9, Ram-Lakshman-Parshuram, Samvad, Tulsidas, NCERT Class IX, Ganga Book Solutions. Questions Answers,

तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास का जन्म आज के उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनका जीवन-काल 16वीं -17वीं शताब्दी (सन् 1532-1623) के मध्य माना गया है। रामचरितमानस तुलसीदास का प्रसिद्ध महाकाव्य है। रामचरितमानस उनकी अनन्य रामभक्ति और उनके सृजनात्मक कौशल

का मनोरम उदाहरण है। उनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ कवितावली, गीतावली, दोहावली, कृष्णगीतावली, विनयपत्रिका, हनुमान बाहुक हैं। तुलसीदास की रचनाओं में राम मानवीय मर्यादाओं और आदर्शों के प्रतीक हैं जिनके माध्यम से उन्होंने नीति, स्नेह, शील, विनय, त्याग जैसे मूल्यों को प्रतिष्ठित किया है। मानव-प्रकृति, लोकजीवन और जीवन-जगत संबंधी गहरी अंतर्दृष्टि उनके काव्य में दिखाई पड़ती है।

तुलसीदास संस्कृत के श्रेष्ठ ज्ञाता थे। उनका अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं पर समान अधिकार था। उन्होंने रामचरितमानस की रचना अवधी में और विनयपत्रिका तथा कवितावली की रचना ब्रजभाषा में की। काशी में उनका देहावसान हुआ।

 

राम-लक्ष्मण – परशुराम संवाद – पाठ परिचय

प्रस्तुत अंश ‘रामचरितमानस’ के ‘बालकांड’ से लिया गया है। सीता स्वयंवर में श्रीराम द्वारा शिव-धनुष भंग का समाचार जब मुनि परशुराम को मिलता है तो वे आक्रोशित होकर वहाँ आते हैं। शिव-धनुष को खंडित देखकर वे तीव्र रोष प्रकट करते हैं और सभा में उपस्थित सभी राजाओं पर क्रोधित होते हैं। यहाँ तुलसीदास ने परशुराम के रोषपूर्ण और तेजस्वी रूप का वर्णन किया है। प्रस्तुत अंश में, सभा में उपस्थित राजाओं के भय, विश्वामित्र और जनक की सभा में उपस्थिति, जनक द्वारा सीता-स्वयंवर के बारे में बताने, विश्वामित्र द्वारा राम-लक्ष्मण का परशुराम से परिचय एवं सम्मानपूर्वक अभिवादन के बाद कथा आगे बढ़ती है।

 

राम-लक्ष्मण – परशुराम संवाद

देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥

पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥

जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥

जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥

आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गईं सयानीं॥

बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥

रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥

रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥

बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।

पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥

समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥

सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥

अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥

बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥

अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥

सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥

मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥

भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता।

सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।

हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥

नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥

आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।

सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥

सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु सो मोरा॥

बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥

सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥

बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥

एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥

रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।

धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥

 

विस्तृत व्याख्या

प्रसंग

यह घटना ‘धनुष-यज्ञ’ अर्थात् सीता स्वयंवर के समय की है। राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के विवाह के लिए यह शर्त रखी थी कि जो भी भगवान शिव के प्राचीन और भारी धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, उसी के साथ सीता का विवाह होगा। जब सभा में उपस्थित कोई भी राजा उस धनुष को हिला तक नहीं सका, तब मुनि विश्वामित्र की आज्ञा पाकर श्रीराम ने शिव-धनुष अर्थात् पिनाक को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाई, तो वह धनुष बीच से टूट गया। उस समय इतनी भयानक और गूँजती हुई ध्वनि हुई कि वह तीनों लोकों में सुनाई दी। धनुष टूटने की वह भयंकर टंकार अर्थात् आवाज़ तीनों लोकों में गूँज उठी। रामचरित मानस की पंक्ति “घोर कठोर रव रवि बाजि तजि मारगु चले।” अर्थात् उस घोर कठोर शब्द से सूर्य के घोड़े भी अपना रास्ता छोड़कर विचलित हो गए। परशुराम जी उस समय महेंद्र पर्वत पर तपस्या कर रहे थे। उस दिव्य धनुष के टूटने की टंकार को सुनकर वे तुरंत समझ गए कि उनके आराध्य देव भगवान शिव का धनुष टूट गया है। परशुराम जी भगवान विष्णु के आवेश अवतार माने जाते हैं और परम तपस्वी थे। उनके पास दिव्य दृष्टि थी। धनुष टूटने की टंकार सुनते ही उन्होंने अपने तपोबल से जान लिया कि यह घटना कहाँ और किस कारण से हुई है। शिव का अनन्य भक्त होने के नाते, अपने इष्टदेव के धनुष का अपमान उनसे सहन नहीं हुआ। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, परशुराम जी के पास वायु मार्ग से गमन करने की खेचरी शक्ति थी। वे पलक झपकते ही एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचने में सक्षम थे। उनका क्रोध इतना तीव्र था कि वे बिना एक क्षण गँवाए, अपने फरसे अर्थात् परशु को उठाकर सीधे मिथिला के जनकपुर की सभा में जा पहुँचे।

 

  1. देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥

व्याख्या – परशुराम अर्थात् भृगुपति के भयानक वेष और उग्र रूप को देखते ही सभा में उपस्थित सभी राजा अर्थात् भुआल डर के मारे व्याकुल होकर अपने आसन से खड़े हो गए।

शब्दार्थ –

भृगुपति – परशुराम (Parshurama)

कराला – भयानक (Dreadful)

बिकल – व्याकुल (Agitated/Disturbed)

भुआला – राजा (Kings)

 

  1. पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥

व्याख्या – सभी राजा अपने-अपने पिताओं के नाम के साथ अपना नाम ले-लेकर परशुराम जी को साष्टांग प्रणाम करने लगे ताकि परशुराम जी का क्रोध शांत रहे।

शब्दार्थ –

निज – अपना (Own)

दंड प्रनामा – साष्टांग प्रणाम (Prostrate salutation)

 

  1. जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥

व्याख्या – परशुराम जी अपनी आँखों से जिसे भी सहज भाव से या मित्र मानकर भी देखते थे, वह व्यक्ति डर के मारे यही समझता था कि अब उसका अंत अर्थात् बुरा समय आ गया है।

शब्दार्थ –

सुभायँ – स्वभाव से (Naturally)

चितवहिं – देखते हैं (Look at)

खुटानी – बुरा समय/विनाश (Bad time/Demise)

 

  1. जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥

व्याख्या – इसके बाद राजा जनक ने आकर मुनि के चरणों में सिर झुकाया और फिर सीता जी को बुलाकर उनसे भी मुनि को प्रणाम करवाया।

शब्दार्थ –

बहोरि – फिर (Then/Again)

नावा – झुकाया (Bowed)

 

  1. आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गईं सयानीं॥

व्याख्या – परशुराम जी ने सीता जी को आशीर्वाद दिया, जिसे देखकर उनकी सखियाँ प्रसन्न हो गईं और चतुर सखियाँ उन्हें वापस स्त्रियों के समूह में ले गईं।

