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जीवन परिचय
जन्म – डॉ. देवेंद्रनाथ शर्मा का जन्म 1918 ई. में बिहार के छपरा जिले के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था।
शिक्षा – उनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव में हुई, जिसके बाद उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। वे संस्कृत और हिंदी के प्रकांड विद्वान थे।
कार्यक्षेत्र – उन्होंने अपना अधिकांश जीवन अध्यापन (Teaching) में बिताया। वे पटना विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष और बाद में पटना विश्वविद्यालय तथा संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा के कुलपति (Vice-Chancellor) भी रहे।
साहित्यिक विशेषताएँ
डॉ. देवेंद्रनाथ शर्मा एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे। उनकी रचनाओं में निम्नलिखित विशेषताएँ प्रमुखता से दिखाई देती हैं –
- ऐतिहासिक दृष्टि – उन्होंने इतिहास की घटनाओं को केवल तथ्यों के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रस्तुत किया। ‘बाबर की ममता’ इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
- भाषा शैली – उनकी भाषा तत्सम प्रधान (Sanskritized) होने के साथ-साथ उर्दू-फारसी के शब्दों से भी युक्त है, जो उनके नाटकों के पात्रों को सजीव और ऐतिहासिक परिवेश के अनुकूल बनाती है।
- मानवीय मूल्य – उनके साहित्य में त्याग, बलिदान, प्रेम और उच्च नैतिक मूल्यों पर विशेष बल दिया गया है। वे मनुष्य के भीतर छिपी कोमलता और कठोरता के द्वंद्व को बखूबी चित्रित करते थे।
- सशक्त संवाद – उनके नाटकों के संवाद छोटे, प्रभावशाली और चरित्रों की मनोदशा को प्रकट करने वाले होते हैं।
प्रमुख रचनाएँ
डॉ. शर्मा ने गद्य की विभिन्न विधाओं में अपनी लेखनी चलाई –
नाटक और एकांकी – ‘बाबर की ममता’ (ऐतिहासिक एकांकी)
‘पारिजात’
‘अपनी धरती’
आलोचना और निबंध – ‘साहित्य समीक्षा’
‘भाषा विज्ञान की भूमिका’ (यह हिंदी भाषा विज्ञान के क्षेत्र में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक मानी जाती है)
‘अलंकार मुक्तावली’
संपादन – उन्होंने कई साहित्यिक पत्रिकाओं और ग्रंथों का संपादन भी किया।
सम्मान और उपलब्धि
साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार और शोध के लिए विद्वानों के बीच अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।
डॉ. देवेंद्रनाथ शर्मा का नाम हिंदी के उन विद्वानों में अग्रणी है जिन्होंने अकादमिक जगत और सृजनात्मक साहित्य के बीच एक सुंदर सेतु बनाया। उनके एकांकी न केवल रंगमंच पर सफल रहे, बल्कि पाठकों के हृदय में मानवीय संवेदनाओं को जगाने में भी समर्थ हुए।
बाबर की ममता
पात्र परिचय
बाबर – मुगल साम्राज्य का संस्थापक, हुमायूँ का पिता
माहम – बाबर की पत्नी, हुमायूँ की माता
हुमायूँ – बाबर का पुत्र
मुर्तजा – हकीम
अबू बका – एक वयोवृद्ध धर्मात्मा
सेनापति, दास-दासी आदि।
प्रथम दृश्य
[स्थान – आगरा का चारबाग। चारों ओर तरह-तरह के फूलों के पौधे और बेलें लगी हुई हैं। बाग के बीच में बाबर का अत्यन्त सुंदर विशाल राजभवन। इसी राजभवन के एक कमरे में बाबर का पुत्र हुमायूँ बीमार पड़ा है। बीमारी धीरे-धीरे बिगड़ती जाती है और उसके साथ हुमायूँ के जीवन की आशा भी क्षीण पड़ती जाती है। बाबर इस समय आगरे से बाहर धौलपुर में है। हुमायूँ की बीमारी की खबर मिलते ही वह आगरे लौट पड़ता है।दोपहर का समय है। चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ है और वातावरण से उदासी टपक रही है। बाग के भीतर घुसते ही वहाँ के सन्नाटे से बाबर स्तब्ध हो जाता है। उसके आते ही राजभवन में कुछ हलचल होती है। वह सीधे उस कमरे में पहुँचता है जहाँ हुमायूँ पड़ा हुआ है। माहम बेगम – हुमायूँ की माँ – उसके पलंग के पास बैठी है और चिंता से उसका चेहरा उतरा हुआ है। बाबर को आया देखकर वह चुपचाप सिर झुकाकर खड़ी हो जाती है। बाबर एक बार उसकी ओर देखता है और फिर हुमायूँ के बिस्तर के नजदीक जाकर खड़ा हो शांत भाव से उसे एकटक देखता रहता है।]
बाबर – [हुमायूँ के सिर पर धीरे से हाथ फेरते हुए धीमी आवाज में] बेटे! बेटे! [हुमायूँ आँखें बंद किए निश्चेष्ट पड़ा है, कोई उत्तर नहीं देता। बाबर उसकी ओर जरा ध्यान से देखकर माहम को बगल के कमरे में चलने को इशारा करता है। माहम उसके पीछे-पीछे जाती है।] [माहम से] ऐसी हालत कब से है?
माहम – [निराशा भरे स्वर में] सात दिनों से।
बाबर – हकीम साहब क्या कहते हैं?
माहम – कुछ साफ कहते नहीं, लेकिन ऐसा लगता है, जैसे भीतर-भीतर वह भी घबराए ही हुए हैं।
बाबर – अभी वह हैं कहाँ?
माहम – थोड़ी ही देर हुई, दवा देकर खाना खाने गए हैं। सुबह से यहीं बैठे थे। मेरे जानते उनकी अक्ल कुछ काम नहीं कर रही है।
बाबर – [गंभीर स्वर में] अच्छा। हम आते हैं।
[बाबर बाहर जाने लगता है। माहम घुटने टेककर उसके पैर पकड़ लेती है। उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं।]माहम – [दीन स्वर में] जहाँपनाह! मेरे सरताज! आपके कई लड़के हैं, लेकिन मेरा… मेरा यह एक हुमायूँ ही है। चार औलादों में एक यही बच रहा है। मैं अपनी इन्हीं बदनसीब आँखों से, एक के बाद दूसरे को, मौत के मुँह में जाते देखती रही हूँ और सीने पर पत्थर रखकर सब बर्दाश्त करती गई हूँ, लेकिन आज… अब नहीं…यह आखिरी औलाद… यह कलेजे का टुकड़ा… ! नहीं…नहीं, माँ का दिल इससे ज्यादा तंग…नहीं हो सकता… ! मैं अपनी इन बदनसीब आँखों को फोड़ लूँगी, लेकिन हुमायूँ की मौत नहीं देख सकती… नहीं देख सकती! [सिसकने लगती है।]
बाबर – [प्रेम से उठाकर सिर पर हाथ फेरते हुए] माहम! मलका! घबराओ मत!
माहम – [रोते हुए] सरताज! मैं न घबराऊँ तो और कौन घबराए? काश! आपको एक औरत—एक माँ—का दिल मिला होता! मुझे यह धन-दौलत कुछ नहीं चाहिए लेकिन मेरा बेटा… या खुदा! मेरा यह बेटा मुझसे न छीन! एक माँ का दिल तोड़कर—उसकी दुनिया उजाड़कर—तुझे क्या मिल जाएगा? मेरे सरताज! मैं आपके पैरों पड़ती हूँ। जैसे-भी हो, मेरे बेटे को बचाइए। आपको बादशाहत प्यारी है, लेकिन मुझे…मुझे मेरा बेटा प्यारा है। मेरे सरताज!
बाबर – [कोमल, गंभीर स्वर में] माहम! तुम्हारा कहना सही है। बादशाहत प्यारी जरूर है, अगर वह प्यारी नहीं रहती तो हम मादरे-वतन फरगना को छोड़कर पहाड़ों, नदियों, जंगलों और रेगिस्तानों की खाक नहीं छानते फिरते; महीने की आधी से ज्यादा रातें, खुले आसमान के नीचे, घोड़े की पीठ पर, जागते हुए नहीं गुजारते। लेकिन नहीं, औलाद उस बादशाहत से भी कहीं ज्यादा प्यारी चीज है। बादशाह भी इन्सान होता है। हमें औलादों की कमी नहीं है लेकिन हुमायूँ… ! [लंबी साँस लेता है] हुमायूँ हमारी आँखों की रोशनी, दिल की उम्मीद और जिंदगी का सहारा है। मलका! मायूस न हो! हुमायूँ के लिए हम एक बार मौत से भी लड़ेंगे। हकीम को बुलवाओ। हम एक बार खुद उनसे बातें करना चाहते हैं।
[दोनों हुमायूँ के कमरे में आते हैं। वह उसी भाँति निश्चेष्ट पड़ा है। बाबर उसकी बगल में बैठ जाता है। माहम बाँदी को हकीम को बुलवाने के लिए इशारा करती है। जब तक वह बाहर निकलती है तब तक दरबान हकीम के आने की इत्तला करता है।]दरबान – [दरबारी ढंग से सलाम कर] जहाँपनाह की खिदमत में हकीम साहब हाजिर हैं।
बाबर – आने दो। [दरबान बाहर जाता है।][क्षण भर बाद हकीम का प्रवेश। हकीम आकर दरबारी ढंग से झुककर सलाम करता है। बाबर धीरे से सिर हिला देता है।]
बाबर – आइए, तशरीफ रखिए। [हकीम एक तिपाई पर बैठ जाता है।]
हकीम – [कुछ आश्चर्य से] आलमपनाह! अभी कदमरंजा फरमा रहे हैं?
