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रैदास

रैदास नाम से विख्यात संत रविदास का जन्म काशी (वाराणसी) में हुआ। उनका जीवन-काल 15वीं शताब्दी (सन् 1388–1518) माना जाता है। रैदास संत कवियों में गिने जाते हैं। उन्होंने बाह्य आडंबरों का खंडन कर मन की शुद्धता और आंतरिक भक्ति को ही सच्चा धर्म माना है।

रैदास ने अपनी काव्य-रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्दों का भी मिश्रण है। उनकी सरल ब्रज भाषा में लिखी भक्ति रचनाएँ आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में शामिल हैं और वे आज भी समानता, प्रेम और भाईचारे का संदेश देती हैं। उनकी रचनाएँ रैदास बानी में संकलित हैं।

पद (1)

अब कैसे छूटै राम रट लागी।

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।

प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।

प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।

प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।

प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भगति करै रैदासा।

 

पद (2)

जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।

तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।

जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा, तुम सा देव ओर नहिं दूजा।

मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरों।

सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।

पद (1)

अब कैसे छूटै राम रट लागी।

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।

प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।

प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।

प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।

प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भगति करै रैदासा।

 

कठिन शब्द 
रट लागी – आदत पड़ना / लगन लगना – Addicted / Deeply devoted
बास – सुगंध / महक – Fragrance / Scent
समानी – समा गई / घुल मिल गई – Absorbed / Permeated
घन – बादल – Cloud
मोरा – मोर (पक्षी) – Peacock
चितवत – देखना / निहारना – To gaze / To look
चंद – चंद्रमा – Moon
चकोरा – एक पक्षी जो चाँद को देखता है – A bird (Chakor) that loves the moon
बाती – दीपक की रूई की बत्ती – Wick of a lamp
जोति – ज्योति / प्रकाश – Flame / Light
बरै – जलना / प्रज्वलित होना – To burn / To glow
राती – रात्रि / रात – Night
सुहागा – सोने को शुद्ध करने वाला द्रव्य – Borax (used to purify gold)
दासा – सेवक / गुलाम – Servant / Devotee
भगति – भक्ति – Devotion

प्रसंग

प्रस्तुत पद संत रैदास द्वारा रचित है। इसमें कवि ने भक्त और भगवान के अटूट संबंध को विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से दर्शाया है। वे बताते हैं कि भक्त ईश्वर के बिना अधूरा है।

व्याख्या

रैदास जी कहते हैं कि हे प्रभु! अब आपके नाम की जो रट अर्थात् लगन लग गई है, वह छूट नहीं सकती। मैं पूरी तरह आपके रंग में रंग गया हूँ।

चंदन-पानी – प्रभु यदि चंदन हैं, तो भक्त पानी है। जैसे पानी में मिलकर चंदन की सुगंध उसके कण-कण में समा जाती है, वैसे ही प्रभु की भक्ति मेरे भीतर समा गई है।
घन-मोरा – प्रभु यदि उमड़ते हुए बादल हैं, तो भक्त वन का मोर है जो उन्हें देखकर नाचता है।
चाँद-चकोरा – जैसे चकोर पक्षी पूरी रात टकटकी लगाकर चंद्रमा को निहारता रहता है, वैसे ही मैं भी सदैव आपकी ओर देखता रहता हूँ।
दीपक-बाती – प्रभु यदि दीपक हैं, तो भक्त उसकी बाती है, जिसकी भक्ति की ज्योति दिन-रात जलती रहती है।
मोती-धागा – प्रभु यदि उज्ज्वल मोती हैं, तो भक्त वह धागा है जो मोतियों को पिरोकर रखता है। यह मिलन वैसा ही है जैसे सोने में सुहागा मिल जाने पर उसकी शुद्धता और चमक बढ़ जाती है।
स्वामी-दासा – अंत में रैदास कहते हैं कि हे प्रभु! आप मेरे स्वामी हैं और मैं आपका दास हूँ। मैं इसी ‘दास्य भाव’ की भक्ति करता हूँ।


पद (2)

जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।

तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।

जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा, तुम सा देव ओर नहिं दूजा।

मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरों।

सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।

 

