शेखर जोशी
शेखर जोशी का जन्म सन् 1932 में अल्मोड़ा, उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनका पहला कहानी संग्रह कोसी का घटवार सन् 1958 में प्रकाशित हुआ। उनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ हैं— साथ के लोग, दाज्यू, हलवाहा, नौरंगी बीमार है, आदमी का डर, डांगरी वाले, मेरा पहाड़ (कहानी संग्रह), एक पेड़ की याद (शब्दचित्र-संग्रह), स्मृति में रहें वे (संस्मरण), न रोको उन्हें शुभ्रा (कविता संग्रह), मेरा ओलिया गाँव (आत्मवृत्त)। उनकी कहानियों का संग्रह शेखर जोशी कथा समग्र शीर्षक से प्रकाशित है। शेखर जोशी ने ग्रामीण-शहरी मध्यवर्गीय समाज के जीवन-मूल्यों तथा कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के जीवन-संघर्षों को अपनी कहानियों में प्रमुखता से उभारा है।
उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी पुरस्कार’ तथा ‘साहित्य भूषण सम्मान’, मध्य प्रदेश शासन द्वारा ‘अखिल भारतीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’ तथा ‘श्रीलाल शुक्ल स्मृति इफको साहित्य पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। सन् 2022 में उनका निधन हो गया।
‘संवादहीन’ – कहानी का परिचय
‘संवादहीन’ कहानी ग्रामीण वृद्ध स्त्री के अकेलेपन की संवेदनशील कहानी है। कहानी के दो मुख्य पात्र ताई और मिट्ठू हैं। मिट्ठू ताई के लिए केवल एक तोता नहीं बल्कि संवाद का माध्यम और ममता का केंद्र है। इन दोनों के बीच कभी प्रेमपूर्ण संवाद है तो कभी नोक-झोंक भी रहती है। मनुष्य और पशु-पक्षी के संबंधों को दर्शाने के साथ ही यह कहानी समकालीन जीवन-यथार्थ की विसंगतियों, जैसे- पलायन, अकेलेपन और आदर्श एवं यथार्थ के द्वंद्व को अभिव्यक्त करती है।
संवादहीन
गहरी साँस लेकर ताई कहतीं, “भगवान! कैसे नैया पार लगेगी?” और बंद पिंजड़े में अपने पंखों को फड़फड़ाता, उछल-कूद मचाता मिट्ठू उत्तर देता, “राम-राम कहो, सीताराम कहो।”
ताई दुहराती सीताराम! सीताराम!
ताई और मिट्ठू
मिट्ठू और ताई।
अब ये ही दो प्राणी गाँव के बीच में स्थित बड़े घर के उस सूने खंडहर में एक-दूसरे को सहारा देने के लिए रह गए थे। ताई ने अपने जीवन में अच्छे दिन भी देखे थे। पूत-परिवार, बहू-बेटियाँ, नौकर-चाकर, गाय-ढोर, क्या नहीं था बड़े घर में! देखते ही देखते क्या से क्या हो गया! बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहरों के होकर रह गए। बेटियाँ अपने-अपने हाथ पीले कराकर अपनी गृहस्थी में रम गईं, किसके भरोसे कारबार संभलता। धीरे-धीरे सब पराए हाथों में चला गया। जब खेती-बाड़ी नहीं, कारबार नहीं, तो नौकर-चाकर किस दम पर टिकते! अपनी अकेली जान के लिए ताई दो जून का एक जून चूल्हा फूँक लेतीं, व्रत-उपवास के बहाने चौका-चूल्हा टाल जातीं, पेट की समस्या उनके लिए कभी समस्या नहीं रही, पर सूने घर की भाँय – भाँय जैसे उन्हें काटने को दौड़ती थी।
भला हो गनपत का, जिसने ताई के सूनेपन को सहारा दे दिया था, वह न जाने कहाँ से एक प्यारा-सा पहाड़ी तोता ले आया था। ताई की सारी ममता मिट्ठू पर बरस पड़ी। वह रात-दिन मिट्ठू को लेकर ही बेचैन रहने लगीं। जो ताई अपनी खातिर चूल्हा जलाने में आलस्य कर जाती थीं, वही अब नियमपूर्वक मिट्ठू के लिए दाल-भात बनातीं। मिट्ठू के वक्त-बेवक्त के तकाजों के लिए रोटी बचाकर रखतीं। अब ताई को इस बात की पूरी जानकारी रहने लगी थी कि किसके खेत में हरी मिर्चें तैयार हो गई हैं और किस पेड़ में फसल के आखिरी अमरूद बचे हैं।
कुशाग्र बुद्धि छात्र की तरह मिट्ठू ताई के पढ़ाए पाठ को न केवल हू-ब-हू दुहरा देता बल्कि एक-दो बार सुनकर याद भी रख लेता था और मौके बे-मौके ताई के सवालों का सटीक उत्तर दे देता। बड़े घर का सूनापन धीरे-धीरे मिट्ठू की बातचीत से अब रौनक में बदल गया था, अड़ोस-पड़ोस की बहू-बेटियाँ बच्चों को गोदी में उठाकर मिट्ठू से उनका मन बहलाने के लिए आ जुटती और घर गुलजार हो जाता। सुबह पौ फटने लगती, पेड़ों में चिड़ियाँ चहचहातीं तो मिट्ठू भी जैसे ताई को भोर की झपकी से जगाने के लिए ही अपना पाठ शुरू कर देते—
हर हर गंगे!
हर हर गंगे!!
सीताराम बोल!
सीताराम बोल!!
मिट्ठू राम राम!
मिट्ठू राम राम!!
ताई अचकचाकर उठ बैठतीं। लाड़ से मिट्ठू को निहारकर आशीष देतीं – “जीते रहो बेटा, जुग जुग जिओ” और मिट्ठू भी बदले में अपनी बुजुर्गी दिखाकर कहते-
खुश रहो! खुश रहो!!
ताई निहाल हो जातीं। वृद्धावस्था का शरीर और उस पर नई गृहस्थी का भार, काम-काज से थककर ताई जब कभी पिंजरे को बगल में रखकर सुस्ताने लगतीं तो अनायास ही मिट्ठू से सवाल कर बैठतीं, “मिट्ठू! अब कैसे कटेगी?” और नौजवान मिट्ठू ताई के बुढ़ापे का सहारा बनकर दम-खम के साथ उन्हें दिलासा देते—
कटेगी! कटेगी!! कटेगी!!!
ताई के थके शरीर में प्राण लौट आते, और तब उस अलस दोपहरी में ताई मिट्ठू को अपनी राम-कहानी सुनाने लगतीं। वैभव और सत्ता के बीते दिनों की गाथा। काल की अतल गहराइयों से झाँकता एक-एक चेहरा ताई को नए-नए प्रसंगों की याद दिला देता – जमींदार साहब का रोबीला चेहरा, उनके उपकारों से दबी प्रजा के अनगिनत चेहरे, वे हाथी, वे घोड़े, वे खेल-तमाशे, वे ब्याह-शादियाँ, तीज-त्योहार, जन्म और मृत्यु – पर्व, वे भोज, वे दावतें, जमींदार साहब के दरबार की रौनक, उनकी गुणग्राहकता, उनकी तुनकमिजाजी, उनका गुस्सा, उनके इशारे पर मर मिटने वाले लोग… ताई घंटों तक मिट्ठू को अपनी जीवन-गाथा सुनाती रहतीं और वह अपनी गर्दन टेढ़ी कर कभी धैर्यवान श्रोता बना रहता और कभी अपनी समझ के अनुसार बीच-बीच में कुछ टीका-टिप्पणी कर देता।
