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इंद्रजाल – जयशंकर प्रसाद

Indrajaal By Jayshankar Prasad The Best Explanation

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जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी, 1889 ई को बनारस में हुआ था। उनके पूर्वज कानपुर के रहनेवाले थे जिन्होंने व्यवसाय को ध्यान में रखकर बनारस में रहने का निर्णय लिया था। जयशंकर प्रसाद की औपचारिक शिक्षा केवल छठी-सातवीं कक्षा तक बनारस के क्वींस कॉलेज में हुई थी। केवल 48 साल की उम्र में 15 नवम्बर, 1937 ई को प्रसाद जी की मृत्यु हो गई थी। उन्होंने अल्पायु के बावजूद विपुल साहित्य रचा था। उनकी रचनाओं की सूची इस प्रकार है।

काव्य-कृतियाँ : चित्राधार (1918/1928), कानन कुसुम (1913/1929), प्रेमपथिक (ब्रजभाषा- 1909), प्रेमपथिक (खड़ी बोली हिंदी – 1914), महाराणा का महत्त्व (1914), झरना (1918), आँसू (1925/1933), लहर (1935), कामायनी (1936)

नाट्य-कृतियाँ : उर्वशी (1909), सज्जन (1910), वभ्रुवाहन (1911), कल्याणी परिणय (1912), करुणालय (1912), प्रायश्चित (1914), राज्यश्री (1915), विशाख (1921), अजातशत्रु (1922), जन्मेजय का नाग-यज्ञ (1924), कामना (1927), एक घूँट (1929), स्कन्दगुप्त (1928), चन्द्रगुप्त (1931), ध्रुव स्वामिनी (1933), अग्निमित्र (अपूर्ण)

कहानी-संग्रह : छाया ( 1912/1918), प्रतिध्वनि (1925), आकाशदीप ( 1929), आँधी (1931), इन्द्रजाल (1936),

कथा प्रबंध : ब्रह्मर्षि (1910), पंचायत (1910)

उपन्यास : कंकाल(1930), तितली (1934), इरावती (अपूर्ण, मरणोपरांत 1940 में प्रकाशित)

निबंध : काव्य और कला तथा अन्य निबंध (मरणोपरांत 1939 में प्रकाशित )

जयशंकर प्रसाद छायावाद के चार श्रेष्ठ कवियों में से एक हैं। उनके लेखन काल का अधिकांश छायावाद ( 1918-1936) के दौर से जुड़ा था। निराला, पन्त और महादेवी की तुलना में जयशंकर प्रसाद ने, परिमाण की दृष्टि से सबसे ज्यादा छायावादी साहित्य की रचना की थी। उन्होंने कविता, नाटक, कहानी, उपन्यास और आलोचना में उच्च कोटि की रचनाएँ दीं।

प्रसादजी की कविताएँ मूलतः रोमानी हैं। छायावाद की प्रायः सभी विशेषताओं को अपने में समेटे हुए उनकी कविताएँ ‘कामायनी’ में शैव दर्शन के आनंदवाद तक भी पहुँचती हैं। ‘कामायनी’ को न केवल छायावाद में, बल्कि हिंदी कविता के इतिहास में विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है। प्रसाद ने ऐतिहासिक नाटकों की रचना की, मगर इन नाटकों में अपने वर्तमान को व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता मौजूद है। उन्होंने ‘तितली’ और ‘कंकाल’ नामक उपन्यासों में यथार्थ चित्रण का ध्यान रखा है। उनके उपन्यास रोमानियत के बजाय यथार्थ की तरफ उन्मुख हैं। प्रसाद की कहानियों में रोमानियत और यथार्थ दोनों रूप मिलते हैं। उनके आलोचनात्मक आलेखों में प्रायः साहित्य की अवधारणात्मक समझ को सुलझाने का प्रयास दिखाई पड़ता है।

इंद्रजाल – जयशंकर प्रसाद

गाँव के बाहर, एक छोटे-से बंजर में कंजरों का दल पड़ा था। उस परिवार में टट्टू, भैंसे और कुत्तों को मिलाकर इक्कीस प्राणी थे। उसका सरदार मैकू, लंबी-चौड़ी हड्डियोंवाला एक अधेड़ पुरुष था। दया-माया उसके पास फटकने नहीं पाती थी। उसकी घनी दाढ़ी और मूँछों के भीतर प्रसन्नता की हँसी छिपी ही रह जाती। गाँव में भीख माँगने के लिए जब कंजरों की स्त्रियाँ जातीं, तो उनके लिए मैकू की आज्ञा थी कि कुछ न मिलने पर अपने बच्चों को निर्दयता से गृहस्थ के द्वार पर जो स्त्री न पटक देगी, उसको भयानक दंड मिलेगा।

