पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म सन् 1894 में खैरागढ़, राजनंदगांव, छत्तीसगढ़ (तत्कालीन मध्यप्रदेश) में हुआ था। हिंदी साहित्य में उनकी ख्याति कुशल आलोचक, कवि, निबंधकार, हास्य व्यंग्यकार के रूप में है। निबंध लेखन के लिए वे विशेष रूप से स्मरणीय हैं।
उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं—पंच – पात्र, पद्म-वन, प्रबंध पारिजात. कुछ बिखरे पन्ने (निबंध संग्रह), अश्रुदल, शतदल (काव्य), झलमला, त्रिवेणी (कहानी संग्रह), विश्व साहित्य, हिंदी कहानी साहित्य, हिंदी साहित्य विमर्श, हिंदी उपन्यास साहित्य (आलोचना)। उन्होंने सरस्वती और छाया पत्रिकाओं का संपादन भी किया।
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने अपने लेखन में अध्यात्म, समाज- सुधार, लोकजीवन को प्रमुखता दी है। उन्होंने अपने निबंधों में भारतीय कृषि एवं सामाजिक संबंधों का तार्किक मूल्यांकन और विश्लेषण किया है। उनकी रचनाओं में भारतीय और पाश्चात्य साहित्य के सिद्धांतों का सामंजस्य देखने को मिलता है। सन् 1971 में उनका निधन हो गया।
क्या लिखूँ? – पाठ परिचय
“क्या लिखूँ?” निबंध में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने निबंध की रचना प्रक्रिया को समझाया है। इस निबंध में उन्होंने ‘दूर के ढोल सुहावने’ और ‘समाज-सुधार’ शीर्षक दो विषयों को लेकर निबंध लेखन में आने वाली कठिनाइयों की चर्चा की है। निबंध की रचना प्रक्रिया के संबंध में विभिन्न विद्वानों के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने निबंध लिखने के आदर्श तरीके को खोजने का प्रयत्न रोचक और सरल ढंग से किया है। लेखक ने अपने विचारों को प्रकट करने के लिए साहित्यिक और सांस्कृतिक संदर्भों का अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रयोग किया है। इस निबंध की आत्मपरक शैली- जिसमें लेखक स्वयं पाठकों से संवाद करता है— इसे अधिक जीवंत, आत्मीय और प्रभावशाली बनाती है। आइए, निबंध लेखन की अन्य प्रक्रियाओं को समझने के लिए पढ़ते हैं- ‘क्या लिखूँ?”
क्या लिखूँ?
मुझे आज लिखना ही पड़ेगा। अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबंध लेखक ए. जी. गार्डिनर का कथन है कि लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है। उस समय मन में कुछ ऐसी उमंग-सी उठती है, हृदय में कुछ ऐसी स्फूर्ति-सी आती है, मस्तिष्क में कुछ ऐसा आवेग-सा उत्पन्न होता है कि लेख लिखना ही पड़ता है। उस समय विषय की चिंता नहीं रहती। कोई भी विषय हो, उसमें हम अपने हृदय के आवेग को भर ही देते हैं। हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है। उसी तरह अपने मनोभावों को व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय उपयुक्त है। असली वस्तु है हैट, खूँटी नहीं। इसी तरह मन के भाव ही तो यथार्थ वस्तु हैं, विषय नहीं।
गार्डिनर साहब के इस कथन की यथार्थता में मुझे संदेह नहीं, पर मेरे लिए कठिनता यह है कि मैंने उस मानसिक स्थिति का अनुभव ही नहीं किया है, जिसमें भाव अपने आप उत्थित हो जाते हैं। मुझे तो सोचना पड़ता है, चिंता करनी पड़ती है, परिश्रम करना पड़ता है, तब कहीं मैं एक निबंध लिख सकता हूँ। आज तो मुझे विशेष परिश्रम करना पड़ेगा, क्योंकि मुझे कोई साधारण निबंध नहीं लिखना है। आज मुझे नमिता और अमिता के लिए आदर्श निबंध लिखना होगा। नमिता का आदेश है कि मैं ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ इस विषय पर लिखूँ। अमिता का आग्रह है कि मैं समाज-सुधार पर लिखूँ, ये दोनों ही विषय परीक्षा में आ चुके हैं और उन दोनों पर आदर्श निबंध लिखकर मुझे उन दोनों को निबंध – रचना का रहस्य समझाना पड़ेगा।
दूर के ढोल सुहावने अवश्य होते हैं। पर क्या वे इतने सुहावने होते हैं कि उन पर पाँच पेज लिखे जा सकें? इसी प्रकार जिस समाज-सुधार की चर्चा अनादि काल से लेकर आज तक होती आ रही है और जिसके संबंध में बड़े-बड़े विज्ञों में भी विरोध है, उसको मैं पाँच पेज में कैसे लिख दूँ? मैंने सोचा कि सबसे पहले निबंधशास्त्र के आचार्यों की सम्मति जान लूँ। पहले यह तो समझ लूँ कि आदर्श निबंध है क्या और वह कैसे लिखा जाता है, तब फिर मैं विषय की चिंता करूँगा। इसलिए मैंने निबंधशास्त्र के कई आचार्यों की रचनाएँ देखीं।
एक विद्वान का कथन है कि निबंध छोटा होना चाहिए। छोटा निबंध बड़े की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है, क्योंकि बड़े निबंध में रचना की सुंदरता नहीं बनी रह सकती। इस कथन को मान लेने में ही मेरा लाभ है। मुझे छोटा ही निबंध लिखना है, बड़ा नहीं। पर लिखूँ कैसे? निबंधशास्त्र के उन्हीं आचार्य महोदय का कथन है कि निबंध के दो प्रधान अंग हैं-
सामग्री और शैली। पहले तो मुझे सामग्री एकत्र करनी होगी, विचार-समूह संचित करना होगा। इसके लिए मुझे मनन करना चाहिए। यह तो सच है कि जिसने जिस विषय का अच्छा अध्ययन किया है, उसके मस्तिष्क में उस विषय के विचार आते हैं। पर यह कौन जानता था कि ‘दूर के ढोल सुहावने’ पर भी निबंध लिखने की आवश्यकता होगी। यदि यह बात पहले से ज्ञात होती तो पुस्तकालय में जाकर इस विषय का अनुसंधान कर लेता; पर अब समय नहीं है। मुझे तो यहीं बैठकर दो ही घंटों में दो निबंध तैयार कर देने होंगे। यहाँ न तो विश्वकोश है और न कोई ऐसा ग्रंथ जिसमें इन विषयों की सामग्री उपलब्ध हो सके। अब तो मुझे अपने ही ज्ञान पर विश्वास कर लिखना होगा।
विज्ञों का कथन है कि निबंध लिखने के पहले उसकी रूपरेखा बना लेनी चाहिए। अतएव सबसे पहले मुझे ‘दूर के ढोल सुहावने’ की रूपरेखा बनानी है। मैं सोच ही नहीं सकता कि इस विषय की कैसी रूपरेखा है। निबंध लिख लेने के बाद मैं उसका सारांश कुछ ही वाक्यों में भले ही लिख दूँ, पर निबंध लिखने के पहले उसका सार दस-पाँच शब्दों में कैसे लिखा जाए? क्या सचमुच हिंदी के सब विज्ञ लेखक पहले से अपने-अपने निबंधों के लिए रूपरेखा तैयार कर लेते हैं? ए. जी. गार्डिनर को तो अपने लेखों का शीर्षक बनाने में ही सबसे अधिक कठिनाई होती है। उन्होंने लिखा कि मैं लेख लिखता हूँ और शीर्षक देने का भार मैं अपने मित्र पर छोड़ देता हूँ। उन्होंने यह भी लिखा है कि शेक्सपीयर को भी नाटक लिखने में उतनी कठिनाई न हुई होगी, जितनी कठिनाई नाटकों के नामकरण में हुई होगी। तभी तो घबराकर नाम न रख सकने के कारण उन्होंने अपने एक नाटक का नाम रखा ‘जैसा तुम चाहो’। इसलिए मुझसे तो रूपरेखा तैयार न होगी।
अब मुझे शैली निश्चित करनी है। आचार्य महोदय का कथन है कि भाषा में प्रवाह होना चाहिए। इसके लिए वाक्य छोटे-छोटे हों, पर एक-दूसरे से संबद्ध। यह तो बिल्कुल ठीक है। मैं छोटे-छोटे वाक्य अच्छी तरह लिख सकता हूँ। पर मैं हूँ मास्टर। अपनी विद्वता का प्रदर्शन करने के लिए, अपना गौरव स्थापित करने के लिए यह आवश्यक है कि वाक्य कम-से-कम आधे पृष्ठ में तो समाप्त हों। बाणभट्ट ने कादंबरी में ऐसे ही वाक्य लिखे हैं। वाक्यों में अस्पष्टता भी चाहिए, क्योंकि यह अस्पष्टता या दुर्बोधता गांभीर्य ला देती है। इसीलिए संस्कृत के प्रसिद्ध कवि श्रीहर्ष ने जान-बूझकर अपने काव्य में ऐसी गुत्थियाँ डाल दी हैं, जो अज्ञों से न सुलझ सकें और सेनापति ने भी अपनी कविता दुर्बोध कर दी है। तभी तो अलंकारों, मुहावरों और लोकोक्तियों का समावेश भी निबंधों के लिए आवश्यक बताया जाता है। तब क्या किया जाए?
