोरें मारना, Agitated / Stirred up

शहनाई – वाद्य यंत्र, Clarinet

निशा – रात, Night

अविचल – जो न हिले, Steady / Unwavering

गैरिक – गेरुए रंग का (रक्त), Reddish-ochre (blood)

तौल देना – वार करना, To strike / Swing a weapon

जनेवा – जनेऊ की तरह का कट, A diagonal cut across the body

मल्लिक – माली, Gardener

अघोरा – डरावना, Dreadful

उलांकी – विशेष प्रकार का इक्का, A type of horse-cart

प्रहसन – कॉमेडी / प्रहसन, Farce / Satire

भृकुटी – भौहें टेढ़ी करना, Frowning

शहनाई – एक वाद्य यंत्र, Clarinet

कोलाहल – शोर, Clamor / Noise

विवरण – फीका पड़ना, To become pale

अभिनय – नाटक करना, Acting

अद्भुत – अनोखा, Remarkable / Strange

व्यथित – दुखी, Distressed

प्रतीक्षा – इंतज़ार, Waiting

प्रचुर – बहुत ज्यादा, Abundant

शस्त्र – हथियार, Weapon

भक्ति – पूजा, Devotion

मर्यादा – सीमा / सम्मान, Limit / Honor

बलिदान – कुर्बानी, Sacrifice

यथार्थ – सच, Reality

कायर – डरपोक, Coward

मशहूर – प्रसिद्ध, Famous

निजी – व्यक्तिगत, Private

संकट – परेशानी, Crisis

विद्रोही – बागी, Rebel

शहादत – वीरगति, Martyrdom

सम्मान – आदर, Respect

चेतावनी – आगाह करना, Warning

प्रभावी – असरदार, Effective

उपेक्षा – नजरअंदाज करना, Neglect

सहज – आसान, Natural / Simple

विपरीत – उल्टा, Opposite

धैर्य – सब्र, Patience

हस्तक्षेप – दखल देना, Interference

यंत्र – मशीन / औजार, Tool / Instrument

संकेत – इशारा, Sign / Hint

चमत्कार – जादू, Miracle

अनुभव – तजुर्बा, Experience

शाश्वत – हमेशा रहने वाला, Eternal

स्थिर – न हिलने वाला, Constant

दुर्लभ – जो मुश्किल से मिले, Rare

भ्रष्ट – बिगड़ा हुआ, Corrupt

अंश – हिस्सा, Part

मर्म – रहस्य / सार, Essence

प्रतिष्ठा – इज्जत, Reputation

पतन – गिरावट, Decline

विजय – जीत, Victory

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