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आचार्य रामचंद्र शुक्ल का परिचय
हिंदी साहित्य के ‘सूरज’ माने जाने वाले आचार्य रामचंद्र शुक्ल का परिचय संक्षेप में नीचे दिया गया है। वे एक प्रखर आलोचक, निबंधकार और इतिहासकार थे।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल – संक्षिप्त परिचय
जन्म – 4 अक्टूबर, 1884 ई.
जन्म स्थान – अगोना गाँव, जिला- बस्ती (उत्तर प्रदेश)
मृत्यु – 2 फरवरी, 1941 ई.
युग – शुक्ल युग (छायावाद के समकालीन)
मुख्य विधाएँ – आलोचना, निबंध, इतिहास, संपादन
जीवन परिचय (Life Journey)
आचार्य शुक्ल के पिता का नाम पंडित चंद्रबली शुक्ल था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उर्दू और अंग्रेजी में हुई, लेकिन उनकी गहरी रुचि हिंदी साहित्य में थी। उन्होंने ‘मिर्जापुर’ के मिशन स्कूल में चित्रकला के अध्यापक के रूप में कार्य किया। बाद में वे काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के हिंदी विभाग के अध्यक्ष बने। उन्होंने ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ से जुड़कर ‘हिंदी शब्दसागर’ के संपादन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
साहित्यिक विशेषताएँ (Literary Style)
प्रौढ़ भाषा – शुक्ल जी की भाषा शुद्ध, परिमार्जित और संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है।
गंभीरता – उनके निबंधों में हास्य-व्यंग्य के साथ बौद्धिक गहराई होती है।
मनोवैज्ञानिक विश्लेषण – उन्होंने ‘भय’, ‘क्रोध’, ‘उत्साह’ जैसे मनोविकारों पर विश्वस्तरीय निबंध लिखे हैं।
निष्पक्ष आलोचना – उन्होंने तुलसी और जायसी जैसे कवियों की आलोचना कर उन्हें आधुनिक साहित्य में स्थापित किया।
प्रमुख रचनाएँ (Major Works)
निबंध संग्रह – ‘चिंतामणि’ (भाग 1 और 2), ‘विचार वीथी’।
इतिहास – ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ (1929) — यह हिंदी का सबसे प्रामाणिक इतिहास ग्रंथ माना जाता है।
आलोचना – ‘सूरदास’, ‘रश्मिमांसा’, ‘त्रिवेणी’।
संपादन – ‘भ्रमरगीत सार’, ‘जायसी ग्रंथावली’, ‘तुलसी ग्रंथावली’।
कहानी – ‘ग्यारह वर्ष का समय’।
विशेष नोट – हिंदी साहित्य में निबंध और आलोचना के क्षेत्र में जो स्थान शुक्ल जी का है, वह अद्वितीय है। उनके सम्मान में ही उनके समय को ‘शुक्ल युग’ के नाम से जाना जाता है।
भय
आचार्य रामचंद्र शुक्ल
किसी आती हुई आपदा की भावना या दुःख के कारण के साक्षात्कार से जो एक प्रकार का आवेगपूर्ण अथवा स्तंभ कारक मनोविकार होता है, उसी को भय कहते हैं। क्रोध दुःख के कारण पर प्रभाव डालने के लिए आकुल करता है और भय उसकी पहुँच से बाहर होने के लिए। क्रोध दुःख के कारण के स्वरूपबोध के बिना नहीं होता। यदि दुःख का कारण चेतन होगा और यह समझा जाएगा कि उसने जानबूझकर दुःख पहुँचाया है, तभी क्रोध होगा। पर भय के लिए कारण का निर्दिष्ट होना ज़रूरी नहीं; इतना भर मालूम होना चाहिए कि दुःख या हानि पहुँचेगी। यदि कोई ज्योतिषी किसी गँवार से कहे कि “कल तुम्हारे हाथ पाँव टूट जाएँगे तो उसे क्रोध न आएगा; भय होगा। पर उसी से यदि कोई दूसरा आकर कहे कि कल अमुक-अमुक तुम्हारे हाथ पैर तोड़ देंगे तो वह तुरंत त्योरी बदलकर कहेगा कि कौन है हाथ पैर तोड़ने वाला? देख लूँगा।”
भय का विषय दो रूपों में सामने आता है—असाध्य रूप में और साध्य रूप में। असाध्य विषय वह है जिसका किसी प्रयत्न द्वारा निवारण असंभव हो या असंभव समझ पड़े। साध्य विषय वह है जो प्रयत्न द्वारा दूर किया या रखा जा सकता हो। दो मनुष्य एक पहाड़ी नदी के किनारे बैठे या आनंद से बातचीत करते चले जा रहे थे। इतने में सामने शेर की दहाड़ सुनाई पड़ी। यदि वे दोनों उठकर भागने, छिपने या पेड़ पर चढ़ने आदि का प्रयत्न करें तो बच सकते हैं। विषय के साध्य या असाध्य होने की धारणा परिस्थिति की विशेषता के अनुसार तो होती है पर बहुत कुछ मनुष्य की प्रकृति पर भी अवलंबित रहती है। क्लेश के कारण का ज्ञान होने पर उसकी अनिवार्यता का निश्चय अपनी विवशता या अक्षमता की अनुभूति के कारण होती है। यदि यह अनुभूति कठिनाइयों और आपत्तियों को दूर करने के अनभ्यास या साहस के अभाव के कारण होती है, तो मनुष्य स्तंभित हो जाता है और उसके हाथ पाँव नहीं हिल सकते। पर कड़े दिल का साहसी आदमी पहले तो जल्दी डरता नहीं और डरता भी है तो संभलकर अपने बचाव के उद्योग में लग जाता है।
भय जब स्वभावगत हो जाता है तब कायरता या भीरुता कहलाता है और भारी दोष माना जाता है, विशेषत – पुरुषों में। स्त्रियों की भीरुता तो उनकी लज्जा के समान ही रसिकों के मनोरंजन की वस्तु रही है। पुरुषों की भीरुता की पूरी निंदा होती है। ऐसा जान पड़ता है कि बहुत पुराने ज़माने से पुरुषों ने न डरने का ठेका ले रखा है। भीरुता के संयोजक अवयवों में क्लेश सहने की आवश्यकता और अपनी शक्ति का अविश्वास प्रधान है। शत्रु का सामना करने से भागने का अभिप्राय यही होता है कि भागने वाला शारीरिक पीड़ा नहीं सह सकता तभी अपनी शक्ति के द्वारा उसी पीड़ा से अपनी रक्षा का विश्वास नहीं रखता। यह तो बहुत पुरानी चाल की भीरुता हुई। जीवन के और अनेक व्यपारों में भी भीरुता दिखाई देती है। अर्थहानि के भय से बहुत से व्यापारी कभी कभी किसी विशेष व्यवसाय में हाथ नहीं डालते, परास्त होने के भय से बहुत से पंडित कभी कभी शास्त्रर्थ से मुँह चुराते हैं। इस प्रकार की भीरुता की तह में सहन करने की अक्षमता और अपनी शक्ति का अविश्वास छिपा रहता है। भीरु व्यापारी में अर्थहानि सहने की अक्षमता और अपने व्यवसाय कौशल पर अविश्वास तथा भीरु पंडित में मानहानि सहने की अक्षमता और अपने विद्या बुद्धि बल पर अविश्वास निहित है।