कठिन शब्द

तोरौ / तोरि – तोड़ना – To break / To sever
जोरौ / जोरि – जोड़ना – To connect / To join
कवन – किससे / कौन – Whom / Who
तीरथ – तीर्थ यात्रा – Pilgrimage
बरत – व्रत / उपवास – Fasting / Religious vow
अंदेसा – संशय / संदेह / डर – Doubt / Suspicion / Anxiety
चरन कमल – कमल के समान कोमल पैर – Lotus feet
भरोसां – विश्वास – Trust / Faith
जहँ-जहँ – जहाँ-जहाँ – Wherever
दूजा – दूसरा – Other / Second
सबन – सभी / सांसारिक लोग – Everyone / All worldly ties
पहर – समय का एक भाग (प्रहर) – A watch of the day (3 hours)
आसा – आशा / उम्मीद – Hope / Expectation
क्रम – कर्म / कार्य – Deed / Action
वचन – वाणी / शब्द – Words / Speech


प्रसंग

इस पद में रैदास जी ने ईश्वर के प्रति अपने दृढ़ विश्वास और एकनिष्ठ प्रेम को प्रकट किया है। वे संसार के अन्य बंधनों को तोड़कर केवल ईश्वर से जुड़ने की बात करते हैं।

व्याख्या
रैदास जी भगवान राम से कहते हैं कि हे राम! यदि आप मुझसे नाता तोड़ना भी चाहें, तो भी मैं आपसे नाता नहीं तोड़ूँगा। यदि मैं आपसे नाता तोड़ लूँ, तो फिर और किससे जोड़ूँगा? अर्थात् मेरे लिए आपके सिवा कोई दूसरा सहारा नहीं है।

भरोसा – वे कहते हैं कि मुझे तीर्थ यात्रा या कठिन व्रतों में कोई विश्वास नहीं है। मुझे तो केवल आपके ‘चरण-कमल’ पर पूर्ण भरोसा है।
सर्वत्र ईश्वर – मैं जहाँ भी जाता हूँ, मुझे आपकी ही सत्ता दिखाई देती है और मैं आपकी ही पूजा करता हूँ। आपके समान इस संसार में दूसरा कोई देव नहीं है।
संसार से विरक्ति – मैंने अपना मन केवल हरि से जोड़ लिया है और ईश्वर से जुड़ने के लिए मैंने संसार के अन्य सभी व्यर्थ के मोह-बंधनों को तोड़ दिया है।
समर्पण – रैदास कहते हैं कि आठों पहर मुझे केवल आपकी ही आशा और प्रतीक्षा रहती है। मैं मन, कर्म और वचन से पूरी तरह आपका ही हूँ।


काव्य-सौंदर्य एवं मुख्य बिंदु –
 1. रूपक अलंकार (Metaphor)

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी – यहाँ ईश्वर को चंदन और भक्त को पानी का रूप दिया गया है।

तुम दीपक हम बाती – ईश्वर को दीपक और भक्त को उसकी बाती बताया गया है।

तुम मोती हम धागा – यहाँ ईश्वर मोती है और भक्त उसे पिरोने वाला धागा।

तुम स्वामी हम दासा – प्रभु को स्वामी और भक्त को दास के रूप में चित्रित किया गया है।

तुम्हरे चरन कमल – यहाँ चरणों को ‘कमल’ का रूप दिया गया है।

 

  1. उपमा अलंकार (Simile)

जैसे चितवत चंद चकोरा – भक्त की प्रभु को निहारने की क्रिया की तुलना चकोर पक्षी द्वारा चाँद को देखने से की गई है।

जैसे सोने मिलत सुहागा – भक्त और भगवान के मिलन की तुलना सोने में सुहागा मिलने से की गई है।

 

  1. अनुप्रास अलंकार (Alliteration)

जहाँ वर्णों की आवृत्ति (Repetition) से काव्य में चमत्कार उत्पन्न हो –

चितवत चंद चकोरा – ‘च’ वर्ण की आवृत्ति।

मन क्रम वचन – यहाँ शब्दों का एक विशेष क्रम अनुप्रास जैसा प्रभाव पैदा करता है।

  1. पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार (Repetition for Emphasis)

जहाँ एक ही शब्द की आवृत्ति बिना अर्थ बदले केवल प्रभाव डालने के लिए हो –

अंग-अंग – प्रत्येक अंग में (सुगंध के समाने की तीव्रता बताने के लिए)।

जहँ-जहँ – प्रत्येक स्थान पर (ईश्वर की व्यापकता बताने के लिए)।

 

 

 

अभ्यास

रचना से संवाद

मेरे उत्तर मेरे तर्क

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

  1. अब कैसे छूटै राम रट लागी ” पंक्ति का भाव है?

