सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला‘
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म सन् 1899 में बंगाल के महिषादल में हुआ। वे मूलतः गढ़ाकोला (उन्नाव), उत्तर प्रदेश के निवासी थे। निराला की औपचारिक शिक्षा नौवीं तक महिषादल में ही हुई। उन्होंने स्वाध्याय से संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी का ज्ञान अर्जित किया।
उनकी प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं— अनामिका, परिमल, गीतिका, कुकुरमुत्ता और नए पत्ते। उपन्यास, कहानी, आलोचना और निबंध लेखन में भी उनकी ख्याति अविस्मरणीय है। निराला रचनावली के आठ खंडों में उनका संपूर्ण साहित्य प्रकाशित है। दार्शनिकता, विद्रोह, क्रांति, प्रेम की तरलता और प्रकृति का विराट तथा उदात्त चित्र उनकी रचनाओं में उपस्थित है। छायावादी रचनाकारों में उन्होंने सबसे पहले मुक्त छंद का प्रयोग किया। उपेक्षितों और पीड़ितों के प्रति उनकी कविताओं में गहरी सहानुभूति मिलती है। ‘निराला’ का निधन सन् 1961 में हुआ।
भारति, जय, विजयकरे!
भारति, जय, विजयकरे!
कनक-शस्य-कमलधरे!
लंका पदतल शतदल
गर्जितोर्मि सागर-जल,
धोता-शुचि चरण युगल
स्तव कर बहु-अर्थ-भरे।
तरु-तृण-वन-लता वसन,
अंचल में खचित सुमन,
गंगा ज्योतिर्जल-कण
धवल धार हार गले।
मुकुट शुभ्र हिम-तुषार
प्राण प्रणव ओंकार,
ध्वनित दिशाएँ उदार,
शतमुख-शतरव-मुखरे!
भारति, जय, विजयकरे! – पाठ परिचय
‘भारति, जय, विजयकरे!” कविता ‘निराला’ की देशप्रेम से ओत-प्रोत एक प्रेरणादायक रचना है। कविता के आरंभ में ही कवि ‘भारति, जय, विजयकरे!” कहकर भारत को विजयश्री प्राप्त करने की कामना करता है। वह भारतभूमि को ‘कनक-शस्य-कमलधरे!” कहकर संबोधित करता है जो भारत की कृषि-परंपरा और श्रम के सौंदर्य को दर्शाता है। कविता में भारत की भौगोलिक सुंदरता का ऐसा चित्र खींचा गया है मानो भारत कोई देवी हो, जिसके चरणों को समुद्र अपने जल से धोता है। नदी, वन, पुष्प, हिमालय, गंगा आदि प्राकृतिक शोभा को भारत के वस्त्राभूषण की तरह प्रस्तुत किया गया है। कवि भारत को एक चेतन सत्ता के रूप में देखता है, जिसकी दिशाओं में ओंकार’ की गूँज हो रही है और जो अनेक तरह के स्वरों और विचारों से समृद्ध है।
विस्तृत व्याख्या
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित यह पंक्तियाँ’ ‘भारति जय विजय करे’ कविता से ली गई हैं। यह एक राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत कविता है जिसमें भारत माता की वंदना और उनकी प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन किया गया है।
प्रथम पद
भारति, जय, विजयकरे!
कनक-शस्य-कमलधरे!