ऐसा नहीं कि ताई और मिट्ठू का संवाद हमेशा प्रेमपूर्ण ही रहता हो, कभी-कभी ताई थकी-माँदी लेटी होतीं और अपनी किसी जिद को मनवाने के लिए मिट्ठू पिंजड़े में तूफान खड़ा कर देते। पानी और दाने की कटोरियों को जान-बूझकर उलटा देते, तो खीझकर ताई कोसतीं, “मेरी जान खाने को आ गया है, मर जा!” और मिट्ठू भी उतनी ही खीझ के साथ हमला बोल देते, “मर जा! मर जा! मर जा!” फिर मान-मनौवल का दौर चलता और ताई और मिट्ठू की दुनिया पहले की तरह प्रेम से चलने लगती।
ताई को घड़ी-भर के लिए भी मिट्ठू का वियोग सहन नहीं हो सकता था। कभी-कभार गाँव में थोड़ी देर के लिए भी न्यौते – बुलावे में जातीं, तो दस बार खिड़की-दरवाजों की साँकलें टोहकर देखतीं, कंजूस के धन की तरह मिट्ठू को छिपाकर रखतीं और जल्दी लौट आने का दिलासा देकर देहरी से पाँव बाहर निकालतीं। लेकिन एक संयोग आ पड़ा कि ताई धर्म-संकट में पड़ गईं। इस लोक में ताई ने बहुत ऊँच-नीच देख लिए थे, अब कभी – कभी परलोक की चिंता भी मन में घर कर जाती। गाँव के कई लोग कुंभ – स्नान के लिए प्रयागराज जा रहे थे, अच्छा साथ बन रहा था। प्रयाग में कुंभ-स्नान का लोभ जहाँ उन्हें अपनी ओर खींच रहा था, वहीं मिट्ठू की चिंता अपनी ओर खींच रही थी। हँसी-हँसी में किसी ने सलाह दी, “ताई, मिट्ठू को भी साथ ले चलो, उसे भी गंगा स्नान करा देना।” किसी दूसरे ने टोक दिया कि रेलगाड़ी में उसका भी टिकट लगेगा, आखिर वह भी तो बोलता-बतियाता प्राणी है। ताई पशोपेश में पड़ गईं। टिकट का पैसा भी वह मिट्ठू की खातिर खर्च कर देतीं लेकिन मेले-ठेले, भीड़-भाड़ में उसकी सुरक्षा के बारे में उन्हें पूरा भरोसा नहीं था, अंत में जगन मास्टर की घरवाली ने उनकी चिंता दूर कर दी। वह ताई के लौटने तक मिट्ठू को अपने पास रखने के लिए सहमत हो गई थी। विदा के दिन ताई की आँसुओं की धार रुके नहीं रुकती थी। बार-बार वह मिट्ठू को पुचकारतीं, जल्दी लौट आने का दिलासा देतीं। मिट्ठू भी उनकी बातों के उत्तर में ‘हर हर गंगे’, ‘राम राम सीताराम’ कहकर उन्हें भरोसा देते रहे कि वह जगन मास्टर की घरवाली के साथ प्रेम से रह लेंगे।
ताई तो कुंभ-स्नान के लिए चल दीं। लेकिन जगन मास्टर के घर में महाकुंभ हो गया। अपने पति से सलाह लिए बिना मास्टराइन ने ताई का भार अपना लिया था। जगन मास्टर दूसरे मिजाज के आदमी थे। उन्होंने अपने कुछ नियम-सिद्धांत बना रखे थे और भरसक कोशिश करते थे कि उनके कारण किसी को कोई कष्ट न पहुँचे। स्वतंत्र विचारों के आदमी थे। दूसरों की स्वतंत्रता पर बाधा नहीं डालना चाहते थे। पिंजड़े में बंद मिट्ठू को देखकर उन्हें बेचैनी होने लगती। जब-जब मिट्ठू को देखते, अपनी पत्नी की बुद्धि पर तरस खाते और अपने आप को भी दोषी अनुभव करते।
जगन मास्टर के लिए जब मिट्ठू की यातना असह्य हो गई, तो उन्होंने एक दिन कमरा बंदकर मिट्ठू के पिंजरे को जमीन पर रखा और उसका दरवाजा खोल दिया, ताकि उसे कुछ कुछ देर के लिए ही सही, खुली हवा में आने का मौका देकर अपने पाप का थोड़ा प्रायश्चित कर लें। मिट्टू अब पिंजरे में रहने के इतने आदी हो चुके थे कि उन्होंने बाहर आने की कोई इच्छा नहीं प्रकट की। जगन मास्टर भी अपनी धुन के पक्के थे। निकट ही अनाज का थैला पड़ा हुआ था। उन्होंने मुट्ठी में थोड़ा अनाज लेकर पिंजरे के दरवाजे से लेकर बाहर तक बिखेर दिया और स्वयं अलग हटकर उसे देखते रहे। मिट्ठू धीरे-धीरे दाना चुगते हुए बाहर आ गए तो जगन मास्टर ने संतोष की साँस ली। मिट्टू फिर पिंजरे की छत पर बैठ गए। एक दो घंटे बाद जगन मास्टर ने उन्हें पकड़कर फिर पिंजरे में बंद कर दिया और चैन की साँस लेकर पिंजरे को बरामदे में टाँग दिया।
अब जगन मास्टर हर रोज कमरा बंद करते। मिट्ठू को बाहर आने का आमंत्रण देते और उनकी आजादी का सुख स्वयं भोगते। यह क्रम तीन-चार दिन तक चला ही था कि एक दिन मिट्टू की नजर ऊपर खुले रोशनदान पर पड़ गई और सहज कौतूहलवश वह पिंजरे की छत से तिरछी आँख अपने लक्ष्य की ओर देखकर रोशनदान पर पहुँच लिए। जगन मास्टर का ध्यान अचानक ‘गीता-रहस्य’ से हटकर मिट्टू के पंखों की फड़फड़ाहट पर गया, फिर रोशनदान पर बैठे मिट्ठू पर। जगन मास्टर हाथ में अनाज लेकर ‘आ-आ’ की गुहार लगा ही रहे थे कि मिट्ठू ने फिर तिरछी आँख से रोशनदान के बाहर की दुनिया की ओर देखा और ये गए! वो गए!! अकेले मिट्ठू क्या उड़े, आदर्शवादी जगन मास्टर के हाथों के सभी तोते उड़ गए। ढीली धोती को दोनों हाथों से सँभालते हुए वह बाग में एक पेड़ से दूसरे पेड़ के पास, ‘मिट्ठू आ! मिट्ठू आ!!’ पुकारते हुए पसीना-पसीना होते रहे और मिट्ठू एक डाल से दूसरी डाल पर, एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर अपने पंख तौलने में मशगूल रहे।
ताई के लौटने का दिन निकट आ रहा था। गाँव में सभी के मन में इस अनहोनी घटना ने एक गहरी आशंका को जन्म दे दिया था। ताई के तेज स्वभाव के अतिरिक्त मिट्ठू के प्रति उनके लगाव को सभी जानते थे और लौटकर मिट्ठू को न पाने पर उनकी क्या दशा हो सकती है, इसका अनुमान वे भली-भाँति लगा सकते थे। बहुत सोच-विचार के बाद आखिर गनपत ने ही एक सुझाव दिया कि मिट्टू की ही सूरत – शक्ल का एक दूसरा तोता ले आया जाए, ताकि ताई को भ्रम में रखा जा सके और दूसरे दिन सच ही वह तोता लेकर हाजिर हो गया।
अब जगन मास्टर की जिंदगी का एक नया दौर शुरू हुआ। वह तोते को पिंजरे में रखकर पाठ पढ़ाने लगे, ताकि ताई के आने तक वह भी दो अक्षर सीख ले। यह एक संयोग ही है कि जगन मास्टर ने अंतिम दिन ताई के मिट्ठू को गीता के दो-चार श्लोक रटाने की कल्पना की थी, ताकि गंगा-स्नान का पुण्य अर्जन कर लौटी हुई ताई अपने मिट्टू के मुँह से गीता सुन सकें, लेकिन वह अनहोनी हो गई और अब जगन मास्टर अपनी फिक्र के मारे खाना-पीना छोड़कर घंटों पिंजरे के सामने बैठकर रटते-
मिट्ठू, राम राम
सीताराम सीताराम
हर गंगे, हर गंगे
राम राम, सीताराम
बोलते-बोलते उनका गला सूख जाता, मास्टराइन भोजन ठंडा होने की शिकायत करतीं, तो आग्नेय दृष्टि से उनकी ओर देखकर पानी पीकर फिर दुहराते
राम राम
सीताराम, हर गंगे…
फिर खीझकर कहते — मर जा! मर जा!!