(क) नाम उच्चारण की कठिनाई

(ख) नाम रटकर याद करना

(ग) आराध्य का नाम जपना

(घ) मित्रों का नाम रटना

उत्तर – (ग) आराध्य का नाम जपना

‘राम रट’ का अर्थ है ईश्वर के नाम में लीन हो जाना। यह भक्ति की उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ भक्त अपने आराध्य को भूल नहीं पाता।

  1. प्रभु जी तुम चंदन हम पानी ” पंक्ति में आराध्य और भक्त का संबंध किस रूप में व्यक्त हुआ है?

(क) एकाकार और समरूप

(ख) तरल और तीव्र सुगंध

(ग) आश्रय और आश्रित

(घ) द्रव और ठोस

उत्तर – (क) एकाकार और समरूप

जैसे चंदन पानी में घिसकर अपनी सुगंध उसमें समाहित कर देता है, वैसे ही भक्त और आराध्य मिलकर एक हो जाते हैं।

  1. तुम दीपक, हम बाती” से रैदास का क्या भाव है?

(क) दीपक और बाती का कोई मेल नहीं होता है।

(ख) दीपक बिना बाती भी जल सकता है।

(ग) भक्त आराध्य से अधिक महत्त्वपूर्ण है।

(घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।

उत्तर – (घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।

दीपक और बाती का साथ प्रकाश फैलाता है। रैदास का भाव है कि ईश्वर की भक्ति से भक्त का जीवन ज्ञान के प्रकाश से भर जाता है।

  1. जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति में रैदास का क्या आशय है?

(क) परोपकारी भक्ति भाव

(ख) आराध्य से अटूट संबंध

(ग) सांसारिक मोह

(घ) कर्मकांड पर बल

उत्तर – (ख) आराध्य से अटूट संबंध

रैदास कहते हैं कि यदि राम नाता तोड़ भी लें, तो भी भक्त अपना नाता नहीं तोड़ेगा। यह प्रेम की पराकाष्ठा और अटूट जुड़ाव है।

  1. तीरथ बरत न करूँ अंदेसा ” पंक्ति से आप क्या समझते हैं?

(क) तीर्थ और व्रत आवश्यक नहीं हैं।

(ख) तीर्थ और व्रत सब आवश्यक हैं।

(ग) तीर्थ जाने से मुक्ति निश्चित है।

(घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।

उत्तर – (घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।

रैदास बाह्य आडंबरों जैसे तीर्थ-व्रत के बजाय ईश्वर के चरणों में पूर्ण विश्वास और समर्पण को ही मोक्ष का मार्ग मानते हैं।

  1. सर्वव्यापक ईश्वर की अवधारणा किस पंक्ति में व्यक्त होती है?

(क) “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा”

(ख) “जाकी जोति बरै दिन राती “

(ग) “तुम दीपक, हम बाती “

(घ) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा “

उत्तर – (क) “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा”

यह पंक्ति स्पष्ट करती है कि भक्त जहाँ भी जाता है, उसे वहाँ ईश्वर ही दिखाई देते हैं। यह ईश्वर की सर्वव्यापकता का प्रतीक है।

 

अर्थ और भाव

नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझाते हुए भाव स्पष्ट कीजिए।

(क) “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”

उत्तर – अर्थ – प्रभु, आप घने बादल के समान हैं और मैं जंगल का मोर हूँ जो बादलों को देखकर नाचता है। जिस प्रकार चकोर पक्षी बिना पलक झपकाए चाँद को देखता रहता है, वैसे ही मैं आपको निहारता हूँ।

भाव – यहाँ भक्त की अनन्य निष्ठा और प्रेम को दर्शाया गया है। जैसे मोर का बादलों से और चकोर का चाँद से अटूट संबंध है, वैसी ही प्रीति रैदास की अपने प्रभु से है।

(ख) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।”

उत्तर – अर्थ – मुझे तीर्थ यात्रा करने या व्रत रखने की कोई इच्छा या संदेह नहीं है। मुझे केवल आपके कमल रूपी चरणों पर ही पूर्ण विश्वास है।

भाव – रैदास ने यहाँ बाह्य कर्मकांडों का खंडन किया है। उनके अनुसार, हृदय में ईश्वर के प्रति समर्पण होना ही सच्ची भक्ति है, दिखावे के धार्मिक अनुष्ठान नहीं।

 

मेरी समझ मेरे विचार

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-

  1. जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति में रैदास की अपने आराध्य में अटूट निष्ठा का भाव है। इससे आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए।

उत्तर – “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” से तात्पर्य है कि भक्त की भक्ति ‘शर्त रहित’ है। संसार में रिश्ते स्वार्थ पर टिके होते हैं, लेकिन रैदास की भक्ति अटूट है। वे कहना चाहते हैं कि यदि ईश्वर उन्हें त्याग भी दें, तो भी वे ईश्वर को नहीं त्यागेंगे क्योंकि उन्होंने अपना सर्वस्व प्रभु को सौंप दिया है। यह एकतरफा समर्पण ही सच्ची आध्यात्मिकता है।

  1. रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर किस साधन को भक्ति का प्रमुख आधार माना है? आपके विचार से भक्ति के क्या आधार हो सकते हैं?

