4, Aisi Bhi Baaten Hoti Hain (Interview with Lata Mangeshkar), Yatindra Mishra,NCERT Class IX, Ganga Book Solutions. Questions Answers,

यतींद्र मिश्र

यतींद्र मिश्र का जन्म सन् 1977 में अयोध्या (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ से हिंदी में एम.ए. किया। कविता, संगीत व अन्य ललित कलाओं के साथ-साथ समाज और संस्कृति के विविध क्षेत्रों में भी उनकी गहरी रुचि है।

यतींद्र मिश्र के तीन काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए हैं— यदा-कदा, अयोध्या तथा अन्य कविताएँ, ड्योढ़ी पर आलाप। इसके अलावा उन्होंने शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी के जीवन और संगीत साधना पर एक पुस्तक गिरिजा लिखी। रीतिकाल के अंतिम प्रतिनिधि कवि ‘द्विजदेव’ की ग्रंथावली (2000) का सह-संपादन किया। कुँवर नारायण पर केंद्रित दो पुस्तकों के अलावा स्पिक मैके के लिए विरासत-2001 के कार्यक्रम के लिए रूपंकर कलाओं पर केंद्रित थाती का संपादन भी किया। वे आजकल स्वतंत्र लेखन के साथ अर्द्धवार्षिक पत्रिका ‘सहित’ का संपादन कर रहे हैं।

ऐसी भी बातें होती हैं – पाठ परिचय  

‘मेरी आवाज़ ही पहचान है!’ अपनी आवाज़ से भारत ही नहीं बल्कि विश्व के कोने-कोने में अपनी पहचान बनाने वाली ‘भारत रत्न’ लता मंगेशकर संगीत के संसार का वह नाम हैं जिनके विषय में यदि बात न हो तो भारतीय संगीत की बात अधूरी रह जाएगी। इंदौर, मध्यप्रदेश में जन्मी लता मंगेशकर ने मात्र पाँच वर्ष की आयु में अपने पिता से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ली और जीवनपर्यंत संगीत के प्रति समर्पित रहीं।

जीवन के अनेक उतार-चढ़ाव व संघर्षों के होते हुए भी लता मंगेशकर ने किस प्रकार संगीत और परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व को निभाया, आइए पढ़ते हैं उनके साथ साक्षात्कार में…

 

ऐसी भी बातें होती हैं

(लता मंगेशकर से साक्षात्कार)

यतींद्र मिश्र : दीदी, आपके संगीत की अप्रतिम यात्रा पर बातचीत शुरू करते हैं…

इस संवाद में मेरा प्रयास यह रहेगा कि मैं संगीत में आकंठ डूबे हुए आपके महान जीवन की उन दुर्लभ छवियों से उन करोड़ों प्रशंसकों को मिलवा सकूँ, जो आपको हर दिन सुनते हुए कहीं अपने जीवन को सार्थक ढंग से शुरू करने की प्रेरणा पाते हैं।

आप अगर तैयार हों, तो मैं ऐसे असंख्य शुभचिंतकों, आपके संगीत के प्रति दीवानगी की हद तक समर्पित श्रोताओं और फिल्म-संगीत के प्रति आदर का भाव रखने वाले तमाम देशवासियों की ओर से प्रणाम करते हुए आपसे प्रश्न पूछना चाहूँगा….

लता मंगेशकर : जी, जरूर। आपका बेहद शुक्रिया कि आपका ऐसा कुछ करने का मन है। आप पूछिए, मैं आपके प्रश्नों का जवाब देने के लिए तैयार हूँ। मैं कोशिश करूँगी कि जो कुछ भी मैंने संगीत में रहते हुए जाना है, उसे आपको बता सकूँ। आपके माध्यम से ही मैं अपने करोड़ों प्रशंसकों का आभार व्यक्त करती हूँ, जो उन्होंने मुझे इतना प्रेम और सम्मान दे रखा है। मुझे तो यह भी लगता है कि जितना प्रेम मुझे मिला है, शायद गाकर उतना आभार मैं अपने प्रशंसकों के प्रति जता नहीं पाई हूँ…

यतींद्र मिश्र : आपके पिताजी पं. दीनानाथ मंगेशकर की वे कौन-सी स्मृतियाँ हैं, जो आज भी आपके स्मरण में जीवित हैं? जिनको याद करना आपको सुख से भरता है?

लता मंगेशकर : कई बातें हैं। जैसे हम लोग बचपन में जब बहुत शरारत करते थे, तब पिताजी सबको बुलाकर अपने सामने खड़ा करते थे। वे बस हमको गंभीरता से देखते थे और इतने में ही हमारा रोना शुरू हो जाता था। मतलब वे कुछ कहते नहीं थे, न ही किसी बात पर डाँट पड़ती थी; मगर हम सभी समझ जाते थे कि हमको बुलाया किसलिए गया है। पिताजी उस समय पूछते थे, ‘समझ गए न?’ इस पर हम लोग कहते थे, ‘हाँ, हम लोग समझ गए।’ इसके बाद वे कहते थे कि ‘अच्छा अब जाओ, बाहर जाकर खेलो।’ इस तरह हमारे पिताजी का गुस्सा था, जो बिना कुछ कहे ही हम भाई-बहनों को डरा देता था।

मेरे पिताजी कमाल के आदमी थे, जिन्हें मैंने हमेशा अपने काम और संगीत में डूबा हुआ ही देखा। उनकी ड्रामा कंपनी के नाटक रात नौ बजे शुरू होते थे और देर रात दो से तीन बजे तक जाकर समाप्त होते थे। इतनी देर एक नाटक में समय इसलिए लगता था कि एक नाटक के पाँच अंक होते थे। फिर उसमें लंबी- लंबी रागदारी वाले गायन की भी परंपरा थी। एक बार पिताजी जब गाना शुरू करते थे, करते थे, तो खूब सीटियाँ, तालियाँ और ‘वन्स मोर’ मिलता था। बाबा माइक पर थोड़ी तेज आवाज़ में गाते थे, जो सुनने पर बहुत अच्छा लगता था। मेरे पिताजी की एक बड़ी विशेषता यह भी थी कि वे एक राग को गाते हुए उसमें सुर बदलकर भी अपना गायन करते थे। मतलब एक राग गाते समय किसी भी सुर को ‘सा’ (षडज) बनाकर इस तरह राग को बदल देते थे कि वह कुछ नया हो जाता था और फिर उसी समय नए राग में गाते हुए दोबारा से पहले राग और उसके सुर में वापस लौट आते थे।

उस समय म्यूजिकल ड्रामा का बहुत चलन था। हमारे यहाँ कभी भी बिना म्यूजिक के कोई ड्रामा हुआ ही नहीं। एक नई बात मेरे पिताजी के नाटकों में यह भी थी कि वे पहली बार मराठी रंगमंच में कर्नाटक और पंजाब का संगीत लेकर आए। मतलब उन्होंने बाकायदा कर्नाटक जाकर वहाँ का कुछ गीत और संगीत सीखा था, जिसे अपने नाटकों में डाला।

मुझे यह भी याद है कि जिस दिन कोई ड्रामा नहीं होता था, उस दिन घर में संगीत की सभा होती थी और बहुत सारे लोग हमारे घर आते थे। फिर वे उसमें नाटक का कोई गीत नहीं गाते थे, बल्कि उस दिन सिर्फ शास्त्रीय संगीत होता था। मेरे पिताजी के गाए हुए शास्त्रीय संगीत के कई रेकॉर्ड एच.एम.वी. से रिलीज हुए हैं और जहाँ तक मुझे याद पड़ता है कि एक रेकॉर्ड उन्होंने राग जयजयवंती का भी बनाया था, जिसे मेगाफोन कंपनी ने बाजार में उतारा।

यतींद्र मिश्र : पिताजी से संगीत के अलावा आपने क्या- क्या और सीखा?

लता मंगेशकर : सबसे ज्यादा तो स्वाभिमान से जीने की प्रेरणा। उन्होंने जो संस्कार दिए उससे जिंदगी में सही बातों पर खड़े रहने की हिम्मत मिली। आज मुझे इस बात की खुशी है कि मैंने किसी से यह नहीं कहा कि आप मुझे पाँच सौ रुपये दीजिए, फलाँ चीज ला दीजिए, मुझे उसकी जरूरत है। इस तरह जो चीज मैं कर पाई, उसमें मैं अपने बाबा का संस्कार मानती हूँ। मैंने पिताजी में यह बात देखी थी कि हर हालात में कैसे रहना चाहिए। यह मेरे पिताजी ने ही मुझे सिखाया था कि अगर कोई बात तुम्हें सही लगती है, तो उसे करो और किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है। इस तरह जब मैं याद करती हूँ, तो लगता है कि बाबा ऐसा कहते थे, बाबा ने यह कहा था, बाबा ने उस समय में इस तरह कोई निर्णय लिया था। यह सब मेरे बड़े काम आया है। हमने हर तरह के दिन देखे थे। पिताजी की कंपनी जब अच्छी चलती थी, तो हम सब लोग बड़े शान से रहते थे। फिर पिताजी के निधन के बाद हमें यह भी देखना पड़ा कि बुरे हालात में कैसे जीना है। मेरी माँ का भी वही संस्कार था कि कैसे भी स्वाभिमान के साथ जी लेना है, मगर किसी के आगे जाकर हाथ नहीं पसारना है। … और देखिए, ये सब बातें मेरे कितने काम आई हैं। आज मेरे पास पैसे हैं और नाम है! हम आज जहाँ रहते हैं, वह भले ही इतना छोटा-सा घर है, पर उसमें हम लोग बहुत खुश हैं। इस बात के लिए भी ईश्वर को धन्यवाद करते हैं कि बाबा ने जैसा सिखाया था, उस पर हम सभी भाई-बहनों ने चलने का प्रयास किया।

यतींद्र मिश्र : बचपन में आप सभी भाई-बहन फिल्में देखकर उसकी नकल उतारते थे। किसी खास फिल्म को देखकर उसकी नकल का स्मरण करेंगी?

लता मंगेशकर : (हँसते हुए) अरे! यह तो हम सब भाई-बहन बहुत करते थे। फिल्में ही थीं, जो मनोरंजन का एक ऐसा माध्यम थीं जिनको देखकर बच्चे अपने ढंग से कुछ-कुछ करते रहते थे। मुझे याद है कि प्रभात फिल्म कंपनी की एक पिक्चर थी ‘संत तुकाराम’। फिल्म में दिखाया गया है कि तुकाराम सदेह बैकुंठ जाते हैं और उन्हें लेने ईश्वर का विमान आता है। वे यह गीत गाते हुए स्वर्ग जाते हैं— ‘अमी जातो अमचा गावा, अमचा राम-राम ध्यावा’ (मैं अपने गाँव जा रहा हूँ। सभी लोग मेरा राम-राम ले लीजिए)। हम कमरे में घर भर के गद्दे, तकिये एक के ऊपर एक रखकर ऊँचा स्वर्ग बनाते थे, जिस पर चढ़कर मैं बैठती थी और वहीं से यह गीत गाती थी। नीचे कमरे में मीना, मेरे फूफा का बेटा पंढरीनाथ और आशा, ये तीनों तुकाराम के अनुयायी बनकर रोते थे और कहते थे— ‘हमें भी साथ ले लीजिए। हमें भी साथ ले चलिए।’ (खिलखिलाकर हँसती हैं) उस समय उषा बहुत छोटी थी, इसलिए वह इन नाटकों में नहीं रहती थी। तो यह सब होता था। हम बहुत सारी फिल्मों की नकल उतारते थे, जिनमें धार्मिक फिल्में ज्यादा होती थीं क्योंकि पिताजी धार्मिक और देशभक्ति की फिल्मों के अलावा दूसरी फिल्में नहीं देखने देते थे। उनका सख्त अनुशासन था और यह सब काम चोरी-चोरी तब होता था, जब पिताजी घर के बाहर हों और यह जान न पाएँ कि घर में फिल्मों का खेल खेला जा रहा है।

यतींद्र मिश्र : अगर किसी फिल्म में आपको अभिनय करने को कहा जाता, तो वह कौन-सी फिल्म होती जिसमें आप काम करना पसंद करतीं?

लता मंगेशकर : नहीं, मैंने शुरू में तो फिल्मों में काम ही किया था और कुल छह या सात फिल्मों में किया था। मैं बहुत छोटी थी उस समय, जब फिल्मों की दुनिया में अभिनय के मार्फ़त ही आई। मुझे कभी अच्छा नहीं लगा मेकअप करना, लाइट के सामने जाना और काफी लोग खड़े हैं, तो उनके सामने कभी रो रहे हैं और कभी हँस रहे हैं। गा भी रहे हैं। मुझे वह कभी अच्छा नहीं लगा। अच्छी फिल्मों को देखकर सराहने का जी जरूर करता है, मगर अभिनय करने के बारे में तो सोच भी नहीं सकती। एक फिल्म हमारे यहाँ हिंदी और मराठी दोनों में बनी थी ‘छत्रपति शिवाजी’। उसमें भालजी पेंढारकर थे जिन्हें मैं बाबा कहती थी। मैं उनके पास गई, हालाँकि उस वक्त तक मैंने अभिनय का काम छोड़ दिया था। मैंने उनसे खुद कहा – ‘बाबा मैं चाहती हूँ कि इस फिल्म का आखिर का जो गाना है, उसमें दो लाइनें मैं भी आकर गाऊँ।’ तो फिर मैंने उसके हिंदी और मराठी, दोनों ही संस्करणों में बाद की दो पंक्तियाँ गाई हैं, जिन दृश्यों में मैं मौजूद भी हूँ। मैं छत्रपति शिवाजी को बहुत पसंद करती हूँ, इसलिए बस इसी फिल्म के लिए मेरा मन हुआ कि भले ही एक दृश्य में सही, मगर यहाँ रहा जा सकता है।

यतींद्र मिश्र : उस दौर में आपके काम की परिस्थितियाँ कैसी थीं? क्या वे आपके हिसाब से धीरे-धीरे अनुकूल होती गईं अथवा वैसे ही हमेशा की तरह एक चुनौती का सबब बनी रहीं, जैसे कि वे संघर्ष के दिनों में थीं?

