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दिल्ली में एक मौत – कमलेश्वर

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कमलेश्वर – लेखक परिचय

कमलेश्वर का जीवन परिचय (1932–2007)

कमलेश्वर आधुनिक हिंदी साहित्य के अत्यंत प्रभावशाली और बहुआयामी रचनाकार थे। वे ‘नई कहानी’ आंदोलन के स्तंभों में से एक माने जाते हैं। उन्होंने न केवल कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि पत्रकारिता, पटकथा लेखन और दूरदर्शन के क्षेत्र में भी अमूल्य योगदान दिया।

जन्म और शिक्षा –

कमलेश्वर का जन्म 6 जनवरी, 1932 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा मैनपुरी में हुई और उच्च शिक्षा के लिए वे प्रयागराज (इलाहाबाद) चले गए। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। उनके साहित्यिक जीवन की शुरुआत यहीं से हुई, जहाँ उन्हें उस समय के महान लेखकों का सान्निध्य प्राप्त हुआ।

साहित्यिक विशेषताएँ –

कमलेश्वर की रचनाओं का मुख्य स्वर यथार्थवाद है। उन्होंने महानगरीय जीवन की यांत्रिकता, मध्यम वर्ग के अंतर्द्वंद्व, आर्थिक संघर्ष और मानवीय मूल्यों के ह्रास को अपनी लेखनी का विषय बनाया। उनकी कहानियों में सामाजिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य मिलता है।

प्रमुख कृतियाँ –

  • कहानी संग्रह: ‘राजा निरबंसिया’, ‘खोई हुई दिशाएँ’, ‘मांस का दरिया’, ‘दिल्ली में एक मौत’।
  • उपन्यास: ‘कितने पाकिस्तान’ (प्रसिद्ध ऐतिहासिक-राजनैतिक उपन्यास), ‘डाक बंगला’, ‘काली आँधी’, ‘लौटे हुए मुसाफिर’।
  • पटकथा लेखन: उन्होंने ‘आँधी’, ‘मौसम’, ‘सारा आकाश’ और ‘मिस्टर नटवरलाल’ जैसी प्रसिद्ध फिल्मों की पटकथाएँ लिखीं।

सम्मान और पुरस्कार –

साहित्य के प्रति उनकी सेवाओं के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया –

  1. साहित्य अकादमी पुरस्कार (2003): उनके उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ के लिए।
  2. पद्म भूषण (2005): भारत सरकार द्वारा साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान हेतु।

संपादन और दूरदर्शन –

वे ‘सारिका’, ‘धर्मयुग’, ‘जागरण’ और ‘दैनिक भास्कर’ जैसे प्रतिष्ठित पत्रों के संपादक रहे। साथ ही, उन्होंने दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक के रूप में भी कार्य किया, जहाँ उन्होंने ‘परिक्रमा’ और ‘आकाश गंगा’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से टीवी पत्रकारिता को नई दिशा दी।

27 जनवरी, 2007 को फरीदाबाद में दिल का दौरा पड़ने से इस महान साहित्यकार का निधन हो गया।

दिल्ली में एक मौत – कमलेश्वर

चारों तरफ कुहरा छाया हुआ है। सुबह के नौ बजे हैं, लेकिन पूरी दिल्ली धुँध में लिपटी हुई है। सड़कें नम हैं। पेड़ भीगे हुए हैं। कुछ भी साफ दिखाई नहीं देता। जिंदगी की हलचल का पता आवाजों से लग रहा है। ये आवाजें कानों में बस गई हैं। घर के हर हिस्से से आवाजें आ रही हैं। वासवानी के नौकर ने रोज की तरह स्टोव जला दिया है, उसकी सनसनाहट दीवार के पार से आ रही है। बगल वाले कमरे में अतुल मवानी जूते पर पालिश कर रहा है… ऊपर सरदारजी मूँछों पर फिक्सो लगा रहे हैं… उनकी खिड़की के परदे के पार जलता हुआ बल्ब बड़े मोती की तरह चमक रहा है। सब दरवाजे बंद हैं, सब खिड़कियों पर परदे हैं, लेकिन हर हिस्से में जिंदगी की खनक है। तिमंजिले पर वासवानी ने बाथरूम का दरवाजा बंद किया है और पाइप खोल दिया है…

कुहरे में बसें दौड़ रही हैं। जूँ-जूँ करते भारी टायरों की आवाजें दूर से नजदीक आती हैं और फिर दूर होती जाती हैं। मोटर-रिक्शे बेतहाशा भागे चले जा रहे हैं। टैक्सी का मीटर अभी किसी ने डाउन किया है। पड़ोस के डॉक्टर के यहाँ फोन की घंटी बज रही है। और पिछवाड़े गली से गुजरती हुई कुछ लड़कियाँ सुबह की शिफ्ट पर जा रही हैं।

सख्त सर्दी है। सड़कें ठिठुरी हुई हैं और कोहरे के बादलों को चीरती हुई कारें और बसें हॉर्न बजाती हुई भाग रही हैं। सड़कों और पटरियों पर भीड़ है, पर कुहरे में लिपटा हुआ हर आदमी भटकती हुई रूह की तरह लग रहा है।

वे रूहें चुपचाप धुँध के समुद्र में बढ़ती जा रही हैं… बसों में भीड़ है। लोग ठंडी सीटों पर सिकुड़े हुए बैठे हैं और कुछ लोग बीच में ही ईसा की तरह सलीब पर लटके हुए हैं बाँहें पसारे, उनकी हथेलियों में कीलें नहीं, बस की बर्फीली, चमकदार छड़ें हैं।

और ऐसे में दूर से एक अर्थी सड़क पर चली आ रही है।

इस अर्थी की खबर अखबार में है। मैंने अभी-अभी पढी है। इसी मौत की खबर होगी। अखबार में छपा है आज रात करोलबाग के मशहूर और लोकप्रिय बिजनेस मैगनेट सेठ दीवानचंद की मौत इरविन अस्पताल में हो गई। उनका शव कोठी पर ले आया गया है। कल सुबह नौ बजे उनकी अर्थी आर्य समाज रोड से होती हुई पंचकुइयाँ श्मशान-भूमि में दाह-संस्कार के लिए जाएगी।

और इस वक्त सड़क पर आती हुई यह अर्थी उन्हीं की होगी। कुछ लोग टोपियाँ लगाए और मफलर बाँधे हुए खामोशी से पीछे-पीछे आ रहे हैं। उनकी चाल बहुत धीमी है। कुछ दिखाई पड़ रहा है, कुछ नहीं दिखाई पड़ रहा है, पर मुझे ऐसा लगता है अर्थी के पीछे कुछ आदमी हैं।

मेरे दरवाजे पर दस्तक होती है। मैं अखबार एक तरफ रखकर दरवाजा खोलता हूँ। अतुल मवानी सामने खड़ा है।

‘यार, क्या मुसीबत है, आज कोई आयरन करने वाला भी नहीं आया, जरा अपना आयरन देना। अतुल कहता है तो मुझे तसल्ली होती है। नहीं तो उसका चेहरा देखते ही मुझे खटका हुआ था कि कहीं शवयात्रा में जाने का बवाल न खड़ा कर दे। मैं उसे फौरन आयरन दे देता हूँ और निश्चिंत हो जाता हूँ कि अतुल अब अपनी पेंट पर लोहा करेगा और दूतावासों के चक्कर काटने के लिए निकल जाएगा।

जब से मैंने अखबार में सेठ दीवानचंद की मौत की खबर पढ़ी थी, मुझे हर क्षण यही खटका लगा था कि कहीं कोई आकर इस सर्दी में शव के साथ जाने की बात न कह दे। बिल्डिंग के सभी लोग उनसे परिचित थे और सभी शरीफ, दुनियादार आदमी थे।

तभी सरदारजी का नौकर जीने से भड़भड़ाता हुआ आया और दरवाजा खोलकर बाहर जाने लगा। अपने मन को और सहारा देने के लिए मैंने उसे पुकारा, ‘धर्मा! कहाँ जा रहा है?

