सुभद्रा कुमारी चौहान
सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 1904 में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में हुआ था। उनकी आरंभिक शिक्षा प्रयागराज में हुई। अपने समय की प्रसिद्ध रचनाकार होने के साथ-साथ वह एक स्वतंत्रता सेनानी भी थीं जिसके कारण उन्हें दो बार जेल भी जाना पड़ा था। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से जनमानस में राष्ट्रीय चेतना जगाई।
उनके लेखन में देशप्रेम, स्त्री-केंद्रित विषयों और स्वाधीनता संग्राम के प्रति गहन प्रतिबद्धता दिखाई देती है। उनकी भाषा की सहजता ने उनकी रचनाओं को व्यापक लोकप्रियता दिलाई। उनकी कुछ प्रमुख रचनाएँ हैं— मुकुल, त्रिधारा (कविता संग्रह), बिखरे मोती, उन्मादिनी, सीधे-सादे चित्र (कहानी संग्रह), कदंब का पेड़, सभा का खेल (बाल साहित्य)। सुभद्रा कुमारी चौहान को उनके कविता संग्रह मुकुल तथा कहानी संग्रह बिखरे मोती के लिए दो बार ‘सेकसरिया पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। सन् 1948 में उनकी आकस्मिक मृत्यु हो गई। भारतीय डाक विभाग ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया।
‘झाँसी की रानी’ – पाठ परिचय
‘झाँसी की रानी’ सुभद्रा कुमारी चौहान की बहुत प्रसिद्ध कविता है। यह कविता 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि पर लिखी गई है। 1857 की क्रांति भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अविस्मरणीय अध्याय है। यह कविता रानी लक्ष्मीबाई के जीवन-वृत्त, उनके संघर्ष और विद्रोह से हमारा ओजपूर्ण साक्षात्कार कराती है। यह कविता वीरता, उत्साह और देशप्रेम की भावना से ओत-प्रोत है। यह पाठकों में जोश और साहस का संचार करती है तथा अपने देश के प्रति गर्व एवं स्वतंत्रता के लिए समर्पण की भावना जगाती है। कविता की कथात्मक शैली और गेयता इसे और अधिक जीवंत एवं प्रभावशाली बनाती है।
झाँसी की रानी
सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फ़िरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी,
वीर शिवाजी की गाथाएँ
उसको याद ज़बानी थीं।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार,
महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी
भी आराध्य भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाईं झाँसी में,
सुभट बुँदेलों की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया,
शिव से मिली भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं,
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई,
निःसंतान मरे राजाजी
रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया,
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा
झाँसी हुई बिरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फ़िरंगी की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया,
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपूर, तंजोर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात,
जब कि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात,
बंगाले, मद्रास आदि की,
भी तो यही कहानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
आँगी की रानी
रानी रोईं रनिवासों में बेगम ग़म से थीं बेजार
उनके गहने-कपडे बिकते थे कलकत्ते के बाजार,
सरे-आम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार,
‘नागपूर के जेवर ले लो’ ‘लखनऊ के लो नौलख हार’,
यों परदे की इज़्ज़त पर-
देशी के हाथ बिकानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
कुटियों में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चंडी का कर दिया प्रकट आह्वान,
हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो
सोई ज्योति जगानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं,
मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपुर, कोल्हापुर में भी
कुछ हलचल उकसानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
इस स्वतंत्रता – महायज्ञ में कई वीरवर आए काम
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमद शाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास- गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम,
लेकिन आज जुर्म कहलाती
उनकी जो कुरबानी थी।
बुंदेले हरबालों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
इनकी गाथा छोड़ चलें हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वॉकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में,
जख्मी होकर वॉकर भागा,
उसे अजब हैरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार,
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया
ने छोड़ी रजधानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
विजय मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सन्मुख था, उसने मुँह की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के सँग आई थीं,
युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी,
पर, पीछे ह्यू रोज आ गया,
हाय! घिरी अब रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
तो भी रानी मार-काटकर चलती बनी सैन्य के पार,
किंतु सामने नाला आया, था यह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार,
घायल होकर गिरी सिंहनी
उसे वीर गति पानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई
हमको जो सीख सिखानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारत वासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी,
तेरा स्मारक तू ही होगी,
तू खुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥
झाँसी की रानी – पात्र परिचय
नाना साहब
धुंधूपंत का जन्म एक मराठा ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्हें बाद में बाजीराव द्वितीय (मराठा साम्राज्य के अंतिम पेशवा) ने गोद लिया। गोद लिए जाने के बाद वे नाना साहेब पेशवा कहलाए।
अंग्रेजों से संघर्ष क्यों हुआ?
बाजीराव द्वितीय को अंग्रेजों से पेंशन मिलती थी। उनकी मृत्यु के बाद नाना साहेब (धुंधूपंत) ने वह पेंशन माँगी। लेकिन अंग्रेजों ने उन्हें पेंशन देने से मना कर दिया।
गंगाधर राव परिचय
वे मराठा वंश के शासक थे। उनका शासन झाँसी राज्य पर था, जो आज के झाँसी में स्थित है। वे विद्वान, कला-प्रेमी और प्रशासन में कुशल माने जाते थे। उनकी पत्नी थीं रानी लक्ष्मीबाई, जिनका असली नाम णिकर्णिका (मनु) था। उनके एक पुत्र हुआ, लेकिन वह बचपन में ही चल बसा। बाद में उन्होंने एक बच्चे को गोद लिया, जिसका नाम दामोदर राव रखा।
अंग्रेजों के साथ विवाद
1853 में गंगाधर राव की मृत्यु हो गई। उनके निधन के बाद अंग्रेजों ने “Doctrine of Lapse” (दत्तक नीति) लागू करके झाँसी को अपने कब्जे में लेने की कोशिश की। उन्होंने दामोदर राव को उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया।
तांतिया टोपे
असली नाम: रामचंद्र पांडुरंग
1857 की क्रांति के सबसे कुशल सैन्य नेताओं में से एक।
Nana Sahib के प्रमुख सहयोगी थे।
गुरिल्ला युद्ध (छापामार रणनीति) में माहिर, अंग्रेजों को लंबे समय तक चुनौती दी।
अज़ीमुल्ला ख़ान
नाना साहब के बुद्धिमान सलाहकार और कूटनीतिज्ञ।
अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने विदेशों (विशेषकर इंग्लैंड) की यात्रा भी की थी और ब्रिटिश राजनीति को समझा।
अहमद शाह मौलवी
फैज़ाबाद के धार्मिक नेता और क्रांतिकारी।
जनता को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट करने में बड़ी भूमिका निभाई।
अपने साहस और नेतृत्व के कारण “मौलवी साहब” के नाम से प्रसिद्ध।
ठाकुर कुँवर सिंह
बिहार के जगदीशपुर के राजा/जमींदार।
80 वर्ष की आयु में भी अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध लड़ा।
अपनी वीरता और रणनीति से कई लड़ाइयों में अंग्रेजों को हराया।
लेफ्टिनेंट वॉकर
लेफ्टिनेंट वॉकर एक अंग्रेज (ब्रिटिश) सेना के अधिकारी थे, जिनका उल्लेख झाँसी की रानी और 1857 के विद्रोह के संदर्भ में आता है।
जनरल स्मिथ
वे ब्रिटिश सेना के उच्च अधिकारी (जनरल) थे। उनका नाम खासकर उन युद्धों में आता है जहाँ अंग्रेजों ने भारतीय क्रांतिकारियों से मुकाबला किया।
ह्यू रोज़
ह्यू रोज़ (Sir Hugh Rose) ब्रिटिश सेना के एक प्रमुख जनरल थे, जिन्होंने 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारत में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व किया।
झाँसी की रानी – व्याख्या
सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित “झाँसी की रानी” हिंदी साहित्य की सर्वाधिक ओजस्वी और वीर रस से परिपूर्ण कविताओं में से एक है। यह कविता 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की नायिका रानी लक्ष्मीबाई के अदम्य साहस, शौर्य और बलिदान की अमर गाथा प्रस्तुत करती है।
पद्यांश 1
सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फ़िरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
कठिन शब्दों के अर्थ –
भृकुटी तानी: भौंहें तानना / क्रोधित होना (To frown / To get angry).
