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Sahityik Nibandh

पद्मावत (एल लघु विचार)

पद्मावत हिंदी साहित्य की प्रेमाश्रयी शाखा का प्रधान ग्रंथ है। इस शाखा के सभी सिद्धांतों का समावेश हमें पद्मावत में मिलता है। इस ग्रंथ के लेखक मलिक मुहम्मद जायसी हैं, जिन्होंने विशुद्ध अवधी भाषा में इस ग्रंथ की रचना की है। इनकी...

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हिंदी कविता का नवीन युग

हिंदी साहित्य का नवीन युग भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र जी के काल से प्रारंभ होता है। इस युग को वर्तमान युग का गद्य-युग भी कहते हैं। गद्य-युग कहने का यह तात्पर्य कभी नहीं समझना चाहिए कि इस काल में पद्य का सर्वथा लोप हो गया और उसका...

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हिंदी में गल्प और उपन्यास साहित्य (लघु निबंध)

हिंदी में गद्य का उत्थान हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने तीन कालों के अंतर्गत विभाजित किया है। भारतेंदु से पहले काल, भारतेंदु-काल और फिर द्विवेदी-काल। गल्प और उपन्यास साहित्य का प्रारंभ हमें निबंधों की भाँति भारतेंदु से पूर्व के...

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पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता (लघु विचार)

पृथ्वीराज रासो वीरगाथा-काल का उसी प्रकार प्रतिनिधि ग्रंथ है जिस प्रकार चंदबरदाई इस काल का प्रतिनिधि कवि। पृथ्वीराज रासो 69 समय (अध्याय) का एक बृहद ग्रंथ है। यह ग्रंथ दोहा, तोमर, त्रोटक तथा रोला इत्यादि आर्य-छंदों में लिखा हुआ है।...

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हिंदी साहित्य में नाटकों का विकास (लघु निबंध)

हिंदी-साहित्य में नाटक मौलिक रचनाओं द्वारा न आकर अनुवादों द्वारा प्रस्फुटित हुए हैं। मुस्लिम काल में लेखकों का ध्यान इस साहित्य की ओर इसलिए नहीं गया कि देश का वातावरण अव्यवस्थिति होने के कारण इसके प्रतिकूल था। मुसलमानों ने...

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विनय पत्रिका के बारे में जानें ……  

विनय पत्रिका गोस्वामी जी की अंतिम और साहित्य की दृष्टि से प्रौढ़तम रचना है। इसकी शैली उनकी सभी रचनाओं से पुष्ट हैं। इस रचना में भावों की पुष्टि के लिए कवि को कई भाषाओं का आश्रय लेना पड़ा है। यह समस्त पुस्तक गीति काव्य है। विनय...

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हिंदी में रीति-साहित्य धारा (लघु निबंध)

हिंदी साहित्य के इतिहासज्ञों ने रीति-काल का प्रारंभ संभवत् 1700 से माना है। हिंदी काव्य अब प्रौढ़ हो चुका था। मोहनलाल मिश्र ने शृंगार-सागर’ शृंगार संबंधी और करुणेश कवि ने ‘कर्णाभरण’ और ‘श्रुति-भूषण’ इत्यादि अलंकार संबंधी ग्रंथ...

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हिंदी साहित्य में छायावाद- (लघु निबंध)

हिंदी साहित्य में छायावाद का उदय जयशंकर प्रसाद के ‘आँसू’ और सुमित्रानंदन पंत की ‘वीणा’ से होता है। इन कविताओं के पाठकों ने इनमें रवींद्र बाबू की गीतांजलि और अंग्रेजी के मिस्टक (Mystic) कवियों की छाया पाई। इसलिए प्रारंभ में...

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हिंदी-साहित्य में प्रगतिवाद (लघु निबंध)  

छायावादी साहित्य की पलायनवादी प्रवृत्तियों के विपरीत विद्रोह-स्वरूप प्रगतिवाद का हिंदी-साहित्य में प्रादुर्भाव हुआ। संसार के राजनैतिक दृष्टिकोण में आध्यात्मिकता का धीरे-धीरे ह्रास हो रहा है। रूस के कम्यूनिज्म ने इस प्रवृत्ति को...

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हिंदी साहित्य मैं प्रकृत्ति-चित्रण (लघु निबंध)

साहित्य में प्रकृति का प्रधान स्थान है। प्रकृति में सौंदर्य है और सौंदर्य साहित्य का प्रधान गुण है, इसलिए साहित्य में सौंदर्य लाने के लिए प्रकृति-चित्रण अत्यंत आवश्यक है। साहित्यकारों ने प्रकृति का चित्रण स्वतंत्र रूप से और मानव...

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