शब्दार्थ –

आसिष – आशीर्वाद (Blessing)

सयानीं – चतुर (Clever)

 

  1. बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥

व्याख्या – फिर विश्वामित्र जी आकर परशुराम जी से मिले और उन्होंने राम तथा लक्ष्मण दोनों भाइयों को मुनि के चरण-कमलों में प्रणाम करवाया।

शब्दार्थ –

पद सरोज – चरण-कमल (Lotus feet)

दोउ भाई – दोनों भाई (Both brothers)

 

  1. रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥

व्याख्या – दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण की इस सुंदर जोड़ी को देखकर परशुराम जी ने उन्हें कल्याण का आशीर्वाद दिया।

शब्दार्थ –

ढोटा – पुत्र (Sons)

जोटा – जोड़ी (Pair)

 

  1. रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥

व्याख्या – श्रीराम का सौंदर्य इतना अपार था कि वह कामदेव के गर्व को भी चूर करने वाला था। उन्हें देखकर परशुराम जी की आँखें एकटक टिकी रह गईं।

शब्दार्थ –

चितइ – देखकर (Looking at)

मार – कामदेव (Cupid)

मद मोचन – गर्व को चूर करने वाला (Destroyer of pride)

 

  1. बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।

पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥

व्याख्या – फिर जनक की ओर देखकर परशुराम ने पूछा कि यह भारी भीड़ कैसी है? हालाँकि वे सब जानते थे, फिर भी अनजान बनकर पूछने लगे और उनके शरीर में क्रोध बढ़ने लगा।

शब्दार्थ –

बिदेह – राजा जनक (Janaka)

अजान – अनजान (Ignorant)

कोपु – क्रोध (Anger)

 

  1. समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥

व्याख्या – राजा जनक ने विनम्रतापूर्वक सारा समाचार सुनाया और वह कारण भी बताया जिसके लिए ये सभी राजा यहाँ एकत्रित हुए थे।

शब्दार्थ –

महीप – राजा (Kings)

 

  1. सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥

व्याख्या – जनक की बातें सुनकर परशुराम ने दूसरी ओर दृष्टि डाली और वहाँ जमीन पर पड़े हुए शिव-धनुष को दो टुकड़ों में देखा।

शब्दार्थ –

अनत – दूसरी ओर (Elsewhere)

चापखंड – धनुष के टुकड़े (Fragments of the bow)

महि – पृथ्वी/जमीन (Ground)

 

  1. अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥

व्याख्या – अत्यंत क्रोध में भरकर वे कठोर वाणी में बोले— “हे मूर्ख जनक! बता, यह शिव का धनुष किसने तोड़ा है?”

शब्दार्थ –

रिस – गुस्सा (Rage)

जड़ – मूर्ख (Fool)

 

  1. बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥

व्याख्या – उसे तुरंत मेरे सामने ला, नहीं तो आज मैं तेरे राज्य की धरती को जहाँ तक वह फैली है, पलट दूँगा।

शब्दार्थ –

बेगि – जल्दी (Quickly)

मूढ़ – मूर्ख (Ignorant fool)

लहि – तक (Till)

 

  1. अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥

व्याख्या – मुनि के डर से राजा जनक उत्तर नहीं दे पा रहे थे, जिसे देखकर सभा में मौजूद दुष्ट और कुटिल राजा मन ही मन खुश हो रहे थे।

शब्दार्थ –

नृपु – राजा (King)

कुटिल – दुष्ट/टेढ़े (Cunning/Evil)

 

  1. सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥

व्याख्या – मुनि के क्रोध को देखकर देवता, मुनि, नाग और नगर के सभी लोग अत्यंत भयभीत होकर चिंता करने लगे।

शब्दार्थ –

त्रास – भय (Terror)

उर – हृदय (Heart)

 

  1. मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥

व्याख्या – सीता जी की माता सुनयना मन ही मन पछताने लगीं कि भाग्य ने अब बनी-बनाई बात बिगाड़ दी है।

शब्दार्थ –

महतारी – माता (Mother)

बिधि – विधाता/भाग्य (Creator/Destiny)

 

  1. भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥

व्याख्या – परशुराम के स्वभाव को जानकर सीता जी के लिए पलक झपकने में लगने वाला आधा समय भी करोड़ों वर्षों अर्थात् कल्प के समान भारी हो गया।

शब्दार्थ –

अरध निमेष – आधा पल (Half a moment)

कलप – कल्प/युग (Aeon/Long time)

 

  1. सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।

हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥

व्याख्या – सबको डरा हुआ और सीता जी को भयभीत जानकर, श्रीराम बिना किसी घबराहट या गर्व के शांत भाव से बोले।

शब्दार्थ –

भीरु – डरी हुई (Terrified)

बिषादु – दुख (Sorrow)

 

  1. नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥

व्याख्या – “हे नाथ! शिवजी के इस धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा।”

शब्दार्थ –

संभुधनु – शिव का धनुष (Shiva’s bow)

भंजनिहारा – तोड़ने वाला (Breaker)

 

  1. आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥

व्याख्या – “मेरे लिए क्या आज्ञा है? आप मुझसे क्यों नहीं कहते?” यह सुनकर क्रोधी मुनि गुस्से में भरकर बोले।

शब्दार्थ –

आयसु – आज्ञा (Order/Command)

रिसाइ – क्रोधित होकर (Angrily)

कोही – क्रोधी (Wrathful)

 

  1. सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥

व्याख्या – “सेवक वह होता है जो सेवा का कार्य करे। शत्रुता का काम करने वाले के साथ तो केवल युद्ध ही किया जाता है।”

शब्दार्थ –

सेवकाई – सेवा (Service)

अरि – शत्रु (Enemy)

 

  1. सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु सो मोरा॥

व्याख्या – “हे राम सुनो! जिसने भी यह शिव-धनुष तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा प्रबल शत्रु है।”

शब्दार्थ –

सहसबाहु – एक प्रतापी राजा जिसकी हजार भुजाएँ थीं (Sahasrabahu)

रिपु – दुश्मन (Enemy)

 

  1. बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥

व्याख्या – “वह व्यक्ति इस राज-सभा को छोड़कर तुरंत अलग हो जाए, अन्यथा यहाँ उपस्थित सभी राजा मारे जाएँगे।”

शब्दार्थ –

बिलगाउ – अलग होना (Separate)

बिहाइ – छोड़कर (Leaving)

 

  1. सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥

व्याख्या – मुनि के वचनों को सुनकर लक्ष्मण जी मुस्कुराने लगे और परशुराम का अनादर करते हुए बोले।

शब्दार्थ –

मुसुकाने – मुस्कुराए (Smiled)

अपमाने – निरादर/व्यंग्य में (Insultingly)

 

  1. बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥

व्याख्या – “हे स्वामी! हमने बचपन में ऐसी बहुत सी छोटी धनुहियाँ तोड़ी हैं, तब तो आपने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया।”

शब्दार्थ –

लरिकाईं – बचपन (Childhood)

