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बीसवीं सदी की प्रमुख एवं प्रथम महिला लेखिका राजेन्द्र बाला घोष ‘बंग महिला’ का हिंदी कहानी में प्रमुख योगदान है। इनकी रचनाएँ कहानी, निबन्ध, उपालम्भ, आलोचना आदि विविध विषयों पर है। बंगला की प्रमुख रचनाओं का अनुवाद भी इन्होंने किया है। नारी शिक्षा और चरित्र निर्माण जैसे- सामाजिक विषय पर लेखनी चलाकर हिंदी जगत को श्री सम्पन्न कर दिया है। सन् 1904 ई. से सन् 1917 ई. तक हिंदी की प्रमुख पत्रिकाओं में कभी एक प्रवासिनी बंग महिला तथा कभी बंग महिला के नाम से इनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहीं।
बंग महिला का जन्म भारतेन्दु काल के सन् 1882 ई. में वाराणसी के कोदई चौकी मुहल्ले के भवन संख्या डी॰ 49/142 में हुआ था। इनके पिता का नाम बाबू रामप्रसन्न घोष था, जो मिर्जापुर के प्रतिष्ठित नागरिक एवं जार्डन कम्पनी में उच्च पदाधिकारी के रूप में कार्यरत थे। बाबू रामप्रसन्न घोष के अनन्य मित्रों में चौधरी बदरी नारायण उपाध्याय ‘प्रेमघन’ थे। रामप्रसन्न घोष की जमींदारी खडरा, हनुमानपुर आदि मिर्ज़ापुर के कई गाँवों में थी। इनके पूर्वज बंगाल के चंदननगर जिले के खोलसिनी गाँव के निवासी थे, जो सन् 1858 ई. में बनारस आए। बंग महिला की माता का नाम नीरदवासिनी घोष था। वे कलकत्ते की रहने वाली विदुषी महिला थी।
तत्कालीन सामाजिक परिस्थिति के कारण स्त्रियाँ परदे की ओट वाली ही बनी रहती थी। राजेन्द्र बाला घोष के घर गाड़ी थी किन्तु घर से बाहर मंदिर दर्शनार्थ भी परदे की ओट में जाना पड़ता था। औरतों के घर में पुरुषों का प्रवेश वर्जित था। ऐसी परिस्थिति में घर में रहकर स्वाध्याय के अतिरिक्त अन्य कोई रास्ता भी नहीं था, लेकिन बंग महिला की माता नीरदवासिनी घोष ने अपने संरक्षण में राजेन्द्र बाला घोष को शिक्षा दीक्षा दी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल, केदारनाथ पाठक आदि ने परदे में रहने वाली राजेन्द्र बाला घोष के कृतित्व को सन् 1904 से 1917 ई. तक हिंदी के विशिष्ट पत्रिकाओं में प्रकाशन हेतु अग्रसर करते रहे। आपने रामचन्द्र शुक्ल की प्रेरणा से हिंदी में लिखना शुरू किया। आप हिंदी में ‘बंग महिला’ और बंगला में ‘प्रवासिनी’ नाम से कहानियाँ लिखती थीं। आपने हिंदी और बंगला दोनों में मौलिक कहानियों की रचना की है। ‘कुसुम-संग्रह’ आपकी कहानियों का संग्रह है, जो संवत् 1969 विक्रमी में प्रकाशित हुआ।
बंग महिला की रचनाओं का प्रकाशन मुख्य रूप से समालोचक, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, सरस्वती, आनंद कादम्बिनी, भारतेन्दु, बालप्रभा, श्री, लक्ष्मी, स्वदेश बांधव, मित्र, वनिता विनोद आदि पत्रिकाओं में मिलता है। यद्यपि पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा सम्पादित और जैन वैद्य द्वारा
जयपुर से प्रकाशित समालोचक में सन् 1904 ई. के भाग- 2, संख्या 20-21 में ‘हिंदी के ग्रंथकार’ शीर्षक से बंग महिला का नाम हिंदी जगत में सर्वप्रथम आया।
बंग महिला की रचनाएँ और उनका प्रकाशन काल क्रमश – इस प्रकार है-
- हिंदी के ग्रंथकार – (मूल निबंध) समालोचक, सन् 1904, भाग 2, संख्या 20-21 पृष्ठ- 257–64
- अंडमन द्वीप के निवासी – ( अनूदित निबंध) श्री रामानंद चट्टोपाध्याय के ‘प्रवासी’ में प्रकाशित लेख का अनुवाद | सरस्वती, सन् 1904, भाग 5, संख्या 3 पृष्ठ-91-96
- नीलगिरि पर्वत के निवासी टोड़ा लोग- ‘प्रवासी’ में प्रकाशित लेख का अनुवाद। सरस्वती, सन् 1904, भाग 5, संख्या 4 पृष्ठ- 137 –139
- चंद्रदेव से मेरी बातें – ( उपालंभात्मक, ललित निबंध) सरस्वती, सन् 1904 भाग 5, संख्या 12 – पृष्ठ-440-443
- जोधाबाई – (मूल निबंध) सरस्वती, सन् 1905 भाग 6, संख्या 9, पृष्ठ-331-335
- पति सेवा – ( श्रीमती लावण्यप्रभा सरकार के प्रबंध का भावानुवाद) भारतेन्दु पत्रिका, अप्रैल सन् 1906, खंड 1, संख्या 9, पृष्ठ- 132 – 134
- गृह – ( नारी शिक्षा संबंधी प्रबंध-बंगला से भावानुवाद) मूल लेखक – श्रीयुत् अविनाश चंद्र दास, एम. ए., बी. एड.।
- गृहचर्या – (मूल निबंध) गृहशास्त्र से संबंधित – वनिता विनोद सन् 1906 ई. में प्रकाशित।
- स्त्रियों की शिक्षा – (निबंध) वनिता विनोद सन् 1906 ई. में संकलित
- संगीत और सुई का काम – (स्त्री शिक्षा संबंधी लेख ) वनिता – विनोद में संकलित। पुनः कन्या मनोरंजन में सन् 1995 ई. भाग 2 अंक 1 में प्रकाशित। पृष्ठ 10-12 जनवरी सन् 1915 ई. में संशोधित स्वरूप का पुनः प्रकाशन।
- कुंभ में छोटी बहू – (अनूदित कहानी) मूल लेखिका – नीरदवासिनी घोष, लेखिका की माता। सरस्वती सन् 1906, भाग 7, संख्या 9, पृष्ठ 342-48
- ज्ञातव्य बातें – (टिप्पणियाँ) जनवरी, फरवरी 1907, बाल प्रभाकर, भाग 1 व 2
- दुलाईवाली – (मौलिक कहानी) सरस्वती, सन् 1907 भाग 8, संख्या 5, पृष्ठ- 178-183
- मुरला – ( बंगला औपन्यासिक कृति का अनुवाद ) — मूल लेखक श्रीयुत् नारायणदास सेन हैं। यह कृति सरस्वती के तीन अंकों में क्रमशः प्रकाशित हुई। बंगला में मूल रूप से यह कृति ‘जन्मभूमि’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। सरस्वती, सन् 1908 ई., भाग 9, संख्या 1, पृष्ठ 19 – 21, संख्या 2, पृष्ठ-59-62 संख्या 3, पृष्ठ- 105 – 1101
- भाई-बहन – (कहानी) बाल प्रभाकर, सन् 1908 खंड 3, अंक 1
कन्या मनोरंजन में (पाठ भेद के साथ पुनः प्रकाशित।) सन् 1915 ई., भाग 2 अंक 9, पृष्ठ 251-54
- हमारे देश की स्त्रियों की दशा – (निबंध) श्री सत्यदेव परिब्राजक के ‘अमेरिका की स्त्रियाँ’ शीर्षक निबंध से प्रभावित | सरस्वती, सन् 1908 भाग 9, संख्या 3
- दालिया – ( अनूदित कहानी) कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बंगला कहानी का अनुवाद। सरस्वती, सन् 1909 भाग 10, संख्या 6, पृष्ठ- 256 – 260
- संसार सुख – ( अनूदित कहानी ) – कुसुम – संग्रह। सन् 1910 के पूर्व प्रकाशित।
- नारीरत्न भगवती देवी – ( अनूदित निबंध) श्रीयुत् बैकुंठनाथ दास द्वारा लिखित बंगला भाषा की पुस्तक नारीरत्न माला से अनूदित। लक्ष्मी पत्रिका, फरवरी 1910 भाग 7, अंक 8, पृष्ठ- 246 – 252 कन्या मनोरंजन में सन् 1914, भाग 1, अंक 11, पृष्ठ – 322-26
20- रामायण की समालोचना- बंकिम बाबू द्वारा मूलतः लिखित प्रहसन के अंश का अनुवाद। लक्ष्मी, जुलाई 1910, भाग 8, संख्या 1, पृष्ठ-22-25
- तिल से ताड़ – (अनूदित औपन्यासिक आख्यायिका) मूल लेखक देवेन्द्र कुमार राय, लगभग सन् 1906 से पूर्व पुस्तकाकार प्रकाशित। कुसुम – संग्रह में संकलित।
- मातृहीना – (अनूदित कहानी) मूल लेखक श्रीयुत् देवेन्द्र कुमार सेन। कुसुम-संग्रह में संकलित।
- अपूर्व प्रतिज्ञापालन – (अनूदित कहानी) मूल लेखक – सखा ओ साथी। कुसुम-संग्रह में संकलित