लता मंगेशकर : यह कह पाना मुश्किल होगा कि मेरी परिस्थितियाँ कभी बहुत अच्छी या बुरी रही हों। मैं इन सब बातों पर ध्यान नहीं देती थी। अलबत्ता मैं उस जमाने से लेकर बाद तक बहुत मेहनत से अपने काम करती थी। मुझे याद है कि मेरी रेकॉर्डिंग सुबह से रात तक चलती रहती थी। एक स्टूडियो से दूसरे और तीसरे स्टूडियो के चक्कर में ही पूरा दिन बीत जाता था। मुझे अपने गाने और रेकॉर्डिंग के अलावा किसी दूसरी चीज की सुध नहीं रहती थी।

हमेशा यही बात दिमाग में घूमती थी कि किसी तरह बस मुझे अपने परिवार को देखना है। फिर वह रेकॉर्डिंग का वक्त हो या घर का खाली समय। किस तरह मैं अपने परिवार के लिए ज्यादा से ज्यादा कमाकर उनकी जरूरतें पूरी कर सकती हूँ, इसी में सारा वक्त निकल जाता था। आप मेरी परिस्थितियों के बारे में पूछ रहे हैं, तो सच बात तो यही है कि मुझे रेकॉर्डिंग से या उसकी तकलीफों से इतना फर्क नहीं पड़ता था, जितना इस बात से कि आने वाले कल में मेरे कितने गीत रेकॉर्ड होने हैं। फलाँ फिल्म के खत्म होने के साथ मुझे नए कॉन्ट्रेक्ट की दूसरी नई फिल्मों के गाने कब रेकॉर्ड करने हैं।

यतींद्र मिश्र : बचपन का कोई ऐसा सपना जिसे पूरा करने की हसरत मन में बहुत दिनों तक पलती रही हो?

लता मंगेशकर : ऐसा कोई सपना तो खास नहीं है, मगर आपको बचपन की एक बात बताती हूँ। मेरे पिताजी उस समय जीवित थे और जब वे अपने कार्यक्रमों के लिए तैयार होते थे. तो उनको जितने मेडल मिले थे, वे अपने कपड़ों पर सीने के बाईं तरफ लगाते थे। वह जमाना ऐसा था, जिसमें यह प्रचलन रहा कि कलाकार लोग अपने प्रदर्शनों में मिले हुए मेडल पहनकर ही बैठते थे। मुझे जगह तो याद नहीं है, मगर यह ठीक से याद है कि पिताजी के अलावा बाहर के किसी कलाकार को जो सबसे पहले मैंने गाते हुए सुना है, वह पंडित कुमार गंधर्व थे। कुमार गंधर्व जी जब काली शेरवानी पहनकर और अपने ढेर सारे मेडल लगाकर गाने के लिए बैठे, तो वह बात मुझे बहुत पसंद आई। मुझे तब हमेशा यह लगता था कि जब मैं बड़ी हो जाऊँगी, तब मुझे भी ऐसे ही मेडल मिलेंगे, जिसे लगाकर किसी कार्यक्रम में जाऊँगी।

यतींद्र मिश्र : अगर हम समय के चक्र (टाइम मशीन) को घुमाकर सन् 1949-50 में ले जाएँ, तो आपके फिल्मों से संबंधित सांगीतिक जीवन की शुरुआत में खेमचंद प्रकाश, शंकर-जयकिशन, हुस्नलाल भगतराम जैसे म्यूजिक डायरेक्टर आते हैं और आपको एक मजबूत जमीन बनाने के लिए, ‘आएगा आने वाला’ (महल), ‘हवा में उड़ता जाए मोरा लाल दुपट्टा मलमल का’ (बरसात) और ‘चले जाना नहीं नैन मिला के’ (बड़ी बहन) जैसे गाने मिलते हैं। इससे एक नए युग का सूत्रपात होता है, जो कहीं आपके कद को बड़ा बनाने में मददगार रहता है। मैं यह जानना चाहता हूँ कि यदि उस जमाने में ए. आर. रहमान आए होते, जतिन-ललित आए होते, शंकर-एहसान-लॉय होते, तो ये सारे गाने कैसे बनते? उस समय ‘आएगा आने वाला’ की आमद कैसी होती?

लता मंगेशकर : (हँसते हुए) बड़ा मजेदार प्रश्न है आपका। कहना मुश्किल है इस पर क्या बोलूँ? समझ में नहीं आ रहा है कि वाकई अगर ऐसा हुआ होता, तो ये गाने कैसे बनते। यह विचार और कल्पना तो सुनने में अच्छी लगती है, पर मैं पूरी तरह इसका आकलन नहीं कर सकती कि ‘आएगा आने वाला’ को ए. आर. रहमान ने बनाया होता या ‘हवा में उड़ता जाए’ को जतिन-ललित ने, तो कैसा प्रभाव पैदा होता।… मगर मैं इतना जरूर जानती हूँ कि कुछ बहुत बढ़िया होता या बिल्कुल दूसरे अंदाज में सामने आता, जिसकी शायद धुनें और तर्ज भी अलग होते। मैं आपसे प्रश्न करती हूँ कि जो मेरे गाने रहमान ने बनाए या जतिन-ललित के लिए मैंने ‘मेरे ख्वाबों में जो आए’ (दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे) गाया है, उसे श्याम सुंदर जी, नौशाद साहब या अनिल विश्वास ने रचा होता, तो आपके लिहाज से वह किस तरह बनता? यह वाकई बहुत रोचक और सोचने वाली बात है कि समय के हेर-फेर से हमारे गीतों का स्वभाव कैसा होता? इतना जरूर मैं कहना चाहूँगी कि पुराने समयों में, जब मैंने ‘महल’, ‘बड़ी बहन, ‘बरसात’, ‘तराना’, ‘बाजार’ और ‘संगदिल’ जैसी फिल्मों के लिए पार्श्वगायन किया था. उस समय तकनीकी रूप से सिनेमा में बहुत तरक्की नहीं हुई थी। ‘आएगा आने वाला’ में मुझे हॉल में बहुत दूर से चलकर दबे पाँव रेकॉर्डिंग वाले माईक तक आना पड़ता था और उसी अनुपात में रेकॉर्डिंग के माईक पर स्वर का उतार-चढ़ाव कैद किया जाता था।

बहुत सारे ऐसे गाने मुझे याद हैं जिसमें कुछ विशेष प्रभावों को देने के लिए अनिल विश्वास, श्याम सुंदर, सज्जाद हुसैन, सलिल चौधरी और सी. रामचंद्र ने कुछ नए तरीके और अजीबोगरीब टोटके आजमाए थे, जिनसे गीतों में वह प्रभाव पैदा हो सका। आज, जो स्थिति है और जिस तरह हमारी तकनीक विकसित हो चुकी है, उसमें अगर इन लोगों को काम करने का मौका मिलता, तब तो कमाल ही हो गया होता। न जाने कितना और अधिक एडवांस किस्म का ये लोग संगीत रच पाते, आप सोच सकते हैं। ठीक उसी तरह, जैसा सुंदर और स्तरीय संगीत आज के संगीतकार बना रहे हैं — रहमान, जतिन-ललित और तमाम अन्य लोग — अगर पीछे जाकर काम करते, तो कितनी मुश्किलें आतीं और कितना संघर्ष करते हुए वे सब अपना गाना बनाते, इसका अंदाजा भी लगाया जा सकता है। मेरे लिए भी यह कम चुनौती की बात नहीं कि मैं अनिल विश्वास की धुनों जैसा काम रहमान के साथ कर रही होती और उसी तरह इन नए लोगों की धुनों पर नौशाद साहब के लिए रेकॉर्ड करती, तो कैसा होता?

यतींद्र मिश्र : इसी समय विषय परिवर्तन करते हुए आपसे कुछ व्यक्तिगत सवाल पूछने का मन हो रहा है। इस संदर्भ में आपके व्यक्तित्व को देखते हुए यह बात दिमाग में आती है कि आपने रंगों से हमेशा परहेज किया है। विशेषकर अपने पहनावे में भी इस बात का ध्यान रखा कि कहीं से भी रंगों की कोई भी दर्शना अभिव्यक्त न हो सके। आपकी सफेद रंग की साड़ियों पर मौजूद रंगीन धारियाँ, गुलबूटों और पल्लों का रंग छोड़कर कहीं भी रंग से दोस्ताना निभता नहीं दिखता। ऐसे में एक ख्याल मन में आता है कि आप रंगों का त्योहार होली कैसे मनाती होंगी? होली को लेकर कोई संस्मरण या व्यक्तिगत रुचि की कोई बात जो आप यहाँ साझा करना चाहें।

लता मंगेशकर : हम होली खेलते थे। यह बहुत पहले की बात है, जब मेरे पिताजी जीवित थे। आजकल तो मैंने होली खेलना ही बंद कर दिया है। पहले सारा दिन रंग खेलना और भीगना और बाद में जाकर देर शाम तक नहाना, अब यह सब सालों से अच्छा नहीं लगता है। यह जो होली पूरे देश में प्रचलित है, हम उसे होली की तरह नहीं मनाते थे। मेरा मतलब यह है कि होली के एक दिन पहले जब होली जलाते हैं और उस समय होलिका की पूजा होती है, उसमें जो प्रसाद चढ़ाया जाता है, उन तमाम तरह की मिठाइयों को होलिका में डालते हैं। नारियल भी होलिका में आखिरी में जलाया जाता है, जिसे जल जाने के बाद आग से निकालकर उसे तोड़कर प्रसाद लेते हैं। वह जो राख बनती है, उसे उठाकर दूसरे दिन एक-दूसरे पर डालते हैं। इसे हम लोग ‘गुड़वड़’ कहते हैं। होली के बाद पाँचवें दिन रंग पंचमी आती है, उस दिन मेरी माँ और पिताजी हम सब भाई-बहनों पर केसर घोलकर थोड़ा छिड़कते थे। माँ घर में कुछ मीठा बनाती थीं, जो भगवान को चढ़ाकर हमें प्रसाद में खाने को मिलता था। हम सभी की अलग-अलग आरतियाँ भी माँ उतारती थीं और इस तरह हमारे घर में बचपन में होली का त्योहार मनता था। यह होली जो आजकल प्रचलित है, इसका कोई प्रभाव हमारे घर में नहीं था।

हमारे यहाँ दशहरा और दीवाली का ज्यादा महत्त्व था। नवरात्रि भी बहुत धूमधाम के साथ हम लोगों के यहाँ मनती है। नवरात्रि के पहले दिन हम ‘गुड़ि पड़वा’ मनाते हैं, जिसका विशेष महत्त्व है। इसमें हम घर में बाहर ‘गुड़ि’ बाँधते हैं और कलश स्थापना करते हैं। सूर्योदय के समय ही ‘गुड़ि’ पर बताशों की माला या हार बनाकर चढ़ाई जाती है, जिसे सूर्यास्त होने तक उतार लिया जाता है और प्रसाद के रूप में घर के सभी सदस्य उसे लेते हैं। यह एक बहुत महत्त्वपूर्ण आयोजन है हमारी तरफ और ऐसी मान्यता है कि भगवान राम चौदह वर्ष बाद जब अयोध्या लौटे थे, तो हर घर में ऐसे ही बताशों की लड़ी सजाकर ‘गुड़ि’ बाँधी गई थी। महाराष्ट्र में ऐसा ही कहा जाता है। पहले दिन ‘गुड़ि’ बाँधने के बाद नौ दिन तक उत्सव मनाया जाता है, जिसके अंत में नवमी पर राम जी के जन्म की तिथि रामनवमी आती है।

..तो यह त्योहार हम राम आगमन मानकर मनाते हैं, जबकि बाकी जगहों पर दुर्गा की आराधना में नवरात्र होता है। महाराष्ट्र में उस तरह नवरात्र नहीं मनता, जिस तरह गुजरात. उत्तर प्रदेश और राजस्थान में दुर्गा की आराधना में यह त्योहार मनाया जाता है।

यतींद्र मिश्र : त्योहारों की ऐसी कोई खास बात, जो आपके शुरुआती जीवन में परंपरा की तरह निभती रही हो और जिसे आपने बाद में भी पूरी आत्मीयता के साथ निभाना जारी रखा।

लता मंगेशकर : ऐसी कोई खास बात मुझे याद नहीं आती। अलबत्ता इतना जरूर कहूँगी कि पचास का दशक रहा होगा, जब मैं फिल्म इंडस्ट्री में नई-नई आई थी और मेरा काम कुछ चल निकलना शुरू हुआ था। उस दौरान मैंने कुछ सालों तक दीवाली के दिन अपने सीनियर म्यूजिक डायरेक्टर्स के यहाँ मिठाई लेकर जाने का चलन शुरू किया था। आप सुनकर हैरान होंगे कि मैं ऐन दीवाली के दिन तड़के पाँच बजे ही नहा-धोकर बहुत सारे संगीतकारों के घर मिठाई लेकर पहुँच जाती थी।

एक बार बड़ा मजेदार वाकया हुआ कि मैं नौशाद साहब के घर सुबह करीब साढ़े पाँच बजे पहुँच गई और जब कॉलबेल बजाया, तो उनींदे से नौशाद साहब मुझे गेट पर खड़ा देखकर डर गए। वे डरकर पूछने लगे- “लता बाई सब खैरियत तो है, इतने सबेरे क्या मुसीबत आन पड़ी?” मैंने उन्हें हँसकर कहा, “कुछ नहीं नौशाद साहब, आज दीवाली है तो आपको बधाई देने और मिठाई पहुँचाने चली आई।” इस पर वे बोले, “अरे इतनी सुबह क्यों परेशान हुई?” तब मैंने उनको हँसते हुए जवाब दिया कि नौशाद साहब आपके अलावा मुझे अभी दो-तीन जगह- अनिल विश्वास जी, रोशनलाल, मदन भैया और बर्मन दादा के यहाँ भी जाना है। इस पर वे लाड़ से भरकर बोले— “हाँ। मैं बिल्कुल भूल गया! लेकिन पहले बैठो, चाय पियो और मुँह मीठा करो, फिर जाने देंगे। फिर बोले, “लता, तुम हम सबको मिठाई बाँट रही हो, लेकिन हम सारे संगीतकारों को मिलकर तो तुम्हें मिठाई खिलानी चाहिए, जो तुमने हमारी धुनों में इतनी मिठास घोली है।” नौशाद साहब से मैंने यही इतना भर कहा कि आप आशीर्वाद दीजिए कि आगे भी जीवन में हर दीवाली के साथ मैं और मधुर से मधुर गीत गा सकूँ।

यतींद्र मिश्र : त्योहारों के संदर्भ में एक बात और ध्यान में आती है कि अधिकांश प्रदेशों में पर्वों व अनुष्ठानों से संदर्भित घर-घर गीत गाए जाने का प्रचलन रहा है। उदाहरण के लिए होली के मौके पर फाग और धमार, बिहार में छठ पूजा पर छठ के गीत, जन्माष्टमी और रामनवमी में ईश्वर के जन्म के कारण सोहर और बधावा आदि गाने का मामला। ये गीत ज्यादातर घर और मोहल्ले की स्त्रियाँ ही गाती हैं, गायन एक रिवाज की तरह कायम है। ऐसे में महाराष्ट्र के संदर्भ में आपके देखे ऐसे कौन-से अवसर आए हैं?

