एक परिवार के सबसे छोटे बच्चे को किसी आत्मीयजन ने उपहारस्वरूप एक पटाखे वाली बंदूक दी थी। उस बंदूक में तीन खासियत थी पहली तो यह कि वह मजबूत थी, दूसरी यह कि उस जैसी बंदूक मोहल्ले में किसी के पास न थी जिस कारण से बच्चा उससे अपनी...
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अठन्नी का रुपया
एक आठ साल के बच्चे को अगर सबकुछ भी उपलब्ध करवा दिया जाए तो उत्सुकता के कारण ही सही पर वह कुछ न कुछ शरारत ज़रूर करेगा। इसके विपरीत अगर एक ऐसा बच्चा जो बहुत सारी चीजों से वंचित रहा हो उसके शरारत करने की सूरतें पहले वाले बच्चे से...
शर्बत का गिलास
घटना लगभग 1993 की … रामनवमी का जुलूस निकला हुआ था। सभी जुलूस में लठैतों और करतब दिखाने वाले को देखकर सम्मोहित हो रहे थे। वहीं पर कमेटी की तरफ़ से नि:शुल्क शर्बत वितरण का भी प्रबंध था। वहाँ भी लोगों की काफी भीड़ लगी हुई थी।...
About Avinash
अविनाश रंजन गुप्ता हिंदी भाषा के एक समर्पित शिक्षक हैं, जो हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए सक्रिय रूप से कार्यरत हैं। अपने दोनों वैबसाइट्स और यूट्यूब चैनल पर ये हिंदी भाषा से जुड़े तमाम तरह की अध्ययन सामग्रियाँ उपलब्ध कराते रहते...
‘ले चल वहाँ भुलावा देकर’ जयशंकर प्रसाद की रचना
ले चल वहाँ भुलावा देकरले चल वहाँ भुलावा देकर,मेरे नाविक धीरे-धीरे।जिस निर्जन में सागर लहरी,अम्बर के कानों में गहरी-निश्छल प्रेम-कथा कहती हो,तज कोलाहल की अवनी रे।जहाँ साँझ-सी जीवन छाया,ढीले अपनी कोमल काया,नील नयन से ढुलकाती...
कर गयी प्लावित तन-मन सारा (झरना) जयशंकर प्रसाद की रचना
कर गयी प्लावित तन-मन सारा (झरना)मधुर है स्रोत मधुर है लहरीन है उत्पात, छटा है छहरीमनोहर झरनाकठिन गिरि कहाँ विदारित करनाबात कुछ छिपी हुई है गहरीमधुर है स्रोत मधुर है लहरीकल्पनातीत काल की घटनाहृदय को लगी अचानक रटनादेखकर झरनाप्रथम...
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता ‘भिक्षुक’ का संपूर्ण अध्ययन
भिक्षुकवह आता-दो टूक कलेजे के करता पछतातापथ पर आता।पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक,चल रहा लकुटिया टेक,मुट्ठी भर दाने को भूख मिटाने कोमुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता-दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।साथ में दो बच्चे भी हैं सदा हाथ...
महाकवि नागार्जुन की कविता ‘सिंदूर तिलकित भाल’ कविता का सम्पूर्ण अध्ययन
सिंदूर तिलकित भालघोर निर्जन में परिस्थिति ने दिया है डाल!याद आता तुम्हारा सिंदूर तिलकित भाल!कौन है वह व्यक्ति जिसको चाहिए न समाज?कौन है वह जिसको नहीं पड़ता दूसरे से काज?चाहिए किसको नहीं सहयोग?चाहिए किसको नहीं सहवास?कौन चाहेगा कि...
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता ‘तोड़ती पत्थर’ का संपूर्ण अध्ययन
तोड़ती पत्थरवह तोड़ती पत्थर;देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर-वह तोड़ती पत्थर। कोई न छायादारपेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;श्याम तन, भर बँधा यौवन,नत नयन, प्रिय कर्मरत मन,गुरु हथौड़ा हाथ,करती बार-बार प्रहार-सामने तरु-मालिका...
नागार्जुन की कविता ‘अकाल और उसके बाद’ का संपूर्ण अध्ययन
अकाल और उसके बादकई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदासकई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पासकई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्तकई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्तदाने आए घर के अंदर कई दिनों के बादधुआँ उठा आँगन के ऊपर कई...

