Class VIII, Amrai, Gaate Ho Taru (Poem) – Makhanlal Chaturvedi, ICSE Board, The Best Solutions

कुछ करके सीखिए

कविता पूरी कीजिए-

पेड़ लगाओ, पेड़ लगाओ,

हरा-भरा धरा को बनाओ।

फल, छाया ये हमको देते,

दूर प्रदूषण को ये करते।

हम भी पेड़ लगाएँगे,

प्यारी धरा को बचाएँगे।

गाते हो तरु – सप्रसंग व्याख्या

पंडित माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा रचित यह कविता ‘चिर सुगंध तरु’ के माध्यम से धैर्य, परोपकार और समभाव का संदेश देती है।

प्रथम पद

सह सह कर ऋतुओं की मारें हर क्षण हरषाना

चिर सुगंध तरु, गाते हो, कितना जाग्रत गाना!

भावार्थ – कवि कहते हैं कि हे वृक्ष! तुम ग्रीष्म, वर्षा और शीत जैसी कठोर ऋतुओं की मार सहते हो, फिर भी हर क्षण प्रसन्न रहते हो। तुम्हारा यह जीवन एक ‘जाग्रत गान’ की तरह है, जो सोए हुए लोगों को जगाता है। तुम अपनी सुगंध और हरियाली से हर समय जीवन का उत्सव मनाते हो।

 

द्वितीय पद

हवा चली कि डोल उठते हो, रसना पत्र खोल उठते हो

सधे मौन के, बँधे मौन के, मंत्र अनंत बोल उठते हो,

स्थिर हो गतिमय, लखते हो जग का आना-जाना!

 

भावार्थ – जैसे ही हवा चलती है, तुम्हारे पत्ते झूमने लगते हैं। कवि कल्पना करते हैं कि तुम्हारे पत्ते तुम्हारी ‘जीभ’ हैं, जो हिलकर मौन के अनंत मंत्र बोलते हैं। तुम अपनी जगह पर स्थिर होकर भी संसार के ‘आने-जाने’ अर्थात् नित परिवर्तन को गतिमय होकर देखते हो। तुम्हारा यह मौन भी बहुत कुछ कह जाता है।

 

तृतीय पद

चिर सुगंध तरु, गाते हो, कितना जाग्रत गाना!

जड़ कंधों पर चिड़ियाँ चहकीं, डालें गंध-भरी महकीं

फल रस भरे फूल मनमोहें, झूमें हैं कुछ बहकी-बहकीं,

सब कुछ खोते हो, खरीदते हो कितना ‘पाना’?

भावार्थ – कवि कहते हैं कि हे तरु! तुम्हारा जीवंत गीत सृष्टि को मधुमय बनाता है। तुम्हारे कंधों अर्थात् शाखाओं पर पक्षी चहचहाते हैं और तुम्हारी डालें सुगंधित फूलों से महकती हैं। तुम्हारे फल रस से भरे हैं और फूल मन को मोह लेने वाले हैं। कवि एक बहुत सुंदर प्रश्न पूछते हैं कि तुम दूसरों को फल और छाया देने में अपना ‘सब कुछ’ खो देते हो, लेकिन बदले में जो संतोष और परोपकार का सुख ‘पाते’ हो, वह अनमोल है।

 

चतुर्थ पद

नीचे कीच, शीश पर बंदर, विषधर घूम रहे डालों पर

फूलों पर भौरों की भन-भन, उड़न डिठौने सी गालों पर,

फिर भी शीतल रहने का तरु भेद बताना!

चिर सुगंध तरु, गाते हो, कितना जाग्रत गाना!

भावार्थ – तुम्हारे जीवन की परिस्थितियाँ बड़ी विचित्र हैं। तुम्हारी जड़ों में कीचड़ है, सिर पर बंदर उछल-कूद करते हैं और डालों पर विषैले साँप घूमते रहते हैं। फूलों पर भौंरे भिनभिनाते हैं। इतनी सारी बाधाओं, गंदगी और विष के बीच रहकर भी तुम ‘शीतल’ अर्थात् शांत कैसे बने रहते हो? कवि वृक्ष से इस धैर्य और सहनशीलता का रहस्य पूछ रहे हैं। सचनुच पेड़ जीवन के जाग्रत गीत गाते हैं।

कविता का मुख्य संदेश

सहनशीलता – वृक्ष की तरह हमें भी जीवन के सुख-दुख और ऋतुओं के बदलाव को समान भाव से सहना चाहिए।

परोपकार – अपना सर्वस्व त्याग कर भी दूसरों को सुख (फल, छाया, सुगंध) देना ही जीवन की सार्थकता है।

समभाव – चाहे परिस्थितियाँ कीचड़ जैसी बुरी हों या डालों पर साँप जैसे शत्रु, हमें अपनी ‘शीतलता’ और ‘शांति’ नहीं खोनी चाहिए।

 

मौखिक (बोध प्रश्न)

प्रश्न – तरु कौन-से कष्ट सहते हैं?