गुमी हुई: खोई हुई (Lost).
फ़िरंगी: अंग्रेज / विदेशी (Foreigners / Britishers).
ठानी थी: निश्चय किया था (Determined).
बुंदेले हरबोले: बुंदेलखंड के लोकगायक जो राजाओं की यशोगाथा गाते हैं (Folk singers of Bundelkhand).
मर्दानी: मर्दों की तरह बहादुरी से लड़ने वाली (Brave like a man / Warrior woman).
व्याख्या –
कविता की शुरुआत 1857 की क्रांति के माहौल से होती है। अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के कारण भारत के राजाओं के सिंहासन डोलने लगे थे और उनके चेहरों पर क्रोध दिखाई देने लगा था। ऐसा लग रहा था मानो गुलामी से जर्जर हो चुके ‘बूढ़े भारत’ में एक नया जोश और नई जवानी आ गई हो। भारतवासियों को अपनी खोई हुई आज़ादी का महत्त्व समझ आ गया था और उन्होंने अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने का दृढ़ निश्चय कर लिया था। सन् 1857 में क्रांति की जो पुरानी तलवार चमकी थी, उसकी वीर गाथा हमने बुंदेलखंड के लोकगायकों से सुनी है कि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई रणभूमि में वीरों की तरह डटकर लड़ी थीं।
पद्यांश 2
कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली‘ थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी,
वीर शिवाजी की गाथाएँ उसको याद ज़बानी थीं।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
कठिन शब्दों के अर्थ –
मुँहबोली: जिसे बोलकर बहन माना गया हो (Adopted or considered as a sister).
छबीली: सुंदर और चंचल (Beautiful and playful).
कृपाण, कटारी: छोटी तलवार और खंजर (Types of swords and daggers).
गाथाएँ: कहानियाँ / यशगान (Tales of valour / Legends).
व्याख्या –
इस पद्यांश में रानी के बचपन का परिचय दिया गया है। उनके बचपन का नाम लक्ष्मीबाई था और वे अपने पिता मोरोपंत तांबे जो पेशवा बाजीराव द्वितीय के आश्रित और दरबार में एक ऊँचे पद पर कार्यरत थे उनकी इकलौती संतान थीं। बचपन में वे बहुत सुंदर और चंचल थीं, इसलिए कानपुर के नाना साहेब जिन्हें पेशवा कहते हैं वे उन्हें प्यार से ‘छबीली’ कहकर बुलाते थे और अपनी मुँहबोली बहन मानते थे। आम लड़कियों की तरह लक्ष्मीबाई गुड़ियों से नहीं खेलती थीं; बल्कि बरछी, ढाल, कृपाण और कटारी जैसे अस्त्र-शस्त्र ही उनकी सहेलियाँ थीं। बचपन से ही उनके हृदय में वीरता कूट-कूट कर भरी थी और उन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज की वीरता की कहानियाँ जुबानी याद थीं।
पद्यांश 3
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवार,
महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
कठिन शब्दों के अर्थ –
अवतार: ईश्वरीय रूप का जन्म (Incarnation).
पुलकित: प्रसन्न / रोमांचित (Thrilled / Joyful).
व्यूह: सेना की विशेष जमावट / चक्रव्यूह (Military formation).
दुर्ग: किला (Fort).
खिलवार: खेल (Games / Hobbies).
आराध्य: पूजनीय (Worthy of worship / Deity).
व्याख्या –
कवयित्री लक्ष्मीबाई की वीरता का वर्णन करते हुए कहती हैं कि युद्धभूमि में उनका कौशल देखकर ऐसा लगता था मानो वे साक्षात् देवी लक्ष्मी या दुर्गा का अवतार हों। तलवारबाज़ी में वे इतनी निपुण थीं कि वीर मराठा योद्धा भी उनके वार देखकर रोमांचित हो जाते थे। बचपन में उनके प्रिय खेल नकली युद्ध करना, चक्रव्यूह रचना, शिकार करना, शत्रु की सेना को घेरना और किले तोड़ना आदि थे। महाराष्ट्र के लोगों की कुलदेवी माँ भवानी ही लक्ष्मीबाई की भी आराध्य थीं, जिनसे उन्हें युद्ध करने की शक्ति मिलती थी।
पद्यांश 4
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाईं झाँसी में,
सुभट बुँदेलों की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
कठिन शब्दों के अर्थ –
वैभव: धन-संपत्ति / राजसी शान (Wealth / Royal grandeur).
सुभट: वीर योद्धा (Brave warriors).
विरुदावलि: यशोगान / प्रशस्ति (Song of praise / Glorification).
चित्रा: राजकुमारी चित्रांगदा (Princess Chitrangada – Arjun’s wife).
व्याख्या –
इस पद्यांश में रानी के विवाह का प्रसंग है। ‘वीरता’ अर्थात् लक्ष्मीबाई का विवाह झाँसी के ‘वैभव’ अर्थात् राजा गंगाधर राव के साथ हुआ। गंगाधर राव झाँसी के नेवालकर वंश के अंतिम स्वतंत्र राजा थे। उन्होंने 1843 से 1853 तक झाँसी पर शासन किया। वे एक कुशल प्रशासक थे और उनके समय में झाँसी का सैन्य बल और राजस्व काफी सुदृढ़ हुआ था। विवाह के पश्चात् जब लक्ष्मीबाई रानी बनकर झाँसी के राजमहल में आईं, तो पूरे महल में शहनाइयाँ बजीं और खुशियाँ छा गईं। ऐसा प्रतीत होता था मानो बुंदेलखंड के वीर योद्धाओं की कीर्ति और यश साक्षात् विरुदावलि का रूप धारण करके झाँसी आ गई हो। यह विवाह इतना पवित्र और अलौकिक लग रहा था जैसे राजकुमारी चित्रांगदा को अर्जुन मिल गए हों या माता पार्वती का भगवान शिव से मिलन हो गया हो।
पद्यांश 5
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं,
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई,
निःसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
कठिन शब्दों के अर्थ –
उदित हुआ: उदय हुआ / जगा (Awakened / Rose).
मुदित: प्रसन्न (Happy).
कालगति: समय की चाल / भाग्य (Pace of time / Fate).
काली घटा: मुसीबतों के बादल (Dark clouds of sorrow).
कर: हाथ (Hands).
विधि: विधाता / ईश्वर (Destiny / God).
शोक-समानी: दुख में डूबी हुई (Drowned in grief).
व्याख्या –
विवाह के बाद झाँसी के महलों में खुशियों का उजाला छा गया था। लेकिन समय का चक्र बदला और दुर्भाग्य ने चुपके से झाँसी पर दुखों के काले बादलों को आच्छादित कर दिया। नियति को भी यह पसंद नहीं आया कि तीर-कमान चलाने वाले रानी के वीर हाथों में सुहाग की चूड़ियाँ सजी रहें। झाँसी के राजा गंगाधर राव का अचानक निःसंतान ही निधन हो गया। हाय! ईश्वर को भी रानी पर दया नहीं आई। युवावस्था में ही रानी लक्ष्मीबाई विधवा हो गईं और वे गहरे शोक में डूब गईं।
पद्यांश 6
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया,
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
कठिन शब्दों के अर्थ –
हरषाया: खुश हुआ (Rejoiced / Became happy).
