केदारनाथ अग्रवाल – कवि परिचय
केदारनाथ अग्रवाल का जन्म उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले के कमासिन गाँव में सन् 1911 में हुआ। नींद के बादल, युग की गंगा, फूल नहीं रंग बोलते हैं, आग का आईना, पंख और पतवार और कहे केदार खरी-खरी उनकी प्रमुख काव्य कृतियाँ हैं। उनकी कई रचनाएँ बच्चों के बीच भी बेहद लोकप्रिय हैं। उनकी बाल कविताओं में प्रकृति, पशु-पक्षी और बाल-सुलभ कल्पनाओं का अद्भुत चित्रण है।
बसंती हवा
हवा हूँ, हवा मैं,
बसंती हवा हूँ!
सुनो बात मेरी-
अनोखी हवा हूँ!
बड़ी बावली हूँ,
बड़ी मस्तमौला।
नहीं कुछ फिकर है,
बड़ी ही निडर हूँ।
जिधर चाहती हूँ,
उधर घूमती हूँ,
मुसाफिर अजब हूँ!
न घर-बार मेरा,
न उद्देश्य मेरा,
ज इच्छा किसी की,
न आशा किसी की,
न प्रेमी, न दुश्मन,
जिधर चाहती हूँ,
उधर घूमती हूँ!
हवा हूँ, हवा मैं,
बसंती हवा हूँ!
जहाँ से चली मैं.
जहाँ को गई मैं-
शहर, गाँव, बस्ती,
नदी, रेत, निर्जन,
हरे खेत, पोखर,
झुलाती चली मैं,
झुमाती चली मैं!
हवा हूँ, हवा मैं,
बसंती हवा हूँ!
चढ़ी पेड़ महुआ,
थपाथप मचाया,
गिरी धम्म से, फिर,
चढ़ी आम ऊपर
उसे भी झकोरा,
किया कान में ‘कू’
उतरकर भगी मैं
हरे खेत पहुँची-
वहाँ गेहुँओं में,
लहर खूब मारी।
पहर दोपहर क्या,
अनेकों पहर तक
इसी में रही मैं!
खड़ी देख अलसी
लिए शीश कलसी,
मुझे खूब सूझी-
हिलाया-झुलाया,
गिरी पर न कलसी !
इसी हार को पा,
हिलाई न सरसों,
झुलाई न सरसों !
हवा हूँ, हवा मैं,
बसंती हवा हूँ!
मुझे देखते ही
अरहरी लजाई,
मनाया-बनाया,
न मानी, न मानी,
उसे भी न छोड़ा-
पथिक आ रहा था,
उसी पर धकेला,
हँसी जोर से मैं,
हँसी सब दिशाएँ,
हँसे लहलहाते
हरे खेत सारे,
हँसी चमचमाती
भरी धूप प्यारी,
बसंती हवा में
हँसी सृष्टि सारी !
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!!
-केदारनाथ अग्रवाल
बसंती हवा – सप्रसंग व्याख्या
प्रसंग
इस कविता में कवि ने बसंत ऋतु में बहने वाली हवा का मानवीकरण किया है। बसंत की हवा अपनी मस्ती, आज़ादी, चंचलता और शरारतों का वर्णन बहुत ही सुंदर और खुशमिजाज अंदाज़ में कर रही है।
पद्यांश
हवा हूँ, हवा मैं, बसंती हवा हूँ!
सुनो बात मेरी- अनोखी हवा हूँ!
बड़ी बावली हूँ, बड़ी मस्तमौला।
नहीं कुछ फिकर है, बड़ी ही निडर हूँ।
न घर-बार मेरा, न उद्देश्य मेरा,
न इच्छा किसी की, न आशा किसी की,
न प्रेमी, न दुश्मन, जिधर चाहती हूँ,
उधर घूमती हूँ!