- दान प्रतिदान- (बंगला से अनूदित आख्यान) मूल लेखक- रवीन्द्रनाथ ठाकुर। कुसुम-संग्रह में संकलित।
- श्रीयुत् रामेंद्रसुंदर त्रिवेदी एम.ए.- (निबंध) नागरी प्रचारिणी पत्रिका, जनवरी, फरवरी, सन् 1914, भाग 18, अंक 7-8, पृष्ठ- 219 – 222।
- हृदय परीक्षा – (कहानी) सरस्वती, सन् 1915, भाग 16, संख्या 2। पृष्ठ- 104 – 110
- मन की दृढ़ता – ( अनूदित कहानी) मूल रूप से बंगला पत्रिका ‘यमुना’ में प्रकाशित सरस्वती, सन् 1915, भाग 16, संख्या 5, पृष्ठ– 275 – 279
- अब्बुल फजल – (अनूदित निबंध) मूल लेखक श्रीयुत् जलधर सेन, ‘आइन-ए-अकबरी’ के आधार पर बंगला में प्रकाशित लेख का आशय। नागरी प्रचारिणी पत्रिका, मई-जून सन् 1915, भाग 19, संख्या 11-12, पृष्ठ – 358-362। नागरी प्रचारिणी पत्रिका जुलाई सन् 1915 भाग 20, संख्या 1 पृष्ठ-17-23।
- कविताएँ – बंग महिला की बंगला कविताएँ रवीन्द्र बाबू के अवसान पर लिखी गई हैं और इनके अंतिम दिनों की रचनाएँ हैं, जो लघु पुस्तिका के रूप में इंडियन प्रेस से प्रकाशित हुई। इसमें पूजा, उपेक्षा, भूले जाओ, फूल, अतिथि, उत्तर, उपदेश, स्मृति, धन्यवाद, कवि उद्देशे शीर्षक कविताओं का हिंदी लिप्यंतरण हैं।
(1)
काशी जी के दशाश्वमेध घाट पर स्नान करके एक मनुष्य बड़ी व्यग्रता के साथ गोदौलिया की तरफ़ आ रहा था। एक हाथ में मैली-सी तौलिया से लपेटी हुई भीगी धोती और दूसरे में सुरती की गोलियों की कई डिबियाँ और सुँघनी की एक पुड़िया थी। उस समय दिन के ग्यारह बजे थे। गोदौलिया की बाईं तरफ़ जो गली है, उसके भीतर एक और गली में थोड़ी दूर पर, एक टूटे मकान से पुराने मकान में वह जा घुसा। मकान के पहले खंड में बहुत अँधेरा था, पर ऊपर की जगह मनुष्य के वासोपयोगी थी। नवागत मनुष्य धड़धड़ाता हुआ ऊपर चढ़ गया। वहाँ एक कोठरी में हाथ की चीजें रख दीं और ‘सीता! सीता’ कहकर पुकारने लगा।
“क्या है?” कहती हुई एक दस बरस की बालिका आ खड़ी हुई। तब उस पुरुष ने कहा, “सीता! ज़रा अपनी बहन को बुला ला।”
“अच्छा,” कहकर सीता चली गई और कुछ देर में एक नवीना स्त्री आकर उपस्थित हुई। उसे देखते ही पुरुष ने कहा, “लो, हम लोगों को तो आज ही जाना होगा।”
इस बात को सुनकर स्त्री कुछ आश्चर्ययुक्त होकर और झुँझलाकर बोली, “आज ही जाना होगा! यह क्यों? भला आज कैसे जाना हो सकेगा? ऐसा ही था तो सबेरे भैया से कह देते। तुम तो जानते हो कि मुँह से कह दिया; बस छुट्टी हुई। लड़की कभी विदा की होती तो मालूम पड़ता। आज तो किसी सूरत में जाना नहीं हो सकता।”
“तुम आज कहती हो! हमें तो अभी जाना है। बात यह है कि आज ही नवलकिशोर कलकत्ते से आ रहे हैं। आरे से अपनी नई बहू को भी साथ ला रहे हैं। सो उन्होंने हमें आज ही जाने के लिए इसरार किया है। हम सब लोग मुग़लसराय से साथ ही इलाहाबाद चलेंगे। उनका तार मुझे घर से निकलते ही मिला। इसी से मैं झट नहा-धोकर लौट आया। बस अब करना ही क्या है? कपड़ा-वपड़ा जो कुछ हो बाँध-बूँधकर, घंटे-भर में खा-पीकर, चली चलो। जब हम तुम्हें विदा कराने आए ही हैं, तब कल के बदले आज ही सही।”
“हाँ यह बात है! नवल जो चाहे करावें। क्या एक ही गाड़ी में न जाने से दोस्ती में बट्टा लग जाएगा? अब तो किसी तरह रुकोगे नहीं, ज़रूर ही उनके साथ जाओगे। पर मेरे तो नाकों दम आ जाएगी!”
“क्यों किस बात से?”
“उनकी हँसी से और किससे! हँसी-ठट्ठा राह में अच्छी लगती है? उनकी हँसी मुझे नहीं भाती। एक रोज़ मैं चौके में बैठी पूड़ियाँ काढ़ रही थी, कि इतने में न जाने कहाँ से आकर नवल चिल्लाने लगे— ए बुआ! ए बुआ! देखा तुम्हारी बहू पूड़ियाँ खा रही है— मैं तो मारे शरम के मर-सी गई। हाँ, भाभी जी ने बात उड़ा दी सही। वह बोलीं, खाने दो, खाने-पहनने के लिए तो आई ही है। पर मुझे उनकी हँसी बहुत बुरी लगी।”
“बस इसी से उनके साथ नहीं जाना चाहतीं? अच्छा चलो, मैं नवल से कह दूँगा कि बेचारी कभी रोटी तक तो खाती ही नहीं, पूड़ी क्यों खाने लगी।” इतना कहकर वंशीधर कोठरी के बाहर चले आए और बोले, “मैं तुम्हारे भैया के पास जाता हूँ। तुम रो-रुलाकर तैयार हो जाना।”
इतना सुनते ही जानकीदेई की आँखें भर आईं और असाढ़-सावन की ऐसी झड़ी लग गई।
(2)
वंशीधर इलाहाबाद के रहने वाले हैं। बनारस में ससुराल है। स्त्री को विदा कराने आए हैं। ससुराल में एक साले, साली और सास के सिवाय और कोई नहीं है। नवलकिशोर इनके दूर के नाते में ममेरे भाई हैं। पर दोनों में नाते से मित्रता का ख़याल अधिक है। दोनों में गहरी मित्रता है। दोनों एक जान, दो क़ालिब हैं।
उसी दिन वंशीधर का जाना स्थिर हो गया। सीता, बहन के संग जाने के लिए रोने लगी। माँ रोती-धोती लड़की को विदा की सामग्री इकट्ठी करने लगी। जानकीदेई भी रोती-ही-रोती तैयार होने लगी। कोई चीज़ भूलने पर धीमी आवाज़ से माँ को याद भी दिलाती गई। एक बजने पर स्टेशन जाने का समय आया। अब गाड़ी या इक्का लाने कौन जाए? ससुराल वालों की अवस्था अब आगे की-सी नहीं थी कि दो-दो, चार-चार नौकर-चाकर हर समय बने रहें। सीता के बाप के न रहने से काम बिगड़ गया है। पैसे वाले के यहाँ नौकर-चाकरों के सिवा और भी दो-चार ख़ुशामदी घेरे रहते हैं। छूछे को कौन पूछे? एक कहारिन है; सो भी इस समय कहीं गई है। सालेराम की तबीयत अच्छी नहीं। वह हर घड़ी बिछौने से बातें करते हैं। तिस पर भी आप कहने लगे, “मैं ही धीरे-धीरे जाकर कोई सवारी ले आता हूँ। नज़दीक तो है।”
वंशीधर बोले, “नहीं, नहीं, तुम क्यों तकलीफ़ करोगे? मैं ही जाता हूँ।”
जाते-जाते वंशीधर विचारने लगे कि इक्के की सवारी तो भले घर की स्त्रियों के बैठने लायक़ नहीं होती, क्योंकि एक तो उतने ऊँचे पर चढ़ना पड़ता है। दूसरे, पराए पुरुष के संग एक साथ बैठना पड़ता है। मैं एक पालकी गाड़ी ही कर लूँ। उसमें सब तरह का आराम रहता है। पर जब गाड़ीवालों ने डेढ़ रुपया किराया माँगा, तब वंशीधर ने मन में कहा— चलो इक्का ही सही। पहुँचने से काम। कुछ नवलकिशोर तो यहाँ साथ हैं नहीं। इलाहाबाद में देखा जाएगा।
वंशीधर इक्का ले आए और जो कुछ असबाब था, इक्के पर रखकर आप भी बैठ गए। जानकीदेई बड़ी विकलता से रोती हुई इक्के पर जा बैठी। पर इस अस्थिर संसार में स्थिरता कहाँ? यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं। इक्का जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया, वैसे-ही-वैसे जानकी की रुलाई भी कम होती गई। सिकरौल के स्टेशन के पास पहुँचते-पहुँचते जानकी अपनी आँखें अच्छी तरह पोंछ चुकी थी।
दोनों चुपचाप चले जा रहे थे कि अचानक वंशीधर की नज़र अपनी धोती पर पड़ी; और “अरे एक बात तो हम भूल ही गए” कहकर पछता-सा उठे। इक्केवाले के कान बचाकर जानकी ने पूछा, “क्या हुआ? क्या कोई ज़रूरी चीज़ भूल आए?”