डलहौजी: लॉर्ड डलहौजी, ब्रिटिश गवर्नर-जनरल (Lord Dalhousie).
दुर्ग: किला (Fort).
लावारिस: जिसका कोई उत्तराधिकारी न हो (Heirless / Orphaned).
वारिस: उत्तराधिकारी (Heir / Owner).
अश्रुपूर्ण: आँसुओं से भरी (Tearful).
बिरानी: पराई / वीरान (Alienated / Desolate).
व्याख्या –
राजा के निधन से झाँसी का दीपक बुझ गया। यह देखकर ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी बहुत प्रसन्न हुआ। डलहौजी ने ‘हड़प नीति’ (Doctrine of Lapse) लागू की हुई थी, जिसके तहत जिस राजा का अपना पुत्र नहीं होता था, उसका राज्य अंग्रेज हड़प लेते थे। उसे झाँसी हड़पने का यह सुनहरा अवसर लगा। उसने बिना देर किए झाँसी के किले पर अपनी फौज भेज दी और ब्रिटिश झंडा फहरा दिया। जो झाँसी अब तक स्वतंत्र थी, उस लावारिस झाँसी का मालिक बनकर ब्रिटिश साम्राज्य वहाँ आ धमका। आँसुओं से भरी आँखों से रानी ने देखा कि उनकी प्यारी झाँसी अब पराई अर्थात् अंग्रेजों की हो गई थी।
पद्यांश 7
अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फ़िरंगी की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया,
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
कठिन शब्दों के अर्थ:
अनुनय-विनय: प्रार्थना या निवेदन (Pleading/Request).
विकट: क्रूर / खतरनाक (Formidable/Cruel).
माया: चाल / धोखा (Illusion/Deceit).
काया पलटना: स्थिति का पूरी तरह बदल जाना (Complete transformation).
दासी: गुलाम / सेविका (Maid/Slave).
व्याख्या:
अंग्रेज शासक किसी की प्रार्थना या दुख-दर्द नहीं सुनते थे, उनकी चालें बहुत क्रूर थीं। जब अंग्रेज, ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ भारत आए थे, तो वे मात्र व्यापारी थे और राजाओं से यहाँ व्यापार करने की अनुमति माँगते थे। लेकिन गवर्नर-जनरल डलहौजी ने धीरे-धीरे पूरे देश में अपने पैर पसार लिए और स्थितियाँ बिल्कुल बदल दीं। उसने भारत के बड़े-बड़े राजाओं और नवाबों का भी अपमान किया और उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया। जो भारतीय रानियाँ थीं, वे दासियाँ बन गईं और अंग्रेजी सत्ता जो कभी व्यापारी बनकर आई थी, अब भारत की महारानी बन बैठी थी।
पद्यांश 8
छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपूर, तंजोर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात,
जब कि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात,
बंगाले, मद्रास आदि की, भी तो यही कहानी थी।
कठिन शब्दों के अर्थ:
बातों-बात: देखते ही देखते / आसानी से (Very easily/Quickly).
घात: धोखा / हमला (Attack/Betrayal).
बिसात: औकात / क्षमता (Worth/Capacity).
वज्र-निपात: बिजली गिरना / भारी तबाही (Heavy blow/Lightning strike).
व्याख्या:
अंग्रेजों ने देखते ही देखते देश की राजधानी दिल्ली छीन ली और लखनऊ पर भी आसानी से कब्ज़ा कर लिया। पेशवा बाजीराव को बिठूर में कैद कर दिया गया और नागपुर पर भी धोखे से अधिकार कर लिया। उदयपुर, तंजौर, सतारा और कर्नाटक जैसे राज्यों की तो अंग्रेजों के सामने कोई औकात ही नहीं थी। उधर सिंध, पंजाब और असम (ब्रह्मदेश) पर भी अंग्रेजों ने भारी कहर बरपाया था। बंगाल और मद्रास की भी यही दर्दनाक कहानी थी, अर्थात् पूरा देश अंग्रेजों का गुलाम होता जा रहा था।
पद्यांश 9
रानी रोईं रनिवासों में बेगम ग़म से थीं बेजार
उनके गहने-कपडे बिकते थे कलकत्ते के बाजार,
सरे-आम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार,
‘नागपूर के जेवर ले लो’ ‘लखनऊ के लो नौलख हार’,
यों परदे की इज़्ज़त पर-देशी के हाथ बिकानी थी।
कठिन शब्दों के अर्थ:
रनिवास: महल का वह हिस्सा जहाँ रानियां रहती हैं (Queens’ quarters/Harem).
बेजार: लाचार / दुखी (Helpless/Distressed).
सरे-आम: सबके सामने खुलेआम (Publicly).
नीलाम: बोली लगाकर बेचना (Auction).
पर-देशी: विदेशी / अंग्रेज (Foreigner).
व्याख्या:
अपने राज्य छिन जाने पर रानियाँ और नवाबों की बेगमें अपने महलों में रोती थीं और दुख से बेहाल थीं। अंग्रेजों ने उनके कीमती कपड़े और शाही गहने कलकत्ता के बाज़ारों में सरेआम नीलाम कर दिए। अंग्रेजों के अख़बार खुलेआम इन नीलामियों के विज्ञापन छापते थे कि “नागपुर के जेवर और लखनऊ के नौलक्खा हार खरीद लो।” इस प्रकार भारत की महिलाओं के सम्मान और इज्जत को विदेशियों के हाथों सरेआम बाज़ार में बेचा जा रहा था।
पद्यांश 10
कुटियों में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चंडी का कर दिया प्रकट आह्वान,
हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी।
कठिन शब्दों के अर्थ:
विषम वेदना: भयंकर पीड़ा (Severe pain/agony).
आहत: घायल (Wounded/Hurt).
पुरखों: पूर्वजों (Ancestors).
रण-चंडी: युद्ध की देवी (Goddess of war).
आह्वान: बुलावा / ललकार (Call/Invocation).
व्याख्या:
अंग्रेजों के अत्याचारों से गरीब झोंपड़ियों में भारी दुख और दर्द था, तो महलों के राजाओं में अपमान की आग सुलग रही थी। देश के वीर सैनिकों के दिलों में अपने पूर्वजों की वीरता का गर्व अभी भी ज़िंदा था। इसी बीच नाना धुंधूपंत पेशवा अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का सारा सामान अर्थात् हथियार और सेना जुटा रहे थे। और उधर उनकी छबीली बहन झाँसी की रानी ने रणचंडी का रूप धारण कर युद्ध का खुला ऐलान कर दिया। इस प्रकार स्वतंत्रता का एक महायज्ञ शुरू हो गया, जिसका उद्देश्य भारतीयों की सोई हुई चेतना को जगाना था।
पद्यांश 11
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं,
मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी।
कठिन शब्दों के अर्थ:
अंतरतम: हृदय की गहराई (Deepest part of the heart).
चेती: जागी / सचेत हुई (Awakened).
उकसानी: भड़काना / प्रेरित करना (To stir up/Provoke).
व्याख्या:
आज़ादी की इस लड़ाई में अमीरों के महल और गरीबों की झोंपड़ियों दोनों ने मिलकर क्रांति की आग भड़काई थी। स्वतंत्रता की यह चिंगारी किसी के भड़काने से नहीं, बल्कि हर भारतीय के हृदय की गहराइयों से निकली थी। क्रांति की इस आग में झाँसी और दिल्ली जाग उठे, लखनऊ में बगावत की लपटें फैल गईं। मेरठ, कानपुर और पटना के लोगों ने भी क्रांति में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसी तरह जबलपुर और कोल्हापुर में भी क्रांति की हलचल तेज करनी थी।
पद्यांश 12
इस स्वतंत्रता – महायज्ञ में कई वीरवर आए काम
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमद शाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास- गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम,
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी।
कठिन शब्दों के अर्थ:
वीरवर: महान योद्धा (Great warriors).