उत्तर – रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर ‘नाम स्मरण’ और ‘चरणों में पूर्ण समर्पण’ को आधार माना है। मेरे विचार से भक्ति के आधार प्रेम, सेवा, सादगी और अहंकार का त्याग हो सकते हैं। सच्ची भक्ति मंदिर जाने में नहीं, बल्कि अपने कर्मों और विचारों को शुद्ध रखने में है।

  1. दोनों पदों में भक्त और आराध्य के संबंध को किन-किन प्रतीकों / उपमाओं से व्यक्त किया गया है? लिखिए।

उत्तर – पदों में प्रयुक्त प्रतीक और उपमाएँ –

आराध्य के लिए – चंदन, घन (बादल), चाँद, दीपक, मोती, स्वामी।

भक्त के लिए – पानी, मोर, चकोर, बाती, धागा, दास।

 

विधा से संवाद

कविता का सौंदर्य

“प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”

उपर्युक्त पंक्ति के रेखांकित अंश पर ध्यान दीजिए। इसमें अनुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है। जिस रचना में व्यंजन वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

“प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।

उपर्युक्त रेखांकित अंश में उपमा अलंकार है। किसी प्रसिद्ध वस्तु की समानता के आधार पर जब किसी वस्तु या व्यक्ति के रूप, गुण, धर्म का वर्णन किया जाता है तो वहाँ उपमा अलंकार होता है।

“तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।”

उपर्युक्त रेखांकित अंश में रूपक अलंकार है। रूपक अलंकार वहाँ होता है जहाँ रूप और गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का आरोप कर अभेद स्थापित किया जाए।

अब आप अपनी पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित कविताओं में अनुप्रास, उपमा और रूपक अलंकार वाली अन्य पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए।

  1. अनुप्रास अलंकार

जहाँ एक ही वर्ण की आवृत्ति बार-बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

“अब कैसे छूटै राम रट लागी”

(यहाँ ‘र’ वर्ण की आवृत्ति हुई है।)

“प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी”

(यहाँ ‘अ’ वर्ण की आवृत्ति है।)

“तीरथ बरत न करूँ अंदेसा”

(यहाँ ‘र’ वर्ण का दोहराव है।)

  1. उपमा अलंकार

जहाँ किसी वस्तु या व्यक्ति की तुलना किसी प्रसिद्ध वस्तु या व्यक्ति से की जाती है (वाचक शब्द – जैसे, सा, सी, सम, सरिस)।

“प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा”

(यहाँ भक्त की तुलना चकोर पक्षी से की गई है, वाचक शब्द ‘जैसे’ है।)

“प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा”

(भक्ति के मेल की तुलना सोने और सुहागे के मेल से की गई है।)

  1. रूपक अलंकार (Metaphor)

जहाँ उपमेय (जिसकी तुलना हो) और उपमान (जिससे तुलना हो) में कोई भेद न रहे, दोनों को एक ही मान लिया जाए।

“तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां”

(यहाँ चरणों पर कमल का आरोप किया गया है, यानी चरणों को ही कमल मान लिया गया है।)

“मैया मैं तो चंद्र-खिलौना लैहों”

(यहाँ चाँद को ही खिलौना मान लिया गया है, चाँद जैसा खिलौना नहीं।)

“भज मन चरण-कंवल अविनासी”

(चरणों को ही कमल कहा गया है।)

“उदित उदयगिरि मंच पर, रघुबर बाल पतंग” (तुलसीदास)

(यहाँ मंच को उदयगिरि पर्वत और राम को बाल सूर्य माना गया है।)

 

कविता की कुछ अन्य विशेषताएँ

नीचे दी गई सूची को ध्यान से देखिए। इस सूची में रैदास के दोनों पदों से कुछ विशेषताएँ चुनकर दी गई हैं। पदों में से चुनकर इन विशेषताओं को दर्शाती पंक्तियाँ लिखिए। उदाहरण के लिए पहली विशेषता के सामने पंक्ति दी गई है।