गोसाईं – स्वामी/मुनि (Lord/Master)

 

  1. एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥

व्याख्या – “इसी धनुष पर आपका इतना प्रेम किस कारण से है?” यह सुनकर परशुराम जी और अधिक क्रोधित होकर बोले।

शब्दार्थ –

ममता – लगाव/प्रेम (Affection)

भृगुकुलकेतू – भृगु वंश की ध्वजा रूप परशुराम (Banner of Bhrigu’s race)

 

  1. रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।

धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥

व्याख्या – “अरे राजपुत्र! तू मृत्यु के वश में होने के कारण संभलकर नहीं बोल रहा है। क्या शिवजी का यह धनुष उन छोटी धनुहियों के समान है? यह तो पूरे संसार में प्रसिद्ध है।”

शब्दार्थ –

नृप बालक – राजकुमार (Prince)

तिपुरारि धनु – शिव का धनुष (Shiva’s bow)

बिदित – प्रसिद्ध/ज्ञात (Famous/Known)

 

काव्य सौष्ठव

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित ‘राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद’ अलंकारों की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। इसमें वीर और रौद्र रस की अभिव्यक्ति को प्रभावशाली बनाने के लिए शब्दों और अर्थों का चमत्कारिक प्रयोग किया गया है।

  1. अनुप्रास अलंकार (Alliteration)

जहाँ एक ही वर्ण की आवृत्ति बार-बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। इस प्रसंग में इसके कई उदाहरण हैं –

‘भय बिकल भुआला’ – यहाँ ‘ब’ और ‘भ’ वर्ण की आवृत्ति है।

‘कहि कहि’ – ‘क’ वर्ण की आवृत्ति।

‘कहिअ किन’ – ‘क’ वर्ण की आवृत्ति।

‘सेवकु सो जो करै सेवकाई’ – यहाँ ‘स’ और ‘क’ वर्ण की आवृत्ति बार-बार हुई है।

‘बालक काल बस’ – ‘ब’ और ‘क’ वर्ण की आवृत्ति।

  1. पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार (Repetition)

जहाँ एक ही शब्द की आवृत्ति बिना अर्थ बदले भाव को बढ़ाने के लिए की जाए।

‘कहि कहि’ – यहाँ ‘कहि’ शब्द दोबारा आया है, जिसका अर्थ ‘कहकर’ ही है। यह भाव की तीव्रता को बढ़ाता है।

‘करि करिअ’ – यहाँ ‘कर’ धातु की आवृत्ति है।

  1. रूपक अलंकार (Metaphor)

जहाँ उपमेय और उपमान में कोई भेद न रहे (सीधे तुलना न करके वही रूप दे दिया जाए)।

‘पद सरोज’ – यहाँ चरणों को सीधे ‘सरोज’ (कमल) कहा गया है। अर्थात् चरण-रूपी कमल।

‘भृगुकुलकेतू’ – परशुराम जी को भृगु वंश का ‘केतु’ (ध्वज) कहा गया है।

  1. उपमा अलंकार (Simile)

जहाँ ‘सी’, ‘से’, ‘सम’, ‘जिमि’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर तुलना की जाए।

जानि अजान जिमि’ – यहाँ परशुराम जी के व्यवहार की तुलना एक अनजान व्यक्ति से की गई है (जिमि = जैसे)।

कलप सम बीता’ – सीता जी के लिए आधा पल ‘कल्प’ (युग) के समान बीत रहा था।

सहसबाहु सम सो रिपु सो मोरा’ – धनुष तोड़ने वाले की तुलना सहस्रबाहु के समान शत्रु से की गई है।

धनुही सम तिपुरारि धनु’ – यहाँ शिव धनुष की तुलना साधारण ‘धनुही’ से करने का संकेत है (व्यंग्य स्वरूप)।

  1. उत्प्रेक्षा अलंकार (Hyperbolic Imagination)

जहाँ ‘जनु’, ‘मनु’ जैसे शब्दों का प्रयोग कर संभावना व्यक्त की जाए।

सो जानइ जनु आइ खुटानी’ – यहाँ संभावना व्यक्त की गई है किमानो (जनु) बुरा समय आ गया है।

  1. अतिशयोक्ति अलंकार (Hyperbole)

जहाँ किसी बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहा जाए।

‘उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू’ – परशुराम जी द्वारा पूरी धरती को पलट देने की बात कहना उनके प्रचंड क्रोध की अतिशयोक्तिपूर्ण अभिव्यक्ति है।

‘अरध निमेष कलप सम बीता’ – समय का कल्प के समान बीतना सीता जी की मानसिक पीड़ा की अतिशयोक्ति है।

  1. वक्रोक्ति एवं व्यंग्य (Sarcasm)

पूरे संवाद में, विशेषकर लक्ष्मण के वचनों में, टेढ़ी उक्ति या व्यंग्य का प्रयोग है।

‘बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं’ – यहाँ लक्ष्मण ‘धनुही’ शब्द का प्रयोग कर शिव धनुष का महत्त्व कम करके परशुराम जी पर कटाक्ष कर रहे हैं।

काव्य-विशेष (शिल्प सौंदर्य) –

  1. भाषा – अवधि (तत्सम शब्दों से युक्त)।
  2. छंद – दोहा और चौपाई।
  3. शैली – संवादात्मक और ओजपूर्ण।
  4. रस – रौद्र (परशुराम), वीर (लक्ष्मण) और शांत (राम)।

अभ्यास

रचना से संवाद

मेरे उत्तर मेरे तर्क

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

  1. पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥” यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मनःस्थिति को दर्शाती है?

(क) आदर और सम्मान

(ख) भक्ति और श्रद्धा

(ग) भय और शिष्टाचार

(घ) प्रेम और सहिष्णुता

उत्तर – (ग) भय और शिष्टाचार

परशुराम के ‘कराला’ अर्थात् भयानक रूप को देखकर राजा डर गए थे। वे दंडवत प्रणाम श्रद्धा से नहीं, बल्कि प्राण बचाने के शिष्टाचार और डर के कारण कर रहे थे।

  1. जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा” पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है?

(क) संवेदनशीलता

(ख) शिष्टता

(ग) सहनशीलता

(घ) उदासीनता

उत्तर – (ख) शिष्टता

राजा जनक एक आदर्श मेजबान और पिता हैं। मुनि के आगमन पर स्वयं झुकना और पुत्री से भी प्रणाम करवाना उनके ऊँचे संस्कारों और शिष्ट व्यवहार को दर्शाता है।

  1. अति रिस बोले बचन कठोरा।” जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था-

(क) उचित आदर-सत्कार न मिलना

(ख) जनक द्वारा समाचार छिपाना

(ग) शिव-धनुष का खंडित होना

(घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थिति

उत्तर – (ग) शिव-धनुष का खंडित होना

परशुराम शिव के अनन्य भक्त हैं। उनके लिए शिव-धनुष का टूटना उनके आराध्य का अपमान था, यही उनके भीषण क्रोध और कठोर वचनों का मुख्य कारण था।

  1. राम का कथन “होइहि केउ एक दास तुम्हारा” उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है?