पर वह पिंजरे के अंदर से टुकुर-टुकुर उन्हें देखता रहता या शायद उनकी बेवकूफी पर हँसता रहता हो।
कुंभ-स्नान से लौटकर सभी तीर्थयात्री अपने-अपने घरों की ओर चल दिए लेकिन ताई सीधे बड़े घर की ओर न जाकर जगन मास्टर के दरवाजे पहुँचीं। ताई सोच रही थीं कि उन्हें देखते ही मिट्ठू ‘राम राम सीताराम’ की रट लगाकर आसमान सिर पर उठा लेगा, पिंजड़े में कूद-फाँद मचाकर तूफान खड़ा कर देगा, लेकिन वहाँ बैठे एवजी मिट्ठू ने उन्हें देखकर कोई हरकत नहीं की, वह केवल इधर-उधर ताकता रहा।
ताई अपने मिट्ठू को गुहार कर थक गईं लेकिन उनके सूनेपन का साथी न जाने किन अमराइयों में घूम रहा होगा।
संवादहीन – पात्र परिचय
- ताई (मुख्य पात्र)
परिचय – गाँव के एक बड़े ‘हवेली’ जैसे घर की बुजुर्ग स्वामिनी।
स्थिति – कभी भरे-पूरे वैभवशाली परिवार की मुखिया थीं, लेकिन अब अकेली और उपेक्षित हैं।
विशेषताएँ – ममतामयी – अपनी सारी ममता मिट्ठू (तोते) पर न्योछावर कर देती हैं।
संवेदनशील – वे अकेलेपन से डरती हैं और बीते दिनों की स्मृतियों में जीती हैं।
धार्मिक – परलोक की चिंता में कुंभ-स्नान के लिए प्रयागराज जाती हैं।
- मिट्ठू (पहाड़ी तोता)
परिचय – ताई के सूनेपन का एकमात्र साथी।
विशेषताएँ – कुशाग्र बुद्धि – वह ताई की बातों को हू-ब-हू दोहराता है और समय पर सटीक उत्तर देता है।
आत्मीय – वह ताई के लिए पक्षी से बढ़कर एक बेटे या पोते जैसा है, जो उन्हें दिलासा देता है।
स्वतंत्रता प्रेमी – मौका मिलते ही वह खुले आकाश की ओर उड़ जाता है, जो उसकी मूल प्रवृत्ति है।
- जगन मास्टर
परिचय – ताई के पड़ोसी और एक आदर्शवादी शिक्षक।
विशेषताएँ – स्वतंत्र विचारों वाले – वे किसी भी जीव को कैद में रखना पाप समझते हैं।
सिद्धांतवादी – अपनी पत्नी की नाराज़गी सहकर भी मिट्ठू को आज़ाद करने का प्रयास करते हैं।
संवेदनशील – मिट्ठू के उड़ जाने पर ग्लानि महसूस करते हैं और ताई के लौटने के डर से उसे ढूँढने के लिए बेचैन रहते हैं।
- मास्टराइन (जगन मास्टर की घरवाली)
परिचय – जगन मास्टर की पत्नी।
विशेषताएँ – व्यावहारिक – वे ताई की चिंता दूर करने के लिए मिट्ठू को अपने पास रखने की जिम्मेदारी लेती हैं।
मददगार – हालाँकि पति से अनबन होती है, फिर भी वे ताई के प्रति सहानुभूति रखती हैं।
- गनपत
परिचय – गाँव का एक व्यक्ति जो ताई का शुभचिंतक है।
भूमिका – वही ताई के लिए पहला मिट्ठू लाया था और बाद में मिट्ठू के उड़ जाने पर ताई को सदमे से बचाने के लिए ‘एवजी’ (दूसरा) तोता लाने का सुझाव भी उसी ने दिया।
- एवजी मिट्ठू (नया तोता)
परिचय – असली मिट्ठू के उड़ जाने के बाद लाया गया दूसरा तोता।
विशेषता – वह केवल शारीरिक रूप से मिट्ठू जैसा है, लेकिन उसमें वह ‘संवाद’ और ‘आत्मीयता’ नहीं है, जिसके कारण अंत में ताई का जीवन फिर से ‘संवादहीन’ हो जाता है।
पाठ का सारांश
- ताई का एकाकी जीवन और मिट्ठू का आगमन
गाँव के एक बड़े और पुराने खंडहरनुमा घर में ताई अकेली रहती थीं। कभी उनके घर में नौकर-चाकर, बहू-बेटे और भरा-पूरा परिवार था, लेकिन समय के साथ सब बिखर गया। बेटे शहर जा बसे और ताई अपने अकेलेपन से जूझने लगीं। इस सूनेपन को दूर करने के लिए गनपत नामक व्यक्ति एक पहाड़ी तोता ले आया। ताई ने अपनी सारी ममता उस मिट्ठू पर उड़ेल दी।
- ताई और मिट्ठू का अनूठा संवाद
मिट्ठू बहुत कुशाग्र बुद्धि का था। वह ताई द्वारा सिखाए गए शब्द जैसे ‘राम-राम’, ‘हर-हर गंगे’ और ‘सीताराम’ न केवल दोहराता था, बल्कि ताई के सवालों का सटीक जवाब भी देता था। जब थकी-हारी ताई पूछतीं, “अब कैसे कटेगी?”, तो मिट्ठू दिलासा देता, “कटेगी! कटेगी!”। ताई घंटों उसे अपने बीते वैभव की कहानियाँ सुनातीं और मिट्ठू एक धैर्यवान श्रोता की तरह सुनता। कभी-कभी दोनों में नोक-झोंक भी होती, पर जल्द ही सुलह हो जाती।
- कुंभ-स्नान और मिट्ठू की विदाई
गाँव के लोग कुंभ-स्नान के लिए प्रयागराज जा रहे थे। ताई भी परलोक सुधारने के लिए जाना चाहती थीं, लेकिन उन्हें मिट्ठू की चिंता थी। अंत में, जगन मास्टर की पत्नी ने ताई के लौटने तक मिट्ठू को सँभालने की जिम्मेदारी ली। ताई भारी मन से मिट्ठू को उनके पास छोड़कर तीर्थ यात्रा पर चली गईं।
- जगन मास्टर का आदर्श और अनहोनी
जगन मास्टर स्वतंत्र विचारों के व्यक्ति थे। उन्हें पिंजरे में बंद पक्षी को देखकर ग्लानि होती थी। एक दिन उन्होंने प्रायश्चित करने के लिए कमरे का दरवाजा बंद कर मिट्ठू को पिंजरे से बाहर निकाला। कुछ दिनों तक सब ठीक रहा, लेकिन एक दिन मिट्ठू खुले रोशनदान से उड़ गया। जगन मास्टर ने उसे बहुत ढूँढा, पर मिट्ठू वापस नहीं आया।
- नया तोता और जगन मास्टर की कोशिश
ताई के लौटने का समय नजदीक था। ताई के गुस्से और लगाव को देखते हुए गनपत ने मिट्ठू जैसा ही एक दूसरा तोता लाकर पिंजरे में डाल दिया। अब जगन मास्टर की कठिन परीक्षा शुरू हुई। वे दिन-रात उस नए तोते को ‘राम-राम’ और ‘सीताराम’ रटाने लगे ताकि ताई को शक न हो। लेकिन नया तोता बिल्कुल गूंगा बना रहा।
- मर्मस्पर्शी अंत
जब ताई कुंभ-स्नान से लौटीं, तो वे सीधे जगन मास्टर के घर पहुँचीं। उन्हें उम्मीद थी कि मिट्ठू उन्हें देखते ही शोर मचा देगा और उनका स्वागत करेगा। लेकिन पिंजरे में बैठा नया तोता बिल्कुल शांत था। ताई उसे पुकारती रहीं, पर वह केवल टुकुर-टुकुर ताकता रहा। ताई के सूनेपन का असली साथी आज़ाद हो चुका था और ताई फिर से संवादहीनता के घेरे में खड़ी रह गईं।
मुख्य भाव – यह कहानी वृद्धावस्था के अकेलेपन, मनुष्य और पशु के बीच के मर्मस्पर्शी लगाव और आज़ादी की मूल प्रवृत्ति को दर्शाती है।
संवादहीन – मूल संवेदना
कहानी ‘संवादहीन’ आधुनिक समाज की एक बहुत ही गहरी और मर्मस्पर्शी समस्या को उजागर करती है। इसकी मूल संवेदना को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है –
- वृद्धावस्था का अकेलापन
कहानी की सबसे प्रमुख संवेदना बुजुर्गों का अकेलापन है। ताई एक भरे-पूरे परिवार की स्वामिनी थीं, लेकिन समय के साथ उनके बहू-बेटे शहर जाकर बस गए। यह आज के ‘नक्शेकदम’ पर चलते समाज का यथार्थ है, जहाँ भौतिक सुखों की तलाश में युवा पीढ़ी अपने बुजुर्गों को गाँव के सूने घरों में छोड़ देती है। ताई के लिए पेट की भूख बड़ी नहीं थी, बल्कि घर की ‘भाँय-भाँय’ यानी सन्नाटा सबसे बड़ा दुख था।
- संवाद की महत्ता
कहानी का शीर्षक ‘संवादहीन’ ही इसकी आत्मा को स्पष्ट करता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसे जीवित रहने के लिए ‘संवाद’ अर्थात् बातचीत की आवश्यकता होती है। जब ताई के पास कोई मनुष्य नहीं रहा, तो एक तोता उनका साथी बना। वह तोता सिर्फ एक पक्षी नहीं था, बल्कि ताई के लिए एक श्रोता और सलाहकार था। कहानी यह संदेश देती है कि संवाद के बिना जीवन केवल एक ‘खंडहर’ के समान है।
- पशु-पक्षी और मानवीय संवेदना
लेखक ने यह दिखाया है कि संवेदनाएँ केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं हैं। ताई की सारी ममता मिट्ठू पर बरसती है और मिट्ठू भी उनके सुख-दुख का साथी बनता है। पशु-पक्षी भी प्यार और अपनेपन की भाषा समझते हैं। ताई का मिट्ठू के लिए नियम से खाना बनाना और मिट्ठू का ताई को दिलासा देना “कटेगी! कटेगी!” इस भावनात्मक जुड़ाव का बेहतरीन उदाहरण है।
- स्वतंत्रता की मूल प्रवृत्ति
जगन मास्टर के माध्यम से कहानी एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष को छूती है—’स्वतंत्रता’। जगन मास्टर मानते हैं कि किसी भी जीव को पिंजरे में रखना अनैतिक है। मिट्ठू का अंत में रोशनदान से उड़ जाना यह सिद्ध करता है कि चाहे पिंजरे में कितनी भी सुख-सुविधाएँ क्यों न हों, आज़ादी की चाहत हर जीव में सर्वोपरि होती है।
- यांत्रिकता बनाम आत्मीयता
कहानी के अंत में जब असली मिट्ठू की जगह एक ‘एवजी’ (Substitute) तोता लाया जाता है, तो वह ताई के साथ संवाद नहीं कर पाता। यहाँ लेखक यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि रिश्तों और भावनाओं का कोई विकल्प नहीं होता। शक्ल मिलने से रिश्ता नहीं बनता, रिश्ता आत्मीयता और वर्षों के साथ से बनता है। अंत में ताई का वह सन्नाटा और गहरा हो जाता है क्योंकि उनके पास ‘तोता’ तो है, पर ‘संवाद’ नहीं।
निष्कर्ष – ‘संवादहीन’ कहानी हमें अपने घर के बुजुर्गों के प्रति संवेदनशील होने और जीवन में मशीनी व्यवस्था के बजाय मानवीय संवाद को महत्त्व देने की प्रेरणा देती है।
अभ्यास
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
- कहानी में ताई और मिट्ठू का संबंध किस भाव को दर्शाता है?