शब्दार्थ
भारति – भारत माता (Mother India)
विजयकरे – विजय प्राप्त करने वाली (Victorious)
कनक – सोना (Gold)
शस्य – फसल/अनाज (Crops/Grain)
कमलधरे – कमल धारण करने वाली (Holder of the lotus)
व्याख्या
कवि भारत माता की वंदना करते हुए कहते हैं कि हे भारती! तुम्हारी जय हो, तुम सदैव विजय प्राप्त करो। तुम वह हो जो अपने हाथों में सोने के समान चमकती हुई ‘कनक-शस्य’ अर्थात् सुनहरी फसलें और कमल धारण करती हो। यहाँ सुनहरी फसलें भारत की समृद्धि और संपन्नता का प्रतीक हैं।
द्वितीय पद
लंका पदतल शतदल
गर्जितोर्मि सागर-जल,
धोता-शुचि चरण युगल
स्तव कर बहु-अर्थ-भरे।
शब्दार्थ
पदतल – पैरों के नीचे (At the feet)
शतदल – सौ पत्तों वाला कमल (Lotus)
गर्जितोर्मि – गर्जना करती हुई लहरें (Roaring waves – गर्जित + ऊर्मि)
शुचि – पवित्र (Pure/Sacred)
युगल – जोड़ा (Pair – यहाँ दोनों पैरों के लिए)
स्तव – स्तुति/प्रार्थना (Hymn/Praise)
व्याख्या
कवि भारत के भौगोलिक स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं। भारत के दक्षिण में लंका उसके चरणों के पास एक कमल अर्थात् शतदल के समान सुशोभित है। विशालसागर का जल अपनी गर्जना करती हुई लहरों) के साथ निरंतर भारत माता के दोनों पवित्र चरणों को धो रहा है। सागर की ये लहरें ऐसी प्रतीत होती हैं जैसे वे मधुर ध्वनि में माता की स्तुति कर रही हों, जिसके कई गहरे अर्थ निकलते हैं।
तृतीय पद
तरु-तृण-वन-लता वसन,
अंचल में खचित सुमन,
गंगा ज्योतिर्जल-कण
धवल धार हार गले।
शब्दार्थ
तरु-तृण – वृक्ष और घास (Trees and Grass)
वसन – वस्त्र (Clothes/Garment)
अंचल – आँचल (The edge of a garment/Lap)
खचित – जड़े हुए (Studded/Embedded)
सुमन – फूल (Flowers)
ज्योतिर्जल-कण – प्रकाशमय जल की बूँदें (Radiant water droplets)
धवल – सफेद/उज्ज्वल (White/Bright)
व्याख्या
भारत माता का सौंदर्य प्रकृति के अंगों से बना है। यहाँ के वृक्ष, घास, वन और लताएँ माता के वस्त्र के समान हैं। उनके आँचल में असंख्य फूल जड़े हुए हैं, जो धरती की सुंदरता बढ़ाते हैं। माता के गले में गंगा की उज्ज्वल और सफेद धारा हार के समान सुशोभित है, जिसका जल प्रकाशमय और पवित्र है।
चतुर्थ पद
मुकुट शुभ्र हिम-तुषार
प्राण प्रणव ओंकार,
ध्वनित दिशाएँ उदार,
शतमुख-शतरव-मुखरे!
शब्दार्थ
शुभ्र – सफेद/निर्मल (Shining white)
हिम-तुषार – बर्फ (Snow/Frost – हिमालय के संदर्भ में)
प्रणव ओंकार – ‘ॐ’ की ध्वनि (The primordial sound OM)
ध्वनित – गूँजना (Resounding)
शतमुख – सौ मुखों वाली (With a hundred mouths/voices)
मुखरे – मुखरित होना/बोलना (Vocal/Expressive)
व्याख्या
भारत माता के मस्तक पर हिमालय की सफेद बर्फ एक शुभ्र मुकुट के समान चमक रही है। भारत की आत्मा में ‘ॐ’ अर्थात् ओंकार की ध्वनि बसी है, जो यहाँ के प्राणों का आधार है। यह पवित्र ध्वनि और भारत का गौरव सभी दिशाओं में गूँज रहा है। ऐसा लगता है मानो भारत माता सौ-सौ मुखों और सौ-सौ आवाज़ों से अपनी महिमा का गान कर रही हो।
विशेष
निराला जी ने इस कविता में भारत को केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि एक जीवंत देवी के रूप में चित्रित किया है, जिसकी रक्षा स्वयं प्रकृति कर रही है और जिसका आध्यात्मिक आधार ‘ओंकार’ है।
काव्य-सौंदर्य
- भाव पक्ष
राष्ट्र-प्रेम और वंदना – कवि ने भारत को केवल एक भौगोलिक नक्शा नहीं माना, बल्कि उसे एक साक्षात् देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया है।
प्रकृति का मानवीकरण – पूरी कविता में प्रकृति का मानवीकरण (Personification) किया गया है। हिमालय मुकुट है, सागर सेवक है जो चरण धोता है, और नदियाँ गले का हार हैं।
आध्यात्मिक गौरव – ‘प्रणव ओंकार’ जैसे शब्दों के माध्यम से भारत की आध्यात्मिक श्रेष्ठता और प्राचीन ज्ञान की महिमा को दर्शाया गया है।