अंग्रेजी के निबंधकारों ने एक दूसरी ही पद्धति को अपनाया है। उनके निबंध इन आचार्यों की कसौटी पर भले ही खरे सिद्ध न हों, पर अंग्रेजी साहित्य में उनका मान अवश्य है। उस पद्धति के जन्मदाता मानटेन समझे जाते हैं। उन्होंने स्वयं जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया। ऐसे निबंधों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे मन की स्वच्छंद रचनाएँ हैं। उनमें न कवि की उदात्त कल्पना रहती है, न आख्यायिका-लेखक की सूक्ष्म दृष्टि और न विज्ञों की गंभीर तर्कपूर्ण विवेचना। उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है। उनमें उसके सच्चे भावों की सच्ची अभिव्यक्ति होती है, उनमें उसका उल्लास रहता है। ये निबंध तो उस मानसिक स्थिति में लिखे जाते हैं, जिसमें न ज्ञान की गरिमा रहती है और न कल्पना की महिमा, जिसमें जीवन का गौरव भूलकर हम अपने में ही लीन हो जाते है, जिसमें हम संसार को अपनी ही दृष्टि से देखते हैं और अपने ही भाव से ग्रहण करते हैं। तब इसी पद्धति का अनुसरण कर मैं भी क्यों न निबंध लिखूँ। पर मुझे तो दो निबंध लिखने होंगे।
मुझे अमीर खुसरो की एक कहानी याद आई। एक बार प्यास लगने पर वे एक कुएँ के पास पहुँचे। वहाँ चार औरतें पानी भर रही थीं। पानी माँगने पर पहले उनमें से एक ने खीर पर कविता सुनने की इच्छा प्रकट की, दूसरी ने चरखे पर, तीसरी ने कुत्ते पर और चौथी ने ढोल पर। अमीर खुसरो प्रतिभावान थे, उन्होंने एक ही पद्य में चारों की इच्छाओं की पूर्ति कर दी। उन्होंने कहा-
खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा॥
मुझमें खुसरो की प्रतिभा नहीं है, पर उनकी इस पद्धति को स्वीकार करने से मेरी कठिनाई आधी रह जाती है। मैं भी एक निबंध में इन दोनों विषयों का समावेश कर दूँगा।
दूर के ढोल सुहावने होते हैं, क्योंकि उनकी कर्कशता दूर तक नहीं पहुँचती। जब ढोल के पास बैठे हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर संध्या समय, किसी दूसरे के कान में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं। ढोल के उन्हीं शब्दों को सुनकर वह अपने हृदय में किसी के विवाहोत्सव का चित्र अंकित कर लेता है। कोलाहल से पूर्ण घर के एक कोने में बैठी हुई किसी लज्जाशील नव-वधू की कल्पना वह अपने मन में कर लेता है। उस नव-वधू के प्रेम, उल्लास, संकोच, आशंका और विषाद से युक्त हृदय के कंपन ढोल की कर्कश ध्वनि को मधुर बना देते हैं। सच तो यह है कि ढोल की ध्वनि के साथ आनंद का कलरव, उत्सव का प्रमोद और प्रेम का संगीत, ये तीनों मिले रहते हैं। तभी उसकी कर्कशता समीपस्थ लोगों को भी कटु नहीं प्रतीत होती और दूरस्थ लोगों के लिए तो वह अत्यंत मधुर बन जाती है।
यह बात सच है कि दूर रहने से हमें यथार्थता की कठोरता का अनुभव नहीं होता। यही कारण है कि जो तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है; जो वृद्ध हो गए हैं, जो अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट आए हैं, उन्हें अपने अतीतकाल की स्मृति बड़ी सुखद लगती है। वे अतीत का ही स्वप्न देखते हैं। तरुणों के लिए जैसे भविष्य उज्ज्वल होता है, वैसे ही वृद्धों के लिए अतीत। वर्तमान से दोनों को असंतोष होता है। तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं। तरुण क्रांति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक। इन्हीं दोनों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है और इसी से वर्तमान काल सदैव सुधारों का काल बना रहता है।
मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल ही नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो। तभी तो आज तक कितने ही सुधारक हो गए हैं, पर सुधारों का अंत कब हुआ है? भारत के इतिहास में बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी में ही सुधारकों की गणना समाप्त नहीं होती। सुधारकों का दल नगर – नगर और गाँव-गाँव में होता है। यह सच है कि जीवन में नए-नए दोष उत्पन्न होते जाते हैं और नए-नए सुधार हो जाते हैं। न दोषों का अंत है और न सुधारों का। जो कभी सुधार थे, वही आज दोष हो गए हैं और उन सुधारों का फिर नव सुधार किया जाता है। तभी तो यह जीवन प्रगतिशील माना गया है।
हिंदी में प्रगतिशील साहित्य का निर्माण हो रहा है। उसके निर्माता यह समझ रहे हैं कि उनके साहित्य में भविष्य का गौरव निहित है। पर कुछ ही समय के बाद उनका यह साहित्य भी अतीत का स्मारक हो जाएगा और आज जो तरुण हैं, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे। उनके स्थान में तरुणों का फिर दूसरा दल आ जाएगा, जो भविष्य का स्वप्न देखेगा। दोनों के ही स्वप्न सुखद होते हैं, क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।
क्या लिखूँ? – पाठ में उठाए गए सवाल
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने ‘क्या लिखूँ?’ निबंध में केवल लेखक की दुविधा को ही नहीं दर्शाया है, बल्कि साहित्य, समाज और मानव मनोविज्ञान से जुड़े कई गहरे सवाल उठाए हैं।
- लेखन और निबंध कला से जुड़े सवाल
निबंध क्या है? क्या यह केवल सूचनाओं का संग्रह है या लेखक के मन की स्वतंत्र रचना?
आदर्श निबंध की सीमा क्या होनी चाहिए? क्या किसी विस्तृत विषय, जैसे- समाज-सुधार को मात्र पाँच पृष्ठों में समेटना संभव है और क्या वह न्यायसंगत होगा?
लेखन की प्रेरणा कहाँ से आती है? क्या लिखना एक विशेष मानसिक ‘आवेग’ का परिणाम है या यह कठिन परिश्रम और अभ्यास का फल है?
रूपरेखा और शीर्षक का महत्त्व – क्या सचमुच विद्वान लेखक लिखने से पहले रूपरेखा तैयार करते हैं, या विचार प्रवाह में खुद-ब-खुद बनते चले जाते हैं?
- मानव मनोविज्ञान से जुड़े सवाल
मनुष्य वर्तमान से असंतुष्ट क्यों रहता है? क्यों युवाओं को भविष्य और वृद्धों को अतीत ही सुहावना लगता है?
“दूर के ढोल सुहावने” क्यों होते हैं? क्या यह केवल एक कहावत है या इसके पीछे यथार्थ की कड़वाहट से बचने की मानवीय प्रवृत्ति छिपी है?
- समाज और सुधार से जुड़े सवाल
समाज-सुधार का अंत कब होगा? क्या दुनिया में कभी ऐसी स्थिति आएगी जब किसी सुधार की आवश्यकता न रहे?
दोष और सुधार का संबंध – क्या यह सच है कि जो आज एक महान सुधार है, वही आने वाले समय में एक नया दोष बन जाएगा?
प्रगतिशीलता क्या है? क्या आज का आधुनिक और प्रगतिशील साहित्य कल के लिए केवल एक ‘स्मारक’ बनकर नहीं रह जाएगा?
- साहित्यिक शैली का सवाल
भाषा कैसी होनी चाहिए? क्या अपनी विद्वता दिखाने के लिए बाणभट्ट की तरह क्लिष्ट भाषा लिखना ज़रूरी है, या मानटेन की तरह सरल और निजी अनुभूतियों को व्यक्त करना श्रेष्ठ है?
निष्कर्ष –
लेखक इन सवालों के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि दुनिया में कोई भी विचार या सुधार स्थायी नहीं है। यह द्वंद्व हमेशा बना रहेगा, और यही जीवन की गतिशीलता का प्रमाण है।
क्या लिखूँ? – पाठ का सारांश
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा रचित निबंध ‘क्या लिखूँ?’ हिंदी साहित्य का एक श्रेष्ठ ललित निबंध है। इस निबंध में लेखक ने निबंध लेखन की कला, लेखकों की मानसिक स्थिति और दो अलग-अलग विषयों के माध्यम से जीवन के दर्शन को बहुत ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है।
- निबंध लेखन की समस्या और मानसिक स्थिति
निबंध का प्रारंभ लेखक की इस दुविधा से होता है कि वह किस विषय पर लिखे। वे प्रसिद्ध अंग्रेजी निबंधकार अल्फ्रेड जॉर्ज गार्डिनर के विचार का उल्लेख करते हैं, जिनके अनुसार लिखने के लिए एक विशेष मानसिक अवस्था अर्थात् आवेग या उमंग की आवश्यकता होती है। गार्डिनर का मानना है कि यदि मन में भाव हैं, तो विषय कोई भी हो ‘खूँटी’ की तरह, उस पर अपने विचारों का ‘हैट’ टाँगा जा सकता है। परंतु लेखक बख्शी जी का कहना है कि उन्हें लिखने के लिए बहुत सोचना और परिश्रम करना पड़ता है।
- नमिता और अमिता का आग्रह
लेखक को अपनी दो शिष्याओं नमिता और अमिता के लिए आदर्श निबंध लिखने हैं।
नमिता का विषय है – “दूर के ढोल सुहावने होते हैं।”
अमिता का विषय है – “समाज-सुधार।”
लेखक इन दोनों गंभीर और विस्तृत विषयों को मात्र पाँच पृष्ठों में समेटने की चुनौती को लेकर चिंतित हैं।
- निबंध शास्त्र के आचार्यों के मत
लेखक निबंध लिखने की विधि जानने के लिए विद्वानों के मतों पर विचार करते हैं –
एक मत के अनुसार निबंध छोटा और आकर्षक होना चाहिए।
निबंध के दो मुख्य अंग होते हैं— सामग्री अर्थात् विचार और शैली अर्थात लिखने का ढंग।
लेखक शैली के बारे में सोचते हैं कि क्या वे बाणभट्ट की तरह लंबी और दुर्बोध भाषा लिखें या अंग्रेजी निबंधकारों, जैसे – मानटेन की तरह स्वच्छंद और सरल भाषा, जिसमें लेखक की अपनी सच्ची अनुभूति हो।