(क) परोपकार और त्याग
(ख) ममता और स्नेह
(ग) करुणा और क्रोध
(घ) जिज्ञासा और सहायता
उत्तर – (ख) ममता और स्नेह
ताई का मिट्ठू के लिए नियम से खाना बनाना और उसे अपनी जीवन-गाथा सुनाना उनके बीच के गहरे ममत्व और भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाता है।
- जगन मास्टर द्वारा मिट्ठू को पिंजरे से बाहर निकालना किस भावना या मूल्य का संकेत देता है?
(क) अनुशासन और परंपरा
(ख) उदासीनता और असावधानी
(ग) आत्मगौरव और विद्रोह
(घ) करुणा और नैतिकता
उत्तर – (घ) करुणा और नैतिकता
जगन मास्टर को पिंजरे में बंद पक्षी को देखकर ग्लानि होती थी। उनका मानना था कि किसी की स्वतंत्रता छीनना अनैतिक है, इसलिए उन्होंने दयावश उसे आज़ाद किया।
- मिट्ठू का उड़ जाना किस विचार को प्रस्तुत करता है?
(क) भोजन की खोज
(ख) प्रेम की आकांक्षा
(ग) स्वतंत्रता की चाह
(घ) पक्षियों में सम्मान की प्रवृत्ति
उत्तर – (ग) स्वतंत्रता की चाह
पक्षी का स्वभाव ही खुले आकाश में उड़ना है। पिंजरे की सुख-सुविधाओं के बावजूद जैसे ही मिट्ठू को अवसर मिला, उसने आज़ादी को ही चुना।
- ताई के जीवन के दुख का मुख्य कारण क्या था?
(क) सम्मान और प्रतिष्ठा में कमी आना
(ख) परिवार से दूरी और संवाद का अभाव
(ग) आर्थिक विपन्नता और निर्धनता
(घ) मिट्ठू के प्रति प्रेम और संवाद
उत्तर – (ख) परिवार से दूरी और संवाद का अभाव
ताई के पास वैभव की कमी नहीं थी, लेकिन उनके बच्चे उन्हें छोड़कर शहर जा चुके थे। घर का खालीपन और बात करने वाले किसी साथी का न होना उनके दुख का मूल कारण था।
- कहानी में मानव समाज में व्याप्त किस विसंगति को उजागर किया गया है?
(क) मजबूरी
(ख) कर्मपरायणता
(ग) अकेलापन
(घ) संवादधर्मिता
उत्तर – (ग) अकेलापन
यह कहानी आधुनिक समाज में बुजुर्गों के एकाकीपन और उनके अपनों से बिछड़ जाने की विडंबना को प्रमुखता से उठाती है।
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-
- “भगवान! कैसे नैया पार लगेगी?” ताई इस वाक्य में किस ‘नैया’ की बात कर रही हैं? वे यह बात क्यों कह रही हैं?
उत्तर – यहाँ ‘नैया’ का अर्थ जीवन रूपी नैया है। ताई वृद्धावस्था में अपने अकेलेपन और परिवार के अभाव के कारण चिंतित हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि शेष जीवन का समय और बुढ़ापा किसके सहारे और कैसे व्यतीत होगा।
- “धीरे – धीरे सब पराए हाथ में चला गया।” इस वाक्य में किस घटना की ओर संकेत किया गया है?
उत्तर – इस वाक्य का संकेत ताई के पारिवारिक वैभव और संपत्ति के विनाश की ओर है। बहू-बेटों के शहर जाने और देख-रेख करने वाला कोई न होने के कारण उनकी खेती-बाड़ी और कारोबार धीरे-धीरे दूसरों के नियंत्रण में चला गया।
- ” ताई की सारी ममता मिट्ठू पर बरस पड़ी।” क्यों?
उत्तर – ताई का परिवार उनसे दूर था। मनुष्य को प्रेम करने के लिए कोई आधार चाहिए होता है। मिट्ठू के आने से ताई को एक ऐसा साथी मिला जो उनकी बातें सुनता और जवाब देता था, इसलिए उनकी सारी ममता उस पर केंद्रित हो गई।
- “अब ताई को इस बात की पूरी जानकारी रहने लगी थी कि किसके खेत में हरी मिर्चें तैयार हो गई हैं और किस पेड़ में फसल के आखिरी अमरूद बचे हैं।” इस वाक्य द्वारा ताई के व्यक्तित्व में आए परिवर्तनों के विषय में क्या-क्या पता चलता है?
उत्तर – इससे पता चलता है कि ताई अब सक्रिय और जागरूक हो गई थीं। जो ताई पहले अपने लिए खाना बनाने में भी आलस्य करती थीं, वे अब मिट्ठू के लिए मिर्च और अमरूद की खोज में गाँव भर की जानकारी रखने लगीं। यह दर्शाता है कि किसी दूसरे के प्रति प्रेम हमें कर्मशील बना देता है।
- “जगन मास्टर दूसरे मिजाज के आदमी थे।” जगन मास्टर का व्यक्तित्व कैसा था? कहानी में से उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – वे आदर्शवादी, स्वतंत्र विचारों वाले और संवेदनशील व्यक्ति थे। उदाहरण के लिए, उन्हें पिंजरे में बंद पक्षी को देखना ‘पाप’ और ‘यातना’ जैसा लगता था। वे सिद्धांतों के पक्के थे, इसीलिए उन्होंने अपनी पत्नी की नाराजगी मोल लेकर भी मिट्ठू को बाहर निकाला।
- कहानी का शीर्षक ‘संवादहीन’ किसके लिए सबसे अधिक सार्थक प्रतीत होता है— ताई, जगन मास्टर, मिट्ठू या नया तोता? कारण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – यह शीर्षक नया तोता और ताई के लिए सबसे सार्थक है। पुराना मिट्ठू ताई से ‘संवाद’ करता था, लेकिन नया तोता बिल्कुल संवादहीन है। यह ताई के जीवन में फिर से लौट आए उस सन्नाटे को दर्शाता है जहाँ अब कोई उनकी बातों का जवाब देने वाला नहीं है।
- “अब ये ही दो प्राणी गाँव के बीच में स्थित बड़े घर के उस सूने खंडहर में एक-दूसरे को सहारा देने के लिए रह गए थे।” ताई के बड़े से घर को सूना खंडहर क्यों कहा गया होगा?
उत्तर – ताई का घर भौतिक रूप से बड़ा था, लेकिन उसमें हँसी-खुशी, हलचल और परिवार के सदस्यों का अभाव था। जिस घर में मानवीय संवेदनाएँ और आपसी संवाद खत्म हो जाता है, वह केवल ईंट-पत्थरों का ढाँचा यानी खंडहर बन जाता है।
मेरे प्रश्न
नीचे कुछ उत्तर और उनके दो-दो प्रश्न दिए गए हैं। पहचानिए कि इनमें से कौन-सा प्रश्न उस उत्तर के लिए उपयुक्त है?
- उत्तर – ताई के अकेलेपन को मिट्ठू ने सहारा दिया।
प्रश्न क – ताई के सूनेपन को किसने सहारा दिया था?
प्रश्न ख – तांई को मिट्ठू किसने भेंट में दिया था?
उत्तर – प्रश्न क – ताई के सूनेपन को किसने सहारा दिया था?
- उत्तर – ताई के लौटने से पहले मिट्ठू उड़ गया था।
प्रश्न – ताई के लौटने के बाद मिट्ठू कहाँ चला गया था?
प्रश्न ख – ताई के प्रयागराज से लौटने से पहले क्या अनहोनी हुई?
उत्तर – प्रश्न ख – ताई के प्रयागराज से लौटने से पहले क्या अनहोनी हुई?
- उत्तर – गाँववालों को डर था कि ताई को सच्चाई जानकर सदमा लगेगा।
प्रश्न – गाँववाले ताई की वापसी से क्यों चिंतित थे?
प्रश्न ख – गाँववाले मिट्टू के उड़ने से खुश क्यों थे?
उत्तर – प्रश्न – गाँववाले ताई की वापसी से क्यों चिंतित थे?
- उत्तर – कहानी का शीर्षक ‘संवादहीन’ जीवन के मौन का प्रतीक है।
प्रश्न क – कहानी का शीर्षक ‘संवादहीन’ क्यों उपयुक्त नहीं है?
प्रश्न ख – शीर्षक ‘संवादहीन’ का क्या भावार्थ है?
उत्तर – प्रश्न ख – शीर्षक ‘संवादहीन’ का क्या भावार्थ है?