लता मंगेशकर : (हँसते हुए) हमारे यहाँ होली और दीवाली पर तो इस तरह घरों में गीत नहीं होता। यह जरूर है कि विवाह के बाद जब नई बहू घर में आती है, तब एक पूजा होती है घरों में, जिसमें पास-पड़ोस की बहुत सारी औरतें आती हैं। यह मंगलागौर कहलाता है। सारी औरतें बिल्कुल मुग्ध भाव से गीत गाती हैं और नाचती भी हैं। बिल्कुल ठेठ गँवई अंदाज में यह मंगलागौर का उत्सव मनाया जाता है, मगर आहिस्ता-आहिस्ता वह भी अब खत्म हो रहा है। मुझे अच्छी तरह से याद है; जब मैं बहुत छोटी थी, तब घर-परिवार या पड़ोस में किसी की भी शादी के बाद यह मंगलागौर मनाया जाता था और हम सभी लोग उसमें खूब नाचते-गाते थे। उनमें स्त्रियाँ नौटंकी और तमाशा की तरह भी कुछ-कुछ करती थीं। मतलब कोई कुछ भी रूप धरकर नाचता था।

यतींद्र मिश्र : दीदी, कोरस में गाने वाली लड़कियों के साथ आपके कैसे रिश्ते रहे? क्या वे सब भी आप लोगों की गायिकी में कोई सहयोग करती थीं या उनका एक अलग ही विभाग होता था, जो मुख्य पार्श्वगायक-गायिकाओं से अलग रहता था?

लता मंगेशकर : उस वक्त एक ऐसा ग्रुप था, जो सब जगह जाता था। नौशाद साहब के यहाँ, मदन मोहन जी के यहाँ। शंकर-जयकिशन, एस. डी. बर्मन, आर. डी. बर्मन, लक्ष्मीकांत- प्यारेलाल – ये जितने भी लोग थे; सभी के यहाँ एक ही ग्रुप की लड़कियाँ थीं, जो कोरस में गाने जाती थीं। इसलिए सबसे मेल-मुलाकात भी गहरी पहचान में बदल गई थी। मेरा कोरस की लड़कियों के साथ बहुत अच्छा संबंध था। मतलब जितनी भी लड़कियाँ थीं, वो बिल्कुल मेरे घर जैसी थीं। सबका ही घर में आना-जाना होता था। मीना की शादी जब कोल्हापुर में हुई, तो कोरस की सारी लड़कियाँ और लड़के वहाँ आए थे और उन लोगों ने वहाँ खूब गाने गाए और डांस किया था। जहाँ तक मुझे याद पड़ता है, सन् 1960 में जो ग्रुप कोरस गाने वालों का हमें मिला था, वह लगभग अस्सी तक वैसे ही चला है। 1980 के पास जाकर वह बदला गया। फिर उनमें कुछ लड़कियों ने गाना बंद कर दिया था और कुछ लोगों ने छोड़ दिया।

फिर अस्सी के बाद तो यह भी हो गया था कि कोरस वालों का म्यूजिक पहले रेकॉर्ड हो जाता था। बाद में हम लोग जाकर अपने गाने गा आते थे। उससे पहले के दौर में पुरुष और स्त्री आवाज़ों के कोरस हम लोगों के गीतों के साथ ही रेकॉर्ड होते थे। भले ही वह गाना डुएट हो या फिर कोई सोलो सांग। अकसर मुकेश भैया और मेरे गाने या किशोर कुमार और मेरे गानों में कोरस की लड़कियाँ साथ ही गाती थीं। उनमें से कुछ के नाम तो मुझे अभी भी याद हैं। कुछ एक लड़कियाँ बहुत सुरीला गाती थीं, जिनमें कविता, गांधारी, कल्याणी, सुमन और रेखा थीं। यह सब मुझे बड़ी भली और अच्छी लगती थीं। कविता और गांधारी बहनें थीं और दोनों साथ ही कोरस में गाती थीं। रेखा शादी-शुदा बाल-बच्चों वाली औरत थी, जो अच्छी तरीके से कोरस में साथ देती थी। कल्याणी की भी आवाज़ सुंदर थी। यह सब इतनी भली थीं कि जब रेकॉर्डिंग के लिए आती थीं, तो अकसर वहाँ स्टूडियो में ज्यादा कुर्सियाँ नहीं होती थीं। वे सब बड़े मजे से जमीन पर बैठती थीं और अकसर मैं भी रेकॉर्डिंग में आकर वहीं जमीन पर बैठकर उन सभी के साथ बातें करती थी। यह मैं उन कोरस गाने वाली लड़कियों की बात कर रही हूँ, जो बहुत शुरुआती दौर में लगभग पचास और साठ के दशक में संगीतकारों के यहाँ कोरस गाने के लिए जाती रही हैं। आजकल का मुझे कुछ मालूम नहीं है। अब कौन-कौन से लोग हैं और उनका सिंगर्स के साथ में गाना रेकॉर्ड होता है या अलग से? यह मुझे मालूम नहीं है। मुझसे मिलने वाले जितने लड़के और लड़कियाँ थीं, उन सबने बहुत बाद तक संपर्क बनाया हुआ था।

यतींद्र मिश्र : संगीत की प्राचीन परंपरा में बहुत सारी जनश्रुतियाँ और कहानियाँ संगीत को गरिमा और शिखर देने के संदर्भ में कही जाती रही हैं या हम इस तरह कह सकते हैं कि परंपरा में व्याप्त रही हैं। मसलन स्वामी हरिदास और तानसेन के युग की बहुत सारी कथाओं में यह मान्यताएँ भी प्रचलित रहीं कि तानसेन के दीपक राग गाने से दीये जल उठे या कि उनकी पुत्रियों ताना-रीरी के मेघ राग गाने से वर्षा होने लगी। इस तरह की अवधारणाओं पर आप किस तरह सोचती हैं?

लता मंगेशकर : यह जिस जमाने की कथाएँ हैं, जिसमें हरिदास बाबा और तानसेन जैसे महान संगीतकारों के लिए ऐसा कहा गया, तो हो सकता है कि उनकी कला में कोई सच्चा सुर या आत्मा की आवाज़ लगी होगी, तो ऐसा कुछ घट गया होगा, ऐसा हम आदर में मान लेते हैं। परंतु यह निश्चित ही हुआ होगा, यह कम से कम मैं नहीं कह सकती क्योंकि ऐसा मेरा कोई अनुभव नहीं है। हालाँकि मैं यह मानती हूँ कि संगीत में वह असीम शक्ति है कि कुछ अप्रत्याशित वह जरूर रच देता है, जिसका अनुभव भी कई बार हमें हुआ है। कई बार अपने बाबा पंडित दीनानाथ मंगेशकर को सुनते हुए भी मैं कुछ अप्रत्याशित अनुभव करती थी।

आपको एक वाकया बताती हूँ। मैं मुंबई में उस्ताद अली अकबर खाँ और पंडित रविशंकर का एक कंसर्ट सुन रही थी। मैं श्रोताओं की पंक्ति में बिल्कुल आगे बैठी अली अकबर भाई का वादन सुन रही थी और वे अत्यंत मंत्रमुग्ध किस्म का वादन कर रहे थे। तभी कुछ समय बीता होगा, मसलन पचास-साठ मिनट कि ‘ठन’ से उनके सरोद का एक तार टूटा और उन्हें बजाना बंद करना पड़ा। जब वे उठकर पीछे ग्रीन रूम में गए, तो उनसे मिलने मैं भी वहाँ गई। मैंने बोला, “आप बहुत सुंदर बजा रहे थे, काश कि यह तार न टूटता और हम पूरी तरह राग को अंत तक सुन पाते।” इस पर अली अकबर भाई ने एक बड़ी मार्मिक बात कही, जो आज तक मुझे भूलती नहीं। वे बोले – “बहन, जब बहुत सुर में तार लगता है, तो टूट जाता है।” उन्होंने अपने सुर को इतने पवित्र भाव से इतना डूबकर लगाया कि सरोद का तार टूट गया। इस प्रसंग से मुझे यह लगता है कि संगीत की सीमा इतनी अनंत है कि तार भी शुद्ध स्वर के आघात को सह नहीं पाता, टूटकर अलग हो जाता है। आज जब उस्ताद अली अकबर खाँ या पंडित रविशंकर के संदर्भ में इन बातों को सोचती हूँ, तो इस बात पर विश्वास करने का मन होता है कि हो सकता है मियाँ तानसेन से कोई ऐसा सच्चा सुर जरूर लगा होगा कि बारिश हो गई या दीपक जल उठे!

यतींद्र मिश्र : दीदी, आप तो घर-घर में व्याप्त हैं। आपकी आवाज़ से लोगों की सुबह होती है। अगर मैं अतिरेक नहीं कर रहा, तो यह कहना वाजिब है कि आप अमर हैं और दूसरी लता मंगेशकर होना इस दुनिया में संभव नहीं है…

लता मंगेशकर : मुझे भगवान ने बहुत कुछ दिया है। मुझे किसी बात की शिकायत नहीं है। मैं बहुत खुश हूँ। आप जैसे लोग अगर यह मानते हैं कि मैं अमर हूँ, तो यह मुझे मिलने वाले उस प्यार जैसा ही है, जो दुनिया ने मुझे दिया है।… मेरा गाना अमर है, पर शरीर तो अमर नहीं। उसे तो जाना ही है, आज नहीं तो कल। कल नहीं तो परसों या किसी न किसी दिन….। इस बात पर मुझे कोई अफसोस नहीं होता। वह तो होकर रहेगा। हमारे यहाँ यही कहा जाता है — गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन’। मतलब गाँव तो बह जाता है, लेकिन जो नाम है, वह रह जाता है। मैं इसको हमेशा से मानती रही हूँ। एक बात की मुझे सबसे ज्यादा खुशी है कि मैंने अपने पिताजी का नाम, थोड़ा ही सही मगर, आगे बढ़ाया।

आज मुझे लगता है कि हे प्रभु! तुमने जो भी दिया, वह बहुत दिया, दूसरों से कहीं ज्यादा दिया। अपनी कृपा की छाया से जैसे मुझे छाँह दी है, वैसे ही हर एक कलाकार और नेक इंसानों के ऊपर भी रखना… यही प्रार्थना है।

ऐसी भी बातें होती हैं – पाठ का सारांश

यतींद्र मिश्र द्वारा ‘भारत रत्न’ लता मंगेशकर से लिया गया यह साक्षात्कार ‘ऐसी भी बातें होती हैं’ उनके जीवन के अनछुए पहलुओं, संघर्षों, पारिवारिक संस्कारों और संगीत के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा को उजागर करता है।

  1. पिता की स्मृतियाँ और संगीत की शिक्षा

लता जी ने अपने पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर को अपना पहला गुरु और प्रेरणा स्रोत माना है। उन्होंने बताया कि उनके पिता संगीत में पूरी तरह डूबे रहते थे। वे संगीत नाटकों (म्यूजिकल ड्रामा) के पुरोधा थे और मराठी रंगमंच पर कर्नाटक और पंजाब का संगीत लाने वाले पहले व्यक्ति थे। पिता के अनुशासन का प्रभाव ऐसा था कि वे बिना कुछ कहे, केवल गंभीरता से देखकर ही बच्चों को उनकी गलती का अहसास करा देते थे।

  1. स्वाभिमान और संस्कारों की नींव

लता जी के अनुसार, उनके पिता ने उन्हें सबसे बड़ी सीख स्वाभिमान से जीने की दी। उन्होंने सिखाया कि यदि तुम सही हो, तो किसी के आगे झुकने या हाथ पसारने की जरूरत नहीं है। पिता के निधन के बाद परिवार ने बहुत कठिन दिन देखे, लेकिन इन्हीं संस्कारों के कारण लता जी और उनके भाई-बहनों ने हार नहीं मानी और मेहनत के बल पर अपनी पहचान बनाई।

  1. बचपन की शरारतें और अभिनय से अरुचि

बचपन में लता जी और उनके भाई-बहन फिल्मों की नकल उतारते थे। ‘संत तुकाराम’ फिल्म की नकल करते हुए वे गद्दों का ‘स्वर्ग’ बनाकर गीत गाती थीं। हालाँकि उन्होंने शुरुआत में 6-7 फिल्मों में अभिनय किया, लेकिन उन्हें मेकअप करना, लाइटों के सामने हँसना-रोना कभी अच्छा नहीं लगा। उन्हें केवल संगीत से लगाव था।

  1. संघर्ष के दिन और कड़ी मेहनत

करियर के शुरुआती दौर में लता जी ने सुबह से रात तक स्टूडियो के चक्कर लगाए। उनका एकमात्र लक्ष्य अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाना था। उन्होंने उस दौर को याद किया जब तकनीक इतनी विकसित नहीं थी। ‘आएगा आने वाला’ (फिल्म-महल) की रिकॉर्डिंग के लिए उन्हें हॉल में दूर से चलकर माइक तक आना पड़ता था ताकि आवाज़ में गूँज और गहराई का प्रभाव पैदा हो सके।