- अमीर खुसरो की पद्धति का अनुसरण
लेखक बताते हैं कि एक बार अमीर खुसरो को प्यास लगी और वे एक कुएँ के पास पहुँचे। वहाँ चार औरतें पानी भर रही थीं। जब खुसरो ने उनसे पानी माँगा, तो उन्होंने पानी पिलाने के बदले अपनी-अपनी पसंद के विषयों पर कविता सुनाने की शर्त रख दी –
पहली औरत ने खीर पर कविता सुनने की इच्छा जताई।
दूसरी ने चरखे पर।
तीसरी ने कुत्ते पर।
चौथी ने ढोल पर।
अमीर खुसरो अत्यंत प्रतिभावान थे। उन्होंने समय और ऊर्जा बचाने के लिए चारों विषयों पर अलग-अलग कविताएँ लिखने के बजाय, एक ही पद्य में चारों शब्दों को इस प्रकार पिरो दिया कि सबकी इच्छा पूरी हो गई –
“खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा॥” लेखक भी इसी पद्धति को अपनाकर ‘दूर के ढोल सुहावने’ और ‘समाज-सुधार’ दोनों विषयों को एक साथ जोड़ने का निश्चय करते हैं।
- वर्तमान से असंतोष
लेखक ने सबसे पहले यह सिद्ध किया कि ‘दूर के ढोल सुहावने’ लगने का असली कारण वर्तमान से असंतोष है। उन्होंने तर्क दिया कि –
तरुण (युवा) – भविष्य का सपना देखते हैं क्योंकि भविष्य उनसे दूर है और उन्हें सुहावना लगता है।
वृद्ध (बुजुर्ग) – अतीत का गौरव गान करते हैं क्योंकि अतीत उनसे दूर जा चुका है और उसकी स्मृतियाँ प्यारी लगती हैं।
समानता – दोनों ही अपनी वर्तमान स्थिति से दुखी रहते हैं।
- सुधार की आवश्यकता
लेखक के अनुसार, जब मनुष्य को अपने ‘वर्तमान’ से असंतोष होता है, तभी उसके मन में उसे बदलने की इच्छा जागती है। यही इच्छा ‘समाज-सुधार’ का मूल कारण बनती है।
यदि हम वर्तमान से संतुष्ट होते, तो कभी सुधार की बात ही नहीं करते।
चूँकि वर्तमान सदैव कष्टकारी लगता है और दूर की चीज़ें, जैसे – भविष्य या अतीत की बातें सुहावनी, इसलिए मनुष्य निरंतर सुधार करने में लगा रहता है।
- निरंतरता का सिद्धांत
लेखक ने दोनों विषयों को जोड़ते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि सुधारों का कभी अंत नहीं होता –
जो आज ‘सुधार’ है, वह कल ‘पुराना’ (अतीत) होकर ‘दोष’ बन जाएगा।
फिर उस समय के तरुण नए सुधारों का स्वप्न देखेंगे।
इस प्रकार, “दूर के ढोल सुहावने होते हैं” वाली मानसिकता ही समाज को “प्रगतिशील” बनाए रखती है और सुधारों का चक्र कभी नहीं रुकता।
- निष्कर्ष
लेखक निबंध का समापन इस विचार के साथ करते हैं कि आज का ‘प्रगतिशील’ साहित्य कल का ‘अतीत’ बन जाएगा। आज के युवा कल वृद्ध होंगे और फिर से अपने अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे। यह चक्र चलता रहेगा क्योंकि मनुष्य की प्रकृति ही ऐसी है कि उसे वह चीज़ अधिक सुंदर लगती है जो उससे दूर है।
क्या लिखूँ? – पाठ से प्राप्त सीखें
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के निबंध ‘क्या लिखूँ?’ से हमें जीवन और साहित्य के बारे में कई महत्त्वपूर्ण और व्यावहारिक सीखें मिलती हैं।
- वर्तमान का सम्मान करना
लेखक के अनुसार, मनुष्य अक्सर वर्तमान से असंतुष्ट रहता है। युवा भविष्य के सपने देखते हैं और वृद्ध अतीत की यादों में खोए रहते हैं। पाठ हमें सिखाता है कि वर्तमान ही यथार्थ है। हमें भविष्य की कल्पना या अतीत के मोह में आज की खुशियों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।
- परिवर्तन और प्रगतिशीलता
पाठ यह स्पष्ट करता है कि परिवर्तन ही जीवन का नियम है। जो आज ‘सुधार’ है, वह कल ‘दोष’ बन सकता है। हमें इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि समाज हमेशा गतिशील रहता है और हर दौर की अपनी चुनौतियाँ और अपने समाधान होते हैं।
- रचनात्मकता और मौलिकता
निबंध लेखन के माध्यम से लेखक सिखाते हैं कि किसी भी कार्य में सच्ची अनुभूति और मौलिक विचार सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। किसी की नकल करने या केवल विद्वता दिखाने के बजाय, अपने अनुभवों को ईमानदारी से व्यक्त करना ही सच्ची रचनात्मकता है।
- असंतोष ही विकास की जड़ है
लेखक का मानना है कि वर्तमान से होने वाला असंतोष ही हमें सुधार के लिए प्रेरित करता है। यदि हम पूरी तरह संतुष्ट हो जाएँगे, तो प्रगति रुक जाएगी। इसलिए, सकारात्मक असंतोष हमें जीवन में बेहतर करने और समाज को सुधारने की ऊर्जा देता है।
- संतुलन और समन्वय
अमीर खुसरो के प्रसंग से हमें यह सीख मिलती है कि बुद्धि और चातुर्य से हम विपरीत परिस्थितियों और अलग-अलग विचारों के बीच तालमेल बिठा सकते हैं। जीवन की समस्याओं को जटिल बनाने के बजाय उन्हें सरल और कलात्मक ढंग से हल करने का प्रयास करना चाहिए।
- दृष्टिकोण का महत्त्व
“दूर के ढोल सुहावने होते हैं” के माध्यम से हमें यह सीख मिलती है कि किसी भी वस्तु या स्थिति का मूल्यांकन केवल दूर से देखकर नहीं करना चाहिए। वास्तविकता उसके समीप जाने पर ही पता चलती है। यह हमें चीज़ों को गहराई से देखने और भ्रम में न रहने की प्रेरणा देता है।
- मानसिक द्वंद्व
वर्तमान पीढ़ी जैसे – नमिता-अमिता की अपेक्षाओं और लेखक की अपनी चुनौतियों के माध्यम से यह दिखाया गया है कि एक आदर्श निबंध लिखना और दूरों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना कितना कठिन कार्य है।
निष्कर्ष –
यह पाठ हमें एक संतुलित जीवन दृष्टि प्रदान करता है, जहाँ हम पुरानी पीढ़ी के अनुभवों (अतीत) का सम्मान करते हुए नई पीढ़ी के उत्साह (भविष्य) के साथ तालमेल बिठाकर वर्तमान को बेहतर बनाने का प्रयास कर सकें।
अभ्यास
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
- “हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है… असली वस्तु है हैट, खूँटी नहीं।” निबंध में ‘हैट’ और ‘खूँटी’ का उल्लेख किस भाव को सबसे अधिक उजागर करता है?
(क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना
(ख) विचार से अधिक तथ्य आधारित सामग्री को प्रमुख बताना
(ग) शैली से अधिक भाषा व्यवस्था की उपयोगिता बताना
(घ) उदाहरण से अधिक सिद्धांत आधारित लेखन का समर्थन करना
उत्तर – (क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना
गार्डिनर के अनुसार, निबंध का विषय खूँटी की तरह गौण है, जबकि लेखक के मन के भाव हैट की तरह असली वस्तु हैं। लेखक किसी भी बहाने अपने मन की बात कहना चाहते हैं।
- “उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है… उसका उल्लास रहता है।” मानटेन की पद्धति लेखक के लिए किस निर्णय का आधार बनती है?
(क) शैली और स्पष्ट – सहज भाषा को महत्त्व न देना
(ख) परंपरागत निबंधकारों को अस्वीकार करना
(ग) अध्ययन के बिना अपने विचार प्रस्तुत कर देना
(घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना
उत्तर – (घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना
मानटेन ऐसे निबंधों के जन्मदाता हैं जहाँ नियम या तर्क के बजाय लेखक की अपनी अनुभूति और उल्लास को प्रधानता दी जाती है।
3 .“तरुणों के लिए भविष्य उज्ज्वल… वृद्धों के लिए अतीत सुखद…” यह तुलना किस पर आधारित है?
(क) तर्क और भावना
(ख) ज्ञान और शिक्षा
(ग) परिश्रम और उपलब्धि
(घ) अभिलाषा और अनुभव
उत्तर – अभिलाषा और अनुभव
तरुणों के पास भविष्य की ‘अभिलाषा’ अर्थात् इच्छाएँ होती हैं, इसलिए वह उन्हें उज्ज्वल लगता है, जबकि वृद्धों के पास ‘अनुभव’ अर्थात् स्मृतियाँ होती हैं, इसलिए उन्हें अतीत सुखद लगता है।
- निबंध में अमीर खुसरो की कहानी का उल्लेख किस संदर्भ में किया गया है?
(क) कविता लेखन की कला को समझाने के लिए
(ख) एक साथ कई विषयों को संबोधित करने की प्रतिभा दिखाने के लिए
(ग) ढोल के महत्त्व को दर्शाने के लिए
(घ) सामाजिक सुधार के उदाहरण के रूप में
उत्तर – (ख) एक साथ कई विषयों को संबोधित करने की प्रतिभा दिखाने के लिए
लेखक ने खुसरो का उदाहरण यह दिखाने के लिए दिया कि कैसे एक ही रचना में ‘दूर के ढोल’ और ‘समाज-सुधार’ जैसे अलग विषयों को जोड़ा जा सकता है।
- निबंध में समाज-सुधार के संदर्भ में क्या कहा गया है?
(क) सुधारों की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है।
(ख) सुधार केवल बड़े विचारकों द्वारा संभव हैं।
(ग) सुधार केवल आधुनिक युग की देन हैं।
(घ) सुधारों का कोई अंत नहीं, लेकिन दोष समाप्त हो जाते हैं।
उत्तर – (क) सुधारों की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है।
पाठ के अनुसार, दोष और सुधार का चक्र निरंतर चलता रहता है। जो आज सुधार है, वह कल दोष बन जाता है और फिर नए सुधार की माँग उठती है।
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-
- निबंध लेखन के विषय में ए. जी. गार्डिनर और लेखक के विचारों में क्या अंतर है?