उत्तर – तरु हर क्षण ऋतुओं की मार जैसे भीषण गर्मी, वर्षा और कड़ाके की ठंड के कष्ट सहते हैं, लेकिन फिर भी वे हमेशा प्रसन्न रहते हैं।

प्रश्न – डालों पर कौन-कौन से जीव हैं?

उत्तर – डालों पर पक्षी चहक रहे हैं, विषधर अर्थात् साँप घूम रहे हैं, बंदर उछल-कूद कर रहे हैं और फूलों पर भौंरे भिनभिना रहे हैं।

प्रश्न – सब जीवों का तरु पर होने पर भी तरु का क्या भाव है?

उत्तर – मित्र और शत्रु दोनों प्रकार के जीवों के होने और ऋतुओं के कष्ट सहने के बावजूद तरु का भाव हमेशा शीतल, शांत और हर्षित रहने का है। वह बिना किसी भेदभाव के सबको आश्रय प्रदान करता है।

 

शब्दार्थ (Word Meaning)

1 – तरु – वृक्ष / पेड़ – Tree

2 – सहना – बर्दाश्त करना – To endure / Bear

3 – हरषाना – खुश होना / प्रसन्न करना – To rejoice / Delight

4 – चिर सुगंध – सदा रहने वाली महक – Eternal fragrance

5 – जाग्रत – सचेत / जगा हुआ – Awake / Vigilant

6 – रसना – जीभ – Tongue

7 – पत्र – पत्ता – Leaf

8 – सधे मौन – गहरी शांति / साधना – Disciplined silence

9 – अनंत – जिसका कोई अंत न हो – Infinite / Endless

10 – लखते – देखते – To watch / Behold

11 – जग – संसार / दुनिया – World / Universe

12 – जड़ – निर्जीव / अचल – Inanimate / Rooted

13 – कंधे – शाखाएँ / डालियाँ – Shoulders (Branches)

14 – मनमोहें – मन को लुभाने वाले – Captivating / Charming

15 – बहकी-बहकी – मदमस्त होकर झूमना – Swaying / Intoxicated

16 – कीच – कीचड़ – Mud / Mire

17 – शीश – सिर – Head / Top

18 – विषधर – साँप (विष को धारण करने वाला) – Venomous snake / Serpent

19 – भन-भन – भौरों की आवाज़ – Buzzing sound

20 – डिठौने – नज़र का काला टीका – Beauty spot / Protective mark

21 – शीतल – ठंडा / शांत – Cool / Calm

22 – भेद – रहस्य – Secret / Mystery

23 – क्षण – पल – Moment

24 – मंत्र – पवित्र शब्द / उपदेश – Chant / Incantation

25 – वितान – विस्तार / शामियाना – Canopy / Expanse

लिखित

  1. एक वाक्य में उत्तर लिखिए-

क. ऋतुओं की मार सहकर भी वृक्ष क्या करते हैं?

उत्तर – ऋतुओं की मार सहकर भी वृक्ष हर क्षण प्रसन्न रहते हैं और आनंद का गाना गाते हैं।

ख. हवा चलते ही तरु पर क्या-क्या परिवर्तन होने लगते हैं?

उत्तर – हवा चलते ही तरु झूमने लगते हैं और उनके पत्ते सरसराहट की आवाज़ करते हैं, जिसे कवि ने ‘रसना खोलना’ कहा है।`

ग. ‘सब कुछ खोते हो’ कवि ने ऐसा क्यों कहा है?

उत्तर – कवि ने ऐसा कहा है क्योंकि वृक्ष दूसरों को फल, फूल और छाया देने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देते हैं।

घ. वृक्ष के विभिन्न अंगों पर कौन-कौन सुशोभित हैं?

उत्तर – वृक्ष के सिर पर बंदर, डालों पर साँप, कंधों पर पक्षी और फूलों पर भौंरे सुशोभित हैं।

 

  1. विस्तार से प्रश्नों के उत्तर लिखिए-

क. कवि ने वृक्षों के किस विशेष गुण की ओर हमारा ध्यान दिलाया है?

उत्तर – कवि ने वृक्षों की सहनशीलता और परोपकारिता के विशेष गुण की ओर ध्यान दिलाया है। वृक्ष कठिन परिस्थितियों में भी शांत रहकर दूसरों की सेवा करते हैं।

ख. कवि ने वृक्ष के गाने को जाग्रत गाना क्यों कहा है?