शब्दार्थ –
बसंती (Basanti): बसंत ऋतु की / Of the Spring season
बावली (Bawli): पगली या नटखट / Playful or crazy
मस्तमौला (Mastmaula): मनमौजी / Carefree
निडर (Nidar): बिना किसी डर के / Fearless
उद्देश्य (Uddeshya): लक्ष्य / Goal or purpose
सप्रसंग व्याख्या –
हवा अपना परिचय देते हुए कहती है कि मैं बसंत ऋतु की एक बहुत ही अनोखी और मनमौजी हवा हूँ। मुझे किसी बात की कोई चिंता नहीं है और मैं बिल्कुल निडर हूँ। मेरा न तो कोई घर है, न ही मेरी कोई मंजिल या दुश्मन है। मैं एक आज़ाद मुसाफिर हूँ, मेरी जहाँ मर्जी होती है, मैं वहाँ बेफिक्र होकर घूमती हूँ।
पद्यांश 2
जहाँ से चली मैं. जहाँ को गई मैं-
शहर, गाँव, बस्ती, नदी, रेत, निर्जन,
हरे खेत, पोखर,
झुलाती चली मैं, झुमाती चली मैं!
शब्दार्थ –
बस्ती (Basti): मोहल्ला / Settlement or colony
निर्जन (Nirjan): सुनसान जगह / Deserted or lonely place
पोखर (Pokhar): तालाब / Pond
सप्रसंग व्याख्या –
हवा अपनी यात्रा का वर्णन करते हुए कहती है कि मैं जहाँ से भी गुज़रती हूँ, चाहे वह शहर हो, गाँव हो, नदी हो, सुनसान रेगिस्तान हो, हरे-भरे खेत हों या तालाब हों, मैं अपने रास्ते में आने वाली हर चीज़ को खुशी से झुमाते और लहराते हुए आगे बढ़ जाती हूँ।
पद्यांश 3
चढ़ी पेड़ महुआ, थपाथप मचाया,
गिरी धम्म से, फिर, चढ़ी आम ऊपर
उसे भी झकोरा, किया कान में ‘कू‘
उतरकर भगी मैं हरे खेत पहुँची-
वहाँ गेहुँओं में, लहर खूब मारी।
पहर दोपहर क्या, अनेकों पहर तक
इसी में रही मैं!
शब्दार्थ –
महुआ (Mahua): एक प्रकार का पेड़ / A tropical Indian tree
थपाथप (Thapathap): थपथपाने की आवाज़ / Tapping sound
झकोरा (Jhakora): ज़ोर से हिलाया / Shook violently
पहर (Pahar): समय का एक हिस्सा (जैसे दोपहर) / Part of the day
सप्रसंग व्याख्या –
हवा अपनी शरारतों के बारे में बताती है। वह महुआ के पेड़ पर चढ़कर उसे हिलाती है और नीचे कूद जाती है। फिर वह आम के पेड़ पर चढ़कर उसे झकझोरती है और उसके पत्तों में छिपकर ‘कू’ की आवाज़ निकालती है। वहाँ से भागकर वह गेहूँ के हरे खेतों में पहुँचती है और घंटों तक उन फसलों के साथ लहरें बनाकर खेलती रहती है।
पद्यांश 4
खड़ी देख अलसी लिए शीश कलसी,
मुझे खूब सूझी-
हिलाया-झुलाया, गिरी पर न कलसी !
इसी हार को पा, हिलाई न सरसों,
झुलाई न सरसों !
शब्दार्थ –
अलसी (Alsi): एक तिलहन का पौधा (तीसी) / Linseed or Flax plant
शीश (Sheesh): सिर / Head
कलसी (Kalsi): छोटी मटकी (यहाँ अलसी के गोल बीज) / Small water pot (referring to round seed pods)
सूझी (Soojhi): शरारत का विचार आना / An idea or mischief struck
सप्रसंग व्याख्या –
खेत में हवा अलसी के पौधे को देखती है, जिसके सिर पर गोल बीज ऐसे लग रहे थे जैसे कोई मटकी रखी हो। हवा को शरारत सूझती है और वह अलसी को खूब ज़ोर से हिलाती है, लेकिन उसकी मटकी अर्थात् बीज नीचे नहीं गिरती। अपनी इस हार से हवा थोड़ी रूठ जाती है और इसी कारण वह पास में खड़ी सरसों की फसल को बिल्कुल नहीं हिलाती और चुपचाप आगे बढ़ जाती है।
पद्यांश 5
मुझे देखते ही अरहरी लजाई,
मनाया-बनाया, न मानी, न मानी,
उसे भी न छोड़ा- पथिक आ रहा था,
उसी पर धकेला, हँसी जोर से मैं,
हँसी सब दिशाएँ, हँसे लहलहाते
हरे खेत सारे, हँसी चमचमाती
भरी धूप प्यारी, बसंती हवा में
हँसी सृष्टि सारी !