  1. व्यक्तिगत जीवन और रंगों से परहेज

साक्षात्कार में लता जी ने बताया कि उन्हें सादगी पसंद है, इसलिए वे सफेद साड़ियाँ पहनती हैं। उन्होंने त्योहारों के बारे में बताया कि उनके घर में होली से ज्यादा दशहरा, दिवाली और गुड़ी पड़वा (नवरात्रि) का महत्त्व है। वे दिवाली पर अपने वरिष्ठ संगीतकारों (जैसे नौशाद साहब) के घर सुबह-सुबह मिठाई लेकर जाती थीं, जो उनके विनम्र स्वभाव को दर्शाता है।

  1. संगीत की असीम शक्ति और श्रद्धा

लता जी संगीत को आत्मा की आवाज़ मानती हैं। उन्होंने उस्ताद अली अकबर खाँ का एक प्रसंग सुनाया कि कैसे अत्यधिक सुर में डूबकर बजाने से उनके सरोद का तार टूट गया था। इस आधार पर वे तानसेन और स्वामी हरिदास से जुड़ी चमत्कारी कहानियों (दीपक जलना या वर्षा होना) पर विश्वास करती हैं कि संगीत में ऐसी असीम शक्ति संभव है।

  1. विनम्रता और कृतज्ञता

करोड़ों प्रशंसकों का प्यार पाने के बावजूद लता जी में रंच मात्र भी अहंकार नहीं है। वे मानती हैं कि शरीर नश्वर है, केवल नाम और कर्म ही शेष रहते हैं। वे ईश्वर को धन्यवाद देती हैं कि उन्होंने उन्हें पिता का नाम आगे बढ़ाने का अवसर दिया।

पाठ का मुख्य संदेश

यह पाठ हमें सिखाता है कि सफलता के शिखर पर पहुँचने के बाद भी व्यक्ति को अपनी जड़ों (संस्कारों), परिवार और गुरुओं के प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए। स्वाभिमान, कठिन परिश्रम और कला के प्रति समर्पण ही एक साधारण मनुष्य को ‘असाधारण’ बनाता है।

 

जीवन मूल्य

  1. स्वाभिमान – विपरीत परिस्थितियों में भी हाथ न पसारना।

उदाहरण – “कैसे भी स्वाभिमान के साथ जी लेना है, मगर किसी के आगे जाकर हाथ नहीं पसारना है।”

  1. कर्तव्यनिष्ठा – परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व को सर्वोपरि रखना।

उदाहरण – “हमेशा यही बात दिमाग में घूमती थी कि किसी तरह बस मुझे अपने परिवार को देखना है।”

  1. विनम्रता – अपार ख्याति के बाद भी प्रशंसकों के प्रति झुकना।

उदाहरण – “जितना प्रेम मुझे मिला है, शायद गाकर उतना आभार मैं अपने प्रशंसकों के प्रति जता नहीं पाई हूँ।”

  1. दृढ़ता (संघर्ष) – कठिनाइयों में भी काम के प्रति अडिग रहना।

उदाहरण – “एक स्टूडियो से दूसरे और तीसरे स्टूडियो के चक्कर में ही पूरा दिन बीत जाता था।”

  1. कृतज्ञता – अपनी सफलता का श्रेय पूर्वजों को देना।

उदाहरण – “एक बात की मुझे सबसे ज्यादा खुशी है कि मैंने अपने पिताजी का नाम… आगे बढ़ाया।”

  1. अनुशासन – बचपन से ही नियमों का पालन करना।

उदाहरण – “पिताजी धार्मिक और देशभक्ति की फिल्मों के अलावा दूसरी फिल्में नहीं देखने देते थे।”

  1. आत्मीयता – सहयोगियों को बराबरी का दर्जा देना।

उदाहरण – “जितनी भी (कोरस की) लड़कियाँ थीं, वो बिल्कुल मेरे घर जैसी थीं।”

  1. साधना – कला को पवित्रता और पूर्ण एकाग्रता से निभाना।

उदाहरण – “अली अकबर भाई बोले— बहन, जब बहुत सुर में तार लगता है, तो टूट जाता है।”

  1. यथार्थवाद (दार्शनिकता) – जीवन की नश्वरता को स्वीकार करना।

उदाहरण – “मेरा गाना अमर है, पर शरीर तो अमर नहीं। उसे तो जाना ही है।”

10.पवित्रता – कला और संस्कारों में शुद्धता बनाए रखना।

उदाहरण – “उन्होंने जो संस्कार दिए उससे जिंदगी में सही बातों पर खड़े रहने की हिम्मत मिली।”

 

पाठ से प्राप्त सीखें

यतींद्र मिश्र द्वारा लिए गए लता मंगेशकर के इस साक्षात्कार से हमें जीवन के कई महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर प्रेरणा मिलती है। पाठ के आधार पर प्राप्त 7 प्रमुख सीखें निम्नलिखित हैं:

  1. स्वाभिमान का महत्त्व (Self-Respect)

लता जी ने अपने पिता से सीखा कि जीवन में कैसी भी परिस्थिति आए, कभी किसी के आगे हाथ नहीं पसारना चाहिए। अपनी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय अपने स्वाभिमान को बचाए रखना सबसे बड़ा संस्कार है।

  1. विपरीत परिस्थितियों में धैर्य (Resilience)

पिता के निधन के बाद 13 वर्ष की अल्पायु में ही लता जी पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई। उन्होंने संघर्ष के दिनों को चुनौती मानकर स्वीकार किया और कड़ी मेहनत से अपने परिवार को सँभाला। यह हमें सिखाता है कि कठिन समय में टूटने के बजाय लक्ष्य पर केंद्रित रहना चाहिए।

  1. कला के प्रति अटूट समर्पण (Dedication)

लता जी की सफलता का राज उनकी एकाग्रता थी। वे कहती हैं कि उन्हें रिकॉर्डिंग के अलावा किसी और चीज़ की सुध नहीं रहती थी। किसी भी क्षेत्र में शिखर तक पहुँचने के लिए उस कार्य में ‘आकंठ’ डूबना अनिवार्य है।

  1. जड़ों और संस्कारों का सम्मान (Respect for Roots)

इतनी बड़ी वैश्विक पहचान बनाने के बाद भी लता जी अपने पिता के दिए गए संस्कारों, अपनी भाषा (मराठी) और अपनी परंपराओं (गुड़ि पड़वा, दीवाली के रीति-रिवाज) से जुड़ी रहीं। यह सीख देती है कि सफलता हमें अपनी जड़ों से दूर नहीं करनी चाहिए।

  1. कृतज्ञता और विनम्रता (Humility & Gratitude)

अकूत प्रसिद्धि मिलने के बाद भी लता जी में अहंकार नहीं था। वे अपनी अमरता का श्रेय जनता के प्यार को देती हैं और मानती हैं कि उन्हें ईश्वर ने उनकी योग्यता से कहीं अधिक दिया है। वे अपने सहयोगियों (कोरस सिंगर्स) को भी अपने परिवार जैसा मानती थीं।

  1. निरंतर सीखने की प्रवृत्ति (Lifelong Learning)

साक्षात्कार में उन्होंने पुराने और नए संगीतकारों (जैसे ए.आर. रहमान) की तुलना करते हुए तकनीक के विकास को सराहा। वे स्वयं को हमेशा एक विद्यार्थी मानती रहीं, जो संगीत के अनंत सागर को समझने का प्रयास कर रही है।

  1. कर्म की अमरता (Immortality of Work)

लता जी ने कहा— “गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन”। यानी शरीर नश्वर है, लेकिन हमारे द्वारा किए गए नेक काम और हमारी कला दुनिया में हमेशा जीवित रहती है। यह हमें समाज के लिए कुछ सार्थक करने की प्रेरणा देता है।

 

पाठ में आए व्यक्तियों का परिचय

यतींद्र मिश्र द्वारा लता मंगेशकर से लिए गए साक्षात्कार ‘ऐसी भी बातें होती हैं’ में आए प्रमुख व्यक्तियों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है –

  1. लता मंगेशकर

इस पाठ की मुख्य पात्र और ‘भारत रत्न’ से सम्मानित विश्व प्रसिद्ध पार्श्वगायिका। उन्होंने मात्र 5 वर्ष की आयु से संगीत सीखना शुरू किया और जीवन भर संगीत और परिवार के प्रति समर्पित रहीं। उन्हें ‘स्वर कोकिला’ के नाम से जाना जाता है।

  1. यतींद्र मिश्र

एक प्रसिद्ध लेखक, कवि और कला-सांस्कृतिक समीक्षक। उन्होंने ही लता मंगेशकर का यह साक्षात्कार लिया है। वे संगीत और सिनेमा के गहरे जानकार माने जाते हैं।

  1. पं. दीनानाथ मंगेशकर

लता मंगेशकर के पिताजी। वे शास्त्रीय संगीतज्ञ और नाट्य संगीत के दिग्गज कलाकार थे। उन्होंने ही लता जी को संगीत की प्रारंभिक शिक्षा और स्वाभिमान से जीने के संस्कार दिए।

  1. कुमार गंधर्व

भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक महान और विशिष्ट गायक। लता जी ने बचपन में उन्हें गाते हुए सुना था और उनकी काली शेरवानी व पदकों (मेडल) से वे बहुत प्रभावित हुई थीं।

  1. नौशाद साहब

हिंदी सिनेमा के महान संगीत निर्देशक। लता जी दिवाली पर उन्हें बधाई देने उनके घर जाया करती थीं। उन्होंने लता जी की गायिकी की मिठास की बहुत सराहना की थी।

  1. उस्ताद अली अकबर खाँ

विश्व प्रसिद्ध सरोद वादक। पाठ में उनके एक प्रसंग का वर्णन है कि कैसे संगीत में पूरी तरह डूब जाने पर उनके सरोद का तार टूट गया था, जिसे लता जी ने ‘सच्चे सुर’ की शक्ति बताया है।

  1. पंडित रविशंकर

प्रसिद्ध सितार वादक और ‘भारत रत्न’ सम्मानित कलाकार। पाठ में अली अकबर खाँ के साथ उनके एक संगीत कार्यक्रम (कंसर्ट) का उल्लेख है।

  1. अन्य संगीत निर्देशक

साक्षात्कार में कई अन्य दिग्गजों का भी नाम आया है जिन्होंने लता जी के करियर में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई –

खेमचंद प्रकाश – फिल्म ‘महल’ के संगीतकार।

अनिल विश्वास – प्रसिद्ध संगीत निर्देशक जिन्होंने लता जी से कई नए प्रयोग करवाए।

ए. आर. रहमान और जतिन-ललित – आधुनिक दौर के संगीतकार जिनके साथ लता जी ने काम किया और उनकी तकनीक की सराहना की।

  1. भाई-बहन

लता जी ने अपने बचपन के प्रसंगों में अपनी बहनों मीना, आशा, उषा और भाई हृदयनाथ (प्रसंगवश) का उल्लेख किया है, जिनके साथ वे बचपन में फिल्मों की नकल उतारा करती थीं।

 

अभ्यास

रचना से संवाद

मेरे उत्तर मेरे तर्क

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

  1. लता जी ने अपने पिताजी से क्या-क्या सीखा?

(क) अनुशासन और नियम के साथ जीना

(ख) भय और संशय के साथ जीना

(ग) स्वाभिमान और सच्चाई के साथ जीना

(घ) चतुराई और संयम के साथ जीना

उत्तर – (ग) स्वाभिमान और सच्चाई के साथ जीना

पाठ में लता जी स्पष्ट कहती हैं कि पिताजी से उन्होंने स्वाभिमान और सही बातों पर अडिग रहने की हिम्मत सीखी।

  1. पिताजी की मृत्यु के बाद परिवार सँभालने का लता जी का निर्णय किस जीवन-मूल्य का द्योतक है?

(क) संघर्ष

(ख) निराशा

(ग) भौतिकता

(घ) कर्तव्यनिष्ठा

उत्तर – (घ) कर्तव्यनिष्ठा

कम आयु में ही पिता के निधन के बाद पूरे परिवार का बोझ उठाना और अपनी जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी से निभाना उनकी ‘कर्तव्यनिष्ठा’ को दर्शाता है।

  1. बिल्कुल ठेठ गँवई अंदाज में यह मंगलागौर का उत्सव मनाया जाता है…” “मंगलागौरके वर्णन से भारतीय समाज की कौन-सी परंपरा उजागर होती है?

(क) संगीत पर आधुनिकता का प्रभाव

(ख) लोकगीतों की लोकप्रियता में कमी

(ग) धार्मिक कार्यक्रमों में संगीत का महत्त्व

(घ) संगीत की महत्त्वपूर्ण सामाजिक भूमिका

उत्तर – (घ) संगीत की महत्त्वपूर्ण सामाजिक भूमिका

मंगलागौर का वर्णन यह दिखाता है कि भारतीय समाज में सामूहिक उत्सवों, विशेषकर विवाह के बाद महिलाओं के बीच संगीत एक सामाजिक कड़ी का काम करता था।

  1. गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन” – इस कहावत का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?

(क) नाव गाँव में नहीं रहती, नदी में बहती है।

(ख) इस नश्वर संसार में सब कुछ नष्ट हो जाता है।

(ग) फिल्मों में गीत गाने से बहुत प्रसिद्धि मिलती है।

(घ) जीवन अस्थायी है, पर कर्म अमर रहते हैं।

उत्तर – (घ) जीवन अस्थायी है, पर कर्म अमर रहते हैं।

लता जी के अनुसार शरीर नश्वर है, लेकिन व्यक्ति का नाम और उसके द्वारा किया गया कार्य (जैसे उनका संगीत) हमेशा जीवित रहता है।

  1. कोरस में साथ गाने वाली लड़कियों के साथ लता जी के संबंध कैसे थे?

(क) औपचारिक

(ख) कामकाजी

(ग) आत्मीय

(घ) प्रतिस्पर्धात्मक

उत्तर – (ग) आत्मीय

लता जी बताती हैं कि कोरस की लड़कियां उनके घर के सदस्यों जैसी थीं और उनके बीच बहुत गहरा और अपनत्व भरा रिश्ता था।

  1. लता मंगेशकर के अनुसार बाबा हरिदास और तानसेन की कथाओं से क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है?