(क) कूटनीति और चतुराई

(ख) विनम्रता और मर्यादा

(ग) त्याग और समर्पण

(घ) दृढ़ता और आत्मविश्वास

उत्तर – (ख) विनम्रता और मर्यादा

राम जानते हैं कि परशुराम अत्यंत क्रोधी हैं, फिर भी वे स्वयं को उनका ‘दास’ कहकर संबोधित करते हैं। यह उनकी असीम विनम्रता और मर्यादा पुरुषोत्तम होने का प्रमाण है।

  1. सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥” लक्ष्मण के मुसकराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था?

(क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे।

(ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था।

(ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे।

(घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।

उत्तर – (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।

लक्ष्मण वीर योद्धा हैं। उन्हें परशुराम का अहंकार और अनुचित क्रोध स्वीकार नहीं था। वे अपने व्यंग्य और मुस्कुराहट से मुनि के गर्व को चुनौती दे रहे थे।

 

मेरी समझ मेरे विचार

नीचे दिए गए प्रश्नों पर चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-

  1. अरध निमेष कलप सम बीता” पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि कविता में यह किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों?

उत्तर – यह पंक्ति सीता जी के संदर्भ में कही गई है। जब सीता जी ने परशुराम के उग्र और संहारक स्वभाव के बारे में सुना, तो वे अत्यंत भयभीत हो गईं। उनके लिए डर और चिंता के कारण पलक झपकने का आधा समय भी एक कल्प अर्थात् करोड़ों वर्ष के समान लंबा और कष्टकारी बीतने लगा। यह मन की उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ अत्यधिक तनाव में समय ठहर-सा जाता है।

  1. सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥” पंक्ति के आधार पर बताइए कि परशुराम द्वारा दी गई इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज-समाज पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर – परशुराम की चेतावनी— “वह समाज से अलग हो जाए, नहीं तो सब राजा मारे जाएँगे”— ने पूरी सभा में दहशत और बेचैनी पैदा कर दी होगी।

राजा जनक डर के मारे उत्तर नहीं दे पा रहे थे। सीता जी की माता सुनयना और स्वयं सीता जी अनिष्ट की आशंका से घबरा गई थीं। निर्दोष राजाओं को लगा होगा कि वे बिना किसी अपराध के मुनि के क्रोध की बलि चढ़ जाएँगे। केवल लक्ष्मण ही ऐसे थे जो निर्भय थे।

  1. तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण के माध्यम से एक ही परिस्थिति के प्रति दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दिखाई हैं। आपकी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का विनयका मार्ग उचित है या लक्ष्मण के तर्कका? अपने उत्तर का उचित कारण और तर्क भी प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर – मेरी दृष्टि में, परशुराम जैसे महाक्रोधी व्यक्ति को शांत करने के लिए राम का ‘विनय’ का मार्ग अधिक उचित है। ऐसा इसलिए क्योंकि आग को आग से नहीं, पानी से बुझाया जा सकता है। लक्ष्मण का तर्क मुनि के क्रोध में ‘घी’ का काम कर रहा था, जिससे युद्ध की स्थिति बन रही थी। वहीं, राम की विनम्रता ने परशुराम को यह सोचने पर मजबूर किया कि धनुष तोड़ने वाला कोई उद्दंड व्यक्ति नहीं, बल्कि एक शीलवान पुरुष है। अंततः राम की विनयशीलता ने ही परशुराम के हृदय को बदला।

  1. हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।श्री राम के हृदय में न हर्ष था, न विषाद। यह उनके व्यक्तित्व के किन गुणों को दर्शाता है? उनका भावनात्मक संतुलन इस पूरे पाठ में उन्हें अन्य पात्रों से अलग कैसे स्थापित करता है?

उत्तर – ‘हृदयँ न हरषु बिषादु कछु’ राम के ‘स्थितप्रज्ञ’ होने और उनके धैर्य को दर्शाता है। यह उनके व्यक्तित्व के अडिग आत्मविश्वास और निष्काम भाव को प्रकट करता है। जहाँ पूरी सभा भय से काँप रही थी, जनक असमंजस में थे और लक्ष्मण उत्तेजित थे, वहीं राम पूरी तरह शांत थे। उनका यह संतुलन उन्हें एक ‘अवतार’ और ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ के रूप में अन्य सभी पात्रों से ऊपर स्थापित करता है। वे जानते थे कि सत्य उनके पक्ष में है, इसलिए उन्हें न तो जीत का हर्ष था और न ही मृत्यु का भय।

मेरी कल्पना मेरे अनुमान

नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर दीजिए—

  1. कल्पना कीजिए कि आप जनक की सभा में उपस्थित एक राजा हैं। परशुराम जी के आगमन से लेकर उनके गमन तक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर – मिथिला की वह भयंकर सभा

“मैं भी उस दिन मिथिला की राज-सभा में अन्य राजाओं के साथ उपस्थित था। सभा का माहौल उत्सव जैसा था, जो श्रीराम द्वारा शिव-धनुष तोड़े जाने के बाद अचानक सन्नाटे में बदल गया। अचानक द्वार से क्रोध की अग्नि के समान दहकते हुए मुनि परशुराम का प्रवेश हुआ। उनके कंधे पर एक विशाल फरसा था और उनकी आँखों में क्रोध की ज्वाला। उन्हें देखते ही मेरे सहित सभी राजाओं के प्राण सूख गए। हम सब अपनी गद्दियों से खड़े हो गए और डर के मारे अपने पिताओं का नाम ले-लेकर उन्हें साष्टांग प्रणाम करने लगे।

मुनि का क्रोध सातवें आसमान पर था। जब उन्होंने टूटे हुए धनुष को देखा, तो उनकी गर्जना से पूरी सभा काँप उठी। उन्होंने महाराज जनक को धमकी दी कि यदि अपराधी सामने नहीं आया, तो वे राज्य पूरी धरती को उलट देंगे। जनक जी भय के कारण मौन थे। तभी लक्ष्मण जी ने आगे बढ़कर मुनि पर व्यंग्य शुरू कर दिए। वह दृश्य बड़ा ही रोमांचक और डरावना था—एक तरफ मुनि का भीषण क्रोध और दूसरी तरफ बालक लक्ष्मण की निडर मुस्कान। अंत में, श्रीराम की अत्यंत शीतल और विनीत वाणी ने मुनि के क्रोध को शांत किया। जब मुनि को श्रीराम के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हुआ, तो वे नतमस्तक होकर तपस्या के लिए महेंद्र पर्वत की ओर लौट गए। तब जाकर हमने चैन की साँस ली।”

  1. अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥” जनक द्वारा डर से चुप रहने पर अन्य राजा मन में प्रसन्न क्यों हुए होंगे?

(संकेत- सोचिए, यह मनुष्य के व्यवहार की किस सच्चाई को उजागर करता है?)