एक ही प्रकार की भीरुता ऐसी दिखाई पड़ती है जिसकी प्रशंसा होती है। वह धर्म भीरुता है। पर हम तो उसे भी कोई बड़ी प्रशंसा की बात नहीं समझते। धर्म से डरने वालों की अपेक्षा धर्म की ओर आकर्षित होने वाले हमें अधिक धन्य जान पड़ते हैं। जो किसी बुराई से यही समझकर पीछे हटते हैं कि उसके करने से अधर्म होगा, उसकी अपेक्षा वे कहीं श्रेष्ठ हैं जिन्हें बुराई अच्छी ही नहीं लगती।
दुःख या आपत्ति का पूर्ण निश्चय न रहने पर उसकी संभावना मात्र के अनुमन से जो आवेग शून्य भय होता है उसे आशंका कहते हैं। उसमें वैसी आकुलता नहीं होती। उसका संचार कुछ धीमा पर अधिक काल तक रहता है। घने जंगल से होकर जाता हुआ यात्री चाहे रास्ते भर इस आशंका में रहे कि कहीं चीता न मिल जाए, पर वह बराबर चल सकता है। यदि उसे असली भय हो जाएगा तो वह या तो लौट जाएगा अथवा एक पैर आगे न रखेगा। दुःखात्मक भावों में आशंका की वही स्थिति समझनी चाहिए जो सुखात्मक भावों में आशा की। अपने द्वारा कोई भयंकर काम किए जाने की कल्पना या भावना मात्र से भी क्षणिक स्तंभ के रूप में एक प्रकार के भय का अनुभव होता है। जैसे, कोई किसी से कहे कि इस छत पर से कूद जाओ तो कूदना और न कूदना उसके हाथ में होते हुए भी वह कहेगा कि डर मालूम होता है। पर डर भी पूर्ण भय नहीं है।
क्रोध का प्रभाव दुःख के कारण पर डाला जाता है, इससे उसके द्वारा दुःख का निवारण यदि होता है तो सब दिन के लिए या बहुत दिनों के लिए। भय के द्वारा बहुत सी अवस्थाओं में यह बात नहीं हो सकती। ऐसे सज्ञान प्राणियों के बीच जिनमें भाव बहुत काल तक संचित रहते हैं और ऐसे उन्नत समाज में जहाँ एक-एक व्यक्ति की पहुँच और परिचय का विस्तार बहुत अधिक होता है, प्रायः भय का फल भय के संचार काल तक ही रहता है। जहाँ वह भय भूला कि आफ़त आई। यदि कोई क्रूर मनुष्य किसी बात पर आपसे बुरा मान गया और आपको मारने दौड़ा तो उस समय भय की प्रेरणा से आप भागकर अपने को बचा लेंगे। पर संभव है कि उस मनुष्य का क्रोध जो आप पर था उसी समय दूर न हो, बल्कि कुछ दिन के लिए वैर के रूप में टिक जाए, तो उसके लिए आपके सामने फिर आना कोई बड़ी बात न होगी। प्राणियों की असभ्य दशा में ही भय से अधिक काम निकलता है जबकि समाज का ऐसा गहरा संगठन नहीं होता है कि बहुत से लोगों को एक-दूसरे का पता और उसके विषय में जानकारी रहती हो।
जंगली मनुष्य के परिचय का विस्तार बहुत थोड़ा होता है। बहुत सी ऐसी जंगली जातियाँ अब भी हैं जिनमें कोई एक व्यक्ति बीस-पचीस से अधिक आदमियों को नहीं जानता। अतः उसे दस बारह कोस पर ही रहने वाला यदि कोई दूसरा जंगली मिले और मारने दौड़े तो वह भागकर उससे अपनी रक्षा उसी समय के लिए ही नहीं बल्कि सब दिनों के लिए कर सकता है। पर सभ्य, उन्नत और विस्तृत समाज में भय के द्वारा स्थाई रक्षा की उतनी संभावना नहीं होती। इसी से जंगली और असभ्य जातियों में भय अधिक होता है। जिससे वे भयभीत हो सकते हैं उसी को वे श्रेष्ठ मानते हैं और उसी की स्तुति करते हैं। उनके देवी-देवता भय के प्रभाव से ही कल्पित होते हैं। किसी आपत्ति या दुःख से बचे रहने के लिए ही अधिकतर वे उनकी पूजा करते हैं। अति भय और भयकारक का सम्मान असभ्यता के लक्षण हैं। अशिक्षित होने के कारण अधिकांश भारतवासी भी भय के उपासक हो गए हैं। वे जितना सम्मान एक थानेदार का करते हैं, उतना किसी विद्वान का नहीं।
चलने-फिरने वाले बच्चों में, जिनमें भाव देर तक नहीं टिकते और दुःख परिहार का ज्ञान या बल नहीं होता, भय अधिक होता है। बहुत से बच्चे तो किसी अपरिचित आदमी को देखते ही घर के भीतर भागते हैं। पशुओं में भी भय अधिक पाया जाता है। अपरिचित के भय में जीवन का कोई गूढ़ रहस्य छिपा जान पड़ता है। प्रत्येक प्राणी भीतरी आँख कुछ खुलते ही अपने सामने मानो एक दुःख-कारणपूर्ण संसार फैला हुआ पाता है जिसे क्रमश – कुछ अपने ज्ञानबल से और कुछ बाहुबल से थोड़ा बहुत सुखमय बनाता चलता है। क्लेश और बाधा का ही सामान्य आरोप करके जीव संसार में पैर रखता है। सुख और आनंद को वह सामान्य का व्यतिक्रम समझता है; विरल विशेष मानता है। इस विशेष से सामान्य की ओर जाने का साहस उसे बहुत दिनों तक नहीं होता। परिचय के उत्तरोत्तर अभ्यास के बल से अपने माता पिता या नित्य दिखाई पड़ने वाले कुछ थोड़े से और लोगों के ही संबंध में वह यह धारणा रखता है कि मुझे सुख पहुँचाते हैं और कष्ट न पहुँचाएँगे। जिन्हें वह नहीं जानता, जो पहले-पहल उसके सामने आते हैं, उनके पास वह बेधड़क नहीं चला जाता। बिल्कुल अज्ञात वस्तुओं के प्रति भी वह ऐसा ही करता है।
भय की इस वासना का परिहार क्रमशः होता चलता है। ज्यों-ज्यों वह नाना रूपों से अभ्यस्त होता है त्यों-त्यों उसको धड़क खुलती जाती है। इस प्रकार अपने ज्ञान बल, हृदय बल और शरीर बल के वृद्धि के साथ वह दुःख की छाया मानो हटाता चलता है। समस्त मनुष्य जाति की सभ्यता के विकास का ही यही क्रम रहा है। भूतों का भय तो अब बहुत कुछ छूट गया है, पशुओं की बाधा भी मनुष्य के लिए प्रायः नहीं रह गई है – पर मनुष्य के लिए मनुष्य का भय बना हुआ है। इस भय के छूटने के लक्षण भी नहीं दिखाई देते। अब मनुष्यों के दुःख के कारण मनुष्य ही है। सभ्यता से अंतर केवल इतना ही पड़ा है कि दुःख दान की विधियों बहुत गूढ़ और जटिल हो गई है। उनका क्षोभकारक रूप बहुत से आवरणों के भीतर ढक गया है। अब इस बात की आशंका तो नहीं रहती है कि कोई ज़बरदस्ती आकर हमारे चर, खेत, बाग़-बग़ीचे, रूपए-पैसे छीन न ले, पर इस बात का खटका रहता है कि कोई नक़ली दस्तावेज़ों झूठे गवाहों और क़ानूनी बहसों के बल से हमें इन वस्तुओं से वंचित न कर दे। दोनों बातों का परिणाम एक ही है।