(क) संगीत द्वारा दीपक जलाए जा सकते हैं।

(ख) मेघराग गाने से वर्षा होने लगती है।

(ग) सुर में वाद्य बजाने से तार टूट जाते हैं।

(घ) संगीत में अपरिमित शक्ति होती है।

उत्तर – (घ) संगीत में अपरिमित शक्ति होती है।

हालाँकि लता जी ने स्वयं दीपक जलते नहीं देखा, पर वे मानती हैं कि संगीत में वह असीम शक्ति है जो कुछ भी अप्रत्याशित रच सकती है।

  1. पूरे साक्षात्कार में लता मंगेशकर की जो छवि बनती है, वह मुख्यत – कैसी है?

(क) सादगी, समर्पण और आत्मसम्मान की

(ख) प्रसिद्धि, परिवार को समर्पित और आत्ममुग्ध

(ग) कठोर सिद्धांतवादी और व्यावहारिक व्यक्ति

(घ) आधुनिकता विरोधी रूढ़िवादी विचारों वाली

उत्तर – (क) सादगी, समर्पण और आत्मसम्मान की

पूरे साक्षात्कार में लता जी की विनम्रता, संगीत के प्रति समर्पण और अपने पिता द्वारा दिए गए स्वाभिमान के संस्कारों की छवि उभरती है।

 

मेरी समझ मेरे विचार

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-

  1. पिताजी उस समय पूछते थे, ‘समझ गए न?’… इसके बाद वे कहते थे कि अच्छा अब जाओ, बाहर जाकर खेलो।” यह प्रसंग पारिवारिक अनुशासन और स्नेह के संतुलन का प्रतीक है। कैसे?

(संकेत- यहाँ अनुशासन में डर है या सम्मान?)

उत्तर – पिताजी का केवल गंभीरता से देखना और “समझ गए न?” पूछना यह दर्शाता है कि उनके अनुशासन में ‘डर’ से अधिक ‘सम्मान’ था। बच्चे बिना डाँट-फटकार के अपनी गलती समझ जाते थे और फिर उन्हें बाहर खेलने भेज देना यह दिखाता था कि पिताजी के मन में बच्चों के प्रति गहरा स्नेह भी था। यह अनुशासन और प्रेम का एक आदर्श संतुलन है।

  1. लता मंगेशकर पर अपने पिताजी पं. दीनानाथ मंगेशकर के व्यक्तित्व का क्या प्रभाव पड़ा? उनके कौन-कौन से कार्यों और व्यवहार में उनके पिता का प्रभाव दिखाई देता है?

उत्तर – लता जी पर उनके पिता के संगीत और संस्कारों का गहरा प्रभाव पड़ा। उनके गायन की तकनीकी बारीकियाँ, जैसे – रागों में बदलाव, स्वाभिमान से जीना, और हर हाल में खुश रहने का व्यवहार उनके पिता की ही देन है। यहाँ तक कि संगीत के प्रति उनकी निष्ठा भी उनके पिता को देखकर ही विकसित हुई।

  1. मैंने अपने पिताजी का नाम, थोड़ा ही सही मगर, आगे बढ़ाया।” नाम आगे बढ़ानेका लता जी के लिए क्या अर्थ है? क्या यह सिर्फ प्रसिद्धि पाना है या इससे कोई महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व भी जुड़ा हुआ है?

उत्तर – लता जी के लिए नाम आगे बढ़ाने का अर्थ केवल प्रसिद्ध होना नहीं, बल्कि अपने पिता की संगीत परंपरा को जीवित रखना और उसे नई ऊँचाइयों तक पहुँचाना है। इसमें एक महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व जुड़ा है—अपनी कला की गरिमा बनाए रखना और नई पीढ़ी के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करना।

  1. किसी भी कार्य को पूरा करने में सहयोगियों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। साक्षात्कार के आधार पर बताइए कि लता जी के अपने सहयोगियों के साथ संबंध कैसे थे?

उत्तर – लता जी के संबंध अपने सहयोगियों (संगीतकारों और कोरस की लड़कियों) के साथ बहुत ही सहज और आत्मीय थे। वे स्टूडियो में कोरस की लड़कियों के साथ जमीन पर बैठकर बातें करती थीं और दिवाली जैसे त्योहारों पर अपने वरिष्ठ संगीतकारों को सम्मान देने उनके घर मिठाई लेकर जाती थीं। इससे उनके विनम्र और मिलनसार स्वभाव का पता चलता है।

साक्षात्कार से उभरता व्यक्तित्व/उभरती छवि

साक्षात्कार से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन पंक्तियों से लता मंगेशकर के व्यक्तित्व के कौन- कौन से गुण या विशेषताएँ उभरकर सामने आती हैं? चुनकर लिखिए–

दृढ़ता, कृतज्ञता, दार्शनिकता, समर्पण, उत्तरदायित्व, स्पष्टता, एकाग्रता, साधना, स्पष्टवादिता, विनम्रता, कठोरता, सरलता, आत्मविश्वास, उत्सवप्रियता, श्रद्धा, मानवता, अमरता, घमंड, स्वाभिमान

  1. मुझे अपने गाने और रेकॉर्डिंग के अलावा किसी दूसरी चीज की सुध नहीं रहती थी।”

उभरते गुण – एकाग्रता, समर्पण, साधना।

व्याख्या – यह पंक्ति दर्शाती है कि लता जी अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित थीं। संगीत उनके लिए केवल पेशा नहीं, बल्कि एक कठिन साधना थी जिसमें वे दुनिया को भूलकर लीन हो जाती थीं।

  1. अगर कोई बात तुम्हें सही लगती है, तो उसे करो और किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है।”

उभरते गुण – स्वाभिमान, दृढ़ता, स्पष्टवादिता, आत्मविश्वास।

व्याख्या – यहाँ उनके व्यक्तित्व की निर्भीकता प्रकट होती है। वे अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने वाली महिला थीं, जो सच्चाई के लिए समझौता नहीं करती थीं।

  1. आप जैसे लोग अगर यह मानते हैं कि मैं अमर हूँ, तो यह मुझे मिलने वाले उस प्यार जैसा ही है।”

उभरते गुण – विनिम्रता, कृतज्ञता, सरलता।

व्याख्या – इतनी बड़ी उपलब्धि के बाद भी वे अपनी महानता का श्रेय स्वयं को न देकर जनता के प्यार को देती हैं। यह उनकी विनम्रता और अपने प्रशंसकों के प्रति कृतज्ञता को दर्शाता है।

  1. मेरा गाना अमर है, पर शरीर तो अमर नहीं।”

उभरते गुण – दार्शनिकता, स्पष्टता, यथार्थवाद।

व्याख्या – यह पंक्ति उनके दार्शनिक दृष्टिकोण को उजागर करती है। वे जीवन की नश्वरता को स्वीकार करती हैं और मानती हैं कि व्यक्ति से बड़ा उसका कर्म और उसकी कला होती है।

 

मेरे प्रश्न

नीचे दिए गए वाक्य को पढ़िए-

“संगीत में असीम शक्ति और अप्रत्याशित रचने की क्षमता होती है।”

इस वाक्य के आधार पर अनेक प्रश्न बनाए जा सकते हैं, जैसे-

  1. लता मंगेशकर ने संगीत के विषय में क्या कहा?
  2. लता मंगेशकर ने संगीत की क्या विशेषताएँ बताई हैं?
  3. लता मंगेशकर ने संगीत की क्षमता का आकलन करते हुए क्या कहा?
  4. उस्ताद अली अकबर खाँ और पंडित रविशंकर के कंसर्ट में हुई घटना से संगीत के बारे में क्या पता चलता है?

आपने देखा कि अनेक प्रश्नों का एक ही उत्तर हो सकता है और एक ही उत्तर से अनेक प्रश्न बनाए जा सकते हैं।

अब नीचे दिए गए उत्तरों से अधिक से अधिक प्रश्न बनाइए (कम से कम दो) –

  1. उत्तर – मंगलागौरजैसे लोक पर्वों में स्त्रियों के बीच गीत, नृत्य और सौहार्द का भाव झलकता था।

प्रश्न (क) – लता मंगेशकर के अनुसार ‘मंगलागौर’ उत्सव का स्वरूप कैसा होता था?

प्रश्न (ख) – महाराष्ट्र के ‘मंगलागौर’ जैसे लोक पर्वों में स्त्रियों के बीच किस तरह के सामाजिक भाव दिखाई देते थे?

प्रश्न (ग) – स्त्रियों के बीच गीत, नृत्य और आपसी प्रेम के प्रदर्शन के लिए कौन-सा पारंपरिक उत्सव मनाया जाता था?

  1. उत्तर – लता जी का मानना था कि तकनीकी प्रगति के बावजूद पुराने संगीतकारों की सादगी और गहराई अद्वितीय थी।

प्रश्न (क) – पुराने दौर के संगीतकारों की कला के विषय में लता मंगेशकर के क्या विचार थे?

प्रश्न (ख) – लता जी ने वर्तमान तकनीक और पुराने दौर की संगीत साधना के बीच क्या मुख्य अंतर बताया?

प्रश्न (ग) – पुराने संगीतकारों की वह कौन-सी विशेषता थी जो लता जी के अनुसार आज की तकनीक के दौर में भी बेजोड़ या अद्वितीय है?

मेरे अनुभव मेरे विचार

अपने अनुभवों के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

  1. अगर कोई बात तुम्हें सही लगती है, तो उसे करो और किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है।”

क्या आप किसी ऐसी स्थिति से गुजरे हैं जब आपको किसी सही बात पर अकेले खड़ा होना पड़ा हो? कब और क्यों?

उत्तर – हाँ, कई बार ऐसी स्थितियाँ आती हैं। उदाहरण के तौर पर विद्यालय में जब किसी सहपाठी के साथ अन्याय हो रहा हो और पूरी कक्षा चुप हो, तब अकेले उसकी सच्चाई का साथ देना। मेरा यह मानना है कि ऐसी स्थिति में झुकने की जरूरत इसलिए नहीं है क्योंकि सच्चाई अंततः अपनी पहचान बना ही लेती है। अकेले खड़े होने से आपका आत्मबल और ‘स्वाभिमान’ बढ़ता है।

  1. बाबा ने जैसा सिखाया था, उस पर हम सभी भाई-बहनों ने चलने का प्रयास किया।”

आपके परिवार में भी कोई ऐसी सीख या नियम अवश्य होंगे जिनका पालन आप किसी के याद दिलाए बिना स्वत – करते होंगे. उनके विषय में बताइए।

उत्तर – हर परिवार की कुछ अपनी परंपराएँ होती हैं, उदाहरणस्वरूप बड़ों के कमरे में जाने से पहले अनुमति लेना या विशेष अवसरों पर उनके पैर छूना। भोजन करने से पहले ईश्वर को धन्यवाद देना। घर आए अतिथि का जल और भोजन से सत्कार करना। ये नियम ‘संस्कार’ बन जाते हैं, जिन्हें निभाने के लिए किसी के टोकने की आवश्यकता नहीं होती।

  1. पहले दिन गुड़ि बाँधने के बाद नौ दिन तक उत्सव मनाया जाता है।”

आप भी अपने घर में किसी पारंपरिक पर्व को विशेष तरीके से मनाते होंगे। उसका वर्णन कीजिए।

उत्तर – हमारा परिवार दीपावली विशेष तरीके से मनाता है। दीपावली पर घर की सफाई के साथ-साथ मिट्टी के दीये जलाना, घर के मुख्य द्वार पर रंगोली बनाना और साथ मिलकर पूजा करना। यह ‘उत्सवप्रियता’ और परिवार की एकजुटता को दर्शाता है।

  1. बिल्कुल ठेठ गँवई अंदाज में यह मंगलागौर का उत्सव मनाया जाता है, मगर आहिस्ता-आहिस्ता वह भी अब खत्म हो रहा है।”

पाठ में आपने पढ़ा कि लता मंगेशकर के बचपन से अब तक उत्सवों से जुड़ी अनेक परंपराएँ बदल रही हैं। कौन-कौन सी परंपराएँ बदल गई हैं? अपने घर-परिवार में बातचीत करके पता लगाइए कि विभिन्न त्योहारों को मनाने के तरीकों में कौन-कौन से बदलाव आ रहे हैं?

उत्तर – पाठ के आधार पर – लता जी ने बताया कि पहले ‘मंगलागौर’ जैसे उत्सव गँवई अंदाज़ में और सामूहिक रूप से मनाए जाते थे, जो अब धीरे-धीरे कम हो रहे हैं। पहले लोग खुद जाकर मिलते थे, जैसे लता जी का नौशाद साहब के घर जाना, अब तकनीक ने इसे बदल दिया है। आज के दौर में –

डिजिटल शुभकामनाएँ – अब लोग व्यक्तिगत रूप से मिलने के बजाय व्हाट्सएप या सोशल मीडिया पर बधाई देना पसंद करते हैं।

सामूहिक से व्यक्तिगत – पहले पूरे मोहल्ले का त्योहार होता था, अब यह केवल परिवार के ड्राइंग रूम तक सिमट गया है।

बाज़ारीकरण – घर की बनी मिठाइयों की जगह अब रेडीमेड पैकेट और उपहारों ने ले ली है।

तकनीक का प्रभाव – लाउडस्पीकर और डीजे ने पारंपरिक वाद्य यंत्रों और लोकगीतों की जगह ले ली है।

 

विधा से संवाद

साक्षात्कार की पड़ताल

  1. ‘ऐसी भी बातें होती हैं एक साक्षात्कार है। साक्षात्कार में एक व्यक्ति प्रश्न पूछता है और दूसरा व्यक्ति उन प्रश्नों के उत्तर देता है। साक्षात्कार विधा के कुछ मुख्य बिंदु आगे दिए गए हैं। इस साक्षात्कार में से इन मुख्य बिंदुओं को रेखांकित करने वाली पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए।

साक्षात्कार के मुख्य बिंदु

  • साक्षात्कार लेने वाले का नाम और जिसका साक्षात्कार लिया गया, उसका नाम

नाम (साक्षात्कारकर्ता एवं अतिथि),यतींद्र मिश्र (साक्षात्कार लेने वाले) और लता मंगेशकर (जिनका साक्षात्कार लिया गया)।

  • प्रश्नोत्तर

“यतींद्र मिश्र  – “आपके पिताजी… की वे कौन-सी स्मृतियाँ हैं…?”

