भवानीप्रसाद मिश्र
भवानीप्रसाद मिश्र का जन्म सन् 1913 में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) में हुआ था। साहित्य के साथ-साथ स्वाधीनता आंदोलन में जिन कवियों की सक्रिय भागीदारी थी, उनमें ये प्रमुख हैं। उनकी मुख्य रचनाएँ- अँधेरी गीत-फ़रोश, खुशबू के शिलालेख, चकित है दुख, कविताएँ, बुनी हुई रस्सी, कवितांतर, शतदल, गांधी- पंचशती, त्रिकाल संध्या आदि हैं। बुनी हुई रस्सी (कविता संग्रह) पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है।
भवानीप्रसाद मिश्र ने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति में कार्य किया और सन् 1952–55 तक हैदराबाद से प्रकाशित हिंदी की लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका कल्पना का संपादन भी किया। सन् 1955-58 के बीच वे आकाशवाणी के हिंदी कार्यक्रमों से संबद्ध रहे। उन्होंने संपूर्ण गांधी वाङ्मय का भी संपादन किया। सन् 1985 में उनका निधन हो गया।
घर की याद – पाठ परिचय
भवानीप्रसाद मिश्र ने सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में सक्रिय रूप से भाग लिया जिसके चलते ब्रिटिश सरकार ने उन्हें तीन वर्ष के लिए कारावास का दंड दिया। 1942 के स्वाधीनता आंदोलन के समय जेल में रहते हुए ही उन्होंने ‘घर की याद’ कविता लिखी। परिवार की स्मृति ही इस कविता की केंद्रीय संवेदना है। कारावास के समय घर को याद करते हुए कवि की स्मृति में उनके परिजन एक-एक करके सम्मिलित होते चले जाते हैं। कवि सावन के बादल द्वारा परिवार को संदेश भेज रहा है और उससे आग्रह करता है कि वह उन्हें जेल के कष्टों के विषय में न बताए और सांत्वना दे।
घर की याद
आज पानी गिर रहा है,
बहुत पानी गिर रहा है,
रात-भर गिरता रहा है,
प्राण मन घिरता रहा है,
अब सबेरा हो गया है,
कब सबेरा हो गया है,
ठीक से मैंने न जाना,
बहुत सोकर सिर्फ माना-
क्योंकि बादल की अँधेरी,
है अभी तक भी घनेरी,
अभी तक चुपचाप है सब,
रातवाली छाप है सब,
गिर रहा पानी झरा – झर,
हिल रहे पत्ते हरा-हर,
बह रही है हवा सर-सर,
काँपते हैं प्राण थर-थर,
बहुत पानी गिर रहा है,
घर नजर में तिर रहा है,
घर कि मुझसे दूर है जो,
घर खुशी का पूर है जो,
घर कि घर में चार भाई,
मायके में बहिन आई,
बहिन आई बाप के घर,
हाय रे परिताप के घर!
आज का दिन दिन नहीं है,
क्योंकि इसका छिन नहीं है,
एक छिन सौ बरस है रे.
हाय कैसा तरस है रे,
घर कि घर में सब जुड़े हैं,
सब कि इतने कब जुड़े हैं,
चार भाई चार चार बहिनें
भुजा भाई प्यार बहिनें,
और माँ बिन- पढ़ी मेरी,
दुख में वह गढ़ी मेरी,
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुख नहीं फिर,
माँ कि जिसकी स्नेह-धारा
का यहाँ तक भी पसारा,
उसे लिखना नहीं आता,
जो कि उसका पत्र पाता।
और पानी गिर रहा है,
घर चतुर्दिक् घिर रहा है,
पिताजी भोले बहादुर,
वज्र-भुज नवनीत-सा उर,
पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी भी दौड़ जाएँ. जो
अभी भी खिलखिलाएँ,
मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें,
बोल में बादल गरजता,
काम में झंझा लरजता,
आज गीता-पाठ करके,
दंड दो सौ साठ करके,
खूब मुगदर हिला लेकर,
मूठ उनकी मिला लेकर,
जब कि नीचे आए होंगे,
नैन जल से छाए होंगे,
हाय, पानी गिर रहा है,
घर नजर में तिर रहा है,
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
खेलते या खड़े होंगे.
नजर उनको पड़े होंगे।
पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
रो पड़े होंगे बराबर,
पाँचवें का नाम लेकर,
पाँचवाँ मैं मैं हूँ अभागा,
जिसे सोने पर सुहागा,
पिताजी कहते रहे हैं,
प्यार में बहते रहे हैं,
आज उनके स्वर्ण बेटे,
लगे होंगे उन्हें हेटे,
क्योंकि मैं उन पर सुहागा
बँधा बैठा हूँ अभागा,
और माँ ने कहा होगा,
दुख कितना बहा होगा
आँख में किसलिए पानी,
वहाँ अच्छा है भवानी,
वह तुम्हारा मन समझकर,
और अपनापन समझकर,
गया है सो ठीक ही है
यह तुम्हारी लीक ही है,
पाँव जो पीछे हटाता,
कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेंगे और बच्चे,
पिताजी ने कहा होगा,
हाय, कितना सहा होगा,
कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ,
धीर मैं खोता, कहाँ हूँ,
गिर रहा है आज पानी,
याद आता है भवानी,
उसे थी बरसात प्यारी,
रात दिन की झड़ी झारी,
खुले सिर नंगे बदन वह,
घूमता फिरता मगन वह,
बड़े बाड़े में कि जाता,
बीज लौकी का लगाता,
तुझे बतलाता कि बेला
ने फलानी फूल झेला,
तू कि उसके साथ जाती,
आज इससे याद आती,
मैं न रोऊँगा कहा होगा,
और फिर पानी बहा होगा,
दृश्य उसके बाद का रे,
पाँचवें की याद का रे,
भाई पागल, बहिन पागल,
और अम्मा ठीक बादल,
और भौजी और सरला,
सहज पानी सहज तरला,
शर्म से रो भी न पाएँ,
खूब भीतर छटपटाएँ,
आज ऐसा कुछ हुआ होगा
आज सबका मन चुआ होगा।
अभी पानी थम गया है,
मन निहायत नम गया है,
एक-से बादल जमे हैं,
गगन-भर फैले रमे हैं,
ढेर है उनका, न फाँकें,
जो कि किरनें झकें-झाँकें,
लग रहे हैं वे मुझे यों,
माँ कि आँगन लीप दे ज्यों;
गगन-आँगन की लुनाई
दिशा के मन में समाई
दश दिशा चुपचाप है रे,
स्वस्थ की लय छाप है
झाड़ आँखें बंद करके
साँस सुस्थिर मंद करके,
हिले बिन चुपके खड़े हैं,
क्षितिज पर जैसे जड़े हैं
एक पंछी बोलता है,
घाव उर के खोलता है,
आदमी के उर बिचारे,
किसलिए इतनी तृषा रे,
तू जरा-सा दुख कितना,
सह सकेगा क्या कि इतना,
और इस पर बस नहीं है,
बस बिना कुछ रस नहीं है,
हवा आई उड़ चला तू,
लहर आई मुड़ चला तू,
लगा झटका टूट बैठा,
गिरा नीचे फूट बैठा,
तू कि प्रिय से दूर होकर,
बह चला रे पूर होकर,
दुख भर क्या पास तेरे,
अश्रु सिंचित हास तेरे!
पिताजी का वेश मुझको,
दे रहा है क्लेश मुझको,
देह एक पहाड़ जैसे,
मन कि बड़ का झाड़ जैसे,
एक पत्ता टूट जाए,
बस कि धारा फूट जाए,
एक हल्की चोट लग ले,
दूध की नदी उमग ले,
एक टहनी कम न हो ले,
कम कहाँ कि ख़म न हो ले,
ध्यान कितना फिक्र कितनी,
डाल जितनी जड़ें उतनी!
