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सर्वोदयवाद

संसार में दो विचारधाराएँ अर्थ चक्र को संचालित कर रही हैं—एक लोक- तंत्री देशों की निजी उद्योग-पद्धति है, जिसे पूँजीवाद कहते हैं। दूसरी विचार- धारा समाजवाद या साम्यवाद की है। ऐसा प्रतीत होता है कि अन्य देशों की भाँति भारत भी आज दो...

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साम्यवाद

दो प्रणालियाँ आज समस्त संसार दो भागों में बँटता जा रहा है। एक वे देश हैं, जहाँ समाजवाद या साम्यवाद की विचारधारा काम करती है, और दूसरे वे देश हैं जहाँ लोकतंत्रवाद की भावना काम कर रही है। साम्यवाद और लोकतंत्र- वाद, इन दो शब्दों से...

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पूँजीवाद

यों तो बहुत प्राचीन काल से उत्पादन के साधनों पर मनुष्य का व्यक्तिगत अधिकार था, परंतु पूँजीवाद का वर्तमान स्वरूप तभी से विकसित हुआ, जब से विज्ञान का सहयोग पूँजीपतियों ने प्राप्त किया। पूँजीवाद का इतिहास यूरोप और विशेषकर ब्रिटेन का...

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लोकमान्य तिलक

“लोकमान्य जनता के आराध्य देव थे। उनके वचन हजारों लोगों के लिए वेद-वाक्य थे। वे पुरुषों में पुरुष सिंह थे। देश भक्ति उनका धर्म हो गया था। उन्होंने निःसंदेह स्वराज्य प्राप्त करने की अवधि कई वर्ष कम कर दी। भारतीय उनको यह कहकर स्मरण...

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महान मानव गांधी

महात्मा गांधी जैसी विभूतियाँ सदियों बाद आती हैं। राजनैतिक नेता प्रायः प्रत्येक देश में होते रहते हैं, बड़े-बड़े कुशल सेनापतियों के भी नाम हम पढ़ते रहते हैं, सामाजिक सुधारकों के भी दर्शन समय-समय पर होते रहे हैं, विचारकों एवं...

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युग प्रवर्तक दयानंद

जो महान आत्माएँ शताब्दियों बाद दुर्दशाग्रस्त समाज और देश का उद्धार करने के लिए पुण्यभूमि भारत में अवतरित हुई हैं, उनमें ऋषि दयानंद का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ऋषि दयानंद ने भारत में ऐसे समय जन्म लिया था, जब देश की स्थिति...

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महात्मा बुद्ध व उनका संदेश

आज के कुछ दशकों पहले बुद्ध – पूर्णिमा (24 मई 1956) को भारत तथा अन्य अनेक पूर्वी एशिया के देशों ने महात्मा बुद्ध का 2500वीं स्मृति दिवस मना कर भारत और विश्व की एक पवित्रतम, विशुद्धतम और उदात्ततम विभूति के प्रति श्रद्धांजलि...

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हमारे पड़ोसी

राजनीतिज्ञ आचार्य महामति चाणक्य ने कहा है कि सामान्यतया पड़ोसी देश अपना शत्रु होता है और उसके साथ का देश अपना मित्र होता है। चाणक्य की इस उक्ति में काफी सच्चाई है। संसार का इतिहास और विशेषकर योरोप का इतिहास इसकी पुष्टि करता है।...

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पंचशील

जिन कुछ शब्दों ने आज के अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में बहुत अधिक महत्त्व प्राप्त कर लिया है, उनमें से ‘पंचशील’ सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। आज संस्कृत का यह शब्द केवल भारतवर्ष में ही नहीं बोला जाता, अपितु संसार के सभी महाद्वीपों — रूस...

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भारत की विदेश नीति

जब तक भारत पराधीन था, उसकी अपनी कोई अंतर्राष्ट्रीय राजनीति नहीं थी। ब्रिटिश सरकार की नीति भारत सरकार की नीति थी। इंगलैंड के शत्रु भारत के शत्रु माने जाते थे, और उसके मित्र हमारे मित्र। 1914 में इंग्लैंड और जर्मनी में युद्ध छिड़ा...

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