“नहीं, एक देशी धोती पहनकर आना था, सो भूलकर विलायती ही पहिन आए। नवल कट्टर स्वदेशी हुए हैं न? वह बंगालियों से भी बढ़ गए हैं। देखेंगे दो-चार सुनाए बिना न रहेंगे। और, बात भी ठीक है। नाहक विलायती चीज़ें मोल लेकर क्यों रुपए की बरबादी की जाए? देशी लेने से भी दाम लगेगा सही; रहेगा तो देश ही में।”
जानकी ज़रा भौहें टेढ़ी करके बोली, “ऊँह, धोती तो धोती, पहिनने से काम। क्या यह बुरी है?”
इतने में स्टेशन के कुलियों ने आ घेरा। वंशीधर एक कुली करके चले। इतने में इक्केवाले ने कहा, “इधर से टिकट लेते जाइए। पुल के उस पार तो ड्योढ़े दरजे का टिकट मिलता है।”
वंशीधर फिरकर बोले, “अगर ड्योढ़े दरजे ही का टिकट लूँ तो?”
इक्केवाला चुप हो गया। “इक्के की सवारी देखकर इसने ऐसा कहा”—यह कहते हुए वंशीधर आगे बढ़े। यथासमय रेल पर बैठकर वंशीधर राजघाट पार करके मुग़लसराय पहुँचे। वहाँ पर पुल लाँघकर दूसरे प्लेटफ़ॉर्म पर जा बैठे। आप नवल से मिलने की ख़ुशी में प्लेटफ़ॉर्म की इस छोर से उस छोर तक टहलते रहे। देखते-देखते गाड़ी का धुआँ दिखलाई पड़ा।
मुसाफ़िर अपनी गठरी सँभालने लगे। रेल-देवी भी अपनी चाल धीमी करती हुई गंभीरता से आ खड़ी हुई। वंशीधर एक बार चलती गाड़ी ही में शुरू से आख़िर तक देख गए, पर नवल का कहीं पता नहीं। वंशीधर फिर सब गाड़ियों को दोहरा गए, तेहरा गए; भीतर घुस-घुसकर एक-एक डिब्बे को देखा, किंतु नवल न मिले। अंत को आप खिजला उठे और सोचने लगे कि मुझे तो वैसी चिट्ठी लिखी और आप न आया। मुझे अच्छा उल्लू बनाया, अच्छा जाएँगे कहाँ? भेंट होने पर समझ लूँगा। सबसे अधिक सोच तो इस बात का था कि जानकी सुनेगी तो ताने पर ताना मारेगी। पर अब सोचने का समय नहीं। रेल की बात ठहरी। वंशीधर झट गए और जानकी को लाकर जनानी गाड़ी में बिठाया। वह पूछने लगी, “नवल की बहू कहाँ है?”
“वह नहीं आए, कोई अटकाव हो गया।” कहकर आप बग़ल वाले कमरे में जा बैठे। टिकट तो ड्योढ़े का था, पर ड्योढ़े दरजे का कमरा कलकत्ते से आने वाले मुसाफ़िरों से भरा था। इसलिए तीसरे ही दरजे में बैठना पड़ा। जिस गाड़ी में वंशीधर बैठे थे, उसके सब कमरों में मिलाकर कुल दस ही बारह स्त्री-पुरुष थे। समय पर गाड़ी छूटी। नवल की बातें और न जाने क्या अगड़-बगड़ सोचते-सोचते गाड़ी कई स्टेशन पार करके मिर्ज़ापुर पहुँची।
(3)
मिर्ज़ापुर में पेटराम की शिकायत शुरू हुई। उसने सुझाया कि इलाहाबाद पहुँचने में अभी देरी है। चलने के झंझट में अच्छी तरह उसकी पूजा किए बिना ही वंशीधर ने बनारस छोड़ा था। इसलिए आप झट प्लेटफ़ॉर्म पर उतरे; और पानी के बंबे से हाथ-मुँह धोकर, एक खोमचेवाले से थोड़ी-सी ताज़ी पूड़ियाँ और मिठाई लेकर, निराले में बैठ आपने उन्हें ठिकाने पहुँचाया। पीछे से जानकी की सुध आई। सोचा कि पहले पूछ लें, तब कुछ मोल लेंगे, क्योंकि स्त्रियाँ नटखट होती हैं। वह रेल पर खाना नहीं पसंद करतीं। पूछने पर वही बात हुई। तब वंशीधर लौटकर अपने कमरे में आ बैठे। यदि वह चाहते तो वे इस समय ड्योढ़े में बैठ जाते, क्योंकि अब भीड़ कम हो गई थी। पर उन्होंने कहा, थोड़ी देर के लिए कौन बखेड़ा करे।
वंशीधर अपने कमरे में बैठा तो दो-एक मुसाफ़िर अधिक दीख पड़े। आगे वाले में से एक उतर भी गया था। जो लोग थे सब तीसरे ही दरजे के योग्य ही जान पड़ते थे, अधिक सभ्य कोई थे तो वंशीधर ही थे। उनके कमरे में पास वाली जगह में एक भले घर की स्त्री बैठी थी। वह बेचारी सिर से पैर तक ओढ़े, सिर झुकाए, एक हाथ लंबा घूँघट काढ़े, कपड़े की गठरी-सी बनी बैठी थी। वंशीधर ने सोचा इनके संग वाले भद्र पुरुष के आने पर उनके साथ बातचीत करके समय बिताएँगे। एक-दो करके तीसरी घंटी बजी। तब वह स्त्री कुछ अचकचाकर, थोड़ा-सा मुँह खोल जंगले के बाहर देखने लगी। ज्यों ही गाड़ी छूटी, वह मानो काँप-सी उठी। रेल का देना-लेना तो हो ही गया था। अब उसको किसी की क्या परवाह, अपनी स्वाभाविक गति से चलने लगी। प्लेटफ़ॉर्म पर भीड़ भी न थी। केवल दो-चार आदमी रेल की अंतिम विदाई तक खड़े थे। जब तक स्टेशन दिखलाई दिया तब तक वह बाहर ही देखती रही। फिर अस्पष्ट स्वर से रोने लगी। उस कमरे में तीन-चार प्रौढ़ा ग्रामीण स्त्रियाँ भी थीं। एक, जो उनके पास ही थी, कहने लगी, “अरे इनकर मनई तो नाहीं आईलेन। हो देख हो रोवल करथईन।”
दूसरी, “अरे दुसर गाड़ी में बैठा होंइहैं।”
पहली, “दुर वौरही! ई जनानी गाड़ी थोड़े है।”
दूसरी, “तऊ हो भलू तो कहू।” कहकर दूसरी भद्र महिला से पूछने लगी, कौने गाँव उतरबू बेटा! मीरजैपूरा चढ़ी हऊ न?” इसके जवाब में उसने जो कहा, वह सुन न सकी। तब पहली बोली, “हट हम पुंछिला न, हम कहा काहाँ उतरबू हो? आँय ईलाहाबास?”
दूसरी, “ईलाहाबास कौन गाँव ही गोइंयाँ?”