‘सरदारजी के लिए मक्खन लेने, उसने वहीं से जवाब दिया तो लगे हाथों लपककर मैंने भी अपनी सिगरेट मँगवाने के लिए उसे पैसे थमा दिए।

सरदारजी नाश्ते के लिए मक्खन मँगवा रहे हैं, इसका मतलब है वे भी शवयात्रा में शामिल नहीं हो रहे हैं। मुझे कुछ और राहत मिली। जब अतुल मवानी और सरदारजी का इरादा शवयात्रा में जाने का नहीं है तो मेरा कोई सवाल ही नहीं उठता। इन दोनों का या वासवानी परिवार का ही सेठ दीवानचंद के यहाँ ज्यादा आना-जाना था। मेरी तो चार-पाँच बार की मुलाकात भर थी। अगर ये लोग ही शामिल नहीं हो रहे हैं तो मेरा सवाल ही नहीं उठता।

सामने बारजे पर मुझे मिसेस वासवानी दिखाई पड़ती हैं। उनके खूबसूरत चेहरे पर अजीब-सी सफेदी और होंठों पर पिछली शाम की लिपस्टिक की हल्की लाली अभी भी मौजूद थी। गाउन पहने हुए ही वे निकली हैं और अपना जूड़ा बाँध रही हैं। उनकी आवाज सुनाई पड़ती है, ‘डार्लिंग, जरा मुझे पेस्ट देना, प्लीज…

मुझे और राहत मिलती है। इसका मतलब है कि मिस्टर वासवानी भी मैयत में शामिल नहीं हो रहे हैं।

दूर आर्य समाज रोड पर वह अर्थी बहुत आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ती आ रही है…

अतुल मवानी मुझे आयरन लौटाने आता है। मैं आयरन लेकर दरवाजा बंद कर लेना चाहता हूँ, पर वह भीतर आकर खड़ा हो जाता है और कहता है, ‘तुमने सुना, दीवानचंदजी की कल मौत हो गई है।

‘मैंने अभी अखबार में पढ़ा है, मैं सीधा-सा जवाब देता हूँ, ताकि मौत की बात आगे न बढ़े। अतुल मवानी के चेहरे पर सफेदी झलक रही है, वह शेव कर चुका है। वह आगे कहता है, ‘बड़े भले आदमी थे दीवानचंद।

यह सुनकर मुझे लगता है कि अगर बात आगे बढ़ गई तो अभी शवयात्रा में शामिल होने की नैतिक जिम्मेदारी हो जाएगी, इसलिए मैं कहता हूँ, ‘तुम्हारे उस काम का क्या हुआ?

‘बस, मशीन आने भर की देर है। आते ही अपना कमीशन तो खड़ा हो जाएगा। यह कमीशन का काम भी बड़ा बेहूदा है। पर किया क्या जाए? आठ-दस मशीनें मेरे थ्रू निकल गईं तो अपना बिजनेस शुरू कर दूँगा। अतुल मवानी कह रहा है, ‘भई, शुरू-शुरू में जब मैं यहाँ आया था तो दीवानचंदजी ने बड़ी मदद की थी मेरी। उन्हीं की वजह से कुछ काम-धाम मिल गया था। लोग बहुत मानते थे उन्हें।

फिर दीवानचंद का नाम सुनते ही मेरे कान खड़े हो जाते हैं। तभी खिड़की से सरदारजी सिर निकालकर पूछने लगते हैं, ‘मिस्टर मवानी! कितने बजे चलना है?

‘वक्त तो नौ बजे का था, शायद सर्दी और कुहरे की वजह से कुछ देर हो जाए। वह कह रहा है और मुझे लगता है कि यह बात शवयात्रा के बारे में ही है।

सरदारजी का नौकर धर्मा मुझे सिगरेट देकर जा चुका है और ऊपर मेज पर चाय लगा रहा है। तभी मिसेज वासवानी की आवाज सुनाई पड़ती है, ‘मेरे खयाल से प्रमिला वहाँ जरूर पहुँचेगी, क्यों डार्लिंग?

‘पहुँचना तो चाहिए। …तुम जरा जल्दी तैयार हो जाओ। कहते हुए मिस्टर वासवानी बारजे से गुजर गए हैं।

अतुल मुझसे पूछ रहा है, ‘शाम को कॉफी-हाउस की तरफ आना होगा?

‘शायद चला आऊँ, कहते हुए मैं कम्बल लपेट लेता हूँ और वह वापस अपने कमरे में चला जाता है। आधे मिनट बाद ही उसकी आवाज फिर आती है, ‘भई, बिजली आ रही है?

मैं जवाब दे देता हूँ, ‘हाँ, आ रही है। मैं जानता हूँ कि वह इलेक्ट्रिक रॉड से पानी गर्म कर रहा है, इसीलिए उसने यह पूछा है।

‘पॉलिश! बूट पॉलिश वाला लड़का हर रोज की तरह अदब से आवाज लगाता है और सरदारजी उसे ऊपर पुकार लेते हैं। लड़का बाहर बैठकर पॉलिश करने लगता है और वह अपने नौकर को हिदायतें दे रहे हैं, ‘खाना ठीक एक बजे लेकर आना।… पापड़ भूनकर लाना और सलाद भी बना लेना…।

मैं जानता हूँ सरदारजी का नौकर कभी वक्त से खाना नहीं पहुँचाता और न उनके मन की चीजें ही पकाता है।

बाहर सड़क पर कुहरा अभी भी घना है। सूरज की किरणों का पता नहीं है। कुलचे-छोलेवाले वैष्णव ने अपनी रेढ़ी लाकर खड़ी कर ली है। रोज की तरह वह प्लेटें सजा रहा है, उनकी खनखनाहट की आवाज आ रही है।

सात नंबर की बस छूट रही है। सूलियों पर लटके ईसा उसमें चले जा रहे हैं और क्यू में खड़े और लोगों को कंडक्टर पेशगी टिकट बाँट रहा है। हर बार जब भी वह पैसे वापस करता है तो रेजगारी की खनक यहाँ तक आती है। धुँध में लिपटी रूहों के बीच काली वर्दी वाला कंडक्टर शैतान की तरह लग रहा है।

और अर्थी अब कुछ और पास आ गई है।

 

‘नीली साड़ी पहन लूँ? मिसेज वासवानी पूछ रही हैं।

वासवानी के जवाब देने की घुटी-घुटी आवाज से लग रहा है कि वह टाई की नॉट ठीक कर रहा है।

सरदारजी के नौकर ने उनका सूट ब्रुश से साफ करके हैंगर पर लटका दिया है। और सरदारजी शीशे के सामने खड़े पगड़ी बाँध रहे हैं।

अतुल मवानी फिर मेरे सामने से निकला है। पोर्टफोलियो उसके हाथ में है। पिछले महीने बनवाया हुआ सूट उसने पहन रखा है। उसके चेहरे पर ताजगी है और जूतों पर चमक। आते ही वह मुझे पूछता है, ‘तुम नहीं चल रहे हो? और मैं जब तक पूछूँ कि कहाँ चलने को वह पूछ रहा है, वह सरदारजी को आवाज लगाता है, ‘आइए, सरदारजी! अब देर हो रही है। दस बज चुका है।

दो मिनट बाद ही सरदारजी तैयार होकर नीचे आते हैं कि वासवानी ऊपर से ही मवानी का सूट देखकर पूछता है, ‘ये सूट किधर सिलवाया?

‘उधर खान मार्केट में।

‘बहुत अच्छा सिला है। टेलर का पता हमें भी देना। फिर वह अपनी मिसेज को पुकारता है, ‘अब आ जाओ, डियर!… अच्छा मैं नीचे खड़ा हूँ तुम आओ। कहता हुआ वह भी मवानी और सरदारजी के पास आ जाता है और सूट को हाथ लगाते हुए पूछता है, ‘लाइनिंग इंडियन है।

‘इंग्लिश!

‘बहुत अच्छा फिटिंग है! कहते हुए वह टेलर का पता डायरी में नोट करता है। मिसेज वासवानी बारजे पर दिखाई पड़ती हैं।

अर्थी अब सड़क पर ठीक मेरे कमरे के नीचे है। उसके साथ कुछेक आदमी हैं, एक-दो कारें भी हैं, जो धीरे-धीरे रेंग रही हैं। लोग बातों में मशगूल हैं।

मिसेज वासवानी जूड़े में फूल लगाते हुए नीचे उतरती हैं तो सरदारजी अपनी जेब का रुमाल ठीक करने लगते हैं। और इससे पहले कि वे लोग बाहर जाएँ वासवानी मुझसे पूछता है, ‘आप नहीं चल रहे?