आए काम: युद्ध में शहीद होना (Martyred/Died in battle).
सरनाम: प्रसिद्ध / मशहूर (Famous).
अभिराम: सुंदर / श्रेष्ठ (Excellent/Beautiful).
इतिहास-गगन: इतिहास रूपी आकाश (Sky of history).
व्याख्या:
आज़ादी के इस महायज्ञ में देश के कई महान वीर शहीद हो गए। इनमें नाना धुंधूपंत, तात्या टोपे, चतुर अजीमुल्ला, मौलवी अहमद शाह और वीर सैनिक कुँवर सिंह जैसे महान योद्धाओं के नाम प्रमुख हैं। भारत के इतिहास रूपी आकाश में इन वीरों के नाम हमेशा तारों की तरह अमर रहेंगे। लेकिन अंग्रेजों की नज़र में उनका यह महान बलिदान और देशप्रेम एक बहुत बड़ा ‘अपराध’ अर्थात् जुर्म था।
पद्यांश 13
इनकी गाथा छोड़ चलें हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वॉकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में,
जख्मी होकर वॉकर भागा, उसे अजब हैरानी थी।
कठिन शब्दों के अर्थ:
मर्दानों: वीर पुरुषों के बीच (Among men/warriors).
द्वंद्व: दो लोगों के बीच का युद्ध (Duel/Fight).
असमानों: जो बराबर न हों (Unequals – यहाँ अकेली महिला और शक्तिशाली अंग्रेज अफसर का संदर्भ है).
लेफ्टिनेंट वॉकर – लेफ्टिनेंट वॉकर एक अंग्रेज (ब्रिटिश) सेना के अधिकारी थे, जिनका उल्लेख झाँसी की रानी और 1857 के विद्रोह के संदर्भ में आता है।
व्याख्या:
कवयित्री कहती हैं कि अन्य वीरों की कहानियों को यहीं छोड़कर अब हम झाँसी के युद्ध के मैदान में चलते हैं। वहाँ रानी लक्ष्मीबाई वीर पुरुषों के बीच एक मर्द अर्थात् महान योद्धा की तरह डटकर खड़ी हैं। तभी अंग्रेजी सेना का लेफ्टिनेंट वॉकर अपने सैनिकों के साथ आगे बढ़ा। रानी ने अपनी तलवार म्यान से निकाल ली और फिर दो असमान योद्धाओं के बीच भयंकर युद्ध शुरू हो गया। रानी के प्रहारों से वॉकर बुरी तरह घायल हो गया और अपनी जान बचाकर, हैरान होकर वहाँ से भाग खड़ा हुआ।
पद्यांश 14
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार,
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी।
कठिन शब्दों के अर्थ:
कालपी – उत्तर प्रदेश राज्य का एक ऐतिहासिक नगर है। जालौन जिला में आता है। यह यमुना नदी के किनारे स्थित है। कालपी, यह झाँसी से लगभग 90–100 किमी दूर है।
निरंतर: लगातार (Continuously).
स्वर्ग सिधार: मृत्यु को प्राप्त होना (Died/Went to heaven).
रजधानी: राजधानी (Capital).
व्याख्या:
युद्ध लड़ते हुए रानी लगातार सौ मील का लंबा सफर तय करके ‘कालपी’ पहुँचीं। इस लंबी और कठिन यात्रा के कारण उनका प्यारा घोड़ा बुरी तरह थक गया और ज़मीन पर गिरकर तुरंत मर गया। यमुना नदी के तट पर अंग्रेजों ने एक बार फिर रानी लक्ष्मीबाई से हार का स्वाद चखा। जीत हासिल करने के बाद रानी आगे बढ़ीं और उन्होंने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। ग्वालियर का राजा ‘सिंधिया’, जो अंग्रेजों का दोस्त था, रानी के डर से अपनी राजधानी छोड़कर भाग गया।
पद्यांश 15
विजय मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सन्मुख था, उसने मुँह की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के सँग आई थीं,
युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी,
पर, पीछे ह्यू रोज आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी।
कठिन शब्दों के अर्थ:
सन्मुख: सामने (In front).
मुँह की खाई: हार का सामना करना (Faced defeat).
मार मचाई: दुश्मनों का संहार किया (Caused havoc).
जनरल स्मिथ – वे ब्रिटिश सेना के उच्च अधिकारी (जनरल) थे। उनका नाम खासकर उन युद्धों में आता है जहाँ अंग्रेजों ने भारतीय क्रांतिकारियों से मुकाबला किया।
ह्यू रोज़ – ह्यू रोज़ (Sir Hugh Rose) ब्रिटिश सेना के एक प्रमुख जनरल थे, जिन्होंने 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारत में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व किया।
व्याख्या:
रानी को जीत तो मिल गई, लेकिन अंग्रेजों की एक नई विशाल सेना ने फिर से उन्हें घेर लिया। इस बार रानी के सामने अंग्रेज जनरल स्मिथ था, जिसे भी रानी के हाथों बुरी तरह हार खानी पड़ी। इस युद्ध में रानी के साथ उनकी दो बहादुर सहेलियाँ ‘काना’ और ‘मंदरा’ भी थीं, जिन्होंने रणभूमि में दुश्मनों का जमकर संहार किया। लेकिन दुर्भाग्य से, पीछे से एक और अंग्रेज अफसर ‘ह्यू रोज़’ अपनी सेना लेकर आ गया और अब रानी लक्ष्मीबाई पूरी तरह से दुश्मनों से घिर गईं।
पद्यांश 16
तो भी रानी मार-काटकर चलती बनी सैन्य के पार,
किंतु सामने नाला आया, था यह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार,
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी।
कठिन शब्दों के अर्थ:
विषम अपार: बहुत बड़ा और कठिन (Extremely difficult).
अड़ा: हठ करके रुक जाना (Stubbornly stopped).
बहुतेरे: बहुत सारे (Many).
सिंहनी: शेरनी (Lioness).
वीर गति: युद्ध भूमि में शहादत प्राप्त करना (Martyrdom).
व्याख्या:
चारों ओर से घिरने के बावजूद रानी ने हार नहीं मानी और अंग्रेजी सेना को चीरती हुई बाहर निकल गईं। लेकिन तभी उनके रास्ते में एक बड़ा नाला आ गया, जो एक बहुत बड़ी मुसीबत थी। रानी का नया घोड़ा इस नाले को पार करने से डर गया और वहीं अड़ गया। इसी बीच पीछे से अंग्रेज घुड़सवार वहाँ पहुँच गए। रानी अकेली थीं और दुश्मन बहुत सारे थे। उन्होंने रानी पर लगातार कई वार किए। अंततः शेरनी के समान वह वीर रानी बुरी तरह घायल होकर ज़मीन पर गिर पड़ीं; उन्हें मातृभूमि के लिए वीरगति प्राप्त करनी थी।
पद्यांश 17
रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी।
कठिन शब्दों के अर्थ:
सिधार: मृत्यु को प्राप्त होना (Passed away).
दिव्य: अलौकिक / ईश्वरीय (Divine).
तेज: आभा / प्रकाश / आत्मा (Aura/Light/Soul).
मनुज: इंसान (Human).
अवतारी: ईश्वर का रूप (Incarnation).