“लता मंगेशकर  – “”कई बातें हैं। जैसे हम लोग बचपन में जब बहुत शरारत करते थे…”

  • भावनात्मक वातावरण

“मैं… आपके महान जीवन की उन दुर्लभ छवियों से उन करोड़ों प्रशंसकों को मिलवा सकूँ…” (श्रद्धा का भाव) और “”(खिलखिलाकर हँसती हैं)”” (खुशी का भाव)।”

  • आमंत्रण, स्वागत और परिचय

“दीदी, आपके संगीत की अप्रतिम यात्रा पर बातचीत शुरू करते हैं… तमाम देशवासियों की ओर से प्रणाम करते हुए आपसे प्रश्न पूछना चाहूँगा।”

  • .उत्तर देने की शैली का संकेत

“कोष्ठक में दिए गए निर्देश जैसे – (हँसते हुए), (खिलखिलाकर हँसती हैं), (जी, जरूर)। ये संकेत वक्ता के हाव-भाव दर्शाते हैं।”

  • .विचार और उदाहरण

“विचार – “”संगीत में वह असीम शक्ति है कि कुछ अप्रत्याशित वह जरूर रच देता है।” उदाहरण – उस्ताद अली अकबर खाँ के सरोद का तार टूटने वाला प्रसंग।”

  • संस्मरण

“मुझे याद है कि प्रभात फिल्म कंपनी की एक पिक्चर थी ‘संत तुकाराम’…” (बचपन की यादें)।”

  • समापन

“अपनी कृपा की छाया से जैसे मुझे छाँह दी है, वैसे ही हर एक कलाकार और नेक इंसानों के ऊपर भी रखना… यही प्रार्थना है।”

 

  1. मैं कोशिश करूँगी कि जो कुछ भी मैंने संगीत में रहते हुए जाना है, उसे आपको बता सकूँ।”

इस कथन से साक्षात्कार की शैली के विषय में क्या पता चलता है क्या यह औपचारिक संवाद है या आत्मीय बातचीत? अपने विचार तर्क सहित लिखिए।

उत्तर – यह साक्षात्कार ‘आत्मीय बातचीत’ की श्रेणी में आता है। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं –

संवाद की सरलता – लता जी का यह कहना कि वे ‘कोशिश करेंगी’, उनकी विनम्रता और सीखने की प्रवृत्ति को दर्शाता है, जो किसी औपचारिक इंटरव्यू के बजाय दो संगीत प्रेमियों के बीच की चर्चा जैसा लगता है।

भावनात्मक जुड़ाव – पूरे संवाद में यतींद्र मिश्र उन्हें ‘दीदी’ कहकर संबोधित करते हैं और लता जी भी अपने घर, बचपन और व्यक्तिगत दुखों-सुखों को खुलकर साझा करती हैं।

पारदर्शिता – लता जी का अपने प्रशंसकों के प्रति आभार व्यक्त करना और यह स्वीकार करना कि उन्हें जितना मिला, वे शायद उतना लौटा नहीं पाईं, एक गहरा भावनात्मक और आत्मीय पक्ष है।

स्वतंत्र प्रवाह – यहाँ प्रश्नों के उत्तर केवल सूचना देने के लिए नहीं हैं, बल्कि कुछ किस्सों, जैसे दिवाली पर मिठाई ले जाना या बचपन की फिल्मों की नकल करना आदि के माध्यम से एक कहानी की तरह चलते हैं, जो आत्मीय शैली की पहचान है।

 

आपका साक्षात्कार

आप पूछिए, मैं आपके प्रश्नों का जवाब देने के लिए तैयार हूँ।”

प्रस्तुत पाठ में विश्व-प्रसिद्ध व्यक्तित्व का साक्षात्कार दिया गया है। कल्पना कीजिए कि आप भी लता मंगेशकर के इस साक्षात्कार में उपस्थित हैं। आप लता जी से कौन-कौन से अलग प्रश्न पूछते और क्यों?

उत्तर – मेरे प्रस्तावित प्रश्न और उनके पीछे के तर्क निम्नलिखित हैं –

  1. संगीत और मौन का संबंध

प्रश्न – “दीदी, आपके गायन में शब्दों के बीच जो ‘मौन’ या खाली जगह होती है, वह भी उतना ही प्रभावी होता है जितना कि सुर। आप गाते समय इस ठहराव या मौन को कैसे साधती थीं?”

क्यों – मैं यह समझना चाहता कि एक महान कलाकार संगीत के सुरों के साथ-साथ ‘शांति’ और ‘विराम’ का उपयोग भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कैसे करता है।

  1. रियाज़ की बदलती परिभाषा

प्रश्न – “आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में नए कलाकार जल्द सफलता चाहते हैं। आपके लिए ‘रियाज़’ केवल गले की कसरत थी या मन की शुद्धि? क्या आज के दौर में भी उसी तरह की तपस्या संभव है?”

क्यों – इस प्रश्न के माध्यम से मैं आज की पीढ़ी के लिए उनके अनुशासन और साधना के महत्त्व को स्पष्ट करना चाहता।

  1. भाषाओं की विविधता और भाव

प्रश्न – “आपने भारत की लगभग हर क्षेत्रीय भाषा में गीत गाए हैं। जब आप ऐसी भाषा में गाती थीं जिसे आप रोज़मर्रा में नहीं बोलतीं, तो उस भाषा की ‘आत्मा’ और ‘मिट्टी की खुशबू’ को अपने स्वर में कैसे उतारती थीं?”

क्यों – यह प्रश्न उनके भाषाई कौशल और एक कलाकार की संवेदनशीलता को समझने के लिए होता।

  1. विफलता और असंतोष

प्रश्न – “क्या कभी ऐसा हुआ कि कोई गाना रिकॉर्ड करने के बाद आपको लगा हो कि आप इससे बेहतर कर सकती थीं? एक कलाकार के रूप में खुद से होने वाला वह ‘असंतोष’ आपको आगे बढ़ने में कितनी मदद करता था?”

क्यों – हम अक्सर उनकी सफलता देखते हैं, लेकिन मैं उनकी आत्म-समीक्षा (Self-criticism) के बारे में जानना चाहता, जो किसी भी व्यक्ति को महान बनाती है।

  1. संगीत के भविष्य पर विचार

प्रश्न – “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक तकनीक के इस युग में, क्या आपको लगता है कि ‘मानवीय संवेदना’ और ‘आत्मा का सुर’ संगीत में सुरक्षित रह पाएगा?”

क्यों – यह प्रश्न उनके दूरदर्शी विचारों और कला के प्रति उनकी गहरी चिंता या आशावाद को जानने के लिए होता।

 

विषयों से संवाद

  1. एक स्टूडियो से दूसरे और तीसरे स्टूडियो के चक्कर में ही पूरा दिन बीत जाता था।”

सन् 1942 में अपने पिता की मृत्यु के बाद लता मंगेशकर ने अकेले अपनी माँ, छोटे भाई-बहनों की देखभाल की और अपने घर को सँभाला। उस समय उनकी आयु मात्र 13 वर्ष थी। तब महिलाओं का फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। उस समय सुबह से रात तक एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो भागते हुए लता जी के एक दिन की कल्पना कीजिए। इस भागदौड़ में वे किन-किन चुनौतियों का सामना करती होंगी?

(संकेत- भोजन, यात्रा – भाड़ा, सुरक्षा, थकान आदि)

उत्तर – सन् 1942 में, जब समाज रूढ़ियों से घिरा था, एक 13 साल की बच्ची के कंधों पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी आना किसी पहाड़ टूटने जैसा था। उनके एक दिन की चुनौतियों की कल्पना इस प्रकार की जा सकती है –

सुबह की शुरुआत और जिम्मेदारी – भोर होते ही घर के काम निपटाना और छोटे भाई-बहनों मीना, आशा, ऊषा, हृदयनाथ के लिए भोजन की व्यवस्था करना। माँ को सांत्वना देना और फिर भारी मन से काम की तलाश में निकलना।

परिवहन और यात्रा-भाड़ा – उस समय आज जैसी मेट्रो या कैब नहीं थीं। एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो जाने के लिए पैदल चलना या ट्राम/बस का इंतज़ार करना पड़ता होगा। जेब में पैसे कम होने के कारण अक्सर कई मील पैदल चलना उनकी मजबूरी रही होगी ताकि कुछ पैसे बचाकर घर ले जा सकें।

सुरक्षा और सामाजिक चुनौतियाँ – एक छोटी लड़की का फिल्म नगरी के पुरुषों के बीच काम करना सुरक्षित महसूस नहीं होता होगा। लोगों की तिरछी निगाहें और ‘फिल्म में काम करने वाली’ जैसी सामाजिक टिप्पणियों का सामना करना सबसे बड़ी मानसिक चुनौती रही होगी।

भोजन और थकान – स्टूडियो के बाहर घंटों इंतज़ार करना, अक्सर भूख को दबा लेना ताकि घर में छोटों को पूरा भोजन मिल सके। दिन भर की भागदौड़ के बाद रात को जब वे लौटती होंगी, तो शरीर थकान से चूर होता होगा, लेकिन अगले दिन फिर से वही संघर्ष करने की ‘दृढ़ता’ उनके चेहरे पर दिखती होगी।

काम की अनिश्चितता – तकनीक पुरानी थी, एक गाने के खराब होने पर पूरा दिन फिर से रिकॉर्डिंग करनी पड़ती थी। थके हुए गले के बावजूद मुस्कुराकर गाना उनकी सबसे बड़ी ‘साधना’ थी।

 

  1. पहले के दौर में पुरुष और स्त्री आवाज़ों के कोरस हम लोगों के गीतों के साथ ही रेकॉर्ड होते थे। भले ही वह गाना डुएट हो या फिर कोई सोलो सांग।”

अपने घर, आस-पड़ोस, समुदाय, विद्यालय में होने वाले उन कार्यों के विषय में बताइए जिसमें सहयोग और सामूहिकता की आवश्यकता होती है।

उत्तर – लता जी ने बताया कि पहले ‘कोरस’ अर्थात् सामूहिक स्वर मुख्य गायकों के साथ ही रिकॉर्ड होते थे। यह ‘टीम वर्क’ या सामूहिकता का प्रतीक है। हमारे जीवन में भी ऐसे कई कार्य हैं जहाँ सहयोग अनिवार्य है –

क. घर और परिवार में

विवाह या उत्सव – घर में किसी भी बड़े आयोजन, जैसे शादी या पूजा में परिवार का हर सदस्य अलग-अलग जिम्मेदारी उठाता है। कोई मेहमानों को सँभालता है, तो कोई भोजन की व्यवस्था। बिना सामूहिकता के यह संभव नहीं।

सफाई और रखरखाव – घर की साप्ताहिक सफाई या त्योहारों पर सजावट में जब सभी सदस्य हाथ बँटाते हैं, तो काम आसान और आनंददायक हो जाता है।

ख. आस-पड़ोस और समुदाय में

सार्वजनिक त्यौहार – गणेश उत्सव, दुर्गा पूजा या दिवाली के समय मोहल्ले के लोग मिलकर चंदा इकट्ठा करते हैं, पंडाल लगाते हैं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं।

आपदा प्रबंधन – मोहल्ले में किसी भी प्रकार की विपत्ति, जैसे – आग लगना या चोरी के समय पड़ोसी ही एक-दूसरे के काम आते हैं।

ग. विद्यालय में

सांस्कृतिक कार्यक्रम और नाटक – किसी भी नाटक के मंचन में न केवल मंच पर दिखने वाले कलाकार, बल्कि परदे के पीछे प्रकाश (Light), ध्वनि (Sound) और साज-सज्जा सँभालने वालों का सहयोग अनिवार्य होता है।

खेलकूद – रिले रेस या फुटबॉल/क्रिकेट जैसे खेलों में जीत केवल एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि पूरी टीम के ‘सहयोग’ की होती है।

 

शास्त्रीय संगीत

  1. फिर उसमें लंबी-लंबी रागदारी वाले गायन की भी परंपरा थी।”

रागदारी वाले गायन का अर्थ है भारतीय शास्त्रीय संगीत। आपने इस पाठ में संगीत से जुड़े अनेक शब्दों को पढ़ा है। शब्दकोश, इंटरनेट, पुस्तकालय और अपने शिक्षकों की सहायता से इनके अर्थ और उदाहरण खोजकर लिखिए-

राग, सुर, बंदिश, अभंग, सोहर, फाग, बधावा

उत्तर – राग – स्वरों का वह विशिष्ट समूह जो सुनने में मधुर हो और मन में विशेष भाव उत्पन्न करे। इसमें आरोह-अवरोह के नियम होते हैं। – “राग यमन –  राग भैरवी –  राग जयजयवंती।”

सुर – “संगीत की वह ध्वनि जिसका एक निश्चित कंपन (Frequency) हो। मुख्य रूप से सात सुर होते हैं – सा –  रे –  ग –  म –  प –  ध –  नी।” – “षडज (सा) –  मध्यम (म) –  पंचम (प)।”

बंदिश – किसी राग के नियमों में बँधी हुई वह कविता या शब्द जिसे ताल के साथ गाया जाता है। – छोटा ख्याल या बड़ा ख्याल की रचनाएँ।

अभंग – विट्ठल (विष्णु) की भक्ति में गाए जाने वाले मराठी छंद या पद। यह भक्ति संगीत की एक महत्त्वपूर्ण शैली है। – संत तुकाराम और संत ज्ञानेश्वर के अभंग।

सोहर – “बच्चे के जन्म के अवसर पर गाए जाने वाले मंगल गीत। यह मुख्य रूप से उत्तर भारत (यूपी –  बिहार) में प्रचलित है।” – “जुग-जुग जियसु ललनवा…”

फाग – “होली के अवसर पर गाए जाने वाले गीत –  जिनमें फाल्गुन मास और मस्ती का वर्णन होता है।” – “होली खेलें रघुवीरा अवध में…”

