7, Main Aur Mera Desh, Kanhaiyalal Mishra ‘Prabhakar’, NCERT Class IX, Ganga Book Solutions. Questions Answers,

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर‘ – लेखक

हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का जन्म सन् 1906 ई. में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में हुआ था। कन्हैयालाल मिश्र का मुख्य कार्यक्षेत्र पत्रकारिता था। उन्होंने नया जीवन और विकास पत्रों का संपादन किया। प्रारंभ से ही स्वतंत्रता संग्राम एवं सामाजिक कार्यों में भाग लेने के कारण उन्हें अनेक बार जेल-यात्रा भी करनी पड़ी। उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक जीवन से संबंध रखने वाले अनेक निबंध लिखे। अपनी उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाओं के लिए उन्हें ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया गया।

उनके संस्मरणात्मक निबंध-संग्रह दीप जले शंख बजे, जिंदगी मुसकरायी, बाजे पायलिया के घुँघरू, जिंदगी लहलहाई, क्षण बोले कण मुसकाए, कारवाँ आगे बढ़े, माटी हो गई सोना, महके आँगन चहके द्वार और आकाश के तारे धरती के फूल गहन मानवतावादी दृष्टिकोण और जीवन-दर्शन के परिचायक हैं। सन् 1995 में उनका निधन हो गया।

मैं और मेरा देश – पाठ परिचय

‘मैं और मेरा देश’ कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा रचित एक विचारात्मक निबंध है, जो व्यक्ति और राष्ट्र के अटूट संबंध को रेखांकित करता है। लेखक के अनुसार, एक नागरिक की पहचान उसके परिवार, समाज और राष्ट्र से गहराई से जुड़ी होती है; इसलिए व्यक्ति का हर कार्य न केवल उसकी अपनी छवि, बल्कि उसके देश के सम्मान को भी प्रभावित करता है। ‘मैं और मेरा देश’ एक ऐसी रचना है जो व्यक्ति और राष्ट्र के अविभाज्य संबंध को गहराई से स्थापित करती है। इस निबंध के अनुसार व्यक्ति की पूर्णता उसकी निजता में ही नहीं होती, बल्कि उसके परिवार, क्षेत्र विशेष और राष्ट्र की पहचान तक से जुड़ी होती है। व्यक्ति द्वारा किया गया हर कार्य उसकी पहचान के साथ-साथ उसके परिवार, क्षेत्र और राष्ट्र से भी जुड़ा होता है। इसी विचार से लेखक यह निष्कर्ष निकालते हैं कि देश का सम्मान और नागरिक का सम्मान एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़े होते हैं। निबंध में नागरिक के अधिकार, उसके कर्तव्य और देश की उन्नति तथा कुशल नेतृत्वकर्ता कैसा हो, इस पर भी विचार किया गया है। लेखक इस बात पर बल देता है कि देश के लिए हर एक नागरिक महत्त्वपूर्ण कार्य कर सकता है, यदि वह देश के ‘शक्तिबोध’ और ‘सौंदर्यबोध’ को हानि न पहुँचाकर सशक्त करता है।

मैं और मेरा देश

मैं अपने घर में जनमा था, पला था।

अपने पड़ोस में खेलकर, पड़ोसियों का ममता-दुलार पा, बड़ा हुआ था।

अपने नगर में घूम-फिरकर, वहाँ के विशाल समाज का संपर्क पा, वहाँ के संचित ज्ञान-भंडार का उपयोग कर, उसे अपनी सेवाओं का दान दे, उसकी सेवाओं का सहारा पा और इस तरह एक मनुष्य से भरा-पूरा नगर बनकर मैं खड़ा हुआ था।

मैं अपने नगर के लोगों का सम्मान करता था, वे भी मेरा सम्मान करते थे।

मुझे बहुतों की अपने लिए जरूरत पड़ती थी। मैं भी बहुतों की जरूरत का उनके लिए जवाब था।

इस तरह मैं समझ रहा था कि मैं अपने में अब पूरा हो गया हूँ, पूरा फैल गया हूँ, पूरा मनुष्य हो गया हूँ।

मैं सोचा करता था कि मेरी मनुष्यता में अब कोई अपूर्णता नहीं रही, मुझे अब कुछ न चाहिए, जो चाहिए, वह सब मेरे पास है— मेरा घर, मेरा पड़ोस, मेरा नगर और मैं। वाह कैसी सुंदर, कैसी संगठित और कैसी पूर्ण है मेरी स्थिति!

एक दिन आनंद की इस दीवार में एक दरार पड़ गई और तब मुझे सोचना पड़ा कि अपने घर, अपने पड़ोस, अपने नगर की सीमाओं में ममता, सहारा, ज्ञान और आनंद के उपहार पाकर भी मेरी स्थिति एकदम हीन है और हीन भी इतनी कि मेरा कहीं भी और कोई भी अपमान कर सकता है— एक मामूली अपराधी की तरह और मुझे यह भी अधिकार नहीं कि मैं उस अपमान का बदला लेना तो दूर रहा, उसके लिए कहीं अपील या दया-प्रार्थना ही कर सकूँ।

क्या कोई भूकंप आया था, जिससे दीवार में दरार पड़ गई?

बड़े महत्त्व का प्रश्न है। इस अर्थ में भी कि यह बात को खिलने का, आगे बढ़ने का अवसर देता है और इस अर्थ में भी कि ठीक समय पर पूछा गया है। ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में एक अपूर्व आनंद आता है, तो उत्तर यह है आपके प्रश्न का-

जी हाँ, एक भूकंप आया था, जिससे दीवार में दरार पड़ गई और लीजिए आपको कोई नया प्रश्न न पूछना पड़े, इसलिए मैं अपनी ओर से ही कह रहा हूँ कि यह दीवार थी मानसिक विचारों की; इसलिए यह भूकंप भी किसी प्रांत या प्रदेश में नहीं उठा, मेरे मानस में ही उठा था।

मानस में भूकंप उठा था?

हाँ जी, मानस में भूकंप उठा था और भूकंप में क्या कोई धरती थोड़े ही हिली थी, आकाश थोड़े ही काँपा था, एक तेजस्वी पुरुष का अनुभव ही वह भूकंप था, जिसने मुझे हिला दिया।

वे तेजस्वी पुरुष थे स्वर्गीय पंजाब-केसरी लाला लाजपत राय। अपने महान राष्ट्र की पराधीनता के दीन दिनों में जिन लोगों ने अपने रक्त से गौरव के दीपक जलाए और जो घोर अंधकार और भयंकर बवंडरों के झकझोरों में जीवन-भर खेल, उन दीपकों को बुझने से बचाते रहे, उन्हीं में एक थे लालाजी। उनकी कलम और वाणी दोनों में तेजस्विता की अद्भुत किरणें थीं।

वे उन्हीं दिनों सारे संसार में घूमे थे। उनके व्यक्तित्व के गठन में, उनके परिवार, उनके पास-पड़ोस और उनके नगर ने अपने सर्वोत्तम रत्नों की ज्योति उन्हें भेंट दी थी। अजी, क्या बात थी उनके व्यक्तित्व की, क्या देखने में, क्या सुनने में! वे एक अपूर्व मनुष्य थे। कौन था दुनिया में जिस पर वे मिलते ही छा न जाते, पर संसार के देशों में घूमकर वे अपने देश में लौटे, तो उन्होंने अपना सारा अनुभव एक ही वाक्य में भरकर बिखेर दिया। वह अनुभव ही तो वह भूकंप था, जिसने मेरी पूर्णता को एक ही ठसक में अपूर्णता की कसक से भर दिया।

उनका वह अनुभव था कि “मैं अमेरिका गया, इंग्लैंड गया, फ्रांस गया और संसार के दूसरे देशों में भी घूमा, पर जहाँ भी मैं गया, भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक मेरे माथे पर लगा रहा।” क्या सचमुच यह अनुभव एक मानसिक भूकंप नहीं है, जो मनुष्य को झकझोर कर कहे कि किसी मनुष्य के पास संसार के ही नहीं, यदि स्वर्ग के भी सब उपहार और साधन हों, पर उसका देश गुलाम हो या किसी भी दूसरे रूप में हीन हो तो वे सारे उपहार और साधन उसे गौरव नहीं दे सकते।

इस अनुभव की छाया में मैं सोचता हूँ कि मेरा कर्तव्य है कि मुझे निजी रूप में सारे संसार का राज्य भी क्यों न मिलता हो, मैं कोई ऐसा काम न करूँ जिससे मेरे देश की स्वतंत्रता को, दूसरे शब्दों में, उसके सम्मान को धक्का पहुँचे, उसकी किसी भी प्रकार की शक्ति में कमी आए; साथ ही उसके एक नागरिक के रूप में मेरा यह अधिकार भी है कि अपने देश के सम्मान का पूरा-पूरा भाग मुझे मिले और उसकी शक्तियों से अपने सम्मान की रक्षा का मुझे, जहाँ भी मैं हूँ, भरोसा रहे।

अजी, भला एक आदमी अपने इतने बड़े देश के लिए कर ही क्या सकता है! फिर कोई बड़ा वैज्ञानिक हो तो वह अपने आविष्कार से ही देश को कुछ बल दे या फिर कोई बहुत बड़ा धनपति हो तो वह अपने धन का भामाशाह की तरह समय पर त्याग कर ही कुछ काम आ सकता है, पर हरेक आदमी न तो ऐसा वैज्ञानिक ही हो सकता है, न धनिक ही। फिर जो बेचारा अपनी ही दाल-रोटी की फिक्र में लगा हुआ हो, वह अपने देश के लिए चाहते हुए भी क्या कर सकता है?

आपका प्रश्न विचारों को उत्तेजना देता है, इसमें कोई संदेह नहीं; पर इसमें भी संदेह नहीं कि इसमें जीवनशास्त्र का घोर अज्ञान भी भरा हुआ है। अरे भाई, जीवन कोई आपके मुन्ने की गुड़िया थोड़े ही है कि आप कह सकें कि बस यह है, इतना ही है। वह तो एक विशाल समुंदर का तट है, जिस पर हरेक अपने लिए स्थान पा सकता है।

लो, एक और बात बताता हूँ आपको। जीवन को दर्शनशास्त्रियों ने बहुमुखी बताया है, उसकी अनेक धाराएँ है। सुना नहीं आपने कि जीवन एक युद्ध है और युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता। लड़ने वालों को रसद न पहुँचे तो वे कैसे लड़ें। किसान ही खेती न उपजाए तो रसद पहुँचाने वाले क्या करें और लो, जाने दो बड़ी-बड़ी बातें युद्ध में जय बोलने वालों का भी महत्त्व है।

जय बोलने वालों का?