व्याख्या:
रानी वीरगति को प्राप्त हो गईं। अब चिता ही उनकी अंतिम और अलौकिक सवारी थी। उनका पवित्र ‘तेज’ अर्थात् उनकी आत्मा अब अग्नि के ‘तेज’ में विलीन हो गई, जिसकी वे सच्ची हक़दार थीं। शहादत के समय उनकी उम्र मात्र 23 वर्ष थी। इतनी कम उम्र में उनके अदम्य साहस को देखकर लगता था कि वे कोई साधारण इंसान नहीं, बल्कि कोई दिव्य अवतार थीं। वे स्वतंत्रता की देवी बनकर हम मृतप्राय भारतीयों में नई जान फूँकने आई थीं। वे हमें आज़ादी का सही रास्ता दिखा गईं और देशभक्ति का जो पाठ उन्हें पढ़ाना था, वे हमें पढ़ा गईं।
पद्यांश 18
जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारत वासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी,
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
कठिन शब्दों के अर्थ:
कृतज्ञ: उपकार मानने वाले / आभारी (Grateful).
अविनाशी: जो कभी नष्ट न हो (Indestructible/Eternal).
मदमाती: घमंड में चूर (Intoxicating/Arrogant).
स्मारक: याद में बनाया गया चिह्न या भवन (Memorial/Monument).
अमिट: जो कभी न मिटे (Indelible/Unforgettable).
व्याख्या:
कवयित्री रानी को अंतिम श्रद्धांजलि देते हुए कहती हैं— हे रानी! तुम स्वर्ग जाओ, हम भारतवासी तुम्हारे इस महान बलिदान के लिए हमेशा तुम्हारे आभारी रहेंगे। तुम्हारा यह बलिदान भारतीयों के दिलों में आज़ादी की ऐसी आग जलाएगा जो कभी नहीं बुझेगी। चाहे इतिहास तुम्हारे बारे में चुप रहे, चाहे सच्चाई को फाँसी लगा दी जाए, चाहे अंग्रेज अपनी जीत के नशे में चूर होकर झाँसी को तोपों के गोलों से पूरी तरह मिटा दें; फिर भी तुम्हें किसी स्मारक की ज़रूरत नहीं है। तुम स्वयं अपना स्मारक हो, तुम वीरता की एक ऐसी अमिट निशानी हो जिसे दुनिया और आने वाली पीढ़ियाँ कभी नहीं भुला सकतीं। बुंदेले लोकगायकों से हमने यही वीरगाथा सुनी है कि वह झाँसी की रानी युद्ध भूमि में वीरों की तरह लड़ी थी।
अभ्यास
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
- ‘झाँसी की रानी’ कविता की पंक्ति “बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी” में ‘नई जवानी’ शब्द किस भाव को व्यक्त करता है?
(क) देश का स्वाभिमान
(ख) विद्रोह की चिंगारी
(ग) स्वाधीनता का भय
(घ) भारत की युवावस्था
उत्तर – (ख) विद्रोह की चिंगारी
‘बूढ़ा भारत’ यहाँ उस भारत का प्रतीक है जो गुलामी, अत्याचार और निराशा के कारण कमज़ोर और उत्साहहीन हो चुका था। ‘नई जवानी’ का अर्थ है कि 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ अचानक लोगों के भीतर जोश, संघर्ष की भावना और ‘विद्रोह की चिंगारी’ भड़क उठी।
- लक्ष्मीबाई को ‘छबीली’ कहना उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?
(क) विनम्रता
(ख) शोभायुक्त
(ग) सहिष्णुता
(घ) कठोरता
उत्तर – (ख) शोभायुक्त
‘छबीली’ का अर्थ होता है सुंदर, चंचल और आकर्षक अर्थात् शोभायुक्त। बचपन में लक्ष्मीबाई बहुत सुंदर और चुलबुली थीं, इसी कारण प्यार से नाना साहेब पेशवा उन्हें ‘छबीली’ बुलाते थे।
- “बुझा दीप झाँसी का” पंक्ति का भावार्थ है—
(क) अंग्रेजों का झाँसी पर अधिकार हो जाना
(ख) झाँसी राज्य की उम्मीदों का नष्ट हो जाना
(ग) राजा की आकस्मिक मृत्यु होना
(घ) रानी के जीवन में उदासी होना
उत्तर – (ग) राजा की आकस्मिक मृत्यु होना
किसी राज्य का ‘दीपक’ उसका राजा या शासक होता है। यहाँ ‘दीप बुझने’ का सीधा अर्थ झाँसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु से है, जिसके बाद ही अंग्रेजों ने झाँसी को लावारिस मानकर उस पर कब्ज़ा किया था।
- “इस स्वतंत्रता – महायज्ञ में कई वीरवर आए काम” पंक्ति में स्वतंत्रता आंदोलन की किस ऐतिहासिक घटना की ओर संकेत किया गया है?
(क) असहयोग आंदोलन
(ख) भारत छोड़ो आंदोलन
(ग) 1857 की क्रांति
(घ) सविनय अवज्ञा आंदोलन
उत्तर – (ग) 1857 की क्रांति
यह पूरी कविता भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम यानी 1857 की क्रांति पर ही आधारित है, जिसमें तात्या टोपे, नाना साहेब और कुँवर सिंह जैसे अनेक वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी।
- “व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया” पंक्ति में ‘यह’ शब्द किसके लिए कहा गया है?
(क) नवाबों के लिए
(ख) जनरल डलहौजी के लिए
(ग) लेफ्टिनेंट वॉकर के लिए
(घ) ब्रिटिश राज के लिए
उत्तर – (घ) ब्रिटिश राज के लिए
अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में, शुरू में भारत में केवल व्यापार करने आए थे और भारतीय राजाओं से व्यापार की अनुमति माँगते थे, लेकिन बाद में उन्होंने पूरे देश पर कब्ज़ा कर लिया।
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-
- ‘झाँसी की रानी’ कविता के आधार पर बताइए कि लक्ष्मीबाई के प्रिय खेल कौन-कौन से थे? उनका बचपन दूसरों से किस प्रकार भिन्न था?
उत्तर – लक्ष्मीबाई के प्रिय खेल आम लड़कियों की तरह गुड़ियों से खेलना नहीं था। उनके प्रिय खेल थे— नकली युद्ध करना, चक्रव्यूह की रचना करना, शिकार खेलना, सेना को घेरना और शत्रु के किले तोड़ना। उनका बचपन दूसरों से पूरी तरह भिन्न था क्योंकि जहाँ अन्य बालिकाएँ सहेलियों और खिलौनों के साथ खेलती थीं, वहीं लक्ष्मीबाई की सहेलियाँ बरछी, ढाल, कृपाण और कटारी थीं। उन्हें बचपन से ही शिवाजी जैसे वीरों की कहानियाँ जुबानी याद थीं।
- “किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई” पंक्ति के माध्यम से किस घटना की ओर संकेत किया गया है?
उत्तर – इस पंक्ति के माध्यम से झाँसी के राजा गंगाधर राव की आकस्मिक मृत्यु और रानी लक्ष्मीबाई के कम उम्र में विधवा होने की अत्यंत दुखद घटना की ओर संकेत किया गया है। राजा की मृत्यु के कारण झाँसी पर जो संकट के बादल छाए, उसे ही ‘काली घटा’ कहा गया है।
- “महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी” पंक्ति समाज के विभिन्न वर्गों की एकता को दर्शाती है, इस एकता का स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में क्या महत्त्व है?
उत्तर – इस पंक्ति का महत्त्व यह है कि 1857 की क्रांति केवल राजाओं-नवाबों का युद्ध नहीं था, बल्कि इसमें आम जनता, किसानों और गरीबों ने भी पूरा साथ दिया था। स्वतंत्रता संग्राम में इस एकता का महत्त्व यह है कि जब देश का हर वर्ग एक साथ मिलकर आज़ादी के लक्ष्य के लिए संघर्ष करता है, तभी क्रांति सही मायने में सफल हो सकती है। इसी एकता ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी।
- “सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार” पंक्ति में ‘नीलाम छापते’ शब्द किसकी ओर संकेत करता है? यह भी बताइए कि किसकी नीलामी की जाती थी और क्यों?