एक-एक व्यक्ति से दूसरे-दूसरे व्यक्तियों के लिए सुखद और दुःखद दोनों रूप बराबर रहे हैं और बराबर रहेंगे। किसी प्रकार की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था—एकाशाही से लेकर साम्यवाद—तक इस दो रंगी झलक को दूर नहीं कर सकती। मानवी प्रकृति की अनेकरूपता रोष प्रकृति की अनेकरूपता के साथ साथ चलती रहेगी। ऐसे समाज की कल्पना, ऐसी परिस्थिति का स्वप्न, जिसमें सुख ही सुख, प्रेम ही प्रेम हो, या तो लंबी-चौड़ी बात बनाने के लिए अथवा अपने को या दूसरों को फुसलाने के लिए ही समझा जा सकता है।
ऊपर जिस व्यक्तिगत विषमता की बात कही गई है, उससे समष्टि रूप में मनुष्य जाति का वैसा अमंगल नहीं है। कुछ लोग अलग-अलग यदि क्रूर लोभ के व्यापार में रत रहे, तो थोड़े से लोग ही उनके द्वारा दुःखी या त्रस्त होंगे। यदि उक्त व्यापार का साधन एक बड़ा दल बाँधकर किया जाएगा, तो उसमें अधिक सफलता होगी और उसका अनिष्ट प्रभाव बहुत दूर तक फैलेगा। संघ एक शक्ति है जिसके द्वारा शुभ और अशुभ दोनों के प्रसार की संभावना बहुत बढ़ जाती है। प्राचीन काल में जिस प्रकार के स्वदेश प्रेम की प्रतिष्ठा यूनान में हुई थी उसने आगे चलकर यूरोप में बड़ा भयंकर रूप धारण किया। अर्थशास्त्र के प्रभाव में अर्थोन्माद का उसके साथ संयोग हुआ और व्यापार, राजनीति या राष्ट्रनीति का प्रधान अंग हो गया। यूरोप के देश इस धुन में लगे कि व्यापार के बहाने दूसरे देशो से जहाँ तक धन खींचा जा सके, बराबर खींचा जाता रहे। पुरानी चढ़ाइयों की लूटपाट का सिलसिला आक्रमण काल तक ही—जो बहुत दीर्घ नहीं हुआ करता था—रहता था। पर यूरोप के अर्थोन्मादियों ने ऐसी गूढ़, जटिल और स्थाई प्रणालियाँ प्रतिष्ठित की जिनके द्वारा भूमंडल की न जाने कितनी जनता का क्रम-क्रम से रक्त चूसता चला जा रहा है— न जाने कितने देश चलते-फिरते कंकालों के कारागार हो रहे हैं।
जब तक यूरोप की जातियों ने आपस में लड़कर अपना रक्त नहीं बहाया तब तक उनका ध्यान अपनी उस अंधनीति से अनर्थ की ओर नहीं गया। गत महायुद्ध के पीछे जगह-जगह स्वदेश-प्रेम के साथ-साथ विश्वप्रेम उमड़ता दिखाई देने लगा। आध्यात्मिकता की भी बहुत कुछ पूछ होने लगी। पर इस विश्वप्रेम और आध्यात्मिकता का शाब्दिक प्रचार ही तो अभी देखने में आया है। इस फ़ैशन की लहर भारतवर्ष में आई। पर कोरे फ़ैशन के रूप में गृहीत इस ‘विश्वप्रेम’ और ‘अध्यात्म’ की चर्चा का कोई स्थाई मूल्य नहीं। इसे हवा का एक झोका समझना चाहिए।
सभ्यता की वर्तमान स्थिति में एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से वैसा भय तो नहीं रहा जैसा पहले रहा करता था। पर एक जाति को दूसरी जाति से, एक देश को दूसरे देश से भय के स्थाई कारण प्रतिष्ठित हो गए हैं। सबल और सबल देशों के बीच अर्थ संघर्ष की, सबल और निर्बल देशों के बीच अर्थ शोषण की प्रक्रिया अनवरत चल रही है; एक क्षण का विराम नहीं है। इस सार्वभौम वणिग्वृत्ति से उतना अनर्थ कभी न होता यदि क्षत्रियवृत्ति उसके लक्ष्य से अपना लक्ष्य अलग रखती। पर इस युग में दोनों का विलक्षण सहयोग हो गया है। वर्तमान अर्थोन्माद को शासन के भीतर रखने के लिए क्षत्रिय धर्म के उच्च और पवित्र आदर्श को लेकर क्षत्रियसंघ की प्रतिष्ठा आवश्यक है।
जिस प्रकार सुखी होने का प्रत्येक प्राणी को अधिकार है, उसी प्रकार मुक्तांतक होने का भी पर कर्मक्षेत्र के चक्रव्यूह में पड़कर जिस प्रकार सुखी होना प्रयत्न साध्य होता है उसी प्रकार निर्भय रहना भी। निर्भयता के संपादन के लिए दो बातें अपेक्षित होती है—पहली तो यह है कि दूसरों को हमसे किसी प्रकार का भय या कष्ट न हो दूसरी यह कि दूसरे हमको कष्ट का भय पहुँचाने का साहस न कर सके। इनमें से एक का संबंध उत्कृष्ट-शील से है और दूसरी का शक्ति और पुरुषार्थ से इस संसार में किसी को न डराने से ही डरने की संभावना दूर नहीं हो सकती। साधु से साधु प्रकृति वाले को क्रूर लोभियों और दुर्जनों से क्लेश पहुँचता है। अतः उनके प्रयत्नों को विफल करने या भय संचार द्वारा रोकने की आवश्यकता से हम बच नहीं सकते।
भय – सारांश
आचार्य रामचंद्र शुक्ल का निबंध ‘भय’ केवल एक साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान (Psychology) का एक गहरा विश्लेषण है। शुक्ल जी ने बहुत ही सरल तरीके से बताया है कि हम क्यों डरते हैं, डर कितने प्रकार का होता है और समाज के विकास के साथ डर का रूप कैसे बदल गया है।
- भय क्या है? क्रोध बनाम भय
शुक्ल जी कहते हैं कि जब हमें लगता है कि कोई मुसीबत आने वाली है, तो मन में जो खलबली मचती है, वही भय है।
अंतर – क्रोध हमें मुसीबत पहुँचाने वाले पर हमला करने के लिए उकसाता है, जबकि भय हमें वहाँ से भागने या बचने के लिए प्रेरित करता है।
उदाहरण – अगर आपको पता चले कि कल परीक्षा है और आपने कुछ नहीं पढ़ा, तो आपको भय होगा। लेकिन अगर कोई आपकी किताब फाड़ दे, तो आपको क्रोध आएगा।
- भय के दो रूप – साध्य और असाध्य
साध्य भय (जिसे सुधारा जा सके) – ऐसा डर जिससे बचने का रास्ता हमारे हाथ में हो।
उदाहरण – अगर आप सड़क पर चल रहे हैं और सामने से तेज कार आ रही है, तो आप किनारे हटकर बच सकते हैं। यह ‘साध्य’ है।
असाध्य भय (जो काबू से बाहर हो) – ऐसा डर जिसमें इंसान को लगता है कि अब कुछ नहीं हो सकता।
उदाहरण – अचानक सुनामी की विशाल लहर सामने देख लेना, जहाँ भागने का कोई रास्ता न हो।