इस तरह का हाल उनका,
इस तरह का ख्याल उनका,
हवा, उनको धीर देना,
यह नहीं जी चीर देना,
सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें,
मैं मजे में हूँ सही है,
घर नहीं हूँ बस यही है,
किंतु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से सब विरस है,
किंतु उनसे यह न कहना,
उन्हें देते धीर रहना,
उन्हें कहना लिख रहा
उन्हें कहना पढ़ रहा हूँ,
काम करता हूँ कि कहना,
नाम करता कि कहना,
चाहते हैं लोग, कहना
मत करो कुछ शोक, कहना,
और कहना मस्त हूँ मैं,
कातने में व्यस्त हूँ मैं,
वजन सत्तर सेर मेरा,
और भोजन ढेर मेरा,
कूदता हूँ, खेलता हूँ,
दुख डटकर ठेलता हूँ
और कहना मस्त हूँ मैं,
यों न कहना अस्त हूँ मैं,
हाय रे, ऐसा न कहना,
है कि जो वैसा न कहना,
कह न देना जागता हूँ
आदमी से भागता हूँ
कह न देना मौन हूँ मैं,
खुद न समझूँ कौन हूँ मैं,
देखना कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक न देना,
हे सजीले हरे सावन,
हरे हे कि मेरे पुण्य
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें।
‘घर की याद’ कविता की पृष्ठभूमि
‘घर की याद’ कविता की पृष्ठभूमि अत्यंत गौरवपूर्ण और भावुक है। इसे समझने के लिए हमें उस समय के इतिहास और कवि की व्यक्तिगत स्थिति को देखना होगा –
- ऐतिहासिक कालखंड – भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
यह कविता सन् 1942 में लिखी गई थी, जब महात्मा गांधी के आह्वान पर पूरे देश में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (Quit India Movement) चल रहा था। भवानी प्रसाद मिश्र जी एक गांधीवादी कवि थे और उन्होंने इस स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लिया था।
- जेल प्रवास (कारावास)
आंदोलन में भागीदारी के कारण कवि को ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें तीन साल के लिए जेल भेज दिया गया। यह कविता उन्होंने जेल की कोठरी में ही लिखी थी। जेल के अकेलेपन और सलाखों के पीछे रहने की मजबूरी ने इस कविता को जन्म दिया।
- प्रकृति का उद्दीपन – सावन की वर्षा
कविता की तात्कालिक पृष्ठभूमि सावन का महीना और बरसता हुआ पानी है। जेल में रात भर हो रही मूसलाधार बारिश ने कवि के मन में ‘उद्दीपन’ का काम किया। बारिश की बूँदों ने उनकी स्मृतियों को जगा दिया, जिससे उन्हें अपने घर, आँगन, भाई-बहनों और माता-पिता की याद आने लगी।
- पारिवारिक परिवेश
कवि एक अत्यंत प्रेमपूर्ण और संयुक्त परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता के आदर्श और माता की ममता ही उनके व्यक्तित्व का आधार थे। जेल में रहते हुए उन्हें इस बात का गहरा दुख था कि उनके वहाँ होने की वजह से उनके घर में उदासी छाई होगी।
संक्षेप में कहें तो, इस कविता की पृष्ठभूमि देशभक्ति और पारिवारिक मोह का संगम है। एक तरफ कवि को देश के लिए जेल जाने का गर्व है, तो दूसरी तरफ एक बेटे के रूप में उन्हें अपने माता-पिता के दुख का एहसास कचोट रहा है। वह सावन को दूत बनाकर घर संदेश भेजना चाहते हैं ताकि उनका परिवार यह सोचकर परेशान न हो कि उनका बेटा जेल में दुखी है।
घर की याद – विस्तृत व्याख्या
- प्रथम
आज पानी गिर रहा है,
बहुत पानी गिर रहा है,
रात-भर गिरता रहा है,
प्राण मन घिरता रहा है,
अब सबेरा हो गया है,
कब सबेरा हो गया है,
ठीक से मैंने न जाना,
व्याख्या – कवि जेल में हैं और बाहर मूसलाधार बारिश हो रही है। इस बारिश को देखकर कवि को अपने घर की याद आने लगती है। रात भर पानी बरसता रहा और जैसे-जैसे पानी गिर रहा था, कवि का मन अपने परिवार की यादों से घिरता जा रहा था। कवि कहते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब सुबह हो गई, क्योंकि बादलों के अँधेरे के कारण जेल की कोठरी में अभी भी रात जैसा ही सन्नाटा और अँधेरा व्याप्त है। अपने मन को तसल्ली देने के लिए ही वह कहते हैं कि
शब्दार्थ –
प्राण मन घिरना – मन में यादों का छा जाना (Mind filled with memories)
घनेरी – बहुत गहरी या घनी (Dense/Deep)
- द्वितीय
बहुत सोकर सिर्फ माना-
क्योंकि बादल की अँधेरी,
है अभी तक भी घनेरी,
अभी तक चुपचाप है सब,
रातवाली छाप है सब,
गिर रहा पानी झरा-झर,
हिल रहे पत्ते हरा-हर,
बह रही है हवा सर-सर,
काँपते हैं प्राण थर-थर,
व्याख्या – कवि कहते हैं कि जेल की कोठरी में बाहर के समय का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है। उन्होंने बहुत देर तक सोकर बस यह मान लिया कि अब सवेरा हो गया होगा, क्योंकि बादलों का अँधेरा अभी भी इतना घना है कि दिन और रात का अंतर पता ही नहीं चल रहा। चारों ओर एक अजीब-सी शांति है और ऐसा लग रहा है मानो अभी भी रात का ही प्रभाव बाकी है। बाहर प्रकृति अपने पूरे वेग में है। पानी ‘झरा-झर’ बरस रहा है, हवा के वेग से पत्ते ‘हरा-हर’ की आवाज़ करते हुए हिल रहे हैं और हवा ‘सर-सर’ बह रही है। जहाँ बाहर यह शोर है, वहीं कवि के भीतर एक सिहरन है; घर की याद और अकेलेपन के कारण उनके प्राण ‘थर-थर’ काँप रहे हैं। यहाँ प्रकृति की आवाज़ें कवि की आंतरिक बेचैनी को और गहरा बना रही हैं।
शब्दार्थ –
झरा-झर – लगातार गिरना (Continuous flow)
सर-सर – हवा की आवाज (Whizzing sound of wind)
थर-थर – काँपना (Shivering/Trembling)
- तृतीय
बहुत पानी गिर रहा है,
घर नजर में तिर रहा है,
घर कि मुझसे दूर है जो,
घर खुशी का पूर है जो,
घर कि घर में चार भाई,
मायके में बहिन आई,
बहिन आई बाप के घर,
हाय रे परिताप के घर!