 

विशेषताएँ         उदाहरण

अनन्य भक्ति भाव –  “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।”

सरल और लोकधर्मी भाषा – “अब कैसे छूटै राम रट लागी।” या “ऐसी भगति करै रैदासा।” (ब्रज और सधुक्कड़ी मिश्रित भाषा जो आम जन को समझ आती है)

उपमा और तुलना – “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।” या “जैसे सोने मिलत सुहागा।”

लयात्मकता और गेयता / ध्वन्यात्मकता – “प्रभु जी तुम मोती, हम धागा… प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा।” (पदों के अंत में तुकबंदी—धागा/सुहागा, दासा/रैदासा—के कारण इन्हें गाया जा सकता है)

दृढ़ निष्ठा और आस्था – “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।” (कर्मकांडों के त्याग और केवल प्रभु पर विश्वास की दृढ़ता)

विषयों से संवाद

  1. तीर्थ और व्रत के स्थान पर रैदास ने आराध्य की भक्ति को प्रधान माना है। भक्तिकाल के कवि रैदास की तरह कबीर भी निराकार आराध्य की भक्ति पर बल देते हैं। तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर बताइए कि इसके क्या कारण हो सकते हैं?

(संकेत- आप अपने सामाजिक विज्ञान के शिक्षक की सहायता भी ले सकते हैं।)

उत्तर – रैदास और कबीर जैसे संतों ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर आंतरिक भक्ति और निराकार ईश्वर  पर बल दिया। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित थे –

बाह्य आडंबरों का विरोध – उस समय समाज में कर्मकांड, ऊँच-नीच और छुआछूत बहुत बढ़ गई थी। पंडितों और मुल्लाओं का दबदबा था। संतों ने बताया कि ईश्वर किसी मंदिर या मस्जिद में नहीं, बल्कि मनुष्य के हृदय में बसता है।

समानता का संदेश – तीर्थ और व्रत अक्सर वह लोग ही कर पाते थे जिनके पास संसाधन थे। निराकार भक्ति ने ‘राम’ को सबके लिए सुलभ बना दिया—चाहे वह गरीब हो या अमीर, ऊँची जाति का हो या नीची।

सामाजिक एकता – तत्कालीन समय में हिंदू-मुस्लिम वैमनस्य को कम करने के लिए संतों ने एक ऐसे ईश्वर की बात की जो धर्मों की सीमाओं से परे था। उन्होंने आंतरिक शुद्धता को सर्वोपरि माना।

आसान मार्ग – संस्कृत भाषा और कठिन अनुष्ठान आम जनता की पहुँच से बाहर थे। रैदास और कबीर ने लोकभाषा में अपनी बात कही, जिससे साधारण व्यक्ति भी ईश्वर से जुड़ सका।

  1. सोने मिलत सुहागा ”

सुहागाएक प्राकृतिक खनिज है जिसके प्रयोग से सोने की अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं और उसकी चमक बढ़ जाती है। सुहागाका रासायनिक नाम और उसकी विशेषताएँ अपने विज्ञान के शिक्षक से चर्चा करके लिखिए।

उत्तर – रैदास ने ईश्वर और भक्त के मेल को ‘सोने और सुहागे’ के मेल जैसा बताया है। इसका वैज्ञानिक पक्ष –

रासायनिक नाम – सुहागा का रासायनिक नाम ‘बोरेक्स’ (Borax) है। इसका रासायनिक सूत्र Na2B4O7 + 10H2O (सोडियम टेट्राबोरेट डेकाहाइड्रेट) होता है।

विशेषताएँ और उपयोग – शुद्धीकरण (Flux) – सोने को पिघलाते समय जब उसमें सुहागा डाला जाता है, तो यह ‘फ्लक्स’ का कार्य करता है। यह सोने की सतह पर जमी अशुद्धियों (Oxides) को सोख लेता है और उन्हें अलग कर देता है।

चमक – अशुद्धियाँ दूर होने के कारण सोना अधिक शुद्ध, कोमल और चमकदार हो जाता है।

जुड़ाव – सुहागा सोने के दो टुकड़ों को आपस में जोड़ने (Soldering) में भी मदद करता है।

भावार्थ – जिस प्रकार सुहागा सोने की गंदगी दूर कर उसे श्रेष्ठ बनाता है, उसी प्रकार ईश्वर की भक्ति भक्त के मन के अहंकार, क्रोध जैसे विकारों को दूर कर उसे ‘कुंदन’ जैसा शुद्ध बना देती है।