पहली, “अरे नाही जनलँ? पैयाग जी, जाहाँ मनइ मकर नाहाए जाला।”
दूसरी, “भला पैयाग जी काहे न जानीथ; ले, कहैके नाहीं, तोहरे पंच के धरम से चार दाँई नहाए चुकी हंइ। ऐसों हो सोमवारी, अउर गहन, दका, दका, लाग रहा तउन तोहरे काशी जी नाहाय गई रहे।”
पहली, “आवै जाए के तो सब अऊते जात बटले बाटेन। फुन यह साइत तो विचारो विपत में न पड़ल बाटिन। हे हम पंचा हइ, राजघाट टिकस कटऊली, मोंगल के सरायं उतरलीह, होदे पुनः चढ़लीह।”
दूसरी, “ऐसे एक दाँइ हम आवत रहे। एक मिली औरो मोरे संघे रहीं। द कौने टिसनीया पर उकर मलिकवा उतरे से कि जुरतंइहै गड़िया खुली। अब भईया उः गरा फाड़-फाड़ नरियाय-ए साहब गड़िया खड़ी कर। ए साहेब गड़िया तंनी खड़ी कर। भला गड़िया दहिनाती काहै के खड़ी होय?”
पहली, “उ मेहररुवा बड़ी उजबक रहल। भला केहू के चिल्लाए से रेलीऔ कहूँ खड़ी होला?”
इसकी इस बात पर कुल कमरे वाले हँस पड़े। अब जितने पुरुष-स्त्रियाँ थीं, एक-से-एक अनोखी बातें कहकर अपने-अपने तजुर्बा बयान करने लगीं। बीच-बीच में उस अकेली अबला की स्थिति पर भी दुःख प्रकट करती जाती थीं।
तीसरी स्त्री बोली, “टीक्कसिया पल्ले बाय द नाही। हे सहेबवा सुनि तो कलकत्ते ताँइ ले मसुलिया लेइ। अरे इंहो तो नाही कि दूर से आवत रहलेन, फरागत के बदे उतरलेन।”
चौथी, “हम तो इनके संगे के आदमी के देखबो ना किहा गोइयाँ।”
तीसरी, “हम देखे रहली हो, मजेक टोपी दिहले रहलेन को!”
इस तरह उनकी बेसिर-पैर की बातें सुनते-सुनते वंशीधर ऊब उठे। तब वह उन स्त्रियों से कहने लगे, “तुम तो नाहक उन्हें और भी डरा रही हो। ज़रूर इलाहाबाद तार गया होगा और दूसरी गाड़ी से वे भी वहाँ पहुँच जाएँगे। मैं भी इलाहाबाद ही जा रहा हूँ। मेरे संग भी स्त्रियाँ हैं। जो ऐसा ही है तो दूसरी गाड़ी के आने तक मैं स्टेशन ही पर ठहरा रहूँगा। तुम लोगों में से कोई प्रयाग उतरे तो थोड़ी देर के लिए स्टेशन पर ठहर जाना। इनको अकेले छोड़ देना उचित नहीं। यदि पता मालूम हो जाएगा तो मैं इन्हें इनके ठहरने के स्थान पर भी पहुँचा दूँगा।”
वंशीधर की इन बातों से उन स्त्रियों की वाक्यधारा दूसरी ओर बह चली, “हाँ यह बात तो आप भली कही। नाही भइया! हम पंचे काहिके केहुसे कुछ कही। अरे एक के एक करत न बाय तो दुनिया चलत कैसे बाय?” इत्यादि ज्ञान-गाथा होने लगी। कोई-कोई उस बेचारी को सहारा मिलते देख ख़ुश हुए और कोई-कोई नाराज़ भी हुए। क्यों, सो मैं आपसे नहीं बतला सकती। उस गाड़ी में जितने मनुष्य थे सभी ने इस विषय में कुछ-न-कुछ कह डाला था। पिछली सीट में केवल एक स्त्री, जो फरासीसी छींट की दुलाई ओढ़े अकेली बैठी थी, कुछ नहीं बोली। कभी-कभी घूँघट के भीतर से एक आँख निकालकर वंशीधर की ओर ताक देती थी और सामना हो जाने पर फिर मुँह फेर लेती थी। वंशीधर सोचने लगे कि यह क्या बात है? देखने में तो यह भले घर की मालूम होती है, पर आचरण इसका अच्छा नहीं।
गाड़ी इलाहाबाद के पास पहुँचने को हुई। वंशीधर उस स्त्री को धीरज दिलाकर आकाश-पाताल सोचने लगे। यदि तार से कोई खबर न आई होगी तो दूसरी गाड़ी तक स्टेशन पर ही ठहरना पड़ेगा और जो उससे भी कोई न आया तो क्या करूँगा? जो हो गाड़ी नैनी से छूट गई। अब उन अशिक्षिता स्त्रियों ने फिर मुँह खोला, “क भईया, जो केहु बिन टिक्कस के आवत होय तो ओकर का सजाय होला? अरे ओंका ई नाहीं चाहत रहा कि मेहरारू के तो बैठा दिहलेन, अउर अपुआ तऊन टिक्कस लेइ के चल दिहलेन।”
किसी-किसी आदमी ने यहाँ तक दौड़ मारी कि रात को वंशीधर इसके जेवर छीनकर रफ़ूचक्कर हो जाएँगे। उस गाड़ी में एक लाठीवाला भी था। उसने खुल्लम-खुल्ला कहा, “का बाबू जी! कुछ हमरो साझा?”
उसकी बात पर वंशीधर क्रोध से लाल हो गए। उन्होंने उसे खूब धमकाया। उस समय तो वह चुप हो गया, पर यदि इलाहाबाद उतरता तो वंशीधर से बदला लिए बिना न रहता।
(4)
वंशीधर इलाहाबाद में उतरे। एक बुढ़िया को भी वहीं उतरना था। उससे उन्होंने कहा, “उनको भी अपने संग उतार लो।” फिर इस बुढ़िया को उस स्त्री के पास बिठाकर आप जानकी को उतारने गए। जानकी से सब हाल कहने पर वह बोली, “अरे, जाने भी दो, किस बखेड़े में पड़े हो।” पर वंशीधर ने न माना। जानकी को और उस भद्र महिला को एक ठिकाने बिठाकर आप स्टेशन मास्टर के पास गए। वंशीधर के जाते ही बुढ़िया, जिसे उन्होंने रखवाली के लिए छोड़ा था, किसी बहाने से भाग गई। स्टेशन मास्टर से पूछने पर मालूम हुआ कि कोई तार नहीं आया। अब तो वंशीधर बड़े असमंजस में पड़े। टिकट के लिए बखेड़ा होगा, क्योंकि वह स्त्री बे-टिकट है। लौटकर आए तो किसी को न पाया, “अरे यह सब कहाँ गईं?” यह कहकर चारों तरफ़ देखने लगे। कहीं पता नहीं। इस पर वंशीधर घबराए। आज कैसी बुरी साइत में घर से निकले कि एक के बाद दूसरी आफ़त में फँसते चले आ रहे हैं। इतने में अपने सामने उस दुलाईवाली को आते देखा।
“तू ही उन स्त्रियों को कहीं ले गई है।” इतना कहना था कि दुलाई से मुँह खोलकर नवलकिशोर खिलखिला उठे।
“अरे यह क्या? सब तुम्हारी ही करतूत है! अब मैं समझ गया। कैसा गज़ब तुमने किया है? ऐसी हँसी मुझे नहीं अच्छी लगती। मालूम होता है कि वह तुम्हारी ही बहू थी। अच्छा तो वे लोग गई कहाँ?”
“वे लोग तो पालकी गाड़ी में बैठी हैं। तुम भी चलो।”
“नहीं मैं सब हाल सुन लूँगा तब चलूँगा। हाँ, ये तो कहो, तुम मिरजापुर में कहाँ से आ निकले?”
“मिरजापुर नहीं मैं तो कलकत्ते से, बल्कि मुग़लसराय से, तुम्हारे साथ चला आ रहा हूँ। तुम जब मुग़लसराय में मेरे लिए चक्कर लगाते थे, तब मैं ड्यौढ़े दरजे में ऊपरवाले बेंच पर लेटे तुम्हारा तमाशा देख रहा था। फिर मिरजापुर में तुम पेट के धंधे में लगे थे, मैं तुम्हारे पास से निकल गया पर तुमने न देखा। मैं तुम्हारी गाड़ी में जा बैठा। सोचा कि तुम्हारे आने पर प्रकट होऊँगा। फिर थोड़ा और देख लें, करते-करते यहाँ तक नौबत पहुँची। अच्छा अब चलो, जो हुआ उसे माफ़ करो।”
यह सुन वंशीधर प्रसन्न हो गए। दोनों मित्रों में बड़े प्रेम से बातचीत होने लगी। वंशीधर बोले, “मेरे ऊपर जो कुछ बीती सो बीती पर वह बेचारी, जो तुम्हारे गुणवान के संग पहली ही बार रेल से आ रही थी, बहुत ही तंग हुई। उसे तो तुमने नाहक रुलाया। वह बहुत ही डर गई।”
“नहीं जी! डर किस बात का था? हम, तुम दोनों गाड़ी में न थे?”