‘आप चलिए मैं आ रहा हूँ मैं कहता हूँ पर दूसरे ही क्षण मुझे लगता है कि उसने मुझसे कहाँ चलने को कहा है? मैं अभी खड़ा सोच ही रहा रहा हूँ कि वे चारों घर के बाहर हो जाते हैं।

अर्थी कुछ और आगे निकल गई है। एक कार पीछे से आती है और अर्थी के पास धीमी होती है। चलाने वाले साहब शवयात्रा में पैदल चलने वाले एक आदमी से कुछ बात करते हैं और कार सर्र से आगे बढ़ जाती है। अर्थी के साथ पीछे जाने वाली दोनों कारें भी उसी कार के पीछे सरसराती हुई चली जाती हैं।

मिसेज वासवानी और वे तीनों लोग टैक्सी स्टैंड की ओर जा रहे हैं। मैं उन्हें देखता रहता हूँ। मिसेज वासवानी ने फर-कालर डाल रखा है। और शायद सरदारजी अपने चमड़े के दास्ताने पहने हैं और वे चारों टैक्सी में बैठ जाते हैं। अब टैक्सी इधर ही आ रही है और उसमें से खिलखिलाने की आवाज मुझे सुनाई पड़ रही है। वासवानी आगे सड़क पर जाती अर्थी की ओर इशारा करते हुए ड्राइवर को कुछ बता रहा है।…

मैं चुपचाप खड़ा सब देख रहा हूँ और अब न जाने क्यों मुझे मन में लग रहा है कि दीवानचंद की शवयात्रा में कम से कम मुझे तो शामिल हो ही जाना चाहिए था। उनके लड़के से मेरी खासी जान-पहचान है और ऐसे मौके पर तो दुश्मन का साथ भी दिया जाता है। सर्दी की वजह से मेरी हिम्मत छूट रही है… पर मन में कहीं शवयात्रा में शामिल होने की बात भीतर ही भीतर कोंच रही है।

उन चारों की टैक्सी अर्थी के पास धीमी होती है। मवानी गर्दन निकालकर कुछ कहता है और दाहिने से रास्ता काटते हुए टैक्सी आगे बढ़ जाती है।

मुझे धक्का-सा लगता है और मैं ओवरकोट पहनकर, चप्पलें डालकर नीचे उतर आता हूँ। मुझे मेरे कदम अपने आप अर्थी के पास पहुँचा देते हैं, और मैं चुपचाप उसके पीछे-पीछे चलने लगता हूँ। चार आदमी कंधा दिए हुए हैं और सात आदमी साथ चल रहे हैं सातवाँ मैं ही हूँ। और मैं सोच रहा हूँ कि आदमी के मरते ही कितना फर्क पड़ जाता है। पिछले साल ही दीवानचंद ने अपनी लड़की की शादी की थी तो हजारों की भीड़ थी। कोठी के बाहर कारों की लाइन लगी हुई थी…

मैं अर्थी के साथ-साथ लिंक रोड पर पहुँच चुका हूँ। अगले मोड़ पर ही पंचकुइयाँ श्मशान भूमि है।

और जैसे ही अर्थी मोड़ पर घूमती है, लोगों की भीड़ और कारों की कतार मुझे दिखाई देने लगती है। कुछ स्कूटर भी खड़े हैं। औरतों की भीड़ एक तरफ खड़ी है। उनकी बातों की ऊँची ध्वनियाँ सुनाई पड़ रही हैं। उनके खड़े होने में वही लचक है जो कनॉट प्लेस में दिखाई पड़ती है। सभी के जुड़ों के स्टाइल अलग-अलग हैं। मर्दों की भीड़ से सिगरेट का धुआँ उठ-उठकर कुहरे में घुला जा रहा है और बात करती हुई औरतों के लाल-लाल होंठ और सफेद दाँत चमक रहे हैं और उनकी आँखों में एक गरूर है…

अर्थी को बाहर बने चबूतरे पर रख दिया गया है। अब खामोशी छा गई है। इधर-उधर बिखरी हुई भीड़ शव के इर्द-गिर्द जमा हो गई है और कारों के शोफर हाथों में फूलों के गुलदस्ते और मालाएँ लिए अपनी मालकिनों की नजरों का इंतजार कर रहे हैं।

मेरी नजर वासवानी पर पड़ती है। वह अपनी मिसेज को आँख के इशारे से शव के पास जाने को कह रहा है और वह है कि एक औरत के साथ खड़ी बात कर रही है। सरदारजी और अतुल मवानी भी वहीं खड़े हुए हैं।

शव का मुँह खोल दिया गया है और अब औरतें फूल और मालाएँ उसके इर्द-गिर्द रखती जा रही हैं। शोफर खाली होकर अब कारों के पास खड़े सिगरेट पी रहे हैं।

एक महिला माला रखकर कोट की जेब से रुमाल निकालती है और आँखों पर रखकर नाक सुरसुराने लगती है और पीछे हट जाती है।

और अब सभी औरतों ने रुमाल निकाल लिए हैं और उनकी नाकों से आवाजें आ रही हैं।

कुछ आदमियों ने अगरबत्तियाँ जलाकर शव के सिरहाने रख दी हैं। वे निश्चल खड़े हैं।

आवाजों से लग रहा है औरतों के दिल को ज्यादा सदमा पहुँचा है।

अतुल मवानी अपने पोर्टफोलियो से कोई कागज निकालकर वासवानी को दिखा रहा है। मेरे खयाल से वह पासपोर्ट का फॉर्म है।

अब शव को भीतर श्मशान भूमि में ले जाया जा रहा है। भीड़ फाटक के बाहर खड़ी देख रही है। शोफरों ने सिगरेटें या तो पी ली हैं या बुझा दी हैं और वे अपनी-अपनी कारों के पास तैनात हैं।

शव अब भीतर पहुँच चुका है।

मातमपुरसी के लिए आए हुए आदमी और औरतें अब बाहर की तरफ लौट रहे हैं। कारों के दरवाजे खुलने और बंद होने की आवाजें आ रही हैं। स्कूटर स्टार्ट हो रहे हैं। और कुछ लोग रिंग रोड, बस-स्टॉप की ओर बढ़ रहे हैं।

कुहरा अभी भी घना है। सड़क से बसें गुजर रही हैं और मिसेज वासवानी कह रही हैं, ‘प्रमिला ने शाम को बुलाया है, चलोगे न डियर? कार आ जाएगी। ठीक है न?

वासवानी स्वीकृति में सिर हिला रहा है।

कारों में जाती हुई औरतें मुस्कराते हुए एक-दूसरे से विदा ले रही हैं और बाय-बाय की कुछेक आवाजें आ रही हैं। कारें स्टार्ट होकर जा रही हैं।

अतुल मवानी और सरदारजी भी रिंग रोड, बस स्टॉप की ओर बढ़ गए हैं और मैं खड़ा सोच रहा हूँ कि अगर मैं भी तैयार होकर आया होता तो यहीं से सीधा काम पर निकल जाता। लेकिन अब तो साढ़े ग्यारह बज चुके हैं।

चिता में आग लगा दी गई है और चार-पाँच आदमी पेड़ के नीचे पड़ी बैंच पर बैठे हुए हैं। मेरी तरह वे भी यूँ ही चले आए हैं। उन्होंने जरूर छुट्टी ले रखी होगी, नहीं तो वे भी तैयार होकर आते।

मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि घर जाकर तैयार होकर दफ्तर जाऊँ या अब एक मौत का बहाना बनाकर आज की छुट्टी ले लूँ आखिर मौत तो हुई ही है और मैं शवयात्रा में शामिल भी हुआ हूँ।

 

 

कहानी परिचय – ‘दिल्ली में एक मौत’ (कमलेश्वर)

‘दिल्ली में एक मौत’ सुप्रसिद्ध कथाकार कमलेश्वर द्वारा रचित एक यथार्थवादी कहानी है, जो आधुनिक महानगरीय जीवन की यांत्रिकता, संवेदनहीनता और अमानवीयता को उजागर करती है। यह कहानी दिल्ली जैसे महानगर में रहने वाले लोगों की उस मानसिक स्थिति का चित्रण है, जहाँ व्यक्ति के पास अपने पड़ोसी की मौत पर शोक व्यक्त करने का भी समय भी नहीं है।

कथानक और संवेदना –

कहानी की शुरुआत करोलबाग के एक धनी व्यवसायी सेठ दीवानचंद की मृत्यु से होती है। पूरी बिल्डिंग के लोग जैसे – वासवानी, सरदारजी, अतुल मवानी और स्वयं लेखक इस बात से कतराते हैं कि उन्हें इस कड़कड़ाती ठंड में शवयात्रा में शामिल होना पड़ेगा। कहानी का केंद्रबिंदु वह बनावटीपन है, जहाँ लोग शवयात्रा में केवल इसलिए जाते हैं ताकि वे सामाजिक औपचारिकता निभा सकें और दूसरों को अपना कीमती सूट या रसूख दिखा सकें।

मुख्य बिंदु –

  • संवेदनशून्य समाज – लोग अर्थी के पीछे चलते हुए भी अपने व्यापार, पासपोर्ट और फैशन की बातें करते हैं।
  • महानगरीय अकेलापन – यहाँ रूहें ‘भटकती’ हुई-सी लगती हैं और जीवन एक यांत्रिक दिनचर्या बन गया है।
  • प्रदर्शन की प्रवृत्ति – श्मशान घाट पर भी औरतों के जुड़ों के स्टाइल और पुरुषों की सिगरेट का धुआँ आधुनिकता के खोखलेपन को दर्शाता है।

अंततः, यह कहानी मनुष्य के भीतर मर चुकी संवेदनाओं पर एक तीखा व्यंग्य है।

 

 