बाबर – हाँ, हम आ ही रहे हैं। आप आ गए, अच्छा हुआ। हम अभी आपको बुलवा रहे थे?
हकीम – ताबेदार चंद ही लमहे पहले यहाँ से गया है और खुद ही दौड़ा चला आ रहा है। इसी बीच आलमपनाह को इसे याद करने की तकलीफ गवारा करनी पड़ी, इसके लिए बंदा माफी चाहता है।
बाबर – हकीम साहब!
हकीम – आलमपनाह!
बाबर – शाहजादे की बीमारी के मुतल्लिक आपका क्या खयाल है?
हकीम – [गंभीर आवाज में] आलमपनाह! बुखार बहुत तेज है। उसकी वजह से हमेशा बेहोशी रह रही है। साथ ही और भी शिकायतें हैं। अपनी लियाकत के मुताबिक जो कुछ भी मुमकिन है, खादिम कर रहा है; लेकिन अभी तक… [रुक जाता है।]
बाबर – हालत में पहले से कोई फर्क नहीं है?
हकीम – जी नहीं, मैं तो शाहजादे की बीमारी को अपना इन्तिहाँ समझ रहा हूँ। यह पहला मौका है कि ताबेदार की दवा अब तक कारगर नहीं हुई। जो एक-से-एक मुश्किल बीमारियों को चुटकियाँ बजाते चंगा करता रहा है, उसको अपनी इस नाकामयाबी पर जितनी शर्म है उसकी इन्तिहा नहीं। मेरा तो दिल रंज से बैठा जा रहा है।
बाबर – बीमारी के आसार कैसे हैं?
हकीम – [जरा रुककर] आलमपनाह! ताबेदार क्या बताए? जब दवा काम नहीं कर रही है तब तो खुदा की…।
बाबर – [बात काटकर] गोया कि आप भी मायूस ही हैं। ठीक है, इससे ज्यादा आप कर भी क्या सकते हैं? दवा बीमारी की होती है, मौत की नहीं।
हकीम – आलमपनाह! अभी वैसी मायूसी की बात नहीं है। खुदा की मेहरबानी हुई तो शाहजादा जल्द ही चंगे हो जाएँगे।
बाबर – हकीम साहब! जब तक कोई बात एकदम इधर या उधर नहीं हो जाती, तब तक इन्सान उम्मीद छोड़ता ही कहाँ है, लेकिन रंग-ढंग भी तो कोई चीज़ है।
हकीम – आलमपनाह!
माहम – [घबराहट भरी आवाज में] हकीम साहब! मेरे बच्चे को किसी तरह अच्छा कर दीजिए। मैं आपको मुँहमाँगा इनाम दूँगी और जिंदगी भर एहसान मानूँगी।
हकीम – मलका का दिया हुआ ही तो ताबेदार खाता है। शाहजादा की सेहत और मलका की खुशी से बढ़कर भी कोई इनाम हो सकता है? मलका इतमीनान रखें। मेरा दिल कहता है कि शाहजादा जरूर चंगे होंगे। माँ का दिल बच्चे की मामूली बीमारी से भी घबरा जाता है, यह तो खैर…। मैं मलका को फिर यकीन दिलाता हूँ कि शाहजादा जरूर अच्छे होंगे। आप घबराएँ नहीं।
माहम – हकीम साहब! मैं चाहती तो हूँ कि न घबराऊँ, पर दिल जो नहीं मानता। [हुमायूँ के चेहरे की ओर बताकर] हमेशा गुलाब-सा खिला रहने वाला यह चेहरा कैसा मुरझा गया है, कितना सूख गया है? बुखार से बदन तवा हो रहा है, होठ काले पड़ गये हैं, आँखें हमेशा बंद, दवा कोई काम नहीं करती। ऐसी हालत, यह बेहोशी देखकर भी कैसे न घबराऊँ? मेरा तो कलेजा टूक-टूक हो रहा है, रोआँ-रोआँ रो रहा है।
हकीम – [अफसोस की आवाज में] क्या मैं इतना भी नहीं समझता? मलका का दिल माँ का दिल है और माँ की मुहब्बत तो दुनिया में बे-मिसाल है, एकदम-बे-मिसाल। शाहजादे की ऐसी हालत से मलका का कलेजा कैसे टूक-टूक न होगा, लेकिन करना क्या है? हमारी सारी कोशिशें एक ओर, मालिक की मर्जी एक ओर।
बाबर – [उठकर धीरे-धीरे टहलने लगता है] हकीम साहब!
हकीम – [उठकर] आलमपनाह!
बाबर – मलका की दिली हालत का ठीक अंदाजा न तो आप लगा सकते हैं और न हम, क्योंकि हम मर्द हैं। मलका की बात तो छोड़िए, हमारी ही जिन आँखों ने बचपन से आज तक हजारों-लाखों आदमियों को तड़प-तड़प कर दम तोड़ते देखा है और कभी नहीं पसीजी हैं, वे ही आज एक, सिर्फ एक इन्सान की मौत के अंदेशे से भर आती हैं। यह है औलाद की मुहब्बत!
हकीम – आलमपनाह की खिदमत में ही ताबेदार की दाढ़ी सुफेद हो गई। मुर्त्तजा आलमपनाह के दिल के दोनों पहलुओं से अच्छी तरह वाकिफ है जो सख्ती और मुलामियत दोनों में नायाब है। एक ओर जिस हाथ में तलवार आने पर लड़ाई के मैदान में दुश्मनों पर बिजलियाँ गिरती हैं, वही हाथ जब कलम पकड़ता है तो उससे शायरी की वे फुलझड़ियाँ झड़ती हैं जिनसे दिल का कोना-कोना जगमगा जाता है। मुझे यकीन है कि आलमपनाह की तलवार और कलम दोनों की बे-मिसाल खूबी जब तक यह दुनिया कायम है, तब तक कायम रहेगी!
बाबर – [टहलते हुए गंभीर स्वर में] हकीम साहब! हमने होश सँभाला नहीं कि लड़ाई के जूए में हार और जीत के पासे फेंकना शुरू किया। हमारी जिंदगी की पूरी कहानी हार और जीत इन्हीं दो लफ्जों में कही जा सकती है, लेकिन न तो हमें कभी हार से मायूसी हुई और न जीत से गरूर! हमने समरकंद जीता, काबुल जीता, कंधार जीता और आखिर में हिन्दुस्तान को जीतकर एक बड़ी-सी सल्तनत भी कायम की। लेकिन सच कहते हैं, दौलत के लालच से नहीं, बल्कि नाम के लिए, अपने बाजुओं की ताकत का जोर आजमाने के लिए। हम इसलिए लड़ते हैं कि लड़ने में जिंदगी का लुत्फ आता है। सर को हथेली लेकर मौत से खेलने में क्या मजा है, इसे हम जानते हैं।
हकीम – आलमपनाह जो फर्मा रहे हैं उसे ताबेदार जमाने से जानता है और समरकंद से लेकर पानीपत तक के मैदान उसके जीते-जागते सबूत हैं।
बाबर – हम वही कह रहे थे। पानीपत की लड़ाई के बाद लाखों क्या करोड़ों की दौलत हाथ में आई। लेकिन हमने छदाम भी अपने पास नहीं रखा। हमने अशर्फियों को ठीकरी की तरह लुटाया। रिश्तेमदों की बात छोड़िए, जिनसे मामूली जान-पहचान भी थी, उन्हें भी हमने सौगात भेजी। फरगना, खुरासान, फारस तक के दोस्तों को भी हम न भूले। हेरात, मक्का और मदीना के भी फकीरों के सामने हमने अपनी भेंट हाजिर की और काबुल के हर आदमी, मर्द-औरत, बूढ़ा-जवान, अमीर-गरीब को भी इस फतह का तोहफा मिला। हमारा वह ढंग देखकर लोगों ने हमें कलंदर कहना शुरू किया! कितना मीठा था वह नाम!