“हाँ, पर, यदि मैं स्टेशन मास्टर से इत्तला कर देता तो बखेड़ा खड़ा हो जाता न?”
“अरे तो क्या, मैं मर थोड़े ही गया था! चार हाथ की दुलाई की बिसात ही कितनी?”.
इसी तरह बातचीत करते-करते दोनों गाड़ी के पास आए। देखा तो दोनों मित्र-वधुओं में खूब हँसी हो रही थी। जानकी कह रही थी, “अरे, तुम जानो क्या! इन लोगों की हँसी ऐसी ही होती है। हँसी में किसी के प्राण भी निकल जाएँ तो इन्हें दया न आवे।”
ख़ैर, दोनों मित्र अपनी-अपनी घरवाली को ले राज़ी-ख़ुशी घर पहुँचे और मुझे भी उनकी ये राम-कहानी लिखने से छुट्टी मिली।
केंद्र बिंदु
कहानी ‘दुलाईवाली’ का केंद्र बिंदु मुख्य रूप से तीन दिशाओं में घूमता है। यह केवल एक मनोरंजक कहानी नहीं है, बल्कि अपने समय के समाज और राजनीति का दर्पण भी है।
कहानी के मुख्य केंद्र बिंदु निम्नलिखित हैं –
- स्वदेशी भावना और देशभक्ति (मुख्य केंद्र बिंदु)
कहानी का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू स्वदेशी आंदोलन है। 1907 में लिखी गई यह कहानी उस दौर को दर्शाती है जब भारत में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का स्वर तेज़ था।
- वंशीधर का डर – वंशीधर का यह सोचना कि उसने ‘विलायती’ धोती पहनी है और नवलकिशोर उसे डाँटेंगे, यह दिखाता है कि उस समय ‘स्वदेशी’ होना केवल एक विचार नहीं बल्कि एक सामाजिक प्रतिष्ठा और जिम्मेदारी बन चुका था।
- संदेश – लेखिका ने हास्य के माध्यम से यह संदेश दिया है कि अपने देश की वस्तुओं का उपयोग करना ही वास्तविक गौरव है।
- निश्छल मित्रता और विनोदप्रियता (हास्य)
कहानी का केंद्र नवलकिशोर और वंशीधर की गहरी मित्रता है।
- मजाक (Prank) – नवलकिशोर द्वारा स्त्री (दुलाईवाली) का भेष धारण करना और अपने मित्र को पूरे रास्ते परेशान करना यह बताता है कि उस समय की मित्रता में कितना अपनापन, निश्छलता और हास्य होता था।
- यह कहानी मानवीय संबंधों की मधुरता को रेखांकित करती है।
- मानवीय संवेदना और परोपकार
कहानी का एक केंद्र बिंदु वंशीधर का परोपकारी स्वभाव भी है।
- जब वंशीधर एक अनजान महिला (दुलाईवाली) को अकेला और रोता हुआ देखते हैं, तो वे अपनी पत्नी के तानों की परवाह किए बिना उसकी मदद के लिए तैयार हो जाते हैं।
- यह उस काल के भारतीय समाज की नैतिकता और नारी के प्रति सम्मानजनक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है।
- तत्कालीन समाज और रेल यात्रा का जीवंत चित्रण
लेखिका ने 20वीं सदी की शुरुआत के भारतीय मध्यमवर्गीय समाज को केंद्र में रखा है।
- सामाजिक परिवेश – बनारस और इलाहाबाद के बीच की रेल यात्रा, डिब्बे में ग्रामीण महिलाओं की बातचीत, उनकी भाषा (बोली), और लोगों की मानसिकता का बहुत ही बारीक चित्रण किया गया है।
- यह कहानी दिखाती है कि कैसे रेल यात्रा उस समय सामाजिक मेल-जोल का एक बड़ा मंच थी।
राजेंद्र बाला घोष (बंग महिला) द्वारा रचित कहानी ‘दुलाईवाली’ हिंदी की शुरुआती कहानियों में से एक है। इस कहानी के पात्र मध्यमवर्गीय समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनमें मानवीय संवेदनाओं के साथ-साथ विनोदप्रियता भी कूट-कूट कर भरी है।
कहानी के प्रमुख पात्र और उनकी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
- वंशीधर (मुख्य पात्र)
वंशीधर कहानी के नायक हैं जो इलाहाबाद के निवासी हैं और अपनी पत्नी को ससुराल (बनारस) से विदा कराने आए हैं।
- कर्तव्यपरायण और जिम्मेदार – वह अपनी पत्नी और परिवार की सुरक्षा के प्रति बेहद सजग हैं। जब उन्हें लगता है कि एक अनजान महिला अकेली है, तो वे उसकी मदद करने के लिए बखेड़ों में पड़ने से भी नहीं डरते।
- सरल और भावुक – वे अपने मित्र नवलकिशोर पर बहुत भरोसा करते हैं। नवल के न मिलने पर वे परेशान हो जाते हैं और पत्नी के तानों से भी डरते हैं।
- स्वदेशी के प्रति झुकाव – वंशीधर के मन में देशभक्ति का भाव है। वे विलायती धोती पहनकर नवल के सामने जाने में संकोच करते हैं क्योंकि नवल कट्टर स्वदेशी हैं।
- परोपकारी – एक अनजान महिला की मदद करने का उनका प्रयास उनके ऊँचे चरित्र और दयालु स्वभाव को दर्शाता है।
- नवलकिशोर
नवलकिशोर वंशीधर के ममेरे भाई और उनके घनिष्ठ मित्र हैं।
- विनोदप्रिय और मजाकिया – नवल पूरी कहानी के ‘मास्टरमाइंड’ हैं। वे अपनी पहचान छिपाकर ‘दुलाईवाली’ बनकर वंशीधर को पूरे रास्ते छकाते हैं। उन्हें हँसी-मजाक करना बहुत पसंद है।
- चतुर और योजनाबद्ध – उन्होंने जिस तरह से वंशीधर को ‘उल्लू’ बनाया और अंत तक अपनी पहचान छिपाए रखी, वह उनकी चतुराई को दर्शाता है।
- कट्टर स्वदेशी – वे स्वदेशी आंदोलन के समर्थक हैं और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार पर जोर देते हैं।
- मित्रवत – उनका चरित्र दिखाता है कि पुराने समय में मित्रों के बीच कितना गहरा और निश्छल प्रेम होता था, जहाँ वे एक-दूसरे के साथ भारी मजाक भी कर सकते थे।
- जानकीदेई (वंशीधर की पत्नी)
- संकोची और मर्यादित – जानकी एक पारंपरिक भारतीय स्त्री हैं। उन्हें नवलकिशोर की हँसी-ठिठोली पसंद नहीं आती क्योंकि उन्हें शर्म आती है।
- सीधी और स्पष्टवक्ता – वह अपने पति को सीधे-सीधे टोक देती हैं कि आज ही विदा होना संभव नहीं है। वह नवलकिशोर के स्वभाव से भी अच्छी तरह वाकिफ हैं।
- चिंताशील – यात्रा के दौरान जब नवल नहीं मिलते, तो वे अपने पति पर तंज भी कसती हैं, लेकिन अंत में नवल की पत्नी (बहू) के साथ उनकी खूब जमती है।
- दुलाईवाली (भेस में नवलकिशोर)
हालाँकि यह पात्र नवलकिशोर ही है, लेकिन कहानी के बड़े हिस्से में यह एक रहस्यमयी महिला के रूप में मौजूद है।
- रहस्यमयी – पूरी यात्रा में वह दुलाई ओढ़े चुपचाप बैठी रहती है, जिससे वंशीधर और अन्य यात्री उसे एक असहाय महिला समझते हैं। वह बीच-बीच में वंशीधर को देखती हैं और नज़र मिलते ही घूँघट कर लेती इससे वंशीधर को आश्चर्य भी होता था।
- अभिनय में कुशल – नवलकिशोर ने एक डरी हुई और असहाय महिला का इतना सजीव अभिनय किया कि वंशीधर जैसा अनुभवी व्यक्ति भी उसे पहचान नहीं पाया।
- घूँघट ओढ़ी हुई महिला
