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Sahityik Nibandh

हिंदी  एकांकी का विकास

‘एकांकी’ से हमारा तात्पर्य एक ही अंक में समाप्त हो जाने वाले उस नाटक से है जिसका रंगमंच पर अभिनय किया जा सके। आधुनिक युग में गद्य का प्रारंभ होने पर लेखकों का ध्यान एकांकी नाटकों की रचना की ओर भी गया। उस समय अंग्रेजी...

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हिंदी नाटक का विकास

गद्य – साहित्य के अन्य अंगों की भाँति हिंदी में नाटक रचना का प्रारंभ भी भारतेंदु-युग में ही हुआ। हिंदी से पूर्व संस्कृत साहित्य में अनेक नाटकों की सफल रचना की गई थी। हिंदी का सर्वप्रथम उल्लेखनीय नाटक ‘नहुष’ है।...

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मलिक मुहम्मद जायसी

का जन्म सम्वत् 1546 में हुआ था। वह एक सज्जन प्रकृति के ईश्वर भक्त व्यक्ति थे। पहले वह एक गृहस्थ कृषक थे, किंतु बाद में किसी दुर्घटना में अपने पुत्रों की मृत्यु हो जाने पर उन्होंने वैराग्य धारण कर लिया। उन्होंने...

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हिंदी काव्य में राष्ट्रीय भावना

हिंदी काव्य में राष्ट्रीय भावना का चित्रण मुख्य रूप से आधुनिक युग में ही हुआ है। इससे पूर्व वीरगाथा काल में उसकी एक धारा प्राप्त अवश्य होती है, किंतु वह अपने आप में अत्यंत क्षीण है। इसका कारण यही है कि उस युग में उत्साह की भावना...

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हिंदी काव्य में प्रकृति-चित्रण

प्रकृति अपने सहज सौंदर्य की ओर मानव का सदा से ही ध्यान आकर्षित करती रही है। काव्य में प्रकृति चित्रण की ओर भी प्रारंभ से ध्यान दिया जाता रहा है। प्रकृति-सौंदर्य का चित्रण करने वाले काव्य में एक विशेष सरलता और स्वाभाविकता की...

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हिंदी का भ्रमरगीत-काव्य

‘भ्रमरगीत’ से हमारा तात्पर्य उन मुक्तक गीतों से है जिनमें गोपियों ने भ्रमर को संबोधित करते हुए कृष्ण और उद्धव के प्रति व्यंग्य किए हैं। कृष्ण के मथुरा चले जाने पर गोपियाँ उनके वियोग में उदास रहने लगी थीं। जब श्रीकृष्ण...

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हिंदी का गीति काव्य

हिंदी का गीति काव्य ‎जिस काव्य रचना को गाया जा सके उसे ‘गीति काव्य’ कहते हैं। गीति- काव्य की रचना मुक्तक कविता के रूप में की जाती है। अतः उसमें एक ही भाव को मार्मिक रूप में उपस्थित किया जाता है। भाव-पक्ष की दृष्टि से...

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हिंदी काव्य में प्रगतिवाद

हिंदी में प्रगतिवादी साहित्य की रचना इसी युग की देन है। इसकी रचना छायावादी काव्य के प्रति प्रतिक्रिया के रूप में हुई थी। इससे पूर्व छायावाद के कवि अपने भावों को सूक्ष्म रूप में उपस्थित किया करते थे। इस सूक्ष्मता के लिए कल्पना और...

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हिंदी काव्य में रहस्यवाद

‘रहस्यवाद’ से हमारा तात्पर्य उस सिद्धांत से है जो ईश्वर के रहस्य को प्राप्त करने की विधि बताता है। साधारणतः यह स्वीकार किया गया है कि रहस्यवाद की तीन स्थितियाँ होती है। प्रथम स्थिति के अनुसार जब व्यक्ति संसार की...

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हिंदी का छायावादी काव्य

द्विवेदी युग के पश्चात् हिंदी में ‘छायावाद’ के नाम से एक नवीन काव्य- धारा का प्रारंभ हुआ। इस काव्य का परिचय हमें सर्वप्रथम श्री जयशंकर प्रसाद की कविताओं में मिलता है। इस काव्यधारा में भावना और कला, दोनों ही क्षेत्रों...

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