पात्र परिचय

कमलेश्वर की कहानी ‘दिल्ली में एक मौत’ में पात्र किसी व्यक्ति विशेष के बजाय आधुनिक महानगरीय समाज की संवेदनहीनता और औपचारिकता के प्रतीक हैं। कहानी के मुख्य पात्र और उनका परिचय कुछ इस प्रकार है –

1. लेखक (कथावाचक)

यह कहानी के केंद्रीय पात्र हैं जो पूरी घटना का सूक्ष्म अवलोकन करते हैं।

  • द्वंद्व का शिकार – उनके मन में सामाजिक नैतिकता और अपनी सर्दी से बचाव की सुविधा के बीच लगातार संघर्ष चलता रहता है।
  • दिखावे की प्रवृत्ति – वह शवयात्रा में शामिल तो होते हैं, लेकिन उसके मन में सहानुभूति से ज्यादा यह चिंता है कि वह ऑफिस जाने के लिए तैयार होकर क्यों नहीं आए।
  • अवसरवादी – अंत में वह दीवानचंद की मौत को ऑफिस से छुट्टी लेने का एक बहाना बनाने की सोचता है।

2. अतुल मवानी

मवानी दिल्ली में संघर्ष कर रहे उस मध्यमवर्गीय युवक का प्रतीक है जो ‘कमीशन’ और ‘बिजनेस’ की दौड़ में लगा है।

  • वह दीवानचंद का करीबी होने के बावजूद शवयात्रा में जाने के बजाय अपने जूतों की चमक और सूट की फिटिंग को ज्यादा महत्त्व देता है।
  • उसके लिए मौत का अवसर भी नेटवर्किंग और अपने पासपोर्ट फॉर्म के काम को निपटाने का एक ज़रिया है।

3. सरदारजी

सरदारजी बिल्डिंग के एक अन्य निवासी हैं जो अपनी दिनचर्या और ठाठ-बाट में मगन हैं।

  • उनका चरित्र दिखाता है कि मौत जैसी घटना भी उनकी ‘नाश्ते में मक्खन’ मँगाने या ‘पगड़ी बाँधने’ की प्रक्रिया में कोई बाधा नहीं डालती।
  • वे शवयात्रा में केवल एक सामाजिक रस्म अदायगी के लिए जाते हैं।

4. वासवानी और मिसेज वासवानी

यह दंपत्ति उच्च-मध्यम वर्ग के बनावटीपन और प्रदर्शनप्रियता को दर्शाता है।

  • मिसेज वासवानी के लिए श्मशान घाट भी एक ‘कनॉट प्लेस’ जैसा स्थान है, जहाँ वे अपने फैशन, जुड़ों के स्टाइल और रसूख का प्रदर्शन करती हैं।
  • मिस्टर वासवानी शवयात्रा के दौरान भी टेलर का पता नोट करने और दुनियादारी की बातों में मशगूल रहते हैं।

5. सेठ दीवानचंद (मृतक)

वे एक प्रसिद्ध बिज़नेस मैग्नेट थे, लेकिन कहानी में वे केवल एक ‘वस्तु’ बनकर रह जाते हैं।

  • उनकी मृत्यु लोगों के लिए शोक का विषय नहीं, बल्कि उनकी सुबह की दिनचर्या में एक ‘अड़चन’ की तरह है।
  • उनके माध्यम से लेखक यह दिखाता है कि महानगर में व्यक्ति के जीवित रहने का मूल्य तो है, पर मरने के बाद वह केवल एक औपचारिक खबर बन जाता है।

निष्कर्ष –

इस कहानी के सभी पात्र ‘भीड़ में अकेले’ मनुष्य की त्रासदी को व्यक्त करते हैं। इनके बीच कोई आत्मीय संबंध नहीं है, बस एक सामाजिक दिखावा है।

 

 

‘दिल्ली में एक मौत’ – विस्तृत सारांश

कमलेश्वर की कहानी ‘दिल्ली में एक मौत’ महानगर की संवेदनहीनता, यांत्रिकता और कृत्रिमता पर एक करारा प्रहार है। यह कहानी दिखाती है कि कैसे बड़े शहरों में इंसान की मौत महज एक ‘खबर’ बनकर रह जाती है और संवेदनाओं का स्थान औपचारिकता ले लेती है।

कहानी का विस्तृत सारांश घटनाक्रम के इन बिंदुओं के आधार पर समझा जा सकता है –

1. दिल्ली की धुंध और यांत्रिक सुबह

कहानी की शुरुआत दिल्ली की एक सर्द और कोहरे भरी सुबह से होती है। लेखक अपने कमरे से बाहर का दृश्य देखते हैं जहाँ जीवन की हलचल तो है, पर उसमें कोई आत्मीयता नहीं है। कोहरे के कारण सब कुछ धुंधला है और लोग ‘भटकती रूहों’ की तरह लग रहे हैं। बसों में लोग ईसा की तरह सलीब पर लटके अर्थात् हैंडल पकड़े जा रहे हैं। हर कोई अपनी दिनचर्या में व्यस्त हैं—कोई जूते पॉलिश कर रहा है, कोई स्टोव जला रहा है, तो कोई ऑफिस जाने की तैयारी में है।

2. सेठ दीवानचंद की मौत की खबर

लेखक अखबार में पढ़ता है कि करोलबाग के मशहूर व्यापारी सेठ दीवानचंद की मौत अस्पताल में हो गई है। बिल्डिंग के सभी लोग उन्हें जानते थे। लेखक के मन में द्वंद्व है कि उसे शवयात्रा में जाना चाहिए या नहीं। वह सर्दी की वजह से बचना चाहता है और यह उम्मीद करता है कि दूसरे लोग जैसे – अतुल मवानी, सरदारजी, वासवानी भी न जाएँ, ताकि उसे नैतिक ग्लानि न हो।

3. पड़ोसियों की संवेदनहीनता और बहानेबाजी

लेखक गौर करते हैं कि उसके पड़ोसी मौत की खबर सुनकर भी अपनी सुख-सुविधाओं में मगन हैं –

  • अतुल मवानी अपनी पैंट पर प्रेस कर रहा है और बिजनेस की बातें कर रहा है।
  • सरदारजी नाश्ते के लिए मक्खन मँगवा रहे हैं और जूतों पर पॉलिश करवा रहे हैं।
  • मिसेज वासवानी अपने मेकअप और कपड़ों के चुनाव में व्यस्त हैं।

इन सभी के लिए दीवानचंद की मौत एक शोक नहीं, बल्कि एक सामाजिक ‘ड्यूटी’ है जिसे वे बेमन से निपटाना चाहते हैं।

4. शवयात्रा का दृश्य और दिखावा

अंततः, लेखक और उसके पड़ोसी शवयात्रा में शामिल होते हैं। यहाँ कमलेश्वर ने श्मशान घाट के दृश्य का बड़ा ही तीखा वर्णन किया है –

  • तमाशा और फैशन – श्मशान में जुटी औरतों के बीच शोक कम और फैशन का प्रदर्शन ज्यादा है। उनके जुड़ों के स्टाइल, चमचमाती कारें और सलीके से निकाले गए रुमाल उनके बनावटीपन को दर्शाते हैं।
  • दुनियादारी – पुरुष वर्ग वहाँ भी व्यापार, पासपोर्ट फॉर्म और टेलर के पते की बातें कर रहा है।
  • औपचारिकता – रुमाल से नाक सुरसुराना और बनावटी रोना केवल एक रस्म अदायगी लगती है। ऐसा लगता है जैसे वे किसी की अंतिम विदाई में नहीं, बल्कि किसी ‘गेट-टुगेदर’ में आए हों।

5. अंत – संवेदनहीनता की पराकाष्ठा

जैसे ही अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू होती है, लोग धीरे-धीरे खिसकने लगते हैं। कारों के दरवाजे बंद होने की आवाजें आती हैं और लोग एक-दूसरे को ‘बाय-बाय’ कहकर अपनी अगली पार्टियों या कामों की चर्चा करने लगते हैं। लेखक भी खड़े सोच रहे हैं कि वह अब ऑफिस जाए या ‘मौत’ का बहाना बनाकर छुट्टी ले लें। दीवानचंद की मौत उसके लिए दुख का विषय नहीं, बल्कि ऑफिस से बचने का एक बहाना बन जाती है।

कहानी का संदेश

यह कहानी यह कड़वा सच उजागर करती है कि आधुनिक युग में मनुष्य एक ‘मशीन’ बन गया है। महानगरों में व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से कोई भावनात्मक जुड़ाव नहीं रह गया है। यहाँ ‘भीड़’ तो है, पर ‘मनुष्यता’ गायब है।

 

 

‘दिल्ली में एक मौत’ – केंद्र बिंदु

कमलेश्वर की कहानी ‘दिल्ली में एक मौत’ का केंद्र बिंदु “आधुनिक महानगरीय जीवन की संवेदनहीनता और अमानवीयता” है। लेखक ने इस कहानी के माध्यम से यह दिखाया है कि बड़े शहरों में व्यक्ति का अस्तित्व केवल जीवित रहते तक ही महत्त्व रखता है, मृत्यु के बाद वह केवल एक ‘औपचारिकता’ बनकर रह जाता है।