सांस्कृतिक एकता – उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में लंका और सागर तक, कवि ने पूरे अखंड भारत की सांस्कृतिक और भौगोलिक एकता को पिरोया है।
- कला पक्ष
(क) भाषा-शैली –
तत्सम प्रधान संस्कृतनिष्ठ भाषा – कविता की भाषा अत्यंत गरिमामयी और शुद्ध संस्कृतनिष्ठ (तत्सम) हिंदी है। जैसे – गर्जितोर्मि, ज्योतिर्जल-कण, शतदल आदि।
शैली – यह एक ‘गेय’ अर्थात् गाए जाने योग्य कविता है। इसमें लय, ताल और संगीतबद्धता का अद्भुत प्रवाह है।
(ख) अलंकार योजना (Figures of Speech) –
रूपक अलंकार (Metaphor) – हिमालय को ‘मुकुट’, गंगा को ‘हार’ और वन-लताओं को ‘वसन’ (वस्त्र) कहकर रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग किया गया है।
अनुप्रास अलंकार (Alliteration) – ‘तरु-तृण’, ‘प्राण प्रणव’, ‘जय-विजय’ में शब्दों की आवृत्ति से संगीतात्मकता आई है।
मानवीकरण अलंकार (Personification) – सागर का चरण धोना और स्तुति करना प्रकृति के मानवीकरण का श्रेष्ठ उदाहरण है।
(ग) रस और गुण –
रस – इसमें वीर रस और भक्ति रस (देशभक्ति) का मिश्रण है।
गुण – कविता में ‘ओज गुण’ की प्रधानता है, जो पाठक के मन में उत्साह और गर्व का संचार करती है।
(घ) बिम्ब योजना (Imagery) –
कविता में दृश्य बिम्ब (Visual Imagery) बहुत सशक्त है। जब हम “धवल धार हार गले” पढ़ते हैं, तो आँखों के सामने गंगा की श्वेत धारा का हार जैसा चित्र उभर आता है।
विशेष टिप्पणी –
निराला जी की यह रचना उस समय की है जब भारत पराधीन था। ऐसे समय में अपनी धरती को विजयशालिनी और देवी रूप में देखना भारतीयों के भीतर सोए हुए स्वाभिमान को जगाने का एक सशक्त माध्यम था।
अभ्यास
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
- “भारति, जय, विजयकरे” कविता में विशेष रूप से
(क) भारत की भौगोलिक संरचना की प्रशस्ति की गई है।
(ख) भारत की सांस्कृतिक विविधता बताई गई है।
(ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।
(घ) भारत के खनिज पदार्थों के बारे में बताया गया है।
उत्तर – (ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।
कविता में ‘भारती’ अर्थात् सरस्वती और ज्ञान, ‘कनक-शस्य’ अर्थात् संपन्नता और ‘गंगा-हिम’ अर्थात् प्रकृति के वर्णन द्वारा देश के समग्र स्वरूप की वंदना है।
- “कनक-शस्य-कमल धरे” पंक्ति का भावार्थ है—
(क) भारत की धन-धान्य संपन्नता
(ख) भारत की नदियों का सौंदर्य
(ग) भारत के लोक-जीवन की सुंदरता
(घ) भारत की सैन्य शक्ति और औद्योगिक विकास
उत्तर – (क) भारत की धन-धान्य संपन्नता
‘कनक-शस्य’ का अर्थ है सोने जैसी सुनहरी फसलें। यह भारत की कृषि प्रधान संपन्नता और समृद्धि का परिचायक है।
- समस्त विश्व में भारत के महत्त्व का उद्घोष करने वाली पंक्तियाँ हैं—
(क) गंगा ज्योतिर्जल-कण/ धवल धार हार गले
(ख) गर्जितोर्मि सागर-जल/ धोता शुचि चरण युगल
(ग) भारति, जय, विजयकरे / कनक- शस्य-कमलधरे!
(घ) ध्वनित दिशाएँ उदार/ शतमुख-शतरव-मुखरे!
उत्तर – (घ) ध्वनित दिशाएँ उदार/ शतमुख-शतरव-मुखरे!
ये पंक्तियाँ बताती हैं कि भारत का गौरव गान सौ-सौ मुखों से हो रहा है और इसकी गूँज उदारतापूर्वक सभी दिशाओं में फैली हुई है।
- कविता की भाषा और शैली किस विशेषता से संपन्न है?
(क) सरल, बोल-चाल की भाषा
(ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त
(ग) सरस और हास्य – व्यंग्यपूर्ण
(घ) संवादात्मक और विश्लेषणात्मक
उत्तर – (ख) संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त
कविता में ‘शतदल’, ‘गर्जितोर्मि’, ‘ज्योतिर्जल’ जैसे तत्सम शब्दों और सामासिक पदों का प्रयोग है, जो इसे गंभीर और गरिमामय बनाता है।
- भारत के वस्त्रों में ‘तरु-तृण-वन-लता‘ और गले में ‘गंगा-धारा‘ को चित्रित कर कवि किस प्रकार की चेतना का संदेश देते हैं?