उत्तर – जनक द्वारा डर के मारे चुप रहने पर अन्य राजाओं के मन में प्रसन्न होने के पीछे निम्नलिखित मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक कारण रहे होंगे –

अहंकार की संतुष्टि – सभा में उपस्थित अधिकांश राजा अहंकारी थे। वे स्वयं शिव-धनुष को हिला तक नहीं पाए थे, जिससे उन्हें अपमान महसूस हो रहा था। अब जब जनक जो इस स्वयंवर के आयोजक थे संकट में पड़े और मुनि के सामने असहाय दिखे, तो उन राजाओं को अपने अपमान का बदला पूरा होता हुआ महसूस हुआ।

प्रतिद्वंद्विता – राजाओं के बीच सत्ता और सम्मान की होड़ रहती थी। जनक को डरता हुआ देखकर अन्य राजाओं को लगा कि अब जनक का प्रभाव कम हो जाएगा।

दूसरे का दुख, अपना सुख – यह मनुष्य के व्यवहार की उस कड़वी सच्चाई ‘परपीड़न’ को उजागर करता है, जहाँ लोग दूसरों की विफलता या कष्ट में अपनी ख़ुशी ढूँढ़ते हैं। यह दर्शाता है कि ईर्ष्या के कारण व्यक्ति अक्सर यह भूल जाता है कि संकट किसी पर भी आ सकता है।

विधा से संवाद

कविता का सौंदर्य

यह कविता तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य रामचरितमानस के ‘बालकांड’ का एक अंश है जहाँ शिव-धनुष के टूटने से क्रोधित परशुराम के रोष भरे वाक्यों का उत्तर लक्ष्मण व्यंग्य वचनों से देते हैं। दोनों के बीच के ये संवाद कविता में नाटकीयता उत्पन्न करते हैं। संवादों के माध्यम से ही पूरी कविता का कथात्मक विकास होता है, संवाद ही चरित्र का निर्माण करते हैं और संवादों से ही भावों में विविधता भी आती है। इस प्रकार यह कविता काव्यात्मक विधा में संवाद – प्रस्तुति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। नीचे कविता के संवादों की कुछ विशेषताएँ दी गई हैं। उन विशेषताओं को दर्शाने वाली पंक्तियों के उदाहरण कविता से ढूँढ़कर लिखिए।

संवादों की विशेषता

  • राम की विनम्रता

“नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥ आयसु काह कहिअ किन मोही।”

  • परशुराम का रौद्र रूप

“बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥” या “सहसबाहु सम सो रिपु सो मोरा।”

  • लक्ष्मण का प्रत्युत्तर पौराणिक संदर्भ

“बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥ एहि धनु पर ममता केहि हेतू।”

  • पौराणिक संदर्भ

“धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥” (यहाँ शिवजी द्वारा त्रिपुर राक्षस के संहार और उनके प्रसिद्ध धनुष का संदर्भ है।)

  • नाटकीयता

“सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥” (यहाँ मुस्कुराहट और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग दृश्य में नाटकीय मोड़ लाता है।)

 

भाव – पहचान एवं विश्लेषण

आपने पढ़ा कि राजा जनक की सभा में उपस्थित विभिन्न पात्रों की मनःस्थिति अलग-अलग है। नीचे दिए गए भावों/मनःस्थिति को दर्शाने वाली पंक्तियों को कविता से चिह्नित कीजिए और बताइए कि यह भाव किस पात्र से संबंधित है और उसकी इस मनःस्थिति का कारण क्या है? आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है।

चिंता, क्रोध, व्यग्रता, भय, संयम / विनम्रता, ईर्ष्या/कुटिलता

भाव / मनःस्थिति

संबंधित पंक्ति

संबंधित पात्र

मनःस्थिति का कारण                   

चिंता

बिधि अब सँवरी बात बिगारी

सीता की माता सुनयना

परशुराम के क्रोध को देखकर उन्हें डर लगा कि अब उनकी पुत्री का विवाह संकट में पड़ गया है।

क्रोध

बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥

परशुराम

अपने आराध्य भगवान शिव के प्राचीन धनुष के टूटने को वे अपना और शिवजी का अपमान मान रहे थे।

व्यग्रता (बेचैनी)

अरध निमेष कलप सम बीता

सीता जी

परशुराम के उग्र स्वभाव और सभा में बढ़ते तनाव के कारण वे अत्यंत बेचैन थीं और उन्हें समय काटना कठिन लग रहा था।

भय

उठे सकल भय बिकल भुआला॥

सभा के राजा

परशुराम के ‘कराल’ (भयानक) वेष और उनके संहारक इतिहास के बारे में सोचकर सभी राजा प्राणों के भय से काँप उठे।

संयम / विनम्रता

नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥

श्रीराम

राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं; वे जानते थे कि विनय से ही मुनि के क्रोध को शांत किया जा सकता है, इसलिए उन्होंने स्वयं को उनका दास कहा।

ईर्ष्या / कुटिलता

कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥

कुटिल राजा

वे राजा स्वयं धनुष नहीं तोड़ पाए थे, इसलिए जनक को मुसीबत में देखकर और राम-लक्ष्मण पर संकट आता देख ईर्ष्यावश खुश हो रहे थे।

 

अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं।”

परशुराम के पूछने पर जनक का मौन भयजनित है या विवेकपूर्ण निर्णय? संवाद की स्थिति के आधार पर विश्लेषण कीजिए।

संदर्भ

शिव-धनुष के खंडित होने पर जब परशुराम जी ने पूरी पृथ्वी को उलटने की धमकी दी, तब राजा जनक की इस स्थिति का वर्णन किया गया है।

विश्लेषण (क्या, क्यों, कैसे) –

क्या – राजा जनक का मौन (चुप रहना)।

क्यों – परशुराम के क्षत्रिय-विनाशक इतिहास और उनके वर्तमान भीषण क्रोध के कारण उत्पन्न ‘प्राण-भय’।

कैसे – मुनि की उग्रता ने जनक के आत्मविश्वास को दबा दिया, जिससे वे उत्तर देने में असमर्थ हो गए।

कारण भाव परिणाम

परशुराम की विनाशकारी चेतावनी (कारण)

जनक के मन में प्रजा और स्वयं की सुरक्षा का तीव्र डर (भाव)

उत्तर न दे पाने की विवशता (परिणाम)।

निष्कर्ष – इससे स्पष्ट होता है कि जनक का मौन तात्कालिक रूप से भयजनित था। यह पंक्ति संकेत देती है कि अत्यंत उग्र क्रोध के सामने ज्ञानी व्यक्ति भी संयम और चुप्पी में ही सुरक्षा ढूँढ़ता है, जो अंततः स्थिति को और अधिक बिगड़ने से रोकती है।

 

काव्य पंक्ति और भाव

रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।

धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥”

(क) यदि आप इन पंक्तियों को मंच पर बोलते, तो आपके चेहरे पर कौन-सा भाव होता?

