खंभे जैसे पैर हैं इसके कान सूप के जैसे हैं। सूँड़ है इसकी लंबी मोटी आँखें छोटी-छोटी हैं काले रंग का होता है ये कद भी इसका ऊँचा है भारी कितना होगा ये क्या कभी किसी ने सोचा है मीठे गन्ने खाता है ये सूँड़ से पानी पीता है मस्त चाल...
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जीवन – सरल व्याख्या
निशिदिन गति करे सब अंत को इसका सबको भान नहीं है मति में कुमति के ही कारण धन लिप्सा में लिप्त रहे हैं अधम कर्म से सिक्त रहे हैं नरोचित गुण से रिक्त रहे हैं अनुभवों से वे तिक्त रहे हैं श्रेष्ठ कर्मों से च्युत रहे हैं उनकी दशा का...
संसार की श्रेष्ठ संपत्ति
धरा को धारण जिसने किया है, जिसने धरा में जीवन दिया है, जिसने सबका पुण्य किया है, जिससे धरा में बसी दुनिया है, नाम उसी का वृक्ष हमने दिया है.. नाम उसी का वृक्ष हमने दिया है। इसको ही कहे हम धरा का गहना, इसके बिना नहीं संभव जीना, सब...
प्रेम और परीक्षा
“ध्यान से सुनिए जो मैं कह रहा हूँ। भुवनेश्वर में 2400 स्केवेयर फीट ज़मीन, पीएफ़ में 21 लाख रुपए और एलआईसी में आठ लाख चालीस हज़ार का सम एस्श्योर्ड, ये सारी संपत्ति पूजा की ही होगी, अगर मुझे कुछ भी हो जाए तो पूजा की दूसरी शादी...
सच्चाई
सच्चाई फल में होती है – ऐसा कई लोग मानते हैं सच्चाई फूल में होती है – ऐसा कई से कुछ कम लोग मानते हैं सच्चाई पत्तों में होती है – ऐसा कुछ लोग मानते हैं सच्चाई डालियों में होती है – ऐसा कुछ से कुछ कम लोग मानते हैं...
एक तमन्ना थी और है …..
एक तमन्ना थी एक आरज़ू थी एक ही चाहत थी की तेरी कुर्बत में मेरी सारी ज़िंदगी गुजरे अब एक दूसरी तमन्ना है दूसरी आरज़ू है दूसरी चाहत है कि तू क्या तेरा साया भी मेरे पास से न गुजरे इसकी वजह जान लीजिए साहब मेरी पहली तमन्ना ने...
‘कुरुक्षेत्र’ रामधारी सिंह ‘दिनकर’
इच्छित बिंदु पर क्लिक करें। लेखक परिचय लेखक परिचय दिनकर जी का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम रवि सिंह तथा माता का नाम मनरूप देवी था। दिनकर की प्राथमिक शिक्षा गाँव से...
‘दाज्यू’ शेखर जोशी
दाज्यूचौक से निकल कर बायीं ओर जो बड़े साइनबोर्डवाला छोटा कैफे है, वहीं जगदीशबाबू ने उसे पहली बार देखा था। गोरा चिट्टा रंग, नीली शफ्फ़ाफ़ आँखें, सुनहरे बाल और चाल में एक अनोखी मस्ती – पर शिथिलता नहीं। कमल के पत्ते पर फिसलती...
‘पत्नी’ जैनेन्द्र कुमार
पत्नीजैनेंद्र कुमारशहर के एक ओर एक तिरस्कृत मकान। दूसरा तल्ला। वहाँ चौके में एक स्त्री अँगीठी सामने लिए बैठी है। अँगीठी की आग राख हुई जा रही है। वह जाने क्या सोच रही है। उसकी अवस्था बीस-बाईस के लगभग होगी। देह से कुछ दुबली है और...
‘पथ की पहचान’ हरिवंश राय बच्चन
पथ की पहचानपूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर लेपुस्तकों में है नहीं छापी गई इसकी कहानी,हाल इसका ज्ञात होता है न औरों की ज़बानी,अनगिनत राही गए इस राह से, उनका पता क्या,पर गए कुछ लोग इस पर छोड़ पैरों की निशानी,यह निशानी मूक होकर...