मेरे अनुभव मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपने अनुभवों के आधार पर दीजिए—
- “कभी-कभार गाँव में थोड़ी देर के लिए भी न्यौते – बुलावे में जातीं, तो दस बार खिड़की-दरवाजों की साँकलें टोहकर देखतीं…” ताई की तरह जब आप अपने घर या परिवार दूर होते हैं, तो किसी वस्तु या व्यक्ति की चिंता आपको भीतर से कैसे परेशान करती है?
उत्तर – जब मैं घर से दूर होता हूँ, तो अक्सर छोटी-छोटी बातों की चिंता सताती है जैसे- क्या मैंने लाइट या फैन बंद की थी? या घर के बुजुर्गों ने समय पर दवा ली होगी? यह चिंता ताई की तरह मुझे मानसिक रूप से अस्थिर कर देती है, जिससे हम बाहर होते हुए भी मन से घर पर ही रहते हैं।
- “आखिर वह भी तो बोलता – बतियाता प्राणी है।” क्या आप मानते हैं कि पशु-पक्षियों में भी संवेदनाएँ होती हैं? अपने किसी अनुभव का वर्णन करते हुए लिखिए।
उत्तर – हाँ, मैं पूरी तरह मानता हूँ कि पशु-पक्षियों में गहरी संवेदनाएँ होती हैं।
मेरे पड़ोस में एक कुत्ता था जिसका मालिक बीमार होकर अस्पताल चला गया। वह कुत्ता कई दिनों तक उनके दरवाजे पर बैठा रहा और खाना पीना छोड़ दिया। जब मालिक ठीक होकर लौटे, तो उसकी आँखों में जो खुशी और उछल-कूद थी, वह किसी भी मनुष्य की भावनाओं से कम नहीं थी।
- “गनपत ने ही एक सुझाव दिया कि मिट्ठू की ही सूरत – शक्ल का एक दूसरा तोता ले आया जाए ताकि ताई को भ्रम में रखा जा सके…” ताई को भ्रम में रखना उचित था या नहीं? तर्क सहित अपने विचार लिखिए।
उत्तर – मेरी राय में, ताई को भ्रम में रखना अनुचित था। यद्यपि गनपत और गाँववालों का इरादा नेक था कि वे ताई को दुख से बचाना चाहते थे लेकिन सत्य को छिपाना समाधान नहीं है। ताई का रिश्ता उस तोते के साथ संवाद का था, जो नए तोते से कभी नहीं मिल सका। अंत में ताई को जो अधूरापन महसूस हुआ, वह सच जान लेने से भी अधिक पीड़ादायक था। विश्वास की नींव सदा सच्चाई पर होनी चाहिए।
- “ताई सोच रही थीं कि उन्हें देखते ही मिट्ठू ‘राम राम सीताराम’ की रट लगाकर आसमान सिर पर उठा लेगा।” क्या कभी ऐसा हुआ कि आपने सोचा कुछ और, हुआ कुछ और? उस अनुभव को लिखिए।
उत्तर – मेरे साथ ऐसा कई बार हुआ है। एक बार मैंने अपने मित्र के जन्मदिन पर उसे ‘सरप्राइज’ देने की योजना बनाई और सोचा कि वह बहुत खुश होगा। लेकिन जब मैं पहुँचा, तो पता चला कि वह बीमार है और शोर-शराबे से परेशान हो रहा है। मेरा उत्साह अचानक चिंता में बदल गया। जीवन अक्सर हमारी योजनाओं से अलग परिणाम देता है।
- “मिट्ठू अब पिंजरे में रहने के इतने आदी हो चुके थे कि उन्होंने बाहर आने की कोई इच्छा नहीं प्रकट की।” क्या प्राणी सचमुच पिंजरे में रहने के आदी हो सकते हैं? अपने उत्तर के समर्थन में अपने आस-पास से उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर – हाँ, प्राणी पिंजरे की सुविधाओं के आदी हो जाते हैं, लेकिन इसे ‘खुशी’ नहीं कहा जा सकता। हमारे आस-पास ऐसे कई लोग पालतू पक्षी रखते हैं जो अगर पिंजरा खुला छोड़ दें, तो भी नहीं उड़ते क्योंकि वे बाहर की दुनिया के खतरों से डरने लगते हैं और आत्मनिर्भरता खो देते हैं। यह उनकी सुरक्षा की आदत है, आज़ादी की इच्छा का मर जाना नहीं।
विधा से संवाद
कहानी का सौंदर्य
संवादहीन कहानी में अनेक विशेष बिंदु हैं जो इसे प्रभावपूर्ण बनाते हैं। नीचे कहानी के कुछ विशेष बिंदु और उनके उदाहरण दिए गए हैं। आप भी कहानी से इसी प्रकार के एक-एक उदाहरण खोजकर लिखिए-
विशेष बिंदु,कहानी से उदाहरण
- आत्मीयता और लगाव – ताई की सारी ममता मिट्ठू पर बरस पड़ी। वह रात-दिन मिट्ठू को लेकर ही बेचैन रहने लगीं।
- अकेलापन और सूनापन – पेट की समस्या उनके लिए कभी समस्या नहीं रही, पर सूने घर की भाँय-भाँय जैसे उन्हें काटने को दौड़ती थी।
- पक्षी के प्रति मानवीय संवेदना – जो ताई अपनी खातिर चूल्हा जलाने में आलस्य कर जाती थीं, वही अब नियमपूर्वक मिट्ठू के लिए दाल-भात बनातीं।
- स्वतंत्रता की चेतना – जब जगन मास्टर के लिए मिट्ठू की यातना असह्य हो गई, तो उन्होंने एक दिन कमरा बंदकर मिट्ठू के पिंजरे को जमीन पर रखा और उसका दरवाजा खोल दिया।
- संवाद और प्रत्युत्तर – ताई अचकचाकर उठ बैठतीं। लाड़ से मिट्ठू को निहारकर आशीष देतीं– ‘जीते रहो बेटा, जुग जुग जिओ’ और मिट्ठू भी बदले में कहता- ‘खुश रहो! खुश रहो!’
- अतीत की स्मृतियाँ – उस अलस दोपहरी में ताई मिट्ठू को अपनी राम-कहानी सुनाने लगतीं। वैभव और सत्ता के बीते दिनों की गाथा।
- मनोवैज्ञानिक द्वंद्व – ताई पशोपेश में पड़ गईं। टिकट का पैसा भी वह मिट्ठू की खातिर खर्च कर देतीं लेकिन मेले-ठेले, भीड़-भाड़ में उसकी सुरक्षा के बारे में उन्हें पूरा भरोसा नहीं था।
- व्यंग्य और विडंबना – अकेले मिट्ठू क्या उड़े, आदर्शवादी जगन मास्टर के हाथों के सभी तोते उड़ गए।
कहानी का अंत
किसी कहानी का अंत अनेक प्रकार से हो सकता है जैसे—
- सुखांत – जब कहानी का अंत प्रसन्नता, सफलता से होता है।
- दुखांत – जब कथा का अंत दुख, वियोग, मृत्यु या हानि से होता है।
- मुक्त अंत – जब कहानी स्पष्ट रूप से खत्म नहीं होती, बल्कि सोचने के लिए छोड़ दी जाती है।
- अप्रत्याशित अंत – जब अंत अचानक और अप्रत्याशित रूप से सामने आता है।
- यथार्थवादी अंत – जब कहानी का अंत जीवन की सच्चाई जैसा लगे।
- प्रेरणात्मक अंत – जब कहानी के अंत में कोई प्रेरणा या सकारात्मक सोच दी जाए।
- व्यंग्यात्मक अंत – जब कहानी का अंत व्यंग्य या कटाक्ष से किसी सत्य को प्रकट करता है।
आपके अनुसार ‘संवादहीन’ कहानी के अंत को किस श्रेणी में रखा जा सकता है? अपने उत्तर के कारण भी बताइए। आप इस कहानी का नया अंत किस प्रकार करना चाहेंगे?