यह और कोई नहीं बल्कि नवलकिशोर की पत्नी है। उसे ऐसा लगा कि उसका पति नवलकिशोर उसके साथ ट्रेन में नहीं चढ़ा है और इस कारण से वह रोने लगी। उसकी करुण दशा को देखकर ट्रेन की कुछ ग्रामीण महिलाएँ और कुछ पुरुष यात्री उससे हमदर्दी जताने लगे। परंतु, नवलकिशोर उसी डिब्बे में दुलाईवाली बनकर बैठा हुआ था और वंशीधर की सारी गतिविधियों को देख रहा था।
शब्दार्थ (Word Meanings)
व्यग्रता – Restlessness / Anxiety – बेचैनी, व्याकुलता
नवीना – Young Woman – युवती, नई स्त्री
इसरार – Insistence – ज़िद करना, आग्रह करना
बट्टा लगना – To be tarnished / Stained – कलंक लगना, प्रतिष्ठा कम होना
नाकों दम आना – To be greatly harassed – बहुत परेशान हो जाना
असाढ़-सावन की झड़ी – Continuous rain (Tears) – लगातार आँसू गिरना (रोने की अधिकता)
कहारिन – Water-carrier woman – पालकी ढोने वाली या पानी भरने वाली महिला
छूछे को कौन पूछे – Who cares for the poor – निर्धन व्यक्ति का कोई सम्मान नहीं करता
असबाब – Luggage / Goods – सामान, सामग्री
निटखट – Mischievous / Stubborn – शरारती या ज़िद्दी
अचकचाकर – Startled / Surprised – अचानक चौंककर
प्रौढ़ा – Middle-aged woman – अधेड़ उम्र की महिला
उजबक – Foolish / Stupid – मूर्ख, बेवकूफ
अबला – Helpless woman – असहाय नारी
बखेड़ा – Hassle / Confusion – झंझट, झमेला
रफ़ूचक्कर होना – To disappear / Run away – गायब हो जाना, भाग जाना
साइत – Auspicious time / Moment – मुहूर्त, समय
दुलाई – Quilt / Wrap – रूईदार ओढ़नी या रजाई
करतूत – Misdeed / Act – काम (अक्सर बुरे या चालाकी भरे अर्थ में)
बिसात – Capacity / Worth – हैसियत, सामर्थ्य
कहानी का शीर्षक इसी शब्द पर आधारित है। दुलाई एक प्रकार का मोटा सूती ओढ़ना होता है जिसमें रूई भरी होती है। नवलकिशोर ने इसी का भेष बनाकर अपनी पहचान छिपाई थी।
नाकों दम आना – बहुत अधिक परेशान या तंग हो जाना।
बट्टा लगना – प्रतिष्ठा कम होना या कलंक लगना।
छूछे को कौन पूछे – निर्धन या खाली हाथ व्यक्ति का कोई सम्मान नहीं करता।
हवा से बातें करना – बहुत तेज़ गति से चलना (दौड़ना)।
एक जान दो क़ालिब – बहुत गहरी मित्रता होना (दो शरीर एक प्राण)।
आकाश-पाताल सोचना – बहुत अधिक चिंता करना या गहरी सोच में डूबे रहना।
रफ़ूचक्कर होना – चुपचाप भाग जाना या गायब हो जाना।
उल्लू बनाना – मूर्ख बनाना।
पेटराम की शिकायत – भूख लगना (पेट की भूख के लिए व्यंग्य)।
‘दुलाईवाली’ – विस्तृत सारांश
1. प्रस्थान की तैयारी
कहानी की शुरुआत काशी (बनारस) से होती है। वंशीधर इलाहाबाद के रहने वाले हैं और अपनी पत्नी जानकीदेई को विदा कराने अपनी ससुराल बनारस आए हैं। अचानक वंशीधर को उनके ममेरे भाई और घनिष्ठ मित्र नवलकिशोर का तार (Telegram) मिलता है। तार में लिखा था कि वे कलकत्ते से आ रहे हैं और मुग़लसराय स्टेशन पर उनसे मिलेंगे, ताकि सब साथ मिलकर इलाहाबाद चल सकें।
वंशीधर हड़बड़ी में घर पहुँचते हैं और जानकी को तुरंत तैयार होकर चलने के लिए कहते हैं। जानकी शुरू में मना करती है और झुँझलाती है क्योंकि उसे नवलकिशोर की हँसी-मजाक करने की आदत पसंद नहीं है, लेकिन वंशीधर के आग्रह पर वह रोती-धोती तैयार हो जाती है।
2. स्वदेशी का विचार और यात्रा का आरंभ
स्टेशन जाते समय वंशीधर को अचानक याद आता है कि उन्होंने गलती से ‘विलायती’ (विदेशी) धोती पहन ली है। उन्हें डर लगता है कि नवलकिशोर, जो अब कट्टर स्वदेशी बन गए हैं, उन्हें इस बात पर टोकेंगे और शर्मिंदा करेंगे। वंशीधर के मन में देश प्रेम और स्वदेशी वस्तुओं के प्रति सम्मान का भाव है, वे मानते हैं कि देशी चीज़ें खरीदने से पैसा देश में ही रहता है।
मुग़लसराय स्टेशन पहुँचकर वंशीधर नवलकिशोर को हर डिब्बे में ढूँढते हैं, लेकिन नवल कहीं नहीं मिलते। अंत में थक-हारकर वे अपनी पत्नी जानकी को ट्रेन के जनाना डिब्बे में बैठा देते हैं और खुद दूसरे डिब्बे में बैठ जाते हैं। वे नवल के न आने से चिढ़ भी जाते हैं।
3. रेल यात्रा और ‘घूँघट वाली महिला’ का रहस्य
ट्रेन जब मिर्जापुर पहुँचती है तो पेटपूजा के लिएवे वंशीधर एक खोमचेवाले से पूड़ियाँ खाते हैं और जब अपने डिब्बे में पुनः जाते हैं तो उनके डिब्बे में एक स्त्री जिसने सिर से पैर तक ओढ़े, सिर झुकाए, एक हाथ लंबा घूँघट काढ़े, कपड़े की गठरी-सी बनी बैठी हुई मिली। वंशीधर ने सोचा इनके संग वाले भद्र पुरुष के आने पर उनके साथ बातचीत करके समय बिताएँगे। पर जब ट्रेन छूटने को हुई तब वह स्त्री कुछ अचकचाकर, थोड़ा-सा मुँह खोल जंगले के बाहर देखने लगी। ज्यों ही गाड़ी छूटी, वह मानो काँप-सी उठी। जब तक स्टेशन दिखलाई दिया तब तक वह बाहर ही देखती रही। फिर अस्पष्ट स्वर से रोने लगी। डिब्बे की अन्य ग्रामीण महिलाएँ उस पर दया दिखाते हुए आपस में बातें करती हैं कि शायद उसका ‘मनई’ (पति) उसे छोड़कर दूसरी गाड़ी में चढ़ गया है या पीछे रह गया है।
वंशीधर को उस बेचारी स्त्री पर तरस आता है। वे अन्य महिलाओं से कहते हैं कि वे भी इलाहाबाद जा रहे हैं और वे उस स्त्री की मदद करेंगे। वंशीधर मन ही मन योजना बनाते हैं कि स्टेशन पर उतरकर वे इस स्त्री के परिवार का पता लगाएँगे या इसे सुरक्षित स्थान पर पहुँचा देंगे। हालाँकि, डिब्बे के कुछ लोग उन पर शक भी करते हैं, लेकिन वंशीधर अपनी परोपकारी भावना पर अडिग रहते हैं। परंतु, वह महिला तो नवलकिशोर की पत्नी थी और नवलकिशोर स्वयं एक दुलाई ओढ़े महिला का भेष धरे उस डिब्बे में बैठे हुए थे।
4. इलाहाबाद स्टेशन पर हंगामा
इलाहाबाद पहुँचकर वंशीधर पहले अपनी पत्नी जानकी को उतारते हैं और फिर उस अनजान स्त्री (घूँघट वाली महिला) की मदद के लिए बुढ़िया को उसके पास बैठाते हैं। जानकी इस बखेड़े में पड़ने के लिए वंशीधर को टोकती है, पर वंशीधर नहीं मानते। बुढ़िया बहाना बनाकर वहाँ से पहले ही भाग जाती है। जब वे स्टेशन मास्टर के पास पूछताछ करने जाते हैं और वापस आते हैं, तो देखते हैं कि वे दोनों स्त्रियाँ भी स्त्री गायब हैं। वंशीधर घबरा जाते हैं कि आखिर वह गई कहाँ?