हाँ जी, युद्ध में जय बोलने वालों का भी बहुत महत्त्व है। कभी मैच देखने का अवसर मिला ही होगा आपको; देखा नहीं आपने कि दर्शकों की तालियों से खिलाड़ियों के पैरों में बिजली लग जाती है और गिरते खिलाड़ी उभर जाते हैं? कवि-सम्मेलनों और मुशायरों की सारी सफलता दाद देने वालों पर ही निर्भर करती है, इसलिए मैं अपने देश का कितना भी साधारण नागरिक क्यों न हूँ, अपने देश के सम्मान की रक्षा के लिए बहुत कुछ कर सकता हूँ। अकेला चना क्या भाड़ फोड़े— यह कहावत, अपने अनुभव के आधार पर ही आपसे कह रहा हूँ — कि सौ फीसदी झूठ है। इतिहास साक्षी है, बहुत बार अकेले चने ने ही भाड़ फोड़ा है और ऐसा फोड़ा है कि भाड़ खील-खील ही नहीं हो गया, उसका निशान तक ऐसा छूमंतर हुआ कि कोई यह भी न जान पाया कि वह बेचारा आखिर था कहाँ।

मैं जानता हूँ, इतिहास की गहराइयों में उतरने का समय नहीं है, पर दो छोटी कहानियाँ तो सुन ही सकते हैं आप; और कहानियाँ भी न प्रेमचंद की हैं, न अंतोन चेखव की। दो युवकों के जीवन की दो घटनाएँ हैं, पर उन दो घटनाओं में वह गाँठ इतनी साफ है, जो नागरिक और देश को एक साथ बाँधती है कि आप दो बड़ी-बड़ी पुस्तकें पढ़कर भी उसे इतना साफ नहीं देख सकते।

हमारे देश के महान संत स्वामी रामतीर्थ एक बार जापान गए। वे रेल में यात्रा कर रहे थे कि एक दिन ऐसा हुआ कि उन्हें खाने को फल न मिले और उन दिनों फल ही उनका भोजन था। गाड़ी एक स्टेशन पर ठहरी तो वहाँ भी उन्होंने फलों की खोज की, पर वे पा न सके। उनके मुँह से निकला – जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते!

एक जापानी युवक प्लेटफार्म पर खड़ा था। वह अपनी पत्नी को रेल में बैठाने आया था, उसने यह शब्द सुन लिए। सुनते ही वह अपनी बात बीच में छोड़कर भागा और कहीं दूर से एक टोकरी ताजे फल लाया। वे फल उसने स्वामी रामतीर्थ को भेंट करते हुए कहा – लीजिए, आपको ताजे फलों की जरूरत थी।

स्वामी जी ने समझा कि यह कोई फल बेचने वाला है और उनके दाम पूछे, पर उसने दाम लेने से इनकार कर दिया। बहुत आग्रह करने पर उसने कहा- आप इनका मूल्य देना ही चाहते हैं तो वह यह है कि आप अपने देश जाकर किसी से यह न कहिएगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।

स्वामी जी युवक का यह उत्तर सुनकर मुग्ध हो गए, और वे क्या मुग्ध हो गए, उस युवक ने अपने इस कार्य से अपने देश का गौरव जाने कितना बढ़ा दिया!

इस गौरव की ऊँचाई का अनुमान आप दूसरी घटना सुनकर ही पूरी तरह लगा सकते हैं। एक दूसरे देश का निवासी एक युवक जापान में शिक्षा लेने आया। एक दिन वह सरकारी पुस्तकालय से एक पुस्तक पढ़ने को लाया जिसमें कुछ दुर्लभ चित्र थे। ये चित्र इस युवक ने पुस्तक में से निकाल लिए और पुस्तक वापस कर आया। किसी जापानी विद्यार्थी ने यह देख लिया और पुस्तकालय को इसकी सूचना दे दी। पुलिस ने तलाशी लेकर वे चित्र उस विद्यार्थी के कमरे से बरामद किए और उस विद्यार्थी को जापान से निकाल दिया गया।

मामला यहीं तक रहता तो कोई बात न थी। अपराधी को दंड मिलना ही चाहिए, पर मामला यहीं तक न रुका और पुस्तकालय के बाहर बोर्ड पर लिख दिया गया कि उस देश का (जिसका वह विद्यार्थी था) कोई निवासी इस पुस्तकालय में प्रवेश नहीं कर सकता।

मतलब साफ है, एकदम साफ— कि जहाँ एक युवक ने अपने काम से अपने देश का सिर ऊँचा किया था, वहीं एक युवक ने अपने देश के मस्तक पर कलंक का ऐसा टीका लगाया, जो जाने कितने वर्षों तक संसार की आँखों में उसे लांछित करता रहा।

इन घटनाओं से क्या यह स्पष्ट नहीं होता है कि हरेक नागरिक अपने देश के साथ बँधा हुआ है और देश की हीनता और गौरव का ही फल उसे नहीं मिलता, उसकी हीनता और गौरव का फल भी उसके देश को मिलता है?

मैं अपने देश का नागरिक हूँ और मानता हूँ कि मैं अपना देश हूँ। जैसे मैं अपने लाभ और सम्मान के लिए हरेक छोटी-छोटी बात पर ध्यान देता दूँ, वैसे ही मैं अपने देश के लाभ और सम्मान के लिए भी छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दूँ, यह मेरा कर्तव्य है और जैसे मैं अपने सम्मान और साधनों से अपने जीवन में सहारा पाता हूँ, वैसे ही देश के सम्मान और साधनों से भी सहारा पाऊँ, यह मेरा अधिकार है। बात यह है कि मैं और मेरा देश दो अलग चीजें तो हैं ही नहीं।

मैंने जो कुछ जीवन में अध्ययन और अनुभव से सीखा है, वह यही है कि महत्त्व किसी कार्य की विशालता में नहीं है, उस कार्य के करने की भावना में है। बड़े से बड़ा कार्य हीन है, यदि उसके पीछे अच्छी भावना नहीं है और छोटे से छोटा कार्य भी महान है, यदि उसके पीछे अच्छी भावना है।

महान कमालपाशा उन दिनों अपने देश तुर्की के राष्ट्रपति थे। राजधानी में अपनी वर्षगाँठ का उत्सव समाप्त कर जब वे अपने भवन में ऊपर चले गए, तो एक देहाती बूढ़ा उन्हें वर्षगाँठ का उपहार भेंट करने आया। सेक्रेटरी ने कहा- अब तो समय बीत गया है। बूढ़े ने कहा- मैं तीस मील से पैदल चलकर आ रहा हूँ, इसलिए मुझे देर हो गई।

राष्ट्रपति तक उसकी सूचना भेजी गई, कमालपाशा विश्राम के वस्त्र बदल चुके थे, वे उन्हीं कपड़ों में नीचे चले आए और उन्होंने बूढ़े किसान का उपहार स्वीकार किया। यह उपहार मिट्टी की छोटी हँडिया में पाव भर शहद था, जिसे बूढ़ा स्वयं तोड़कर लाया था।

कमालपाशा ने हँडिया को स्वयं खोला और उसमें से दो उँगलियाँ भरकर चाटने के बाद तीसरी उँगली शहद में भरकर बूढ़े के मुँह में दे दी, बूढ़ा निहाल हो गया।

राष्ट्रपति ने कहा– दादा, आज सर्वोत्तम उपहार तुमने ही मुझे भेंट किया क्योंकि इसमें तुम्हारे हृदय का शुद्ध प्यार है। उन्होंने आदेश दिया कि राष्ट्रपति की शाही कार में शाही सम्मान के साथ उनके दादा को गाँव तक पहुँचाया जाए।

क्या यह शहद बहुत कीमती था? क्या उसमें मोती – हीरे मिले हुए थे? ना, उस शहद के पीछे उसके लाने वाले की भावना थी जिसने उसे सौ लालों का एक लाल बना दिया।

हमारे देश में भी एक ऐसी ही घटना घटी थी। एक किसान ने रंगीन सुतलियों से एक खाट बुनी और उसे रेल में रखकर वह दिल्ली लाया। दिल्ली स्टेशन से उस खाट को अपने कंधे पर रखे वह भारत के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की कोठी पर पहुँचा। पंडितजी कोठी से बाहर आए तो वह खाट उसने उन्हें दी। पंडितजी को देखकर वह इतना भाव-मुग्ध हो गया कि मुँह से कुछ कह ही न सका। पंडितजी ने पूछा कि क्या चाहते हो तुम?

उसने कहा, यही कि आप इसे स्वीकार करें। प्रधानमंत्री ने उसका यह उपहार स्वीकार ही नहीं किया, अपना एक फोटो दस्तखत कर उसे स्वयं उपहार में दिया— दस्तखती फोटो के लिए देश के बड़े-बड़े लोग, विद्वान और धनी तरसते हैं! वह क्या उस मामूली खाट के बदले में दिया गया था? ना, वह तो उस खाट वाले की भावना का ही सम्मान था।

क्यों जी, हम यह कैसे जान सकते हैं कि हमारा काम देश के अनुकूल है या नहीं?

वाह, क्या सवाल पूछा है आपने। सवाल क्या, बातचीत में आपने तो एक कीमती मोती ही जड़ दिया यह, पर इसके उत्तर में सिर्फ हाँ या ना से काम न चलेगा, मुझे थोड़ा विवरण देना पड़ेगा।

हम अपने कार्यों को देश के अनुकूल होने की कसौटी पर कसकर चलने की आदत डालें, यह बहुत उचित है, बहुत सुंदर है; पर हम इसमें तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक कि हम अपने देश की भीतरी दशा को ठीक से न समझ लें और उसे हमेशा अपने सामने न रखें।

हमारे देश को दो बातों की सबसे पहले और सबसे ज्यादा जरूरत है। एक शक्ति-बोध और दूसरा सौंदर्य-बोध। बस, हम यह समझ लें कि हमारा कोई भी काम ऐसा न हो जो देश में कमजोरी की भावना को बल दे या कुरुचि की भावना को ही।

जरा अपनी बात को और स्पष्ट कर दीजिए, यह आपकी राय है और मैं इससे बहुत ही खुश हूँ कि आप मुझसे यह स्पष्टता माँग रहे हैं।

क्या आप चलती रेलों में, मुसाफिरखानों में, क्लबों में, चौपालों पर और मोटर-बसों में कभी ऐसी चर्चा करते हैं कि हमारे देश में यह नहीं हो रहा है, वह नहीं हो रहा है और गड़बड़ है, बड़ी परेशानी है; साथ ही इन स्थानों में या इसी तरह के दूसरे स्थानों में आप कभी अपने देश के साथ दूसरे देशों की तुलना करते हैं और इस तुलना में अपने देश को हीन और दूसरे देश को श्रेष्ठ सिद्ध किया जाता है?