कहानी के अंत की श्रेणी
मेरे अनुसार, ‘संवादहीन’ कहानी के अंत को ‘यथार्थवादी’ और ‘दुखांत’ श्रेणियों के मिश्रण में रखा जा सकता है।
कारण –
यथार्थवादी अंत – यह कहानी जीवन की इस कड़वी सच्चाई को दिखाती है कि खोया हुआ समय या प्रिय पक्षी वापस उसी रूप में नहीं लौटता। नया तोता आ जाने के बाद भी ताई का अकेलापन दूर नहीं हुआ, क्योंकि आत्मीयता संवाद से पैदा होती है, केवल शक्ल मिलने से नहीं। यह अंत पाठक को जीवन की वास्तविकता से रूबरू कराता है।
दुखांत अंत – कहानी का अंत ताई की उस संवादहीनता और सन्नाटे पर होता है, जिसे वे प्रयागराज से पुण्य कमाकर आने के बाद खत्म करना चाहती थीं। मिट्ठू का न बोलना ताई के लिए भावनात्मक क्षति है, इसलिए यह एक दुखांत समपन है।
मेरे विचार से कहानी का नया अंत
मैं इस कहानी का अंत ‘प्रेरणात्मक’ और ‘सुखांत’ रूप में करना चाहूँगा, जो कुछ इस प्रकार हो सकता है –
“जब ताई जगन मास्टर के घर पहुँचीं, तो उन्होंने देखा कि पिंजरा खाली है। जगन मास्टर ने ग्लानि और साहस के साथ ताई को सच बता दिया कि मिट्ठू अपनी आज़ादी चुनकर उड़ गया है। ताई पहले तो बहुत रोईं, लेकिन तभी पास के अमरूद के पेड़ पर वही मिट्ठू अपने एक झुंड के साथ बैठा दिखाई दिया। उसे स्वतंत्र और खुश देखकर ताई के मन की ममता जाग उठी। उन्होंने महसूस किया कि उनका ‘तोता’ कैद में रहकर नहीं, बल्कि खुले आकाश में रहकर ‘जुग-जुग जिएगा’। ताई ने जगन मास्टर को माफ़ कर दिया और अब वे रोज़ आँगन में दाना डालतीं, जहाँ मिट्ठू अपने साथियों के साथ आता और दूर से ही कहता— ‘सीताराम! खुश रहो!’ ताई अब अकेलेपन से नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ जुड़कर सुखी थीं।”
इस नए अंत का लाभ – यह अंत ताई को केवल एक पक्षी के ‘मालिक’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘प्रकृति प्रेमी’ के रूप में ऊँचा उठाता है और आज़ादी के महत्त्व को सर्वोपरि रखता है।
विषयों से संवाद
- “अंत में जगन मास्टर की घरवाली ने उनकी चिंता दूर कर दी।”
कहानी में रेखांकित पात्र का नाम नहीं दिया गया है। इसे कहीं ‘मास्टराइन’, तो कहीं ‘जगन मास्टर की घरवाली’ कहा गया है। आपके अनुसार कहानी में ऐसा क्यों किया गया होगा?
उत्तर – कहानी में जगन मास्टर की पत्नी को ‘मास्टराइन’ या ‘जगन मास्टर की घरवाली’ कहना तत्कालीन ग्रामीण परिवेश की वास्तविकता को दर्शाता है। इसके पीछे मुख्य कारण ये हो सकते हैं –
सामाजिक पहचान – पुराने ग्रामीण समाज में अक्सर महिलाओं की अपनी स्वतंत्र पहचान के बजाय उन्हें उनके पति के नाम या व्यवसाय जैसे मास्टर से मास्टराइन नाम से पहचाना जाता था।
सम्मान की रूढ़ि – गाँव में बड़ों की पत्नियों का नाम लेना शिष्टाचार के विरुद्ध माना जाता था।
गौण पात्र – कहानी का केंद्र ताई और मिट्ठू का संवाद है, अतः लेखक ने अन्य पात्रों को उनके संबंधों के आधार पर ही संबोधित किया है।
- गाँव के कई लोग कुंभ-स्नान के लिए प्रयागराज जा रहे थे”
(क) ‘कुंभ-स्नान’ एक सुप्रसिद्ध आयोजन है जिसमें करोड़ों लोग भाग लेते हैं। पता लगाइए-
इसका आयोजन क्यों किया जाता है?
पिछली बार इसका आयोजन कब और कहाँ हुआ था?
अगला आयोजन कब और कहाँ होगा?
(क) आयोजन का कारण – पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश की बूँदें प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक, उज्जैन इन चार स्थानों पर गिरी थीं, वहाँ कुंभ का आयोजन होता है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ स्नान करने से पापों से मुक्ति और मोक्ष मिलता है।
पिछला आयोजन – पिछला पूर्ण कुंभ वर्ष 2021 में हरिद्वार, उत्तराखंड में हुआ था। प्रयागराज में पिछला अर्धकुंभ 2019 में हुआ था।
अगला आयोजन – अगला महाकुंभ वर्ष 2037 में प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) में आयोजित होगा।
(ख) मान लीजिए कि ताई आपके मोहल्ले में रहती हैं। वे कुंभ-स्नान के लिए कैसे गई होंगी? उनकी यात्रा का वर्णन लिखिए। (संकेत- कहाँ से कहाँ तक की यात्रा, टिकट, यात्रा के साधन, संगी-साथी, खान-पान, ठहरना आदि।)
ताई हमारे मोहल्ले से प्रयागराज की यात्रा पर पूरे उत्साह और थोड़ी चिंता के साथ निकली होंगी –
यात्रा का साधन – ताई ने गाँव के स्टेशन से रेलगाड़ी पकड़ी होगी। उनके पास तीसरी श्रेणी का टिकट रहा होगा।
संगी-साथी – वे गाँव के अन्य बुजुर्गों और तीर्थयात्रियों की टोली के साथ ‘हर-हर गंगे’ के जयकारे लगाते हुए गई होंगी।
खान-पान – ताई ने रास्ते के लिए घर से बनी पूड़ियाँ, अचार और सत्तू पोटली में बाँधकर रखे होंगे।
ठहरना – प्रयागराज पहुँचकर वे त्रिवेणी संगम के पास किसी पंडे के डेरे या बड़े तंबू में ठहरी होंगी, जहाँ चारों ओर भजन-कीर्तन का वातावरण रहा होगा।
(ग) आपके गाँव या नगर में कौन-सा मेला, उत्सव या पर्व मनाया जाता है? वहाँ का दृश्य, भीड़, श्रद्धा और वातावरण का वर्णन कीजिए। मेले में कैसी आवाज़ें, रंग, गंध, खान-पान, दृश्य और भाव होंगे? (संकेत- उनका वर्णन पाँच ज्ञानेंद्रियों – देखने, सुनने, सूँघने, छूने और स्वाद महसूस करने के आधार पर कीजिए।)
मेरे नगर में हर वर्ष ‘कार्तिक मेला’ लगता है, जिसका वर्णन कुछ इस प्रकार है –
देखना (दृश्य) – आँखों के सामने रंगों का रेला होता है। लाल-पीले झंडे, बिजली की झिलमिलाती लाइटें और लकड़ी के खिलौनों की सजी हुई दुकानें। आसमान छूते बड़े झूले दूर से ही दिखाई देते हैं।
सुनना (आवाज़ें) – कानों में ढोल-ताशों की आवाज़, भोंपू बजाते बच्चे, फेरीवालों की ऊँची पुकार और मंदिरों से आती घंटियों की गूँज एक अद्भुत शोर पैदा करती है।
सूँघने (गंध) – वातावरण में ताज़ा बन रही जलेबियों की महक, अगरबत्ती की खुशबू और मिट्टी की सौंधी सुगंध मिली होती है।
स्वाद (खान-पान) – मेले का मतलब ही है—गर्मागर्म चाट-पकोड़े, ठंडी कुल्फी और कड़ाही में उबलते दूध का स्वाद, जो जीभ पर बरसों याद रहता है।
छूने (अनुभव) – भीड़ में एक-दूसरे से रगड़ते कंधे, रेतीली जमीन का पैरों तले अहसास और ऊनी कपड़ों की गर्माहट मेले की जीवंतता का अनुभव कराते हैं।
सृजन
- “बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहरों के होकर रह गए।”
अपना घर छोड़कर नए स्थान पर बस जाना आसान नहीं होता है। ताई के बहू-बेटों ने गाँव क्यों छोड़ा होगा? गाँव छोड़ते समय क्या-क्या सोचा होगा? अपना घर छोड़ने के लिए स्वयं को कैसे तैयार किया होगा?
उत्तर – ताई के बहू-बेटों ने गाँव संभवतः बेहतर आजीविका, बच्चों की शिक्षा और आधुनिक सुख-सुविधाओं के लिए छोड़ा होगा। उन्होंने सोचा होगा कि गाँव में खेती-बाड़ी अब घाटे का सौदा है और शहर में प्रगति के अवसर अधिक हैं। उन्होंने भारी मन से स्वयं को समझाया होगा कि ‘भविष्य’ बनाने के लिए ‘मोह’ त्यागना पड़ता है। पुराने घर की यादों को समेटकर उन्होंने अपनी जरूरतों को भावनाओं से ऊपर रखा होगा।
- “वहाँ बैठे एवजी मिट्टू ने उन्हें देखकर कोई हरकत नहीं की”
ताई सोच रही थीं कि मिट्ठू ‘राम राम सीताराम‘ कहेगा, लेकिन एवजी मिट्ठू चुप था। कल्पना कीजिए कि एक दिन असली मिट्ठू वापस आ गया। मिट्ठू ने नए तोते को देखकर क्या कहा होगा? आगे की कहानी लिखिए।
(संकेत – प्रारंभ कीजिए— “एक दिन आकाश में वही हरे पंख चमके…”’)
उत्तर – “एक दिन आकाश में वही हरे पंख चमके…” और मिट्ठू की चिर-परिचित आवाज़ गूँजी— “ताई! राम-राम!” ताई ने आँखें मलीं, उन्हें लगा यह भ्रम है। असली मिट्ठू खिड़की पर आकर बैठा और पिंजरे में सहमे हुए ‘एवजी’ तोते को देखा।
मिट्ठू ने गर्दन टेढ़ी कर नए तोते से कहा— “क्यों भाई, यहाँ दाल-भात का लालच तुम्हें ले आया या मेरी ताई का सूनापन?”