5. दुलाईवाली का रहस्योद्घाटन और सुखद अंत
तभी वह ‘दुलाईवाली’ वंशीधर के सामने आती है। वंशीधर जैसे ही उसे टोकते हुए कहते हैं कि “तू ही उन स्त्रियों को कहीं ले गई है।” तब, वह स्त्री खिलखिलाकर हँस पड़ती है और अपना मुँह खोल देती है। वंशीधर यह देखकर दंग रह जाते हैं कि वह कोई स्त्री नहीं बल्कि स्वयं नवलकिशोर थे।
नवल बताते हैं कि वे मुग़लसराय से ही वंशीधर के साथ थे। जब वंशीधर उन्हें प्लेटफ़ॉर्म पर ढूँढ रहे थे, तब नवल ऊपर की बेंच पर लेटे उनका तमाशा देख रहे थे। नवल ने वंशीधर के साथ मज़ाक करने के लिए ही अपनी पत्नी सहित उसके डिब्बे में जा बैठे और अपनी पत्नी को भी इस भ्रम में डाले रखे कि वे खुद उस डिब्बे में नहीं चढ़ पाए है परंतु एक दुलाई ओढ़ स्त्री का भेष धरे वहीं बैठे थे। यह सब सुन-समझ वंशीधर प्रसन्न हो जाते हैं और दोनों मित्र हँसी-खुशी अपनी-अपनी पत्नियों को लेकर घर की ओर चल देते हैं।
1. ‘दुलाईवाली’ कहानी के माध्यम से स्वदेशी आंदोलन के प्रभाव को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – ‘दुलाईवाली’ कहानी 1907 में लिखी गई थी, जब भारत में स्वदेशी आंदोलन चरम पर था। कहानी का मुख्य पात्र वंशीधर जब गलती से ‘विलायती’ (विदेशी) धोती पहनकर स्टेशन आता है, तो वह अत्यंत ग्लानि और डर महसूस करता है। उसे डर है कि उसका मित्र नवलकिशोर, जो कट्टर स्वदेशी है, उसे डाँटेगा। यह प्रसंग दर्शाता है कि उस समय विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि एक सामाजिक मूल्य बन चुका था। लेखिका ने हास्य के माध्यम से यह संदेश दिया है कि अपने देश की वस्तुओं का उपयोग करना ही वास्तविक देशभक्ति है।
2. वंशीधर का चरित्र चित्रण कीजिए।
उत्तर – वंशीधर कहानी के नायक और एक सरल हृदय वाले मध्यमवर्गीय व्यक्ति हैं। वे अपनी पत्नी जानकीदेई के प्रति जिम्मेदार हैं और अपने मित्र नवलकिशोर के प्रति अत्यंत निष्ठावान हैं। उनके चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता उनकी परोपकारिता है। रेल यात्रा के दौरान, एक अनजान और असहाय महिला (दुलाईवाली) को मुसीबत में देख वे उसकी मदद के लिए तत्पर हो जाते हैं, भले ही इसके लिए उन्हें अपनी पत्नी के ताने सुनने पड़ें। वे स्वदेशी भावनाओं का सम्मान करते हैं और अनजाने में विदेशी वस्तु अपनाने पर स्वयं को दोषी मानते हैं। उनका व्यक्तित्व आदर्शवादी और मानवीय संवेदनाओं से भरा है।
3. नवलकिशोर ने वंशीधर के साथ क्या मजाक किया और क्यों?
उत्तर – नवलकिशोर वंशीधर के घनिष्ठ मित्र और ममेरे भाई हैं। उन्होंने वंशीधर को ‘उल्लू’ बनाने के लिए एक चतुर योजना बनाई। वे कलकत्ते से आकर मुग़लसराय स्टेशन पर वंशीधर से मिलने वाले थे, लेकिन वे सामने आने के बजाय स्त्री का भेष धरकर उसी ट्रेन में ‘दुलाई’ ओढ़कर बैठ गए। उन्होंने पूरी यात्रा में एक डरी हुई और असहाय महिला का अभिनय किया, जिससे वंशीधर को लगा कि वह कोई मुसीबत में फंसी महिला है। नवलकिशोर ने यह मजाक केवल मनोरंजन और वंशीधर की परोपकारी भावना की परीक्षा लेने के लिए किया था, जो उनकी गहरी और निश्छल मित्रता को दर्शाता है।
4. जानकीदेई का व्यक्तित्व कहानी के कथानक को कैसे आगे बढ़ाता है?
उत्तर – जानकीदेई वंशीधर की पत्नी हैं और एक पारंपरिक भारतीय नारी का प्रतिनिधित्व करती हैं। वे संकोची स्वभाव की हैं और उन्हें नवलकिशोर की हँसी-ठिठोली बिल्कुल पसंद नहीं है। यात्रा के दौरान वे अपने पति को बार-बार टोकती हैं कि उन्हें दूसरों के बखेड़ों (अनजान महिला की मदद) में नहीं पड़ना चाहिए। उनके ताने और आपत्तियाँ कहानी में तनाव और हास्य पैदा करती हैं। जानकीदेई का चरित्र वंशीधर की परोपकारिता के विपरीत एक व्यवहारिक सोच को सामने लाता है, जिससे कहानी का अंत और भी अधिक प्रभावी और सुखद बन जाता है।
5. कहानी के शीर्षक ‘दुलाईवाली’ की सार्थकता सिद्ध कीजिए।
उत्तर – कहानी का शीर्षक ‘दुलाईवाली’ अत्यंत सटीक और रहस्यपूर्ण है। ‘दुलाई’ एक रूईदार ओढ़नी होती है, जिसके पीछे नवलकिशोर ने अपना असली रूप छिपाया था। पूरी कहानी इसी ‘दुलाईवाली’ के इर्द-गिर्द घूमती है। वंशीधर और अन्य यात्री उसे एक असहाय महिला समझते हैं, जिससे कहानी में कौतूहल (Curiosity) बना रहता है। अंत में जब दुलाई हटती है और नवलकिशोर प्रकट होते हैं, तो पाठक को सुखद आश्चर्य होता है। अतः शीर्षक न केवल मुख्य घटना का केंद्र है, बल्कि यह कहानी के रहस्य और हास्य को भी पूरी तरह से सार्थक करता है।
6. रेल के डिब्बे में ग्रामीण महिलाओं की बातचीत से समाज की क्या छवि उभरती है?
उत्तर – रेल के डिब्बे में ग्रामीण महिलाओं के बीच होने वाली बातचीत तत्कालीन समाज का सजीव चित्रण प्रस्तुत करती है। उनकी भाषा आंचलिक और सरल है, जिसमें एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति और जिज्ञासा का भाव है। वे अनजान ‘दुलाईवाली’ को रोता देख उसकी मदद की बात करती हैं और अपने पुराने अनुभवों को साझा करती हैं। इससे पता चलता है कि उस समय का समाज मिलनसार था और यात्रा के दौरान लोग एक-दूसरे से आत्मीयता से जुड़ जाते थे। हालाँकि, उनकी बातों में अंधविश्वास और अशिक्षा की झलक भी मिलती है, जो उस समय के ग्रामीण भारत की वास्तविकता थी।
7. ‘दुलाईवाली’ कहानी में हास्य और मनोरंजन के तत्वों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर – ‘दुलाईवाली’ हिंदी की शुरुआती हास्य कहानियों में से एक है। इसमें हास्य का मुख्य स्रोत ‘स्थितिजन्य’ (Situational Humour) है। वंशीधर का अपनी विलायती धोती को लेकर डरना, जानकीदेई का झुँझलाना और नवलकिशोर का स्त्री बनकर वंशीधर को छकाना, ये सभी प्रसंग पाठक को हँसाते हैं। विशेषकर जब वंशीधर अत्यंत गंभीरता से एक अनजान ‘स्त्री’ की मदद करने की कोशिश करते हैं और अंत में वह उनका मित्र निकलता है, तो हास्य अपनी चरम सीमा पर होता है। लेखिका ने बहुत ही सहज और निश्छल तरीके से मनोरंजन को कहानी में पिरोया है।
8. इस कहानी के माध्यम से लेखिका ने किस सामाजिक बुराई या प्रथा पर कटाक्ष किया है?