शब्दार्थ –
अरहरी (Arahari): अरहर की दाल का पौधा / Pigeon pea plant
लजाई (Lajai): शरमा गई / Shied away
पथिक (Pathik): यात्री या मुसाफ़िर / Traveler
सृष्टि (Srishti): दुनिया या संसार / The world or universe
सप्रसंग व्याख्या –
हवा को देखकर अरहर का पौधा शरमा जाता है। हवा उसे चिढ़ाती है और जब वह नहीं मानती, तो हवा पास से गुज़र रहे एक यात्री को अरहर के पौधे के ऊपर धकेल देती है। अपनी इस नटखट शरारत पर हवा बहुत ज़ोर से हँस पड़ती है। हवा की इस खुशी और मस्ती को देखकर चारों दिशाएँ, लहलहाते हरे खेत, खिली हुई धूप और पूरी की पूरी दुनिया खुशी से झूमकर हँसने लगती है।
बातचीत के लिए
- इस कविता में कौन अपना परिचय दे रहा है?
उत्तर – इस कविता में ‘बसंती हवा’ अर्थात् वसंत ऋतु में चलने वाली हवा अपना परिचय दे रही है।
- जब आप अपना परिचय किसी को देते हैं तो अपनी किन विशेषताओं को बताते हैं?
उत्तर – जब मैं अपना परिचय देता हूँ, तो अपना नाम, उम्र, शौक और अपनी अच्छी आदतों के बारे में भी बताता हूँ।
- आपकी ये विशेषताएँ सामने वाले पर क्या प्रभाव डालती हैं?
उत्तर – मेरी विशेषताओं को जानकर सामने वाला व्यक्ति मेरे स्वभाव को समझ पाता है और इससे हमारी अच्छी दोस्ती हो जाती है।
- कविता में बसंती हवा ने अपनी किन-किन खूबियों की बात की है?
उत्तर – बसंती हवा ने खुद को मस्तमौला, निडर, बावली, आज़ाद और एक अनोखी मुसाफिर बताया है जिसे किसी बात की चिंता नहीं है।
मेरी समझ से
नीचे दिए गए प्रश्नों का सबसे उपयुक्त उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा (★) बनाइए।
- बसंती हवा का मुख्य गुण क्या है?
(क) गंभीरता
(ग) क्रोध
(ख) चंचलता
(घ) आलस्य
उत्तर – (ख) चंचलता ★
- बसंती हवा ने अपने आपको किससे अलग बताया है?
(क) पक्षियों से
(ख) पेड़ों से
(ग) अन्य मुसाफिरों से
(घ) फूलों से
उत्तर – (ग) अन्य मुसाफिरों से ★
- बसंती हवा के कारण मनुष्य के मन में कौन-सा भाव उत्पन्न होता है?
(क) भय
(ख) क्रोध
(ग) प्रसन्नता
(घ) ईर्ष्या
उत्तर – (ग) प्रसन्नता ★
- बसंती हवा ने अपने आप को अजब मुसाफिर क्यों कहा है?
(क) वह बहुत धीमे चलती है।
(ग) उसके पास बहुत सारा सामान है।
(ख) वह केवल रात में चलती है।
(घ) वह निडर और स्वतंत्र रूप से हर जगह घूमती है।
उत्तर – (घ) वह निडर और स्वतंत्र रूप से हर जगह घूमती है। ★
- कविता में बसंती हवा का प्रभाव किस पर पड़ता है?