व्याख्या – कवि कहते हैं कि बाहर बहुत तेज़ बारिश हो रही है और जैसे-जैसे पानी गिर रहा है, उनकी आँखों के सामने उनके घर की यादें तैर रही हैं। उन्हें अपने उस घर की याद आ रही है जो फिलहाल उनसे बहुत दूर है। यह वह घर है जो कभी खुशियों का भंडार हुआ करता था, जहाँ कभी कोई दुख नहीं था। कवि को याद आता है कि उनके घर में चार भाई हैं। आज सावन के इस महीने में उनकी बहनें भी मायके आई होंगी। एक बहन के लिए पिता का घर खुशियों का ठिकाना होता है, लेकिन कवि दुखी होकर कहते हैं कि आज वह बहन खुशियाँ मनाने अपने पिता के घर आई तो होगी, पर मेरे अर्थात् पाँचवें भाई के जेल में होने के कारण उसे वह घर ‘परिताप’ अर्थात् अत्यधिक कष्ट का घर लगा होगा। वह घर जो खुशियों से भरा होना चाहिए था, आज कवि की अनुपस्थिति के कारण शोक और दुख का केंद्र बन गया है।
शब्दार्थ –
तिर रहा है – आँखों के सामने तैरना (Floating before eyes)
पूर – भरा हुआ/पूर्ण (Full of)
परिताप – बहुत बड़ा दुख या कष्ट (Extreme grief/suffering)
- चतुर्थ
आज का दिन दिन नहीं है,
क्योंकि इसका छिन नहीं है,
एक छिन सौ बरस है रे,
हाय कैसा तरस है रे,
घर कि घर में सब जुड़े हैं,
सब कि इतने कब जुड़े हैं,
चार भाई चार चार बहिनें
भुजा भाई प्यार बहिनें,
व्याख्या – कवि कहते हैं कि जेल में अकेलेपन के कारण उनके लिए आज का दिन, दिन जैसा महसूस नहीं हो रहा है। सामान्य दिनों में समय का पता नहीं चलता, लेकिन आज समय का एक क्षण भी बीतता हुआ नहीं लग रहा। उनके लिए एक छोटा-सा क्षण भी सौ साल के बराबर भारी और लंबा हो गया है। वे इस स्थिति पर अपना दुख और तरस व्यक्त करते हैं कि विवशता के कारण वे अपने परिवार से दूर हैं। आगे वे अपने घर की याद करते हुए कहते हैं कि उनका परिवार एक अटूट बंधन में बँधा हुआ है। घर के सभी सदस्य आपस में बहुत गहरे जुड़े हुए हैं। वे याद करते हैं कि उनके चार भाई और चार बहनें हैं। यहाँ कवि ने बहुत ही मार्मिक उपमा दी है – “भुजा भाई प्यार बहिनें”। भाई भुजाओं के समान हैं जो शक्ति, सहारा और रक्षा का प्रतीक हैं, और बहनें स्नेह और निस्वार्थ प्रेम का आधार हैं। यह पूरा परिवार एक शरीर की तरह है जहाँ शक्ति और प्रेम का संतुलन है।
शब्दार्थ –
छिन – क्षण (Moment)
भुजा – हाथ/सहारा (Arms/Support)
- पंचम
और माँ बिन- पढ़ी मेरी,
दुख में वह गढ़ी मेरी,
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुख नहीं फिर,
माँ कि जिसकी स्नेह-धारा
का यहाँ तक भी पसारा,
उसे लिखना नहीं आता,
जो कि उसका पत्र पाता।
व्याख्या – कवि अपनी माँ को याद करते हुए कहते हैं कि उनकी माँ अनपढ़ हैं। उन्होंने अपने जीवन में बहुत संघर्ष किए हैं और ऐसा लगता है मानो उनका पूरा व्यक्तित्व ही दुखों को सहने से बना है। माँ की ममता का वर्णन करते हुए कवि कहते हैं कि उनकी गोद एक ऐसा सुरक्षित और ममतामयी ठिकाना है जहाँ सिर रख लेने के बाद इंसान को दुनिया का कोई दुख महसूस नहीं होता; सारी चिंताएँ मिट जाती हैं। कवि आगे कहते हैं कि माँ के प्यार की स्नेह-धारा इतनी व्यापक है कि उसका फैलाव जेल की ऊँची दीवारों को पार करके यहाँ तक पहुँच रहा है। कवि को जेल में भी माँ की कमी महसूस नहीं हो रही क्योंकि उनका प्रेम उनके साथ है। बस एक ही मलाल है कि माँ को लिखना नहीं आता, वरना वे कवि को पत्र ज़रूर लिखतीं और कवि अपनी माँ का पत्र पाकर अपनी मातृ विरहाग्नि को शांत कर पाते।
शब्दार्थ –
गढ़ी – डूबी हुई या निर्मित (Endured/Engrossed)
पसारा – फैलाव (Spread/Reach)
- षष्ठ
और पानी गिर रहा है,
घर चतुर्दिक् घिर रहा है,
पिताजी भोले बहादुर,
वज्र-भुज नवनीत-सा उर,
पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी भी दौड़ जाएँ. जो
अभी भी खिलखिलाएँ,
मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें,
बोल में बादल गरजता,
काम में झंझा लरजता,
आज गीता-पाठ करके,
दंड दो सौ साठ करके,
खूब मुगदर हिला लेकर,
मूठ उनकी मिला लेकर,
जब कि नीचे आए होंगे,
नैन जल से छाए होंगे,
व्याख्या – कवि कहते हैं कि बाहर लगातार बारिश हो रही है और यादों में उनका घर चारों ओर से उन्हें घेरे हुए है। वे अपने पिताजी को याद करते हैं जो स्वभाव से भोले हैं लेकिन बहुत बहादुर हैं। उनकी भुजाएँ लोहे जैसी मजबूत हैं, परंतु उनका हृदय मक्खन जैसा कोमल और संवेदनशील है।
कवि कहते हैं कि उनके पिताजी पर बुढ़ापे का कोई असर नहीं दिखता। वे आज भी युवाओं की तरह दौड़ सकते हैं और बच्चों की तरह खिलखिलाकर हँस सकते हैं। वे इतने साहसी हैं कि मौत या शेर के सामने भी नहीं डरते। जब वे बोलते हैं, तो उनकी आवाज़ में बादलों जैसी गर्जना होती है और जब वे काम करते हैं, तो उनकी गति तूफान की तरह तेज़ होती है।
कवि कल्पना करते हैं कि आज भी रोज़ की तरह पिताजी ने सुबह गीता का पाठ किया होगा, 260 दंड लगाए होंगे और मुगदर घुमाया होगा। लेकिन व्यायाम करने के बाद जब वे छत से नीचे आए होंगे, तो अपने बाकी बच्चों के बीच पाँचवें बेटे अर्थात् मुझे न पाकर उनकी आँखें आँसुओं से भर गई होंगी।
शब्दार्थ –
चतुर्दिक् – चारों ओर (In all four directions)
नवनीत – मक्खन (Butter/Soft)
झंझा – तूफान (Storm/Hurricane)
- सप्तम
हाय, पानी गिर रहा है,
घर नजर में तिर रहा है,
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
खेलते या खड़े होंगे,
नजर उनको पड़े होंगे।
पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
रो पड़े होंगे बराबर,
पाँचवें का नाम लेकर,
पाँचवाँ मैं मैं हूँ अभागा,
जिसे सोने पर सुहागा,
पिताजी कहते रहे हैं,
प्यार में बहते रहे हैं,
आज उनके स्वर्ण बेटे,
लगे होंगे उन्हें हेटे,
क्योंकि मैं उन पर सुहागा
बँधा बैठा हूँ अभागा,
व्याख्या – कवि कहते हैं कि बाहर गिरते पानी के साथ उनके घर की यादें आँखों के सामने तैर रही हैं। वे कल्पना करते हैं कि उनके चार भाई और चार बहनें घर के आँगन में या तो खेल रहे होंगे या फिर आपस में बातें करते हुए खड़े होंगे। भाई जो सहारा हैं और बहनें जो प्रेम का स्वरूप हैं, वे सब वहाँ साथ होंगे। जब पिताजी की नज़र उन सब पर पड़ी होगी, तो उन्होंने गिना होगा कि एक बच्चा कम है।
कवि कहते हैं कि उनके पिताजी इतने ऊर्जावान हैं कि उन्हें बुढ़ापा छू तक नहीं पाया, लेकिन आज अपने पाँचवें बेटे का नाम लेते ही उनका धैर्य जवाब दे गया होगा और वे फूट-फूटकर रो पड़े होंगे।
कवि स्वयं को ‘अभागा’ कहते हैं। वे याद करते हैं कि पिताजी उन्हें हमेशा ‘सोने पर सुहागा’ कहते थे यानी बाकी बेटों से भी प्रिय और श्रेष्ठ। आज जब पिताजी ने अपने बाकी सोने जैसे बेटों को देखा होगा, तो वे बेटे उन्हें ‘हेटे’ अर्थात् तुच्छ या कमतर लगे होंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि उनका सबसे लाड़ला बेटा, जिसे वे ‘सुहागा’ मानकर गर्व करते थे, आज जेल में बँधा बैठा है और उनके पास नहीं है।