हकीम – आलमपनाह की दरियादिली का वह नजारा आज भी ताबेदार की आँखों के सामने नाच रहा है। किस बादशाह ने सोने-चाँदी, हीरे-जवाहरात को इस बेतकल्लुफी की नजर से देखा होगा? आज भी, क्या दोस्त, क्या दुश्मन, हर शख्स, आलमपनाह की उस बुलंदी को याद कर दंग रह जाता है।
बाबर – हकीम साहब! आज हम फिर एक बार कलंदर होने को तैयार हैं और आज नाम के लिए नहीं, बल्कि अपने बेटे की जिंदगी के लिए। अपने इस लख्ते-जिगर की जान बचाने के लिए हम अपनी तमाम सल्तनत लुटाने को तैयार हैं। हम फिर वही खानाबदोश की जिंदगी बिताएँगे या अपनी तलवार का जोर आजमाएँगे। लेकिन जैसे भी हो, हुमायूँ को अच्छा करना होगा।
हकीम – आलमपनाह की ख्वाहिश पूरी होगी।
बाबर – पूरी होगी… ! [रुककर कुछ सोचता हुआ] हजारों आदमियों की जान लेने की ताकत हम में थी लेकिन आज एक आदमी की जान बचाने की ताकत हम में नहीं है। कैसी लाचारी है? [थोड़े आवेश में] किसी इन्सान को वह चीज लेने का क्या हक है जिसे वह दे नहीं सकता। बादशाहत! बादशाहत! यही बादशाहत है जिसके लिए बचपन से लेकर आज तक हम एक दिन भी चैन की नींद नहीं सो सके। और उसका नतीजा! [लम्बी साँस लेकर] सारी दौलत, सारी सल्तनत सामने पड़ी है और बादशाह का बेटा दम तोड़ रहा है। कोई तरीका, कोई हिकमत कारगर नहीं हो पाती। यही एक जगह है, जहाँ बादशाह और फकीर में कोई अन्तर नहीं रह जाता। हमसे वह कंगाल सौ गुना अच्छा जो चैन की नींद तो सोता है, बेफिक्री से जिंदगी बिताता है।
हकीम – आलमपनाह! इन्सान कितना भी बड़ा क्यों न हो वह अल्लाह से छोटा ही रहेगा, उस मालिक के सामने इस नाचीज की हस्ती ही क्या है? लेकिन इसीलिए बादशाहत को हिकारत की नजर से नहीं देखा जा सकता! शाहंशाहे- हिन्दुस्तान ने जो किया है वह दुनिया के तारीख में लासानी है। इतने कम दिनों में राजपूतों से लोहा लेकर इतनी बड़ी सल्तनत कायम करना कुछ ऐसा-वैसा काम नहीं था। यह आलमपनाह के ही लायक था।
[बाबर हुमायूँ के पलंग के पास रुकता है। हुमायूँ की आँखें पहले ही जैसी बंद हैं। बाबर धीरे-धीरे उसके सिर पर हाथ फेरता है और बड़ी करुण दृष्टि से उसे देखता है। फिर कमरे में टहलने लगता है।]बाबर – हकीम साहब! वे बीती बातें हैं। आज हुमायूँ की जिंदगी का सवाल है।
हकीम – आलमपनाह! दवा देने का वक्त हो गया है। इजाजत हो तो…।
बाबर – [शांत स्वर में] दीजिए, जरूर दीजिए। लेकिन इस बेहोशी की हालत में दवा हलक के नीचे उतरेगी कैसे?
हकीम – जीभ पर रख देने से वह आप ही धीरे-धीरे हलक के नीचे उतर जाएगी।
[हकीम शीशी से दवा निकालता है, एक-दो चीजों के साथ खरल में मिलाता है। फिर हुमायूँ का मुँह खोलकर उसकी जीभ पर दवा रख देता है। हाथ हटाने पर हुमायूँ का मुँह बंद हो जाता है।]दरबान – [झुक कर अदब से] जनाब अबू बका साहब तशरीफ लाए हैं।
बाबर – मौलाना अबू बका? अच्छा मलका, तुम थोड़ी देर के लिए बगल के कमरे में जाकर आराम करो, जब तक हम मौलाना से मिल लें [माहम धीरे से चली जाती है।] [दरबान से] उन्हें अन्दर आने दो।
[दरबान बाहर जाता है और उसके साथ अबू बका का प्रवेश। अबू बका की आकृति सौम्य, रंग गोरा, दाढ़ी सफेद और गति में गंभीरता है। वह आकर दरबारी ढंग से सलाम करता है। बाबर हाथ उठाकर सलाम का जवाब देता है।]बाबर – [एक पीठिका की ओर बैठने का इशारा करते हुए] आइए, तशरीफ रखिए। इस वक्त कैसे तकलीफ की?
अबू बका – [बैठता हुआ] शाहजादे की हालत जानने के लिए हाजिर हुआ।
बाबर – [सूखी हँसी हँसकर टूटी आवाज में] शाहजादे की हालत? हमारी हिकमत और ताकत का इम्तिहान हो चुका। अब खुदा मालिक है।
अबू बका – [गंभीर स्वर में] अपनी लंबी जिंदगी में आज पहली बार मैं शाहंशाहे-हिन्दुस्तान के चेहरे पर मायूसी देख रहा हूँ और आवाज में भारीपन। एक-से-एक मुश्किल मुसीबतों में जिसके चेहरे पर शिकन नहीं पड़ी, जो आफतों में हमेशा मुस्कुराता रहा उसकी ऐसी हालत देखकर ताज्जुब हो रहा है।
बाबर – आप जैसे आलिम का ताज्जुब करना वाजिब है। हमें अपने ऊपर खुद ताज्जुब है फिर भी हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं कि आज हम जिंदगी की वह कमजोरी महसूस कर रहे हैं जो बिल्कुल नई है। शायद यह उम्र का तकाजा है। सुनते थे कि गिरती उम्र में औलाद की मुहब्बत कई गुनी बढ़ जाती है। आज हम उसकी सचाई के कायल हैं।
अबू बका – जहाँपनाह! औलाद की मुहब्बत इन्सान के दिल की कमजोरी नहीं, बल्कि उसका असली और सच्चा पहलू है। दुनिया इसी ममता पर टिकी है! फिर भी, घबराने से क्या होगा? और क्या सचमुच ही शाहजादे की जिंदगी से मायूस होने का मौका आ गया है? मुर्तजा! तुम क्या सोचते हो?
हकीम – बड़े भाई! मैं क्या सोचूँ? मेरा सोचना और न सोचना तो दवा पर मुनहसर है और दवा कारगर नहीं हो रही है।
अबू बका – तो तुम क्या समझते हो कि दुनिया की तमाम बीमारियों की दवा तुम्हारे इन अर्कों, सफूफों और रूहों में ही महदूद है? कभी उस पर भी खयाल किया है कि जो इन दवाओं को ताकत बख्शता है? अगर उसकी नजर है तो तुम्हारे अर्क और सफूफ आबेहयात हैं; नहीं तो महज मिट्टी या गर्द, बस। तुम भले ही उम्मीद हार बैठे हो लेकिन मैं मायूस नहीं हूँ।
हकीम – बड़े भाई! मुर्तजा की ताकत तो अर्कों ओर सफूफों तक ही खत्म है।
अबू बका – हुक्म हो तो जहाँपनाह की खिदमत में मैं एक दवा अर्ज करूँ?
बाबर – यह भी पूछने की बात है? खुशी से फरमाइए।
अबू बका – मेरे उस्ताद, जिनकी बात के खिलाफ आज तक मैंने कुछ होते नहीं देखा और जिन्हें जहाँपनाह भी अच्छी तरह जानते हैं, कहा करते थे कि ऐसे मौके पर सबसे अजीज चीज खुदाताला को भेंट करने पर अकसर दम तोड़ते हुए मरीज को भी भला-चंगा होते हुए देखा गया है।
बाबर – [खुशी से] सच?
अबू बका – मुझे उस्ताद की बात का पूरा यकीन है।
बाबर – और हमें आप जैसे आलिम, पाकदिल और खुशसखुन की बात का। किसी दूसरी चीज की कौन कहे, हम खुद अपनी जिंदगी खुदा के सामने हाजिर करते हैं।
अबू बका – और हकीम – [एक साथ घबराकर] आलमपनाह यह क्या कह रहे हैं!
बाबर – [दृढ़ आवाज में] वही जो कहना चाहिए। क्यों, इसमें ताज्जुब की क्या बात है?