(क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक
(ख) राष्ट्रीयता और देशप्रेम
(ग) ऐतिहासिक और भौगोलिक
(घ) सामाजिक और राजनीतिक
उत्तर – (क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक
प्रकृति को वस्त्र (लता-वन) और गंगा को हार मानकर कवि ने भारत की पवित्र सांस्कृतिक चेतना और पर्यावरण के साथ गहरे जुड़ाव को दर्शाया है।
अर्थ और भाव
नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझते हुए इनका भाव स्पष्ट कीजिए—
(क) “लंका पदतल शतदल,
गर्जितोर्मि सागर-जल
धोता शुचि चरण युगल!”
अर्थ: भारत माता के पैरों के नीचे लंका एक कमल (शतदल) के समान स्थित है और समुद्र का गरजता हुआ जल निरंतर माँ के दोनों पवित्र चरणों को धो रहा है।
भाव: यहाँ भारत की भौगोलिक स्थिति का मानवीकरण किया गया है। दक्षिण में समुद्र का होना माँ के चरण पखारने जैसा पवित्र दृश्य प्रस्तुत करता है।
(ख) “प्राण प्रणव ओंकार,
ध्वनित दिशाएँ उदार,
शतमुख-शतरव-मुखरे!”
अर्थ: भारत का प्राण ‘ओंकार’ अर्थात् ईश्वर का नाद है। इसकी उदार ध्वनि से सभी दिशाएँ गूँज रही हैं और यह गौरव गान सैंकड़ों ध्वनियों में मुखरित हो रहा है।
भाव: यह पंक्ति भारत की आध्यात्मिक शक्ति को दर्शाती है। भारत केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि विश्व को ज्ञान और शांति का संदेश देने वाली एक चेतना है।
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-
- कविता में कवि की किस भावना की अभिव्यक्ति मिलती है?
उत्तर – कविता में कवि की अगाध राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक गौरव की भावना मिलती है। कवि भारत को केवल एक देश नहीं, बल्कि ‘भारती’ अर्थात् ज्ञान की देवी के रूप में पूजते हैं और उसकी प्राकृतिक सुंदरता में ईश्वरीय वैभव देखते हैं।
- कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया गया है? क्या आप मानते हैं कि प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम का काम है? क्यों?
उत्तर – कवि ने हिमालय को मुकुट, गंगा को हार, समुद्र को चरण धोने वाला सेवक और वनों को वस्त्र बताया है। हाँ, प्रकृति का संरक्षण करना सबसे बड़ा देशप्रेम है। यदि नदियाँ प्रदूषित होंगी और वन कट जाएँगे, तो भारत माता का यह वैभव नष्ट हो जाएगा। देश की रक्षा केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि उसकी मिट्टी और हरियाली को बचाने से भी होती है।
- “कनक-शस्य-कमलधरे! ” पंक्ति भारतभूमि की किन-किन विशेषताओं की ओर संकेत कर रही है?
उत्तर – यह पंक्ति भारत की तीन विशेषताओं की ओर संकेत करती है:
कनक (सोना): भारत की खनिज और आर्थिक समृद्धि।
शस्य (फसल): लहलहाते खेत और खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता।
कमल: सौंदर्य, पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक।
- “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार ” पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट बताया गया है, क्यों?
उत्तर – हिमालय भारत के उत्तर में सबसे ऊँचे स्थान पर स्थित है, जैसे शरीर में सबसे ऊपर सिर पर मुकुट होता है। इसकी धवल बर्फ चांदी के मुकुट की तरह चमकती है। साथ ही, यह सदियों से बाहरी शत्रुओं और ठंडी हवाओं से भारत की रक्षा करने वाले एक रक्षक या सिरमौर की भूमिका निभाता है।
विधा से संवाद
कविता का सौंदर्य
नीचे दी गई पंक्तियों को पढ़िए
“भारति, जय, विजयकरे!
कनक- शस्य कमलधरे!”