शब्दार्थ –
मुगदर – व्यायाम करने का भारी डंडा (Indian club for exercise)
नैन – आँखें (Eyes)
- अष्टम
और माँ ने कहा होगा,
दुख कितना बहा होगा
आँख में किसलिए पानी,
वहाँ अच्छा है भवानी,
वह तुम्हारा मन समझकर,
और अपनापन समझकर,
गया है सो ठीक ही है
यह तुम्हारी लीक ही है,
पाँव जो पीछे हटाता,
कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेंगे और बच्चे,
पिताजी ने कहा होगा,
हाय, कितना सहा होगा,
कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ,
धीर मैं खोता, कहाँ हूँ,
व्याख्या – कवि कहते हैं कि जब पिताजी रो रहे होंगे, तब माँ ने उन्हें ढाँढस बँधाया होगा। ऐसा कहते समय माँ के हृदय से भी दुख के आँसू बह रहे होंगे। माँ ने पिताजी से कहा होगा कि अपनी आँखों में आँसू मत लाइए, भवानी जेल में अच्छी तरह होगा। वह वहाँ इसलिए गया है क्योंकि वह आपके ‘मन’ और ‘आदर्शों’ को समझता है और देश के प्रति अपने कर्तव्य को समझता है।
माँ आगे कहती हैं कि उसका जेल जाना बिल्कुल ठीक है, क्योंकि यह आपके ही परिवार की परंपरा रही है। यदि वह आज देश सेवा के मार्ग से पाँव पीछे हटा लेता, तो वह मेरी कोख को लज्जित करता। माँ पिताजी को समझाती हैं कि आप इस तरह कमजोर मत बनिए, क्योंकि अगर आप रोएँगे तो आपको देखकर घर के बाकी बच्चे भी रोने लगेंगे।
कवि कल्पना करते हैं कि माँ की बात सुनकर पिताजी ने अपनी पीड़ा छिपाते हुए कहा होगा— “कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ?” उन्होंने अपना दुख पीते हुए यह दिखाने की कोशिश की होगी कि वे धैर्य नहीं खो रहे हैं। कवि को अहसास है कि यह कहने में उनके पिताजी ने कितना कष्ट सहा होगा।
शब्दार्थ –
अभागा – जिसका भाग्य खराब हो (Unfortunate)
सोने पर सुहागा – किसी अच्छी चीज़ को और बेहतर बनाना (A gem among gems/Added excellence)
- नवम
गिर रहा है आज पानी,
याद आता है भवानी,
उसे थी बरसात प्यारी,
रात दिन की झड़ी झारी,
खुले सिर नंगे बदन वह,
घूमता फिरता मगन वह,
बड़े बाड़े में कि जाता,
बीज लौकी का लगाता,
तुझे बतलाता कि बेला
ने फलानी फूल झेला,
तू कि उसके साथ जाती,
आज इससे याद आती,
मैं न रोऊँगा कहा होगा,
और फिर पानी बहा होगा,
दृश्य उसके बाद का रे,
पाँचवें की याद का रे,
भाई पागल, बहिन पागल,
और अम्मा ठीक बादल,
और भौजी और सरला,
सहज पानी सहज तरला,
शर्म से रो भी न पाएँ,
खूब भीतर छटपटाएँ,
आज ऐसा कुछ हुआ होगा
आज सबका मन चुआ होगा।
व्याख्या – कवि कल्पना करते हैं कि पिताजी रोते हुए कह रहे होंगे कि आज बाहर पानी गिर रहा है और मुझे मेरा लाड़ला भवानी याद आ रहा है। भवानी को बरसात बहुत प्यारी थी। जब रात-दिन की झड़ी अर्थात् लगातार बारिश होती थी, तब वह खुले सिर और नंगे बदन मगन होकर बारिश में घूमता रहता था। वह घर के बड़े बाड़े में जाकर लौकी के बीज लगाता था और प्रकृति के करीब रहता था।
पिताजी अपनी बेटी को संबोधित करते हुए सोच रहे होंगे कि भवानी तुझे बताता था कि देखो उस बेला पर आज फूल खिल गए हैं। चूँकि तुम उसके साथ बगीचे में खेलती और घूमती थी, इसलिए आज तुम्हें देखकर उसकी और भी याद आ रही है। पिताजी ने अपनी पीड़ा छिपाने के लिए माँ से कहा तो होगा कि “मैं नहीं रोऊँगा”, लेकिन यह कहते-कहते उनकी आँखों से आँसू बहने लगे होंगे।
इसके बाद कवि पूरे घर की स्थिति का वर्णन करते हैं कि भवानी की याद में भाई और बहनें पागलों की तरह व्याकुल हो रहे होंगे। माँ की आँखों से बादलों की तरह लगातार आँसू गिर रहे होंगे। घर की भाभियाँ और सरला कवि की छोटी बहन जो सहज और सरल स्वभाव की हैं, वे भी रो रही होंगी। वे सब बड़ों के सामने शर्म के मारे खुलकर रो भी नहीं पा रहे होंगे, पर उनके भीतर छटपटाहट होगी। कवि कहते हैं कि आज घर के सभी सदस्यों का मन दुख से द्रवित हो गया होगा।
शब्दार्थ –
हेटे – छोटे या तुच्छ (Insignificant/Lesser)
लीक – परंपरा या रास्ता (Tradition/Path)
- दशम
अभी पानी थम गया है,
मन निहायत नम गया है,
एक-से बादल जमे हैं,
गगन-भर फैले रमे हैं,
ढेर है उनका, न फाँकें,
जो कि किरनें झकें-झाँकें,
लग रहे हैं वे मुझे यों,
माँ कि आँगन लीप दे ज्यों;
व्याख्या – कवि कहते हैं कि बाहर जो मूसलाधार वर्षा हो रही थी, वह अब थम गई है। लेकिन बाहर की बारिश रुकने के बावजूद, कवि का मन पूरी तरह से भावुक हो गया है। यानी बाहर की बारिश तो रुक गई, पर उनके भीतर यादों की बारिश जारी है।
आसमान की स्थिति बताते हुए कवि कहते हैं कि अब पूरे आकाश में एक जैसे बादल छाए हुए हैं। वे इस कदर फैले हुए हैं कि उनके बीच कोई ‘फाँक’ अर्थात् खाली जगह नहीं बची है जहाँ से सूरज की किरणें झाँक सकें। यहाँ कवि एक बहुत ही सुंदर और ग्रामीण उपमा देते हैं। वे कहते हैं कि आसमान में फैले ये मटमैले बादल उन्हें बिल्कुल वैसे लग रहे हैं, जैसे माँ ने घर का आँगन को मिट्टी और गोबर से लीप दिया हो।
शब्दार्थ –
कोख लजाना – माँ का नाम बदनाम करना (To shame the mother’s womb)
धीर – धैर्य (Patience/Courage)
- एकादश
गगन-आँगन की लुनाई
दिशा के मन में समाई
दश दिशा चुपचाप है रे,
स्वस्थ की लय छाप है रे,
झाड़ आँखें बंद करके
साँस सुस्थिर मंद करके,
हिले बिन चुपके खड़े हैं,
क्षितिज पर जैसे जड़े हैं
व्याख्या – कवि कहते हैं कि आकाश रूपी आँगन की जो लुनाई अर्थात् सुंदरता है, वह अब दसों दिशाओं के मन में पूरी तरह समा गई है। मूसलाधार बारिश के बाद अब दसों दिशाएँ बिल्कुल चुपचाप और शांत हैं। प्रकृति का यह रूप ऐसा लग रहा है मानो चारों ओर एक स्वस्थ और संतुलित जीवन की लय छा गई हो। प्रकृति अब थकी हुई नहीं, बल्कि विश्राम की स्थिति में ‘स्वस्थ’ महसूस हो रही है।
बाहर के पेड़ों को देखकर कवि को लगता है मानो वे अपनी आँखें बंद करके ध्यान मुद्रा में खड़े हैं। वे अपनी साँस को स्थिर और धीमा करके बिना हिले-डुले बिल्कुल शांत हैं। उनकी स्थिरता ऐसी है मानो वे क्षितिज पर हमेशा के लिए स्थिर कर दिए गए हों। प्रकृति की यह निस्तब्धता कवि के अकेलेपन और स्मृतियों को और अधिक गहरा कर देती है।
- द्वादश
एक पंछी बोलता है,
घाव उर के खोलता है,
आदमी के उर बिचारे,
किसलिए इतनी तृषा रे,
तू जरा-सा दुख कितना,
सह सकेगा क्या कि इतना,
और इस पर बस नहीं है,
बस बिना कुछ रस नहीं है,
हवा आई उड़ चला तू,
लहर आई मुड़ चला तू,
लगा झटका टूट बैठा,
गिरा नीचे फूट बैठा,
तू कि प्रिय से दूर होकर,
बह चला रे पूर होकर,
दुख भर क्या पास तेरे,
अश्रु सिंचित हास तेरे!