उत्तर – गार्डिनर के अनुसार लेखन एक विशेष मानसिक स्थिति अर्थात् उमंग और आवेग का परिणाम है। जब मन में भाव उठते हैं, तो विषय की चिंता नहीं रहती।
लेखक का मानना है कि उन्हें लिखने के लिए विशेष परिश्रम, सोच-विचार और अध्ययन की आवश्यकता होती है। उनके लिए भाव अपने आप नहीं उठते, बल्कि उन्हें मेहनत से जुटाना पड़ता है।
- लेखक के अनुसार वृद्ध और तरुण दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं, पर दोनों की असंतुष्टि के कारण भिन्न हैं। आपके विचार से उनकी असंतुष्टि के क्या-क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर – तरुण वे भविष्य का उज्ज्वल स्वप्न देखते हैं। वे वर्तमान की व्यवस्था को बदलना चाहते हैं। वे क्रांति और बदलाव के समर्थक हैं। उनकी असंतुष्टि का कारण वर्तमान की सीमाओं को तोड़कर आगे बढ़ने की इच्छा है।
वृद्ध अतीत के गौरव के संरक्षक होते हैं। उन्हें वर्तमान की नई रीतियाँ अच्छी नहीं लगतीं। उनकी असंतुष्टि का कारण अपने प्रिय ‘बीते हुए समय’ को खो देना और वर्तमान का उनके आदर्शों पर खरा न उतरना है।
- नमिता और अमिता किन विषयों पर निबंध लिखवाना चाहती हैं? उनके द्वारा सुझाए गए विषयों पर निबंध लिखने में लेखक को क्या-क्या कठिनाइयाँ आईं?
उत्तर – नमिता ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ पर और अमिता ‘समाज-सुधार’ पर निबंध लिखवाना चाहती हैं। उनके द्वारा सुझाए गए विषयों पर लेखक को लगा कि ये विषय बहुत विस्तृत हैं और इन्हें मात्र पाँच पृष्ठों में समेटना असंभव है। साथ ही, समय की कमी के कारण वे पुस्तकालय जाकर इन पर शोध भी नहीं कर सकते थे।
- निबंधशास्त्र के आचार्यों ने आदर्श निबंध लिखने की कौन-सी युक्तियाँ सुझाई हैं? आप किसी भी विषय पर निबंध लिखने से पहले किस तरह की तैयारी करते हैं?
उत्तर – निबंधशास्त्र के आचार्यों की युक्तियों के अनुसार निबंध छोटा और आकर्षक होना चाहिए। इसमें दो मुख्य अंग—सामग्री और शैली होने चाहिए। भाषा में प्रवाह, छोटे वाक्य और मुहावरों का प्रयोग होना चाहिए।
मेरे दृष्टिकोण से किसी विषय पर लिखने से पहले मैं सबसे पहले उसकी रूपरेखा बनाता हूँ, फिर संबंधित तथ्यों को एकत्रित करता हूँ और तत्पश्चात् प्रस्तावना, मुख्य भाग एवं निष्कर्ष के क्रम में निबंध लिखता हूँ।
- मानटेन ने “जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया।” निबंध लेखन के लिए देखने, सुनने और अनुभव करने की क्या उपयोगिता हो सकती है?
उत्तर – देखने, सुनने और अनुभव करने से निबंध लेखक को ‘सच्ची अनुभूति’ प्राप्त होती है। उपयोगिता की दृष्टि से देखा जाए तो जब हम अपने अनुभवों को लिखते हैं, तो पाठक को उसमें सच्चाई और उल्लास महसूस होता है। इससे निबंध केवल किताबी ज्ञान का ढेर न बनकर एक जीवंत रचना बन जाता है, जिसमें लेखक का व्यक्तित्व झलकता है।
विधा से संवाद
निबंध लिखने की कला
‘निबंध’ का शाब्दिक अर्थ है ‘बाँधना’ (नि+बंध), अर्थात भली-भाँति बँधा या गठा हुआ। यह गद्य की वह विधा है जिसमें रचनाकार किसी विषय पर अपने अनुभव, विचार, दृष्टिकोण और भावनाओं को तार्किक, भावनात्मक, क्रमबद्ध और साहित्यिक रूप से प्रस्तुत करते हैं।
शैली का अर्थ अभिव्यक्ति का ढंग होता है। निबंधकार विभिन्न प्रकार से विषय को प्रस्तुत करता है। इस पाठ में निबंध लेखन की प्रक्रियाओं के विषय में चर्चा की गई है। दिए गए आरेख को देखिए और इसके आधार पर एक निबंध लिखिए। अगर आपको निबंध लेखन का कोई और ढंग बेहतर लगता है तो उसे ऐसे ही आरेख से दर्शाइए और बताइए कि आपको वह ढंग क्यों बेहतर लगता है?
विषय – प्रेरणा, लेखन और समापन, विषय चयन, शैली निर्धारण, सामग्री संग्रह, रूपरेखा निर्माण
दूर के ढोल सुहावने
प्रस्तावना (प्रेरणा) – मनुष्य का स्वभाव है कि वह वर्तमान से कभी संतुष्ट नहीं रहता। जो वस्तु या समय उससे दूर है, वह उसे अधिक सुंदर और सुखद प्रतीत होता है। इसी को ‘दूर के ढोल सुहावने होना’ कहते हैं।
मध्य भाग (सामग्री और विचार) – ढोल की आवाज पास बैठने वाले के कान फाड़ देती है, लेकिन दूर नदी किनारे बैठे व्यक्ति को वही आवाज मधुर संगीत जैसी लगती है। यही स्थिति जीवन की भी है। वृद्धों को अपना बीता हुआ ‘अतीत’ स्वर्ण काल लगता है, क्योंकि वे वर्तमान की कठिनाइयों से दूर हो चुके हैं। वहीं युवाओं को अपना ‘भविष्य’ उज्ज्वल और मनमोहक लगता है, क्योंकि वे अभी जीवन-संग्राम से दूर हैं।
उपसंहार (समापन) – वास्तविकता यह है कि दूरी यथार्थ की कठोरता को छिपा लेती है। चाहे समाज सुधार की बात हो या प्रगतिशील साहित्य की, हम हमेशा भविष्य या अतीत के सुखद स्वप्न देखते हैं। जीवन की गतिशीलता इसी में है कि हम इन स्वप्नों से प्रेरणा लें, किंतु वर्तमान की चुनौतियों का साहस से सामना करें।
मेरा पसंदीदा निबंध लेखन का ढंग (आरेख)
मुझे ‘अनुभव-प्रधान’ अर्थात् मानटेन की पद्धति बेहतर लगती है। इसका आरेख इस प्रकार होगा –
अनुभव – सच्ची अनुभूति – स्वच्छंद अभिव्यक्ति – आत्मीय भाषा – पाठक से सीधा संवाद
यह ढंग क्यों बेहतर है?
यह पद्धति इसलिए बेहतर है क्योंकि इसमें लेखक को भारी-भरकम शब्दों या जटिल रूपरेखा की चिंता नहीं करनी पड़ती। इसमें बनावटीपन नहीं होता। जब लेखक अपने सच्चे अनुभवों को लिखता है, तो वह सीधा पाठक के हृदय को छूता है। जैसा कि बख्शी जी ने कहा—”मन के भाव ही यथार्थ वस्तु हैं, विषय नहीं।”
भाव-विस्तार
“तरुण क्रांति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत गौरव के संरक्षक”
यदि उपर्युक्त वाक्य का भाव – विस्तार किया जाए तो कहा जा सकता है कि युवा पीढ़ी में किसी समस्या को लेकर आक्रोश की भावना प्रबल होती है। वह किसी भी समस्या के समाधान के लिए बैठकर बातचीत करने के बजाय उस पर त्वरित निर्णय लेना चाहते हैं जबकि वृद्ध पीढ़ी किसी समस्या के समाधान के लिए अनुभव और परंपरागत ढंग पर विश्वास करती है।
पाठ से चुनकर कुछ ऐसे और वाक्य नीचे दिए गए हैं। इन वाक्यों का अपने शब्दों में भाव – विस्तार कीजिए-
- “जो तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है।”
भाव-विस्तार – युवावस्था में जब तक व्यक्ति अपने परिवार के संरक्षण में रहता है और उसे अपनी आजीविका के लिए स्वयं संघर्ष नहीं करना पड़ता, तब तक उसे दुनिया बहुत रंगीन और आसान लगती है। वह जीवन की कठोर सच्चाइयों, अभावों और संघर्षों से अपरिचित होता है, इसलिए उसे भविष्य केवल सुखद सपनों जैसा दिखाई देता है। वास्तविकता का बोध उसे तब होता है, जब वह स्वयं जीवन के रणक्षेत्र में उतरता है।
- “मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल ही नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो।”
भाव-विस्तार – परिवर्तन संसार का नियम है। समय के साथ समाज में पुरानी परंपराएँ रूढ़ियाँ बन जाती हैं और नई समस्याएँ जन्म लेती हैं। इसलिए, इतिहास के हर दौर में—चाहे वह सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग हो या आधुनिक युग—समाज को बेहतर बनाने के लिए सुधारकों की आवश्यकता बनी रही है। समाज की गतिशीलता को बनाए रखने के लिए निरंतर परिमार्जन और सुधार की प्रक्रिया अनिवार्य है।
- “आज जो तरुण हैं, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे।”
भाव-विस्तार – यह समय के चक्र और मानवीय मनोविज्ञान को दर्शाता है। आज की युवा पीढ़ी जो वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध क्रांति करना चाहती है, समय बीतने पर जब वह स्वयं वृद्ध होगी, तो उसे अपने समय की बातें श्रेष्ठ लगने लगेंगी। वह अपनी नई पीढ़ी को अपने समय की गौरव गाथाएँ सुनाएगी। यह चक्र निरंतर चलता रहता है, जहाँ हर पीढ़ी को अपनी युवावस्था का ‘अतीत’ सबसे सुखद लगता है।
- “निबंध छोटा होना चाहिए। छोटा निबंध बड़े की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है।”
भाव-विस्तार – निबंध का गुण उसकी लंबाई में नहीं, बल्कि विचारों की सघनता और स्पष्टता में होता है। एक छोटा निबंध विषय पर केंद्रित होता है और पाठक की एकाग्रता बनाए रखता है। बड़े निबंधों में अक्सर अनावश्यक विस्तार के कारण मूल भाव बिखर जाता है और कलात्मक सुंदरता नष्ट हो जाती है। संक्षेप में अपनी बात को प्रभावशाली ढंग से कहना ही श्रेष्ठ निबंध कला की कसौटी है।
मेरा अनुभव
इस निबंध में लेखक को दो विषयों (‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ और ‘समाज-सुधार’) पर निबंध लिखने थे। पिछली कक्षाओं में आपने भी बहुत से विषयों पर अनुच्छेद, संवाद और निबंध लिखे हैं। आपको किन विषयों पर लिखना सरल या कठिन लगा और क्यों?