इन पंक्तियों में कवि ने चित्रात्मक भाषा का प्रयोग करते हुए भारतभूमि का मनोरम चित्र प्रस्तुत किया है। इस कविता की कुछ अन्य विशेषताओं की सूची नीचे दी गई है। कविता में से उन विशेषताओं वाली पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए-
विशेषताएँ | कविता की पंक्तियाँ |
प्रकृति का मानवीकरण | “तरु-तृण-वन-लता वसन, / अंचल में खचित सुमन,” (यहाँ प्रकृति के अंगों को वस्त्र और अंचल के रूप में चित्रित कर भारत माता का मानवीकरण किया गया है।) |
आलंकारिक प्रयोग | “धवल धार हार गले” या “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” (यहाँ रूपक अलंकार का प्रयोग है, जहाँ गंगा की धारा को हार और हिमालय को मुकुट बताया गया है।) |
समस्त पद/ सामासिक पद | “कनक-शस्य-कमलधरे” या “ज्योतिर्जल-कण” (इनमें ‘कनक-शस्य’ और ‘ज्योतिर्जल’ सामासिक पदों के सुंदर उदाहरण हैं।) |
संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग | “गर्जितोर्मि सागर-जल, / धोता-शुचि चरण युगल” (यहाँ ‘गर्जितोर्मि’ (गर्जित + ऊर्मि) और ‘शुचि’ जैसे तत्सम शब्दों का प्रयोग भाषा को गरिमा प्रदान करता है।) |
विषयों से संवाद
- स्वतंत्रता- पूर्व लिखी इस कविता में भारत को ज्ञान, कृषि और संस्कृति के प्रतीक / परिचायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वर्तमान संदर्भ में यदि आपको भारत को एक नए रूप में प्रस्तुत करने का अवसर मिले तो आप भारत की किन विशेषताओं और विविधताओं को सम्मिलित करेंगे?
उत्तर – यदि मुझे आज भारत को एक नए रूप में प्रस्तुत करना हो, तो मैं प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के संगम को प्रमुखता दूँगा। मेरी नई कविता में ये विशेषताएँ शामिल होंगी:
तकनीकी शक्ति: भारत को ‘सॉफ्टवेयर हब’ और ‘डिजिटल क्रांति’ के रूप में।
अंतरिक्ष अन्वेषण: ‘चंद्रयान’ और ‘मंगलयान’ की सफलताओं के माध्यम से ब्रह्मांड तक पहुँचते भारत के हाथ।
युवा ऊर्जा: दुनिया के सबसे युवा देश की ‘स्टार्टअप संस्कृति’ और नवाचार।
खेल और कला: वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाते भारतीय खिलाड़ी और कलाकारों की जीवंतता।
- “शतमुख- शतरव-मुखरे!” पंक्ति में भारत के विविध पर्व, उत्सव और रीति-रिवाज किस प्रकार ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत‘ की संकल्पना को साकार करते हैं?
उत्तर – “शतमुख-शतरव-मुखरे!” का अर्थ है सैंकड़ों मुखों और स्वरों से होने वाला घोष। यह पंक्ति ‘विविधता में एकता’ को साकार करती है:
विविध स्वर: भारत में होली, दिवाली, ईद, पोंगल, बीहू और क्रिसमस जैसे उत्सव अलग-अलग ‘स्वरों’ (भाषाओं और शैलियों) में मनाए जाते हैं।
एक संकल्पना: जब ये सैंकड़ों उत्सव मिलकर ‘भारतीयता’ का गान करते हैं, तो वे एक शक्तिशाली सामूहिकता का निर्माण करते हैं। यह विविधता भारत को कमज़ोर नहीं, बल्कि एक इंद्रधनुष की तरह ‘श्रेष्ठ’ और अधिक सुंदर बनाती है।
- भारत को सुदृढ़ करने में इसकी प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा के महत्त्व को बताते हुए संक्षिप्त लेख लिखिए।
उत्तर – शीर्षक: प्रगति की नींव: प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान
भारत की सुदृढ़ता उसकी सीमाओं से अधिक उसकी आंतरिक विरासत में निहित है। हमारी प्रकृति, जैसे – हिमालय, गंगा, उपजाऊ मैदान केवल संसाधन नहीं, बल्कि हमारी जीवनरेखा है जो हमें आत्मनिर्भर बनाती है। हमारी संस्कृति हमें ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का संस्कार देती है, जिससे समाज में सामंजस्य बना रहता है। अंत में, हमारी ज्ञान-परंपरा ने हमें ‘विश्व गुरु’ के पद पर प्रतिष्ठित किया है। जब हम इन तीनों का सम्मान करते हैं, तो भारत केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि नैतिक और सामरिक रूप से भी विश्व का नेतृत्व करने में सक्षम बनता है।
- कविता में गंगा को भारत के स्वच्छ और श्वेत हार एवं हिमालय को मुकुट के रूप में अभिव्यक्त किया गया है। वर्तमान संदर्भ में बताइए कि बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने हमारी नदियों और हिमालय को किस प्रकार प्रभावित किया है?