व्याख्या – कवि कहते हैं कि चारों ओर छाई निस्तब्धता में अचानक एक पक्षी बोलता है। उस पक्षी की चहचहाहट कवि के हृदय के घावों को फिर से हरा कर देती है, उसे फिर से अपनों की याद दिला देती है। कवि मनुष्य के मन की स्थिति पर विचार करते हुए कहते हैं कि इस बेचारे इंसान के हृदय में इतनी प्यास, इतनी इच्छाएँ क्यों हैं? मनुष्य ज़रा-सा दुख भी सहन नहीं कर पाता, जबकि जीवन तो दुखों का ही नाम है।
कवि कहते हैं कि मनुष्य का अपने मन और परिस्थितियों पर कोई बस नहीं है, और विडंबना यह है कि बिना इस ‘बस’ या नियंत्रण के जीवन में कोई आनंद या ‘रस’ भी नहीं है। मनुष्य का स्वभाव अत्यंत अस्थिर है—जैसे हवा के झोंके के साथ वह उड़ने लगता है और लहर के साथ अपनी दिशा मोड़ लेता है। ज़रा-सा भी मानसिक झटका लगने पर वह टूट कर बैठ जाता है और बिखर जाता है।
अंत में कवि कहते हैं कि अपने प्रियजनों से दूर होकर मनुष्य भावनाओं के सैलाब में बाढ़ की तरह बह निकला है। कवि के पास अब केवल दुख ही शेष है, और यदि उसके चेहरे पर कोई हँसी आती भी है, तो वह आँसुओं से भीगी हुई होती है—अर्थात् उसकी खुशी में भी अपनों से बिछड़ने का गम समाया हुआ है।
- त्रयोदश
पिताजी का वेश मुझको,
दे रहा है क्लेश मुझको,
देह एक पहाड़ जैसे,
मन कि बड़ का झाड़ जैसे,
एक पत्ता टूट जाए,
बस कि धारा फूट जाए,
एक हल्की चोट लग ले,
दूध की नदी उमग ले,
एक टहनी कम न हो ले,
कम कहाँ कि ख़म न हो ले,
ध्यान कितना फिक्र कितनी,
डाल जितनी जड़ें उतनी!
व्याख्या – कवि कहते हैं कि उनके पिताजी का जो स्वरूप है, उसकी याद आज उन्हें जेल में कष्ट दे रही है। पिताजी का शरीर पहाड़ की तरह विशाल और मजबूत है, जिसे देखकर कोई उनकी कोमलता का अंदाज़ा नहीं लगा सकता। लेकिन उनका मन बरगद के पेड़ की तरह है—विशाल, छायादार और जड़ों से मजबूती से जुड़ा हुआ।
कवि आगे एक अद्भुत उपमा देते हैं कि जिस तरह बरगद का एक पत्ता भी टूटने पर उसमें से दूध की धारा फूट पड़ती है, वैसे ही पिताजी बाहर से चाहे जितने सख्त दिखें, परिवार के किसी सदस्य को हल्की-सी चोट लगने पर भी उनके हृदय से ममता की नदी उमड़ पड़ती है। वे अपने बच्चों के प्रति इतने संवेदनशील हैं कि परिवार का एक बच्चा भी अगर कम हो जाए या सिर्फ झुक जाए, तो वे विचलित हो जाते हैं।
कवि कहते हैं कि उनके पिता का अपने परिवार के प्रति ध्यान और चिंता उतनी ही गहरी है, जितनी बरगद के पेड़ की डालियों के अनुपात में उसकी जड़ें होती हैं। यानी ऊपर से दिखने वाले उनके अनुशासन के पीछे उतनी ही गहरी ममता की जड़ें छिपी हैं।
- चतुर्दश
इस तरह का हाल उनका,
इस तरह का ख्याल उनका,
हवा, उनको धीर देना,
यह नहीं जी चीर देना,
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें,
मैं मजे में हूँ सही है,
घर नहीं हूँ बस यही है,
किंतु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से सब विरस है,
व्याख्या – कवि कहते हैं कि मेरे पिता का हाल और परिवार के प्रति उनका ख्याल बहुत गहरा है। वे बादलों से प्रार्थना करते हैं कि हे बादल, तुम मेरे घर जाकर उन्हें धीर देना; उनके पास जाकर ऐसी कोई बात मत करना जिससे उनका जी चीर जाए या उन्हें दुख हो।
कवि सावन को ‘सजीले’ और ‘पुण्य पावन’ कहकर संबोधित करते हैं। वे सावन से एक मार्मिक निवेदन करते हैं कि— “हे सावन! तुम चाहे जितना बरस लो, लेकिन मेरे माता-पिता की आँखों से आँसू न बरसें। वे अपने पाँचवें बेटे की याद में न तड़पें और न तरसें।”
कवि आगे कहते हैं कि तुम उन्हें जाकर कहना कि मैं यहाँ मजे में हूँ, यह सच है। बस एक ही कमी है कि मैं घर पर नहीं हूँ। लेकिन कवि स्वयं से कहते हैं कि यह ‘बस’ कहना तो आसान है, पर वास्तव में यह ‘बस’ बहुत बड़ा है। घर से दूर होने का यह जो वियोग है, यही जीवन के सारे आनंद को विरस बना देता है। अपनों से दूर रहने की विवशता ही सबसे बड़ा दुख है।
- पंचदश
किंतु उनसे यह न कहना,
उन्हें देते धीर रहना,
उन्हें कहना लिख रहा
उन्हें कहना पढ़ रहा हूँ,
काम करता हूँ कि कहना,
नाम करता कि कहना,
चाहते हैं लोग, कहना
मत करो कुछ शोक, कहना,
और कहना मस्त हूँ मैं,
कातने में व्यस्त हूँ मैं,
वजन सत्तर सेर मेरा,
और भोजन ढेर मेरा,
कूदता हूँ, खेलता हूँ,
दुख डटकर ठेलता हूँ
और कहना मस्त हूँ मैं,
यों न कहना अस्त हूँ मैं,
व्याख्या – कवि सावन से कहते हैं कि हे सावन, तुम मेरे घर जाकर उन्हें मेरी उदासी के बारे में कुछ मत कहना। इसके बजाय तुम उन्हें निरंतर धैर्य बँधाते रहना। उन्हें यह विश्वास दिलाना कि मैं जेल में समय बर्बाद नहीं कर रहा, बल्कि वहाँ भी निरंतर लिख रहा हूँ और पढ़ रहा हूँ।
तुम उनसे कहना कि मैं वहाँ बहुत काम करता हूँ और अपने कार्यों से परिवार का नाम रोशन कर रहा हूँ। उन्हें यह भी बताना कि जेल में अन्य लोग मुझे बहुत चाहते हैं और सम्मान देते हैं, इसलिए उन्हें मेरे लिए शोक करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
कवि आगे कहते हैं कि उन्हें बताना कि मैं यहाँ पूरी तरह मस्त हूँ और गांधीजी के आदर्शों पर चलते हुए सूत कातने अर्थात् चरखा चलाने में व्यस्त हूँ। उन्हें यह कहकर आश्वस्त करना कि मेरा वजन लगभग सत्तर किलो हो गया है और मैं ढेर सारा भोजन करता हूँ। मैं वहाँ खूब कूदता-खेलता हूँ और आने वाले हर दुख को डटकर दूर भगा देता हूँ। अंत में कवि फिर दोहराते हैं कि उनसे यही कहना कि मैं ‘मस्त’ हूँ, भूलकर भी यह मत कह देना कि मैं ‘अस्त’ अर्थात निराश या बुझा हुआ हो गया हूँ।
- षोडष
हाय रे, ऐसा न कहना,
है कि जो वैसा न कहना,
कह न देना जागता हूँ
आदमी से भागता हूँ
कह न देना मौन हूँ मैं,
खुद न समझूँ कौन हूँ मैं,
देखना कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक न देना,
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें।
व्याख्या – कवि सावन से प्रार्थना करते हैं कि हे सावन, “हाय रे, ऐसा न कहना”—अर्थात् जो सच है, वह भूलकर भी मत कह देना। जैसी मेरी स्थिति यहाँ जेल में है, वैसी की वैसी मत बता देना।
कवि सावन को हिदायत देते हैं कि उन्हें यह मत बताना कि मैं दुख के कारण रात-भर जागता हूँ या मैं इतना उदास और एकाकी हो गया हूँ कि अब आदमियों से भागता हूँ। यह भी मत कहना कि मैं बिल्कुल मौन हो गया हूँ और मानसिक रूप से इतना टूट चुका हूँ कि मुझे खुद भी समझ नहीं आता कि मैं कौन हूँ।
कवि सावन को आगाह करते हैं कि बहुत सावधानी से बोलना, कहीं गलती से कुछ अनर्गल बात मत देना जिससे उन्हें मुझ पर कोई शक हो जाए कि मैं यहाँ दुखी हूँ। अंत में, कवि फिर से सावन का आह्वान करते हुए कहते हैं— “हे सजीले हरे और पवित्र सावन! तुम चाहे जितना बरस लो, तुम्हारी वर्षा से धरती को जीवन मिले, लेकिन मेरे माता-पिता की आँखों से आँसू न बरसें। वे अपने इस पाँचवें अभागे बेटे के लिए जरा भी न तरसें।”
अभ्यास
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
- भवानीप्रसाद मिश्र ने यह कविता कहाँ और क्यों लिखी?