- सरल लगने वाले विषय
मुझे वर्णनात्मक और अनुभव-प्रधान विषयों पर लिखना सबसे सरल लगा।
उदाहरण – “मेरा प्रिय त्योहार”, “रेल यात्रा का अनुभव” या “मेरा विद्यालय”।
कारण – इन विषयों के लिए सामग्री हमारे पास पहले से मौजूद होती है। हमें अपनी यादों और आँखों देखे दृश्यों को केवल शब्दों में पिरोना होता है। इसमें किसी विशेष अनुसंधान की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए भाषा में प्रवाह बना रहता है।
- कठिन लगने वाले विषय
मुझे अमूर्त और गंभीर तर्कपूर्ण विषयों पर लिखना कठिन लगा।
उदाहरण – “दूर के ढोल सुहावने होते हैं”, “साहित्य और समाज” या “भ्रष्टाचार – एक समस्या”।
कारण – जैसा कि लेखक बख्शी जी ने भी उल्लेख किया है, इन विषयों के लिए ‘सामग्री’ जुटाना और ‘चिंतन’ करना पड़ता है। इनमें केवल भावनाओं से काम नहीं चलता, बल्कि ठोस तर्क और रूपरेखा की आवश्यकता होती है। जब तक विषय की गहरी समझ न हो, ऐसे विषयों पर पाँच-छह पृष्ठ लिखना एक बड़ी चुनौती बन जाता है।
निष्कर्ष –
लेखक ए. जी. गार्डिनर की तरह, मुझे भी यह महसूस हुआ कि यदि मन में किसी विषय को लेकर ‘आवेग’ या ‘उमंग’ हो, तो वह सरल हो जाता है। लेकिन जब केवल परीक्षा के दबाव में किसी अनचाहे विषय पर ‘आदर्श निबंध’ लिखना पड़ता है, तो वह परिश्रम और मानसिक थकान का कारण बन जाता है।
विषयों से संवाद
- निबंध में बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक आदि कई महान व्यक्तियों के नाम आए हैं। इनके विषय में जानकारी एकत्रित करके संक्षेप में बताइए कि इन्होंने अपने समय में समाज के लिए क्या-क्या कार्य किए।
उत्तर – बुद्धदेव – अहिंसा और करुणा का संदेश दिया। वर्ण-व्यवस्था और ऊँच-नीच का विरोध कर ‘मध्यम मार्ग’ दिखाया।
महावीर स्वामी – ‘जियो और जीने दो’ का सिद्धांत दिया। अपरिग्रह और अहिंसा के माध्यम से समाज में शांति स्थापित की।
नागार्जुन – माध्यमिक शून्यवाद के प्रवर्तक। उन्होंने बौद्ध दर्शन और तर्कशास्त्र को नई दिशा दी।
शंकराचार्य – अद्वैत वेदांत का प्रचार किया और सांस्कृतिक एकता के लिए भारत के चारों कोनों में मठों की स्थापना की।
कबीर – “बाह्य आडंबरों – रूढ़ियों और सांप्रदायिकता पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने ‘मानवता’ को ही सबसे बड़ा धर्म माना।”
नानक देव – ‘एक ओंकार’ का संदेश दिया। लंगर प्रथा शुरू कर ऊँच-नीच के भेद को समाप्त किया और सेवा पर बल दिया।
- निबंध में उल्लिखित महान व्यक्तियों ने अपने द्वारा किए गए कार्यों से समाज को एक नई दिशा दिखाई। हमारे आस-पास और भी ऐसे व्यक्ति और संस्थाएँ हैं जो स्त्री-शिक्षा, पर्यावरण, असमानता, विशेष आवश्यकता समूह (दिव्यांगजन) आदि के लिए कार्य करते हैं। ऐसे व्यक्तियों, संस्थाओं के विषय में पता लगाइए और लिखिए।
उत्तर – आज के समय में भी कई व्यक्ति और संस्थाएँ निस्वार्थ भाव से कार्य कर रहे हैं –
पर्यावरण – जादव पायेंग (The Forest Man of India) जिन्होंने अकेले पूरा जंगल लगाया।
स्त्री-शिक्षा – मालाला यूसुफजई और भारत में नन्हीं कली जैसी संस्थाएँ लड़कियों की शिक्षा के लिए कार्यरत हैं।
दिव्यांगजन – वर्तमान में नारायण सेवा संस्थान जो दिव्यांगों के उपचार और कौशल विकास के लिए कार्य करती है।
असमानता – कैलाश सत्यार्थी और उनका ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ जो बाल श्रम के विरुद्ध लड़कर बच्चों को समानता का अधिकार दिलाते हैं।
- आपको ‘समाज-सुधार’ करने का अवसर मिले तो आप क्या-क्या सुधार करना चाहेंगे और कैसे करना चाहेंगे? लिखिए।
उत्तर – यदि मुझे अवसर मिले, तो मैं निम्नलिखित सुधार करना चाहूँगा –
शिक्षा में व्यवहारिकता – मैं शिक्षा को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रखकर ‘कौशल विकास’ (Skill Development) और ‘नैतिकता’ से जोड़ना चाहूँगा। इसके लिए स्कूलों में कार्यशालाएँ आयोजित करूँगा।
डिजिटल साक्षरता – गाँवों में हर व्यक्ति को तकनीक से जोड़ूँगा ताकि वे सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे उठा सकें और भ्रष्टाचार कम हो।
पर्यावरण संरक्षण – ‘एक छात्र, एक पेड़’ की नीति अनिवार्य करूँगा ताकि भविष्य की पीढ़ी प्रकृति से जुड़ सके।
- भारतीय ज्ञान साहित्य में अनेक स्थानों पर नैतिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन में संतुलन की बात की गई है। इस विषय पर अपने शिक्षक के साथ मिलकर चर्चा कीजिए।
उत्तर – भारतीय ज्ञान साहित्य सदैव ‘समत्व’ की बात करता है। शिक्षक के साथ चर्चा के लिए कुछ मुख्य बिंदु –
आध्यात्मिक और व्यावहारिक – जैसे गीता में कहा गया है, कर्म करना अनिवार्य है, लेकिन फल की चिंता न करना मानसिक शांति देता है।
स्वयं और समाज – अपने अधिकारों के साथ-साथ समाज के प्रति कर्तव्यों का पालन करना ही जीवन का संतुलन है।
प्रकृति और प्रगति – आधुनिक विकास ज़रूरी है, लेकिन वह पर्यावरण की कीमत पर नहीं होना चाहिए। इसे ही आज हम ‘सतत विकास’ (Sustainable Development) कहते हैं।
सृजन
- ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ एक लोकोक्ति है। लोक में प्रचलित लोकप्रिय वाक्य या वाक्यांश को लोकोक्ति कहते हैं, जो किसी विशेष अर्थ या सीख को व्यक्त करता है। लोकोक्ति भाषा को समृद्ध करती है तथा विचारों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने में सहायता करती है। यह लोगों के अनुभव, विश्वास और मूल्यों को दर्शाती है।
आपने यह लोकोक्ति भी सुनी होगी- ‘आम के आम गुठलियों के दाम’। अब आप इस लोकोक्ति और ‘जैविक खाद की निर्मिति में हमारा प्रयास’ विषय को मिलाकर एक संक्षिप्त लेख तैयार कीजिए।
उत्तर – जैविक खाद की निर्मिति में हमारा प्रयास
भारतीय संस्कृति में ‘आम के आम गुठलियों के दाम’ लोकोक्ति का अर्थ है—दोहरा लाभ प्राप्त करना। आज के समय में जब हम पर्यावरण संकट से जूझ रहे हैं, ‘जैविक खाद’ का निर्माण इस कहावत को चरितार्थ करने का सबसे सटीक उदाहरण है।
हमारे विद्यालय/घर के बगीचे में हम रसोई के गीले कचरे (सब्जियों के छिलके, फल के अवशेष) को फेंकने के बजाय उससे जैविक खाद तैयार कर रहे हैं। इससे एक ओर तो कचरे का सही प्रबंधन हो रहा है और प्रदूषण कम हो रहा है, वहीं दूसरी ओर हमें बाजार से महंगी रासायनिक खाद खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ रही। यह खाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है और हमें शुद्ध, रसायन मुक्त फल-सब्जियाँ प्रदान करती है। इस प्रकार, अपशिष्ट (Waste) से मूल्यवान खाद बनाना वास्तव में ‘आम के आम गुठलियों के दाम’ वसूलने जैसा है।
- “जब ढोल के पास बैठे हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर संध्या समय, किसी दूसरे के कान में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं।”
आपने पढ़ा कि ढोल के पास बैठे व्यक्ति की अपेक्षा दूर बैठे व्यक्ति के लिए ढोल की आवाज़ का अनुभव भिन्न है। अपने अनुभव के आधार पर किसी ऐसी घटना का उल्लेख अपनी डायरी में कीजिए, जब किसी वस्तु, व्यक्ति या संस्था के विषय में दूर से आपका अनुमान कुछ और रहा हो, पर निकट से आपका अनुभव बिल्कुल अलग रहा हो।
उत्तर – दिनांक – 18 जून, 20XX
समय – रात्रि 9 -00 बजे
आज मुझे बख्शी जी की वह बात याद आ गई कि ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’। अक्सर हम बाहरी चमक-धमक देखकर किसी चीज़ का गलत अनुमान लगा लेते हैं।
ऐसी ही एक घटना पिछले महीने की है। हमारे शहर में एक बहुत बड़ा और भव्य ‘एडवेंचर पार्क’ खुला। विज्ञापनों और दूर से उसकी ऊँची-ऊँची स्लाइड्स को देखकर मुझे लगता था कि वहाँ जाना स्वर्ग जैसा अनुभव होगा। मैं हफ़्तों तक वहाँ जाने के सपने देखता रहा। लेकिन जब पिछले रविवार मैं वहाँ पहुँचा, तो मेरा अनुभव बिल्कुल विपरीत था।