उत्तर – यदि मैं इन पंक्तियों को मंच पर बोलता, तो मेरे चेहरे पर ‘रौद्र भाव’ और ‘गर्व’ का मिला-जुला मिश्रण होता।

आँखें – क्रोध से लाल और विस्तारित, जो सामने वाले को चेतावनी दे रही हों।

स्वर – स्वर में भारीपन और गर्जना होती, जैसे कोई समुद्र की लहर गरज रही हो।

अंग संचालन – हाथों के माध्यम से शिव-धनुष की विशालता और लक्ष्मण की तुच्छता को दर्शाने का प्रयास होता। यह भाव केवल गुस्से का नहीं, बल्कि अपने आराध्य शिव के अपमान पर उपजी तड़प और अहंकार की चोट का होता।

(ख) आपने अनुभव किया होगा कि इस कविता में परिस्थितिवश प्रत्येक पात्र एक अलग भाव का प्रतिनिधि बन जाता है। निम्नलिखित पात्रों को आप कौन-कौन से भावों द्वारा प्रदर्शित करेंगे-

उत्तर –

पात्र

प्रदर्शित भाव / मन -स्थिति

प्रदर्शन का तरीका

परशुराम

रौद्र और अहंकार

चढ़ी हुई भौंहें, हाथ में फरसा, और चेहरे पर तीव्र क्रोध की रेखाएँ।

राजा जनक

भय और विवशता

माथे पर पसीना, झुकी हुई नज़रें, और हाथ जोड़े हुए काँपता हुआ शरीर।

लक्ष्मण

हास्य और व्यंग्य

चेहरे पर एक कुटिल मुस्कुराहट, आँखों में शरारत और निडरता का भाव।

राम

शान्त और विनय

सौम्य मुस्कान, स्थिर आँखें, और चेहरे पर असीम धैर्य व मर्यादा।

अन्य राजा

ईर्ष्या और कायरता

कुछ के चेहरे पर डर, तो कुछ के चेहरे पर दूसरों को संकट में देख छिपी हुई कुटिल प्रसन्नता।

 

विषयों से संवाद

  1. सभा में परशुराम के प्रति राम के व्यवहार से उनकी विनम्रता, मर्यादा, धीर और उदात्त चरित्र के संबंध में पता चलता है जो किसी भी कुशल शासक के लिए आवश्यक है। आपको किन-किन परिस्थितियों में इन विशेषताओं का परिचय देना पड़ता है? चर्चा कीजिए और लिखिए।

उत्तर – श्रीराम की विनम्रता, मर्यादा और धैर्य एक कुशल नेतृत्व के आधार स्तंभ हैं। हमें इनका परिचय निम्नलिखित स्थितियों में देना पड़ता है –

विवाद के समय – जब कोई हम पर अकारण क्रोध करे, तब शांत रहकर स्थिति संभालना।

दबाव की स्थिति – परीक्षा या खेल के मैदान में हार-जीत के तनाव के बीच अनुशासन न खोना।

सम्मान की रक्षा – अपने से बड़ों या वरिष्ठों के साथ वैचारिक मतभेद होने पर भी शिष्टता से अपनी बात रखना।

  1. कविता में वर्णित प्रसंग सीता स्वयंवर की सभा का है। प्राचीन भारतीय समाज में वर- चयन के लिए स्वयंवर की प्रथा प्रचलित थी। इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। ऐसी किसी एक पौराणिक-ऐतिहासिक आदि घटना / प्रसंग का वर्णन कीजिए जिससे स्वयंवर विधि द्वारा विवाह की जानकारी मिलती है।

उत्तर – द्रौपदी स्वयंवर

प्रसंग – महाभारत में राजा द्रुपद ने द्रौपदी के विवाह के लिए स्वयंवर आयोजित किया था।

शर्त – जल में मछली का प्रतिबिंब देखते हुए ऊपर घूमते हुए यंत्र पर लगी मछली की आँख को भेदना था।

परिणाम – अनेक राजाओं की विफलता के बाद अर्जुन ने इस कठिन लक्ष्य को भेदा और द्रौपदी का वरण किया। यह प्रथा वर की योग्यता और पराक्रम के चयन का प्रतीक थी।

सृजन

  1. परशुराम के क्रोध को देखकर सीता और उनकी माता सुनयना दोनों चिंतित हैं और सीता के लिए एक-एक पल युग के समान भारी और लंबा प्रतीत हो रहा है। उनकी मनःस्थिति का अनुमान लगाते हुए उस क्षण दोनों के बीच चल रहा मौन संवाद लिखिए।

उत्तर – दृश्य – दोनों एक-दूसरे की आँखों में देख रही हैं, शब्द मौन हैं पर हृदय व्याकुल हैं।

सुनयना (आँखों से) – “पुत्री, विधाता ने यह कैसा संकट खड़ा कर दिया? सुकुमार राम इस क्रोधी मुनि के सामने कैसे टिकेंगे?”

सीता (आँखों से) – “हे माँ! मेरा मन भी काँप रहा है। लक्ष्मण भैया के वचन आग में घी डाल रहे हैं। हे गौरी माँ! मेरे राम की रक्षा करना, उनके बिना यह एक-एक पल मुझे युगों जैसा लंबा लग रहा है।”

  1. सभा में हो रहे संवाद को दूर बैठी सीता, राजा जनक और अन्य लोग भी सुन रहे थे। अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर लिखिए कि उस समय सीता के मन में किस तरह के भाव उत्पन्न हो रहे होंगे? सीता के दृष्टिकोण से पूरी घटना का विश्लेषण कीजिए।

(संकेत- लक्ष्मण के प्रत्युत्तर पर चिंता, गर्व, हँसी, भय, शंका इत्यादि)

उत्तर – सीता जी के लिए वह क्षण भावनाओं का एक तीव्र भँवर था –

भय और चिंता – परशुराम के फरसे और गर्जना को देखकर वे सहम गईं कि कहीं यह खुशी मातम में न बदल जाए।

गर्व और हँसी – जब लक्ष्मण जी निडर होकर तर्क दे रहे थे, तो उन्हें अपने देवर की वीरता पर गर्व भी हुआ और उनकी चपलता पर मन ही मन हँसी भी आई।

अगाध श्रद्धा – अंत में, जब उन्होंने श्रीराम को शांत और गंभीर देखा, तो उनकी शंका दूर हो गई। उन्हें विश्वास हो गया कि उनके स्वामी का ‘धैर्य’ मुनि के ‘क्रोध’ पर विजय पा लेगा।

निष्कर्ष – सीता जी के लिए यह परीक्षा केवल राम की नहीं, बल्कि उनके अपने अटूट विश्वास की भी थी।

  1. कविता में सभा में उपस्थित राजाओं ने अपनी वीरता, पराक्रम आदि का उल्लेख करते हुए अपना परिचय दिया है। यदि आपको अपना परिचय देना हो तो आप अपना परिचय किस प्रकार देना उचित समझेंगे? अपना परिचय देते हुए कुछ वाक्य लिखिए जिससे आपके व्यक्तित्व की महत्त्वपूर्ण बातों का पता चलता हो।

उत्तर – यदि मुझे अपना परिचय देना हो, तो मैं अहंकार के बजाय अपने कर्म और स्वभाव को प्रधानता दूँगा –