उत्तर – ‘नीलाम छापते’ का अर्थ है अखबारों में नीलामी के विज्ञापन छपना। अंग्रेजों द्वारा भारतीय रानियों और बेगमों के कीमती गहनों, जेवरों और शाही कपड़ों, जैसे- नागपुर के जेवर, लखनऊ के नौलक्खा हार आदि की सरेआम बाज़ारों में नीलामी की जाती थी। यह इसलिए किया जाता था ताकि अंग्रेज भारतीय शासकों की संपत्ति लूट सकें और उन्हें मानसिक रूप से अपमानित करके उनकी इज्ज़त को सरेआम नीचा दिखा सकें।
- “अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी” पंक्ति में ‘अवतारी’ शब्द व्यक्ति के विशेष गुणों की ओर इंगित कर रहा है। कविता के आधार पर बताइए कि लक्ष्मीबाई के किन गुणों के कारण उनको ‘अवतारी’ कहा गया है?
उत्तर – रानी लक्ष्मीबाई को उनके अदम्य साहस, असाधारण शौर्य और मातृभूमि के प्रति अपार प्रेम के कारण ‘अवतारी’ कहा गया है। मात्र 23 वर्ष की आयु में उन्होंने जिस तरह विशाल अंग्रेजी सेना को लोहे के चने चबवाए, कई अंग्रेज अधिकारियों, जैसे – वॉकर, स्मिथ, ह्यू रोज़ आदि को युद्ध में हराया और अंत तक बिना डरे अपनी झाँसी के लिए लड़ती रहीं, वह किसी साधारण मनुष्य के बस की बात नहीं थी। उनका वह तेजस्वी रूप साक्षात् देवी दुर्गा या भवानी के समान था, इसीलिए उन्हें ‘अवतारी’ माना गया।
विधा से संवाद
कविता में कहानी
यह कविता लक्ष्मीबाई के जीवन की घटनाओं पर आधारित है और अपनी संरचना में एक कथात्मक कविता है। कथात्मक कविता ऐसी कविता को कहते हैं जिसमें कविता और कहानी के तत्त्व परस्पर जुड़े होते हैं तथा घटनाओं का एक क्रम होता है। इस कविता में भी लक्ष्मीबाई के बचपन से लेकर वीरगति प्राप्त होने तक की कथा क्रम से देखने को मिलती है। पाठ की संरचना को समझते हुए इसमें वर्णित प्रमुख घटनाओं को समय-रेखा (टाइमलाइन) पर दर्शाएँ।
(संकेत- लक्ष्मीबाई का बचपन, विवाह, अन्य घटनाएँ आदि।)
कालखंड/अवस्था | प्रमुख घटनाएँ |
बचपन | जन्म और नाम: पिता की इकलौती संतान, नाम (मणिकर्णिका) ‘लक्ष्मीबाई’। पालन-पोषण: कानपुर के पेशवा (नाना साहेब) के साथ पली-बढ़ीं। रुचियाँ: गुड़ियों के बजाय बरछी, ढाल, कृपाण और कटारी से खेलना। नकली युद्ध करना, शिकार खेलना और सैन्य व्यूह रचना। प्रेरणा: वीर शिवाजी की गाथाएँ ज़बानी याद थीं। |
विवाह | झाँसी आगमन: झाँसी के राजा गंगाधर राव के साथ विवाह। रानी का दर्जा: ‘छबीली’ से झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बनीं। महलों में खुशियाँ छा गईं। |
वैधव्य (विधवा होना) | राजा की मृत्यु: विवाह के कुछ समय बाद ही राजा गंगाधर राव का निःसंतान निधन। शोक: महलों में दुखों के बादल छा गए। |
अंग्रेजों का कब्ज़ा | राज्य हड़प नीति: डलहौजी द्वारा ‘लावारिस’ झाँसी पर अधिकार। झाँसी के किले पर अंग्रेजी झंडा फहराना। नीलामी और अपमान: अंग्रेजों द्वारा देसी रानियों और नवाबों के जेवर और कपड़ों की बाज़ारों में नीलामी। |
क्रांति का आरंभ (1857) | विद्रोह की तैयारी: नाना धुंधूपंत और अन्य वीरों द्वारा युद्ध की तैयारी। रणचंडी रूप: लक्ष्मीबाई ने युद्ध का आह्वान किया। झाँसी से उठी लपटें पूरे देश, जैसे – दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, असम आदि में फैल गईं। |
युद्ध और शहादत | प्रथम युद्ध: लेफ्टिनेंट वॉकर से सामना, वॉकर बुरी तरह घायल होकर भागा। कालपी और ग्वालियर पर अधिकार: सौ मील की यात्रा, घोड़े की मृत्यु। कालपी और फिर ग्वालियर पर विजय। अंतिम युद्ध: जनरल स्मिथ को हराया। ह्यू रोज़ द्वारा पीछे से घेरना। नाला आने के कारण नए घोड़े का अड़ जाना। वीरगति: मात्र 23 वर्ष की आयु में अंग्रेजों से लड़ते हुए शेरनी का शहीद होना। |
विषयों से संवाद
साझा साथ / साझा संघर्ष
- “लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया”, ब्रिटिश राज किस नीति के कारण ‘लावारिस का वारिस’ बन जाता था? अपने इतिहास के शिक्षक से पता लगाकर उस नीति के विषय में लिखिए।
उत्तर – ब्रिटिश राज ‘हड़प नीति’ (Doctrine of Lapse) के कारण ‘लावारिस का वारिस’ बन जाता था। इस नीति को लॉर्ड डलहौजी ने लागू किया था। इस नीति का नियम था कि यदि किसी भारतीय रियासत के राजा की मृत्यु बिना किसी प्राकृतिक उत्तराधिकारी के हो जाती थी, तो वह राज्य ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया जाता था। झाँसी का संदर्भ में राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उनके दत्तक पुत्र को वारिस मानने से इनकार कर दिया और झाँसी को हड़प लिया।
- इस कविता में लक्ष्मीबाई की जीवन-गाथा के साथ-साथ अनेक वीरों के त्याग और बलिदान का भी उल्लेख है। उनकी सूची बनाइए तथा शिक्षक की सहायता से 1857 की क्रांति में उनके योगदान के विषय में लिखिए।
उत्तर – वीर का नाम – 1857 की क्रांति में योगदान
नाना धुंधूपंत – कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व किया और पेशवा घोषित किए गए।
ताँत्या टोपे – लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर ग्वालियर जीता और गुरिल्ला युद्ध में माहिर थे।
अज़ीमुल्ला खाँ – नाना साहेब के सलाहकार और क्रांति के मुख्य रणनीतिकार थे।
कुँवर सिंह – बिहार के जगदीशपुर से अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए।
अहमद शाह मौलवी – फैजाबाद से क्रांति की मशाल जलाई और अंग्रेजों का कड़ा विरोध किया।
- यह कविता जिस समय और परिवेश में लिखी गई है, उसमें युद्ध और अन्य साहसिक कार्य करना सामान्यत: पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था। वर्तमान में लगभग हर क्षेत्र में महिलाएँ कार्य कर रही हैं। नीचे कुछ ऐसे ही कार्यक्षेत्र दिए गए हैं। इन क्षेत्रों में काम करने वाली स्त्रियों के नाम और उनके विषय में लिखिए। आप चाहें तो इसमें अपनी समझ के अनुसार कुछ और कार्यक्षेत्र भी जोड़ सकते हैं।
कार्यक्षेत्र
- दमकल केंद्र (फायर ब्रिगेड)
- रेलगाड़ी चालक
- खेल के विभिन्न क्षेत्र
- व्यापार और प्रबंधन
- विज्ञान और तकनीक
उत्तर – दमकल केंद्र (फायर ब्रिगेड): हर्षिनी कान्हेकर (भारत की पहली महिला फायर फाइटर)।
रेलगाड़ी चालक: सुरेखा यादव (एशिया की पहली महिला लोको पायलट)।