अबू बका – ताज्जुब की बात नहीं है? एक छोटी-सी बात के लिए शाहंशाहे-हिन्दुस्तान अपनी जिंदगी…।
बाबर – [बात काटकर] मौलाना! आप शाहजादे की जिंदगी को एक छोटी-सी बात समझते हैं? जिसे आप शाहंशाहे-हिन्दुस्तान कहते हैं उसके दिल की एक-एक धड़कन हुमायूँ की जिंदगी की मिन्नत की आवाज है। आज आपके सामने शाहंशाहे-हिन्दुस्तान नहीं, एक इन्सान — मामूली इन्सान खड़ा है, और जिंदगी से उसके बेटे की जिंदगी कहीं बेशकीमत है।
अबू बका – जहाँपनाह!
बाबर – आप जो कहिएगा उसे हम समझ रहे हैं। अगर आप यह सोचते हैं कि हुमायूँ के नहीं रहने पर हम जिन्दा रह सकेंगे तो आप धोखे में हैं।
अबू बका – मगर जहाँपनाह जो काम अपनी जान से करना चाहते हैं वह दूसरी चीज से भी तो हो सकता है। आगरे की फतह के बाद जो हीरा जहाँपनाह के हाथ में आया वह दुनिया की किसी भी चीज से बेशकीमत है।
बाबर – हमारी जिंदगी से भी?
अबू बका – जहाँपनाह! मेरे कहने का मतलब कुछ दूसरा है। मैं अर्ज करना चाहता हूँ कि क्यों नहीं उसे ही खुदा को भेंट किया जाए?
हकीम – ताबेदार भी बड़े भाई की बात की हर सूरत से ताईद करता है।
बाबर – [एकाएक हुमायूँ के चेहरे की ओर देखकर घबराई हुई आवाज में] वह देखिए हकीम साहब! शाहजादे के चेहरे पर सफेदी छा रही है। आँख डरावनी लग रही है। [आवेश में] नहीं, नहीं अब ज्यादा सोचने का वक्त नहीं है। हमारे जीते-जी हुमायूँ को कुछ नहीं हो सकता। हम उसे बचाएँगे, जरूर बचाएँगे। हीरे और पत्थर से काम नहीं चलेगा। खुदाताला की खिदमत में हम खुद अपनी जान हाजिर करते हैं।
[बाबर तेजी से गंभीरतापूर्वक हुमायूँ के पलंग की चारों ओर घूमने लगता है।]अबू बका – [और हकीम घबराकर] आलमपनाह! आलमपनाह! यह क्या कर रहे हैं? खुदा के लिए…।
बाबर – [कठोर स्वर में] खामोश! शाहंशाहे-हिन्दुस्तान का हुक्म है कि आप खामोश रहिए। हम जो कर रहे हैं उसमें खलल न डालिए। [तीन बार पलंग की परिक्रमा कर हुमायूँ के सिरहाने जमीन पर घुटने टेक कर बैठ जाता है। हाथ जोड़कर आँखें बंद कर लेता है और मुँह कुछ ऊपर उठाए हुए शांत गंभीर स्वर में कहता है।] या खुदा! परवरदिगार! तेरी मेहरबानी से मैंने एक-से-एक मुश्किलों पर फतह हासिल की है। मैं हर गाढ़े वक्त पर तुझे पुकारता रहा हूँ और तू मेरी मदद करता रहा है। आज एक बार फिर इस मौके पर तेरी उस मेहरबानी की भीख माँगता हूँ। अपने बेटे की जान के बदले मैं अपनी जान हाजिर करता हूँ। तू मुझे बुला ले, लेकिन उसे अच्छा कर दे…।
हकीम – [आश्चर्य और प्रसन्नता से] आलमपनाह! शाहजादा ने आँखें खोल दीं। आज सात रोज के बाद…।
बाबर – [प्रसन्नता से] हमारी आवाज अल्लाहताला तक पहुँच गई… पहुँच गई! अल्लाहो…अकबर…।
[बाबर धीरे-धीरे उठकर हुमायूँ के सिर पर हाथ फेरता है।]हुमायूँ – [अत्यन्त धीमी आवाज में] पा…नी…।
[हकीम कोने में रखी एक सोने की सुराही से पानी डालकर हुमायूँ के मुँह में दो चम्मच पानी देता है।]बाबर – [एक-दो बार जोर से सिर हिलाता है जैसे कोई तकलीफ हो।] हकीम साहब! हमारे सर में जोर का चक्कर और दर्द मालूम हो रहा है। एक अजीब बेचैनी मालूम हो रही है।
हकीम – [चिन्तित स्वर में] आलमपनाह आराम करें। रास्ते की थकावट और दिमागी फिक्र से चक्कर मालूम हो रहा है। मैं अभी एक दवा देता हूँ, थोड़ी देर में तकलीफ जाती रहेगी।
बाबर – अच्छी बात है।
[हकीम एक खुराक दवा देता है। बाबर बगल के कमरे में चला जाता है। अबू बका और हकीम एक दूसरे को आश्चर्य और चिंता-मिश्रित मुद्रा से देखते हैं।]
द्वितीय दृश्य
[स्थान – पूर्वोक्त][बाबर कमजोर और सुस्त एक पलंग पर पड़ा है। कभी-कभी दर्द से कराह उठता है पर चेहरे पर से अफसोस के बदले खुशी जाहिर हो रही है जैसे इस बीमारी की उसे कोई चिंता न हो। पलंग के एक बगल में एक तिपाई पर हकीम और दूसरी पर अबू बका बैठे हैं। दूसरे बगल में माहम और हुमायूँ चिन्तित भाव से चुपचाप खड़े हैं।]अबू बका – जहाँपनाह की तबीयत कैसी है?
बाबर – [धीमी आवाज में] तबीयत? अब तो कूच की तैयारी है। जितनी देर तक साँस चल रही है, वही बहुत है। पसलियों में बेहद दर्द है, साँस नहीं ली जाती। अल्लाहताला बुला रहा है।
अबू बका – आलमपनाह ऐसा न फरमाएँ।
बाबर – हमारे कहने या न कहने से क्या होता है? खैर, मौलाना! आपका हम पर बहुत बड़ा एहसान है। [जोर से साँस लेता है] हमारी जिंदगी के सबसे बड़े इम्तिहाँ में आपने हमारी मदद की है। उसके लिए हम आपके शुक्रगुजार हैं। अगर आप की कोई ख्वाहिश हो तो उसे पूरा कर हमको खुशी होगी। [साँस लेता है।]
अबू बका – [दुख भरी आवाज में] जहाँपनाह की सेहत से बढ़कर अबू बका की कोई दूसरी ख्वाहिश नहीं है। अल्लाह मेरी ख्वाहिश पूरी करे।
बाबर – हम आपके दिल की परेशानी और रंज समझ रहे हैं। आपने उस रोज जो कुछ कहा उसके लिए आपको अफसोस है। लेकिन सोचिए तो कि हुमायूँ की जिंदगी के लिए क्या हम खुद वही तरीका अख्तियार नहीं करते जो आपने बताया? खुदा की इबादत के अलावा और चारा ही क्या था। [साँस लेकर] हाँ, आपके कहने पर हमें उस पर और भी ज्यादा भरोसा हुआ। [खाँसता है।]
हकीम – आलमपनाह अभी आराम करें।
बाबर – आराम? हकीम साहब! हमने जिंदगी में कभी आराम किया है? आराम करते हैं बुजदिल, कमजोर और वे जिनमें कुछ करने का मद्दा नहीं होता। आखिरी वक्त में चुप रहने से और भी दम घुटने लगेगा। अब कितनी देर जीना ही है। [खाँसता है] मौत के पहले ही उसका समाँ बँधने देना हमें गवारा नहीं। हमें हँसते-बोलते मरने दीजिए।
अबू बका – जहाँपनाह ऐसी बदसगुन बात न कहें।
बाबर – यह बात बदसगुन हो या खुशसगुन, लेकिन है सच्ची। इसे आप भी जानते हैं। हम पूरी खुशी से जा रहे हैं।
माहम – जहाँपनाह बार-बार यह क्या दुहरा रहे हैं?