उत्तर – लेखिका ने इस कहानी में सीधे तौर पर किसी बड़ी बुराई पर हमला तो नहीं किया, लेकिन मध्यमवर्गीय समाज की ‘दिखावे की प्रवृत्ति’ और ‘विदेशी मोह’ पर सूक्ष्म कटाक्ष किया है। वंशीधर का विलायती धोती पहनना और फिर पकड़े जाने के डर से काँपना यह दिखाता है कि लोग जाने-अनजाने अपनी जड़ों से कट रहे थे। इसके अलावा, डिब्बे में यात्रियों द्वारा एक-दूसरे पर शक करना और वंशीधर को ठग समझना समाज में व्याप्त अविश्वास की भावना को भी दर्शाता है। लेखिका ने परोपकार और स्वदेशी को बढ़ावा देकर इन प्रवृत्तियों को सुधारने का संदेश दिया है।
9. कहानी के अंत में होने वाले रहस्योद्घाटन का वंशीधर पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर – कहानी के अंत में जब ‘दुलाईवाली’ के भेष से नवलकिशोर बाहर आते हैं, तो वंशीधर पहले तो चकित रह जाते हैं और फिर खिलखिलाकर हँस पड़ते हैं। उनकी पूरी यात्रा की थकान और मानसिक तनाव पल भर में गायब हो जाता है। वे नवलकिशोर की चतुराई की प्रशंसा करते हैं, हालाँकि उन्हें इस बात का दुख भी होता है कि नवल ने उन्हें बहुत परेशान किया। यह अंत उनके बीच की प्रगाढ़ मित्रता को और मजबूत करता है। वंशीधर को यह महसूस होता है कि उनका मित्र उन्हें नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि प्रेम के कारण ऐसा मजाक कर रहा था।
10. ‘दुलाईवाली’ कहानी की ऐतिहासिक महत्ता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर – ऐतिहासिक दृष्टि से ‘दुलाईवाली’ हिंदी साहित्य की अत्यंत महत्त्वपूर्ण कहानी है। यह 1907 में सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुई थी और इसे हिंदी की प्रथम मौलिक कहानियों की श्रेणी में रखा जाता है। इसकी महत्ता इस बात में है कि इसने हिंदी कहानी को अनुवाद के दौर से निकालकर मौलिकता और यथार्थवाद की ओर मोड़ा। बंग महिला (राजेंद्र बाला घोष) ने नारी पात्रों और मध्यमवर्गीय जीवन को जिस सहजता से प्रस्तुत किया, वह उस समय के लिए क्रांतिकारी था। यह कहानी स्वदेशी चेतना और भारतीय हास्य-बोध का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है।
1. स्वदेशी भावना का अंश
“नहीं, एक देशी धोती पहनकर आना था, सो भूलकर विलायती ही पहिन आए। नवल कट्टर स्वदेशी हुए हैं न? वह बंगालियों से भी बढ़ गए हैं। देखेंगे दो-चार सुनाए बिना न रहेंगे। और, बात भी ठीक है। नाहक विलायती चीज़ें मोल लेकर क्यों रुपए की बरबादी की जाए? देशी लेने से भी दाम लगेगा सही; रहेगा तो देश ही में।”
संदर्भ और प्रसंग –
प्रस्तुत पंक्तियाँ राजेंद्र बाला घोष (बंग महिला) द्वारा रचित प्रसिद्ध कहानी ‘दुलाईवाली’ से ली गई हैं। वंशीधर जब बनारस से अपनी पत्नी को विदा कराकर स्टेशन की ओर जा रहे होते हैं, तब अचानक उन्हें ध्यान आता है कि उन्होंने स्वदेशी के बजाय विलायती धोती पहन ली है। इसी ग्लानि और चिंता को वे अपनी पत्नी जानकी से साझा कर रहे हैं।
व्याख्या –
वंशीधर को इस बात का गहरा पछतावा है कि वे अनजाने में विदेशी धोती पहन आए हैं। उन्हें अपने मित्र नवलकिशोर का डर है, क्योंकि नवल स्वदेशी आंदोलन के प्रबल समर्थक हैं और विदेशी वस्तुओं के उपयोग पर कड़ी आपत्ति जताते हैं। वंशीधर आत्म-चिंतन करते हुए कहते हैं कि नवल का सोचना बिल्कुल सही है। विदेशी सामान खरीदने से देश का धन बाहर चला जाता है, जबकि स्वदेशी सामान खरीदने पर पैसा अपने ही देश की अर्थव्यवस्था में रहता है। यह अंश उस समय के भारत में चल रहे ‘स्वदेशी आंदोलन’ के व्यापक प्रभाव और आम आदमी की देशभक्ति की चेतना को दर्शाता है।
2. नवलकिशोर की हँसी और जानकी की झुँझलाहट
“उनकी हँसी से और किससे! हँसी-ठट्ठा राह में अच्छी लगती है? उनकी हँसी मुझे नहीं भाती… मैं तो मारे शरम के मर-सी गई। हाँ, भाभी जी ने बात उड़ा दी सही। वह बोलीं, खाने दो, खाने-पहनने के लिए तो आई ही है। पर मुझे उनकी हँसी बहुत बुरी लगी।”
संदर्भ और प्रसंग –
यह अंश कहानी के शुरुआती भाग से लिया गया है। जब वंशीधर अपनी पत्नी जानकीदेई को बताते हैं कि उन्हें नवलकिशोर के साथ इलाहाबाद जाना होगा, तब जानकी अपनी नाराजगी व्यक्त करती है। वह पुरानी एक घटना को याद कर रही है जब नवल ने रसोई में उसे टोक दिया था।
व्याख्या –
जानकीदेई एक पारंपरिक और संकोची स्वभाव की महिला है। उसे अपने पति के मित्र नवलकिशोर का अत्यधिक मजाक करना और हँसी-ठिठोली करना पसंद नहीं है। वह एक पुरानी घटना का जिक्र करती है जब नवल ने उसे पूड़ियाँ खाते हुए देख लिया था और सबके सामने मजाक उड़ाया था। जानकी के अनुसार, मर्यादित समाज में ऐसी हँसी-मजाक शोभा नहीं देती। यह अंश तत्कालीन समाज में देवर-भाभी या मित्र-पत्नी के बीच के मधुर लेकिन मर्यादित संबंधों और स्त्रियों की लज्जाशील प्रकृति को चित्रित करता है।
3. मानवीय संवेदना और दुलाईवाली का रहस्य
“तुम तो नाहक उन्हें और भी डरा रही हो। ज़रूर इलाहाबाद तार गया होगा और दूसरी गाड़ी से वे भी वहाँ पहुँच जाएँगे। मैं भी इलाहाबाद ही जा रहा हूँ। मेरे संग भी स्त्रियाँ हैं। जो ऐसा ही है तो दूसरी गाड़ी के आने तक मैं स्टेशन ही पर ठहरा रहूँगा।”
संदर्भ और प्रसंग –
यह पंक्तियाँ रेल यात्रा के दौरान की हैं। जब ट्रेन में बैठी ग्रामीण महिलाएँ उस रहस्यमयी ‘दुलाईवाली’ (जो असल में नवलकिशोर थे) को डराने लगती हैं कि उसका पति उसे छोड़कर चला गया है, तब वंशीधर हस्तक्षेप करते हैं।
व्याख्या –
यहाँ वंशीधर के चरित्र की महानता और परोपकारिता स्पष्ट होती है। वे एक अजनबी स्त्री को संकट में देखकर चुप नहीं रह पाते। वे ग्रामीण स्त्रियों को टोकते हैं कि वे उसे और न डराएं। वंशीधर अपनी जिम्मेदारी समझते हुए उस स्त्री को आश्वासन देते हैं कि वे भी उसी शहर जा रहे हैं और जब तक उसका परिवार नहीं मिल जाता, वे उसकी रक्षा करेंगे। यह अंश दर्शाता है कि वंशीधर एक संवेदनशील मनुष्य हैं जो मानवता को पारिवारिक बखेड़ों से ऊपर रखते हैं।
4. कहानी का अंत (रहस्योद्घाटन)
“अरे यह क्या? सब तुम्हारी ही करतूत है! अब मैं समझ गया। कैसा गज़ब तुमने किया है? ऐसी हँसी मुझे नहीं अच्छी लगती। मालूम होता है कि वह तुम्हारी ही बहू थी। अच्छा तो वे लोग गई कहाँ?”
संदर्भ और प्रसंग –
यह कहानी का अंतिम और चरमोत्कर्ष (Climax) वाला हिस्सा है। जब इलाहाबाद स्टेशन पर वंशीधर उस ‘दुलाईवाली’ को गायब पाकर परेशान होते हैं और तभी नवलकिशोर हँसते हुए अपना मुँह खोलते हैं।
व्याख्या –
जैसे ही वंशीधर को पता चलता है कि जिस ‘असहाय महिला’ की वे मदद करना चाह रहे थे, वह असल में उनका मित्र नवलकिशोर ही था, वे चकित रह जाते हैं। वे नवल को डांटते हैं कि उन्होंने ऐसा भयंकर मजाक क्यों किया जिससे उन्हें इतनी मानसिक परेशानी हुई। ‘करतूत’ शब्द यहाँ नवल की शरारत के लिए प्रयोग हुआ है। यह अंश कहानी के हास्य तत्व को पूर्णता प्रदान करता है और पाठकों को एक सुखद अंत की अनुभूति कराता है।