उत्तर – कविता में वर्णित ‘श्वेत मुकुट’ और ‘धवल हार’ आज संकट में हैं:
हिमालय (मुकुट): जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं। ‘हिम-तुषार’ कम हो रही है, जिससे भूस्खलन जैसी आपदाएँ बढ़ रही हैं। हिमालय की शुभ्रता अब प्रदूषण की कालिख के कारण धुँधली हो रही है।
गंगा (हार): औद्योगिक कचरे और शहरी गंदगी ने गंगा की ‘धवल धार’ को विषैला और मटमैला बना दिया है। वह ‘शुचि’ अर्थात् पवित्र जल जो चरणों को धोता था, अब स्वयं को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
यह हमारे अस्तित्व का संकट है; यदि मुकुट पिघल गया और हार मैला हो गया, तो भारत का प्राकृतिक स्वरूप ही बदल जाएगा।
विविध रंग भारत के
आप अपने कक्षा-समूह में मिलकर भारत की सांस्कृतिक विविधता पर आधारित एक पावरपॉइंट प्रस्तुति/ पोस्टर/चार्ट/कोलाज तैयार कीजिए और इसे अपनी कक्षा में दिखाइए। आप भारत के विभिन्न राज्यों पर केंद्रित पावरपॉइंट प्रस्तुति/पोस्टर/चार्ट / कोलाज भी बना सकते हैं।
उत्तर – छात्र इसे शिक्षक की सहायता से इसे पूरा करें।
सृजन
- मान लीजिए आपको भारत को एक मनुष्य के रूप में कल्पित करते हुए सुसज्जित करने का अवसर मिले तो आप अपने राज्य के किन सांस्कृतिक, पारंपरिक वेशभूषा, आभूषण, चिह्नों, पुष्पों आदि का प्रयोग कर उसकी साज-सज्जा करेंगे?
उत्तर – यदि मुझे भारत को अपने राज्य ओड़िशा की संस्कृति से सुसज्जित करना हो, तो मैं निम्नलिखित प्रतीकों का चयन करूँगा:
वेशभूषा: भारत माता को विश्व प्रसिद्ध संबलपुरी या इकत रेशमी साड़ी पहनाऊँगा, जिसकी कलात्मक बुनाई भारतीय हस्तशिल्प की परिपक्वता को दर्शाती है।
आभूषण: तारकसी के बारीक आभूषण और कमर में ओड़िशी नृत्य वाली ‘मेखला’।
चिह्न व पुष्प: मस्तक पर कोणार्क चक्र का तिलक और हाथों में राज्य पुष्प ‘अशोक’ या सुगंधित ‘गदबा’ के फूल। यह सज्जा भारत की शांतिप्रियता और गौरवशाली वास्तुकला का प्रतीक होगी।
- भारत पर आधारित एक डाक टिकट, पोस्टर या पुस्तक के लिए आवरण पृष्ठ बनाइए और बताइए कि आप उसमें किन-किन प्रतीकों को सम्मिलित करेंगे और क्यों?
उत्तर – मैं एक डाक टिकट की कल्पना करता हूँ जिसका शीर्षक “अतुल्य भारत: परंपरा से तकनीक तक” होगा।
प्रतीक: एक ओर योग की मुद्रा में बैठा व्यक्ति और दूसरी ओर चंद्रयान-3 का रोवर।
पृष्ठभूमि: तिरंगे के रंगों में लहराती गंगा और ऊपर हिमालय।
कारण: ये प्रतीक दर्शाते हैं कि भारत एक ऐसा राष्ट्र है जिसकी जड़ें प्राचीन ज्ञान में हैं, लेकिन जिसकी उड़ान आधुनिक विज्ञान की ऊँचाइयों तक है।
- नदी की यात्रा
गंगा नदी की अपने उद्गम स्रोत से लेकर बंगाल की खाड़ी में विलीन होने तक की पूरी यात्रा के बीच में आने वाली प्राकृतिक, सांस्कृतिक, भाषिक आदि विशेषताओं का वर्णन करते हुए एक रोचक यात्रा-वृत्तांत लिखिए।
(संकेत – पर्वतीय सौंदर्य से लेकर गंगासागर तक की संस्कृति इत्यादि)
उत्तर – “पतितपावनी की अनंत यात्रा”
मेरी यात्रा उत्तराखंड के गोमुख की बर्फीली गुफाओं से शुरू होती है, जहाँ भागीरथी के रूप में गंगा का यौवन पर्वतों को चीरता हुआ निकलता है। ऋषिकेश पहुँचते ही हवा में ‘संस्कृत के श्लोकों’ और घंटियों की गूँज सुनाई देती है—यह गंगा का सांस्कृतिक वैभव है।