उत्तर – वृक्ष का गाना ‘जाग्रत’ इसलिए है क्योंकि यह हमें सचेत और सक्रिय रहने की प्रेरणा देता है। यह जीवन के प्रति उत्साह और जीवंतता का प्रतीक है।

ग. वृक्ष के गुण तपस्वी जैसे प्रतीत हो रहे हैं-स्पष्ट करें, कैसे?

उत्तर – वृक्ष एक तपस्वी की तरह हैं क्योंकि वे कीचड़ और साँप के बीच रहकर भी खुद को शीतल और पवित्र बनाए रखते हैं। वे बिना किसी फल की इच्छा किए समाज को सब कुछ अर्पण कर देते हैं।

 

  1. सही विकल्प चुनिए—

क. ‘सह सहकर ऋतुओं की मारें’ से क्या प्रकट होता है?

वृक्ष बहुत सहनशील हैं।

वृक्ष सभी ऋतुओं के प्रकोप झेलते हैं।

वृक्ष को सभी ऋतुएँ मारती हैं।

वृक्ष सदा हरियाली फैलाते हैं।

ख. रसना – पत्र खोल उठते हो-का अर्थ है-

पत्तों का उड़ना

पत्तों का खुलना

पत्तों की सरसराहट

पत्तों की हरियाली

 

  1. निम्नलिखित अर्थों के लिए गीत की पंक्तियाँ ढूँढ़कर लिखिए-

क. वृक्ष शांत और संतुलित हैं, हवा चलने से उनमें जब सरसराहट होती है तो ऐसा लगता है कि वृक्ष मंत्र पढ़ रहे हैं।

उत्तर – सधे मौन के, बँधे मौन के, मंत्र अनंत बोल उठते हो।

ख. वृक्ष अचल खड़े रहते हैं पर गतिमान हैं। उनकी शाखा, फल-पुष्प आदि में वृद्धि होती है और अपने जीवनकाल में लोगों का जन्म लेना, मृत्यु होना भी देखते हैं।

उत्तर – स्थिर हो गतिमय, लखते हो जग का आना-जाना!

ग. वृक्ष सदा प्रसन्नचित्त डोलता रहता है। उसमें सदा सुगंध बसी रहती है। उसके डोलने से, पत्तों और डालियों के झूमने से ऐसे स्वर निकलते हैं कि कहीं भी चुप्पी नहीं रहती।

उत्तर – चिर सुगंध तरु, गाते हो, कितना जाग्रत गाना! / हवा चली कि डोल उठते हो।

घ. फूलों पर मँडराते काले भँवरे गालों पर काजल के टीके जैसे प्रतीत होते हैं, ताकि वृक्षों को नज़र न लगे।

उत्तर – फूलों पर भौरों की भन-भन, उड़न डिठौने सी गालों पर।

 

  1. आशय स्पष्ट कीजिए—

क. चिर सुगंध तरु

उत्तर – वह वृक्ष जिसके व्यक्तित्व में हमेशा परोपकार और अच्छाई की सुगंध बसी रहती है।

ख. स्थिर हो गतिमय

उत्तर – वृक्ष एक स्थान पर स्थिर खड़ा है, फिर भी वह निरंतर वृद्धि करता है और बदलते समय का साक्षी बनता है।

ग. फिर भी शीतल रहने का तरु भेद बताना

उत्तर – संसार की कड़वाहट और गंदगी के बीच रहकर भी शांत रहने का रहस्य वृक्ष से सीखना चाहिए।

 

भाषा -बोध (Language Skills)

  1. दिए गए शब्दों के अलग-अलग अर्थ यहाँ लिखिए और कॉपी में वाक्य बनाइए – (Word Power)

जग – दुनिया (संसार), बर्तन (पानी रखने वाला)

डालें – टहनी (शाखा), क्रिया (नीचे गिराना)

पत्र – पत्ता, चिट्ठी (खत)

भेद – रहस्य, प्रकार (विभेद)

 

  1. दिए गए शब्दों के विलोम लिखिए- (Word Power)

जाग्रत X सुप्त (सोया हुआ)

सुगंध X दुर्गंध

मौन X मुखर (बोलना)

शीतल X उष्ण (गर्म)

जड़ X चेतन

संतुलित X असंतुलित

 

  1. इन वर्णों को संयोजित कर एक शब्द बनाइए-

भ् + औं + र् + औं – भौरों

ऋ + त् + उ + ओँ – ऋतुओं

ब् + अँ + ध् + ए – बँधे

स् + उ + ग् + अ + न् + ध् + अ – सुगंध

म् + अ + न् + त् + र् + अ – मंत्र

 

  1. संज्ञा के साथ उपयुक्त विशेषण शब्द लिखिए-

चिर – सुगंध

जाग्रत — गाना

अनंत — मंत्र

जड़ — कंधों

गंध-भरी — डालें

चिर सुगंध — तरु

 

