कालिदास कालिदास सच-सच बतलाना ! इंदुमती के मृत्युशोक से अज रोया या तुम रोए थे कालिदास सच-सच बतलाना ! शिवजी की तीसरी आँख से निकली हुई महाज्वाला में घृतमिश्रित सूखी समिधा – सम कामदेव जब भस्म हो गया रति का क्रंदन सुन आँसू से...
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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता ‘बादल राग’ का सम्पूर्ण अध्ययन
बादल राग तिरती है समीर-सागर परअस्थिर सुख पर दुख की छाया –जग के दग्ध हृदय परनिर्दय विप्लव की प्लावित माया –यह तेरी रण-तरीभरी आकांक्षाओं से,घन, भेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुरउर में पृथ्वी के, आशाओं सेनवजीवन की, ऊँचा कर...
‘ग्रंथि’ सुमित्रानंदन पंत की श्रेष्ठ रचना का अध्ययन
‘ग्रंथि’ - कविता परिचय पंत जी की प्रारंभिक रचनाएँ हैं – ‘ग्रंथि’, ‘वीणा’ और ‘पल्लव’। परंतु ‘ग्रंथि’, ‘उच्छ्वास’ और ‘आँसू’ एक ही प्रेम-काव्य के तीन खंड...
जाहिल से ज़हीन
चोरी सबने की थी, लेकिन मेरी चोरी पकड़ी गई। सबकी चोरी की सजा इक मुझको ही दी गई। चोरी क्या कलंक थी, जो माथे से चिपक गई, मेरे रोने-धोने-पछताने से भी यह तनिक न कम हुई। फिर एक दिन …… निर्णय लिया खुद से कि अपनी नई...
सुमित्रानंदन की कविता ‘यह धरती कितना देती है!’ का सम्पूर्ण अध्ययन
कविता परिचय — यह धरती कितना देती है ! इस कविता की रचना सन् 1954 में हुई थी। यह कविता पंत जी की उन रचनाओं का प्रतिनिधित्व करती है जिनमें कवि ने अनुभूतियों की तीव्रता और सूक्ष्मता को सहज और सरल ढंग से प्रस्तुत किया है। इसे इनकी...
‘सदाचार का तावीज’ हरिशंकर परसाई जी की रचना का सम्पूर्ण अध्ययन
मूल भाव सचिव वैद गुरु तीनि जो, प्रिय बोलहिं भयु आस।राज, धर्म, तन तीनि कर, होइ बेगिही नास॥ पाठ परिचय ‘सदाचार का तावीज’ व्यंग्य पाठ में हरिशंकर परसाई जी ने भ्रष्टाचार के कारण तथा निवारण के उपायों को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत...
स्वयं से शपथ
कुछ भी अप्राप्य नहीं जगत में इसे तुम आत्मसात कर जाओ अपने सपने को पूरा करने बस जज़्बातों से भर जाओ। क्यों है ज़रूरी ये जीवन में खुद से पूछो खुद से बात करो उत्तर मिलेगा तुम्हें तुमसे ही फिर विजयपथ पर बढ़ते जाओ। रुको न क्षण...
सुमित्रानंदन की कविता ‘पल्लव’ का सम्पूर्ण अध्ययन
पाठ परिचय ‘पल्लव’ आपने एक तीर से दो निशान की उक्ति तो सुनी होगी लेकिन एक तीर से तीन निशान कैसे साधा जाता है यह हमें सुमित्रानंदन पंत की कविता पल्लव से ज्ञात होगा। अपनी इस कविता के माध्यम से कवि पहले तो कविता में वर्णित ‘पल्लव’...
सही जीवन जीने की कला
क्या तुमने कभी सोचा है, की तुम्हारा जीवन कैसा हो? बड़ा महत्त्वपूर्ण प्रश्न है यह, इसी पर ही टिकी हुई है, जीने की चाह, और जीवन की राह। यही प्रश्न बनाता है- आदमी को संगीन इसका उत्तर बनाता है- जीवन को रंगीन जो नहीं...
तुम्हारे पास तुम्हारा है।
तुम्हारे पास तुम्हारा है। मेरे पास मेरा है। तुम्हें तुम्हारा प्रिय है। मुझे मेरा पसंद है। तुम अपने के गुण गाओगे, मैं अपने को श्रेष्ठ मानूँगा। ये मुमकिन है कि मुझे तुम्हारा और तुम्हें मेरा अच्छा लगे, शायद यही सच्चा भी लगे...

