परशुराम उन दिनों शिवजी से शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। अपने शिष्यों की मनोभूमि परखने के लिए शिवजी समय-समय पर उनकी परीक्षा लिया करते थे। एक दिन गुरु ने कुछ अनैतिक काम करके छात्रों की प्रतिक्रिया जाननी चाही। अन्य छात्र तो संकोच में दब...
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“संविधान निर्माता – बाबासाहेब आंबेडकर” के संघर्षमयी जीवन पर एक शानदार नाटक
“संविधान निर्माता – बाबासाहेब आंबेडकर”पात्र परिचय –नरेटर (वाचक) – जो पूरे नाटक को वर्णन करेगाभीमराव रामजी आंबेडकर (बाबासाहेब) – नायकरामजी सकपाल – बाबासाहेब के पिताभीमाबाई – बाबासाहेब की मातागुरुजी – स्कूल के...
‘भगवान के डाकिए’ कविता का संपूर्ण अध्ययन, रामधारी सिंह ‘दिनकर’
भगवान के डाकिए पक्षी और बादल,ये भगवान के डाकिए हैं,जो एक महादेश सेदूसरे महादेश को जाते हैं।हम तो समझ नहीं पाते हैंमगर उनकी लाई चिट्टियाँपेड़, पौधे, पानी और पहाड़बाँचते हैं।हम तो केवल यह आँकते हैंकि एक देश की धरतीदूसरे देश को...
‘हिमालय’ कविता का संपूर्ण अध्ययन, रामधारी सिंह ‘दिनकर’
हिमालय मेरे नगपति! मेरे विशाल! साकार, दिव्य, गौरव विराट्! पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल!मेरी जननी के हिम-किरीट! मेरे भारत के दिव्य भाल!मेरे नगपति! मेरे विशाल! युग-युग अजेय, निर्बन्ध, मुक्त,युग-युग गर्वोन्नत, नित महाननिस्सीम व्योम...
‘चंद्रगहना से लौटती बेर’ केदारनाथ अग्रवाल
चंद्रगहना से लौटती बेर देख आया चंद्रगहना। देखता हूँ दृश्य अब मैंमेंड़ पर इस खेत की बैठा अकेला।एक बीते के बराबरयह हरा ठिंगना चना,बाँधे मुरैठा शीश परछोटे गुलाबी फूल का,सज कर खड़ा है। पास ही मिलकर उगी हैबीच में अलसी हठीलीदेह की...
‘घन गरजे जन गरजे’ केदारनाथ अग्रवाल
घन–जन घन गरजे जन गरजे बन्दी सागर को लख कातरएक रोष सेघन गरजे जन गरजेक्षत-विक्षत लख हिमगिरि अन्तरएक रोष सेघन गरजे जन गरजेक्षिति की छाती को लख जर्जरएक शोध सेघन गरजे जन गरजेदेख नाश का ताण्डव बर्बरएक बोध सेघन गरजे जन गरजे कवि परिचय...
‘धूप’ केदारनाथ अग्रवाल
धूप धूप चमकती है चाँदी की साड़ी पहने मैके में आयी बेटी की तरह मगन है फूली सरसों की छाती से लिपट गयी है जैसे दो हमजोली सखियाँ गले मिली हैं भैया की बाँहों से छूटी भौजाई-सी लहँगे को लहराती लचती हवा चली है सारंगी बजती है खेतों की...
‘अन्वेषण’ पंडित रामनरेश त्रिपाठी
अन्वेषणमैं ढूँढता तुझे था जब कुंज और वन में,तू खोजता मुझे था तब दीन के वतन में,तू आह बन किसी की मुझको पुकारता था।मैं था तुझे बुलाता संगीत में, भजन में।मेरे लिए खड़ा था दुखियों के द्वारा पर तू,मैं बाट जोहता था तेरी किसी चमन में।बन...
‘माँझी न बजाओ बंशी’ केदारनाथ अग्रवाल
माँझी न बजाओ बंशी माँझी ! न बजाओ बंशी मेरा मन डोलतामेरा मन डोलता है जैसे जल डोलताजल का जहाज जैसे पल-पल डोलतामाँझी! न बजाओ बंशी मेरा प्रन टूटतामेरा प्रन टूटता है जैसे तृन टूटतातृन का निवास जैसे बन-बन टूटतामाँझी! न बजाओ बंशी मेरा...
साकेत– अष्टम सर्ग – व्याख्या सहित, मैथिलीशरण गुप्त
‘साकेत‘ के चयनित अंश अष्टम सर्ग निज सौध सदन में उटज पिता ने छाया,मेरी कुटिया में राज-भवन मन भाया।सम्राट स्वयं प्राणेश, सचिव देवर हैं,देते आकर आशीष हमें मुनिवर हैं।धन तुच्छ यहाँ,-यद्यपि असंख्य आकर हैं,पानी पीते मृग...