 

भाषा से संवाद

व्याकरण की बात

शब्दों की बात

  1. पठित पदों में से संज्ञा और सर्वनाम के तीन-तीन उदाहरण ढूँढ़कर लिखिए।

उत्तर – संज्ञा सर्वनाम

  1. चंदन (जातिवाचक),
  2. राम (व्यक्तिवाचक),
  3. मोती (जातिवाचक),

सर्वनाम (Pronoun)

  1. तुम (मध्यम पुरुष)
  2. हम (उत्तम पुरुष)
  3. मैं (उत्तम पुरुष)

 

  1. रैदास के इन दोनों पदों में बहुत से ऐसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं जिनके स्थान पर अन्य शब्दों का प्रयोग होता है। नीचे सूची में दिए गए शब्दों को देखिए। आप या आपके आस-पास के लोग इन शब्दों के लिए किन अन्य शब्दों का प्रयोग करते हैं? लिखिए।

मोरा, चकोरा, बाती, राती, सोने, तीरथ, बरत

उत्तर – पदों के शब्द      अन्य प्रचलित शब्द / अर्थ

मोरा – मोर, मयूर (Peacock)

चकोरा – चकोर (एक पक्षी जो चंद्रमा का प्रेमी माना जाता है)

बाती – बत्ती, वर्तिका (Wick)

राती – रात, रात्रि (Night)

सोने – सोना, स्वर्ण (Gold)

तीरथ – तीर्थ, पवित्र स्थान (Pilgrimage)

बरत – व्रत, उपवास (Fast)

सृजन

  1. कक्षा में समूह बनाकर इन दोनों पदों को गाकर / पाठ करके प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर पूरा करेंगे।

  1. कल्पना कीजिए कि पद में आई उपमाओं के आधार पर भक्त और आराध्य आपस में बात कर रहे हैं। इस दृश्य को आधार बनाकर संवाद-लेखन कीजिए।

उत्तर – दृश्य – एक शांत उपवन जहाँ भक्त रैदास ध्यानमग्न हैं और प्रभु उनके समक्ष प्रकाश रूप में प्रकट होते हैं।

प्रभु – रैदास! तुम बार-बार मेरा ही नाम क्यों पुकार रहे हो? क्या तुम मुझसे अलग होना चाहते हो?

भक्त (रैदास) – प्रभु, अलग कैसे हो सकता हूँ? यदि आप चंदन हैं, तो मैं वह पानी हूँ जिसमें घिसकर आप समा गए हैं। मेरी रग-रग में आपकी ही खुशबू है।

प्रभु – (मुस्कुराते हुए) और यदि मैं आकाश का घना बादल बन जाऊँ?

भक्त – तब मैं वन का मोर बनकर आपको देखकर नाचूँगा। जैसे चकोर चाँद को निहारता है, मेरी आँखें बस आपको ही ढूँढेंगी।

प्रभु – अच्छा, यदि मैं अँधेरे में दीपक बनकर जलूँ?

भक्त – तो मैं आपकी बाती बनूँगा प्रभु। खुद जलकर आपके प्रेम की ज्योति को दिन-रात दुनिया में फैलाऊँगा।

प्रभु – रैदास, तुम्हारी भक्ति तो अनमोल है, जैसे सोने में सुहागा मिल गया हो।

भक्त – नहीं प्रभु, आप स्वामी हैं और मैं आपका तुच्छ दास। हमारा नाता कभी टूट ही नहीं सकता।

  1. जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति को आधार बनाकर अटूट मित्रता पर एक लघुकथा तैयार कीजिए।

उत्तर – शीर्षक – विश्वास का धागा

राघव और माधव बचपन के पक्के मित्र थे। गाँव में एक बार भयंकर अकाल पड़ा। माधव का परिवार शहर जाने लगा, लेकिन राघव पीछे ही रह गया। जाते समय कुछ गलतफहमी के कारण माधव राघव से नाराज हो गया और बिना विदा लिए चला गया।

वर्षों बीत गए। माधव शहर में बड़ा व्यापारी बन गया, पर उसे लगा कि राघव ने उसे धोखा दिया था। एक दिन माधव का व्यापार डूबने लगा। उसे भारी कर्ज चुकाना था। तभी एक गुमनाम व्यक्ति ने उसकी सारी देनदारी चुका दी। माधव उस व्यक्ति से मिलने पहुँचा, तो देखा कि वह फटा-हाल राघव था।

माधव रो पड़ा और बोला, “मैंने तो दोस्ती तोड़ दी थी, तुम क्यों आए?”