(क) विदेश से मित्र के लिए
(ख) युद्धभूमि से जनता के लिए
(ग) जेल से परिवार के लिए
(घ) यात्रा से किसी संबंधी के लिए
उत्तर – (ग) जेल से परिवार के लिए
भवानीप्रसाद मिश्र ने यह कविता 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान जेल में रहते हुए लिखी थी। सावन की बारिश उन्हें घर के सदस्यों की याद दिलाती है।
- लगातार बरसता पानी कवि के मन की किस भावना का परिचायक है?
(क) उत्साह और आवेग
(ख) भय और क्रोध
(ग) साहस और उमंग
(घ) चिंता और बेचैनी
उत्तर – (घ) चिंता और बेचैनी
बाहर गिरता पानी कवि के भीतर स्मृतियों का सैलाब लाता है। अपनों से दूर होने का दर्द और घर की याद उनके मन में व्याकुलता और चिंता पैदा करती है।
- कविता में माँ की कैसी छवि उभरती है?
(क) कमजोर और निष्क्रिय
(ख) स्नेहमयी और दृढ़
(ग) शिक्षित और अनुशासनप्रिय
(घ) सरल और उदासीन
उत्तर – (ख) स्नेहमयी और दृढ़
कविता में माँ अनपढ़ और स्नेहमयी हैं, साथ ही वे दृढ़ भी हैं क्योंकि वे पिता को ढाँढस बँधाती हैं और बेटे के जेल जाने को गर्व की बात मानती हैं।
- “वज्र-भुज नवनीत-सा उर” पंक्ति के माध्यम से पिता के व्यक्तित्व की कैसी छवि प्रस्तुत की गई है?
(क) कर्मठ और सृजनशील
(ख) साहसी और पराक्रमी
(ग) दृढ़ और संवेदनशील
(घ) प्रसन्नचित्त और सक्रिय
उत्तर – (ग) दृढ़ और संवेदनशील
‘वज्र-भुज’ अर्थात् लोहे जैसी भुजाएँ उनके दृढ़ और शक्तिशाली शरीर को दर्शाती हैं, जबकि ‘नवनीत-सा उर’ उनके अत्यंत संवेदनशील और कोमल मन को प्रकट करता है।
- “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए” पंक्ति किस ओर संकेत करती है?
(क) पिता की कठोरता
(ख) पिता की भावुकता
(ग) वर्षा की तीव्रता
(घ) पिता की निर्बलता
उत्तर – (ख) पिता की भावुकता
जिस तरह बरगद का पत्ता टूटने पर दूध निकलता है, वैसे ही पिता के किसी बच्चे को ज़रा भी कष्ट होने पर उनकी ममता उमड़ पड़ती है। यह उनकी अत्यधिक भावुकता का संकेत है।
- “बहिन आई बाप के घर, हाय रे परिताप के घर” पंक्ति में ‘परिताप‘ शब्द से क्या संकेत मिलता है?
(क) घर का समृद्ध होना
(ख) घर की सजावट
(ग) घर में दुख का वातावरण
(घ) घर की शांति
उत्तर – (ग) घर में दुख का वातावरण
‘परिताप’ का अर्थ है अत्यधिक कष्ट। बहन खुशियों की उम्मीद में मायके आई थी, लेकिन भाई के जेल में होने के कारण उसे वहाँ दुख और शोक का माहौल मिला।
- “और कहना मस्त हूँ मैं” पंक्ति में कवि का ऐसा कहना किस बात की ओर संकेत करता है?
(क) कवि अपने जीवन में बहुत खुश है।
(ख) अपने दुख को परिजनों से छिपाना चाहता है।
(ग) घर के लोगों के प्रति उदासीन है।
(घ) कवि प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत है।
उत्तर – (ख) अपने दुख को परिजनों से छिपाना चाहता है।
कवि नहीं चाहते कि उनके माता-पिता उनकी जेल की पीड़ा और अकेलेपन को जानकर दुखी हों। इसलिए वे सावन से झूठ बोलने को कहते हैं कि वे वहाँ मस्त और व्यस्त हैं।
- इस कविता में किस बात को प्रमुखता से वर्णित किया गया है?
(क) घर की शांति और सुरक्षा
(ख) घर के सदस्यों के बीच का संबंध
(ग) घर के निर्माण की प्रक्रिया
(घ) घर की याद और अकेलेपन की पीड़ा
उत्तर – (घ) घर की याद और अकेलेपन की पीड़ा
पूरी कविता का मूल भाव जेल के एकांत में घर के सदस्यों को याद करना और उनसे बिछड़ने के दर्द को महसूस करना है।
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए—
- कविता में वर्णित पिता के व्यक्तित्व की उन विशेषताओं का वर्णन कीजिए जिनसे उनका बहुआयामी रूप सामने आता है।
उत्तर – कविता में पिता का व्यक्तित्व विरोधाभासों का एक सुंदर संगम है –
शारीरिक रूप से शक्तिशाली – वे ‘वज्र-भुज’ हैं, 260 दंड लगाते हैं और मुगदर घुमाते हैं। बुढ़ापा उन्हें छू तक नहीं पाया है।
मानसिक रूप से निडर – वे मौत और शेर के सामने भी नहीं हिचकते। उनकी आवाज़ में ‘बादलों जैसी गर्जना’ है।
हृदय से अत्यंत कोमल – उनका हृदय मक्खन जैसा है। वे अपने ‘पाँचवें बेटे’ को याद करके बच्चों की तरह रो पड़ते हैं।
संवेदनशील और स्नेही – वे अपने बच्चों को बहुत मानते हैं। उनका परिवार के प्रति लगाव बरगद की गहरी जड़ों जैसा है।
- “दुख डटकर ठेलता हूँ” यह कथन मनुष्य के संघर्षशील स्वभाव को उजागर करता है। कविता के आधार पर बताइए कि कठिन परिस्थितियों में कवि किस प्रकार धैर्य, साहस और त्याग का परिचय देता है?
उत्तर – कठिन परिस्थितियों अर्थात् कारावास की यंत्रणा में कवि का व्यवहार अनुकरणीय है –
धैर्य – जेल के एकांत और ‘आदमी से भागने’ की स्थिति के बावजूद वे खुद को टूटने नहीं देते।
साहस – वे दुखों को ‘डटकर ठेलते’ हैं और जेल में भी पढ़ने-लिखने तथा सूत कातने जैसे रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रहते हैं।
त्याग – कवि का सबसे बड़ा त्याग यह है कि वे अपनी वास्तविक पीड़ा को अपने माता-पिता से छिपाते हैं ताकि उन्हें कष्ट न हो। वे अपनी ‘अस्त’ होती ज़िंदगी को ‘मस्त’ बताकर अपनों की खुशी के लिए झूठ का सहारा लेते हैं।
- कविता में बार-बार वर्षा का वर्णन कवि के भावों को किस प्रकार व्यक्त करता है?
उत्तर – वर्षा यहाँ केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि कवि की मानसिक स्थिति का प्रतिबिंब है, जैसे – बारिश की ‘झड़ी’ कवि की ‘स्मृतियों की झड़ी’ बन जाती है। जैसे-जैसे पानी गिरता है, घर की यादें कवि की आँखों में तैरने लगती हैं। बाहर की मूसलाधार वर्षा और भीतर की आँसुओं की वर्षा एकाकार हो जाती है। अंत में ‘पानी का थमना’ और ‘मन का नम होना’ कवि की उदासी की गहराई को दिखाता है।
- कविता से उन पंक्तियों को चुनकर लिखिए और भाव स्पष्ट कीजिए जिनसे माँ की भावनात्मक मजबूती का परिचय मिलता है।
उत्तर – माँ की मजबूती इन पंक्तियों से स्पष्ट होती है –
“पाँव जो पीछे हटाता, कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे, रो पड़ेंगे और बच्चे।”
यहाँ माँ स्वयं दुखी होते हुए भी पिता को संभालती हैं। वे देशभक्ति को पारिवारिक मोह से ऊपर रखती हैं और कहती हैं कि यदि भवानी जेल न जाता, तो यह उनके मातृत्व के लिए अपमान की बात होती। वे पिता को ‘कच्चा’ अर्थात् कमजोर न होने की सलाह देकर अपनी दृढ़ता का परिचय देती हैं।
- कविता का कौन-सा अंश आपको सबसे अधिक भावनात्मक और प्रभावी लगता है और क्यों?