जैसे ही मैं उत्तर प्रदेश और बिहार के समतल मैदानों में पहुँचता हूँ, गंगा का रूप गंभीर हो जाता है। यहाँ भाषा गढ़वाली से ब्रज, अवधी और फिर मैथिली में बदल जाती है। गंगा के तट पर बसे बनारस के घाटों पर जीवन और मृत्यु का अद्भुत दर्शन मिलता है। अंततः, पश्चिम बंगाल पहुँचकर ‘बाउल संगीत’ की धुनों के बीच गंगा विशाल डेल्टा बनाती है और गंगासागर में विलीन हो जाती है। यह केवल एक नदी की यात्रा नहीं, बल्कि भारत की भाषिक और भौगोलिक एकता का जीवंत पथ है।
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
बहुभाषी देश हमारा
भारत की एक विशेषता उसकी बहुभाषिकता है। यदि आपको एक सचेत नागरिक के रूप में भारत से अपनी मातृभाषा में संवाद का अवसर मिले तो आप किन विषयों पर और क्या-क्या संवाद करना चाहेंगे? इन संवादों को अपनी मातृभाषा और हिंदी में लिखिए।
(संकेत- समाज, पर्यावरण, संस्कृति आदि।)
चूँकि मैं ओड़िशा से संबंध रखता हूँ, इसलिए एक सचेत नागरिक के रूप में मैं भारत माता से अपनी मातृभाषा ओड़िया (Odia) मैं बात करना चाहूँगा
यह संवाद मुख्य रूप से पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक गौरव पर केंद्रित है:
ବିଷୟ: ପରିବେଶ ସୁରକ୍ଷା ଓ ସଂସ୍କୃତି
ନାଗରିକ: ହେ ଭାରତ ମାତା! ତୁମର ଏହି ଶ୍ୟାମଳ ରୂପ ଆମର ଗର୍ବ। କିନ୍ତୁ ଆଜି ପ୍ରଦୂଷଣ ଯୋଗୁଁ ତୁମର ନଦୀ ଓ ପାହାଡ଼ ରକ୍ତହୀନ ହୋଇପଡ଼ୁଛନ୍ତି। ଆମେ ଶପଥ କରୁଛୁ କି ଆମେ ଗଛ ଲଗାଇବା ଓ ନଦୀଗୁଡ଼ିକୁ ସଫା ରଖିବା।
ଭାରତ ମାତା: ପୁଅ, ତୁମର ଏହି ସଚେତନତା ହିଁ ମୋର ପ୍ରକୃତ ରକ୍ଷା। ମୋର ସଂସ୍କୃତି ଓ ପ୍ରକୃତିକୁ ବଞ୍ଚାଇ ରଖିବା ତୁମ ସମସ୍ତଙ୍କର କର୍ତ୍ତବ୍ୟ।
हिंदी अनुवाद (Hindi)
विषय: पर्यावरण सुरक्षा और संस्कृति
नागरिक: हे भारत माता! तुम्हारा यह श्यामल (हरा-भरा) रूप हमारा गर्व है। लेकिन आज प्रदूषण के कारण तुम्हारी नदियाँ और पहाड़ क्षीण होते जा रहे हैं। हम शपथ लेते हैं कि हम अधिक से अधिक पेड़ लगाएँगे और अपनी पवित्र नदियों को स्वच्छ रखेंगे।
भारत माता: पुत्र, तुम्हारी यह सजगता ही मेरी वास्तविक रक्षा है। मेरी संस्कृति और प्रकृति को जीवित रखना तुम सभी का परम कर्तव्य है।
मातृभाषा और भाव
“स्तव कर बहु-अर्थ-भरे”
उपर्युक्त पंक्ति में भारत की प्रशंसा विविध अर्थों में की गई है। आप भी अपनी मातृभाषा में भारत की स्तुति के लिए एक कविता की रचना कीजिए और उसका भावार्थ हिंदी में भी लिखिए।
छात्र इसे अपने स्तर पर करें।
समास- समस्त पद एवं विग्रह
“कनक-शस्य-कमलधरे”
उपर्युक्त पंक्ति में ‘कनक शस्य’ का अर्थ है— कनक के समान शस्य (सोने जैसी फसलें) और कमलधरे का अर्थ है— हे कमल को धारण करने वाली! ये शब्द समास शब्द कहलाते हैं। ‘कनक-शस्य’ और ‘कमलधरा’ समस्त पद /सामासिक पद हैं। कमलधरे संबोधन शब्द है।
कविता में से चुनकर कुछ सामासिक पद (शब्द) नीचे दिए गए हैं। उनके समास विग्रह अपनी लेखन- पुस्तिका में लिखिए।
सामासिक पद | समास विग्रह | समास का नाम |
शतदल | शत (सौ) दल (पंखुड़ियों) का समूह | द्विगु समास |
ज्योतिर्जल | ज्योति (प्रकाश) रूपी जल | कर्मधारय समास |
शतमुख | सौ मुखों वाला (यहाँ भारत माता के संदर्भ में) | बहुव्रीहि समास / द्विगु |
सागरजल | सागर का जल | तत्पुरुष समास (संबंध) |
अलंकार – समझ और प्रयोग
“शतमुख-शतरव-मुखरे!”