यदि इस प्रश्न का उत्तर हाँ है तो आप देश के शक्ति-बोध को भयंकर चोट पहुँचा रहे हैं और आपके हाथों देश के सामूहिक मानसिक बल का ह्रास हो रहा है। सुनी है आपने शल्य की बात? वह महाबली कर्ण का सारथी था। जब भी कर्ण अपने पक्ष के विजय की घोषणा करता, हुंकार भरता, वह अर्जुन की अजेयता का एक हल्का-सा उल्लेख कर देता। बार-बार के इस उल्लेख ने कर्ण के सघन आत्मविश्वास में संदेह की तरेड़ डाल दी, जो उसके मन में भावी पराजय की नींव रखने में सफल हो गई।

अच्छा, आप इस तरह की चर्चा कभी नहीं करते! तो मैं आपसे दूसरा प्रश्न पूछता हूँ। क्या आप कभी केला खाकर छिलका रास्ते में फेंकते हैं, अपने घर का कूड़ा बाहर फेंकते हैं; मुँह से गंदे शब्दों में गंदे भाव प्रकट करते हैं, इधर की उधर, उधर की इधर लगाते हैं; अपना घर, दफ्तर, गली गंदा रखते हैं, होटलों-धर्मशालाओं में या ऐसे ही दूसरे स्थानों में, ज़ीनों में, कोनों में पीक थूकते हैं? उत्सवों, मेलों, रेलों और खेलों में ठेलमठेल करते हैं और इसी तरह किसी भी रूप में क्या सुरुचि और सौंदर्य को आपके किसी काम से ठेस लगती है?

यदि आपका उत्तर हाँ है, तो आपके द्वारा देश के सौंदर्य-बोध को भयंकर आघात लग रहा है और आपके द्वारा देश की संस्कृति को गहरी चोट पहुँच रही है।

क्या कोई ऐसी कसौटी भी बनाई जा सकती है, जिससे देश के नागरिकों को आधार बनाकर देश की उच्चता और हीनता को हम तोल सकें?

लीजिए, चलते-चलते आपको इस प्रश्न का भी उत्तर दे ही दूँ। इस उच्चता और हीनता की कसौटी है चुनाव।

जिस देश के नागरिक यह समझते हैं कि चुनाव में किसे अपना मत देना चाहिए और किसे नहीं, वह देश उच्च है; जहाँ के नागरिक गलत लोगों के उत्तेजक नारों या व्यक्तियों के गलत प्रभाव में आकर मत देते हैं, वह हीन है।

इसलिए मैं कह रहा हूँ कि मेरा यानी हरेक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह जब भी कोई चुनाव हो, ठीक मनुष्य को अपना मत दें और मेरा अधिकार है कि मेरा मत लिए बिना कोई भी आदमी, वह संसार का सर्वश्रेष्ठ महापुरुष ही क्यों न हो, किसी अधिकार की कुरसी पर न बैठ सके।

मैं और मेरा देश – मुख्य बिंदु

व्यक्ति और राष्ट्र का संबंध – व्यक्ति और राष्ट्र एक-दूसरे से अविभाज्य रूप से जुड़े हुए हैं; नागरिक का सम्मान और देश का सम्मान एक-दूसरे के पूरक हैं।

पूर्णता और हीनता – लेखक के अनुसार, जब तक देश पराधीन या हीन है, तब तक नागरिक के पास उपलब्ध सभी साधन और उपहार उसे वास्तविक गौरव नहीं दे सकते।

लाला लाजपत राय का अनुभव – लालाजी ने अनुभव किया कि दुनिया के किसी भी कोने में जाने पर, भारत की गुलामी का कलंक हमेशा उनके साथ रहा, जो एक ‘मानसिक भूकंप’ की तरह था।

भावना का महत्व – किसी कार्य की महानता उसकी विशालता में नहीं, बल्कि उसे करने के पीछे की शुद्ध भावना में छिपी होती है।

साधारण नागरिक का योगदान – देश की प्रगति के लिए केवल वैज्ञानिक या धनवान होना आवश्यक नहीं है; एक साधारण नागरिक भी अपने आचरण से देश की रक्षा कर सकता है।

शक्ति-बोध (Sense of Power) – अपने देश की तुलना दूसरे देशों से करके उसे हीन बताना देश के सामूहिक मानसिक बल को चोट पहुँचाता है।

सौंदर्य-बोध (Aesthetic Sense) – सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता बनाए रखना और शिष्टाचार का पालन करना देश की संस्कृति और सौंदर्य की रक्षा करना है।

जापानी युवक की घटना – एक जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ को फल भेंट किए और बदले में केवल यह चाहा कि वे अपने देश में जापान की बुराई न करें, जिससे देश का गौरव बढ़ा।

पुस्तकालय का उदाहरण – एक छात्र द्वारा चित्र चुराने की घटना ने उसके पूरे देश को अपमानित किया, जिससे सिद्ध होता है कि एक व्यक्ति का बुरा कार्य पूरे राष्ट्र को कलंकित कर सकता है।

कमालपाशा और नेहरू जी के उदाहरण – इन नेताओं ने एक किसान के शहद और सुतली की खाट को केवल उनकी ‘भावना’ के कारण सर्वोच्च सम्मान दिया।

चुनाव की कसौटी – देश की उच्चता इस बात पर निर्भर करती है कि नागरिक उत्तेजक नारों के बजाय विवेक से सही और योग्य व्यक्ति को अपना मत देते हैं या नहीं।

अधिकार और कर्तव्य – सही मनुष्य को मत देना नागरिक का कर्तव्य है, और बिना नागरिक की सहमति के किसी का सत्ता पर न बैठ पाना उसका अधिकार है।

मैं और मेरा देश‘ – सारांश

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा रचित निबंध ‘मैं और मेरा देश’ नागरिकता, राष्ट्रीयता और व्यक्ति के देश के प्रति कर्तव्यों का एक प्रेरणादायक विश्लेषण है।

  1. पूर्णता का भ्रम और मानसिक भूकंप

लेखक प्रारंभ में बताते हैं कि वे अपने घर, पड़ोस और नगर के प्रेम और सुविधाओं के बीच खुद को एक ‘पूर्ण मनुष्य’ समझते थे। उन्हें लगता था कि उनके पास जीवन की हर सुख-सुविधा और सम्मान है। परंतु, एक दिन उनके इस ‘आनंद की दीवार’ में दरार पड़ गई। यह दरार किसी भौतिक भूकंप से नहीं, बल्कि एक ‘मानसिक भूकंप’ से आई थी।

यह भूकंप पंजाब केसरी लाला लाजपत राय के एक अनुभव से उत्पन्न हुआ था। लालाजी ने दुनिया भर में घूमने के बाद कहा था कि वे कहीं भी गए, “भारत की गुलामी की लज्जा का कलंक” उनके माथे पर लगा रहा। इस बात ने लेखक को झकझोर दिया कि यदि देश गुलाम या हीन है, तो व्यक्ति की निजी सफलताएँ और सुख-साधन उसे सच्चा गौरव नहीं दे सकते।

  1. व्यक्ति और देश का अटूट संबंध

लेखक इस बात पर बल देते हैं कि नागरिक और देश दो अलग चीजें नहीं हैं। “मैं अपना देश हूँ” – यह भाव ही सच्ची नागरिकता है। व्यक्ति की उन्नति देश की उन्नति है और व्यक्ति की गिरावट देश की गिरावट। लेखक दो घटनाओं के माध्यम से इसे स्पष्ट करते हैं –

जापानी युवक की देशभक्ति – जब स्वामी रामतीर्थ ने जापान में फलों की कमी की बात कही, तो एक जापानी युवक ने उन्हें ताजे फल भेंट किए और बदले में सिर्फ यह माँगा कि वे अपने देश जाकर यह न कहें कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते। उस युवक ने अपने एक छोटे से कार्य से देश का गौरव बढ़ाया।

अपराधी विद्यार्थी का कलंक – इसके विपरीत, एक अन्य विदेशी विद्यार्थी ने जापान के पुस्तकालय से दुर्लभ चित्र चुराए, जिसके कारण न केवल उसे निकाला गया, बल्कि उसके पूरे देश के निवासियों के लिए पुस्तकालय के दरवाजे बंद कर दिए गए।

इन उदाहरणों से सिद्ध होता है कि हर नागरिक का व्यवहार देश के सम्मान को प्रभावित करता है।

  1. साधारण नागरिक का योगदान (भावना का महत्त्व)

लेखक उन लोगों के तर्क को खारिज करते हैं जो कहते हैं कि “अकेला आदमी क्या कर सकता है?” वे कहते हैं कि देश की सेवा के लिए महान वैज्ञानिक या धनपति होना ही जरूरी नहीं है। लेखक कहते हैं कि किसी भी कार्य के पीछे भावना की श्रेष्ठता महत्त्वपूर्ण होती है। महत्त्व कार्य की विशालता में नहीं, बल्कि उसे करने के पीछे की ‘भावना’ में है।

उदाहरण के रूप में तुर्की के राष्ट्रपति कमालपाशा ने एक गरीब किसान की मिट्टी की हँडिया में लाए पाव भर शहद को ‘सर्वोत्तम उपहार’ माना क्योंकि उसमें सच्चा प्रेम था। इसी तरह, पंडित नेहरू ने एक साधारण किसान द्वारा बुनी गई खाट को स्वीकार कर उसे अपना हस्ताक्षरित फोटो दिया। ये उदाहरण बताते हैं कि निष्कपट भाव से किया गया छोटा कार्य भी महान होता है।

  1. शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध – देश की दो मुख्य जरूरतें

लेखक बताते हैं कि हमारे कार्यों को देश के अनुकूल होने के लिए दो कसौटियों पर कसना चाहिए –

शक्ति-बोध (Sense of Power) – यदि हम सार्वजनिक स्थानों पर देश की बुराई करते हैं या दूसरे देशों से हीन तुलना करते हैं, तो हम देश के ‘शक्ति-बोध’ को चोट पहुँचाते हैं। लेखक कर्ण के सारथी ‘शल्य’ का उदाहरण देते हैं, जिसने बार-बार अर्जुन की प्रशंसा कर कर्ण के आत्मविश्वास में दरार पैदा कर दी थी। इसी तरह हमें भी अपने कार्यों से देश का मानसिक बल नहीं घटाना चाहिए।

सौंदर्य-बोध (Sense of Aesthetics) – रास्ते में छिलके फेंकना, गंदगी फैलाना, अशिष्ट भाषा का प्रयोग करना या सार्वजनिक स्थानों पर थूकना आदि ये सब देश के ‘सौंदर्य-बोध’ और संस्कृति पर आघात हैं। एक अनुशासित नागरिक ही देश को सुंदर और सुसंस्कृत बनाता है।

  1. चुनाव – श्रेष्ठता की अंतिम कसौटी

लेखक के अनुसार, किसी देश की उच्चता या हीनता को मापने का सबसे बड़ा पैमाना ‘चुनाव’ है।