- भीरुता या कायरता
जब डर इंसान की आदत बन जाए, तो उसे ‘कायरता’ कहते हैं। शुक्ल जी कहते हैं कि अक्सर पुरुषों के डर की निंदा की जाती है।
उदाहरण – एक व्यापारी जो घाटे के डर से कभी नया काम शुरू ही नहीं करता, वह ‘व्यावसायिक भीरु’ है। एक छात्र जो फेल होने के डर से परीक्षा ही नहीं देता, वह कायरता है।
- आशंका (Apprehension)
जब हमें पक्का यकीन न हो कि मुसीबत आएगी ही, बस एक हल्का सा शक हो, तो उसे आशंका कहते हैं।
उदाहरण – अँधेरी रात में अकेले पैदल घर जाते समय मन में यह विचार आना कि “कहीं कोई चोर न मिल जाए”। इसमें आप घर तो पहुँचते हैं, पर मन में डर बना रहता है।
- सभ्यता और भय का बदलता स्वरूप
शुक्ल जी का सबसे महत्त्वपूर्ण विचार यह है कि जैसे-जैसे इंसान सभ्य हुआ, उसका डर खत्म नहीं हुआ, बस उसका तरीका बदल गया।
पुराना जमाना – पहले लोग शारीरिक चोट, जंगली जानवरों या डाकुओं से डरते थे।
आज का जमाना (सभ्य समाज) – आज हमें कोई लाठी लेकर नहीं मारता, लेकिन हमें डर रहता है— नकली कागजात का, कोर्ट-कचहरी का, अपनी नौकरी चले जाने का या ऑनलाइन धोखाधड़ी का।
- भय का उपासक (अज्ञानता)
शुक्ल जी कहते हैं कि जो समाज कम पढ़ा-लिखा होता है, वह भय की पूजा करता है।
उदाहरण – लोग एक विद्वान प्रोफेसर से उतना नहीं डरते या उनका सम्मान नहीं करते, जितना एक पुलिस वाले या दरोगा का करते हैं। यह असभ्यता का लक्षण है कि हम ज्ञान से ज्यादा ताकत (भय) को पूजते हैं।
- निर्भय (निडर) रहने का मंत्र
निबंध के अंत में शुक्ल जी ने निडर रहने के दो बहुत जरूरी रास्ते बताए हैं –
- उत्कृष्ट शील – हम इतने अच्छे बनें कि दूसरे हमसे न डरें। हम किसी का बुरा न करें।
- शक्ति और पुरुषार्थ – हम इतने मजबूत बनें कि दूसरे हमें डराने की हिम्मत न कर सकें।
उदाहरण – केवल शरीफ होना काफी नहीं है। अगर आप बहुत शरीफ हैं लेकिन कमजोर हैं, तो गुंडे आपको परेशान करेंगे। इसलिए शराफत के साथ-साथ खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से मजबूत बनाना भी जरूरी है।
निष्कर्ष
शुक्ल जी का संदेश यह है कि डर को खत्म करने के लिए ज्ञान (Knowledge) और साहस (Courage) दोनों की जरूरत है। जैसे-जैसे हमारा ज्ञान बढ़ता है, भूतों और अँधेरे का डर खत्म हो जाता है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक शोषण के नए डरों से लड़ने के लिए हमें एक होकर मजबूत बनने की जरूरत है। शुक्ल जी का यह भी मानना है कि पूर्णतः भयमुक्त समाज या केवल सुखमय संसार की कल्पना एक ‘फुसलाने वाली बात’ है। संसार में सुखदुःख और भयनिर्भयता साथसाथ चलते रहेंगे। सभ्यता ने केवल दुःख देने की विधियों को जटिल और आवरणयुक्त बना दिया है।
मुख्य विचार बिंदु (Value Points) –
भय एक रक्षात्मक मनोविकार है।
सभ्यता के साथ भय ‘शारीरिक’ से ‘बौद्धिक/आर्थिक’ हो गया है।
निर्भयता के लिए शील और शक्ति का समन्वय आवश्यक है।
‘भय’ का मुख्य उद्देश्य
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के निबंध ‘भय’ का मुख्य उद्देश्य केवल इस मनोविकार की परिभाषा देना नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से मानवीय स्वभाव और सामाजिक विसंगतियों का गहरा विश्लेषण करना है। इस निबंध के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं –
- भय का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करना
निबंध का प्राथमिक उद्देश्य पाठकों को ‘भय’ के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराना है। शुक्ल जी स्पष्ट करते हैं कि भय अचानक पैदा होने वाला आवेग नहीं, बल्कि आने वाली आपदा के प्रति एक सुरक्षात्मक प्रतिक्रिया है। वे भय, क्रोध और आशंका के बीच के सूक्ष्म अंतर को वैज्ञानिक ढंग से समझाना चाहते हैं।
- कायरता (भीरुता) के प्रति सचेत करना
लेखक का एक बड़ा उद्देश्य समाज, विशेषकर पुरुषों को भीरुता के दोष के प्रति आगाह करना है। वे बताते हैं कि कष्ट सहने की क्षमता में कमी और अपनी शक्ति पर अविश्वास ही कायरता का मूल कारण है। वे चाहते हैं कि पाठक भय को स्वभाव न बनने दें, क्योंकि स्वभावगत भय ही कायरता है।
- सभ्यता के छद्म रूप को उजागर करना
शुक्ल जी यह दिखाना चाहते हैं कि सभ्यता के विकास ने भय को खत्म नहीं किया, बल्कि उसे और अधिक जटिल और गूढ़ बना दिया है। पहले मनुष्य शारीरिक बल से डरता था, अब वह कूटनीति, भ्रष्टाचार और कानूनी धोखाधड़ी से डरता है। लेखक वर्तमान सभ्यता के उस ‘पर्दे’ को हटाना चाहते हैं जिसके पीछे शोषण छिपा हुआ है।
- वैश्विक शोषण और अर्थोन्माद पर प्रहार
निबंध का एक गंभीर उद्देश्य यूरोप के ‘अर्थोन्माद’ (Capitalist Greed) की आलोचना करना है। शुक्ल जी पाठकों को यह समझाना चाहते हैं कि कैसे बड़ी शक्तियाँ व्यापार के नाम पर गरीब देशों का रक्त चूस रही हैं। वे वैश्विक राजनीति और अर्थशास्त्र के पीछे छिपे ‘भय’ के क्रूर स्वरूप को रेखांकित करते हैं।
- निर्भयता का सही मार्ग दिखाना
निबंध का अंतिम और सबसे सकारात्मक उद्देश्य निर्भयता (Fearlessness) प्राप्त करने का सूत्र प्रदान करना है। लेखक के अनुसार, एक आदर्श समाज वह है जहाँ –
- लोग इतने नैतिक हों कि दूसरे उनसे न डरें (उत्कृष्ट शील)।
- लोग इतने सामर्थ्यवान हों कि कोई उन्हें डराने की हिम्मत न करे (शक्ति और पुरुषार्थ)।
निष्कर्ष
इस निबंध का उद्देश्य अत्यंत व्यापक है। यह व्यक्ति को मानसिक मजबूती, समाज को जागरूकता और राष्ट्र को आत्मनिर्भरता एवं शक्ति संचय का संदेश देता है। शुक्ल जी के अनुसार, केवल सज्जन होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि दुष्टों के भय को विफल करने के लिए शक्ति संपन्न होना भी अनिवार्य है।