नया तोता मूक बना रहा। मिट्ठू ने ताई की ओर देखा और बोला— “मैं उड़ तो गया था, पर तुम्हारे ‘सीताराम’ की रट मुझे वापस खींच लाई।” ताई ने काँपते हाथों से पिंजरा खोल दिया। नया तोता आज़ाद हो गया और असली मिट्ठू ताई के कंधे पर बैठ गया। अब घर खंडहर नहीं, खुशियों का चमन था।
- “अब ये ही दो प्राणी गाँव के बीच में स्थित बड़े घर के उस सूने खंडहर में एक-दूसरे को सहारा देने के लिए रह गए थे।”
आज घर जाकर अपने किसी बड़े या बुजुर्ग से बात कीजिए। उनसे पूछिए – “आप जब मेरी आयु के थे, तब समय कैसे बिताया करते थे; क्या-क्या बातें या काम करते थे? आदि”। उनके कहे हुए अनुभव अपनी पुस्तिका में लिखिए।
उत्तर – आज मैंने अपनी दादी जी से बात की। उन्होंने बताया कि जब उनकी मेरी उम्र लगभग 14-15 की थीं –
समय बिताना – वे आज की तरह मोबाइल या टीवी पर नहीं, बल्कि सहेलियों के साथ ‘गिट्टे’ और ‘खो-खो’ खेलकर समय बिताती थीं।
काम – स्कूल से लौटकर वे कुएँ से पानी लाने या रुई कातने में अपनी माँ की मदद करती थीं।
बातें – शाम को नीम के पेड़ के नीचे बैठकर पूरा परिवार एक-दूसरे से दिन भर की बातें साझा करता था। ‘संवादहीनता’ तब शब्दकोश में भी नहीं थी।
- “मिट्ठू ने फिर तिरछी आँख से रोशनदान के बाहर की दुनिया की ओर देखा और ये गए! वो गए!!”
मान लीजिए कि जगन मास्टर ने मिट्ठू की खोज के लिए एक विज्ञापन प्रकाशित किया है। अपनी कल्पना से वह विज्ञापन बनाइए।
(संकेत- आप समाचार पत्रों में प्रकाशित खोया-पाया या तलाश संबंधी विज्ञापन देख सकते हैं।)
उत्तर – तलाश – हमारा प्यारा मिट्ठू
विवरण – एक पहाड़ी तोता, रंग गहरा हरा, गले में लाल कंठी।
पहचान – वह ‘हर-हर गंगे’ और ‘सीताराम’ बहुत स्पष्ट बोलता है।
कब खोया – 15 अप्रैल को जगन मास्टर के निवास, पुरानी हवेली के पास से उड़ गया।
इनाम – जो सज्जन इस तोते को सही-सलामत वापस लाएंगे, उन्हें उचित पुरस्कार और ताई का आशीर्वाद दिया जाएगा।
संपर्क – जगन मास्टर, प्राइमरी स्कूल के पास, सोनपुर गाँव।
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
पाठ में से चुनकर कुछ शब्द-युग्म नीचे दिए गए हैं। उनका अर्थ स्पष्ट करते हुए वाक्य वाक्य में प्रयोग कीजिए-
वक्त-बेवक्त, नियम- सिद्धांत, शादी-ब्याह, तीज-त्योहार
वक्त-बेवक्त – समय-असमय या ज़रूरत पड़ने पर। – ताई वक्त-बेवक्त के तकाजों के लिए मिट्ठू के वास्ते रोटी बचाकर रखती थीं।
नियम-सिद्धांत – अनुशासन और जीवन के मूल्य। – जगन मास्टर अपने नियम-सिद्धांतों के पक्के थे और किसी पक्षी को कैद में नहीं देख सकते थे।
शादी-ब्याह – विवाह से संबंधित उत्सव। – “ताई के घर में जब चहल-पहल थी, तब अक्सर शादी-ब्याह के आयोजनों की रौनक रहती थी।”
तीज-त्योहार – विभिन्न पर्व और उत्सव। – गाँवों में आज भी तीज-त्योहार के मौकों पर पूरा मोहल्ला एक साथ खुशियाँ मनाता है।
खोजबीन शब्दों की
“ढीली धोती को दोनों हाथों से सँभालते हुए वह बाग में एक पेड़ से दूसरे पेड़ के पास, ‘मिट्ठू आ! मिट्ठू आ!!” पुकारते हुए पसीना-पसीना होते रहे और मिट्ठू एक डाल से दूसरी डाल पर, एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर अपने पंख तौलने में मशगूल रहे।”
उपर्युक्त अनुच्छेद में से खोजिए—
ऐसा शब्द जो ‘तंग’ का विपरीतार्थक है।
- ‘तंग’ का विपरीतार्थक शब्द,ढीली (ढीली धोती)
ऐसा वाक्यांश जो एक मुहावरा है।
- मुहावरा, पसीना-पसीना होना (बहुत अधिक थक जाना या घबरा जाना)
ऐसा शब्द जो एक क्रिया है।
- क्रिया शब्द, पुकारते या सँभालते
ऐसा शब्द जो एक संज्ञा है।
- संज्ञा शब्द, मिट्ठू या पेड़ या बाग या धोती
ऐसा शब्द जो एक सर्वनाम है।
- सर्वनाम शब्द, वह (जगन मास्टर के लिए प्रयुक्त)
ऐसा शब्द जो एक विशेषण है।
- विशेषण शब्द, दूसरी (डाल) या ढीली (धोती)
ऐसा शब्द जो एक कारक है।
- कारक शब्द (चिह्न), में (अधिकरण कारक) या से (अपादान/करण)
ऐसा शब्द जो एक कर्ता है।
- कर्ता शब्द,वह (यहाँ ‘वह’ यानी जगन मास्टर कार्य को करने वाले हैं)
अर्थ के आधार पर वाक्य
आप जानते ही हैं कि अर्थ के आधार पर वाक्यों के कई भेद होते हैं जैसे- विधानवाचक, निषेधवाचक, प्रश्नवाचक, विस्मयादिबोधक, आज्ञावाचक (विधिवाचक), इच्छावाचक, संदेहवाचक और संकेतवाचक।
अब आप भी अपनी पुस्तक में से प्रत्येक प्रकार का एक-एक वाक्य चुनकर लिखिए।
अर्थ के आधार पर वाक्यों के भेद और पाठों (‘क्या लिखूँ?’ एवं ‘संवादहीन‘) से उनके उदाहरण निम्नलिखित हैं –
- विधानवाचक वाक्य (Assertive Sentence)
जिस वाक्य में किसी क्रिया के होने या सूचना मिलने का बोध हो।
उदाहरण – “दूर के ढोल सुहावने होते हैं।”
- निषेधवाचक वाक्य (Negative Sentence)
जिस वाक्य में कार्य के न होने का भाव प्रकट हो।
उदाहरण – “मुझमें खुसरो की प्रतिभा नहीं है।”
- प्रश्नवाचक वाक्य (Interrogative Sentence)
जिस वाक्य में प्रश्न पूछने का बोध हो।
उदाहरण – “पर क्या वे इतने सुहावने होते हैं कि उन पर पाँच पेज लिखे जा सकें?”
- विस्मयादिबोधक वाक्य (Exclamatory Sentence)
जिस वाक्य में आश्चर्य, हर्ष, शोक या विस्मय प्रकट हो।
उदाहरण – “जीते रहो बेटा, जुग जुग जिओ!”
- आज्ञावाचक / विधिवाचक वाक्य (Imperative Sentence)
जिस वाक्य में आज्ञा, उपदेश या अनुमति का बोध हो।
उदाहरण – “मिट्ठू, राम राम बोल!”
- इच्छावाचक वाक्य (Optative Sentence)
जिस वाक्य में इच्छा, शुभकामना या आशीर्वाद व्यक्त किया जाए।
उदाहरण – “भगवान! कैसे नैया पार लगेगी?” (यहाँ पार लगने की इच्छा/प्रार्थना है)
- संदेहवाचक वाक्य (Sentence indicating Doubt)
जिस वाक्य में कार्य के होने में संदेह या संभावना हो।
उदाहरण – “शायद ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते, तो सभ्य कहलाने लगते।”
- संकेतवाचक वाक्य (Conditional Sentence)
जिस वाक्य में एक क्रिया का होना दूसरी क्रिया पर निर्भर हो (शर्त)।
उदाहरण – “अगर वे भी ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते, तो शायद सभ्य कहलाने लगते।”
गतिविधियाँ
नीचे दी गई गतिविधियाँ अपने समूह के साथ मिलकर कीजिए –
- कहानी के रंग
समूहों को अलग-अलग भावनाएँ (दुख, स्नेह, आजादी) दीजिए और इसे मूक अभिनय द्वारा प्रस्तुत कीजिए।
- पंखों की योजना
छोटे समूहों में सोचें कि अगर आपको मिट्ठू की तरह उड़ने का मौका मिले तो आप कहाँ जाते और क्यों?