बाबर – मलका! सचाई का सामना हिम्मत से करना चाहिए। जो बात आगे होने वाली है उसे पहले से जान रखना हमेशा अच्छा होता है। सचाई जानते हुए भी अपने को धोखे में रखने से बढ़कर और क्या बेवकूफी होगी? [हुमायूँ की ओर देखकर] बेटा! वक्त करीब आ रहा है। कहीं भूल न जाएँ। मियाँ अबू बका को पन्द्रह गाँव लाखिराज पुश्त-दर-पुश्त के लिए बख्श दो। [खाँसता है।]
अबू बका – जहाँपनाह माफी फरमाएँ। ताबेदार को कुछ न चाहिए। जहाँपनाह का दिया ऐसे ही कुछ कम नहीं है।
बाबर – [अनसुनी कर गंभीर स्वर में] बेटा! हम अपने हुक्म को तुरन्त तामील देखना चाहते हैं। हुक्मनामे पर हमारा दस्तखत करा लो।
हुमायूँ – अब्बा जान का हुक्म तामील होता है।
[हुमायूँ दूसरे कमरे में जाता है। एक कागज पर कुछ लिखकर तुरन्त आता है। बाबर उस पर दस्तखत कर देता है। हुक्मनामा अबू बका के हाथ में दे दिया जाता है। अबू बका उदासी से उठकर सलाम करता है, फिर बैठ जाता है।]बाबर – आज हमें एक ही बात का अफसोस है। जिसकी सारी उम्र लड़ाई के मैदान में कटी उसकी मौत बिस्तर पर हो रही है। [खाँसता है] हम लड़ते-लड़ते मरने के ख्वाहिशमंद थे। खुशकिस्मती से एक ऐसे मुल्क में पहुँच भी गए थे जहाँ बहादुरों की कमी नहीं थी — लेकिन वह अरमान… [खाँसता है।]
हकीम – आलमपनाह को बोलने में तकलीफ हो रही है। मैं फिर अर्ज करूँगा कि थोड़ी देर आराम किया जाए।
बाबर – आराम के लिए न घबराइए, हकीम साहब! हम कभी खत्म न होने वाले आराम की नींद सोने जा रहे हैं। अब आखिरी वक्त में तमाम जिंदगी की तस्वीर एक-एक कर आँखों के सामने गुजर रही है। [खाँसता है] हिन्दुस्तान बड़ा बुलन्द मुल्क है। यहाँ के राजपूतों के लिए हमारे दिल में बड़ी इज्जत है। वे दरसअल दिलेर और बहादुर हैं। मरना या मारना किसी को इनसे सीखना चाहिए। [हिचकी आती है।]
हकीम – लेकिन जहाँपनाह के सामने तो हमेशा हारते ही रहे।
बाबर – आप नहीं जानते। हार-जीत दूसरी चीज है और बहादुरी दूसरी। हार-जीत पर किसी दूसरे का अख्तियार है, बहादुरी पर अपना। हम भी तो बार-बार हारते रहे हैं तो क्या हम अपने को बहादुर न समझें? [हिचकी आती है]
हकीम – आलमपनाह, दवा का वक्त हो गया है।
बाबर – हकीम साहब! अब दवा न दीजिए। यह हिचकी है या खुदा का पैगाम है। [फिर हिचकी आती है]
माहम – [करुण स्वर में] या खुदा, यह कैसा इम्तिहान है? एक ओर लख्तेजिगर को जिंदगी बख्शी तो दूसरी ओर सरताज को इतनी तकलीफ दे रहा है।
बाबर – मलका! परवरदिगार के शुक्र के बदले शिकवा? अल्लाहताला का हजार-हजार शुक्र है कि उसने हमारी इल्तजा सुन ली, हमारी उम्मीद और अरमानों के चमन को सरसब्ज रहने दिया, हमारी आँखों की मिटती हुई रोशनी लौटा दी। तभी तो हम आज शहजादे को भला-चंगा देख रहे हैं।
माहम – मगर जहाँपनाह, आपकी यह तकलीफ…?
बाबर – [बात काटकर] हमारी फिक्र छोड़ो, मलका! हमने तो खुद यह तकलीफ माँगी है। हमें बहुत बड़ा फख्र है कि हमारे मालिक ने अपने ऐसे नाचीज बंदे की अदना-सी भेंट कबूल फर्मा ली। [दर्द से करवट बदलता है] बेटा!
हुमायूँ – अब्बाजान!
बाबर – और करीब आ जाओ बेटा! जाते-जाते अपने लख्तेजिगर को जी भर कर देख तो लूँ।
हुमायूँ – [आँखों में आँसू भरकर] अब्बा!
बाबर – घबराओ मत बेटा! बहादुर आप के दिलेर फर्जन्द को यों मचलना जेब नहीं देता। हमें तुमसे कुछ जरूरी बातें करनी हैं; हमें हिन्दुस्तान के होने वाले बादशाह से कुछ अर्ज करना है।
माहम – [रोती हुई] मेरे सरताज!
बाबर – सब्र और हिम्मत से काम लो, मलका! जो सारी जिंदगी मौत को चुनौती देता रहा हो उसकी बेगम को मौत से नहीं घबराना चाहिए। हमें चैन से जाने दो। [खाँसता है] बेटा!
हुमायूँ – अब्बाजान! हकीम साहब की राय में आपका ज्यादा गुफ्तगू करना सेहत के लिए अच्छा नहीं है।
बाबर – सेहत! बेचारे हकीम साहब! बेटा! हमने हिन्दुस्तान को फतह किया, हकूमत की बुनियाद भी डाली मगर सल्तनत की ऊँची इमारत तैयार करने के पहले ही हमें जाना पड़ रहा है। अब उस इमारत को पूरा करना और कायम रखना तुम्हारा काम है। [हिचकी आती है।] जंग के मैदान में हमारी तलवार के वार कभी ओछे नहीं पड़े और अमन के जमाने में हमारी दानिशमंदी ने कोई गलत रवैया भी अख्तियार नहीं किया। बादशाहत के लिए दोनों चीजें एकसाँ जरूरी हैं। [दर्द से करवट बदलता है।] आह, सिर फटा जा रहा है।
माहम – मेरे सरताज!
बाबर – मलका! हम माँ-बेटे को एक-दूसरे को सुपुर्द करते हैं। [माहम सिसक-सिसककर रोने लगती है] बेटा, सिपहसालार को बुलाओ। [एक आदमी बाहर जाता है] और सुनो। इधर नजदीक आओ। [आवाज पहले से धीमी पड़ जाती है] आज से इस सल्तनत के तुम मालिक हो। [खाँसता है] तुम नेक और आजादखयाल हो। अपने भाइयों और बहनों को मुहब्बत की नजर से देखना। उनसे कोई गलती भी हो तो माफ करना। [हिचकी आती है] आह! साँस लेने में बड़ी तकलीफ है। [जोर से साँस लेता है] सिपहसालार आए?
सिपहसालार – ताबेदार हाजिर है!