‘भय’ में प्रयुक्त व्यंग्य (Satire)
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के निबंध ‘भय’ में प्रयुक्त व्यंग्य (Satire) अत्यंत पैना और बौद्धिक है। शुक्ल जी ने समाज की खोखली परंपराओं, जड़ मानसिकता और आधुनिक सभ्यता के ढोंग पर जो चोट की है, उसके कुछ प्रमुख उदाहरण नीचे दिए गए हैं –
- पुरुषों की ‘वीरता’ के दावों पर व्यंग्य
निबंध के शुरुआत में ही शुक्ल जी पुरुषों द्वारा साहस के ‘एकाधिकार’ पर कटाक्ष करते हैं –
“ऐसा जान पड़ता है कि बहुत पुराने ज़माने से पुरुषों ने न डरने का ठेका ले रखा है।”
व्याख्या – यहाँ ‘ठेका ले रखा है’ शब्द का प्रयोग बहुत ही व्यंग्यात्मक है। लेखक यह कहना चाहते हैं कि पुरुष समाज में यह दिखावा करते हैं कि वे कभी डरते ही नहीं, जबकि असल में वे भी उतने ही भीरु हो सकते हैं। यह पुरुषों के बनावटी स्वाभिमान पर सीधा प्रहार है।
- स्त्रियों की भीरुता को ‘मनोरंजन’ मानने पर व्यंग्य
समाज में स्त्रियों के डर को जिस तरह देखा जाता है, उस पर शुक्ल जी ने गहरी चोट की है –
“स्त्रियों की भीरुता तो उनकी लज्जा के समान ही रसिकों के मनोरंजन की वस्तु रही है।”
व्याख्या – यहाँ ‘रसिकों के मनोरंजन की वस्तु’ कहना समाज की उस संवेदनहीन सोच पर व्यंग्य है, जो स्त्री के भय को गंभीरता से लेने के बजाय उसे आनंद या सौंदर्य का विषय मानती है।
- अशिक्षित समाज की मानसिकता पर व्यंग्य
ज्ञान की तुलना में पद या शक्ति के प्रति भारतीयों के झुकाव पर शुक्ल जी का कटाक्ष –
“अशिक्षित होने के कारण अधिकांश भारतवासी भी भय के उपासक हो गए हैं। वे जितना सम्मान एक थानेदार का करते हैं, उतना किसी विद्वान का नहीं।”
व्याख्या – यहाँ ‘थानेदार बनाम विद्वान’ का उदाहरण देकर लेखक ने समाज की उस मानसिक गुलामी पर व्यंग्य किया है, जो ज्ञान का आदर करने के बजाय डंडे या सत्ता से डरकर उसे सम्मान देने की भूल करती है।
- आधुनिक सभ्यता के ‘गूढ़’ शोषण पर व्यंग्य
सभ्यता के विकास के साथ शोषण के तरीके बदलने पर लेखक का तीखा प्रहार –
“सभ्यता से अंतर केवल इतना ही पड़ा है कि दुःख दान की विधियाँ बहुत गूढ़ और जटिल हो गई हैं। उनका क्षोभकारक रूप बहुत से आवरणों के भीतर ढक गया है।”
व्याख्या – लेखक व्यंग्य कर रहे हैं कि हम खुद को ‘सभ्य’ तो कहते हैं, लेकिन हमने केवल क्रूरता के चेहरे पर मुखौटा लगा लिया है। अब हम तलवार नहीं चलाते, बल्कि कागजों और कानूनों से दूसरों का गला काटते हैं।
- ‘विश्वप्रेम’ और ‘अध्यात्म’ के फैशन पर व्यंग्य
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद उभरे खोखले आदर्शवाद पर शुक्ल जी की टिप्पणी –
“इस फ़ैशन की लहर भारतवर्ष में आई। पर कोरे फ़ैशन के रूप में गृहीत इस ‘विश्वप्रेम’ और ‘अध्यात्म’ की चर्चा का कोई स्थाई मूल्य नहीं। इसे हवा का एक झोंका समझना चाहिए।”
व्याख्या – यहाँ ‘फैशन’ और ‘हवा का झोंका’ शब्दों का प्रयोग उन लोगों के लिए किया गया है जो बिना गहराई के बड़े-बड़े आदर्शवादी शब्दों का प्रयोग केवल दिखावे के लिए करते हैं।
निष्कर्ष (Inference)
शुक्ल जी का व्यंग्य किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि सच्चाई का आईना दिखाने के लिए है। वे अपनी बात को इतनी सूक्ष्मता से कहते हैं कि पाठक पहले मुस्कुराता है और फिर उस विषय की गंभीरता पर सोचने के लिए मजबूर हो जाता है।
क्र.सं. | शब्द (Hindi Word) | अर्थ (Meaning in Hindi) | English Meaning |
1 | साक्षात्कार | आमना-सामना / प्रत्यक्ष होना | Encounter / Facing |
2 | आवेगपूर्ण | जोश या उत्तेजना से भरा | Impulsive / Emotional |
3 | स्तंभ कारक | जड़ कर देने वाला / सुन्न करने वाला | Paralyzing / Stunning |
4 | मनोविकार | मन का भाव / विकार | Psychological disorder / Emotion |
5 | निवारण | रोक-थाम / दूर करना | Prevention / Remediation |
6 | असाध्य | जिसे ठीक न किया जा सके | Incurable / Impossible |
7 | साध्य | जिसे हल किया जा सके | Achievable / Possible |
8 | अवलंबित | टिका हुआ / आश्रित | Dependent / Relied upon |
9 | क्लेश | दुःख / कष्ट | Suffering / Distress |
10 | अनिवार्यता | जिसे टाला न जा सके | Inevitability |
11 | अनुभूति | महसूस करना | Perception / Feeling |
12 | स्तंभित | चकित या जड़ हो जाना | Thunderstruck / Paralyzed |
13 | स्वभावगत | स्वभाव में बसा हुआ | Innate / Habitual |
14 | भीरुता | कायरता / डरपोकपन | Timidity / Cowardice |
15 | रसिकों | कला या रस के प्रेमी | Connoisseurs / Admirers |
16 | संयोजक | जोड़ने वाला | Coordinator / Connector |
17 | अवयव | अंग / हिस्सा | Component / Element |
18 | व्यपारों | कार्यों / गतिविधियों | Activities / Affairs |
19 | शास्त्रर्थ | धार्मिक या दार्शनिक बहस | Intellectual debate |
20 | निहित | समाया हुआ | Inherent / Implied |
21 | आकुलता | बेचैनी | Agitation / Restlessness |
22 | आशंका | शक या हल्का भय | Apprehension / Doubt |
23 | संचार | फैलाव / चलना | Communication / Circulation |
24 | क्षणिक | थोड़े समय के लिए | Momentary / Brief |
25 | सज्ञान | ज्ञानवान / चेतना युक्त | Conscious / Sentient |
26 | संचित | इकट्ठा किया हुआ | Accumulated / Stored |
27 | प्रेरणा | सीख या उकसावा | Inspiration / Impulse |
28 | वैर | दुश्मनी | Enmity / Grudge |
29 | असंभ्य | जंगली / गँवार | Uncivilized / Savage |