जिस देश के नागरिक नारों या गलत प्रभाव में आए बिना, विवेक से सही व्यक्ति को मत (Vote) देते हैं, वह देश उच्च है।

मत देना नागरिक का कर्तव्य है और सही व्यक्ति को चुनना उसका अधिकार।

निष्कर्ष 

निबंध का मूल संदेश यह है कि राष्ट्र का सम्मान किसी एक महापुरुष की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उसके करोड़ों साधारण नागरिकों के छोटे-छोटे व्यवहारों पर टिका होता है। यदि हम अपने दैनिक जीवन में अनुशासन, स्वच्छता और सकारात्मकता अपनाते हैं, तो हम वास्तव में अपने देश की सेवा कर रहे होते हैं।

 

मैं और मेरा देश‘ – विशेषताएँ

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ के निबंध ‘मैं और मेरा देश’ की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं –

  1. व्यक्ति और राष्ट्र की अभिन्नता

इस निबंध का सबसे मुख्य बिंदु यह है कि नागरिक और देश दो अलग चीजें नहीं हैं। लेखक के अनुसार, “मैं अपना देश हूँ” – अर्थात् एक नागरिक का सम्मान और अपमान सीधे उसके देश के सम्मान और अपमान से जुड़ा होता है।

  1. भावना का महत्त्व (कार्य की विशालता नहीं)

लेखक का मानना है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि उसके पीछे की ‘भावना’ उसे महान बनाती है। कमालपाशा और पंडित नेहरू के उदाहरण इसी सत्य को पुष्ट करते हैं।

  1. व्यक्तिगत उत्तरदायित्व

लेखक ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता’ वाली कहावत को गलत सिद्ध करते हैं। वे जापानी युवक के उदाहरण से बताते हैं कि एक साधारण नागरिक का छोटा-सा सही या गलत काम पूरे विश्व में उसके देश की छवि बना या बिगाड़ सकता है।

  1. शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध

निबंध नागरिकता के दो अनिवार्य पहलुओं पर जोर देता है –

शक्ति-बोध – अपने देश की हीन तुलना दूसरों से न करना और देश का मनोबल न गिराना।

सौंदर्य-बोध – सार्वजनिक स्थानों पर स्वच्छता रखना, शिष्टाचार का पालन करना और कुरुचिपूर्ण कार्यों से बचना।

  1. मानसिक भूकंपका विचार

लेखक लाला लाजपत राय के उदाहरण से बताते हैं कि जब तक हमारा देश पराधीन या हीन है, तब तक हमारी व्यक्तिगत उपलब्धियाँ अधूरी हैं। यह बोध मनुष्य के भीतर एक वैचारिक क्रांति या ‘भूकंप’ पैदा करता है।

  1. जागरूक मतदान

लेखक ने लोकतंत्र में चुनाव को देश की श्रेष्ठता की कसौटी माना है। एक जागरूक नागरिक वही है जो नारों के बहकावे में आए बिना विवेकपूर्ण तरीके से मतदान करता है।

  1. सरल और प्रभावी भाषा

निबंध की भाषा सरल, संवादात्मक और प्रेरणादायक है। लेखक ने गंभीर दार्शनिक बातों को छोटी-छोटी कहानियों और उदाहरणों के माध्यम से बहुत सहज बना दिया है।

अभ्यास

रचना से संवाद

मेरे उत्तर मेरे तर्क

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

  1. एक दिन आनंद की इस दीवार में दरार पड़ गई”, इस पंक्ति में रेखांकित शब्द दरारकिस ओर संकेत करता है?

(क) पूर्णता के भाव की तुष्टि

(ख) पारस्परिक संबंध टूटने की स्थिति

(ग) पूर्णता के भाव पर प्रहार

(घ) सुख-सुविधाओं का अभाव

उत्तर – (ग) पूर्णता के भाव पर प्रहार

लेखक को पहले लगता था कि उनका घर, पड़ोस और नगर ही उनकी दुनिया की पूर्णता है। लाला लाजपत राय के अनुभव ने इस भ्रम को तोड़ दिया और उन्हें अहसास कराया कि देश की हीनता उनकी पूर्णता पर एक प्रहार है।

  1. निबंध में कहा गया है कि “ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में एक अपूर्व आनंद आता है।” लेखक को किस तरह के प्रश्नों का उत्तर देने में आनंद की अनुभूति होती है?

(क) बात को विस्तार देने वाले प्रश्नों का

(ख) बात का निष्कर्ष प्रस्तुत करने वाले प्रश्नों का

(ग) बिना किसी संदर्भ के पूछे गए प्रश्नों का

(घ) किसी की समझ का आकलन करने वाले प्रश्नों का

उत्तर – (क) बात को विस्तार देने वाले प्रश्नों का

लेखक का मानना है कि जो प्रश्न ‘बात को खिलने’ और ‘आगे बढ़ने’ का अवसर देते हैं, उनका उत्तर देना सुखद होता है क्योंकि वे चिंतन की नई दिशाएँ खोलते हैं।

  1. अपने महान राष्ट्र की पराधीनता के दीन दिनों में जिन लोगों ने अपने रक्त से गौरव के दीपक जलाए”, इस वाक्य में पराधीनता के दिनों को दीन कहा गया है क्योंकि पराधीन भारत में__

(क) भोजन, आवास और वस्त्र जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव था।

(ख) लोगों के आत्मसम्मान और गौरव की भावना का दमन होता था।

(ग) महत्त्वपूर्ण निर्णय लेने की स्वतंत्रता थी।

(घ) धार्मिक रीति-रिवाजों को मनाने पर रोक लगाई जाती थी।

उत्तर – (ख) लोगों के आत्मसम्मान और गौरव की भावना का दमन होता था।

‘दीन’ शब्द का अर्थ है असहाय या गरीब। गुलामी के दिनों में भारतीय आर्थिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक और आत्मिक रूप से भी हीन महसूस करते थे क्योंकि उनका सम्मान अंग्रेजों के अधीन था।

  1. निबंध के अनुसार मनुष्य साधन-संपन्न होते हुए भी गौरव का अनुभव नहीं कर सकते यदि-

(क) उन्हें विदेश भ्रमण के अवसर न मिलें।

(ख) उनका देश किसी दूसरे देश के अधीन हो।

(ग) उनके नगर की शासन प्रणाली कमजोर हो।

(घ) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन होता हो।

उत्तर – (ख) उनका देश किसी दूसरे देश के अधीन हो।

लाला लाजपत राय के उदाहरण से स्पष्ट है कि कोई व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से कितना भी समृद्ध हो जाए, यदि उसका देश गुलाम है, तो उसे विश्व में वह गौरव और सम्मान नहीं मिल सकता जिसका वह हकदार है।

  1. पर उन दो घटनाओं में वह गाँठ इतनी साफ है”. इस वाक्य में रेखांकित शब्द गाँठकिन दो बातों को साथ बाँधती है?

(क) देश और नागरिक

(ख) देश और संविधान

(ग) देश और विदेश

(घ) व्यवसाय और आजीविका

उत्तर – (क) देश और नागरिक

‘गाँठ’ का अर्थ है अटूट जुड़ाव। लेखक ने दो घटनाओं (जापानी युवक और अपराधी छात्र) के माध्यम से दिखाया है कि नागरिक का हर छोटा-बड़ा काम देश की प्रतिष्ठा से बंधा होता है।

  1. प्रस्तुत निबंध में मुख्यतः कौन-सा भाव व्यक्त हुआ है?

(क) लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था

(ख) पारिवारिक संबंधों का महत्त्व

(ग) व्यक्ति और देश का अंतर्संबंध

(घ) देश का महत्त्व और व्यक्ति की उपेक्षा

उत्तर – (ग) व्यक्ति और देश का अंतर्संबंध

यह निबंध पूरी तरह से इस बात पर केंद्रित है कि एक व्यक्ति का आचरण उसके देश को कैसे प्रभावित करता है और देश की स्थिति का व्यक्ति के आत्मसम्मान पर क्या प्रभाव पड़ता है।

 

मेरी समझ मेरे विचार

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-

  1. स्वामी रामतीर्थ फल देने वाले युवक का उत्तर सुनकर मुग्ध क्यों हो गए?

उत्तर – स्वामी रामतीर्थ उस जापानी युवक का उत्तर सुनकर इसलिए मुग्ध हो गए क्योंकि उस युवक ने फल देने के बदले पैसे नहीं माँगे, बल्कि अपने देश का सम्मान माँगा। युवक का यह निस्वार्थ भाव कि “आप अपने देश जाकर यह न कहिएगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते”, उसकी गहरी देशभक्ति और राष्ट्र के प्रति जागरूकता को दर्शाता है।

  1. जापान के युवक ने स्वामी रामतीर्थ को दिए गए फलों के मूल्य के रूप में क्या माँगा? आपके मन में उस युवक के व्यक्तित्व की कौन-सी छवि उभरती है, यह भी लिखिए।

उत्तर – जापान के युवक ने स्वामी रामतीर्थ को दिए गए फलों के मूल्य के रूप में केवल यह माँगा कि स्वामी जी अपने देश भारत जाकर यह कहकर जापान की बुराई न करें कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते। मेरे मन में उस युवक की छवि एक ‘सच्चे राष्ट्रभक्त’ और ‘जागरूक नागरिक’ के रूप में उभरती है। वह यह समझता है कि उसके एक छोटे से प्रयास से उसके देश की वैश्विक छवि सुधर सकती है। वह मेहनती, विनम्र और चतुर है जो जानता है कि देश का गौरव धन से कहीं अधिक कीमती है।

  1. बात यह है कि मैं और मेरा देश दो अलग चीज तो हैं ही नहीं।” स्वयं को देश से अलग न मानने के पीछे क्या तर्क हो सकते हैं, उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – स्वयं को देश से अलग न मानने के पीछे के तर्क हैं कि जब हम विदेश जाते हैं, तो हमारी पहचान हमारे नाम से बाद में, हमारे देश से पहले होती है। यदि देश का सम्मान बढ़ता है, तो हमारा सिर खुद-ब-खुद ऊँचा हो जाता है। उत्तरदायित्वों का निर्वहन करना, जैसे- हमारे शरीर का एक अंग सही से काम न करे तो पूरा शरीर अस्वस्थ महसूस करता है, वैसे ही एक नागरिक का बुरा आचरण पूरे देश को कलंकित करता है। उदाहरण के तौर पर यदि कोई खिलाड़ी ओलंपिक में पदक जीतता है, तो वह केवल उसकी व्यक्तिगत जीत नहीं होती, पूरे देश का राष्ट्रगान बजता है और तिरंगा लहराता है। इसके विपरीत, यदि कोई नागरिक विदेश में गंदगी फैलाता है या कानून तोड़ता है, तो लोग उसे नहीं बल्कि उसके देश को बुरा कहते हैं जैसा कि पाठ में अपराधी छात्र के मामले में हुआ।