1. यांत्रिकता और कृत्रिमता (Mechanical Life)

कहानी का मुख्य केंद्र यह दिखाना है कि महानगरों में जीवन मशीनी हो गया है। कोहरे में लिपटी हुई ‘भटकती रूहें’ और बसों में ‘ईसा की तरह लटके लोग’ यह संकेत देते हैं कि यहाँ व्यक्ति अपनी संवेदनाएँ खो चुका है। लोगों की दिनचर्या जैसे – मक्खन मँगाना, प्रेस करना, पॉलिश करना आदि किसी की मौत से भी प्रभावित नहीं होती।

2. दिखावा और प्रदर्शन (Show-off Culture)

कहानी का केंद्र बिंदु वह बनावटीपन है जो श्मशान घाट तक पहुँच जाता है। लोग शोक व्यक्त करने नहीं, बल्कि अपनी कारों, सूट की फिटिंग, और औरतों के जुड़ों के स्टाइल का प्रदर्शन करने आते हैं। वहाँ होने वाली बातचीत में ‘शोक’ के बजाय ‘बिजनेस’ और ‘पासपोर्ट फॉर्म’ की चर्चा होना इस खोखलेपन को उजागर करता है।

3. नैतिक द्वंद्व और अवसरवाद

लेखक का स्वयं का चरित्र कहानी के एक महत्त्वपूर्ण केंद्र को दर्शाता है—आंतरिक द्वंद्व। वह शवयात्रा में शामिल तो होता है, लेकिन सहानुभूति के कारण नहीं, बल्कि सामाजिक शर्म और नैतिकता के बोझ के कारण। अंत में, उसका दीवानचंद की मौत को ‘ऑफिस से छुट्टी लेने का बहाना’ बनाना संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।

4. अकेलापन और अलगाव (Alienation)

कहानी यह कड़वा सच दिखाती है कि दिल्ली जैसे शहर में लाखों की भीड़ के बीच भी इंसान अकेला है। पड़ोसियों के बीच कोई भावनात्मक संबंध नहीं है। वे एक-दूसरे के साथ केवल इसलिए हैं ताकि ‘दुनियादारी’ बनी रहे।

निष्कर्ष –

संक्षेप में, इस कहानी का केंद्र बिंदु मनुष्य के भीतर मर चुकी संवेदनाओं पर व्यंग्य करना है। यह कहानी हमें आईना दिखाती है कि हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ ‘लाश’ की गरिमा से बड़ा लोगों का ‘अपना समय और सुविधा’ हो गया है।

 

 

‘दिल्ली में एक मौत’ – मनोवैज्ञानिक पक्ष

कमलेश्वर की कहानी ‘दिल्ली में एक मौत’ का मनोवैज्ञानिक पक्ष आधुनिक मानव के अंतर्द्वंद्व, अलगाव और संवेदनशून्य मानसिकता का गहरा विश्लेषण करता है। महानगरीय परिवेश में व्यक्ति की सोच कैसे स्वार्थ और औपचारिकता के इर्द-गिर्द घूमती है, लेखक ने इसे सूक्ष्मता से उभारा है।

 

1. नैतिक द्वंद्व और सुरक्षात्मक व्यवहार (Moral Conflict and Defense Mechanism)

कहानी का नायक (लेखक) शुरुआत से ही एक मनोवैज्ञानिक द्वंद्व में फँसा है। एक तरफ उसकी ‘सामाजिक नैतिकता’ उसे शवयात्रा में जाने को उकसाती है, तो दूसरी तरफ ‘आलस और सर्दी’ उसे रोकना चाहती है। वह बार-बार अपने पड़ोसियों जैसे अतुल मवानी, सरदारजी, वासवानी को देखता है ताकि वह उनके ‘न जाने’ को अपने भी न जाने का आधार बनाकर अपनी ग्लानि (Guilt) को शांत कर सके। यह मानव मन की वह प्रवृत्ति है जहाँ हम अपने गलत निर्णय को सही ठहराने के लिए दूसरों का सहारा लेते हैं।

 

2. संवेदनहीनता और यांत्रिकता (Emotional Numbness)

मनोवैज्ञानिक रूप से, महानगर का व्यक्ति एक ‘मशीन’ बन गया है। दीवानचंद की मौत उनके पड़ोसियों के लिए भावनात्मक क्षति नहीं, बल्कि उनकी दिनचर्या में एक बाधा (Interruption) है। मिसेज वासवानी का लिपस्टिक लगाना, सरदारजी का नाश्ते के लिए मक्खन मँगाना और अतुल का कमीशन की बातें करना यह दर्शाता है कि उनके मन में ‘मृत्यु’ के प्रति कोई संवेदना नहीं बची है। वे इतने ‘अनुकूलित’ (Conditioned) हो चुके हैं कि मृत्यु भी उनके लिए एक यांत्रिक घटना मात्र है।

 

3. प्रदर्शनप्रियता और ‘छद्म-शोक’ (Pseudo-Grief)

श्मशान घाट पर औरतों का रुमाल निकाल कर नाक सुरसुराना और पुरुषों का सिगरेट पीना ‘सामूहिक मनोविज्ञान’ का हिस्सा है। वे वास्तव में दुखी नहीं हैं, लेकिन वे ‘दुखी दिखने’ का नाटक करते हैं क्योंकि समाज यही अपेक्षा करता है। यहाँ मनोविज्ञान का वह पक्ष उजागर होता है जहाँ व्यक्ति की अपनी मौलिक भावनाएँ खत्म हो जाती हैं और वह केवल ‘सामाजिक अभिनय’ करता है।

 

4. अकेलापन और रूहों का भटकना

लेखक ने लोगों को ‘भटकती रूहों’ और ‘ईसा की तरह सलीब पर लटके लोगों’ के रूप में चित्रित किया है। यह महानगरीय अकेलेपन (Urban Loneliness) का मनोवैज्ञानिक चित्रण है। लाखों की भीड़ में भी हर व्यक्ति मानसिक रूप से अकेला है। एक-दूसरे के प्रति संवेदनहीनता इसी मानसिक अलगाव का परिणाम है।

5. अवसरवाद और निर्लज्जता (Opportunism)

कहानी के अंत में लेखक का यह सोचना कि वह ‘मौत का बहाना बनाकर दफ्तर से छुट्टी ले ले’, उसके मनोवैज्ञानिक पतन को दिखाता है। एक इंसान की मृत्यु उसके लिए ‘दुख’ के बजाय ‘सुविधा’ बन जाती है। यह मनोविज्ञान के उस निम्न स्तर को दर्शाता है जहाँ व्यक्ति किसी की त्रासदी में भी अपना ‘लाभ’ ढूँढने लगता है।

 

निष्कर्ष –

कहानी का मनोवैज्ञानिक पक्ष यह सिद्ध करता है कि आधुनिक सभ्यता ने मनुष्य के ‘हृदय’ को सुखा दिया है और उसे केवल एक ‘तार्किक मस्तिष्क’ (Logical Brain) में बदल दिया है, जो हर घटना को केवल अपने फायदे और घाटे के तराजू पर तौलता है।

‘दिल्ली में एक मौत’ कड़वे सच और नैतिक मूल्य

कमलेश्वर की कहानी ‘दिल्ली में एक मौत’ हमें जीवन के कुछ कड़वे सच और नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूक करती है। इस कहानी से हमें निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण बातें सीखने को मिलती हैं –

 

1. संवेदनाओं को जीवित रखना (Preserving Empathy)

कहानी की सबसे बड़ी सीख यह है कि आधुनिकता की दौड़ में हमें अपनी मानवीय संवेदनाओं को नहीं खोना चाहिए। किसी की मृत्यु केवल एक सामाजिक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक गहरा भावनात्मक क्षण होता है। हमें मशीनी जीवन से ऊपर उठकर दूसरों के दुख में वास्तव में शामिल होना सीखना चाहिए।

 

2. दिखावे और बनावटीपन से दूरी (Avoiding Artificiality)

लेखक ने श्मशान घाट के माध्यम से दिखाया है कि लोग दुख की घड़ी में भी अपने फैशन, रुतबे और व्यापार की बातें करते हैं। यह हमें सिखाता है कि दिखावा (Show-off) व्यक्ति को भीतर से खोखला बना देता है। हमें परिस्थितियों की गंभीरता का सम्मान करना चाहिए और बनावटीपन से बचना चाहिए।

 

3. ‘भीड़’ में भी आत्मीयता बनाए रखना (Human Connection in Crowds)