- “पेट की समस्या उनके लिए कभी समस्या नहीं रही”
यह वाक्य बताता है कि ताई ने भोजन संबंधी अपनी आवश्यकताओं पर कभी ध्यान नहीं दिया अथवा उन्हें महत्त्वपूर्ण नहीं माना। हमारे परिवेश में ऐसी बहुत-सी महिलाएँ हैं जो परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं को प्राथमिकता देती हैं और अपनी आवश्यकताओं की अनदेखी करती हैं।
अपने घर की महिलाओं की भोजन संबंधी रुचियों के विषय में जानिए और समझिए कि उनकी पंसद का भोजन माह में कब-कब बनता है।
छात्र इसे अपने स्तर पर करेंगे।
मेरी पहेली
अपने समूह के साथ मिलकर ऐसी पहेलियाँ या प्रश्न बनाइए जिनके उत्तर निम्नलिखित हों-
तोता, ताई, कुंभ, पिंजरा, कमरा, गंगा
- उत्तर – तोता
पहेली –
“पंख हैं हरे और चोंच है लाल,
सबका नाम रटूँ मैं बेमिसाल।
बागों में उड़ता हूँ, मिर्च बड़े चाव से खाता हूँ,
पिंजरे में रहकर ‘राम-राम’ सुनाता हूँ।”
बताओ मैं कौन हूँ?
- उत्तर – ताई
प्रश्न –
“बड़े घर के उस सूने खंडहर में रहने वाली उस ममतामयी वृद्धा का नाम क्या था, जो मिट्ठू को अपनी जीवन-गाथा सुनाया करती थी?”
- उत्तर – कुंभ
पहेली –
“चार पावन धामों में मेरा डेरा,
अमृत की बूँदों ने भाग्य को घेरा।
बारह वर्षों में आता है मेरा अवसर भारी,
स्नान को आती जहाँ दुनिया सारी।”
मैं क्या हूँ?
- उत्तर – पिंजरा
पहेली –
“लोहे की तीलियों का बना मेरा घर,
पर नहीं सुहाता पक्षी को इसके अंदर।
सुरक्षा तो देता हूँ, पर आज़ादी छीन लेता हूँ,
बताओ, मैं पक्षी को कैसी सजा देता हूँ?”
- उत्तर – कमरा
प्रश्न –
“जगन मास्टर ने कहाँ का दरवाजा बंद करके मिट्ठू को आज़ाद करने का प्रयास किया था ताकि वह बाहर न उड़ जाए?”
- उत्तर – गंगा
पहेली –
“शिव की जटा से निकली मैं धारा,
पावन करती भारत का किनारा।
प्रयाग में मेरा मेल अनोखा,
पाप धोती हूँ, देती मोक्ष का मौका।”
मैं कौन सी नदी हूँ?
कठिन शब्दों के सरल अर्थ
1 – प्राणी – जीव/जीवित वस्तु, Creature / Living being
2 – खंडहर – टूटा-फूटा मकान, Ruins / Dilapidated building
3 – पूत – बेटा, Son
4 – गाय-ढोर – मवेशी/पशु, Cattle / Livestock
5 – दो जून – दो समय (सुबह-शाम), Two square meals
6 – चूल्हा फूँकना – खाना बनाना, To cook food
7 – भाँय-भाँय करना – सूनापन महसूस होना, Desolate silence
8 – ममता – माँ का प्यार, Maternal love / Affection
9 – नियमपूर्वक – कायदे से, Regularly / Methodically
10 – आलस्य – सुस्ती, Laziness
11 – तकाजा – माँग / ज़रूरत, Demand / Requirement
12 – कुशाग्र बुद्धि – बहुत तेज़ दिमाग, Sharp-witted / Intelligent
13 – गुलजार – रौनक से भरा, Lively / Bustling
14 – पौ फटना – सुबह होना, Dawn / Daybreak
15 – अचकचाकर – अचानक चौंककर, Startled / Suddenly
16 – निहाल होना – बहुत खुश होना, Overjoyed / Delighted
17 – वृद्धावस्था – बुढ़ापा, Old age
18 – अनायास – अचानक / अपने आप, Spontaneously / Suddenly
19 – दिलासा – सांत्वना / ढाढ़स, Consolation / Comfort
20 – अलस दोपहरी – सुस्ती भरी दोपहर, Drowsy afternoon
21 – वैभव – ऐश्वर्य / धन-दौलत, Splendour / Wealth
22 – गाथा – कहानी / कथा, Saga / Tale
23 – अतल – बहुत गहरा, Bottomless / Deep
24 – रोबीला – प्रभावशाली, Grand / Impressive
25 – प्रजा – जनता, Subjects / Public
26 – अनगिनत – जिसकी गिनती न हो, Countless
27 – पर्व – त्योहार, Festival
28 – गुणग्राहकता – गुणों को पहचानने वाला, Appreciation of merit
29 – तुनकमिजाजी – चिड़चिड़ापन, Irritability / Short-tempered
30 – धैर्यवान – धीरज रखने वाला, Patient
31 – टीका-टिप्पणी – आलोचना / कमेंट, Comment / Criticism
32 – संवाद – बातचीत, Dialogue / Conversation
33 – खीझकर – चिढ़कर, Irritatedly
34 – मान-मनौवल – मनाना, Persuasion / Reconciliation
35 – वियोग – बिछड़ना, Separation
36 – न्यौता – निमंत्रण, Invitation
37 – साँकल – कुंडी, Latch / Chain
38 – देहँरी – चौखट, Threshold / Doorstep
39 – धर्म-संकट – दुविधा, Moral dilemma
40 – पशोपेश – असमंजस, Hesitation / Dilemma
41 – सुरक्षा – बचाव, Safety / Security
42 – सहमत – राजी होना, Agreed
43 – पुचकारना – प्यार करना, To fondle / Caress
44 – यत्न – कोशिश, Effort
45 – मिजाज – स्वभाव, Temperament / Mood
46 – प्रायश्चित – पछतावा करना, Penance / Atonement
47 – यातना – कष्ट / पीड़ा, Torture / Agony
48 – असह्य – जो सहा न जा सके, Unbearable
49 – आमंत्रण – बुलावा, Invitation
50 – कौतूहल – जिज्ञासा, Curiosity
51 – लक्ष्य – निशाना / उद्देश्य, Target / Goal
52 – मशगूल – व्यस्त, Busy / Engrossed
53 – अनहोनी – न होने वाली घटना, Untoward incident
54 – आशंका – डर / संदेह, Apprehension / Doubt
55 – भ्रम – धोखा / मुगालता, Illusion / Confusion
56 – एवजी – बदले में रखा हुआ, Substitute
57 – पुण्य अर्जन – नेक काम कमाना, Earning merit (Virtue)
58 – आग्नेय दृष्टि – गुस्से वाली नज़र, Fiery look / Angry gaze
59 – अमराइयाँ – आम के बाग़, Mango groves
60 – सुस्ताने – आराम करने, To rest
61 – प्रसंग – घटना / सन्दर्भ, Context / Incident
62 – सत्ता – अधिकार / पावर, Power / Authority
63 – निहारना – ध्यान से देखना, To gaze / Behold
64 – आशीष – आशीर्वाद, Blessing
65 – तौलना – परखना / वजन करना, To weigh / Measure
66 – फड़फड़ाहट – पंखों की आवाज़, Fluttering
67 – रटाना – बार-बार याद कराना, To make someone memorize
68 – अर्जन – इकट्ठा करना, Acquisition
69 – कर्कश – कड़वी आवाज़, Harsh / Hoarse
70 – असंतोष – नाराजगी, Dissatisfaction
71 – यथार्थ – सच, Reality
72 – स्नेह – प्यार, Affection
73 – विवाद – झगड़ा, Dispute
74 – सभ्य – शिष्ट, Civilized
75 – प्रतिभा – हुनर, Talent
76 – अनुसंधान – खोज, Research
77 – विज्ञ – विद्वान, Expert / Scholar
78 – गांभीर्य – गहराई / गंभीरता, Seriousness / Gravity
79 – स्वच्छंद – आज़ाद, Free / Independent
80 – अभिव्यक्ति – प्रकट करना, Expression
81 – तरुण – युवा, Youth
82 – प्रगतिशील – आगे बढ़ने वाला, Progressive
83 – स्मृति – याद, Memory
84 – कद्र – सम्मान, Value / Respect
85 – झपकी – हल्की नींद, Nap / Doze
86 – पुरातन – पुराना, Ancient
87 – मौन – चुप्पी, Silence
88 – विवश – मजबूर, Helpless
89 – हृदयविदारक – दिल दुखाने वाला, Heartbreaking
90 – उल्लास – ख़ुशी, Joy / Exultation
91 – स्फूर्ति – ताज़गी, Energy / Vitality
92 – आवेग – जोश, Impulse / Surge
93 – उमंग – उत्साह, Enthusiasm
94 – परिश्रम – मेहनत, Hard work
95 – रूपरेखा – ढाँचा, Outline / Sketch
96 – अस्पष्टता – धुंधलापन, Ambiguity / Vagueness
97 – दुर्बोध – कठिन, Abstruse / Difficult to understand
98 – उदात्त – महान, Noble / Sublime
99 – अनुभूति – महसूस करना, Feeling / Perception
100 – क्षुब्ध – बेचैन, Agitated / Disturbed