राघव ने शांत भाव से कहा, “माधव, जो तुम तोरौ, मैं नहिं तोरौ।” अर्थात् तुमने भले ही नाता तोड़ लिया हो, मैंने नहीं तोड़ा। राघव ने अपनी पुश्तैनी जमीन बेचकर मित्र की साख बचाई थी। माधव को समझ आ गया कि सच्ची मित्रता वह है जो दूसरे के छोड़ देने पर भी साथ खड़ी रहे।

झरोखे से

आपने रैदास के पद पढ़े। अब आप रैदास की तरह ही महाराष्ट्र के संत कवि नामदेव के आगे दिए गए दो पद पढ़िए। निर्गुण संत काव्य परंपरा के संत कवि नामदेव का जन्म 13वीं-14वीं शताब्दी में महाराष्ट्र में हुआ। अन्य संत कवियों की भाँति नामदेव ने भी बाह्य आडंबरों, सामाजिक रूढ़ियों का विरोध कर सामाजिक समरसता, प्रेम एवं निराकार भक्ति से संबंधित पदों की रचना की है।

(1)

माइ न होती बापु न होता करम न होती काया।

हम नहिं होते, तुम नहिं होते, कवन कहां ते आया।

राम कोइ न किसही केरा। जैसे तरवर पंखि बसेरा॥

चंद न होता, सूर न होता, पानी पवनु मिलाया।

सास्त्र न होता बेद न होता, करमु कहां ते आया।

खेचरि भूचरि तुलसी माला गुरपरसादी पाया।

नामा प्रणवै परम तत्त कूं सतगुर मोहि लखाया॥  

व्याख्या

इस पद में नामदेव जी संसार की नश्वरता और परमात्मा की आदि-शक्ति पर प्रश्न उठाते हैं –

“माइ न होती बापु न होता करम न होती काया।

हम नहिं होते, तुम नहिं होते, कवन कहां ते आया।”

नामदेव जी कहते हैं कि जब न माता थी, न पिता थे और न ही कर्मों के बंधन के कारण यह शरीर था; जब न हम थे और न तुम थे, तब सोचो कि यह जीव कहाँ से आया था?

“राम कोइ न किसही केरा। जैसे तरवर पंखि बसेरा॥”

वे समझाते हैं कि इस संसार में वास्तव में कोई किसी का नहीं है। यह संसार वैसा ही है जैसे किसी वृक्ष पर रात को पक्षी बसेरा करते हैं और सुबह उड़ जाते हैं। सांसारिक रिश्ते अस्थाई हैं।

“चंद न होता, सूर न होता, पानी पवनु मिलाया।”

उस समय न चंद्रमा था, न सूर्य था, केवल पंचतत्त्वों का मेल था।

“सास्त्र न होता बेद न होता, करमु कहां ते आया।”

जब न शास्त्र थे और न वेद थे, तो फिर ‘कर्म’ और उसके विधान कहाँ से आए?

खेचरि भूचरि तुलसी माला गुरपरसादी पाया।

नामदेव कहते हैं कि योग (खेचरि-भूचरि) और भक्ति (तुलसी माला) का असली फल तभी मिलता है जब गुरु की कृपा प्राप्त हो। बिना गुरु के मार्गदर्शन के ये केवल शारीरिक क्रियाएँ या दिखावा मात्र रह जाती हैं। गुरु की कृपा मिलते ही भक्त का मन सहज ही परमात्मा में रम जाता है।

“नामा प्रणवै परम तत्त कूं सतगुर मोहि लखाया॥”

अंत में नामदेव (नामा) कहते हैं कि मैंने उस ‘परम तत्त्व’ (परमात्मा) को प्रणाम किया है, जिसका साक्षात् दर्शन मुझे मेरे सतगुरु ने करा दिया है।

(2)

मोहि लागति तालाबेली।

बछरा बिनु गाइ अकेली ॥

पानी बिनु ज्यूं मीन तलफैं।

ऐसे रामनाम बिनु नामा कलपै॥

जैसे गाइ का बाछा छूटला।

थन चोखता माखन घूटला ॥

नामदेउ नारायन पाया।

गुर भेटत ही अलख लखाया।

जैसे विषै हेत परनारी।

ऐसे नामे प्रीति मुरारी॥

जैसे ताप ते निरमल घामा।

तैसे रामनाम बिनु बापुरो नामा॥  

व्याख्या –

इस पद में भक्त की विरह-वेदना और ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम का वर्णन है –

“मोहि लागति तालाबेली। बछरा बिनु गाइ अकेली॥”