महानगरों में लाखों लोग एक साथ रहते हैं, फिर भी वे एक-दूसरे के लिए अजनबी हैं। कहानी हमें यह सीख देती है कि हमें अपने पड़ोसियों और समाज के प्रति जागरूक और आत्मीय होना चाहिए। यदि हम केवल अपनी ही सुख-सुविधाओं (जैसे नाश्ता, पॉलिश, प्रेस) में मगन रहेंगे, तो हम भी ‘भटकती रूहों’ की तरह बनकर रह जाएँगे।

 

4. अवसरवाद का त्याग (Avoiding Opportunism)

कहानी के अंत में लेखक का यह सोचना कि वह ‘मौत का बहाना बनाकर छुट्टी ले ले’, हमारे गिरते हुए चरित्र को दर्शाता है। यह हमें सिखाता है कि हमें दूसरों की त्रासदी या मृत्यु का उपयोग अपने निजी स्वार्थ या लाभ के लिए नहीं करना चाहिए। यह नैतिक रूप से गलत और संवेदनहीन है।

 

5. सामाजिक उत्तरदायित्व का बोध (Sense of Social Responsibility)

यह कहानी हमें हमारे सामाजिक कर्तव्यों की याद दिलाती है। जब हम किसी समाज में रहते हैं, तो एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होना केवल ‘दिखावा’ नहीं, बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी है। कहानी हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछने पर मजबूर करती है कि क्या हम भी उसी संवेदनहीन भीड़ का हिस्सा तो नहीं बन रहे?

 

निष्कर्ष –

संक्षेप में, यह कहानी हमें एक ‘बेहतर मनुष्य’ बनने की प्रेरणा देती है—एक ऐसा मनुष्य जो अपनी सुविधाओं से अधिक दूसरों की भावनाओं को महत्त्व दे और जिसके भीतर की करुणा महानगरीय धुंध में कहीं खो न जाए।

 

 

क्र.सं.

शब्द (Hindi)

हिंदी अर्थ

English Meaning

1

शवयात्रा

अर्थी के साथ जाना

Funeral Procession

2

कोंच रही

चुभ रही (मन में)

Pricking / Gnawing

3

कुहरा

धुंध, कोहरा

Fog / Mist

4

धुँध

धुंधलापन

Haze / Smog

5

नम

गीली

Damp / Moist

6

सनसनाहट

स्टोव या हवा की आवाज़

Whizzing / Hissing

7

बेतहाशा

बहुत तेज़, अनियंत्रित

Recklessly / Frantically

8

पिछवाड़े

घर का पिछला हिस्सा

Backyard / Rear

9

ठिठुरी

ठंड से सिकुड़ी हुई

Shivering / Frozen

10

रूहें

आत्माएँ

Souls / Spirits

11

सलीब

क्रॉस (ईसा मसीह का)

Cross / Crucifix

12

मैगनेट

बड़ा व्यापारी/रसूखदार

Tycoon / Business Magnet

13

दाह-संस्कार

शव जलाना

Cremation

14

दस्तक

दरवाज़ा खटखटाना

Knock

15

खटका

डर या आशंका

Apprehension / Fear

16

बवाल

मुसीबत

Mess / Nuisance

17

निश्चिंत

चिंता मुक्त

Carefree / Relieved

18

भड़भड़ाता

तेज़ी और शोर के साथ

Rushing noisily

19

राहत

चैन, सुकून

Relief

20

बारजे

बालकनी

Balcony / Veranda

21

अकृत्रिम

प्राकृतिक, स्वाभाविक

Natural / Genuine

22

नैतिक

आचरण संबंधी

Moral / Ethical

23

बेहूदा

बेकार, मूर्खतापूर्ण

Absurd / Ridiculous

24

कमीशन

दलाली

Commission

25

हिदायतें

निर्देश

Instructions

26

अदब

सम्मान, सलीका

Respect / Etiquette

27

खनखनाहट

बर्तनों की आवाज़

Clinking / Jingle

28

रेजगारी

खुले पैसे, सिक्के

Change / Small coins

29

मशगूल

व्यस्त

Engrossed / Busy

30

सरसराती

तेज़ी से गुज़रती

Whizzing / Rustling

31

खिलखिलाने

ज़ोर से हँसना

Giggling / Chuckling

32

मैयत

जनाज़ा, अर्थी

Funeral / Dead body

33

मफलर

गले का ऊनी कपड़ा

Muffler / Scarf

34

तसल्ली

दिलासा, शांति

Satisfaction / Comfort

35

इरादा

नीयत

Intention

36

शिफ्ट

काम की पाली

Shift

37

सख्त

कड़ी, भीषण

Harsh / Severe

38

पटरियों

फुटपाथ

Pavements / Sidewalks

39

अर्थी

शव ले जाने का ढांचा

Bier

40

आयरन

इस्त्री, प्रेस

Clothes iron

41

दूतावास

एम्बेसी

Embassy

42

शरीफ

सज्जन

Noble / Decent

43

दुनियादार

व्यवहारिक

Practical / Worldly

44

लगे हाथों

उसी समय, साथ ही

Simultaneously

45

इरविन

अस्पताल का नाम

Name of a hospital

46

आहिस्ता

धीरे

Slowly

47

शेव

हजामत

Shave

48

पोर्टफोलियो

दस्तावेज़ रखने का बस्ता

Portfolio / Briefcase

49

ताजगी

नयापन

Freshness

50

लाइनिंग

अस्तर

Lining (of clothes)