उपर्युक्त पंक्ति के ‘शतमुख’ और ‘शतरव’ में ‘श’ वर्ण की पुनरावृत्ति हो रही है, इसीलिए यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
“मुकुट शुभ्र हिम-तुषार”
उपर्युक्त पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट कहा गया है। वास्तव में हिमालय मुकुट नहीं है, लेकिन कवि ने कल्पना के बल पर उसे मुकुट का रूप दे दिया। इससे भारत की छवि भव्य और दिव्य बन जाती है। यहाँ गुण की अत्यंत समानता के कारण उपमेय में उपमान का अभेद स्थापित किया गया है, इसीलिए यहाँ रूपक अलंकार है।
(क) कविता में जहाँ-जहाँ अनुप्रास अलंकार आया है, उन पंक्तियों को खोजकर लिखिए।
उत्तर – अनुप्रास अलंकार वहाँ होता है जहाँ वर्णों की आवृत्ति से काव्य में सौंदर्य पैदा हो। कविता से प्रमुख उदाहरण:
“भारति, जय, विजयकरे!”
वर्ण की आवृत्ति: यहाँ ‘ज’ और ‘य’ वर्ण की आवृत्ति हुई है।
“धवल धार हार गले”
वर्ण की आवृत्ति: ‘ध’ और ‘र’ वर्ण की आवृत्ति।
“प्राण प्रणव ओंकार”
वर्ण की आवृत्ति: ‘प्र’ वर्ण की आवृत्ति।
“शतमुख-शतरव-मुखरे!”
वर्ण की आवृत्ति: ‘श’, ‘त’ और ‘म’ वर्णों की सुंदर आवृत्ति हुई है।
(ख) कविता की उन पंक्तियों को खोजिए जहाँ रूपक अलंकार है। साथ ही यह भी बताइए कि कवि ने किस प्राकृतिक दृश्य या वस्तु को भारत का रूप मानकर चित्रित किया है?
उत्तर –
रूपक अलंकार वाली पंक्ति | चित्रित प्राकृतिक दृश्य / वस्तु | भारत माता के रूप में चित्रण |
“तरु-तृण-वन-लता वसन” | वृक्ष, घास, वन और लताएँ | इन्हें भारत माता के वस्त्र (वसन) के रूप में चित्रित किया गया है। |
“गंगा ज्योतिर्जल-कण धवल धार हार गले” | गंगा नदी की उज्ज्वल धारा | गंगा को भारत माता के गले के सफेद हार (धवल हार) के रूप में चित्रित किया गया है। |
“मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” | हिमालय की सफेद बर्फ | हिमालय की बर्फ को भारत माता के सिर के चमकदार मुकुट के रूप में चित्रित किया गया है। |
“लंका पदतल शतदल” | लंका (भौगोलिक स्थिति) | भारत के दक्षिण में स्थित लंका को माता के चरणों के नीचे स्थित कमल (शतदल) के रूप में चित्रित किया गया है। |
गतिविधियाँ
मिलकर लें शपथ
“तरु-तृण-वन-लता वसन/ अंचल में खचित सुमन”
वन, लता, पुष्प आदि भारत के अमूल्य प्राकृतिक संसाधन हैं। इनके संरक्षण के लिए सरकार द्वारा बनाए गए अधिनियमों के बारे में सूचना एकत्रित कीजिए और वन संरक्षण के लिए बनाए नियमों पर विचार कीजिए।
उत्तर – छात्र इसे शिक्षक की सहायता से पूरा करेंगे।