30 | संगठन | ढाँचा / समूह | Organization / Structure |
31 | स्तुति | प्रशंसा / प्रार्थना | Praise / Glorification |
32 | कल्पित | माना हुआ / काल्पनिक | Imaginary / Hypothesized |
33 | परिप्रेक्ष्य | दृष्टिकोण | Perspective |
34 | अशिक्षित | अनपढ़ | Uneducated |
35 | परिहार | त्याग / निवारण | Avoidance / Removal |
36 | अपरिचित | जिसे जानते न हों | Stranger / Unknown |
37 | बाहुबल | भुजाओं की शक्ति | Physical strength / Might |
38 | व्यतिक्रम | नियम के विरुद्ध / उल्लंघन | Deviation / Exception |
39 | विरल | दुर्लभ / जो कम हो | Rare / Sparse |
40 | वासना | तीव्र इच्छा या संस्कार | Deep-seated desire / Impulse |
41 | अभ्यस्त | जिसकी आदत पड़ गई हो | Accustomed / Habituated |
42 | आवरणों | पर्दों / ढकाव | Coverings / Veils |
43 | गूढ़ | रहस्यमयी / गहरा | Mysterious / Deep |
44 | वंचित | जिसे न मिले | Deprived |
45 | विषमता | अंतर / असमानता | Disparity / Inequality |
46 | समष्टि | संपूर्ण समाज / समूह | Aggregate / Collective |
47 | अनिष्ट | बुरा / अमंगल | Harmful / Evil |
48 | प्रतिष्ठा | सम्मान / स्थापना | Reputation / Prestige |
49 | अर्थोन्माद | धन का पागलपन | Obsession with wealth |
50 | प्रणालियाँ | सिस्टम / विधियाँ | Systems / Methods |
51 | अंधनीति | गलत या अंधी नीति | Blind policy |
52 | आध्यात्मिकता | आत्मा का ज्ञान | Spirituality |
53 | गृहीत | अपनाया हुआ | Adopted / Accepted |
54 | अनवरत | बिना रुके / लगातार | Continuous / Unceasing |
55 | वणिग्वृत्ति | व्यापारिक बुद्धि | Mercantile mindset |
56 | विलक्षण | अद्भुत / अजीब | Extraordinary / Peculiar |
57 | मुक्तांतक | भय से मुक्त | Free from fear |
58 | अपेक्षित | जिसकी उम्मीद हो | Expected / Required |
59 | उत्कृष्ट-शील | श्रेष्ठ आचरण | Noble character |
60 | पुरुषार्थ | मेहनत / पराक्रम | Diligence / Valor |
61 | निर्दिष्ट | निश्चित किया हुआ | Specified / Fixed |
62 | विवशता | लाचारी | Helplessness / Compulsion |
63 | अक्षमता | कमजोरी / योग्यता की कमी | Inability / Incapacity |
64 | अनभ्यास | अभ्यास की कमी | Lack of practice |
65 | संयोजक | मिलाने वाला | Uniting factor |
66 | अभिप्राय | मतलब / उद्देश्य | Meaning / Intention |
67 | अधर्म | पाप / धर्म के विरुद्ध | Sin / Unrighteousness |
68 | आवेग शून्य | बिना किसी हलचल के | Motionless / Emotionless |
69 | निवारण | छुटकारा | Eradication / Remedy |
70 | स्थाई | पक्का / जो टिका रहे | Permanent / Stable |
71 | सभ्य | सुसंस्कृत | Civilized |
72 | स्नेह | प्यार | Affection / Love |
73 | अमूर्त | जिसका आकार न हो | Abstract |
74 | जटिल | मुश्किल | Complex / Complicated |
75 | खटका | डर / संदेह | Suspicion / Worry |
76 | दस्तावेज़ों | कागज / प्रलेख | Documents |
77 | राजनीतिक | राजनीति से जुड़ा | Political |
78 | साम्यवाद | समाजवाद का एक रूप | Communism |
79 | अनेकरूपता | कई रूप होना | Diversity / Multiplicity |
80 | फुसलाने | बहलाना | To coax / To lure |
81 | समूह | दल | Group / Batch |
82 | अमंगल | बुरा / अशुभ | Inauspicious |
83 | प्रसार | फैलाव | Spread / Expansion |
84 | स्वदेश-प्रेम | देश भक्ति | Patriotism |
85 | धुँधलका | हल्का अँधेरा | Twilight / Haze |
86 | दीर्घ | लम्बा / बड़ा | Long / Vast |
87 | भूमंडल | पृथ्वी / संसार | Globe / World |
88 | कारागार | जेल | Prison / Jail |
89 | शाब्दिक | केवल शब्दों में | Verbal / Literal |
90 | सार्वभौम | पूरी दुनिया का | Universal |
91 | क्षय | विनाश / कमी | Decay / Destruction |
92 | विराम | रुकना | Pause / Rest |
93 | प्रक्रिया | तरीका | Process |
94 | शत्रु | दुश्मन | Enemy |
95 | उपासक | पूजा करने वाला | Worshiper |
96 | बाधा | रुकावट | Obstacle / Hindrance |
97 | साहस | हिम्मत | Courage / Bravery |
98 | क्रूर | निर्दयी | Cruel / Brutal |
99 | विफल | बेकार / नाकाम | Unsuccessful / Futile |
100 | चक्रव्यूह | घेरा | Labyrinth / Trap |
- भय की परिभाषा देते हुए क्रोध और भय में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – शुक्ल जी के अनुसार, किसी आती हुई आपदा के आभास से जो आवेगपूर्ण मनोविकार उत्पन्न होता है, उसे भय कहते हैं। क्रोध और भय में मुख्य अंतर यह है कि क्रोध दुःख के कारण का विनाश करने के लिए प्रेरित करता है, जबकि भय उस कारण से बचने या भागने की प्रेरणा देता है। क्रोध के लिए दुःख पहुँचाने वाले का सज्ञान (चेतन) होना आवश्यक है, जबकि भय के लिए केवल यह आभास पर्याप्त है कि हानि होगी। क्रोध निवारण स्थाई हो सकता है, परंतु भय का प्रभाव केवल उसके संचार काल तक ही रहता है।
- भय के ‘साध्य’ और ‘असाध्य’ रूपों का सोदाहरण वर्णन कीजिए।
उत्तर – शुक्ल जी ने भय के दो रूप बताए हैं—साध्य और असाध्य। साध्य भय वह है जिसे प्रयत्न द्वारा दूर किया जा सके, जैसे शेर की दहाड़ सुनकर पेड़ पर चढ़ जाना। असाध्य भय वह है जिसका निवारण असंभव जान पड़े या मनुष्य अपनी विवशता के कारण जड़ हो जाए। यह भेद केवल परिस्थिति पर नहीं, बल्कि मनुष्य के साहस पर भी निर्भर करता है। एक साहसी व्यक्ति के लिए जो परिस्थिति साध्य है, एक भीरु व्यक्ति के लिए वही असाध्य हो सकती है।
- ‘भीरुता’ क्या है? इसे पुरुषों के लिए दोष क्यों माना गया है?