खेल: पी.वी. सिंधु (बैडमिन्टन), मिताली राज (क्रिकेट) – इन्होंने वैश्विक स्तर पर भारत का मान बढ़ाया।
व्यापार और प्रबंधन: फाल्गुनी नायर (Nykaa की संस्थापक) और रोशनी नाडर (HCL Technologies)।
विज्ञान और तकनीक: टेसी थॉमस (भारत की ‘मिसाइल वुमन’) और रितु करिधाल (चंद्रयान-2 की मिशन डायरेक्टर)।
अतिरिक्त क्षेत्र (रक्षा/सेना): शिवांगी सिंह (पहली महिला राफेल पायलट)।
- कविता में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित अनके स्थानों के नाम आए हैं। अपने शिक्षक की सहायता से दिए गए मानचित्र में उन स्थानों / नगरों को चिह्नित करके नाम लिखिए।
स्रोत- https://surveyofindia.gov.in/UserFiles/files/1_16-state%20boundary.pdf
उत्तर – कविता और इतिहास के अनुसार, आपको मानचित्र पर निम्नलिखित स्थानों को चिह्नित करना चाहिए:
झाँसी: लक्ष्मीबाई का मुख्य केंद्र।
कानपुर: नाना साहेब और तात्या टोपे का क्षेत्र।
लखनऊ: बेगम हज़रत महल का नेतृत्व।
मेरठ: जहाँ से क्रांति की शुरुआत हुई (10 मई 1857)।
दिल्ली: बहादुर शाह जफर को जहाँ भारत का सम्राट घोषित किया गया।
ग्वालियर: जहाँ लक्ष्मीबाई ने अंतिम युद्ध लड़ा।
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
शब्द एक अर्थ अनेक
- “कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी”
उपर्युक्त पंक्ति में रेखांकित शब्द पर ध्यान दीजिए। कविता में ‘नाना’ शब्द ‘नाना धुंधूपंत’ के लिए प्रयुक्त हुआ है। लेकिन इस शब्द का प्रयोग संदर्भ के अनुसार अन्य अर्थों में भी होता है। जैसे- माता के पिता के लिए तथा अनेक के अर्थ में। इस प्रकार अनेकार्थी शब्द वह शब्द है जिसके एक से अधिक अर्थ होते हैं। नीचे तालिका में दी गई कविता की पंक्तियों में रेखांकित शब्द अनेकार्थी शब्द हैं। कविता के संदर्भ में उनके सही अर्थ पर घेरा लगाइए।
काव्य पंक्ति
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं
अर्थ – नदी का किनारा, बाण, सीसा
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई
अर्थ – शास्त्र में लिखी व्यवस्था, प्रणाली, विधाता, तरीका
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में
अर्थ – युद्ध, संशय, युग्म
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी
अर्थ – किसी पदार्थ का गोल पिंड, रस्सी/सूत/ बर्फ का गोला, तोप से दागने वाले गोले, नारियल
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी
अर्थ – आभा, गति, तेज चाकू (धार)
- “कानपूर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी”
“मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी”
उपर्युक्त पंक्तियों में रेखांकित शब्दों की वर्तनी पर ध्यान दीजिए। दोनों शब्दों की वर्तनी में थोड़ी भिन्नता है। कई बार रचनाकार कविता की लय, अर्थ की लय इत्यादि को ध्यान में रखते हुए भाषा के स्तर पर इस प्रकार का प्रयोग करते रहे हैं। इस कविता में अन्य शब्दों के भी ऐसे प्रयोग मिलते हैं, उन्हें ढूँढ़कर लिखिए और कक्षा में चर्चा कीजिए।
फिरंगियों’ और ‘फिरंगी’: विदेशी शासन के लिए।
‘मरदानी’: पुरुषोचित गुणों वाली स्त्री के लिए (यहाँ लय के लिए ‘मर्दानी’ को ‘मरदानी’ की तरह प्रयुक्त किया गया है)।
‘बूँदेलो’: बुंदेलखंड के निवासियों के लिए।
मुहावरे
दूर फ़िरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी“
उपर्युक्त पंक्ति में ‘दृढ़ निश्चय करने’ के अर्थ को व्यक्त करने के लिए ‘मन में ठान लेना’ वाक्यांश का प्रयोग हुआ है जो एक मुहावरा है। ‘मुहावरे’ ऐसे वाक्यांश होते हैं जो अपने शाब्दिक अर्थ से भिन्न एक विशेष और लाक्षणिक अर्थ व्यक्त करते हैं। इनके प्रयोग से भाषा में सौंदर्य और प्रभाव उत्पन्न होता है।
पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। उन पंक्तियों में आए मुहावरे ढूँढ़कर लिखिए और उन मुहावरों का प्रयोग करते हुए नए वाक्य भी बनाइए। आपकी सुविधा के लिए एक उदाहरण दिया गया है।
काव्य पंक्ति प्रयुक्त मुहावरा नया वाक्य
- अबके जनरल स्मिथ सन्मुख था उसने मुँह की खाई थी।, मुँह की खाना – मोहन ने सोचा था कि वह आसानी से जीत जाएगा लेकिन अंत में उसे मुँह की खानी पड़ी।
- डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया
- राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया
- हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो / सोई ज्योति जगानी थी
- मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी
काव्य पंक्ति | प्रयुक्त मुहावरा | अर्थ | नया वाक्य |
1. डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया | पैर पसारना | विस्तार करना / अधिकार जमाना | अंग्रेजों ने व्यापार के बहाने पूरे भारत में अपने पैर पसार लिए। |
1. डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया | काया पलट जाना | पूरी तरह बदल जाना | नई सड़क बनने से हमारे गाँव की तो काया ही पलट गई है। |
2. राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया | पैरों ठुकराना | तिरस्कार करना / ठुकरा देना | स्वाभिमानी लोग लालच को अपने पैरों से ठुकरा देते हैं। |
3. हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी | ज्योति जगाना | चेतना पैदा करना / प्रेरित करना | महापुरुष अपने विचारों से समाज में ज्ञान की ज्योति जगाते हैं। |
4. मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी | धूम मचाना | बहुत प्रसिद्ध होना / हलचल पैदा करना | भारतीय क्रिकेट टीम ने विश्व कप जीतकर पूरी दुनिया में धूम मचा दी। |
सृजन
- लक्ष्मीबाई की सखियों काना तथा मंदरा की ओर से लक्ष्मीबाई को एक पत्र लिखिए जिसमें काना तथा मंदरा द्वारा ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध युद्ध की रणनीति पर चर्चा की गई हो।
उत्तर – दिनांक: 14 जून, 1858
स्थान: ग्वालियर सैन्य शिविर
ग्वालियर
आदरणीय सखी और हमारी रानी लक्ष्मीबाई,
हम दोनों का आपको सादर प्रणाम।
सखी, कल का दिन हमारे अस्तित्व और झाँसी के सम्मान के लिए अत्यंत निर्णायक होने वाला है। जनरल स्मिथ की सेना ने हमें चारों ओर से घेरने का प्रयास किया है, लेकिन हमने और हमारी महिला सेना ने भी अपनी रणनीति तैयार कर ली है।