बाबर – हम कूच कर रहे हैं। हमारे बाद शाहजादा हुमायूँ हिन्दुस्तान के बादशाह होंगे। [खाँसता है] आप सबों से उन्हें उसी तरह मदद मिलनी चाहिए जिस तरह हमें मिलती है। आह! बेटा! पानी! [हुमायूँ मुँह में पानी देता है] बेटा, यहाँ जितने हैं सबों का हाथ पकड़ो। [हिचकी आती है] सबों की परवरिश करना। [जोर से साँस लेता है] या खुदा! और हाँ, हमारी आखिरी ख्वाहिश… [हिचकी आती है] हमें यहाँ न दफना कर काबुल की मिट्टी में दफनाना। यह हमारा आखिरी हुक्म… और… ख्वाहिश है। [हिचकी] तुम सब… आबाद रहो [जोर की हिचकी] अल…विदा। अल्लाहो…अ…क…ब…र… [हिचकी के साथ शांत हो जाता है।][पटाक्षेप]
पाठ का सारांश
देवेंद्रनाथ शर्मा द्वारा रचित ऐतिहासिक एकांकी ‘बाबर की ममता’ सम्राट बाबर के पितृ-हृदय, उसके त्याग और अटूट वात्सल्य की एक मार्मिक गाथा है। यह नाटक उस ऐतिहासिक घटना पर आधारित है जब बाबर ने अपने पुत्र हुमायूँ के प्राण बचाने के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया था।
प्रथम दृश्य – हुमायूँ की बीमारी और बाबर का संकल्प
कहानी का प्रारंभ आगरा के ‘चारबाग’ स्थित राजभवन से होता है। बाबर का प्रिय पुत्र हुमायूँ गंभीर रूप से बीमार है। हकीमों की तमाम कोशिशें और दवाइयाँ निष्फल हो रही हैं। हुमायूँ की माता, माहम बेगम, अपने इकलौते जीवित पुत्र की दशा देखकर अत्यंत विचलित हैं।
बाबर जब धौलपुर से लौटता है, तो माहम बेगम उसके सामने रोते हुए अपने पुत्र की रक्षा की भीख माँगती है। वह कहती है कि बाबर को अपनी बादशाहत प्यारी है, पर उसे उसका बेटा प्यारा है। यहाँ बाबर का एक मानवीय पक्ष उभरकर सामने आता है। वह स्पष्ट करता है कि यद्यपि उसने साम्राज्य विस्तार के लिए बहुत संघर्ष किया है, लेकिन हुमायूँ उसके लिए जीवन का सहारा और आँखों की रोशनी है।
राजभवन के हकीम मुर्तजा स्वीकार करते हैं कि दवा अब काम नहीं कर रही है और केवल ईश्वर की कृपा ही हुमायूँ को बचा सकती है। तभी वयोवृद्ध धर्मात्मा अबू बका वहाँ आते हैं। वे एक प्राचीन मान्यता का उल्लेख करते हैं कि यदि कोई व्यक्ति अपनी सबसे प्रिय वस्तु ईश्वर को भेंट कर दे, तो रोगी के प्राण बच सकते हैं।
अबू बका का सुझाव था कि बाबर को कोई बेशकीमती हीरा या अपनी सल्तनत दान कर देनी चाहिए। लेकिन बाबर का मानना था कि हुमायूँ के लिए उसकी जान से बढ़कर कीमती और कुछ नहीं है। वह हुमायूँ के पलंग के चारों ओर तीन परिक्रमा करता है और ईश्वर से प्रार्थना करता है— “या खुदा! मेरे बेटे की जान के बदले मेरी जान ले ले, लेकिन उसे अच्छा कर दे।”
चमत्कारिक रूप से, उसी क्षण हुमायूँ की चेतना लौट आती है और वह पानी माँगता है, जबकि बाबर को अचानक तेज सिरदर्द और बेचैनी महसूस होने लगती है।
द्वितीय दृश्य – बाबर का त्याग और अंतिम विदा
दूसरे दृश्य में समय बीत चुका है। हुमायूँ अब पूरी तरह स्वस्थ हो गया है, लेकिन बाबर की हालत दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है। वह बिस्तर पर है और मृत्यु के करीब है, फिर भी उसके चेहरे पर एक अलौकिक संतोष है कि उसका पुत्र जीवित है।
बाबर मृत्यु से नहीं डरता। वह कहता है कि बहादुर बिस्तर पर नहीं, बल्कि युद्ध के मैदान में मरना चाहते हैं, लेकिन खुदा की मर्जी के आगे वह नतमस्तक है। वह अबू बका को उनकी सेवा के बदले 15 गाँव जागीर में देने का आदेश देता है।
मरते समय भी बाबर हुमायूँ को एक कुशल शासक बनने की शिक्षा देता है। वह हुमायूँ से कहता है –
- सल्तनत की रक्षा – जो साम्राज्य की नींव उसने डाली है, हुमायूँ उसे पूरा करे।
- भाइयों के प्रति प्रेम – अपने भाइयों और बहनों से सदैव प्रेम करना और उनकी गलतियों को माफ कर देना।
- प्रजा की सेवा – एक न्यायप्रिय और उदार शासक बनना।
- अंतिम इच्छा – बाबर की इच्छा थी कि उसे आगरा में नहीं, बल्कि काबुल की मिट्टी में दफनाया जाए।
अंत में, ‘अल्लाहो अकबर’ कहते हुए बाबर के प्राण पखेरू उड़ जाते हैं। हुमायूँ और माहम बेगम शोक में डूब जाते हैं, लेकिन बाबर का बलिदान इतिहास में अमर हो जाता है।
एकांकी के मुख्य विचार और संदेश
- पितृ-प्रेम (Father’s Love) – यह नाटक दिखाता है कि एक पिता के लिए उसकी संतान से बढ़कर संसार में कोई वैभव या साम्राज्य नहीं है।
- निःस्वार्थ त्याग – बाबर का अपने पुत्र के लिए स्वयं की आहुति देना सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक है।
- मानवता और बादशाहत – बाबर यह सिद्ध करता है कि एक महान योद्धा और सम्राट होने से पहले वह एक संवेदनशील इंसान और पिता है।
- सांप्रदायिक सद्भाव – बाबर द्वारा राजपूतों की बहादुरी की प्रशंसा करना उसकी उदारता और निष्पक्षता को दर्शाता है।
स्मरणीय बिंदु
- स्थान – आगरा का राजभवन (चारबाग)।
- मुख्य द्वंद्व – दवा बनाम दुआ (चिकित्सा की विफलता और पिता की प्रार्थना की जीत)।
- महायज्ञ – अपनी जान की बाजी लगाना ही बाबर का वास्तविक ‘महायज्ञ’ था।
- अंतिम उपदेश – भाइयों के प्रति उदारता और काबुल में दफनाने की इच्छा।
पात्र परिचय
1. बाबर (मुख्य पात्र / नायक)
बाबर मुगल साम्राज्य का संस्थापक है, लेकिन इस एकांकी में वह एक शक्तिशाली सम्राट से कहीं अधिक एक ममतामयी पिता के रूप में उभरता है।
अगाध पितृ-प्रेम – हुमायूँ की बीमारी उसे विचलित कर देती है। वह कहता है कि “औलाद बादशाहत से भी कहीं ज़्यादा प्यारी चीज़ है।”
त्याग और बलिदान की प्रतिमूर्ति – जब उसे पता चलता है कि सबसे प्रिय वस्तु भेंट करने से पुत्र की जान बच सकती है, तो वह कोहिनूर हीरे के बजाय अपनी ‘जान’ न्योछावर करने का निर्णय लेता है।
दृढ़ निश्चयी – वह हुमायूँ के पलंग की परिक्रमा करते हुए खुदा से उसकी बीमारी अपने ऊपर लेने की प्रार्थना करता है और अपने संकल्प पर अडिग रहता है।
न्यायप्रिय और उदार – मृत्यु शय्या पर होते हुए भी वह अपने गुरु अबू बका को जागीर देने का हुक्म देता है और शत्रुओं (राजपूतों) की वीरता का भी सम्मान करता है।
भविष्यदृष्टा – मरते समय हुमायूँ को भाइयों से प्रेम करने और साम्राज्य को संभालने की महत्त्वपूर्ण सीख देता है।
2. माहम बेगम (हुमायूँ की माता)
माहम बेगम एक आदर्श माँ का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिनका पूरा संसार उनकी संतान के इर्द-गिर्द सिमटा है।
पुत्र-मोह में व्याकुल – चार संतानों में से केवल हुमायूँ के जीवित बचने के कारण वह उसे खोने के विचार से ही काँप उठती हैं।
अत्यंत भावुक – वह बाबर के पैर पकड़कर रोती हैं और अपने बेटे की जिंदगी की भीख माँगती हैं।
धैर्य की कमी – एक माँ होने के नाते वह हकीमों और किस्मत पर भरोसा खोने लगती हैं और गहरे दुख में डूबी रहती हैं।
समर्पित पत्नी – वह अंत समय तक बाबर की सेवा में और हुमायूँ की चिंता में लगी रहती हैं।
3. हुमायूँ (बाबर का पुत्र)
हुमायूँ इस एकांकी की संवेदना का केंद्र है, जिसकी बीमारी पिता के बलिदान का कारण बनती है।
पितृ-भक्त – स्वस्थ होने के बाद जब उसे पता चलता है कि पिता ने उसके लिए अपनी जान व पर लगा दी है, तो वह अत्यंत दुखी और सेवाभावी हो जाता है।
आज्ञाकारी – पिता के अंतिम आदेशों (भाइयों को प्यार करना और साम्राज्य संभालना) को वह सिर झुकाकर स्वीकार करता है।