  1. निम्नलिखित वाक्यों को पहचानकर भेद लिखिए-

क. शाम होते ही गाय लौट आई। सरल वाक्य

ख. कप नीचे गिरा और टूट गया। संयुक्त वाक्य

ग. मेरा विचार है कि आप घूमने चलें। मिश्र वाक्य

घ. वह मंदिर गया और नीचे बैठ गया। संयुक्त वाक्य

ङ. जो लड़का मेरे घर पर काम करता था वह बस से टकरा गया। मिश्र वाक्य

च. वह मंदिर जाकर नीचे बैठ गया। सरल वाक्य

छ. ज्यों ही छुट्टी हुई वैसे ही बच्चे घर चल पड़े। मिश्र वाक्य

 

जीवन कौशल एवं मूल्य (Life Skills and Values)

पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान देने के लिए आप किन-किन तरीकों का उपयोग कर सकते हैं? उसे अपने सहपाठियों के साथ साझा कीजिए।

प्लास्टिक का त्याग – सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के स्थान पर कपड़े के थैलों का उपयोग करें।

वृक्षारोपण – जन्मदिन या विशेष अवसरों पर कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएँ।

ऊर्जा और जल बचत – अनावश्यक बिजली के उपकरण बंद रखें और पानी का अपव्यय रोकें।

जागरूकता – ‘कम उपयोग, पुनर्चक्रण और पुन – उपयोग’ (3Rs) के मंत्र को सहपाठियों के बीच साझा करें।

 

रचनात्मक गतिविधियाँ

अपने मुख से (Oral Expression)

‘पेड़ न हों तो जीवन कैसा होगा’ इस विषय पर चर्चा कीजिए और वृक्ष की महिमा को स्वीकारते हुए शुभ अवसरों पर पेड़ लगाने की प्रतिज्ञा कीजिए।

वृक्ष से संबंधित विभिन्न कवियों की कविताएँ एकत्रित कर कवि-सम्मेलन का आयोजन कीजिए।

उत्तर – छात्र इसे शिक्षक की सहायता से पूरा करेंगे।

 

अपनी कलम से (Creative Writing)

विद्यालय में वृक्षारोपण समारोह आयोजित कर विद्यार्थियों में वृक्षों के प्रति संवेदनशीलता जाग्रत करते हुए ‘चिपको आंदोलन’ के विषय पर अनुच्छेद लिखिए।

‘चिपको आंदोलन’ पर्यावरण संरक्षण का एक ऐतिहासिक उदाहरण है। इसकी शुरुआत उत्तराखंड के चमोली जिले में हुई थी, जहाँ स्थानीय महिलाओं ने पेड़ों को काटने से बचाने के लिए उनसे लिपटकर (चिपककर) विरोध प्रदर्शन किया था। सुंदरलाल बहुगुणा इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे। यह आंदोलन हमें सिखाता है कि वृक्ष हमारे जीवन के रक्षक हैं और उनकी रक्षा के लिए हमें किसी भी हद तक जाना चाहिए।

वृक्ष पुनः हरा-भरा हो जाता है, इस परिवर्तन से हम क्या सीख सकते हैं? अपने विचार लिखिए।

पतझड़ के बाद वृक्ष का पुनः हरा-भरा होना हमें धैर्य और अटूट जीवंतता सिखाता है। यह परिवर्तन संदेश देता है कि जीवन में बुरा समय स्थायी नहीं है। यदि हम कठिन परिस्थितियों में हिम्मत न हारें और अपनी जड़ों (संस्कारों) से जुड़े रहें, तो हम फिर से फल-फूल सकते हैं और नई शुरुआत कर सकते हैं।

 

अपनी कल्पना से (From my Imagination)

पतझड़ का पत्रविहीन वृक्ष अपने बारे में जीव-जंतुओं को क्या बताना चाहता है?

पतझड़ का पत्रविहीन वृक्ष जीव-जंतुओं से कहता है कि उसकी नग्नता कमजोरी नहीं, बल्कि विश्राम और धैर्य की अवस्था है। वह समझाता है कि जीवन में पुराने को त्यागना आवश्यक है ताकि नए और कोमल पल्लव आ सकें। वह पक्षियों को भरोसा दिलाता है कि वह मरा नहीं है, बल्कि भीतर से शक्ति संचित कर रहा है ताकि आने वाले वसंत में वह फिर से सबको आश्रय और फल दे सके।

परियोजना कार्य (Project Work)

‘वृक्ष और पर्यावरण’ अथवा ‘वृक्ष हमारे मित्र’ विषय पर एक परियोजना तैयार कीजिए, जिसमें वृक्षों के चित्र, उनके महत्त्व, आवश्यकता से जुड़ी जानकारी और नारे (slogans) हों-

उत्तर – छात्र इसे अपने स्तर पर पूरा करें।

 

 

You cannot copy content of this page