“मैं स्वयं को एक निरंतर सीखने वाले के रूप में देखता हूँ, जिसका व्यक्तित्व सत्य, संवेदनशीलता और अटूट धैर्य की नींव पर टिका है। मेरा मानना है कि इंसान की असली पहचान उसके पद या बल से नहीं, बल्कि कठिन समय में उसके द्वारा दिखाए गए संयम और दूसरों के प्रति करुणा से होती है। मैं अपनी परंपराओं का सम्मान करते हुए आधुनिक विचारों के साथ आगे बढ़ने में विश्वास रखता हूँ और मेरा लक्ष्य अपने कार्यों से समाज में सकारात्मक बदलाव लाना है।”

 

भाषा से संवाद

व्याकरण की बात

नीचे दी गई पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए-

“देखत भृगुपति बेषु कराला।”

“बोले परसुधरहि अपमाने।”

“सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू”

यहाँ परशुराम को विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है, जैसे- भृगुपति, परसुधर और भृगुकुलकेतू। आप इस कविता में अनेक विशेषताएँ देख सकते हैं, जैसे- दोहा – चौपाई का क्रम से होना, बिना वक्ता का नाम बताए उनका कथन कह देना, मुहावरों का उपयोग करना आदि। नीचे इस कविता की कुछ विशेषताएँ और उनके एक-एक उदाहरण दिए गए हैं। एक-एक उदाहरण आप लिखिए।

विशेषता – अनुप्रास अलंकार, अतिशयोक्ति अलंकार, रूपक अलंकार

अर्थ – एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति, बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना, रूप का आरोपण करना

उदाहरण – अरि करनी करि करिअ लराई, अरध निमेष कलप सम बीता, पद सरोज मेले दोउ भाई

अलंकार

मुख्य पहचान

इस पाठ का संकेत

अनुप्रास

वर्ण का दोहराव

हसबाहु सो

अतिशयोक्ति

असंभव सी बात

पल भर में धरती उलटना

रूपक

एकरूपता

भृगुकुलकेतु (भृगुवंश की ध्वजा)

 

बहुभाषिकता

यह कविता अवधी भाषा में लिखी गई है जो कि हिंदी भाषा का ही एक स्वरूप है और उत्तर प्रदेश के अनेक स्थानों पर बोली जाती है। कविता में ऐसे बहुत से शब्द आए हैं, जो अवधी भाषा के हैं। ऐसे शब्दों को पहचान कर उनके खड़ी बोली हिंदी रूप लिखिए। साथ ही आपकी भाषा में इनके लिए कौन-से शब्द प्रयुक्त होते हैं, उन्हें भी लिखिए।

उदाहरण-

अवधी शब्द – कोही, वेषु

खड़ी बोली का शब्द – क्रोधी, वेष

मेरी भाषा में शब्द – गुस्सैल, भेस

 

लोक में भाषा

मन राम राजा बात सिरु (सिर)

नीचे कोष्ठक में कविता से कुछ शब्द चुनकर दिए गए हैं। उन शब्दों से संबंधित लोकोक्ति और उनका अर्थ लिखकर स्वतंत्र वाक्यों में प्रयोग कीजिए। आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है।

मन, राम, राजा, बात, सिर

उदाहरण-

शब्द

लोकोक्ति

अर्थ

वाक्य प्रयोग

मन

मन के जीते जीत है, मन के हारे हार।  

आत्मविश्वास

साहस और मनोबल से सफलता निश्चित है।

राम

राम राम जपना, पराया माल अपना।

बाहर से भक्त बनना और मन में छल रखना।

आज के समय में कई लोग ‘राम-राम जपते हैं और पराया माल अपना’ करने की ताक में रहते हैं, ऐसे पाखंडियों से बचना चाहिए।

राजा

अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा।

जहाँ का मुखिया मूर्ख हो, वहाँ अन्याय और अव्यवस्था होती है।

उस कंपनी में न कोई नियम है न अनुशासन, वहाँ तो ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ वाली स्थिति है।

बात

बात का धनी होना।

अपनी कही हुई बात या वादे को पूरा करना।

श्याम भले ही गरीब है, पर वह अपनी ‘बात का धनी’ है; उसने जो वादा किया उसे निभाकर दिखाया।

सिर

सिर ओखली में दिया, तो मूसलों से क्या डरना।

जब कठिन काम हाथ में ले ही लिया, तो बाधाओं से घबराना क्या।

पर्वतारोहण का संकल्प लेने के बाद राहुल ने सोचा कि जब ‘सिर ओखली में दे ही दिया, तो मूसलों से क्या डरना’।

 

 

गद्य-रूप

नीचे लिखी चौपाई को पढ़िए-

“नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥

आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥”

इस चौपाई को हम गद्य-रूप में भी लिख सकते हैं। इसमें राम परशुराम से विनम्रतापूर्वक कहते हैं.हे नाथ! शिव-धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा आपकी क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? राम की यह बात सुनकर क्रोधित परशुराम कहते हैं।

अब आप नीचे दी गई चौपाई को गद्य-रूप में लिखिए-

“अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥

सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥”

मुनि परशुराम के भीषण क्रोध को देखकर राजा जनक अत्यधिक डर गए और उनके मुँह से कोई उत्तर नहीं निकल रहा था। जनक की इस विवशता को देखकर सभा में उपस्थित दुष्ट राजा मन ही मन बहुत प्रसन्न हो रहे थे। उस समय देवता, मुनि, नाग और नगर के सभी स्त्री-पुरुष बहुत चिंतित थे और उन सबके हृदय में अनिष्ट की आशंका का भारी भय समाया हुआ था।

गतिविधियाँ

  1. यह कविता संवाद का सुंदर उदाहरण है। तालिका में दिए गए कथनों को पढ़कर बताइए कि कौन-सा कथन किसका हो सकता है। अपनी समझ से सही () का चिह्न लगाइए—

कथन

राम

लक्ष्मण

परशुराम

जनक

सीता की माता

(सुनयना)

शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास ही हो सकता है।

    

विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी।

    

सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे।

  

  

इस कारण ये सब राजा आए हैं।

   

 

बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली हैं।

 

   

क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते?

    

कहो जनक, किस कारण यह भीड़ है?

  

  

इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों!