(क) केवल फूलों पर
(ख) केवल खेतों पर
(ग) संपूर्ण प्रकृति पर
(घ) केवल पक्षियों पर
उत्तर – (ग) संपूर्ण प्रकृति पर ★
सोचिए और लिखिए
- बसंती हवा अपना परिचय कैसे देती है?
उत्तर – बसंती हवा अपना परिचय देते हुए कहती है कि मैं बड़ी ही अनोखी, मस्तमौला और निडर हवा हूँ। मैं जहाँ चाहती हूँ, वहाँ आज़ादी से घूमती हूँ।
- कविता में बसंती हवा का कौन-सा गुण आपको सबसे अधिक प्रभावित करता है?
उत्तर – मुझे बसंती हवा का ‘निडर’ और ‘आज़ाद’ स्वभाव सबसे अच्छा लगता है, क्योंकि वह बिना किसी फिक्र के खुशी बाँटते हुए चलती है।
- कविता में एक जगह बसंती हवा हार मान लेती है। उन पंक्तियों को खोजकर लिखिए।
उत्तर – वे पंक्तियाँ हैं –
“हिलाया-झुलाया, गिरी पर न कलसी!
इसी हार को पा, हिलाई न सरसों।”
- ‘बसंती हवा’ कविता क्या संदेश देती है?
उत्तर – यह कविता संदेश देती है कि हमें भी बसंती हवा की तरह जीवन में मस्त, निडर और खुशमिजाज रहना चाहिए और दूसरों को भी खुशियाँ बाँटनी चाहिए।
- बसंती हवा सरसों को क्यों नहीं हिला-झुला पाई?
उत्तर – हवा ने अलसी के पौधे को बहुत हिलाया, लेकिन उसकी कलसी नहीं गिरी। इस हार से वह थोड़ी रूठ गई और इसी कारण उसने पास खड़ी सरसों को छुआ तक नहीं।
भाषा की ओर
- जब किसी नाम को बार-बार दोहराने से बचने के लिए उसके स्थान पर दूसरे शब्दों की आवश्यकता होती है, तब सर्वनाम का उपयोग होता है। सर्वनाम के प्रयोग से वाक्य अधिक सुंदर और प्रभावशाली बनते हैं।
“हवा हूँ, हवा मैं, बसंती हवा हूँ!”
पंक्ति में ‘मैं’ शब्द किसके लिए आया है? → ‘हवा‘ के लिए।
मित्र के नाम के बदले आप किस शब्द का प्रयोग करेंगे? → तुम, तुम्हारा, उसे।
बड़ों के नाम के बदले किन शब्दों का प्रयोग करेंगे? → आप, आपका, उन्हें।
- नीचे वाक्यों में दिए गए रेखांकित शब्दों के विपरीत अर्थ वाले शब्दों का चयन कर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए—
(भयभीत, मित्र, जीत, बड़ा)
मेरी सहेली निडर है परंतु शेर को देखकर भयभीत हो गई।
चूहा बहुत छोटा होता है लेकिन हाथी बहुत बड़ा होता है।
शेखर के सरल स्वभाव के कारण उसका कोई शत्रु नहीं था, सभी उसके मित्र थे।
मैच में हार जाने वाली टीम ने जीत जाने वाली टीम को बधाई दी।
- नीचे दिए गए एक जैसी या मिलती-जुलती ध्वनि वाले शब्दों पर गोला बनाइए-
जिधर – उधर, मगन, कमरा
हिलाई – चलाना, झुलाई, सिकाई
मनाया – पकाया, चलाया, बनाना
- नीचे दिए गए शब्दों के समान अर्थ वाले शब्दों पर घेरा बनाइए-
नदी – सरिता, तटिनी, नहर
पोखर – तालाब, प्रपात, सरोवर
घर – आवास, सदन, मंजिल
पेड़ – तरु, पौधा, वृक्ष
बसंती हवा हूँ