आपकी आज्ञानुसार, मंदरा ने पूर्वी मोर्चे पर कमान संभाल ली है। वहाँ के घने पेड़ों के पीछे हमने अपनी छोटी तोपें छिपाई हैं ताकि जैसे ही गोरा सैन्य दल आगे बढ़े, हम उन पर अचूक प्रहार कर सकें। मैंने (काना) अपनी टुकड़ी के साथ पश्चिमी नाले की ओर मोर्चाबंदी की है। हमारा लक्ष्य ब्रिटिश सेना की रसद की आपूर्ति को काटना है।
हमने तय किया है कि हम सीधे युद्ध के बजाय गुरिल्ला नीति अपनाएँगे। जैसे ही आप मुख्य सेना के साथ बीच से आक्रमण करेंगी, हम दोनों अपनी-अपनी दिशाओं से शत्रु को भ्रमित कर उन्हें ‘चक्रव्यूह’ में फँसा लेंगे। हमारे प्राण भी चले जाएँ तो कोई शोक नहीं, बस फिरंगी कदम आगे न बढ़ा पाएँ।
कल सूर्योदय के साथ हम अपनी तलवारों से नया इतिहास लिखेंगे। हमें आपकी वीरता पर पूरा विश्वास है।
आपकी अटूट सखियाँ,
काना और मंदरा
- युद्धपूर्व रात्रि में झाँसी की रानी के मन में अगले दिन की संभावनाओं को लेकर कई तरह के भाव और विचार उठ रहे होंगे। आपके जीवन में भी कई ऐसे क्षण आए होंगे जब आपने मानसिक ऊहापोह का अनुभव किया होगा। ऐसी किसी घटना के विषय में अपनी डायरी में लिखिए, जैसे- परीक्षा के एक दिन पूर्व की स्थिति या नौंवी कक्षा में पहला दिन आदि।
उत्तर – 25 मार्च, 2026
समय: रात 11:30 बजे
आज की रात मेरी आँखों से नींद कोसों दूर है। कल मेरी कक्षा नौवीं की वार्षिक परीक्षा का अंतिम और सबसे कठिन पेपर ‘गणित’ है। वैसे तो मैंने पूरे साल मेहनत की है और हर सवाल को कई बार हल किया है, फिर भी मन के किसी कोने में एक अजीब-सी बेचैनी है।
कमरे में सन्नाटा है, बस घड़ी की ‘टिक-टिक’ सुनाई दे रही है जो मुझे याद दिला रही है कि समय कितनी तेजी से भाग रहा है। बार-बार मन में विचार आ रहा है—”अगर कोई ऐसा सवाल आ गया जो मुझे नहीं आता हुआ तो?” या “अगर मैं समय पर पेपर पूरा नहीं कर पाया तो?” माँ ने दूध का गिलास देते हुए कहा था कि खुद पर विश्वास रखो, लेकिन यह ऊहापोह कम होने का नाम नहीं ले रही।
कभी लगता है कि सब कुछ याद है, और अगले ही पल लगता है कि मैं सारे सूत्र भूल गया हूँ। यह स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे किसी बड़े युद्ध से पहले एक योद्धा महसूस करता होगा। फिर मैंने अपनी मेज पर रखी झाँसी की रानी की तस्वीर देखी और सोचा कि उन्होंने कितने बड़े संकटों का सामना मुस्कुराकर किया था। उनके साहस को याद करके मेरा डर कुछ कम हुआ है।
अब मैं खुद को शांत करने की कोशिश करूँगा। जो होगा देखा जाएगा, मैंने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया है। अब बस कल का इंतज़ार है।
अविनाश रंजन गुप्ता
गतिविधियाँ
शौर्य के समाचार
यह कविता रानी लक्ष्मीबाई के जीवन की घटनाओं, उनकी वीरता और पराक्रम से हमारा साक्षात्कार कराती है। कविता में वर्णित घटनाओं को एक समाचार वाचक की तरह समाचार के रूप में प्रस्तुत कीजिए।
(संकेत- “आज झाँसी की रणभूमि पर रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी अद्भुत वीरता और शौर्य का परिचय दिया…।”)
समाचार वाचक: अविनाश रंजन गुप्ता
दिनांक: 18 जून, 1858 (ग्वालियर का मैदान)
“नमस्कार, मैं हूँ अविनाश रंजन गुप्ता और आप देख रहे हैं ‘शौर्य के समाचार’। आज झाँसी की रणभूमि और ग्वालियर के मैदानों से दिल दहला देने वाली खबरें आ रही हैं।
आज की मुख्य सुर्खियाँ:
झाँसी की रानी का अद्भुत पराक्रम: जनरल स्मिथ की सेना को मुँह की खानी पड़ी।
दो वीर सखियों का साथ: काना और मंदरा ने युद्ध के मैदान में मचाया तहलका।
अंतिम बलिदान: रानी ने ग्वालियर के पास घेरा तोड़ा, पर एक नए नाले ने बदली युद्ध की दिशा।
विस्तृत समाचार:
आज झाँसी की रणभूमि पर रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी अद्भुत वीरता और शौर्य का परिचय दिया है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, रानी अपनी दो सखियों—काना और मंदरा—के साथ शत्रु सेना पर बिजली बनकर टूट पड़ीं। जनरल स्मिथ ने अपनी ताज़ा सैन्य टुकड़ी के साथ हमला किया था, लेकिन रानी की तलवार के सामने गोरे सैनिकों के पैर उखड़ गए।
खबर मिल रही है कि रानी ने बहादुरी से ग्वालियर का किला फतह कर लिया था, लेकिन पीछे से ह्यू रोज की सेना ने आकर घेराबंदी कर ली है। युद्ध अत्यंत भीषण है। एक ओर फिरंगियों की भारी फौज है, तो दूसरी ओर ‘मरदानी’ अकेली उन पर भारी पड़ रही है।
दुखद सूचना:
अभी-अभी एक हृदयविदारक खबर आ रही है। शत्रु सेना से घिरी रानी वीरतापूर्वक लड़ते हुए आगे बढ़ रही थीं, लेकिन रास्ते में एक ‘बड़ा नाला’ आने के कारण उनका घोड़ा अड़ गया। इसी बीच पीछे से आए वार ने रानी को घायल कर दिया है। घायल होने के बावजूद उन्होंने अंतिम दम तक संघर्ष जारी रखा।
भारत की यह महान ‘छबीली’ अब इतिहास के सुनहरे पन्नों में अमर हो गई है। झाँसी भले ही हाथ से निकल गई हो, लेकिन लक्ष्मीबाई ने स्वतंत्रता की जो ज्योति जलाई है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए मशाल का काम करेगी।
‘खूब लड़ी मरदानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी’
बुलेटिन में फिलहाल इतना ही। बने रहिए हमारे साथ।”
‘हरबोलों’ और हमारी कहानी
“बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।”
‘हरबोला’ बुंदेलखंड क्षेत्र में रहने वाले लोकगायकों का एक समुदाय है जिन्होंने रानी लक्ष्मीबाई की वीरतापूर्ण गाथा को अपने गीतों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने का काम किया। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में लोकगायकों की एक लंबी और समृद्ध परंपरा रही है। इनके द्वारा गाए जाने वाले गीत सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मूल्यों को संरक्षित करने का एक जीवंत माध्यम हैं। आपके क्षेत्र में अथवा आपकी भाषा में भी ऐसे लोकगायक और उनके द्वारा गाए जाने वाले देशभक्तिपूर्ण गीत अवश्य प्रचलित होंगे। ऐसे गीतों का एक संकलन तैयार कीजिए और कक्षा में साझा कीजिए।
छात्र इसे अपने स्तर पर करेंगे।