 

   

 

  1. रामचरितमानस के इस प्रसंग का मंचन लोकनाट्य, रामलीला और कठपुतली कला में बड़ी जीवंतता से किया जा सकता है। कलात्मक तकनीकों (ध्वनि, भाव, संगीत, वेशभूषा) का उपयोग करते हुए कविता को एक दृश्य नाटक के रूप में प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर – छात्र स्वयं करें।

  1. ‘कठिन परिस्थितियों में भी सत्य कहने का साहस करना आवश्यक है।’ इस विषय पर कक्षा में एक परिचर्चा अथवा वाद-विवाद गतिविधि के माध्यम से अपने विचार साझा कीजिए।

उत्तर – छात्र स्वयं करें।

 

भाषा से संवाद

व्याकरण की बात

मुहावरे

“मगर किसी के आगे जाकर हाथ नहीं पसारना है।”

उपर्युक्त वाक्य में रेखांकित अंश मुहावरा है। हाथ पसारना या फैलाना का अर्थ है— कुछ माँगना या याचना करना। हाथों से जुड़े अनेक मुहावरे आपने पढ़े और सुने होंगे। ऐसे ही कुछ मुहावरे नीचे दिए गए हैं। इनका प्रयोग करते हुए वाक्य बनाइए

  1. हाथ में आना

अर्थ – अधिकार में आना या किसी चीज़ का प्राप्त होना।

वाक्य – बरसों की कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार पुश्तैनी ज़मीन का मालिकाना हक झूरी के हाथ में आ गया।

  1. हाथ का मैल होना

अर्थ – धन-दौलत को तुच्छ समझना या पैसा बहुत छोटी चीज़ होना।

वाक्य – लता जी के लिए पैसा कभी प्राथमिकता नहीं थी, वे मानती थीं कि दौलत तो हाथ का मैल है, असली चीज़ तो कलाकार की साधना है।

  1. हाथ से हाथ मिलाना

अर्थ – मिल-जुलकर काम करना या सहयोग करना।

वाक्य – यदि देश के सभी नागरिक हाथ से हाथ मिलाकर चलें, तो समाज-सुधार का कार्य बहुत आसान हो जाएगा।

  1. हाथ साफ करना

अर्थ – चोरी करना या बड़ी चतुराई से कुछ ले उड़ना।

वाक्य – मेले की भीड़भाड़ का फायदा उठाकर चोर ने एक यात्री के पर्स पर हाथ साफ कर दिया।

  1. हाथ से निकल जाना

अर्थ – अवसर खो देना या नियंत्रण से बाहर हो जाना।

वाक्य – हीरा और मोती को पकड़ने का अच्छा मौका था, लेकिन जैसे ही वे भागे, वे गया के हाथ से निकल गए।

  1. हाथ धो बैठना

अर्थ – किसी प्रिय वस्तु या व्यक्ति को हमेशा के लिए खो देना।

वाक्य – काँजीहौस में बंद जानवरों को डर था कि यदि वे जल्द ही वहाँ से नहीं भागे, तो अपनी जान से हाथ धो बैठेंगे।

 

 

हमारी भाषाएँ

  1. गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन। मतलब गाँव तो बह जाता है, लेकिन जो नाम है, वह रह जाता है।” आपने एक कहावत और उसका हिंदी में अर्थ पढ़ा। इस कहावत के अर्थ को अपने घर या क्षेत्र की भाषा अथवा भाषाओं में लिखिए।

उत्तर – लता जी द्वारा प्रयुक्त इस कहावत का अर्थ है कि भौतिक शरीर या स्थान नष्ट हो सकता है, परंतु व्यक्ति का यश और कर्म सदैव जीवित रहते हैं।

ब्रजभाषा (उत्तर प्रदेश) – “गाँव बह गयौ, पै नाम रह गयौ।”

भोजपुरी (बिहार/पूर्वांचल) – “गाँव बह गइल, बाकिर नाम रह गइल।”

मैथिली – “गाम बह गेल, मुदा नाम रहि गेल।”

तर्क – इन सभी भाषाओं में शब्द भले ही थोड़े बदल गए हों, लेकिन “नाम” (यश) की अमरता का भाव बिल्कुल वही है जो मूल मराठी कहावत में था।

  1. लता जी ने मराठी कहावत को हिंदी में समझाया। अब आप अपनी मातृभाषा की कोई कहावत चुनिए और उसका हिंदी में अनुवाद कीजिए। अनुवाद के बाद भाव में क्या परिवर्तन आया? लिखिए।

उत्तर – भोजपुरी की एक बहुत प्रसिद्ध कहावत “अधजल गगरी छलकत जाय।”

हिंदी अनुवाद – “आधी भरी हुई गगरी (घड़ा) चलते समय ज्यादा छलकती है।”

भावार्थ – जिस व्यक्ति के पास ज्ञान कम होता है, वह उसका प्रदर्शन या दिखावा अधिक करता है।

अनुवाद के बाद भाव में परिवर्तन –

जब हम इसका अनुवाद हिंदी में करते हैं, तो अर्थ तो स्पष्ट हो जाता है, लेकिन जो ‘ठेठपन’ और ‘लय’ भोजपुरी शब्दों जैसे ‘गगरी’ और ‘छलकत’ में है, वह मानक हिंदी में थोड़ी कम हो जाती है। मातृभाषा में यह कहावत अधिक चुटीली और प्रभावशाली लगती है, जबकि हिंदी अनुवाद इसे अधिक गंभीर और औपचारिक बना देता है।

  1. एक सेतु चित्रबनाइए जिसमें दो किनारे हों— एक किनारे पर हिंदी और दूसरे किनारे पर अपने घर या क्षेत्र की भाषा। दोनों किनारों के बीच में ऐसे शब्द लिखिए जो दोनों भाषाओं में समान अर्थ रखते हैं।

उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर करें।

 

गतिविधियाँ

  1. ‘नाम रह जाएगा’ वाक्य के लिए एक सुंदर पोस्टर बनाइए। इसके ऊपर ‘ नाम रह जाता है…’ लिखिए और नीचे विभिन्न भारतीय भाषाओं में ‘नाम’ शब्द (जैसे- नाव, नालो, नांउ, नाउँ, मिङ्, पेरु, नामम् आदि) लिखिए। साथ ही कक्षा में सब विद्यार्थी मिलकर एक प्रतिज्ञा लें- ‘हम हर भाषा का सम्मान करेंगे।”

उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर करें।

  1. कागज पर एक पेड़ का चित्र बनाइए। इसे नाम दीजिए— भाषा – वृक्ष। इसकी जड़ में लिखिए- ‘भारतीय संस्कृति’; तने पर और शाखाओं पर लिखिए- हिंदी, मराठी, तमिल, बांग्ला, गुजराती आदि। हर शाखा पर उस भाषा का एक प्यारा शब्द जोड़िए।

उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर करें।

  1. समूह में मिलकर किसी विषय पर एक छोटा समाचार बुलेटिन तैयार कीजिए जिसमें हिंदी, अंग्रेजी और किसी क्षेत्रीय भाषा का प्रयोग हो। उदाहरण के लिए, एक विषय हो सकता है —- ‘कला जो जोड़ती है, बाँटती नहीं। ‘

उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर करें।

  1. भाषाई स्मृति पोटली

अपने परिवार में प्रयुक्त अलग-अलग भाषाओं के पाँच शब्द एकत्र कीजिए (जैसे- दादी मराठी बोलती हों, माँ हिंदी)। उन्हें एक ‘शब्द पोटली’ में कार्ड पर सजाइए।

उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर करें।

  1. स्वर – कोलाज

लता जी के जीवन के प्रेरक वाक्यों और गीतों का चित्रमय कोलाज बनाइए।

उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर करें।

  1. समय-रेखा

लता जी के जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ कालानुक्रम में दर्शाइए।

उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर करें।

 

मेरी पहेली

पाठ में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। अब अपने समूह में मिलकर ऐसी पहेलियाँ बनाइए जिनके उत्तर निम्नलिखित हों—

समाचार धनुष मन नाग नगर

उत्तर – छात्र स्वयं करें।

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