दूर से जो स्लाइड्स रोमांचक लग रही थीं, पास जाने पर वे असुरक्षित और शोर-शराबे से भरी थीं। पार्क में इतनी अधिक भीड़ और अव्यवस्था थी कि सुकून का एक पल भी नहीं मिला। जो पानी दूर से नीला और साफ़ दिख रहा था, वह पास जाने पर गंदा था। उस दिन मैंने महसूस किया कि किसी भी संस्था या स्थान की वास्तविकता केवल बाहर से देखकर नहीं जानी जा सकती। जैसा कि ढोल की आवाज़ दूर से मधुर और पास से कर्कश लगती है, वैसे ही उस पार्क का आकर्षण भी केवल दूरी तक ही सीमित था।
अविनाश रंजन गुप्ता
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
समास
निबंध में ऐसे अनेक सामासिक शब्द आए हैं। उन शब्दों को ढूँढ़कर उनका समास विग्रह कीजिए और समास का नाम लिखिए। आपकी समझ के लिए एक उदाहरण तालिका में दिया गया है। पाठ से अन्य उदाहरण चुनकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए।
सामासिक शब्द – समास विग्रह – समास का नाम
मनोभाव – मन के भाव – तत्पुरुष समास (संबंध)
निबंधशास्त्र – निबंध का शास्त्र – तत्पुरुष समास (संबंध)
सुधारवादी – सुधार को मानने वाला – तत्पुरुष समास
अनादि – जिसका कोई आदि (प्रारंभ) न हो – नञ् तत्पुरुष समास
विश्वकोश – विश्व का कोश (खजाना) – तत्पुरुष समास (संबंध)
बााल्यावस्था – बाल्य की अवस्था – तत्पुरुष समास
अतीत–गौरव – अतीत का गौरव – तत्पुरुष समास
जीवन–संग्राम – जीवन का संग्राम – तत्पुरुष समास
सुख-दुख – सुख और दुख – द्वंद्व समास
हानि-लाभ – हानि और लाभ – द्वंद्व समास
विवाहोत्सव – विवाह का उत्सव – तत्पुरुष समास
लज्जाशील – लज्जा से युक्त – तत्पुरुष समास (करण)
नगर-नगर – हर नगर (नगर ही नगर) – अव्ययीभाव समास
गाँव-गाँव – हर गाँव (गाँव ही गाँव) – अव्ययीभाव समास
उपसर्ग एवं प्रत्यय
- निबंध से उपसर्ग और प्रत्यय वाले शब्द ढूँढ़कर अपनी लेखन – पुस्तिका में लिखिए।
उपसर्ग वाले शब्द – उपसर्ग + मूल शब्द – प्रत्यय वाले शब्द – मूल शब्द + प्रत्यय
असंतोष – अ + संतोष | सुहावने – सुहावना + ए
उपयुक्त – उप + युक्त | कठिनता – कठिन + ता
अनुभव – अनु + भव | मनमोहक – मनमोह + अक
प्रगति – प्र + गति | मानसिक – मानस + इक
विरोध – वि + रोध | विद्वता – विद्वान + ता
- नीचे दिए गए वाक्यों को उचित उपसर्ग या प्रत्यय लगाकर पूरा कीजिए—
निबंध लिखना बड़ी कठिनाई (कठिन) की बात है।
वर्तमान से दोनों को असंतोष (संतोष) होता है।
वाक्यों में कुछ अस्पष्टता (“”स्पष्ट “) भी चाहिए, क्योंकि यह अस्पष्टता (स्पष्ट) या दुर्बोधता (बोध) गांभीर्य ला देती है।
- नीचे दिए गए शब्दों में उपसर्ग या प्रत्यय लगाकर नए शब्द बनाकर लिखिए। आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है।
मधुर सुधार सुंदर गति समाज
उदाहरण- मधुर मधुरता, मधुरमय, सुमधुर
सुधार – नव-सुधार – सुधारक – सुधारवादी
सुंदर – असुंदर – सुंदरता – सौंदर्य
गति – प्रगति – दुर्गति – गतिशील – गतिमान
समाज – सामाजिक – असामाजिक – समाजवाद
भाव एक शब्द अनेक
इस पाठ में अनेक ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया है जिनके अर्थ परस्पर मिलते-जुलते हैं। उदाहरण के लिए, विचार-मनन-चिंतन या सुहावने-मधुर-मनमोहक पाठ में से ऐसे शब्द ढूँदिए तथा वाक्य प्रयोग के द्वारा उनके अर्थ स्पष्ट कीजिए।
- विचार – मनन – चिंतन
ये शब्द ‘सोचने’ की प्रक्रिया के अलग-अलग स्तरों को दर्शाते हैं।
विचार – “किसी विषय पर निबंध लिखने से पहले मन में विचार करना आवश्यक है।” (सामान्य सोच)
मनन – “पाठ को केवल पढ़ना काफी नहीं, उसका मनन करने से वह याद रहता है।” (गहनता से सोचना)
चिंतन – “देश की समस्याओं पर गंभीर चिंतन करना विद्वानों का काम है।” (दार्शनिक या समस्या-समाधान हेतु सोच)
- सुहावने – मधुर – मनमोहक
ये शब्द ‘सुंदरता’ या ‘प्रियता’ के अनुभव को बताते हैं।
सुहावने – “बारिश के बाद मौसम बड़ा सुहावना हो गया है।” (सुखद एहसास)
मधुर – “कोयल की मधुर आवाज़ सबको अच्छी लगती है।” (सुनने में मीठा)
मनमोहक – “हिमालय के पर्वतों का दृश्य अत्यंत मनमोहक होता है।” (मन को मोह लेने वाला/सुंदर)
- आदेश – आग्रह – ताकीद
ये शब्द किसी कार्य को करने के लिए कहे जाने के अलग-अलग ढंग हैं।
आदेश – “नमिता का आदेश था कि मैं ‘दूर के ढोल सुहावने’ पर लिखूँ।” (अधिकार के साथ कहना)
आग्रह – “अमिता का आग्रह था कि मैं समाज-सुधार पर निबंध लिखूँ।” (विनम्रतापूर्वक निवेदन करना)
ताकीद – “मालिक ने नौकर को समय पर आने की सख्त ताकीद की।” (चेतावनी या जोर देकर निर्देश देना)
- विस्मृति – अतीत – स्मृति
ये शब्द समय और याददाश्त से जुड़े हैं।
स्मृति – “बचपन की स्मृतियाँ हमेशा सुखद होती हैं।” (यादें)
अतीत – “वृद्ध लोग अक्सर अपने अतीत के गौरव में खोए रहते हैं।” (बीता हुआ समय)
विस्मृति – “समय के साथ पुरानी बातें विस्मृति के गर्त में चली जाती हैं।” (भूल जाना)
- आवेग – उमंग – उल्लास
ये शब्द मन की उत्साहजनक स्थितियों को दर्शाते हैं।
आवेग – “क्रोध के आवेग में व्यक्ति अपना विवेक खो देता है।” (तीव्र मानसिक वेग)
उमंग – “त्योहारों के समय बच्चों के मन में नई उमंग होती है।” (काम करने का उत्साह)
उल्लास – “जीत की ख़बर सुनते ही चारों ओर उल्लास छा गया।” (अत्यधिक ख़ुशी या आनंद)
व्याकरण की बात
समास
निबंध में ऐसे अनेक सामासिक शब्द आए हैं। उन शब्दों को ढूँढ़कर उनका समास विग्रह कीजिए और समास का नाम लिखिए। आपकी समझ के लिए एक उदाहरण तालिका में दिया गया है। पाठ से अन्य उदाहरण चुनकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए।
सामासिक शब्द – समास विग्रह – समास का नाम
मनोभाव – मन के भाव – तत्पुरुष समास (संबंध)
निबंधशास्त्र – निबंध का शास्त्र – तत्पुरुष समास (संबंध)
सुधारवादी – सुधार को मानने वाला – तत्पुरुष समास
अनादि – जिसका कोई आदि (प्रारंभ) न हो – नञ् तत्पुरुष समास
विश्वकोश – विश्व का कोश (खजाना) – तत्पुरुष समास (संबंध)
बााल्यावस्था – बाल्य की अवस्था – तत्पुरुष समास
अतीत–गौरव – अतीत का गौरव – तत्पुरुष समास
जीवन–संग्राम – जीवन का संग्राम – तत्पुरुष समास
सुख-दुख – सुख और दुख – द्वंद्व समास
हानि-लाभ – हानि और लाभ – द्वंद्व समास
विवाहोत्सव – विवाह का उत्सव – तत्पुरुष समास
लज्जाशील – लज्जा से युक्त – तत्पुरुष समास (करण)
नगर-नगर – हर नगर (नगर ही नगर) – अव्ययीभाव समास
गाँव-गाँव – हर गाँव (गाँव ही गाँव) – अव्ययीभाव समास
उपसर्ग एवं प्रत्यय
- निबंध से उपसर्ग और प्रत्यय वाले शब्द ढूँढ़कर अपनी लेखन – पुस्तिका में लिखिए।
उपसर्ग वाले शब्द – उपसर्ग + मूल शब्द – प्रत्यय वाले शब्द – मूल शब्द + प्रत्यय
असंतोष – अ + संतोष | सुहावने – सुहावना + ए
उपयुक्त – उप + युक्त | कठिनता – कठिन + ता
अनुभव – अनु + भव | मनमोहक – मनमोह + अक
प्रगति – प्र + गति | मानसिक – मानस + इक
विरोध – वि + रोध | विद्वता – विद्वान + ता
- नीचे दिए गए वाक्यों को उचित उपसर्ग या प्रत्यय लगाकर पूरा कीजिए—
निबंध लिखना बड़ी कठिनाई (कठिन) की बात है।
वर्तमान से दोनों को असंतोष (संतोष) होता है।
वाक्यों में कुछ अस्पष्टता (“”स्पष्ट “) भी चाहिए, क्योंकि यह अस्पष्टता (स्पष्ट) या दुर्बोधता (बोध) गांभीर्य ला देती है।
- नीचे दिए गए शब्दों में उपसर्ग या प्रत्यय लगाकर नए शब्द बनाकर लिखिए। आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है।
मधुर सुधार सुंदर गति समाज
उदाहरण- मधुर मधुरता, मधुरमय, सुमधुर
सुधार – नव-सुधार – सुधारक – सुधारवादी
सुंदर – असुंदर – सुंदरता – सौंदर्य
गति – प्रगति – दुर्गति – गतिशील – गतिमान
समाज – सामाजिक – असामाजिक – समाजवाद
भाव एक शब्द अनेक