बधावा – “किसी शुभ कार्य –  विवाह या संतान प्राप्ति पर दी जाने वाली बधाई के गीत।” – राम जन्म या कृष्ण जन्म के बधाई गीत।

  1. त्योहारों के संदर्भ में एक बात और ध्यान में आती है कि अधिकांश प्रदेशों में पर्वों व अनुष्ठानों से संदर्भित घर-घर गीत गाए जाने का प्रचलन रहा है।” आपने पढ़ा कि भारत में त्योहारों पर फाग, धमार, सोहर, बधावा, छठ के गीत आदि गाने की परंपरा है। अपने क्षेत्र में गाए जाने वाले ऐसे गीतों के विषय में अपने घर में पता कीजिए और एक गीत अपनी लेखन – पुस्तिका में लिखिए।

उत्तर – भारत के हर क्षेत्र की अपनी लोक संस्कृति है। हमारे यहाँ एक प्रसिद्ध सोहर जो बच्चे के जन्म का गीत का होता है, उदाहरण के तौर पर यहाँ प्रस्तुत है-

गीत – सोहर (भोजपुरी)

“जुग जुग जियसु ललनवा, भवनवा के भाग जागल हो।

ललना लाल हुईहें कुलवा के दीपक, मनवा में आस लागल हो॥”

भावार्थ – यह गीत बच्चे के जन्म पर गाया जाता है। इसमें आशीर्वाद दिया गया है कि बच्चा युगों-युगों तक जिए जिससे घर का भाग्य जाग जाए। वह कुल का दीपक बनेगा और सबकी आशाएँ पूरी करेगा।

 

हम ऐसे भी बोलते हैं

वे बस हमको गंभीरता से देखते थे… मगर हम सभी समझ जाते थे कि हमको बुलाया किसलिए गया है।” 1. क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा व्यक्ति है जो बिना कुछ बोले सिर्फ नजरों या संकेतों (हाव-भाव) से ही आपको समझा देता है? उस अनुभव के विषय में बताइए।

उत्तर – हाँ, लगभग हर व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई ऐसा व्यक्तित्व होता है जिसकी नज़रें ही उसके शब्दों का काम करती हैं। मेरे जीवन में यह व्यक्तित्व मेरे पिता हैं।

अनुभव – जब कभी घर में कोई मेहमान आता है और मैं अनजाने में कोई ऐसी शरारत या बात करता हूँ जो उचित नहीं है, तो मेरे पिता केवल एक बार अपनी भौहें सिकोड़कर मेरी ओर देखते हैं। उस एक पल की ‘नज़र’ में गुस्सा, निर्देश और अनुशासन सब कुछ छिपा होता है। मुझे तुरंत समझ आ जाता है कि मुझे अपनी बात रोकनी है या वहाँ से हट जाना है।

सीख – यह अनुभव सिखाता है कि गहरे रिश्तों में शब्दों की आवश्यकता नहीं होती; वहाँ ‘मूक संवाद’ सबसे प्रभावी होता है। यह अनुशासन और सम्मान का प्रतीक है।

 

  1. यदि कोई व्यक्ति बिना बोले (संकेत भाषा में) आपको कुछ समझा रहा है, तो वह आपके साथ और आप उसके साथ कैसा व्यवहार करेंगे?

(संकेत- धैर्य, जिज्ञासा, समानुभूति आदि)

उत्तर – यदि कोई व्यक्ति बिना बोले केवल संकेतों से अपनी बात समझा रहा है, तो उस समय व्यवहार में निम्नलिखित गुणों का होना अनिवार्य है –

धैर्य (Patience) – संकेत भाषा को समझने में समय लग सकता है। उस व्यक्ति को बीच में टोकने के बजाय धैर्यपूर्वक उसके पूरे संकेत को देखना चाहिए ताकि अर्थ का अनर्थ न हो।

जिज्ञासा (Curiosity) – हमारे मन में उस व्यक्ति की बात को गहराई से जानने की इच्छा होनी चाहिए। हमारी आँखें और चेहरा यह दर्शाना चाहिए कि हम उसकी बातों में पूरी दिलचस्पी ले रहे हैं।

समानुभूति (Empathy) – यदि सामने वाला व्यक्ति बोलने में असमर्थ है या जानबूझकर मौन है, तो हमें उसके स्थान पर खुद को रखकर उसकी भावनाओं को समझना चाहिए। उसे यह महसूस नहीं होना चाहिए कि वह हमसे अलग है।

प्रतिक्रिया (Response) – हमें भी सरल संकेतों (जैसे सिर हिलाना या मुस्कुराना) के माध्यम से उसे यह आश्वासन देना चाहिए कि हम उसकी बात समझ रहे हैं।

सृजन

  1. “अगर हम समय के चक्र (टाइम मशीन) को घुमाकर सन् 1949-50 में ले जाएँ”, कल्पना कीजिए कि आपके पास टाइम मशीन है। 1940-50 के दशक में जाकर लता जी से मिलिए और उनके साथ बिताए गए एक दिन का वर्णन डायरी के रूप में लिखिए। उस समय की वेशभूषा, भोजन, संगीत आदि का वर्णन अवश्य कीजिए।

दिनांक – 15 मार्च, 1947

समय – रात 11 -00 बजे

स्थान – बंबई (मुंबई)

आज का दिन मेरे जीवन का सबसे अविस्मरणीय दिन रहेगा। मेरी टाइम मशीन मुझे सीधे 1940 के दशक के उत्तरार्ध में ले गई। आज मेरी मुलाकात उस उभरती हुई कलाकार से हुई, जिसे दुनिया ‘लता मंगेशकर’ के नाम से जानने वाली है।

सुबह का दृश्य – मैं गोरेगाँव के एक पुराने स्टूडियो पहुँचा। वहाँ मैंने एक दुबली-पतली, किशोर लड़की को देखा, जिसने सफेद सूती साड़ी पहनी थी, जिसके पल्लू पर साधारण नीली धारियाँ थीं। उनके बाल दो चोटियों में बँधे थे और चेहरे पर अद्भुत दृढ़ता और विनम्रता का मेल था।

भोजन और सादगी – दोपहर के समय, उन्होंने अपना साधारण-सा लकड़ी का टिफिन खोला। भोजन में दाल, चावल और सूखी सब्ज़ी थी। उन्होंने बड़े स्नेह से मुझे भी साथ बैठने को कहा। उस दौर के स्टूडियो में आज जैसी चकाचौंध नहीं थी, लेकिन आत्मीयता बहुत थी।

संगीत की साधना – शाम को रिकॉर्डिंग शुरू हुई। उस समय तकनीक इतनी पुरानी थी कि एक छोटा-सा शोर भी पूरी रिकॉर्डिंग खराब कर देता था। मैंने उन्हें ‘महल’ फिल्म के गाने ‘आएगा आने वाला’ का अभ्यास करते देखा। रिकॉर्डिंग रूम में माइक्रोफोन से दूर खड़े होकर आवाज़ की गहराई पैदा करने का उनका तरीका देख मैं दंग रह गया। वह घंटों बिना थके गाती रहीं, मानों वह संगीत की साधना कर रही हों।

आज मैंने जाना कि एक महानायक बनने के पीछे कितनी कर्तव्यनिष्ठा और मेहनत छिपी होती है।

अविनाश रंजन गुप्ता

 

  1. आप जैसे लोग अगर यह मानते हैं कि मैं अमर हूँ, तो यह मुझे मिलने वाले उस प्यार जैसा ही है।”

कल्पना कीजिए कि यह लता जी का अंतिम संदेश है— आप उस पर अपनी भावनात्मक प्रतिक्रिया एक अनुच्छेद के रूप में व्यक्त कीजिए।

“अमर स्वर का महाप्रयाण”

जब मैं लता जी के इन शब्दों को पढ़ता हूँ कि “मेरा गाना अमर है, पर शरीर तो अमर नहीं,” तो मन एक असीम कृतज्ञता और दुःख से भर जाता है। यह संदेश उनकी उस दार्शनिकता को उजागर करता है, जहाँ वे स्वयं को ईश्वर की कृपा का एक माध्यम मात्र मानती हैं। हमारे लिए लता जी केवल एक पार्श्वगायिका नहीं थीं, बल्कि वे एक ऐसी धुरी थीं, जिससे भारतीय संस्कृति का संगीत जुड़ा हुआ था। उनकी आवाज़ में वह असीम शक्ति थी जो सरहदें मिटा देती थी और मन को शांति पहुँचाती थी। यह सोचना कि अब कोई ‘दूसरी लता’ नहीं होगी, मन में एक खालीपन पैदा करता है। लेकिन जैसा कि उन्होंने कहा, उनका संगीत सदैव जीवित रहेगा। उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके द्वारा सिखाए गए स्वाभिमान और सादगी के जीवन-मूल्यों को अपनाएँ। उनकी आवाज़ हमारे सुख-दुःख की साथी बनकर अनंत काल तक गूँजती रहेगी। वे चली गईं, पर उनकी ‘पहचान’ उनके स्वरों में हमेशा सुरक्षित रहेगी।

 

भाषा से संवाद

व्याकरण की बात

मुहावरे

“मगर किसी के आगे जाकर हाथ नहीं पसारना है।”

उपर्युक्त वाक्य में रेखांकित अंश मुहावरा है। हाथ पसारना या फैलाना का अर्थ है— कुछ माँगना या याचना करना। हाथों से जुड़े अनेक मुहावरे आपने पढ़े और सुने होंगे। ऐसे ही कुछ मुहावरे नीचे दिए गए हैं। इनका प्रयोग करते हुए वाक्य बनाइए

  1. हाथ में आना

अर्थ – अधिकार में आना या किसी चीज़ का प्राप्त होना।

वाक्य – बरसों की कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार पुश्तैनी ज़मीन का मालिकाना हक झूरी के हाथ में आ गया।

  1. हाथ का मैल होना

अर्थ – धन-दौलत को तुच्छ समझना या पैसा बहुत छोटी चीज़ होना।

वाक्य – लता जी के लिए पैसा कभी प्राथमिकता नहीं थी, वे मानती थीं कि दौलत तो हाथ का मैल है, असली चीज़ तो कलाकार की साधना है।

  1. हाथ से हाथ मिलाना

अर्थ – मिल-जुलकर काम करना या सहयोग करना।

वाक्य – यदि देश के सभी नागरिक हाथ से हाथ मिलाकर चलें, तो समाज-सुधार का कार्य बहुत आसान हो जाएगा।

  1. हाथ साफ करना

अर्थ – चोरी करना या बड़ी चतुराई से कुछ ले उड़ना।

वाक्य – मेले की भीड़भाड़ का फायदा उठाकर चोर ने एक यात्री के पर्स पर हाथ साफ कर दिया।

  1. हाथ से निकल जाना

अर्थ – अवसर खो देना या नियंत्रण से बाहर हो जाना।

वाक्य – हीरा और मोती को पकड़ने का अच्छा मौका था, लेकिन जैसे ही वे भागे, वे गया के हाथ से निकल गए।

  1. हाथ धो बैठना

अर्थ – किसी प्रिय वस्तु या व्यक्ति को हमेशा के लिए खो देना।

वाक्य – काँजीहौस में बंद जानवरों को डर था कि यदि वे जल्द ही वहाँ से नहीं भागे, तो अपनी जान से हाथ धो बैठेंगे।

 

 

हमारी भाषाएँ

  1. गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन। मतलब गाँव तो बह जाता है, लेकिन जो नाम है, वह रह जाता है।” आपने एक कहावत और उसका हिंदी में अर्थ पढ़ा। इस कहावत के अर्थ को अपने घर या क्षेत्र की भाषा अथवा भाषाओं में लिखिए।

उत्तर – लता जी द्वारा प्रयुक्त इस कहावत का अर्थ है कि भौतिक शरीर या स्थान नष्ट हो सकता है, परंतु व्यक्ति का यश और कर्म सदैव जीवित रहते हैं।

ब्रजभाषा (उत्तर प्रदेश) – “गाँव बह गयौ, पै नाम रह गयौ।”

भोजपुरी (बिहार/पूर्वांचल) – “गाँव बह गइल, बाकिर नाम रह गइल।”

मैथिली – “गाम बह गेल, मुदा नाम रहि गेल।”

तर्क – इन सभी भाषाओं में शब्द भले ही थोड़े बदल गए हों, लेकिन “नाम” (यश) की अमरता का भाव बिल्कुल वही है जो मूल मराठी कहावत में था।

  1. लता जी ने मराठी कहावत को हिंदी में समझाया। अब आप अपनी मातृभाषा की कोई कहावत चुनिए और उसका हिंदी में अनुवाद कीजिए। अनुवाद के बाद भाव में क्या परिवर्तन आया? लिखिए।

उत्तर – भोजपुरी की एक बहुत प्रसिद्ध कहावत “अधजल गगरी छलकत जाय।”

हिंदी अनुवाद – “आधी भरी हुई गगरी (घड़ा) चलते समय ज्यादा छलकती है।”

भावार्थ – जिस व्यक्ति के पास ज्ञान कम होता है, वह उसका प्रदर्शन या दिखावा अधिक करता है।

अनुवाद के बाद भाव में परिवर्तन –

जब हम इसका अनुवाद हिंदी में करते हैं, तो अर्थ तो स्पष्ट हो जाता है, लेकिन जो ‘ठेठपन’ और ‘लय’ भोजपुरी शब्दों जैसे ‘गगरी’ और ‘छलकत’ में है, वह मानक हिंदी में थोड़ी कम हो जाती है। मातृभाषा में यह कहावत अधिक चुटीली और प्रभावशाली लगती है, जबकि हिंदी अनुवाद इसे अधिक गंभीर और औपचारिक बना देता है।

  1. एक सेतु चित्रबनाइए जिसमें दो किनारे हों— एक किनारे पर हिंदी और दूसरे किनारे पर अपने घर या क्षेत्र की भाषा। दोनों किनारों के बीच में ऐसे शब्द लिखिए जो दोनों भाषाओं में समान अर्थ रखते हैं।

उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर करें।

 