विनीत स्वभाव – वह युद्ध और वीरता के गुणों के साथ-साथ एक विनम्र पुत्र के रूप में दिखाई देता है।
4. अबू बका (वयोवृद्ध धर्मात्मा/गुरु)
अबू बका एक विद्वान और आध्यात्मिक पुरुष हैं, जो बाबर के मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं।
ज्ञानी और अनुभवी – उन्हें धर्म और रूहानियत का गहरा ज्ञान है। वे ही ‘प्रिय वस्तु भेंट करने’ का उपाय बताते हैं।
सच्चा शुभचिंतक – वे केवल राजगुरु नहीं बल्कि बाबर के परिवार के प्रति सच्ची सहानुभूति रखते हैं।
निःस्वार्थ – जब बाबर उन्हें उपहार स्वरूप गाँव भेंट करता है, तो वे विनम्रतापूर्वक मना करते हैं, जो उनके संतोषी स्वभाव को दर्शाता है।
5. मुर्तजा (हकीम)
हकीम मुर्तजा राजसी चिकित्सक हैं, जो विज्ञान और दवा का प्रतिनिधित्व करते हैं।
कर्तव्यनिष्ठ – वे पूरी लगन से हुमायूँ का इलाज करते हैं और अपनी असफलता पर दुखी होते हैं।
विनम्र – वे अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हैं और मानते हैं कि दवा से ऊपर खुदा की मर्जी है।
सत्यवादी – वे बाबर को बीमारी की गंभीरता के बारे में स्पष्ट और ईमानदारी से बताते हैं।
‘बाबर की ममता‘ साहित्यिक समीक्षा
कथानक और संरचना – एकांकी की कथावस्तु अत्यंत सुसंगठित और प्रभावशाली है। यह हुमायूँ की बीमारी और बाबर के आत्म-बलिदान की प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना पर आधारित है। नाटक दो दृश्यों में बँटा है, जो कौतूहल और भावुकता को अंत तक बनाए रखता है।
चरित्र-चित्रण – लेखक ने पात्रों के मनोवैज्ञानिक पक्ष को बखूबी उभारा है। जहाँ बाबर एक ओर ‘कलंदर’ और कठोर योद्धा है, वहीं दूसरी ओर वह एक अत्यंत कोमल हृदय पिता के रूप में चित्रित है। माहम बेगम का वात्सल्य और अबू बका की आध्यात्मिकता पात्रों को जीवंत बनाती है।
भाषा-शैली – एकांकी की भाषा पात्रों के अनुकूल उर्दू-फारसी मिश्रित हिंदी है, जो मुगलकालीन परिवेश को सजीव कर देती है। संवाद संक्षिप्त, मर्मस्पर्शी और अर्थपूर्ण हैं।
उद्देश्य – इस रचना का मुख्य उद्देश्य निःस्वार्थ प्रेम और त्याग की महिमा को दर्शाना है। यह सिद्ध करता है कि एक सम्राट के पद से कहीं ऊपर ‘पिता’ का स्थान होता है।
निष्कर्ष – ‘बाबर की ममता’ अपनी नाटकीयता, भावात्मक गहराई और ऐतिहासिक गरिमा के कारण हिंदी एकांकी साहित्य की एक विशिष्ट रचना है। यह पाठकों के हृदय में करुणा और श्रद्धा जगाने में पूर्णतः सफल है।
दुआ-ए-तसद्दुक
एकांकी ‘बाबर की ममता’ में, जहाँ बाबर अपने बीमार पुत्र हुमायूँ के चारों ओर घूमकर उसकी बीमारी अपने ऊपर लेने की प्रार्थना करता है, इस विधि को इतिहास और साहित्य में ‘तसद्दुक’ कहा जाता है।
तसद्दुक एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ होता है— ‘बलिदान’ या ‘सदका’। मुग़ल इतिहास के अनुसार, बाबर ने हुमायूँ के पलंग के चारों ओर चक्कर लगाते हुए अल्लाह तआला से प्रार्थना की थी कि हुमायूँ की जान के बदले अल्लाह उसकी जान ले ले। इस आध्यात्मिक अदला-बदली या बलिदान की प्रक्रिया को ‘तसद्दुक’ कहा गया है। हिन्दी में इसे ‘आत्म-बलिदान’ या ‘प्राण-विनिमय’ कहते हैं। यह घटना हुमायूँनामा और अन्य ऐतिहासिक वृत्तांतों में भी दर्ज है, जिसे एकांकीकार ने बहुत ही भावनात्मक रूप से प्रस्तुत किया है।
‘बाबर की ममता‘ – सप्रसंग व्याख्या
- “औलाद उस बादशाहत से भी कहीं ज़्यादा प्यारी चीज़ है। बादशाह भी इंसान होता है।”
प्रसंग – जब माहम बेगम रोते हुए हुमायूँ की जान बचाने की भीख माँगती है और कहती है कि आपको अपनी बादशाहत प्यारी है, तब बाबर यह उत्तर देता है।
व्याख्या – बाबर स्पष्ट करता है कि यद्यपि उसने अपना पूरा जीवन साम्राज्य विस्तार और युद्धों में बिताया है, लेकिन एक सम्राट के कठोर कवच के भीतर एक पिता का कोमल हृदय भी धड़कता है। वह बताता है कि सत्ता और सिंहासन का मूल्य संतान के जीवन के सामने शून्य है। एक बादशाह होने से पहले वह एक पिता है।
- “हुमायूँ हमारी आँखों की रोशनी, दिल की उम्मीद और जिंदगी का सहारा है।”
प्रसंग – बाबर हुमायूँ के प्रति अपना गहरा लगाव व्यक्त करते हुए माहम से यह कहता है।
व्याख्या – यहाँ हुमायूँ के प्रति बाबर के अटूट वात्सल्य का पता चलता है। वह हुमायूँ को केवल अपना उत्तराधिकारी नहीं, बल्कि अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य और बुढ़ापे की लाठी मानता है। उसके बिना बाबर के लिए संसार अंधकारमय है।
- “दवा बीमारी की होती है, मौत की नहीं।”
प्रसंग – हकीम मुर्तजा जब अपनी दवाइयों के बेअसर होने पर शर्मिंदा होता है, तब बाबर यह गंभीर सत्य कहता है।
व्याखी – बाबर यहाँ जीवन की वास्तविकता और मनुष्य की सीमाओं को स्वीकार करता है। वह कहता है कि चिकित्सा केवल शरीर के रोगों का उपचार कर सकती है, लेकिन यदि मृत्यु का समय (नियति) आ गया हो, तो दुनिया का कोई भी हकीम या औषधि उसे रोक नहीं सकती।
- “माँ की मुहब्बत तो दुनिया में बे-मिसाल है, एकदम बे-मिसाल।”
प्रसंग – हकीम मुर्तजा, माहम बेगम की व्याकुलता और दुख को देखकर यह टिप्पणी करता है।
व्याख्या – हकीम स्वीकार करता है कि संतान के कष्ट को देखकर एक माँ का हृदय जिस पीड़ा से गुजरता है, उसकी तुलना किसी और दुख से नहीं की जा सकती। माँ का निस्वार्थ प्रेम संसार का सबसे श्रेष्ठ और अद्वितीय भाव है।
- “जो हाथ तलवार आने पर दुश्मनों पर बिजलियाँ गिराते हैं, वही हाथ जब कलम पकड़ते हैं तो शायरी की फुलझड़ियाँ झड़ती हैं।”
प्रसंग – हकीम मुर्तजा बाबर के बहुमुखी व्यक्तित्व की प्रशंसा करते हुए यह कहता है।
व्याख्या – यह अंश बाबर के चरित्र के दो पहलुओं को दर्शाता है—एक ओर वह युद्ध के मैदान का वीर योद्धा है और दूसरी ओर वह एक संवेदनशील कवि और लेखक भी है। उसके व्यक्तित्व में कठोरता और कोमलता (शौर्य और साहित्य) का अद्भुत संगम है।
- “या खुदा! अपने बेटे की जान के बदले मैं अपनी जान हाज़िर करता हूँ। तू मुझे बुला ले, लेकिन उसे अच्छा कर दे।”
प्रसंग – हुमायूँ के पलंग की परिक्रमा करने के बाद बाबर खुदा से यह मन्नत माँगता है।
व्याख्या – यह एकांकी का चरम बिंदु (Climax) है। बाबर यहाँ एक पिता के रूप में सर्वोच्च बलिदान दे रहा है। वह ईश्वर से ‘अदला-बदली’ की प्रार्थना करता है कि उसका जीवन ले लिया जाए और उसके बदले उसके पुत्र को नया जीवन मिले। यह निःस्वार्थ त्याग और ममता की पराकाष्ठा है।
- “आराम करते हैं बुज़दिल, कमज़ोर और वे जिनमें कुछ करने का मद्दा नहीं होता।”
प्रसंग – मृत्यु शय्या पर पड़े होने पर जब हकीम बाबर को आराम करने की सलाह देते हैं, तब बाबर यह उत्तर देता है।
व्याख्या – बाबर अपने योद्धा स्वभाव को अंतिम क्षणों तक नहीं छोड़ता। वह आराम को आलस्य और कमजोरी का प्रतीक मानता है। वह मरते दम तक सचेत और कर्मठ रहना चाहता है, जो उसके अदम्य साहस और जुझारू व्यक्तित्व को दर्शाता है।
- “हार-जीत दूसरी चीज़ है और बहादुरी दूसरी। हार-जीत पर किसी दूसरे का अख्तियार है, बहादुरी पर अपना।”
प्रसंग – अंतिम समय में बाबर राजपूतों की वीरता की प्रशंसा करते हुए यह दार्शनिक बात कहता है।