इस पाठ में अनेक ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया है जिनके अर्थ परस्पर मिलते-जुलते हैं। उदाहरण के लिए, विचार-मनन-चिंतन या सुहावने-मधुर-मनमोहक पाठ में से ऐसे शब्द ढूँदिए तथा वाक्य प्रयोग के द्वारा उनके अर्थ स्पष्ट कीजिए।
- विचार – मनन – चिंतन
ये शब्द ‘सोचने’ की प्रक्रिया के अलग-अलग स्तरों को दर्शाते हैं।
विचार – “किसी विषय पर निबंध लिखने से पहले मन में विचार करना आवश्यक है।” (सामान्य सोच)
मनन – “पाठ को केवल पढ़ना काफी नहीं, उसका मनन करने से वह याद रहता है।” (गहनता से सोचना)
चिंतन – “देश की समस्याओं पर गंभीर चिंतन करना विद्वानों का काम है।” (दार्शनिक या समस्या-समाधान हेतु सोच)
- सुहावने – मधुर – मनमोहक
ये शब्द ‘सुंदरता’ या ‘प्रियता’ के अनुभव को बताते हैं।
सुहावने – “बारिश के बाद मौसम बड़ा सुहावना हो गया है।” (सुखद एहसास)
मधुर – “कोयल की मधुर आवाज़ सबको अच्छी लगती है।” (सुनने में मीठा)
मनमोहक – “हिमालय के पर्वतों का दृश्य अत्यंत मनमोहक होता है।” (मन को मोह लेने वाला/सुंदर)
- आदेश – आग्रह – ताकीद
ये शब्द किसी कार्य को करने के लिए कहे जाने के अलग-अलग ढंग हैं।
आदेश – “नमिता का आदेश था कि मैं ‘दूर के ढोल सुहावने’ पर लिखूँ।” (अधिकार के साथ कहना)
आग्रह – “अमिता का आग्रह था कि मैं समाज-सुधार पर निबंध लिखूँ।” (विनम्रतापूर्वक निवेदन करना)
ताकीद – “मालिक ने नौकर को समय पर आने की सख्त ताकीद की।” (चेतावनी या जोर देकर निर्देश देना)
- विस्मृति – अतीत – स्मृति
ये शब्द समय और याददाश्त से जुड़े हैं।
स्मृति – “बचपन की स्मृतियाँ हमेशा सुखद होती हैं।” (यादें)
अतीत – “वृद्ध लोग अक्सर अपने अतीत के गौरव में खोए रहते हैं।” (बीता हुआ समय)
विस्मृति – “समय के साथ पुरानी बातें विस्मृति के गर्त में चली जाती हैं।” (भूल जाना)
- आवेग – उमंग – उल्लास
ये शब्द मन की उत्साहजनक स्थितियों को दर्शाते हैं।
आवेग – “क्रोध के आवेग में व्यक्ति अपना विवेक खो देता है।” (तीव्र मानसिक वेग)
उमंग – “त्योहारों के समय बच्चों के मन में नई उमंग होती है।” (काम करने का उत्साह)
उल्लास – “जीत की ख़बर सुनते ही चारों ओर उल्लास छा गया।” (अत्यधिक ख़ुशी या आनंद)
गतिविधियाँ
- “खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा॥”
पाठ में अमीर खुसरो की यह प्रसिद्ध अनमेली आई है। अनमेली एक प्रकार की हास्य- व्यंग्यपूर्ण काव्य शैली है जिसमें असंगत वाक्यों एवं विपरीत स्थितियों को जोड़कर मनोरंजन किया जाता है। अमीर खुसरो आम लोगों के मन को बहलाने व हँसाने के उद्देश्य से ऐसे प्रयोग किया करते थे। आप उनके द्वारा रचित अन्य अनमेलियों, मुकरियों व पहेलियों का शिक्षक की सहायता से ढूँढ़कर संकलन कीजिए।
- अनमेली (जिसमें असंगत बातें जोड़ी जाती हैं)
प्रसिद्ध अनमेली यह है –
“पान सड़ा, घोड़ा अड़ा, विद्या भूली जाए।
तवे पर रोटी क्यों जली? उलटी-पलटी न जाए॥”
(अर्थ – इन चारों का कारण एक ही है—’फेरा न गया’ यानी पलटा न गया।)
- मुकरियाँ (कहकर मुकर जाना)
मुकरियों में पहले सखी अपने प्रिय (साजन) का वर्णन करती है, फिर अंत में मुकर कर किसी वस्तु का नाम ले लेती है।
आभूषण पर –
“वह आए तो शादी होय, उस बिन दूजा और न कोय।
मीठे लागें वाके बोल, ऐ सखि साजन? ना सखि ढोल।”
- पहेलियाँ (बुझौवल)
दर्पण (शीशा) पर –
“एक थाल मोती से भरा, सबके सिर पर औंधा धरा।
चारों ओर वह थाली फिरे, मोती उससे एक न गिरे।”
(उत्तर – आकाश)
- कक्षा में ‘युवा और वृद्ध — दो पीढ़ियों के पीढ़ीगत अंतर’ पर वाद-विवाद का आयोजन कीजिए।
वाद-विवाद के नियमों के लिए आप कक्षा 7 और 8 की पाठ्यपुस्तक मल्हार के कुछ पाठों का अभ्यास देखकर अपनी प्रतियोगिता के नियम निर्धारित कर सकते हैं।
– छात्र इसे अपने स्तर पर करें।
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
मेरे शब्द
कहानी में से पाँच ऐसे शब्द चुनकर लिखिए जो आपके लिए बिल्कुल नए हैं। अब उन शब्दों के अर्थ अपने अनुमान से लिखिए। इसके बाद उनके अर्थ शब्दकोश में से देखकर लिखिए।
1 – निरापद – सुरक्षित या बिना किसी डर के। – “सुरक्षित – जिससे कोई खतरा न हो।”
2 – सहिष्णुता – किसी चीज को सहने की शक्ति। – “सहनशीलता – धैर्यपूर्वक कष्ट सहने का गुण।”
3 – विग्रह – लड़ाई या झगड़ा। – “अलगाव – बँटवारा या कलह (झगड़ा)।”
4 – मसलहत – सही समय या चतुराई। – “हितकर – उचित या बुद्धिमानी की बात।”
5 – अख्तियार – मालिकाना हक या ताकत। – “अधिकार – शक्ति या वश।”
भाषा गढ़ते मुहावरे
“लोग आ-आकर उनकी सूरत देखते और मन फीका करके चले जाते।”
‘मन फीका करना’ एक मुहावरा है जिसका अर्थ आपको वाक्य पढ़कर समझ में आ ही गया होगा। इसी से मिलते-जुलते मुहावरे हैं— जी फीका होना, जी खट्टा होना आदि। ‘दो बैलों की कथा’ कहानी में कई मुहावरे हैं जिनसे यह कहानी जीवंत हो गई है। ऐसी भाषा को ही मुहावरेदार भाषा कहा जाता है।
कहानी में से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। इन वाक्यों में मुहावरों को पहचानकर रेखांकित कीजिए। इन मुहावरों का प्रयोग करते हुए नए वाक्य बनाकर लिखिए-
- “झूरी के साले गया को घर तक गोईं ले जाने में दाँतों पसीना आ गया।”
- “उसका चेहरा देखकर अंतर्ज्ञान से दोनों मित्रों के दिल काँप उठे।”
- “झूरी की स्त्री ने बैलों को द्वार पर देखा, तो जल उठी।”
- “मोती दिल में ऐंठकर रह गया।”
- “आएगा तो दूर ही से खबर लूँगा। देखेँ कैसे ले जाता है।”
- “जी तोड़कर काम करते हैं, किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करते, चार बातें सुनकर गम खा जाते हैं।”
- “अगर वे भी ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते, तो शायद सभ्य कहलाने लगते।”
- “तो फिर वहीं मरो। बंदा तो नौ-दो ग्यारह होता है।”
1 – दाँतों पसीना आना – बहुत अधिक परिश्रम करना या भारी कठिनाई होना। – गणित के कठिन सवालों को हल करने में अच्छे-अच्छों को दाँतों पसीना आ जाता है।
2 – दिल काँप उठना – बहुत अधिक डर जाना या भयभीत होना। – अचानक सामने शेर को देखकर शिकारी का दिल काँप उठा।
3 – जल उठना – ईर्ष्या होना या बहुत अधिक क्रोधित होना। – अपनी सहेली के नए खिलौने देखकर रीना जल उठी।
4 – दिल में ऐंठकर रह जाना – मन मसोस कर रह जाना या व्यवस्था के कारण क्रोध पी जाना। – “मालिक की डाँट सुनकर नौकर दिल में ऐंठकर रह गया – पर कुछ बोल न सका।”
5 – खबर लेना – दंड देना या सबक सिखाना। – अध्यापक ने गृहकार्य न करने वाले छात्रों की अच्छी खबर ली।
6 – जी तोड़कर काम करना – बहुत अधिक मेहनत करना। – परीक्षा में प्रथम आने के लिए राहुल जी तोड़कर काम कर रहा है।
7 – गम खा जाना – चुपचाप सहन कर लेना या धैर्य रखना। – बड़ों की कड़वी बातों पर कभी-कभी गम खा जाना ही बुद्धिमानी है।
8 – ईंट का जवाब पत्थर से देना – कड़ा प्रतिवाद करना या दुष्ट के साथ दुष्टता करना। – भारतीय सेना ने सीमा पर दुश्मनों को ईंट का जवाब पत्थर से दिया।
9 – नौ-दो ग्यारह होना – भाग जाना। – पुलिस को आते देखकर चोर पलक झपकते ही नौ-दो ग्यारह हो गया।
गतिविधियाँ
नीचे दी गई गतिविधियाँ अपने समूह के साथ मिलकर कीजिए—
- कविता (गीत) और अभिनंदन-पत्र
“बाल-सभा ने निश्चय किया, दोनों पशुवीरों को अभिनंदन-पत्र देना चाहिए।”
(क) मान लीजिए कि बाल-सभा ने हीरा और मोती की प्रशंसा में एक गीत लिखा और गाया। अपनी कल्पना से वह गीत लिखिए।
उत्तर – हमारे दो वीर
आए हैं दो वीर निराले, झूरी के ये हैं प्यारे।
संकट में जो कभी न टूटे, हिम्मत के ये हैं ध्रुव तारे।
सींगों से दीवार गिरा दी, मूक प्रेम है इनकी भाषा।
काँजीहौस के बंदी कहते, इन्हें स्वतंत्रता की आशा।
लौट आए अपने आँगन में, तोड़ गुलामी की जंजीर।
हीरा-मोती तुम हो योद्धा, तुम हो सबसे शूरवीर!