उस निर्दय झुंड में गानेवाली एक लडक़ी थी और एक बाँसुरी बजानेवाला युवक। ये दोनों भी गा-बजाकर जो पाते, वह मैकू के चरणों में लाकर रख देते। फिर भी गोली और बेला की प्रसन्नता की सीमा न थी। उन दोनों का नित्य संपर्क ही उनके लिए स्वर्गीय सुख था। इन घुमक्कड़ों के दल में ये दोनों विभिन्न रुचि के प्राणी थे। बेला बेड़िन थी। माँ के मर जाने पर अपने शराबी और अकर्मण्य पिता के साथ वह कंजरों के हाथ लगी। अपनी माता के गाने-बजाने का संस्कार उसकी नस-नस में भरा था। वह बचपन से ही अपनी माता का अनुकरण करती हुई अलापती रहती थी।

शासन की कठोरता के कारण कंजरों का डाका और लड़कियों के चुराने का व्यापार बंद हो चला था। फिर भी मैकू अवसर से नहीं चूकता। अपने दल की उन्नति में बराबर लगा ही रहता। इस तरह गोली के बाप के मर जाने पर-जो एक चतुर नट था-मैकू ने उसकी खेल की पिटारी के साथ गोली पर भी अधिकार जमाया। गोली महुअर तो बजाता ही था, पर बेला का साथ होने पर उसने बाँसुरी बजाने में अभ्यास किया। पहले तो उसकी नट-विद्या में बेला भी मनोयोग से लगी; किंतु दोनों को भानुमती वाली पिटारी ढोकर दो-चार पैसे कमाना अच्छा न लगा। दोनों को मालूम हुआ कि दर्शक उस खेल से अधिक उसका गाना पसंद करते हैं। दोनों का झुकाव उसी ओर हुआ। पैसा भी मिलने लगा। इन नवागंतुक बाहरियों की कंजरों के दल में प्रतिष्ठा बढ़ी।

बेला साँवली थी। जैसे पावस की मेघमाला में छिपे हुए आलोकपिंड का प्रकाश निखरने की अदम्य चेष्टा कर रहा हो, वैसे ही उसका यौवन सुगठित शरीर के भीतर उद्वेलित हो रहा था। गोली के स्नेह की मदिरा से उसकी कजरारी आँखें लाली से भरी रहतीं। वह चलती तो थिरकती हुई, बातें करती तो हँसती हुई। एक मिठास उसके चारों ओर बिखरी रहती। फिर भी गोली से अभी उसका ब्याह नहीं हुआ था।

गोली जब बाँसुरी बजाने लगता, तब बेला के साहित्यहीन गीत जैसे प्रेम के माधुर्य की व्याख्या करने लगते। गाँव के लोग उसके गीतों के लिए कंजरों को शीघ्र हटाने का उद्योग नहीं करते! जहाँ अपने सदस्यों के कारण कंजरों का वह दल घृणा और भय का पात्र था, वहाँ गोली और बेला का संगीत आकर्षण के लिए पर्याप्त था; किंतु इसी में एक व्यक्ति का अवांछनीय सहयोग भी आवश्यक था। वह था भूरे, छोटी-सी ढोल लेकर उसे भी बेला का साथ करना पड़ता।

भूरे सचमुच भूरा भेडिय़ा था। गोली अधरों से बाँसुरी लगाए अर्द्धनिमीलित आँखों के अंतराल से, बेला के मुख को देखता हुआ जब हृदय की फूँक से बाँस के टुकड़े को अनुप्राणित कर देता, तब विकट घृणा से ताड़ित होकर भूरे की भयानक थाप ढोल पर जाती। क्षण-भर के लिए जैसे दोनों चौंक उठते।