51

रुमाल

हाथ पोंछने का कपड़ा

Handkerchief

52

मशगूल

डूबे हुए

Occupied

53

रेंग रही

धीरे चलना

Crawling

54

सर्र से

तेज़ी से

Swiftly

55

टैक्सी स्टैंड

टैक्सी रुकने की जगह

Taxi stand

56

दास्ताने

दस्ताने

Gloves

57

कोंच रही

कचोट रही

Pricking

58

दाहिने

दाईं ओर

Right side

59

धक्का-सा

झटका

A bit of a shock

60

लिंक रोड

संपर्क मार्ग

Link road

61

मोड़

घुमाव

Turn / Bend

62

श्मशान भूमि

मरघट

Cremation ground

63

कतार

पंक्ति, लाइन

Queue / Row

64

लचक

लचीलापन

Flexibility / Graceful sway

65

ध्वनियाँ

आवाजें

Sounds

66

गरूर

घमंड, गर्व

Arrogance / Pride

67

चबूतरे

ऊँचा मंच

Platform / Pedestal

68

निश्चल

बिना हिले-डुले

Motionless

69

शोफर

ड्राइवर

Chauffeur / Driver

70

गुलदस्ते

फूलों का गुच्छा

Bouquet

71

इंतजार

प्रतीक्षा

Waiting

72

सदमा

गहरा दुःख

Shock / Trauma

73

अगरबत्तियाँ

खुशबूदार छड़ें

Incense sticks

74

सिरहाने

सिर की ओर

Bedside / Head side

75

मातमपुरसी

शोक प्रकट करना

Condolence

76

फाटक

बड़ा दरवाज़ा

Gate

77

तैनात

नियुक्त

Stationed / Deployed

78

स्वीकृति

रज़ामंदी

Acceptance / Approval

79

बाय-बाय

विदा लेना

Goodbye

80

चिता

शव जलाने की लकड़ियाँ

Pyre

81

बहाना

टालमटोल

Excuse / Pretext

82

मौत

मृत्यु

Death

83

पड़ोस

आस-पास

Neighborhood

84

घंटी

बेल

Bell

85

भारी

वज़नदार

Heavy

86

टायर

पहिया

Tire

87

सलीब

सूली

Crucifix

88

बर्फीली

बहुत ठंडी

Icy / Frigid

89

लोकप्रिय

मशहूर

Popular

90

मुसीबत

आफत

Trouble

91

फौरन

तुरंत

Immediately

92

जीने

सीढ़ियाँ

Stairs

93

थमा दिए

पकड़ा दिए

Handed over

94

पहुँचना

अराइवल

Reach / Arrive

95

इलेक्ट्रिक रॉड

पानी गरम करने की छड़

Electric immersion rod

96

अदब

तमीज़

Manner / Etiquette

97

सजा रहा

व्यवस्थित करना

Decorating / Arranging

98

कंडक्टर

बस का टिकट काटने वाला

Bus conductor

99

वर्दी

ड्रेस

Uniform

100

शैतान

दुष्ट

Devil / Demon

101

घुटी-घुटी

दबी हुई

Muffled / Choked

102

हेंगर

कपड़े लटकाने का स्टैंड

Clothes hanger

103

ताजगी

स्फूर्ति

Freshness

104

फिटिंग

नाप

Fitting

105

मशगूल

डूबे हुए

Absorbed

106

इशारा

संकेत

Gesture / Signal

107

सरसराती

तेज़ी से भागना

Rustling

108

फर-कालर

रोएँदार कॉलर

Fur collar

109

खिलखिलाने

हँसने की आवाज़

Giggle

110

दाहिने

राईट

Right

111

कदम

पैर, पग

Step

112

हज़ारों

बहुत अधिक संख्या

Thousands

113

भीड़

जनसमूह

Crowd

114

घूमती

मुड़ना

Turning

115

स्टाइल

ढंग

Style

116

ध्वनियाँ

शोर

Sounds

117

इर्द-गिर्द

चारों तरफ

Around / Surrounding

118

गुलदस्ते

फूलदान

Bouquet

119

नजरों

निगाहों

Eyes / Glances

120

सुरसुराने

सूं-सूं करना

Sniffling

121

निश्चल

स्थिर

Motionless

122

सदमा

आघात

Trauma

123

पासपोर्ट

पारपत्र

Passport

124

फाटक

गेट

Main gate

125

तैनात

ड्यूटी पर

Stationed

126

मातमपुरसी

शोक संवेदना

Expressing grief

127

स्वीकृति

हाँ कहना

Consent / Nod

128

मुस्कराते

हँसना

Smiling

129

साढ़े ग्यारह

समय

11:30

130

चिता

अग्नि

Funeral pyre

131

बैंच

बैठने का आसन

Bench

132

छुट्टी

अवकाश

Leave / Holiday

133

दफ्तर

कार्यालय

Office

134

बहाना

हीला

Pretext

135

शामिल

सम्मिलित

Included / Joined

136

आवाजों

शब्द

Sounds / Voices

137

हिस्से

भाग

Parts

138

बेतहाशा

बिना सोचे समझे

Recklessly

139

ठिठुरी

जमी हुई

Shivering / Frozen

140

भटकती

घूमती हुई

Wandering

‘दिल्ली में एक मौत’ महत्त्वपूर्ण दीर्घ उत्तरीय प्रश्न और उत्तर

 

1. कहानी में ‘कोहरे’ और ‘धुंध’ का क्या महत्त्व है?

उत्तर – कहानी में कोहरा और धुंध केवल मौसम का वर्णन नहीं हैं, बल्कि ये महानगरीय जीवन की धुंधली संवेदनाओं के प्रतीक हैं। कोहरा मानवीय संबंधों के बीच की दूरी और संवेदनहीनता को दर्शाता है। धुंध में लिपटे लोग ‘भटकती रूहों’ की तरह लगते हैं, जिसका अर्थ है कि वे भौतिक रूप से तो साथ हैं, पर भावनात्मक रूप से एक-दूसरे के लिए अजनबी हैं। यह कोहरा व्यक्ति के स्वार्थ को ढकता है और समाज की उस सच्चाई को उजागर करता है जहाँ व्यक्ति को अपने पड़ोसी की मौत भी साफ़ दिखाई नहीं देती।

2. बसों में ‘ईसा की तरह लटके लोग’ के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है?

उत्तर – लेखक ने बसों में भीड़ के कारण हैंडल पकड़कर लटके लोगों की तुलना ‘सलीब पर लटके ईसा’ से की है। यह रूपक आधुनिक मानव की पीड़ा और यांत्रिकता को दर्शाता है। जैसे ईसा ने कष्ट सहा था, वैसे ही दिल्ली का आम आदमी रोज़ाना काम पर जाने के लिए संघर्ष और कष्ट सहता है। उनकी हथेलियों में कीलें नहीं, बल्कि बस की बर्फीली छड़ें हैं। यह बिम्ब दिखाता है कि महानगर में जीवन इतना कठिन और मशीनी हो गया है कि मनुष्य केवल एक जीवित लाश बनकर रह गया है।

3. सेठ दीवानचंद की मृत्यु पर पड़ोसियों की प्रतिक्रिया उनके चरित्र के बारे में क्या बताती है?

उत्तर – पड़ोसियों की प्रतिक्रिया दिखाती है कि वे पूरी तरह आत्म-केन्द्रित और संवेदनहीन हैं। अतुल मवानी के लिए दीवानचंद की मौत से ज़्यादा ज़रूरी अपनी पैंट पर प्रेस करना और बिज़नेस कमीशन है। सरदारजी के लिए नाश्ते का मक्खन और जूतों की पॉलिश प्राथमिकता है। मिस्टर और मिसेज वासवानी के लिए यह अपनी सुंदरता और फैशन दिखाने का एक अवसर मात्र है। इन सभी के लिए मृत्यु एक निजी दुःख नहीं, बल्कि एक सामाजिक बोझ या औपचारिकता है जिसे वे अपनी सुविधा के अनुसार निभाना चाहते हैं।

4. लेखक (कथावाचक) के मन में चल रहे अंतर्द्वंद्व का वर्णन कीजिए।

उत्तर – लेखक के मन में सामाजिक नैतिकता और व्यक्तिगत सुविधा के बीच संघर्ष है। एक ओर उसे लगता है कि पड़ोसी होने के नाते उसे शवयात्रा में जाना चाहिए, वहीं दूसरी ओर कड़कड़ाती सर्दी उसे रोकती है। वह बार-बार दूसरों को देखता है ताकि उनके न जाने को अपना बहाना बना सके। जब वह देखता है कि सभी जा रहे हैं, तो वह ‘दुनियादारी’ निभाने के लिए शामिल हो जाता है। अंत में उसका यह सोचना कि वह इस मौत का बहाना बनाकर दफ्तर से छुट्टी ले ले, उसके नैतिक पतन और अवसरवाद को दर्शाता है।

5. श्मशान घाट पर औरतों के व्यवहार में छिपे बनावटीपन को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – श्मशान घाट पर औरतों का व्यवहार अत्यधिक बनावटी और प्रदर्शनप्रिय है। वे वहाँ शोक मनाने के बजाय अपने फैशन, जुड़ों के स्टाइल और रसूख का प्रदर्शन करने आती हैं। उनके चेहरे पर वही लचक है जो कनॉट प्लेस के बाज़ारों में दिखती है। दुख प्रकट करने के लिए वे जेब से रुमाल निकालती हैं और नाक सुरसुराने का नाटक करती हैं, जिसे लेखक ‘छद्म-शोक’ कहता है। उनके लिए यह दुख की घड़ी नहीं, बल्कि एक सामाजिक ‘गेट-टुगेदर’ है जहाँ वे मुस्कुराते हुए एक-दूसरे को ‘बाय-बाय’ कहती हैं।

6. इस कहानी में ‘यांत्रिकता’ (Mechanical Life) का चित्रण किस प्रकार किया गया है?

उत्तर – कहानी में हर घटना एक निश्चित मशीन की तरह घटती है। वासवानी के नौकर का स्टोव जलाना, अतुल का जूते पॉलिश करना और सात नंबर की बस का अपने समय पर छूटना—यह सब दिखाता है कि दिल्ली में मौत भी इस निर्धारित चक्र को नहीं रोक सकती। मौत की खबर अखबार में छपती है, जो एक उत्पाद की तरह पढ़ी जाती है। लोग अर्थी के पीछे चलते हुए भी अपने काम, व्यापार और सूट की सिलाई की बातें करते हैं। संवेदनाओं का स्थान पूरी तरह यांत्रिक रस्मों ने ले लिया है।

7. अतुल मवानी शवयात्रा के दौरान भी अपने ‘पासपोर्ट फॉर्म’ की चर्चा क्यों करता है?

उत्तर – अतुल मवानी उस युवा पीढ़ी का प्रतीक है जो सफलता और पैसे की दौड़ में अंधी हो चुकी है। उसके लिए दीवानचंद की मौत शोक का विषय नहीं, बल्कि एक ऐसा स्थान है जहाँ बहुत से प्रभावशाली लोग इकट्ठे होंगे। वह श्मशान घाट को नेटवर्किंग का अवसर समझता है और वासवानी को अपना पासपोर्ट फॉर्म दिखाता है। यह व्यवहार दिखाता है कि आधुनिक मनुष्य ने ** tragic (दुखद) अवसरों** को भी व्यावसायिक लाभ के अवसरों में बदल दिया है, जो संवेदनशून्यता की चरम सीमा है।

8. ‘दिल्ली में एक मौत’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – यह शीर्षक अत्यंत व्यंग्यात्मक और सार्थक है। ‘दिल्ली’ यहाँ उस महानगर का प्रतीक है जहाँ लाखों लोग रहते हैं, लेकिन ‘मौत’ यहाँ केवल दीवानचंद की शारीरिक मृत्यु नहीं है, बल्कि दिल्ली के लोगों की संवेदनाओं और मानवता की मौत है। शीर्षक यह संकेत देता है कि एक बड़े शहर में किसी का मरना कितनी साधारण और अर्थहीन घटना बन गई है। पूरी कहानी यह सिद्ध करती है कि दीवानचंद के मरने से दिल्ली की रफ्तार नहीं रुकी, बल्कि लोगों ने अपनी सुविधा के लिए उसका इस्तेमाल किया।

9. क्या यह कहानी केवल दिल्ली की है या हर बड़े शहर की? तर्क दीजिए।

उत्तर – यद्यपि कहानी का शीर्षक दिल्ली पर आधारित है, लेकिन इसकी संवेदना हर आधुनिक महानगर की है। न्यूयॉर्क, लंदन या मुंबई—हर बड़े शहर में व्यक्ति अपनी पहचान खो चुका है। भीड़ में अकेलापन और पड़ोसियों के प्रति उदासीनता हर महानगरीय संस्कृति का हिस्सा बन गई है। जहाँ समय ही पैसा है, वहाँ किसी की मौत के लिए रुकना ‘समय की बर्बादी’ समझा जाता है। यह कहानी वैश्विक स्तर पर बढ़ रही मानवीय दूरियों और मशीनी सभ्यता का यथार्थवादी चित्रण प्रस्तुत करती है।

10. कहानी के अंत में लेखक की सोच समाज के बारे में क्या संदेश देती है?