 

मेरे अनुभव मेरे विचार

  1. देश की हीनता और गौरव का ही फल उसे नहीं मिलता, उसकी हीनता और गौरव का फल भी उसके देश को मिलता है”, अपने आस-पास के विभिन्न उदाहरणों के द्वारा इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – देश की पहचान उसके नागरिकों से होती है। जैसे जब नीरज चोपड़ा स्वर्ण पदक जीतते हैं, तो पूरे भारत का गौरव बढ़ता है। इसके विपरीत, यदि कोई भारतीय विदेश में यातायात नियमों का उल्लंघन करता है, तो पूरे देश की छवि ‘अनुशासनहीन’ बनती है। यह सिद्ध करता है कि नागरिक का आचरण देश के सम्मान का दर्पण है।

  1. मुझे बहुतों की अपने लिए जरूरत पड़ती थी। मैं भी बहुतों की जरूरत का उनके लिए जवाब था।”

(क) प्रातः काल से लेकर रात्रि तक आप अपने किन-किन कार्यों में किस-किसका क्या सहयोग लेते हैं और आप दूसरों को किस तरह का सहयोग देते हैं? अपने अनुभव लिखिए।

उत्तर – सुबह दूधवाले और सफाईकर्मी से सहयोग लेते हैं, तो स्कूल में सहपाठियों की मदद करते हैं।

(ख) उपर्युक्त वाक्य में रेखांकित शब्द बहुतोंमें कौन-कौन सम्मिलित होंगे, अनुमान के आधार पर लिखिए।

उत्तर – ‘बहुतों’ में किसान, डॉक्टर, सफाईकर्मी, शिक्षक और दुकानदार जैसे सभी समाज के अंग शामिल हैं।

(ग) रचनाकार को स्वयं के लिए दूसरे लोगों से किस प्रकार के सहयोग की आवश्यकता पड़ती होगी और वह दूसरों को किस प्रकार का सहयोग देता होगा, अनुमान के आधार पर लिखिए

उत्तर – रचनाकार को प्रकाशक और पाठकों का सहयोग चाहिए, जबकि वह अपने विचारों से समाज को मार्गदर्शन और प्रेरणा देता है।

  1. सुना नहीं आपने कि जीवन एक युद्ध है और युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता।”

(क) उपर्युक्त वाक्य के रेखांकित अंश “युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता” के आधार पर लिखिए कि देश की प्रगति, विकास एवं सुरक्षा के प्रति हम सभी के क्या-क्या दायित्व हैं? अपने उत्तर को विस्तार देने के लिए अपने घर या पास-पड़ोस के बड़ों और अध्यापक से चर्चा करके लिखिए।

उत्तर – देश की सुरक्षा केवल सैनिक नहीं करते; ईमानदारी से टैक्स भरना, संसाधनों की बचत और अफवाहें न फैलाना भी हमारे नागरिक दायित्व हैं।

(ख) अपने पास-पड़ोस में विचरने वाले पशु-पक्षियों की जीवनचर्या का अवलोकन कीजिए और अपने अवलोकन के आधार पर लिखिए कि आप उनके संघर्षों को किस रूप में देखते हैं?

(संकेत- आप अपनी पाठ्यपुस्तक में दी गई कहानी दो बैलों की कथा के मुख्य पात्रों के अनुभवों को भी आधार बना सकते हैं।)

उत्तर – पशु-पक्षी भोजन और सुरक्षा के लिए निरंतर संघर्ष करते हैं। जैसे ‘दो बैलों की कथा’ में हीरा-मोती ने आजादी के लिए प्राणों की बाजी लगाई, वैसे ही हर जीव अस्तित्व, भोजन और सुरक्षा के लिए लड़ता है।

(ग) इस निबंध में जीवन को युद्ध क्यों कहा गया है? आप अपने घर के बड़ों से इस विषय पर चर्चा करके उनके और अपने विचार लिखिए।

उत्तर – जीवन चुनौतियों का नाम है। बड़ों के अनुसार, हर दिन बाधाओं को पार करना और सिद्धांतों पर टिके रहते हुए अपनी और देश की प्रगति के लिए प्रयासरत् रहना ही युद्ध है।

(घ) देश की भौगोलिक सीमाओं की रक्षा सैनिक करते हैं। इसी तरह हमारे आस-पास हमारे जीवन को बेहतर बनाने के लिए अनेक लोग कार्यरत हैं। ये कौन-कौन लोग हैं और उनके लिए आप क्या – क्या कर सकते हैं?

उत्तर – सफाईकर्मी, पुलिस और डॉक्टर हमारे जीवन को बेहतर बनाते हैं। हम इनके कार्यों में बाधा न डालकर, इनका आवश्यकतानुसार सहयोग करके, समाज में इनकी अहमियत कायम करके उनका सम्मान कर उनकी मदद कर सकते हैं।

  1. अपने पड़ोस में खेलकर, पड़ोसियों की ममता-दुलार पा, बड़ा हुआ था।”

(क) उपर्युक्त पंक्ति के आधार पर लिखिए कि पास-पड़ोस के लोगों में किस तरह के पारस्परिक संबंध रहे होंगे?

उत्तर – पुराने समय में पड़ोस एक विस्तारित परिवार की तरह था, जहाँ आपसी दुख-सुख साझा किए जाते थे। ये पास-पड़ोस के लोगों से ही हमारा व्यक्तित्व भी गठित होता था।

(ख) वर्तमान समय में ऐसे संबंधों में किस तरह के परिवर्तन आए हैं और इनके क्या कारण हो सकते हैं? लिखिए।

उत्तर – आधुनिक समय में तकनीक और भागदौड़ के कारण ‘निजता’ बढ़ी है, जिससे संवाद कम हुआ है और संबंधों में औपचारिकता आई है।

  1. क्या सुरुचि और सौंदर्य को आपके किसी काम से ठेस लगती है?” अपने घर / विद्यालय आस-पास, सार्वजनिक संसाधनों और ऐतिहासिक महत्त्व के स्थानों की स्वच्छता एवं सौंदर्य को बनाए रखने के लिए आप और आपके सहपाठी, संबंधी क्या-क्या करते हैं?

उत्तर – हम ऐतिहासिक स्थानों पर गंदगी नहीं फैलाते, दीवारों पर नाम नहीं लिखते और सार्वजनिक संपत्ति को अपना मानकर उसकी सुरक्षा करते हैं। विद्यालय में वृक्षारोपण, श्रमदान, जागरूकता फैलाने हेतु प्रभात फेरि और कचरा प्रबंधन हमारी दिनचर्या का हिस्सा है।

  1. मैं कोई ऐसा काम न करूँ जिससे मेरे देश की स्वतंत्रता को, दूसरे शब्दों में, उसके सम्मान को धक्का पहुँचे।” देश के सम्मान को धक्का न पहुँचे, इसके लिए क्या करें और क्या नहीं करें? अपने-अपने समूह में इसकी चर्चा कीजिए और चर्चा से उभरे बिंदुओं को प्रातः कालीन सभा में पढ़कर सुनाइए।

उत्तर – क्या करें – नियम-कानूनों का पालन करें, तिरंगे का सम्मान करें, समझदारी से मतदान करें और स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा दें।

क्या न करें – सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान न पहुँचाएँ, रिश्वत न दें/लें और विदेशों में जाकर देश की बुराई न करें।

मेरे प्रश्न

ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में एक अपूर्व आनंद आता है”

निबंध के उपर्युक्त संदर्भ से आपके लिए दो प्रश्न बनाए गए हैं.

(क) रचनाकार को किस तरह के प्रश्नों का उत्तर देने में आनंद आता है?

(ख) आपको किस तरह के प्रश्नों को बूझना रोचक लगता है?

अब इस निबंध के आलोक में नीचे दी गई सामग्री को पढ़कर तीन प्रश्न बनाइए और लिखिए।

यह सोचना एकदम निराधार है कि केवल संपन्न व्यक्ति ही देश की प्रगति और विकास में योगदान है सकते हैं। देश की सुरक्षा का विषय हो अथवा ऐश्वर्य व संपन्नता का, सभी नागरिकों का अपनी ही तरह से योगदान होता है। हम सब नागरिक अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। हम यदि कुछ भी गलत करते हैं तो उससे अपनी छवि ही धूमिल नहीं होती अपितु अपने देश की छवि पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

तीन प्रश्न

  1. क्या देश की प्रगति और विकास का उत्तरदायित्व केवल साधन-संपन्न व्यक्तियों का है? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
  2. “हम सब नागरिक अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हैं” – इस कथन के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि एक व्यक्ति का आचरण पूरे देश की छवि को कैसे प्रभावित करता है?
  3. यदि कोई नागरिक सार्वजनिक नियमों का उल्लंघन या कोई गलत कार्य करता है, तो उसका असर केवल उसकी व्यक्तिगत छवि तक सीमित क्यों नहीं रहता?

विधा से संवाद

आपने अब तक अपनी पाठ्यपुस्तकों और अन्य पुस्तकों में बहुत से निबंध पढ़े होंगे और लिखे भी होंगे। निबंध लिखने से पहले किस तरह की तैयारी करते हैं? आइए, इस विधा से संबंधित कुछ विचार-विमर्श करते हैं—

  1. ‘निबंध’ का शाब्दिक अर्थ है— ‘बाँधना’ (नि+बंध)। अर्थात भली-भाँति बँधा या गठा हुआ। यह गद्य की वह विधा है जिसमें रचनाकार किसी विषय पर अपने अनुभव, विचार, दृष्टिकोण और भावनाओं को तार्किक, भावनात्मक, क्रमबद्ध और साहित्यिक रूप से प्रस्तुत करते हैं। एक विधा के रूप में निबंध की कुछ विशेषताओं को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है—

निबंध –

  1. विषय-केंद्रीयता

पूरा निबंध एक ही केंद्रीय विचार पर टिका है – ‘नागरिक का आचरण और देश का सम्मान’। लेखक आदि से अंत तक इसी बात को पुष्ट करते हैं कि व्यक्ति और देश एक-दूसरे के पूरक हैं।

  1. वैयक्तिकता

निबंधकार ने अपने निजी अनुभवों और सोच को इसमें पिरोया है।

उदाहरण – “मैं सोचा करता था कि मेरी मनुष्यता में अब कोई अपूर्णता नहीं रही… एक दिन आनंद की इस दीवार में एक दरार पड़ गई।” यहाँ लेखक ‘मैं’ के माध्यम से अपनी वैचारिक यात्रा साझा कर रहे हैं।