उत्तर – मुझे “पाँचवें का नाम लेकर, रो पड़े होंगे बराबर” वाला अंश सबसे प्रभावी लगता है। कारण – यह एक पिता की उस मर्मभेदी पीड़ा को दर्शाता है जहाँ एक मज़बूत और साहसी व्यक्ति भी अपने बच्चे की याद में टूट जाता है। ‘सोने पर सुहागा’ और ‘स्वर्ण बेटे’ जैसे शब्द पिता के उस अगाध प्रेम को व्यक्त करते हैं, जो पाठक के मन को झकझोर देता है।
विधा से संवाद
कविता का सौंदर्य
गिर रहा पानी झरा-झर, हिल रहे पत्ते हरा-हर,
बह रही है हवा सर-सर, काँपते हैं प्राण थर-थर”
उपर्युक्त पंक्तियों में रेखांकित शब्दों को ध्यानपूर्वक पढ़िए। यहाँ शब्दों का चयन और संयोजन इस प्रकार किया गया है कि कविता में ध्वन्यात्मकता और नाद सौंदर्य की सृष्टि हुई है। शब्दों के ऐसे प्रयोग से कविता आकर्षक बनती है। कविता में ऐसी अनेक विशेषताएँ हैं जो इसे जीवंत और प्रभावपूर्ण बनाती हैं। ऐसी कुछ विशेषताओं की सूची नीचे दी गई है। कविता से ऐसी विशेषताओं वाली पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए।
विशेषताएँ
विशेषता | कविता से उदाहरण (पंक्तियाँ) |
स्मृति और दृश्य बिंब | “बड़े बाड़े में कि जाता, बीज लौकी का लगाता” या “खूब मुगदर हिला लेकर, मूठ उनकी मिला लेकर” |
लोकभाषा की सहजता | “वजन सत्तर सेर मेरा, और भोजन ढेर मेरा” या “बँधा बैठा हूँ अभागा” |
पंक्तियों का दोहराव | “बहुत पानी गिर रहा है, घर नजर में तिर रहा है” (यह कविता में कई बार आया है जो यादों की निरंतरता दिखाता है) |
आलंकारिक प्रयोग | “वज्र-भुज नवनीत-सा उर” (उपमा अलंकार) या “अम्मा ठीक बादल” (उपमा) |
प्राकृतिक दृश्यों और भावों का संयोजन | “तुम बरस लो वे न बरसें, पाँचवें को वे न तरसें” (वर्षा और आँसुओं का मिलन) |
संबोधनात्मकता | “हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन” या “हवा, उनको धीर देना” |
कविता की संरचना
‘घर की याद’ कवि के भीतर उठते भावों की यात्रा है। कविता में प्रकृति के माध्यम से व्यक्त इस यात्रा के प्रमुख चरणों का वर्णन करें।
(संकेत – पानी का गिरना, सबेरा होना)
उत्तर – ‘घर की याद’ कविता की संरचना वास्तव में स्मृतियों का एक प्रवाह है, जो बाहर गिरती बारिश की बूँदों के साथ शुरू होकर कवि के अंतर्मन की गहराई तक जाती है। इस यात्रा को हम निम्नलिखित चरणों में देख सकते हैं –
- बाह्य उद्दीपन – पानी का गिरना और स्मृतियों का प्रारंभ
कविता की शुरुआत बाहर हो रही मूसलाधार वर्षा से होती है। यह वर्षा कवि के लिए केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं है, बल्कि यह उनके भीतर की यादों को जगाने वाला माध्यम है।
- समय का भ्रम – सबेरा होना और जेल का एकांत
वर्षा और बादलों के घने अँधेरे के कारण कवि को समय का आभास नहीं होता। कवि कहते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चला कि ‘कब सबेरा हो गया’। यह इस बात का संकेत है कि कवि अपनी यादों में इतना खो गए थे कि उन्हें बाहरी दुनिया का होश नहीं रहा। जेल का सन्नाटा और ‘रात वाली छाप’ उनके अकेलेपन को और गहरा कर देती है।
- स्मृतियों का विस्तार – परिवार के सदस्यों का चित्रण
यहाँ से यात्रा प्रकृति से मुड़कर मानवीय संबंधों की ओर जाती है। कवि एक-एक करके अपने परिवार के सदस्यों को याद करते हैं –
भाई-बहन – ‘भुजा’ और ‘प्यार’ के रूप में उनकी मजबूती।
माँ – उनकी ममतामयी गोद और पत्र न लिख पाने की विवशता।
पिता – उनका वज्र जैसा शरीर और मक्खन जैसा हृदय।
यह चरण कविता का सबसे भावुक हिस्सा है, जहाँ कवि घर के ‘खुशी के पूर’ से ‘परिताप के घर’ बनने की पीड़ा को महसूस करते हैं।
- मानसिक द्वंद्व – आत्म-ग्लानि और ‘पाँचवाँ’ बेटा
कवि की मानसिक यात्रा अब कवि के आत्म-चिंतन की ओर बढ़ती है। वे स्वयं को ‘अभागा’ कहते हैं क्योंकि वे जेल में हैं और उनके कारण उनके पिता रो रहे होंगे।
- काल्पनिक संवाद – माता-पिता का ढाँढस
कवि कल्पना करते हैं कि उनकी माँ ने पिताजी को कैसे समझाया होगा। यह हिस्सा कवि के भीतर चल रहे संघर्ष को शांत करने का प्रयास है। वे खुद को सांत्वना देते हैं कि उनका जेल जाना ‘लीक’ अर्थात् परंपरा का पालन करना है।
- दूत काव्य – सावन को संदेश देना
कविता के अंतिम चरण में यात्रा फिर से बारिश की ओर लौटती है, लेकिन इस बार प्रकृति एक संदेशवाहक है।
- यात्रा का समापन – ‘तुम बरस लो वे न बरसें’
कविता का अंत एक निस्वार्थ प्रार्थना के साथ होता है। कवि सावन को बरसने की अनुमति देते हैं, लेकिन अपने पिता की आँखों को बरसने से रोकना चाहते हैं।
निष्कर्ष
‘घर की याद’ की संरचना एक वृत्त की तरह है। यह सावन की बारिश से शुरू होती है, स्मृतियों के गलियारों से गुजरती हुई परिवार तक पहुँचती है और अंत में फिर सावन पर ही समाप्त होती है। यह यात्रा बाहर से भीतर और फिर भीतर से बाहर के संदेश की यात्रा है।
विषयों से संवाद
- कविता में चित्रित ‘घर‘ एक भौतिक स्थान से बढ़कर भावनाओं और संबंधों के केंद्र के रूप में चित्रित हुआ है। वर्तमान में एकल परिवारों के बढ़ते चलन के संदर्भ में संयुक्त परिवार और एकल परिवार की तुलना कीजिए और कारण सहित लिखिए कि दोनों की कौन-कौन-सी बातें आपको पसंद हैं और कौन-कौन-सी नापसंद?
उत्तर – ‘घर की याद’ कविता एक संयुक्त परिवार की आदर्श तस्वीर पेश करती है जहाँ भाई-बहन और माता-पिता एक ‘इकाई’ के रूप में जुड़े हैं।
परिवार का प्रकार | पसंद आने वाली बातें | नापसंद आने वाली बातें |
संयुक्त परिवार | संकट के समय पूरा परिवार साथ खड़ा होता है। बच्चों को दादा-दादी का संस्कार और कहानियाँ मिलती हैं। काम का बोझ बँट जाता है। | व्यक्तिगत गोपनीयता की कमी हो सकती है। कभी-कभी आपसी मनमुटाव या निर्णय लेने में स्वतंत्रता की कमी। |
एकल परिवार | आत्मनिर्भरता आती है और निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता होती है। जीवनशैली आधुनिक और शांत हो सकती है। | अकेलेपन की समस्या, विशेषकर बच्चों और कामकाजी माता-पिता के लिए। आपातकालीन स्थिति में बाहरी मदद पर निर्भरता। |
मुझे संयुक्त परिवार का ‘सुरक्षा कवच’ और एकल परिवार की ‘निजता’ पसंद है। वर्तमान में ‘विस्तारित परिवार’ अर्थात् अलग रहकर भी भावनात्मक रूप से जुड़े रहना सबसे अच्छा विकल्प है।
- कविता में बार-बार पानी गिरने का वर्णन है। लगातार बारिश होती रहे तो ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में किस प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं?