व्याख्या – बाबर यहाँ एक बहुत बड़ी सीख देता है। वह कहता है कि युद्ध का परिणाम (हार या जीत) भाग्य या परिस्थितियों के हाथ में हो सकता है, लेकिन वीरतापूर्वक लड़ना मनुष्य के अपने हाथ में है। किसी वीर की बहादुरी उसके हारने से कम नहीं हो जाती। यह उसके न्यायप्रिय और पारखी दृष्टिकोण को प्रकट करता है।
कठिन शब्दों के सरल अर्थ
1 – साम्राज्य – शासन क्षेत्र – Empire
2 – संस्थापक – नींव रखने वाला – Founder
3 – जहाँपनाह – संसार का रक्षक (राजा) – Protector of the world
4 – आलमपनाह – दुनिया को शरण देने वाला – Shelter of the world
5 – सल्तनत – राज्य / हुकूमत – Sultanate / Kingdom
6 – शाहजादा – राजकुमार – Prince
7 – हुक्मनामा – आधिकारिक आदेश पत्र – Decree / Official Order
8 – खिदमत – सेवा – Service
9 – ताबेदार – आज्ञाकारी / सेवक – Obedient / Subordinate
10 – सफीर – दूत – Ambassador
11 – सिपहसालार – सेनापति – Commander-in-chief
12 – फतह – जीत / विजय – Victory / Conquest
13 – हकूमत – शासन – Rule / Governance
14 – लाखिराज – लगान-मुक्त (भूमि) – Tax-free (land)
15 – पुश्त-दर-पुश्त – पीढ़ी-दर-पीढ़ी – Generation to generation
16 – हकीम – वैद्य / डॉक्टर – Physician / Doctor
17 – क्षीण – कमजोर / कम होना – Feeble / Diminishing
18 – निश्चेष्ट – बिना हलचल के / बेहोश – Motionless / Inert
19 – मुतल्लिक – के संबंध में – Concerning / Regarding
20 – लियाकत – योग्यता / कुशलता – Ability / Capability
21 – मुमकिन – संभव – Possible
22 – इन्तिहाँ – परीक्षा की पराकाष्ठा – Extreme test / Limit
23 – कारगर – असरदार – Effective
24 – आसार – लक्षण – Symptoms / Signs
25 – चंगा – स्वस्थ / ठीक – Healthy / Recovered
26 – सेहत – स्वास्थ्य – Health
27 – तवा – गरम बर्तन (यहाँ – बहुत गरम) – Griddle (Here – Burning hot)
28 – अर्क – जड़ी-बूटियों का रस – Extract / Essence
29 – सफूफ – चूर्ण / दवा का पाउडर – Powdered medicine
30 – रूह – आत्मा / सत्व – Soul / Spirit
31 – मरणासन्न – मृत्यु के निकट – On the verge of death
32 – हिचकी – कण्ठ की ध्वनि – Hiccup
33 – हलक – गला – Throat
34 – खरल – औषध कूटने का पात्र – Mortar and pestle
35 – खुराक – दवा की मात्रा – Dose
36 – स्तब्ध – हैरान / सुन्न – Stunned / Speechless
37 – औलाद – संतान – Offspring / Children
38 – लख्ते-जिगर – कलेजे का टुकड़ा – Piece of one’s heart
39 – बदनसीब – अभागा – Unfortunate
40 – बर्दाश्त – सहन करना – To tolerate / Endure
41 – मायूस – निराश – Disappointed / Dejected
42 – इल्तजा – प्रार्थना / विनती – Entreaty / Plea
43 – ममता – माँ का प्रेम – Maternal love
44 – रंज – दुख / शोक – Grief / Sorrow
45 – बे-मिसाल – बेजोड़ / अनुपम – Incomparable / Unique
46 – पसीजना – दया से पिघलना – To be moved by pity
47 – अंदेशा – भय / आशंका – Apprehension / Fear
48 – मुलामियत – कोमलता – Softness / Gentleness
49 – गरूर – घमंड / अभिमान – Pride / Arrogance
50 – शुक्रगुजार – आभारी – Grateful
51 – मादरे-वतन – मातृभूमि – Motherland
52 – खाक छानना – दर-दर भटकना – To wander aimlessly
53 – बाजुओं – भुजाओं (ताकत) – Arms (Strength)
54 – लुत्फ – आनंद / मज़ा – Pleasure / Joy
55 – सौगात – उपहार – Gift / Souvenir
56 – कलंदर – मस्तमौला / दानी – Ascetic / Saintly giver
57 – बेतकल्लुफी – बिना किसी संकोच के – Without hesitation
58 – खानाबदोश – घुमंतू – Nomadic
59 – लाचारी – बेबसी – Helplessness
60 – लोहा लेना – युद्ध करना / टकराना – To challenge / Fight
61 – दंगल – कुश्ती का मैदान – Wrestling arena
62 – दिलेर – बहादुर – Brave / Daring
63 – फर्जन्द – पुत्र – Son
64 – चुनौती – ललकार – Challenge
65 – ओछे – हल्के / कमज़ोर – Shallow / Weak
66 – धर्मात्मा – पुण्य आत्मा – Pious soul
67 – मौलाना – विद्वान / धर्मगुरु – Scholar / Cleric
68 – पाकदिल – पवित्र हृदय – Pure-hearted
69 – खुशसखुन – मृदुभाषी – Sweet-spoken
70 – खुदाताला – परमेश्वर – Almighty God
71 – परवरदिगार – ईश्वर (पालने वाला) – The Sustainer / Lord
72 – मेहरबानी – कृपा – Kindness / Favor
73 – इबादत – पूजा / प्रार्थना – Worship
74 – आबेहयात – अमृत – Water of life / Elixir
75 – आलिम – ज्ञानी / विद्वान – Learned person
76 – इल्तेजा – विनती – Request
77 – ताईद – समर्थन – Support
78 – भेंट – चढ़ावा – Offering
79 – परिक्रमा – चक्कर लगाना – Circumambulation
80 – अल-विदा – अंतिम विदाई – Farewell
- कदमरंजा – कष्ट करना – To take trouble
- गवारा – स्वीकार्य – Acceptable
- अक्ल – बुद्धि – Intelligence
- बर्दाश्त – सहन – Tolerance
- इत्तला – सूचना – Information
- तिपाई – तीन पैरों वाली मेज – Stool/Tripod
- लमहा – क्षण – Moment
- नाकामयाबी – असफलता – Failure
- इत्मीनान – तसल्ली – Satisfaction
- बे-मिसाल – जिसकी मिसाल न हो – Matchless
- तवा – गरम – Burning hot
- निराशा – उम्मीद न होना – Despair
- अंदेशा – शक – Suspicion
- वाकिफ – परिचित – Aware
- नायाब – दुर्लभ – Rare
- खूबी – विशेषता – Quality
- कायम – स्थापित – Established
- गरूर – घमंड – Arrogance
- मजा – आनंद – Fun
- अशर्फियों – सोने के सिक्के – Gold coins
- ठीकरी – पत्थर का टुकड़ा – Potsherd
- रिश्तेमंदों – संबंधियों – Relatives
- सौगात – तोहफा – Gift
- कलंदर – दानी फकीर – Liberal saint
- नजारा – दृश्य – View
- बेतल्लुफी – बेबाकी – Informality
- बुलंदी – ऊँचाई – Greatness
- लख्ते-जिगर – कलेजे का टुकड़ा – Dear son
- खवाहिश – इच्छा – Wish
- हिकमत – युक्ति – Strategy
- कंगाल – निर्धन – Destitute
- हिकारत – नफरत – Contempt
- तारीख – इतिहास – History
- लासानी – बेजोड़ – Peerless
- करुण – दयापूर्ण – Pathetic
- मायूस – दुखी – Sad
- शिकन – माथे का बल – Frown/Wrinkle
- वाजिब – उचित – Proper
- तकाजा – आवश्यकता – Demand
- कायल – स्वीकार करना – Convinced
- मुनहसर – आश्रित – Dependent
- महदूद – सीमित – Limited
- गर्द – धूल – Dust
- पाकदिल – शुद्ध मन – Pure of heart
- बेशकीमत – बहुमूल्य – Priceless
- आवेश – जोश – Emotion/Passion
- खलल – बाधा – Disturbance
- गाढ़े वक्त – बुरा समय – Difficult times
- कूच – प्रस्थान – Departure
- शुक्रगुजार – कृतज्ञ – Grateful
- अख्तियार – अपनाना/अधिकार – To adopt/Authority
- बुजदिल – डरपोक – Coward
- मद्दा – शक्ति – Capability
- समाँ – वातावरण – Atmosphere
- बदसगुन – अपशकुन – Ill-omened
- तामील – आज्ञा पालन – Execution of order
- दस्तखत – हस्ताक्षर – Signature
- अरमान – इच्छा – Longing
- दिलेर – हिम्मती – Brave
- शिकवा – शिकायत – Complaint
- सरसब्ज़ – हरा-भरा – Prosperous/Green
- अदना – छोटा – Humble/Small
- जेब – शोभा देना – To suit
- दानिशमंदी – बुद्धिमानी – Wisdom
- आजादखयाल – खुले विचारों वाला – Liberal-minded
- परवरिश – लालन-पालन – Upbringing
- आबाद – खुशहाल – Prosperous
- पटाक्षेप – पर्दा गिरना – Curtain fall
- निश्चेष्ट – हलचल रहित – Motionless
- इत्तला – खबर – Information