  1. विचार प्रधानता एवं भावनात्मकता

इसमें विचारों की गंभीरता के साथ-साथ भावनाओं का भी संतुलन है।

उदाहरण – लाला लाजपत राय के ‘गुलामी के कलंक’ वाले अनुभव को लेखक ने अत्यंत भावनात्मक रूप से प्रस्तुत किया है, जो पाठक के मन में देश के प्रति वेदना और जिम्मेदारी जगाता है।

  1. साहित्यिक सौंदर्य

लेखक ने भाषा को अलंकृत और सुंदर बनाया है।

उदाहरण – “दीवार में दरार पड़ना”, “गौरव के दीपक जलाना”, “अपूर्णता की कसक” जैसे मुहावरेदार प्रयोग निबंध के साहित्यिक स्तर को ऊँचा उठाते हैं।

  1. सजीवता/चित्रात्मकता

लेखक कहानियों और दृश्यों के माध्यम से बात को सजीव कर देते हैं।

उदाहरण – जापानी युवक का फलों की टोकरी लेकर दौड़ना या किसान द्वारा रंगीन सुतलियों से बुनी खाट को कंधे पर रखकर नेहरू जी के पास ले जाना—ये दृश्य पाठक की आँखों के सामने चित्र की तरह उभरते हैं।

  1. तार्किकता

लेखक केवल उपदेश नहीं देते, बल्कि तर्क देते हैं।

उदाहरण – जब वे कहते हैं कि “युद्ध में जय बोलने वालों का भी महत्त्व है”, तो वे खेल के मैदान में दर्शकों की तालियों का उदाहरण देकर अपनी बात को तार्किक रूप से सिद्ध करते हैं।

  1. संक्षिप्तता और स्पष्टता

गंभीर बातों को छोटे और स्पष्ट वाक्यों में कहना उनकी विशेषता है।

उदाहरण – “महत्त्व किसी कार्य की विशालता में नहीं है, उस कार्य के करने की भावना में है।” यह एक वाक्य पूरे निबंध के सार को स्पष्ट कर देता है।

  1. प्रेरणात्मकता

निबंध का मुख्य उद्देश्य पाठक को एक श्रेष्ठ नागरिक बनने के लिए प्रेरित करना है।

उदाहरण – अंत में ‘शक्ति-बोध’ और ‘सौंदर्य-बोध’ की चर्चा करना पाठक को अपने दैनिक व्यवहार को सुधारने की सीधी प्रेरणा देता है।

 

  1. क्या कोई भूकंप आया था, जिससे दीवार में दरार पड़ गई?

बड़े महत्त्व का प्रश्न है। इस अर्थ में भी कि यह बात को खिलने का, आगे बढ़ने का अवसर देता है और इस अर्थ में भी कि ठीक समय पर पूछा गया है। ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में एक अपूर्व आनंद आता है, तो उत्तर यह है आपके प्रश्न का…”

निबंध के उपर्युक्त अंश को ध्यान से देखिए। इसकी पहली पंक्ति में एक प्रश्न है और बाद के अंश में उसका उत्तर दिया गया है। आपने ध्यान दिया होगा कि यह पूरा निबंध इसी तरह की प्रश्नोत्तर शैली में लिखा गया है। यह प्रश्नोत्तर या संवादात्मक शैली इस निबंध की संरचना को विशेष बनाती है। इसी तरह की और भी अन्य विशेषताएँ इस निबंध में से छाँटकर लिखिए।

उत्तर – प्रश्नोत्तर शैली के अतिरिक्त इस निबंध में दृष्टांत शैली का सुंदर प्रयोग है, जहाँ जापानी युवक और कमालपाशा जैसी कहानियों से गंभीर बात समझाई गई है। सूक्तिपरक वाक्यों जैसे – “महत्त्व भावना में है” का प्रयोग विषय को स्पष्टता देता है। साथ ही, संबोधनात्मक शैली जैसे – अजी, भाई! पाठक से सीधा संवाद स्थापित कर उसे विषय से जोड़े रखती है, जिससे निबंध जीवंत बन पड़ा है।

  1. नीचे कुछ विषय दिए गए हैं, आप इनमें से किन विषयों पर निबंध लिखना चाहेंगे, कारण सहित लिखिए-

मेरा भारत मेरा गौरव

चाँद के साथ गपशप

जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि

गागर में सागर

यथा नाम तथा गुण

दूध का दूध और पानी का पानी

मैं ‘गागर में सागर’ पर निबंध लिखना चाहूँगा। कारण यह है कि यह विषय कम शब्दों में गूढ़ अर्थ व्यक्त करने की कला सिखाता है, जो आज के भागदौड़ भरे युग में अत्यंत प्रासंगिक है। इसके माध्यम से मैं भाषा की शक्ति और संक्षिप्तता के महत्त्व को तार्किक व रचनात्मक ढंग से प्रस्तुत कर सकता हूँ।

 

विषयों से संवाद

चुनाव एवं आपके अनुभव

क्या कोई ऐसी कसौटी भी बनाई जा सकती है, जिससे देश के नागरिकों को आधार बनाकर देश की उच्चता और हीनता को हम तोल सकें?”

रचनाकार के अनुसार इस प्रश्न का उत्तर है- निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया।

  1. जब कोई चुनाव प्रक्रिया आपके क्षेत्र में शुरू होती है तो किस तरह की गतिविधियाँ होती हैं?

उत्तर – चुनाव के दौरान क्षेत्र में रैलियों, सभाओं, पोस्टर-बैनर और लाउडस्पीकर द्वारा प्रचार की सरगर्मी बढ़ जाती है। घर-घर जाकर जनसंपर्क किया जाता है।

 

  1. जब भी कोई चुनाव हो, ठीक मनुष्य को अपना मत दें”, आपके विचार से एक अच्छे उम्मीदवार में क्या-क्या गुण होने चाहिए?

उत्तर – मेरे विचार से एक अच्छे उम्मीदवार में निम्नलिखित गुण होने चाहिए –

ईमानदारी और नैतिकता – वह भ्रष्टाचार मुक्त और स्वच्छ छवि वाला हो।

सेवा भाव – उम्मीदवार का मुख्य लक्ष्य व्यक्तिगत लाभ के बजाय जनहित होना चाहिए।

शिक्षित और जागरूक – वह क्षेत्र की समस्याओं और देश की नीतियों को समझने की क्षमता रखता हो।

विवेकशीलता – वह संकुचित नारों या जाति-धर्म के बजाय विकास के मुद्दों पर बात करे।

  1. चुनाव से जुड़ा अपना कोई अनुभव लिखिए।

(संकेत- विद्यालय में कक्षा प्रतिनिधि का चुनाव)

उत्तर – कक्षा प्रतिनिधि (Class Monitor) के चुनाव के समय विद्यालय में लोकतंत्र का छोटा रूप देखने को मिलता है। एक बार जब मैं उम्मीदवार था, तो मैंने देखा कि सहपाठी केवल मित्रता के आधार पर वोट देना चाहते थे। तब मैंने उन्हें समझाया कि मित्रता अपनी जगह है, लेकिन जो अनुशासन बनाए रख सके और शिक्षक तक हमारी बात सही ढंग से पहुँचा सके, उसे ही चुनना चाहिए। उस दिन मैंने सीखा कि सही चुनाव ही सामूहिक प्रगति का आधार है।

  1. यदि आप किसी सभा, क्लब आदि के चुनाव में उम्मीदवार हों तो आपके क्या-क्या मुद्दे होंगे?

उत्तर – यदि मैं किसी सभा या क्लब का उम्मीदवार होता, तो मेरे मुख्य मुद्दे होते –

पारदर्शिता – क्लब के फंड और निर्णयों की जानकारी सभी सदस्यों को देना।

समावेशिता – हर सदस्य के सुझाव को महत्त्व देना और चर्चा के बाद निर्णय लेना।

नवाचार – नई गतिविधियों और रचनात्मक कार्यक्रमों को बढ़ावा देना।

 

अधिकार और कर्तव्य

इस निबंध में किसी भी स्वतंत्र देश में नागरिक के अधिकार और उसके कर्तव्य की बात की गई है। आपकी पाठ्यपुस्तक के प्रारंभिक पृष्ठ पर भारतीय संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकार और कर्तव्य दिए गए हैं। उसे पढ़कर अपनी कक्षा में चर्चा कीजिए।

उत्तर – निबंध के अनुसार, अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

मौलिक अधिकार – संविधान हमें समानता, स्वतंत्रता और शोषण के विरुद्ध अधिकार देता है। ये हमें एक गरिमापूर्ण जीवन जीने और स्वतंत्र अभिव्यक्ति जैसे – चुनाव में मत देना की शक्ति प्रदान करते हैं।

मौलिक कर्तव्य – अधिकार तभी सुरक्षित रह सकते हैं जब हम अपने कर्तव्यों का पालन करें। देश की एकता, अखंडता की रक्षा करना, सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखना और भाईचारा बनाए रखना हमारे अनिवार्य कर्तव्य हैं।

चर्चा का निष्कर्ष –

निबंध हमें सिखाता है कि “मेरा मत लिए बिना कोई कुरसी पर न बैठ सके” यह हमारा अधिकार है, लेकिन “सही प्रार्थी को मत देना” हमारा कर्तव्य है। जब हम अधिकारों का प्रयोग कर्तव्यों के बोध के साथ करते हैं, तभी देश ‘उच्च’ बनता है।

सृजन

हमारा पुस्तकालय

आप अपने विद्यालय एवं सार्वजनिक पुस्तकालय में जाते हैं। हो सकता है, आपको कभी कोई पुस्तक फटी हुई मिली हो या उसमें से कुछ पृष्ठ गायब हों अथवा उसमें पेन से निशान लगे हों

  • ऐसा होने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?

उत्तर – पुस्तकों के फटने या पृष्ठ गायब होने के मुख्य कारण नागरिक बोध की कमी और अनुशासनहीनता है। कुछ लोग निजी स्वार्थ के लिए महत्वपूर्ण जानकारी या चित्र काट लेते हैं, जबकि कुछ लोग इसे अपनी संपत्ति न मानकर लापरवाही से इस्तेमाल करते हैं।

  • ऐसा न हो, इसके लिए क्या किया जा सकता है?