- ‘बसंती’ शब्द में अनुस्वार (ं) का प्रयोग हुआ है और ‘हूँ’ शब्द में अनुनासिक (ँ) का प्रयोग हुआ है। आप इन शब्दों में अनुस्वार (ं) अनुनासिक (ँ) लगाकर शब्द लिखिए-
नही → नहीं (अनुस्वार)
वहा → वहाँ (अनुनासिक)
यहा → यहाँ (अनुनासिक)
पहुची → पहुँची (अनुनासिक)
सरसो → सरसों (अनुस्वार)
हसे → हँसे (अनुनासिक)
पाठ से आगे
जिस तरह बसंती हवा अपना परिचय कविता में दे रही है, आप कक्षा में अपना परिचय दीजिए।
उत्तर – मेरा नाम अविनाश रंजन गुप्ता है। मुझे पढ़ाई करना बहुत अच्छा लगता है। मेरा प्रिय खेल बैडमिंटन और शतरंज है। इस कक्षा के सभी सहपाठी मेरे मित्र हैं। यह विद्यालय मुझे बहुत पसंद है।
भारत की ऋतुओं में बसंत ऋतु के महत्त्व पर एक अनुच्छेद लिखिए।
उत्तर – बसंत ऋतु को ‘ऋतुराज’ यानी सभी ऋतुओं का राजा कहा जाता है। यह सर्दियों के बाद और गर्मियों से पहले आती है। इस मौसम में न बहुत सर्दी होती है न बहुत गर्मी। पेड़ों पर नए पत्ते और रंग-बिरंगे फूल खिल जाते हैं। सरसों के पीले खेतों से धरती बहुत सुंदर लगती है। बसंत पंचमी और होली जैसे खुशियों भरे त्योहार भी इसी ऋतु में आते हैं।
आज हवा भी प्रदूषित हो रही है। वायु प्रदूषण के कारणों पर चर्चा कीजिए और उसकी रोकथाम के लिए उपाय बताइए।
उत्तर – वायु प्रदूषण के कारण और रोकथाम:
कारण: फैक्ट्रियों से निकलने वाला जहरीला धुआँ, गाड़ियों का धुआँ, पेड़ों की कटाई और कूड़ा या प्लास्टिक जलाना वायु प्रदूषण के मुख्य कारण हैं।
रोकथाम: हमें अधिक से अधिक पेड़ लगाने चाहिए। कम दूरी के लिए साइकिल का प्रयोग करना चाहिए। फैक्ट्रियों की चिमनियों में फिल्टर लगाने चाहिए और प्लास्टिक नहीं जलाना चाहिए।
कल्पना कीजिए यदि प्रकृति में सुंदर-सुंदर रंग नहीं होते तो कैसा लगता?
उत्तर – यदि प्रकृति में रंग नहीं होते, तो यह दुनिया ब्लैक एंड व्हाइट टीवी की तरह बहुत उदास और नीरस (Boring) लगती। फूलों की सुंदरता, इंद्रधनुष की चमक और हरे खेतों की ताजगी कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
खोजबीन
नीचे दी गई एनसीईआरटी की आधिकारिक यू-ट्यूब इंटरनेट कड़ी (लिंक) का प्रयोग करके आप इस पाठ के बारे में और अधिक जान-समझ सकते हैं।
शब्द-संपदा
शब्द अर्थ आपकी भाषा में शब्द
बसंती हवा वसंत ऋतु में चलने वाली हवा
बावली पगली, सनकी
मस्तमौला आजाद तबीयत का, सदा मस्त रहने वाला
मुसाफिर यात्री
अजब अनोखा, विचित्र
पोखर तालाब
महुआ एक प्रकार का पेड़, जिसके फल-फूल खाने के काम आते हैं
झकोरा जोर से हिलाया
अलसी तीसी, सरसों की तरह तेल के काम आने वाली कलसी छोटा घड़ा, गगरी
अरहरी अरहर का पौधा, दाल के रूप में प्रयुक्त एक अनाज
लहलहाते प्रसन्नचित्त, प्रफुल्लित, खुशी से भरे हुए