गतिविधियाँ

  1. ‘नाम रह जाएगा’ वाक्य के लिए एक सुंदर पोस्टर बनाइए। इसके ऊपर ‘ नाम रह जाता है…’ लिखिए और नीचे विभिन्न भारतीय भाषाओं में ‘नाम’ शब्द (जैसे- नाव, नालो, नांउ, नाउँ, मिङ्, पेरु, नामम् आदि) लिखिए। साथ ही कक्षा में सब विद्यार्थी मिलकर एक प्रतिज्ञा लें- ‘हम हर भाषा का सम्मान करेंगे।”

उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर करें।

  1. कागज पर एक पेड़ का चित्र बनाइए। इसे नाम दीजिए— भाषा – वृक्ष। इसकी जड़ में लिखिए- ‘भारतीय संस्कृति’; तने पर और शाखाओं पर लिखिए- हिंदी, मराठी, तमिल, बांग्ला, गुजराती आदि। हर शाखा पर उस भाषा का एक प्यारा शब्द जोड़िए।

उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर करें।

  1. समूह में मिलकर किसी विषय पर एक छोटा समाचार बुलेटिन तैयार कीजिए जिसमें हिंदी, अंग्रेजी और किसी क्षेत्रीय भाषा का प्रयोग हो। उदाहरण के लिए, एक विषय हो सकता है —- ‘कला जो जोड़ती है, बाँटती नहीं। ‘

उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर करें।

  1. भाषाई स्मृति पोटली

अपने परिवार में प्रयुक्त अलग-अलग भाषाओं के पाँच शब्द एकत्र कीजिए (जैसे- दादी मराठी बोलती हों, माँ हिंदी)। उन्हें एक ‘शब्द पोटली’ में कार्ड पर सजाइए।

उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर करें।

  1. स्वर – कोलाज

लता जी के जीवन के प्रेरक वाक्यों और गीतों का चित्रमय कोलाज बनाइए।

उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर करें।

  1. समय-रेखा

लता जी के जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ कालानुक्रम में दर्शाइए।

उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर करें।

 

खोजबीन

लता मंगेशकर से जान-पहचान

  1. जब मैं बड़ी हो जाऊँगी, तब मुझे भी ऐसे ही मेडल मिलेंगे।”

लता जी ने बचपन में मेडल पाने की कल्पना की और जीवन में अनगिनत पुरस्कार और मेडल प्राप्त भी किए। पता कीजिए कि उन्होंने जीवन भर में कौन-कौन से ‘मेडल’ और पुरस्कार प्राप्त किए?

उत्तर – लता जी को उनके सात दशकों के करियर में हज़ारों पुरस्कार मिले। उनके कुछ सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों की सूची  –

भारत रत्न – 2001 – भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान।

पद्म विभूषण – 1999 – भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान।

पद्म भूषण – 1969 – कला के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए।

दादा साहेब फाल्के पुरस्कार – 1989 – भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान।

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार – “1972 –  1974 –  1990” – सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका के लिए (3 बार)।

फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट – 1993 – सिनेमा में जीवनपर्यंत योगदान के लिए।

लीजन ऑफ ऑनर – 2007 – फ्रांस का सर्वोच्च नागरिक सम्मान।

 

  1. पाठ में लता मंगेशकर ने कई फिल्मों और गीतों का उल्लेख किया है। इंटरनेट की सहायता से इनमें से किसी एक फिल्म और गीत को देखकर उसके विषय में अपने विचार लिखिए। आपको यह फिल्म और गीत कैसा लगा और क्यों?

उत्तर – पाठ में लता जी ने फिल्म ‘महल’ के प्रसिद्ध गीत ‘आएगा आने वाला’ का उल्लेख किया है। इस फिल्म और गीत को देखने के बाद मेरे विचार निम्नलिखित हैं –

गीत का अनुभव –

जब हम इस गीत को सुनते हैं, तो सबसे पहले लता जी की आवाज़ की शुद्धता और गहराई मन को छू लेती है। साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि इस गीत के लिए उन्हें माइक से दूर चलकर आना पड़ा था। वह प्रभाव आज भी इतना ताज़ा लगता है कि रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

मुझे यह क्यों पसंद आया?

रहस्यमयी वातावरण – यह एक ‘हॉरर-सस्पेंस’ फिल्म है और यह गीत उस रहस्य को बनाने में पूरी तरह सफल रहता है।

सादगी – उस दौर में आज जैसी भारी मशीनें और ऑटो-ट्यून नहीं था। यह पूरी तरह से लता जी की साधना और गले का जादू है।

अमर संगीत – खेमचंद प्रकाश जी का संगीत और लता जी का स्वर मिलकर एक ऐसा जादू रचते हैं जो आज 75 साल बाद भी पुराना नहीं लगता।

  1. अब आप नीचे दी गई इंटरनेट कड़ी की सहायता से लता मंगेशकर द्वारा गाया हुआ गीत ऐ मेरे वतन के लोगोसुन सकते हैं।

https -//youtu.be/CF_RqQF99Iw?si=7CG_zpv8XW5Hprmi

कठिन शब्दों के सरल अर्थ

1 – अप्रतिम – बेजोड़ / जिसकी तुलना न हो – Peerless / Matchless

2 – साक्षात्कार – भेंट / मुख़ातिब होना – Interview

3 – आकंठ – गले तक / पूरी तरह डूबा हुआ – Fully immersed / Up to the neck

4 – दुर्लभ – जो आसानी से न मिले – Rare / Scarce

5 – सार्थक – अर्थपूर्ण – Meaningful

6 – असंख्य – अनगिनत – Countless / Innumerable

7 – दीवानगी – पागलपन / जुनून – Obsession / Madness

8 – श्रद्धा – आदर / विश्वास – Reverence / Devotion

9 – आभार – धन्यवाद – Gratitude / Thanks

10 – स्मृतियाँ – यादें – Memories

11 – स्मरण – याद करना – Remembrance / Recollection

12 – गंभीरता – धीरता / शांत भाव – Seriousness / Gravity

13 – रागदारी – रागों का गायन – Singing of classical ragas

14 – परंपरा – रीति-रिवाज – Tradition

15 – विशेषता – खूबी – Specialty / Feature

16 – षडज (सा) – संगीत का पहला स्वर – The first note of the octave

17 – प्रचलन – रिवाज / चलन – Prevalence / Trend

18 – बाकायदा – नियम के साथ – Properly / Formally

19 – शास्त्रीय संगीत – क्लासिकल म्यूजिक – Classical Music

20 – स्वाभिमान – आत्म-सम्मान – Self-respect

21 – संस्कार – अच्छे आचरण की शिक्षा – Etiquette / Values

22 – हिम्मत – साहस – Courage / Valor

23 – निधन – मृत्यु – Death / Demise

24 – प्रयास – कोशिश – Effort / Attempt

25 – अनुयायी – पीछे चलने वाले / भक्त – Follower / Disciple

26 – अनुशासन – नियम का पालन – Discipline

27 – अभिनय – एक्टिंग – Acting / Performance

28 – मार्फ़त – के द्वारा – Through / Via

29 – संस्करण – रूप / प्रकाशन का प्रकार – Edition / Version

30 – अनुकूल – पक्ष में / उपयुक्त – Favorable / Suitable

31 – चुनौती – ललकार – Challenge

32 – सबब – कारण – Reason / Cause

33 – अलबत्ता – हालाँकि / बेशक – Although / Of course

34 – सुध – होश / याद – Consciousness / Memory

35 – हसरत – इच्छा / कामना – Desire / Wish

36 – प्रशंसा – तारीफ – Praise / Applause

37 – आकलन – अंदाजा लगाना – Assessment / Estimation

38 – सूत्रपात – शुरुआत – Initiation / Beginning

39 – मददगार – सहायक – Helpful

40 – तकनीकी – तकनीक संबंधी – Technical

41 – पार्श्वगायन – परदे के पीछे गाना – Playback singing

42 – अनुपात – हिस्सा / तालमेल – Proportion / Ratio

43 – टोटके – युक्ति / तरीका – Tricks / Knacks

44 – विकसित – तरक्की किया हुआ – Developed

45 – स्तरीय – अच्छे दर्जे का – Qualitative / Standard

46 – अंदाज – तरीका – Style / Manner

47 – परहेज – दूरी बनाना / त्याग – Avoidance / Abstinence

48 – अभिव्यक्त – प्रकट करना – Expressed

49 – संस्मरण – यादों का वर्णन – Reminiscence / Memoir

50 – प्रचलित – जो चलन में हो – Popular / Current

51 – गुड़वड़ – होली की राख का खेल – A traditional Holi play with ash

52 – मान्यता – परंपरा / विश्वास – Belief / Tradition

53 – आगमन – आना – Arrival

54 – आराधना – पूजा – Worship / Devotion

55 – आत्मीयता – अपनापन – Affection / Intimacy

56 – वाकया – घटना – Incident / Event

57 – खैरियत – कुशलता – Welfare / Well-being

58 – अतिरेक – अधिकता – Excess / Exaggeration

59 – वाजिब – उचित / सही – Justified / Right

60 – अफसोस – पछतावा / दुःख – Regret / Sorrow

61 – सरोद – एक वाद्य यंत्र – Sarod (musical instrument)

62 – मार्मिक – दिल को छू लेने वाला – Touching / Poignant

63 – अनंत – जिसका अंत न हो – Infinite / Endless

64 – आघात – चोट / प्रहार – Blow / Stroke

65 – प्रार्थना – विनती – Prayer

66 – पवित्र – शुद्ध – Sacred / Holy

67 – असीम – जिसकी सीमा न हो – Limitless / Boundless

68 – अप्रत्याशित – जिसकी उम्मीद न हो – Unexpected

69 – जनश्रुतियाँ – सुनी-सुनाई बातें – Folklores / Legends

70 – गरिमा – गौरव – Dignity / Glory

71 – शिखर – चोटी – Peak / Summit

72 – अवधारणा – विचार / धारणा – Concept / Notion

73 – अमर – जो कभी न मरे – Immortal

74 – कृपा – दया – Grace / Mercy

75 – प्रस्तुत – पेश किया हुआ – Presented

76 – आकंठ – पूरी तरह भरा हुआ – Fully saturated

77 – अप्रतिम – अद्वितीय – Matchless

78 – संवाद – बातचीत – Dialogue

79 – दुर्लभ – अनमोल – Rare

80 – प्रशंसक – चाहने वाले – Admirers / Fans

81 – प्रेरणा – सीख – Inspiration

82 – असंख्य – अनगिनत – Countless

83 – शुभचिंतक – भला चाहने वाले – Well-wishers

84 – समर्पित – अर्पण किया हुआ – Dedicated

85 – श्रोता – सुनने वाले – Listeners

86 – कृतज्ञता – उपकार मानना – Gratitude

87 – आदर – सम्मान – Respect

88 – स्मृति – याद – Memory

89 – गंभीरता – शांत स्वभाव – Gravity / Seriousness

90 – विशेषता – खूबी – Quality

91 – परंपरा – रीति – Tradition

92 – शास्त्रीय – नियमों पर आधारित – Classical

93 – प्रसिद्ध – मशहूर – Famous

94 – स्वाभिमान – खुद का गौरव – Self-respect

95 – संस्कार – अच्छी शिक्षा – Cultural values

96 – हिम्मत – साहस – Courage

97 – प्रयास – कोशिश – Effort

98 – निर्णय – फैसला – Decision

99 – अवस्था – हालत – State / Condition

100 – संघर्ष – कठिनाई से लड़ना – Struggle

101 – अनुकूल – सुहावना / पक्ष में – Favorable

102 – प्रतिकूल – विपरीत – Adverse

103 – उत्तरदायित्व – ज़िम्मेदारी – Responsibility

104 – साक्षात्कार – भेंट – Interview

105 – मनोरंजन – मन बहलाना – Entertainment

106 – अनुयायी – चेला / भक्त – Follower

107 – कठिनाई – मुश्किल – Difficulty

108 – अनुशासन – नियमबद्धता – Discipline

109 – अभिनय – कलाकारी – Acting

110 – मार्फ़त – द्वारा – Through

111 – परिस्थिति – हालात – Circumstance

112 – मेहनत – परिश्रम – Hard work

113 – हसरत – अधूरी इच्छा – Longing / Desire

114 – प्रचलन – चलन – Prevalence

115 – प्रदर्शन – दिखाना – Performance / Display

116 – आकलन – गणना – Assessment

117 – प्रभाव – असर – Effect

118 – रोचक – दिलचस्प – Interesting

119 – स्वभाव – आदत / प्रकृति – Nature / Character

120 – तकनीक – विधा / माध्यम – Technique

121 – विकसित – बढ़ा हुआ – Developed

122 – स्तरीय – गुणवत्तापूर्ण – Standard

123 – चुनौती – मुक़ाबला – Challenge

124 – अभिव्यक्त – ज़ाहिर करना – Expressed

125 – संस्मरण – यादगारी – Reminiscence

126 – साझा – बाँटना – Shared

127 – प्रचलित – आम चलन वाला – Popular

128 – आगमन – पधारना – Arrival

129 – आराधना – इबादत – Worship

130 – आत्मीयता – गहरा लगाव – Intimacy

131 – वाकया – किस्सा – Incident

132 – खैरियत – सलामती – Well-being

133 – अनुष्ठान – धार्मिक कार्य – Ritual

134 – संदर्भ – प्रसंग – Context

135 – रिवाज – रस्म – Custom

136 – मुग्ध – मोहित – Mesmerized

137 – परिवर्तन – बदलाव – Change

138 – पार्श्वगायक – परदे के पीछे का गायक – Playback singer

139 – सहयोग – मदद – Cooperation

140 – संपर्क – जुड़ाव – Contact

141 – असीम – जिसकी हद न हो – Boundless

142 – अप्रत्याशित – अचानक – Unexpected

143 – मंत्रमुग्ध – वश में होना (संगीत से) – Spellbound

144 – मार्मिक – कष्टकारी / गहरा – Heart-touching

145 – अनंत – अपार – Infinite

146 – शुद्ध – साफ़ / असली – Pure

147 – अतिरेक – फालतू / ज़्यादा – Excess

148 – वाजिब – ठीक – Proper

149 – अमर – अविनाशी – Immortal

150 – अफसोस – रंज / पछतावा – Regret

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