उत्तर – जब भय किसी व्यक्ति के स्वभाव का स्थायी अंग बन जाता है, तो उसे ‘भीरुता’ या कायरता कहते हैं। शुक्ल जी के अनुसार, भीरुता में कष्ट सहने की अक्षमता और अपनी शक्ति पर अविश्वास छिपा होता है। पुरुषों में इसे एक भारी दोष माना जाता है क्योंकि समाज ने प्राचीन काल से पुरुषों से साहस की अपेक्षा की है। इसके विपरीत, स्त्रियों की भीरुता को अक्सर उनकी लज्जा के समान रसिकों के मनोरंजन का विषय मानकर समाज में स्वीकार्यता दी गई है, जो एक सामाजिक विषमता को दर्शाता है।
- ‘धर्म-भीरुता’ के संबंध में लेखक के क्या विचार हैं?
उत्तर – शुक्ल जी ‘धर्म-भीरुता’ को प्रशंसा के योग्य नहीं मानते। उनके अनुसार, जो लोग केवल पाप या नरक के डर से बुराई से पीछे हटते हैं, वे उच्च श्रेणी के नहीं हैं। श्रेष्ठ वे लोग हैं जिन्हें बुराई स्वाभाविक रूप से अच्छी ही नहीं लगती। वे कहते हैं कि धर्म से डरने वालों की तुलना में वे लोग अधिक धन्य और श्रेष्ठ हैं जो धर्म की ओर प्रेम और श्रद्धा के कारण आकर्षित होते हैं। डर पर आधारित सदाचार स्थाई और महान नहीं हो सकता।
- ‘आशंका’ और ‘भय’ में क्या अंतर है? उदाहरण सहित समझाएँ।
उत्तर – दुःख की संभावना मात्र के अनुमान से जो आवेग-शून्य (धीमा) भय होता है, उसे आशंका कहते हैं। भय में तीव्र आकुलता होती है, जबकि आशंका में विचार धीमा पर लंबे समय तक रहता है। उदाहरण के लिए, जंगल से गुजरता यात्री इस आशंका में रहता है कि कहीं चीता न मिल जाए, पर वह चलता रहता है। यदि उसे साक्षात् भय हो जाए, तो वह एक कदम आगे नहीं बढ़ाएगा। आशंका की स्थिति दुःखात्मक भावों में वही है जो सुखात्मक भावों में ‘आशा’ की होती है।
- सभ्यता के विकास के साथ भय के स्वरूप में क्या परिवर्तन आया है?
उत्तर – सभ्यता के विकास से मनुष्य का जंगली जानवरों और प्राकृतिक आपदाओं का भय तो कम हो गया है, लेकिन ‘मनुष्य का मनुष्य से भय’ बढ़ गया है। पहले भय का रूप शारीरिक था, अब वह गूढ़ और जटिल हो गया है। आज हमें डर है कि कोई शारीरिक शक्ति से नहीं, बल्कि नकली दस्तावेजों, झूठे गवाहों और कानूनी दांव-पेचों से हमारी संपत्ति छीन लेगा। दुःख देने की विधियां अब आवरणों के पीछे ढक गई हैं, जिससे भय अधिक सूक्ष्म हो गया है।
- असभ्य और जंगली जातियों में भय की क्या स्थिति होती है?
उत्तर – जंगली और असभ्य जातियों में परिचय का विस्तार कम होने के कारण भय अधिक होता है। वे जिससे डरते हैं, उसी को श्रेष्ठ मानकर उसकी स्तुति और पूजा करने लगते हैं। उनके देवी-देवता भी अक्सर भय के प्रभाव से ही कल्पित होते हैं। शुक्ल जी का मानना है कि अति भय और भयकारक का सम्मान करना असभ्यता का लक्षण है। अज्ञानता के कारण लोग ज्ञान की अपेक्षा शक्ति (जैसे थानेदार) का अधिक सम्मान करते हैं।
- बच्चों और पशुओं में भय अधिक क्यों पाया जाता है?
उत्तर – बच्चों और पशुओं में दुःख निवारण का ज्ञान या बाहुबल नहीं होता, इसलिए उनमें भय अधिक पाया जाता है। बच्चे अपरिचित को देखते ही घर में छिप जाते हैं क्योंकि उन्हें अज्ञात वस्तुओं से कष्ट की आशंका रहती है। धीरे-धीरे ज्ञान और अनुभव बढ़ने के साथ वे इस भय पर विजय पाते हैं। जैसे-जैसे मनुष्य का ज्ञानबल, हृदयबल और शरीरबल बढ़ता है, वह अपने जीवन से दुःख की छाया (भय) को हटाता चलता है।
- ‘अर्थोन्माद’ और अंतरराष्ट्रीय भय पर लेखक की क्या टिप्पणी है?
उत्तर – शुक्ल जी के अनुसार, वर्तमान समय में एक देश को दूसरे देश से स्थायी भय बना हुआ है। यूरोप के देशों में अर्थशास्त्र के प्रभाव से ‘अर्थोन्माद’ (धन का पागलपन) पैदा हुआ है। सबल देश निर्बल देशों का आर्थिक शोषण कर रहे हैं और उनका रक्त चूस रहे हैं। व्यापार अब राजनीति का अंग बन गया है। इस शोषण और कूटनीति ने पूरी दुनिया को भय के चक्रव्यूह में फंसा दिया है, जिससे कई देश ‘कंकालों के कारागार’ बन गए हैं।
- निर्भयता प्राप्त करने के लिए लेखक ने कौन से दो उपाय बताए हैं?