उत्तर – जागरूकता – पुस्तकालय में ‘पुस्तकों की सुरक्षा’ से संबंधित प्रेरणादायक पोस्टर लगाए जाएँ।

निरीक्षण – पुस्तक जारी करने (Issue) और जमा करने (Return) के समय पुस्तकालयाध्यक्ष द्वारा पन्नों की गहन जाँच की जाए।

जुर्माना – जानबूझकर पुस्तक खराब करने वालों पर उचित दंड या जुर्माना लगाया जाए।

  • आप पुस्तकालय में किन नियमों का पालन करते हैं, उन नियमों का पालन करना क्यों अनिवार्य है? इस पर अपनी कक्षा में चर्चा कीजिए और लिखिए।

उत्तर – मैं पुस्तकालय में निम्नलिखित नियमों का पालन करता हूँ –

पूर्ण शांति बनाए रखना – ताकि दूसरों की एकाग्रता भंग न हो।

पुस्तकों पर न लिखना – ताकि अगले पाठक को पढ़ने में असुविधा न हो।

समय पर पुस्तक लौटाना – ताकि अन्य जरूरतमंद विद्यार्थियों को भी पढ़ने का अवसर मिले।

अनिवार्यता – इन नियमों का पालन करना इसलिए अनिवार्य है क्योंकि पुस्तकालय एक साझा संसाधन है। यदि हम आज पुस्तक की रक्षा करेंगे, तभी वह आने वाली पीढ़ी के लिए ज्ञान का स्रोत बनी रह सकेगी। यह हमारे देश के ‘सौंदर्य-बोध’ और ‘सुरुचि’ का परिचायक है।

 

ब्रेल लिपि में पुस्तकें

आपके विद्यालय में रोचक पुस्तकों का भंडार है परंतु आपके ‘दृष्टिबाधित’ सहपाठी स्वयं पढ़कर इनका आनंद नहीं उठा पाते हैं। प्रधानाध्यापक को ब्रेल लिपि में पुस्तकें मँगवाने के संदर्भ में पत्र लिखिए।

दिनांक – 4 नवंबर, 20XX

सेवा में,

प्रधानाध्यापक महोदय,

डीएवी पब्लिक स्कूल, बोलानी,

केंदुझर

विषय – विद्यालय पुस्तकालय में ब्रेल लिपि की पुस्तकें उपलब्ध कराने हेतु।

महोदय,

सविनय निवेदन है कि मैं अविनाश रंजन गुप्ता, इस विद्यालय की कक्षा दसवीं ‘ब’ का एक अनुशासित छात्र हूँ। हमारे विद्यालय का पुस्तकालय ज्ञान और रोचक पुस्तकों के भंडार से समृद्ध है, जिसका लाभ हम सभी विद्यार्थी उठाते हैं। किंतु, अत्यंत खेद का विषय है कि हमारे कुछ ‘दृष्टिबाधित’ सहपाठी इन पुस्तकों का स्वयं पढ़कर आनंद नहीं उठा पाते हैं।

ज्ञान प्राप्त करना प्रत्येक विद्यार्थी का मौलिक अधिकार है। यदि हमारे पुस्तकालय में ब्रेल लिपि (Braille script) की कहानियाँ, महापुरुषों की जीवनियाँ और सहायक पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध हों, तो ये सहपाठी भी आत्मनिर्भर होकर शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे और मुख्यधारा से जुड़ सकेंगे।

अतः आपसे विनम्र प्रार्थना है कि समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पुस्तकालय में ब्रेल लिपि की पुस्तकें मँगवाने की कृपा करें। हम सभी विद्यार्थी इस पुनीत कार्य के लिए आपके अत्यंत आभारी रहेंगे।

सधन्यवाद।

आपका आज्ञाकारी शिष्य,

अविनाश रंजन गुप्ता

कक्षा – दसवीं ‘ब’

अनुक्रमांक – 03

 

कृतज्ञता ज्ञापन

“अपने महान राष्ट्र की पराधीनता के दीन दिनों में जिन लोगों ने अपने रक्त से गौरव के दीप जलाए …”

देश के विकास में सभी का सहयोग होता है जो सीमा पर तैनात हैं और जो देश के भीतर हैं, जैसे- अध्यापक, किसान, श्रमिक, कलाकार, वैज्ञानिक, अभियंता आदि। इन सभी के अमूल्य योगदान के लिए कृतज्ञता ज्ञापन तैयार करके लिखिए।

“देश केवल सीमाओं का नाम नहीं, बल्कि उन करोड़ों नागरिकों के सामूहिक परिश्रम का फल है जो इसे सींचते हैं।”

आज मैं उन सभी विभूतियों के प्रति अपना हृदय से आभार और कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ, जिनके निस्वार्थ योगदान से हमारा राष्ट्र प्रगति के पथ पर अग्रसर है।

सीमा पर तैनात सैनिकों को – जिन्होंने अपना आज हमारे सुखद ‘कल’ के लिए समर्पित कर दिया है। आपकी सजगता ही हमारी स्वतंत्रता की ढाल है।

किसानों को – ‘जय जवान-जय किसान’ के उद्घोष को चरितार्थ करते हुए, जो तपती धूप और कड़ाके की ठंड में देश का अन्न भंडार भरते हैं।

अध्यापकों को – जो भावी पीढ़ियों के चरित्र और विवेक का निर्माण कर राष्ट्र की नींव मज़बूत करते हैं।

वैज्ञानिकों और अभियंताओं को – जिनकी मेधा और नवाचार ने भारत को विश्व पटल पर तकनीकी और वैज्ञानिक शक्ति के रूप में स्थापित किया है।

श्रमिकों और कलाकारों को – जो अपने श्रम से देश का बुनियादी ढाँचा खड़ा करते हैं और अपनी कला से हमारी संस्कृति की धरोहर को जीवित रखते हैं।

आप सभी का योगदान अमूल्य है। यह कृतज्ञता ज्ञापन मात्र शब्दों का समूह नहीं, बल्कि आपके प्रति सवा सौ करोड़ भारतीयों के सम्मान और विश्वास का प्रतीक है।

हम आपके ऋणी हैं। जय हिंद!

 

विज्ञापन

“ठीक मनुष्य को अपना मत दें।”

उपर्युक्त पंक्ति में चुनाव में योग्य उम्मीदवार को चुनने का संदेश दिया गया है। आप भी चुनाव में योग्य उम्मीदवार को चुनने के लिए एक आकर्षक विज्ञापन तैयार कीजिए।

 

जागृत नागरिक, उज्ज्वल भविष्य!

“आपका एक सही ‘मत’, बदल सकता है देश की तक़दीर और तस्वीर।”

क्या आप अपने क्षेत्र में सच्चा विकास, ईमानदारी और स्वच्छ छवि चाहते हैं? तो इस बार भावनाओं में नहीं, विवेक से फैसला करें!

🌟 एक योग्य उम्मीदवार की पहचान

✅ शिक्षित और अनुभवी – जो समस्याओं को समझे और समाधान खोजे।

✅ ईमानदार छवि – जिसका दामन भ्रष्टाचार के दागों से पाक हो।

✅ सेवा भाव – जो कुर्सी के लिए नहीं, जनता की सेवा के लिए खड़ा हो।

✅ स्थानीय जुड़ाव – जो आपकी गली, आपके मोहल्ले की आवाज़ बन सके।

📢 याद रखें

न नारों से, न वादों से,

देश बनेगा योग्य उम्मीदवारों से!

जाति-पाति और लालच को कहें ‘ना’!

काम और काबिलियत को कहें ‘हाँ’!

📍 मतदान केंद्र पर ज़रूर जाएँ!

📅 तारीख – 12.08.20XX

⏰ समय – सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक

“मत देना आपका अधिकार है, सही को चुनना आपका कर्तव्य है।”

जनहित में जारी –

युवा मतदाता संघ

 

स्वच्छता और आचरण

“क्या आप कभी केला खाकर छिलका रास्ते में फेंकते हैं…

निबंध के इस अंश को पुन – पढ़िए। इस प्रकार के और कौन – कौन से आचरण हो सकते हैं जिनसे देश के सौंदर्य को आघात लगता है? इस विषय पर अपने अभिभावकों, सहपाठियों और शिक्षकों के साथ चर्चा कीजिए। (संकेत- ऐतिहासिक या सार्वजनिक स्थानों पर अपना नाम आदि लिखना।)

उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर शिक्षक की सहायता से पूरा करें।

 

भाषा से संवाद

व्याकरण की बात

संदर्भ में शब्द

नीचे लिखे वाक्यों पर ध्यान दीजिए—

  • एक दिन आनंद की इस दीवार में दरार पड़ गई।
  • क्या कोई भूकंप आया था, जिससे दीवार में दरार पड़ गई।

दीवार में पैदा हुई चटक/तरेड़ / फाँक/टूटन के लिए ‘दरार शब्द का प्रयोग करते हैं। भूकंप आने पर अथवा किसी भी प्रकार के तोड़-फोड़ का कार्य होने पर भवनों की छतों और दीवारों में दरार पड़ जाती है। इस शब्द का प्रयोग ऐसे भी किया जाता है-

वे बहुत अच्छे मित्र थे। न जाने ऐसा क्या हुआ कि उनके संबंधों में दरार पड़ गई।

भेदभाव की भावना सामाजिक एकता में दरार डालती है।

अब इसी प्रकार ‘गाँठ’ शब्द के प्रयोग पर ध्यान दीजिए—

  • “पर उन दो घटनाओं में वह गाँठ इतनी साफ है, जो नागरिक और देश को एक साथ बाँधती है”
  • माला गूँथते समय धागे के एक सिरे पर गाँठ बाँध दीजिए।

इसी प्रकार पानीशब्द का प्रयोग देखिए –

बहुत प्यास लगी है, पानी दीजिए।

जब उस लड़के की पुस्तक से पन्ने फाड़ने की बात सामने आई तो वह पानी-पानी हो गया।

इतनी अधिक वर्षा हुई कि चारों ओर पानी-पानी हो गया।

अब इनके कामों के बारे में और क्या कहा जाए, इनका तो पानी ही उतर चुका है।

अब अपनी पाठ्यपुस्तक में से ऐसे अन्य शब्द छाँटकर लिखिए जो संदर्भ के अनुसार भिन्न-भिन्न अर्थ देते हों।

  1. कर

हाथ – “कवि ने अपने कर कमलों से दीप प्रज्वलित किया।”

टैक्स (Tax) – “प्रत्येक जागरूक नागरिक को समय पर कर का भुगतान करना चाहिए।”

करना (क्रिया) – “अपना काम स्वयं करो।”

  1. हार

माला – “जापानी युवक ने स्वामी जी को फूलों का हार पहनाया।”

पराजय – “जीवन एक युद्ध है, जहाँ हमें हार से घबराना नहीं चाहिए।”

  1. उत्तर

जवाब – “लेखक को तार्किक प्रश्नों का उत्तर देने में आनंद आता है।”

दिशा – “हिमालय भारत की उत्तर दिशा में स्थित है।”

बाद का – “वैदिक काल के उत्तर भाग में कई परिवर्तन हुए।”

  1. फल

खाने वाला फल – “जापानी युवक टोकरी में ताजे फल लेकर आया।”

परिणाम (Result) – “हमारी हीनता का फल हमारे देश को भी मिलता है।”

  1. सोना

धातु (Gold) – “पिताजी अपने बच्चों को सोने पर सुहागा मानते थे।”

नींद/शयन (क्रिया) – “थकान के कारण वह जल्दी सो गया।”