उत्तर – मूसलाधार बारिश होने पर ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में अलग-अलग चुनौतियाँ आती हैं। ग्रामीण क्षेत्र में कच्चे मकान गिरने का डर, फसलों का जलमग्न होना, पशुओं के चारे की समस्या और आवागमन के कच्चे रास्तों का कीचड़ से भर जाना। शहरी क्षेत्र में जल-निकासी की समस्या, सड़कों पर जल-भराव, ट्रैफिक जाम, बिजली गुल होना और संक्रामक बीमारियों का खतरा।
- कविता में सावन के बादल का प्रयोग एक संचार माध्यम के रूप में किया गया है जिसके द्वारा कवि अपने परिवार तक संदेश भेज रहा है। कक्षा में संचार के नए-पुराने माध्यमों में अंतर बताते हुए चर्चा कीजिए और लिखिए।
उत्तर – कवि ने ‘सावन’ को माध्यम बनाया, जिसे ‘दूत काव्य’ परंपरा कहा जाता है।
पुराने माध्यम – दूत (इंसान), संदेशवाहक पक्षी विशेषकर कबूतर, ढोल बजाकर घोषणा, पत्र। इनमें समय अधिक लगता था लेकिन आत्मीयता बहुत होती थी।
नये माध्यम – ईमेल, व्हाट्सएप, वीडियो कॉल, सोशल मीडिया। ये तात्कालिक हैं, लेकिन इनमें पत्रों जैसी प्रतीक्षा और ठहराव की कमी है।
- भवानीप्रसाद मिश्र ने यह कविता स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कारावास में लिखी थी। अपने शिक्षक और पुस्तकालय की सहायता से ‘भारत का स्वतंत्रता संग्राम‘ विषय पर लेख लिखिए।
उत्तर – भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (1857-1947) दुनिया का सबसे बड़ा जन-आंदोलन था। यह केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान की लड़ाई थी। भवानी प्रसाद मिश्र जैसे कवियों ने 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लिया। इस संघर्ष में गांधीजी की अहिंसा और सुभाष चंद्र बोस की सशस्त्र क्रांति दोनों धाराओं ने मिलकर काम किया, जिसके परिणामस्वरूप 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ।
सृजन
- कल्पना कीजिए कि कवि की माँ को पत्र लिखना आता है। कविता में वर्णित उनकी छवि और अनुमान के आधार पर लिखिए कि वे कवि के लिए पत्र में क्या-क्या लिखतीं?
उत्तर – मेरे लाडले भवानी,
ढेरों आशीर्वाद। यहाँ घर में सब ठीक हैं, बस तेरी कमी हर पल खलती है। तेरे पिताजी तुझे याद कर थोड़े कच्चे पड़ जाते हैं, पर मैं उन्हें संभाल लेती हूँ। तू जेल में अपना ध्यान रखना। जो तूने किया, उस पर मुझे गर्व है। देश की सेवा से बढ़कर कुछ नहीं। तू बस स्वस्थ रहना और जल्दी लौट आना। तेरी पसंद की लौकी की सब्जी और रोटियाँ तेरा इंतज़ार कर रही हैं।
— तेरी माँ
- कविता में माँ और पिताजी के बीच कवि के विषय में की जाने वाली बातचीत का वर्णन है। उनकी इस बातचीत को संवाद-लेखन के रूप में प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर – (दृश्य – पिताजी मुगदर रखकर नीचे आए हैं और उनकी आँखों में आँसू हैं)
माँ – “सुनिए, आँखों में पानी क्यों है? भवानी को याद कर रहे हैं क्या?”
पिता – “नहीं, मैं कहाँ रोता हूँ? बस… वह पाँचवाँ याद आ गया। पता नहीं कैसा होगा वहाँ।”
माँ – “वह अच्छा ही होगा। आखिर आपके ही तो संस्कारों पर चला है। अगर वह पाँव पीछे हटाता तो मेरी कोख लजाता। आप खुद को संभालिए, वरना बाकी बच्चे भी रोने लगेंगे।”
पिता – “तुम ठीक कहती हो। वह वीर है, मजे में होगा। मैं धीर नहीं खोऊँगा।”
- इस कविता में कवि ने सावन के बादल को संदेशवाहक बनाया है। अगर आपको किसी प्राकृतिक उपादान के माध्यम से अपने घर, मित्र या किसी संबंधी व्यक्ति को कोई संदेश भेजना हो तो आप किसे चुनेंगे और क्यों?
उत्तर – अगर मुझे किसी प्राकृतिक उपादान को चुनना हो, तो मैं ‘हवा’ को चुनूँगा। इसका कारण यह है कि हवा हर जगह मौजूद है, वह पहाड़ों और दीवारों को पार कर सकती है। इसकी छुअन अदृश्य है लेकिन महसूस की जा सकती है। मैं चाहूँगा कि हवा मेरे प्रियजनों के पास जाकर उन्हें मेरी मौजूदगी का अहसास कराए और उनके माथे को चूमकर मेरा स्नेह उन तक पहुँचाए।
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
- “आज सबका मन चुआ होगा।”
उपर्युक्त पंक्ति में रेखांकित शब्द कवि की क्षेत्रीय/स्थानीय भाषा का शब्द है। कविता में स्थानीय भाषा के शब्दों का सहज प्रयोग हुआ है। कविता से कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई है। उनमें रेखांकित शब्दों का अर्थ स्पष्ट करते हुए उनसे नए वाक्य बनाइए।
पंक्ति और रेखांकित शब्द | शब्द का अर्थ | नया वाक्य प्रयोग |
एक छिन सौ बरस है रे | क्षण / पल | माँ की ममता के आगे दुख का एक छिन भी नहीं टिकता। |
ने फलानी फूल झेला | खिला / धारण किया | वसंत ऋतु आते ही बागों ने अनगिनत फूल झेले हैं। |
सहज पानी सहज तरला | कोमल / तरल / चंचल | ओस की तरला बूँदें घास पर मोतियों जैसी लग रही हैं। |
मन कि बड़ का झाड़ जैसे | बरगद का पेड़ | हमारे गाँव के चौराहे पर एक विशाल बड़ का पेड़ है। |
- नीचे दी गई कविता की पंक्तियों में आए शब्दों की व्याकरणिक पहचान लिखिए। आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है।
(क) “बहुत पानी गिर रहा है”
‘पानी’ शब्द है – संज्ञा
‘बहुत’ शब्द है – विशेषण
‘गिर रहा है’ है – क्रिया
(ख) “पिताजी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा”
‘बुढ़ापा’ शब्द है – भाववाचक संज्ञा
‘व्यापा’ शब्द है – क्रिया
‘जिनको’ शब्द है – संबंधवाचक सर्वनाम
(ग) “खुले सिर नंगे बदन वह, घूमता फिरता मगन वह”
‘खुले’ शब्द है – विशेषण
‘वह’ शब्द है – पुरुषवाचक सर्वनाम – अन्य पुरुष
‘बदन’ शब्द है – जातिवाचक संज्ञा
‘फिरता’ शब्द है – क्रिया
(घ) “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए”
‘एक’ शब्द है – संख्यावाचक विशेषण
‘फूट जाए’ है – संयुक्त क्रिया
‘पत्ता’ शब्द है – जातिवाचक संज्ञा
(ङ) “हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन”
‘सजीले’ शब्द है – गुणवाचक विशेषण
‘मेरे’ शब्द है – सार्वनामिक विशेषण / निजवाचक सर्वनाम का रूप
‘सावन’ शब्द है – व्यक्तिवाचक संज्ञा
गतिविधियाँ –
- कवि ने कविता में अपने परिवार का उल्लेख किया है। आप भी अपना एक परिवार वृक्ष तैयार कीजिए और प्रत्येक सदस्य के व्यक्तित्व के बारे में कुछ पंक्तियाँ लिखिए।
उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर करें।
- कविता में प्रयुक्त ध्वनि आधारित शब्द (जैसे- झरा-झर, थर-थर, सर-सर) को पढ़कर एक छोटी-सी ऑडियो रिकॉर्डिंग या मौखिक पाठ तैयार कीजिए। बताइए कि ये शब्द कविता में कैसे वातावरण का निर्माण करते हैं?
उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर करें।