उत्तर – शुक्ल जी के अनुसार निर्भयता के लिए दो बातें अनिवार्य हैं – उत्कृष्ट शील और शक्ति/पुरुषार्थ। पहली बात (शील) का अर्थ है कि हमारा आचरण ऐसा हो कि दूसरों को हमसे कोई कष्ट या भय न हो। दूसरी बात (शक्ति) का अर्थ है कि हम इतने सामर्थ्यवान बनें कि दूसरे हमें कष्ट पहुँचाने का साहस न कर सकें। केवल सज्जन होने से निर्भयता नहीं मिलती, क्योंकि क्रूर और लोभी लोगों को रोकने के लिए शक्ति का संचार आवश्यक है।
‘भय’ महत्त्वपूर्ण अंशों की सप्रसंग व्याख्या
- भय की परिभाषा और क्रोध से अंतर
“किसी आती हुई आपदा की भावना… देख लूँगा।”
संदर्भ – प्रस्तुत गद्यांश आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा रचित प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक निबंध ‘भय’ से लिया गया है।
प्रसंग – लेखक भय के मूल स्वरूप को स्पष्ट करते हुए क्रोध और भय के बीच के मनोवैज्ञानिक अंतर को समझा रहे हैं।
कठिन शब्द – साक्षात्कार (प्रत्यक्ष होना), आवेगपूर्ण (जोश से भरा), स्तंभकारक (जड़ कर देने वाला), त्योरी बदलना (क्रोधित होना)।
व्याख्या – शुक्ल जी कहते हैं कि आने वाले दुख या विपत्ति के आभास से मन में जो व्याकुलता पैदा होती है, उसे भय कहते हैं। भय और क्रोध का उद्देश्य अलग है—क्रोध हमें दुख के कारण को नष्ट करने के लिए उकसाता है, जबकि भय हमें उस कारण से दूर भागने को प्रेरित करता है। लेखक उदाहरण देते हैं कि यदि हमें पता चले कि कल पैर टूटेगा, तो डर होगा; लेकिन यदि पता चले कि ‘अमुक व्यक्ति’ तोड़ेगा, तो उस पर क्रोध आएगा।
- साध्य और असाध्य भय
“भय का विषय दो रूपों में सामने आता है… उद्योग में लग जाता है।”
प्रसंग – यहाँ लेखक भय के दो मुख्य प्रकारों—साध्य और असाध्य—का विश्लेषण कर रहे हैं।
कठिन शब्द – निवारण (दूर करना), विवशता (लाचारी), अक्षमता (कमजोरी), उद्योग (प्रयत्न)।
व्याख्या – भय का साध्य रूप वह है जिसका समाधान मनुष्य अपनी कोशिश से कर सकता है (जैसे पहाड़ी नदी पर शेर देखकर भाग जाना)। असाध्य वह है जहाँ बचाव का कोई रास्ता न दिखे। शुक्ल जी यह स्पष्ट करते हैं कि भय का साध्य या असाध्य होना केवल परिस्थिति पर नहीं, बल्कि व्यक्ति के साहस पर भी निर्भर है। डरपोक आदमी मुसीबत देखकर जड़ (स्तंभित) हो जाता है, जबकि साहसी आदमी तुरंत बचाव के काम में जुट जाता है।
- भीरुता और कायरता
“भय जब स्वभावगत हो जाता है… अविश्वास निहित है।”
प्रसंग – भय का जब स्थायी संस्कार बन जाता है, तो उसे ‘भीरुता’ कहते हैं।
कठिन शब्द – भीरुता (डरपोकपन), संयोजक अवयव (जोड़ने वाले तत्व), अर्थहानि (धन का नुकसान), मानहानि (सम्मान का नुकसान)।
व्याख्या – लेखक के अनुसार, जब डर इंसान के स्वभाव में बस जाता है, तो वह ‘कायरता’ कहलाता है। इसके दो मुख्य कारण हैं—दुख सहने की हिम्मत न होना और अपनी ताकत पर यकीन न होना। व्यापारी आर्थिक घाटे के डर से और विद्वान पंडित बहस (शास्त्रार्थ) हारने के डर से जब पीछे हटते हैं, तो वह उनकी भीरुता ही है।
- धर्म-भीरुता का विश्लेषण
“एक ही प्रकार की भीरुता… बुराई अच्छी ही नहीं लगती।”
प्रसंग – समाज में प्रशंसित ‘धर्म-भीरुता’ पर लेखक का आलोचनात्मक दृष्टिकोण।
व्याख्या – शुक्ल जी कहते हैं कि लोग ‘धर्म-भीरु’ (पाप से डरने वाला) की तारीफ करते हैं, लेकिन यह कोई बहुत ऊँची बात नहीं है। जो व्यक्ति केवल दंड या नरक के डर से बुरा काम नहीं करता, उसकी तुलना में वह श्रेष्ठ है जिसे बुराई स्वभाव से ही नापसंद है। डर के कारण सही रास्ते पर चलने वाले से बेहतर वह है जो धर्म के प्रति प्रेम के कारण सही चलता है।
- आशंका और भय का अंतर
“दुःख या आपत्ति का पूर्ण निश्चय न रहने पर… आशा की।”
प्रसंग – भय के मंद रूप ‘आशंका’ की व्याख्या।
कठिन शब्द – अनुमन (अंदाजा), आवेग शून्य (बिना हलचल के), आकुलता (बेचैनी)।
व्याख्या – जब दुःख का पक्का यकीन न हो, केवल संभावना लगे, तो उसे ‘आशंका’ कहते हैं। इसमें भय जैसी घबराहट नहीं होती। जंगल में यात्री को चीता मिलने की ‘आशंका’ रहती है, इसलिए वह चलता रहता है; लेकिन यदि उसे ‘भय’ हो जाए, तो वह रुक जाएगा। आशंका दुख की वैसी ही स्थिति है जैसी सुख की स्थिति ‘आशा’ होती है।
- सभ्यता और भय का बदलता स्वरूप
“सभ्यता से अंतर केवल इतना ही पड़ा है… परिणाम एक ही है।”
प्रसंग – सभ्यता के विकास के साथ भय के गूढ़ होने की प्रक्रिया।
कठिन शब्द – क्षोभकारक (विचलित करने वाला), दस्तावेज़ों (कागजों), वञ्चित (छीन लेना)।
व्याख्या – लेखक कहते हैं कि सभ्य समाज में जंगली जानवरों का डर तो खत्म हो गया, पर मनुष्य का मनुष्य से डर बना हुआ है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब लूटपाट लाठी-डंडे से नहीं, बल्कि कूटनीति, जाली कागजों और झूठी कानूनी बहसों से होती है। सभ्यता ने दुख देने के तरीकों को पर्दों के पीछे छिपा दिया है, जिससे वे अधिक जटिल हो गए हैं।
- अर्थोन्माद और अंतरराष्ट्रीय शोषण
“यूरोप के अर्थोन्मादियों ने ऐसी गूढ़… कंकालों के कारागार हो रहे हैं।”
प्रसंग – पाश्चात्य देशों की आर्थिक नीतियों और उनके कारण उत्पन्न वैश्विक भय पर कटाक्ष।
कठिन शब्द – अर्थोन्माद (धन का पागलपन), भूमंडल (दुनिया), कारागार (जेल)।
व्याख्या – शुक्ल जी यूरोप के देशों पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने व्यापार के बहाने दूसरे देशों का धन लूटने की स्थायी प्रणालियाँ बना ली हैं। यह पुरानी लूटपाट से अधिक खतरनाक है क्योंकि यह धीरे-धीरे पूरी जनता का रक्त (संसाधन) चूस रही है, जिससे कई देश गरीबी के कारण चलते-फिरते कंकालों की जेल बन गए हैं।
- निर्भयता के दो सूत्र
“निर्भयता के संपादन के लिए दो बातें अपेक्षित होती हैं… बच नहीं सकते।”
प्रसंग – निबंध का निष्कर्ष—निडर बनने का मार्ग।
कठिन शब्द – मुक्तांतक (भय मुक्त), अपेक्षित (जरूरी), उत्कृष्ट-शील (श्रेष्ठ चरित्र), पुरुषार्थ (पराक्रम)।
व्याख्या – शुक्ल जी के अनुसार, निर्भय रहने के लिए दो शर्तें हैं। पहली—हमारा चरित्र इतना अच्छा हो कि दूसरे हमसे न डरें (शील)। दूसरी—हम इतने ताकतवर हों कि दूसरे हमें न डरा सकें (शक्ति)। केवल सज्जन होना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि दुष्ट लोग सज्जनता का फायदा उठाते हैं। अतः निर्भय रहने के लिए शक्ति और पुरुषार्थ का होना अनिवार्य है।