  1. अर्थ

मतलब (Meaning) – “निबंध का अर्थ है—भली-भाँति बँधा हुआ।”

धन (Wealth) – “आज के युग में अर्थ व्यवस्था ही देश की शक्ति है।”

 

मिलते-जुलते भाव वाले शब्द-युग्म

“अपने पड़ोस में खेलकर, पड़ोसियों की ममता-दुलार पा, बड़ा हुआ था।”

“इस तरह एक मनुष्य से भरा-पूरा नगर बनकर मैं खड़ा हुआ था।”

पहले वाक्य में ‘ममता-दुलार’ और दूसरे वाक्य में ‘भरा-पूरा’ शब्द मिलता-जुलता भाव दे रहे हैं। ये शब्द-युग्म हैं। शब्द-युग्म प्राय – दो शब्दों के समूह होते हैं। ये कई प्रकार से बनते और बनाए जाते हैं। कभी अर्थ की दृष्टि से समान होते हैं, कभी उच्चारण की दृष्टि से समान होते हैं परंतु अर्थ में अंतर होता है, कभी विपरीत भाव भी देते हैं। इस प्रकार के शब्दों के प्रयोग से भाषा में सजीवता आती है।

आप इस निबंध में से मिलते-जुलते अर्थ वाले और पुनरुक्त (एक ही शब्द को फिर से कहना) शब्द-युग्म छाँटकर लिखिए।

ममता-दुलार (प्रेम और स्नेह)

घूम-फिरकर (भ्रमण करना)

ज्ञान-भंडार (विद्या का खजाना)

दया-प्रार्थना (विनती करना)

दाल-रोटी (जीविका/भोजन)

ऐश्वर्य-संपन्नता (सुख-सुविधाएँ)

प्रगति-विकास (आगे बढ़ना)

होटलों-धर्मशालाओं (ठहरने के स्थान)

अध्ययन-अनुभव (सीखना और महसूस करना)

 

शब्दों की कड़ियाँ / शृंखला

“मैं सोचा करता था कि मेरी मनुष्यता में अब कोई अपूर्णता नहीं रही।”

उपर्युक्त वाक्य के रेखांकित शब्द ‘अपूर्णता’ में उपसर्ग और प्रत्यय दोनों का ही प्रयोग चिह्नित किया गया है। इस प्रयोग को समझकर नीचे दिए गए शब्दों में उपसर्ग और प्रत्यय शब्द पहचानकर लिखिए-

अलौकिक, निरक्षरता, सम्मानित, अनावश्यक, अपमानित, अभिमानी

शब्द

उपसर्ग

मूल शब्द

प्रत्यय

अलौकिक

लोक

इक

निरक्षरता

निर्

अक्षर

ता

सम्मानित

सम्

मान

इत

अनावश्यक

अन्

आवश्यक

अपमानित

अप

मान

इत

अभिमानी

अभि

मान

 

गतिविधियाँ

‘देश मात्र एक भौगोलिक सीमा क्षेत्र नहीं है।’

इस विषय पर परिचर्चा का आयोजन कीजिए और परिचर्चा में उभरकर आए बिंदुओं की रिपोर्ट तैयार कीजिए। रिपोर्ट को पावर प्वांइट प्रस्तुतीकरण या चार्ट के माध्यम से कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।

छात्र इसे अपने स्तर पर पूरा करेंगे।

कठिन शब्दों के सरल अर्थ  

1 – अविभाज्य – जिसे अलग न किया जा सके – Indivisible

2 – अपूर्णता – कमी या अधूरापन – Incompleteness

3 – संगठित – व्यवस्थित या जुड़ा हुआ – Organized

4 – हीन – नीचा या तुच्छ – Inferior / Lowly

5 – अपील – प्रार्थना या गुहार – Appeal / Plea

6 – भूकंप – भूचाल (यहाँ वैचारिक हलचल) – Earthquake (Mental upheaval)

7 – तेजस्वी – प्रभावशाली / कांतिवान – Radiant / Illustrious

8 – पराधीनता – गुलामी – Slavery / Subjugation

9 – बवंडर – चक्रवात या तूफ़ान – Cyclone / Storm

10 – तेजस्विता – प्रखरता – Brilliance / Splendour

11 – अपूर्व – अनोखा / जो पहले न हुआ हो – Unprecedented / Unique

12 – लज्जा – शर्म – Shame / Bashfulness

13 – कलंक – दाग या लांछन – Stigma / Blemish

14 – गौरव – सम्मान या गर्व – Glory / Pride

15 – निजी – व्यक्तिगत – Personal / Private

16 – आविष्कार – नई खोज – Invention

17 – धनपति – बहुत अमीर व्यक्ति – Wealthy person / Magnate

18 – त्याग – छोड़ देना / बलिदान – Sacrifice / Renunciation

19 – उत्तेजना – जोश या सक्रियता – Excitement / Stimulation

20 – अज्ञान – जानकारी न होना – Ignorance

21 – बहुमुखी – जिसके कई पक्ष हों – Versatile / Multidimensional

22 – रसद – खाद्य सामग्री (युद्ध हेतु) – Provisions / Supplies

23 – साधारण – मामूली – Ordinary / Common

24 – साक्षी – गवाह – Witness

25 – छूमंतर – गायब हो जाना – Disappear / Vanish

26 – दुर्लभ – जो कठिनता से मिले – Rare / Scarce

27 – बरामद – खोज निकालना – Recovered / Seized

28 – लांछित – अपमानित करना – Insulted / Defamed

29 – विशालता – बड़ा होना – Magnanimity / Vastness

30 – निहाल – बहुत प्रसन्न – Overjoyed / Delighted

31 – सर्वोत्तम – सबसे अच्छा – Best / Supreme

32 – शक्ति-बोध – शक्ति का अहसास – Sense of power

33 – सौंदर्य-बोध – सुंदरता की समझ – Aesthetic sense

34 – कुरुचि – बुरी पसंद या अरुचि – Bad taste / Indelicacy

35 – ह्रास – गिरावट या कमी – Decline / Deterioration

36 – अजेयता – जिसे जीता न जा सके – Invincibility

37 – सघन – गहरा या घना – Dense / Intense

38 – आघात – चोट – Blow / Impact

39 – कसौटी – परखने का आधार – Criterion / Touchstone

40 – मत – वोट या राय – Vote / Opinion

41 – संचित – इकट्ठा किया हुआ – Accumulated

42 – अविभाज्य – अटूट – Inseparable

43 – मानस – मन या मस्तिष्क – Mind / Psyche

44 – मुग्ध – मोहित – Fascinated / Enchanted

45 – आग्रह – निवेदन या जोर देना – Insistence / Urging

46 – अमूल्य – कीमती – Priceless

47 – विवरण – विस्तार से जानकारी – Description / Detail

48 – अनुकूल – पक्ष में – Favourable / Compatible

49 – दशा – स्थिति – Condition / State

50 – निष्पक्ष – बिना भेदभाव के – Impartial / Unbiased

51 – उत्तेजक – भड़काने वाला – Provocative

52 – मस्तक – माथा – Forehead

53 – प्रांत – क्षेत्र – Province

54 – विश्राम – आराम – Rest

55 – हँडिया – मिट्टी का बर्तन – Small clay pot

56 – अविभाज्य – अभिन्न – Undivided

57 – संपर्क – जुड़ाव – Contact

58 – उपहार – भेंट – Gift

59 – संगठित – व्यवस्थित – Organized

60 – कलंक – धब्बा – Blot

61 – प्रशंसा – तारीफ – Praise

62 – विवेक – समझदारी – Wisdom

63 – सजग – सावधान – Alert

64 – आचरण – व्यवहार – Conduct

65 – प्रतिष्ठा – इज्जत – Reputation

66 – संस्कृति – सभ्यता – Culture

67 – अधिकार – हक – Right

68 – कर्तव्य – जिम्मेदारी – Duty

69 – विकास – प्रगति – Development

70 – नेतृत्व – अगुवाई – Leadership

71 – सशक्त – मजबूत – Powerful

72 – प्रवाह – बहाव – Flow

73 – दृष्टांत – उदाहरण – Illustration

74 – उद्देश्य – लक्ष्य – Objective

75 – प्रेरणा – प्रोत्साहन – Inspiration

76 – आंतरिक – भीतरी – Internal

77 – सार्वजनिक – सरकारी/सबका – Public

78 – ऐतिहासिक – इतिहास से जुड़ा – Historical

79 – स्वतंत्रता – आज़ादी – Freedom

80 – महत्त्व – उपयोगिता – Importance

81 – विद्वान – ज्ञानी – Scholar

82 – रचनाकार – लेखक – Author

83 – प्रक्रिया – विधि – Process

84 – उम्मीदवार – प्रत्याशी – Candidate

85 – अनुमान – अंदाजा – Estimation

86 – प्रतिनिधित्व – नुमाइंदगी – Representation

87 – नकारात्मक – बुरा – Negative

88 – सकारात्मक – अच्छा – Positive

89 – प्रभाव – असर – Influence

90 – उपयोग – इस्तेमाल – Use

91 – संपर्क – मेल-जोल – Connection

92 – समृद्ध – धनी – Prosperous

93 – उल्लेख – जिक्र – Mention

94 – धूमिल – धुंधला – Tarnished / Blurred

95 – विशिष्ट – खास – Specific

96 – संरचना – बनावट – Structure

97 – साहित्यिक – साहित्य संबंधी – Literary

98 – तार्किक – तर्कपूर्ण – Logical

99 – संवादात्मक – बातचीत जैसा – Conversational

100 – क्रमबद्ध – सिलसिलेवार – Systematic

101 – चित्रात्मकता – दृश्यों जैसा – Pictorial quality

102 – सजीवता – जीवंतता – Liveliness

103 – स्पष्टता – साफ़ होना – Clarity

104 – सुरुचि – अच्छी पसंद – Good taste

105 – अनुशासन – नियम पालन – Discipline

106 – परिमार्जित – शुद्ध/सुधरा हुआ – Refined

107 – कुरुचिपूर्ण – गंदा/भद्दा – Inelegant

108 – आघात – प्रहार – Blow

109 – स्थायित्व – टिकाऊपन – Stability

110 – वैयक्तिकता – निजीपन – Individuality

111 – अपरिहार्य – जिसे टाला न जा सके – Inevitable

112 – कृतज्ञता – आभार – Gratitude

113 – साधन-संपन्न – सुविधाओं से युक्त – Well-equipped

114 – धरोहर – विरासत – Heritage

115 – संवाद – बातचीत – Dialogue

116 – पुनरुक्त – दोहराया गया – Repeated

117 – शृंखला – कड़ी – Series

118 – उपसर्ग – शब्द के शुरू का अंश – Prefix

119 – प्रत्यय – शब्द के अंत का अंश – Suffix

120 – व्याकरण – भाषा के नियम – Grammar

121 – संदेश – सूचना – Message

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