उत्तर – कहानी के अंत में लेखक का दफ्तर जाने के बजाय ‘मौत का बहाना बनाकर छुट्टी’ लेने की बात सोचना समाज के चरित्रहीन और अवसरवादी स्वरूप को उजागर करता है। यह संदेश देता है कि अब मनुष्य के पास दूसरों के लिए सच्ची सहानुभूति नहीं बची है। वह किसी की मृत्यु जैसी दुखद घटना में भी अपना स्वार्थ और आराम ढूँढता है। समाज अब केवल ‘दिखावे’ पर टिका है, जहाँ भीतर से हर व्यक्ति केवल अपने ‘फायदे’ के तराजू पर हर रिश्ते को तौलता है।

 

 

‘दिल्ली में एक मौत’ के महत्त्वपूर्ण अंशों की सप्रसंग व्याख्या

 

1. महानगरीय जीवन की यांत्रिकता

“सड़कें ठिठुरी हुई हैं और कोहरे के बादलों को चीरती हुई कारें और बसें हॉर्न बजाती हुई भाग रही हैं। सड़कों और पटरियों पर भीड़ है, पर कुहरे में लिपटा हुआ हर आदमी भटकती हुई रूह की तरह लग रहा है।”

  • प्रसंग – लेखक दिल्ली की एक सर्द सुबह का वर्णन कर रहा है जहाँ जीवन की गति तो तेज़ है, पर आत्मीयता गायब है।
  • व्याख्या – लेखक कहता है कि दिल्ली की सड़कों पर भारी भीड़ है, लेकिन कोहरे के कारण लोग स्पष्ट दिखाई नहीं देते। यह ‘कोहरा’ वास्तव में लोगों के बीच की भावनात्मक दूरी है। लोग मशीनों की तरह भाग रहे हैं। उन्हें ‘भटकती रूह’ कहना यह दर्शाता है कि उनका शरीर तो सक्रिय है, लेकिन उनकी आत्मा (संवेदना) मर चुकी है। वे एक-दूसरे से पूरी तरह अनजान और कटे हुए हैं।

 

2. आधुनिक मानव की पीड़ा (ईसा का रूपक)

“बसों में भीड़ है। लोग ठंडी सीटों पर सिकुड़े हुए बैठे हैं और कुछ लोग बीच में ही ईसा की तरह सलीब पर लटके हुए हैं बाँहें पसारे, उनकी हथेलियों में कीलें नहीं, बस की बर्फीली, चमकदार छड़ें हैं।”

  • प्रसंग – लेखक बस में यात्रा करने वाले आम आदमी के दैनिक संघर्ष का चित्रण कर रहा है।
  • व्याख्या – यहाँ लेखक ने एक बहुत ही गहरा रूपक (Metaphor) इस्तेमाल किया है। बस के हैंडल पकड़कर लटके हुए लोग ‘ईसा मसीह’ की तरह लगते हैं। जैसे ईसा ने मानवता के लिए कष्ट सहा था, वैसे ही यहाँ का आम आदमी रोज़गार के लिए रोज़ाना यह ‘यातना’ सहता है। यह उनके जीवन की त्रासदी और लाचारी को दर्शाता है कि महानगर में जीवित रहना भी एक निरंतर संघर्ष है।

 

3. अवसरवाद और व्यावसायिकता

“अतुल मवानी के चेहरे पर सफेदी झलक रही है, वह शेव कर चुका है… ‘भई, शुरू-शुरू में जब मैं यहाँ आया था तो दीवानचंदजी ने बड़ी मदद की थी मेरी। उन्हीं की वजह से कुछ काम-धाम मिल गया था।'”

  • प्रसंग – अतुल मवानी लेखक को प्रेस (इस्त्री) लौटाने आता है और दीवानचंद की मौत पर औपचारिक चर्चा करता है।
  • व्याख्या – अतुल यह स्वीकार करता है कि दीवानचंद ने उसके करियर में बहुत मदद की थी, लेकिन उसके व्यवहार में कोई शोक नहीं है। वह अपनी दिनचर्या (शेव करना, प्रेस करना) को मौत से ऊपर रखता है। यह अंश दिखाता है कि आधुनिक युग में ‘कृतज्ञता’ जैसी भावनाएँ भी औपचारिकता बनकर रह गई हैं। व्यक्ति के लिए अपना काम और स्वार्थ सर्वोपरि है।

 

4. श्मशान में प्रदर्शनप्रियता

“औरतों की भीड़ एक तरफ खड़ी है। उनकी बातों की ऊँची ध्वनियाँ सुनाई पड़ रही हैं। उनके खड़े होने में वही लचक है जो कनॉट प्लेस में दिखाई पड़ती है। मर्दों की भीड़ से सिगरेट का धुआँ उठ-उठकर कुहरे में घुला जा रहा है।”

  • प्रसंग – लेखक श्मशान घाट पर पहुँची भीड़ और उनके व्यवहार का वर्णन कर रहा है।
  • व्याख्या – यह अंश समाज के खोखलेपन पर करारा व्यंग्य है। श्मशान जैसी जगह पर भी लोग अपने ‘रसूख’ और ‘स्टाइल’ का प्रदर्शन कर रहे हैं। औरतों के खड़े होने का ढंग और पुरुषों का बेफिक्री से सिगरेट पीना यह बताता है कि वे वहाँ शोक मनाने नहीं, बल्कि एक सामाजिक रस्म निभाने आए हैं। उनके लिए यह स्थान भी कनॉट प्लेस जैसे किसी सार्वजनिक स्थल से अलग नहीं है।

 

5. बनावटी शोक (छद्म-संवेदना)

“एक महिला माला रखकर कोट की जेब से रुमाल निकालती है और आँखों पर रखकर नाक सुरसुराने लगती है और पीछे हट जाती है। और अब सभी औरतों ने रुमाल निकाल लिए हैं और उनकी नाकों से आवाजें आ रही हैं।”

  • प्रसंग – शव पर फूल चढाने के बाद महिलाओं द्वारा शोक प्रकट करने का दृश्य।
  • व्याख्या – लेखक यहाँ ‘भेड़चाल’ और ‘बनावटीपन’ को उजागर करता है। एक औरत को रोते (या नाटक करते) देख बाकी सब भी वैसा ही करने लगती हैं। यह कोई वास्तविक दुख नहीं है, बल्कि एक ‘सामूहिक अभिनय’ है। रुमाल और नाक की आवाज़ें यह सिद्ध करती हैं कि संवेदनाएँ अब केवल बाहरी आचरण तक सीमित रह गई हैं, हृदय तक नहीं पहुँचतीं।

 

6. नैतिक पतन की पराकाष्ठा

“मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि घर जाकर तैयार होकर दफ्तर जाऊँ या अब एक मौत का बहाना बनाकर आज की छुट्टी ले लूँ आखिर मौत तो हुई ही है और मैं शवयात्रा में शामिल भी हुआ हूँ।”

  • प्रसंग – कहानी का अंतिम वाक्य, जहाँ लेखक श्मशान से लौटते हुए अपने लाभ के बारे में सोचता है।
  • व्याख्या – यह कहानी का सबसे प्रभावशाली और दुखद अंश है। यहाँ लेखक स्वयं को भी उसी संवेदनहीन समाज का हिस्सा स्वीकार करता है। किसी की मृत्यु उसके लिए दुःख का कारण नहीं, बल्कि ऑफिस से छुट्टी लेने का एक ‘बहाना’ (Excuse) बन जाती है। यह आधुनिक मनुष्य की उस मानसिकता को दिखाता है जहाँ वह दूसरों की मृत्यु में भी अपना ‘आराम’ और ‘फायदा’ तलाशने लगता है।

 

निष्कर्ष – ये छह अंश पूरी कहानी के सार को समेटे हुए हैं, जो हमें दिखाते हैं कि कैसे दिल्ली की धुंध में इंसानियत पूरी तरह गुम हो चुकी है।

 

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