(ख) हीरा और मोती के लिए अभिनंदन पत्र लिखिए।
उत्तर – अभिनंदन-पत्र
प्रिय पशु-वीर हीरा एवं मोती,
हम ग्राम बाल-सभा के सदस्य आपकी वीरता और स्वाभिमान की सराहना करते हैं। आपने यह सिद्ध कर दिया कि आज़ादी केवल मनुष्यों का नहीं, बल्कि हर जीव का अधिकार है। आपकी अटूट मित्रता और झूरी के प्रति वफादारी हमारे लिए प्रेरणा है। इस अभिनंदन-पत्र के साथ हम आपके लिए ताजी रोटियाँ और चोकर सप्रेम भेंट करते हैं।
शुभकामनाओं सहित,
बाल-सभा, बोलानी।
- बाल सभा में भाषण
मान लीजिए कि आपको बाल-सभा ने हीरा-मोती के लौटने के बाद भाषण देने के लिए बुलाया है। भाषण का विषय है— ‘पशुओं के अधिकार। अपना भाषण लिखिए और कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।
विषय – पशुओं के अधिकार
“आदरणीय शिक्षक गण और मेरे सहपाठियों,
आज जब हम हीरा और मोती की घर वापसी का उत्सव मना रहे हैं, तो हमें यह समझना होगा कि पशु भी संवेनशील प्राणी हैं। ईश्वर ने उन्हें वाणी नहीं दी, इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें दर्द नहीं होता।
पशुओं का पहला अधिकार है— क्रूरता से मुक्ति। उन्हें बेवजह मारना या उनकी क्षमता से अधिक बोझ लादना अन्याय है। दूसरा अधिकार है— उचित पोषण। जैसे हमें भूख लगती है, वैसे ही उन्हें भी ताज़ा चारा और स्वच्छ जल चाहिए। तीसरा और सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकार है— प्रेम और गरिमा। हीरा और मोती केवल ‘कामचोर’ नहीं थे, वे स्वाभिमानी थे।
आइए संकल्प लें कि हम अपने आस-पास के बेजुबानों के प्रति दयालु रहेंगे और उनके अधिकारों की रक्षा करेंगे। धन्यवाद!”
- शीर्षक
इस कहानी के पाँच भाग हैं। कहानी के प्रत्येक भाग को अपने मन से उपयुक्त शीर्षक दीजिए।
कहानी की घटनाओं के प्रवाह के आधार पर प्रस्तावित शीर्षक –
भाग 1 – गधा, बैल और झूरी का प्रेम (प्रस्तावना)
भाग 2 – गया की कैद और विद्रोह (ससुराल की यात्रा)
भाग 3 – आज़ादी की पहली डकार और साँड़ से युद्ध (साहस का परिचय)
भाग 4 – काँजीहौस का नरक और महान पलायन (पशु एकता)
भाग 5 – कसाई का चंगुल और अपनी थान पर वापसी (विजयी मिलन)
मेरी पहेली
अपने समूह के साथ मिलकर ऐसी पहेलियाँ बनाइए जिनके उत्तर निम्नलिखित हों-
हीरा, झूरी, मोती, गया, बैल, मटर, रस्सी, रोटी
- उत्तर – झूरी
मैं हूँ उनका असली मालिक, करता उनसे सच्चा प्यार।
घर आने पर चूम लिया था, खोल दिया था बाहें पसार।
(कौन हूँ मैं?)
- उत्तर – हीरा
पछाईं जाति का सुंदर हूँ मैं, स्वभाव मेरा है बहुत गंभीर।
गया की मार भी चुपचाप सहता, सहनशीलता में मैं हूँ वीर।
(मेरा नाम क्या है?)
- उत्तर – मोती
ईंट का जवाब पत्थर से दूँ, क्रोध बड़ा है मेरी नाक पर।
काँजीहौस की दीवार गिरा दी, पहुँचा घर मैं अपनी साख पर।
(मेरा नाम क्या है?)
- उत्तर – गया
झूरी का मैं साला लगता, क्रूरता की मैं मूरत हूँ।
सूखी घास खिलाता हूँ मैं, बैलों के लिए मुसीबत हूँ।
(मैं कौन हूँ?)
- उत्तर – बैल
खेती की मैं जान कहाता, हल खींचूँ मैं दिन और रात।
‘बछिया का ताऊ’ भी कहते, मूक भाषा में करता बात।
(मैं कौन हूँ?)
- उत्तर – मटर
हरे-भरे खेत में खड़ी थी, खाने में मैं बड़ी स्वादिष्ट।
मुझे चरते ही पकड़े गए, बन गई दोनों के लिए मैं आफ़त।
(मैं क्या हूँ?)
- उत्तर – रस्सी
गले में मेरे बंधन डाले, मुँह से मुझे चबाते हैं।
जब मैं झटके से टूटूँ, तो कैदी भाग जाते हैं।
(मैं क्या हूँ?)
- उत्तर – रोटी
छोटी सी एक बच्ची लाई, प्रेम का मैं प्रसाद हूँ।
भूखे बैलों के मन को तृप्त करूँ, ममता की मीठी याद हूँ।
(मैं क्या हूँ?)
कठिन शब्दों के सरल अर्थ
1 – कथन – कही हुई बात – Statement / Assertion
2 – उमंग – उत्साह / जोश – Enthusiasm / Zeal
3 – स्फूर्ति – ताज़गी / तेज़ी – Vitality / Agility
4 – आवेग – तीव्र वेग / भावना – Impulse / Surge
5 – मस्तिष्क – दिमाग़ – Brain / Intellect
6 – मनोभाव – मन के विचार – Sentiments / Feelings
7 – उपयुक्त – उचित – Appropriate / Suitable
8 – यथार्थ – वास्तविक / सच – Reality / Actual
9 – उत्थित – उठा हुआ / उत्पन्न – Arisen / Originated
10 – आदेश – आज्ञा – Order / Command
11 – आग्रह – ज़ोर देना / निवेदन – Insistence / Urge
12 – सुहावने – सुंदर / अच्छे लगने वाले – Pleasant / Charming
13 – रहस्य – गुप्त बात – Mystery / Secret
14 – अनादि काल – बहुत प्राचीन समय – Eternal / Immemorial time
15 – विज्ञ – विद्वान / जानकार – Scholar / Expert
16 – सम्मति – सलाह / राय – Consent / Opinion
17 – अपेक्षा – तुलना में – In comparison to
18 – संचित – इकट्ठा किया हुआ – Accumulated / Stored
19 – मनन – गहराई से सोचना – Contemplation / Reflection
20 – अनुसंधान – खोज / शोध – Research / Investigation
21 – विश्वकोश – ज्ञान का भंडार (किताब) – Encyclopedia
22 – उपलब्ध – प्राप्त – Available
23 – रूपरेखा – ढाँचा – Outline / Blueprint
24 – सारांश – निचोड़ / सार – Summary / Gist
25 – नामकरण – नाम देना – Naming / Nomenclature
26 – प्रवाह – बहाव – Flow / Fluency
27 – संबद्ध – जुड़ा हुआ – Connected / Related
28 – विद्वता – बुद्धिमानी – Scholarship / Erudition
29 – प्रदर्शन – दिखावा – Exhibition / Display
30 – अस्पष्टता – जो साफ़ न हो – Ambiguity / Vagueness
31 – दुर्बोधता – कठिनता – Abstruseness / Difficulty
32 – गांभीर्य – गंभीरता – Seriousness / Gravity
33 – गुत्थियाँ – उलझनें – Complexities / Riddles
34 – लोकोक्ति – कहावत – Proverb / Adage
35 – समावेश – शामिल करना – Inclusion
36 – कसौटी – परख – Criterion / Touchstone
37 – लिपिबद्ध – लिखा हुआ – Documented / Written down
38 – स्वच्छंद – आज़ाद – Independent / Free
39 – उदात्त – महान / ऊँचा – Sublime / Grand
40 – आख्यायिका – छोटी कहानी – Fable / Narrative
41 – सूक्ष्म – बहुत छोटा / बारीक – Minute / Subtle
42 – विवेचना – चर्चा / विश्लेषण – Critical Analysis
43 – अनुभूति – एहसास – Perception / Experience
44 – उल्लास – प्रसन्नता – Joy / Exultation
45 – गरिमा – गौरव / गरिमा – Dignity / Glory
46 – महिमा – बड़प्पन – Magnitude / Greatness
47 – लीन – डूबा हुआ – Absorbed / Engrossed
48 – अनुसरण – पीछे चलना / नकल – Following / Imitation
49 – प्रतिभा – बुद्धिमत्ता – Genius / Talent
50 – कर्कशता – कड़वाहट (आवाज़ में) – Harshness / Hoarseness
51 – संचार – फैलाव – Transmission / Flow
52 – विवाहोत्सव – शादी का उत्सव – Wedding festivities
53 – कोलाहल – शोर-शराबा – Clamor / Noise
54 – विषाद – गहरा दुःख – Sorrow / Dejection
55 – कलरव – शोर / पक्षियों की चहक – Chirping / Hum
56 – प्रमोद – आनंद – Pleasure / Delight
57 – समीपस्थ – पास वाला – Nearby / Adjacent
58 – दूरस्थ – दूर वाला – Remote / Distant
59 – तरुण – युवा – Youth / Young man
60 – वृद्ध – बूढ़ा – Aged / Old man
61 – अतीतकाल – बीता हुआ समय – Past time
62 – उज्ज्वल – साफ़ / चमकदार – Radiant / Bright
63 – समर्थक – साथ देने वाला – Supporter / Proponent
64 – संरक्षक – रक्षा करने वाला – Guardian / Custodian
65 – क्षुब्ध – परेशान / व्याकुल – Agitated / Perturbed
66 – प्रगतिशील – आगे बढ़ने वाला – Progressive
67 – निहित – समाया हुआ – Inherent / Implied
68 – स्मारक – याद दिलाने वाला – Monument / Memorial
69 – अपरिहार्य – जिसे टाला न जा सके – Inevitable
70 – दर्शन – विचारधारा – Philosophy