नामदेव कहते हैं कि प्रभु के बिना मुझे ऐसी ‘तालाबेली’ अर्थात् बेचैनी या तड़प लगी है, जैसे अपने बछड़े के बिना गाय व्याकुल और अकेली हो जाती है।

“पानी बिनु ज्यूं मीन तलफैं। ऐसे रामनाम बिनु नामा कलपै॥”

जिस प्रकार पानी के बिना मछली  तड़पती है, ठीक वैसे ही राम के नाम के बिना नामदेव का मन तड़पता है।

“जैसे गाइ का बाछा छूटला। थन चोखता माखन घूटला॥”

जैसे ही गाय का बछड़ा बंधन से छूटता है, वह तुरंत अपनी माँ के थनों से दूध पीने के लिए दौड़ता है, वैसे ही भक्त का मन भगवान की ओर दौड़ता है।

“नामदेउ नारायन पाया। गुर भेटत ही अलख लखाया।”

नामदेव कहते हैं कि मैंने नारायण को पा लिया है। गुरु से मिलते ही वह ‘अलख’ अर्थात् अदृश्य परमात्मा मुझे स्पष्ट दिखाई देने लगा है।

“जैसे विषै हेत परनारी। ऐसे नामे प्रीति मुरारी॥”

वे एक लोक-उदाहरण देते हैं कि जिस प्रकार एक विषयी अर्थात् कामी पुरुष का ध्यान पराई स्त्री में लगा रहता है, वैसे ही नामदेव की प्रीति ‘मुरारी’ में लगी हुई है।

“जैसे ताप ते निरमल घामा। तैसे रामनाम बिनु बापुरो नामा॥”

जैसे तेज धूप के बिना गर्मी का अस्तित्व नहीं, वैसे ही राम के नाम के बिना बेचारे नामदेव का कोई अस्तित्व नहीं है।

अब अपनी कक्षा में चर्चा कीजिए और बताइए कि रैदास तथा नामदेव के पदों में क्या-क्या अंतर है और क्या-क्या समानताएँ हैं?

उत्तर – रैदास और नामदेव के पदों में समानताएँ

अनन्य प्रेम और तड़प – दोनों ही कवियों के पदों में ईश्वर के प्रति गहरा प्रेम और उनके बिना बेचैनी का भाव है। जहाँ रैदास ‘राम रट’ न छूटने की बात करते हैं, वहीं नामदेव कहते हैं कि राम नाम के बिना वे वैसे ही तड़पते हैं जैसे पानी के बिना मछली।

लोकप्रिय प्रतीकों का प्रयोग – दोनों संतों ने अपनी बात समझाने के लिए प्रकृति और रोजमर्रा के जीवन के प्रतीकों का सहारा लिया है, जैसे –

रैदास – चंदन-पानी, दीपक-बाती, चकोर-चाँद।

नामदेव – गाय-बछड़ा, मछली-पानी, वृक्ष-पक्षी।

गुरु की महत्ता – दोनों कवियों ने माना है कि ईश्वर (परम तत्त्व) का साक्षात्कार गुरु की कृपा से ही संभव है।

रैदास – “ऐसी भगति करै रैदासा” (समर्पण भाव)।

नामदेव – “गुर भेटत ही अलख लखाया” (गुरु से मिलते ही अदृश्य परमात्मा दिख गया)।

रैदास और नामदेव के पदों में अंतर

भक्ति का भाव – रैदास की भक्ति मुख्य रूप से ‘दास्य भाव’ अर्थात् स्वामी और सेवक की है। वे स्वयं को तुच्छ और प्रभु को महान बताते हैं। जबकि नामदेव की भक्ति में ‘वात्सल्य’ और ‘विरह’ की तीव्रता अधिक है। वे ईश्वर को गाय और स्वयं को बछड़ा मानकर पुकारते हैं।

दार्शनिक गहराई – रैदास भक्त और आराध्य के ‘एकाकार’ होने, जैसे – चंदन और पानी का मिलना, पर बल देते हैं। वहीं “नामदेव के पहले पद में ‘सृष्टि के रहस्य’ और अस्तित्व पर प्रश्न उठाए गए

उपमाओं की प्रकृति – रैदास की उपमाएँ स्थिर और शांत हैं, जैसे – धागे में पिरोया मोती या दीपक की ज्योति। जबकि नामदेव की उपमाएँ अधिक भावुक और गतिशील हैं, जैसे- पानी के बिना मछली का तड़पना या बछड़े का दूध पीना।

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