उस दिन ठाकुर के गढ़ में बेला का दल गाने के लिए गया था। पुरस्कार में कपड़े-रुपये तो मिले ही थे; बेला को एक अँगूठी भी मिली थी। मैकू उन सबको देखकर प्रसन्न हो रहा था। इतने में सिरकी के बाहर कुछ हल्ला सुनाई पड़ा। मैकू ने बाहर आकर देखा कि भूरे और गोली में लड़ाई हो रही थी। मैकू के कर्कश स्वर से दोनों भयभीत हो गए। गोली ने कहा- ”मैं बैठा था, भूरे ने मुझको गालियाँ दीं। फिर भी मैं न बोला, इस पर उसने मुझे पैर से ठोकर लगा दी।”

”और यह समझता है कि मेरी बाँसुरी के बिना बेला गा ही नहीं सकती। मुझसे कहने लगा कि आज तुम ढोलक बेताल बजा रहे थे।” भूरे का कंठ क्रोध से भर्राया हुआ था।

मैकू हँस पड़ा। वह जानता था कि गोली युवक होने पर भी सुकुमार और अपने प्रेम की माधुरी में विह्वल, लजीला और निरीह था। अपने को प्रमाणित करने की चेष्टा उसमें थी ही नहीं। वह आज जो कुछ उग्र हो गया, इसका कारण है केवल भूरे की प्रतिद्वन्द्विता।

बेला भी वहाँ आ गई थी। उसने घृणा से भूरे की ओर देखकर कहा-

‘तो क्या तुम सचमुच बेताल नहीं बजा रहे थे?’

”मैं बेताल न बजाऊँगा, तो दूसरा कौन बजायेगा। अब तो तुमको नए यार न मिले हैं। बेला! तुझको मालूम नहीं तेरा बाप मुझसे तेरा ब्याह ठीक करके मरा है। इसी बात पर मैंने उसे अपना नैपाली का दोगला टट्टू दे दिया था, जिस पर अब भी तू चढक़र चलती है।” भूरे का मुँह क्रोध के झाग से भर गया था। वह और भी कुछ बकता; किंतु मैकू की डाँट पड़ी। सब चुप हो गए।

उस निर्जन प्रांत में जब अंधकार खुले आकाश के नीचे तारों से खेल रहा था, तब बेला बैठी कुछ गुनगुना रही थी।

कंजरों की झोंपड़ियों के पास ही पलाश का छोटा-सा जंगल था। उनमें बेला के गीत गूँज रहे थे। जैसे कमल के पास मधुकर को जाने से कोई रोक नहीं सकता; उसी तरह गोली भी कब माननेवाला था। आज उसके निरीह हृदय में संघर्ष के कारण आत्मविश्वास का जन्म हो गया था। अपने प्रेम के लिए, अपने वास्तविक अधिकार के लिए झगड़ने की शक्ति उत्पन्न हो गई थी। उसका छुरा कमर में था। हाथ में बाँसुरी थी। बेला की गुनगुनाहट बंद होते ही बाँसुरी में गोली उसी तान को दुहराने लगा। दोनों वन-विहंगम की तरह उस अँधेरे कानन में किलकारने लगे। आज प्रेम के आवेश ने आवरण हटा दिया था, वे नाचने लगे। आज तारों की क्षीण ज्योति में हृदय-से-हृदय मिले, पूर्ण आवेग में। आज बेला के जीवन में यौवन का और गोली के हृदय में पौरुष का प्रथम उन्मेष था।

किंतु भूरा भी वहाँ आने से नहीं रुका। उसके हाथ में भी भयानक छुरा था। आलिंगन में आबद्ध बेला ने चीत्कार किया। गोली छटककर दूर जा खड़ा हुआ, किंतु घाव ओछा लगा।

बाघ की तरह झपटकर गोली ने दूसरा वार किया। भूरे सम्हाल न सका। फिर तीसरा वार चलाना ही चाहता था कि मैकू ने गोली का हाथ पकड़ लिया। वह नीचे सिर किए खड़ा रहा।

मैकू ने कड़क कर कहा- ”बेला, भूरे से तुझे ब्याह करना ही होगा। यह खेल अच्छा नहीं।”

उसी क्षण सारी बातें गोली के मस्तक में छाया-चित्र-सी नाच उठीं। उसने छुरा धीरे से गिरा दिया। उसका हाथ छूट गया। जब बेला और मैकू भूरे का हाथ पकड़कर ले चले, तब गोली कहाँ जा रहा है, इसका किसी को ध्यान न रहा।

 

2

कंजर-परिवार में बेला भूरे की स्त्री मानी जाने लगी। बेला ने भी सिर झुका कर इसे स्वीकार कर लिया। परंतु उसे पलाश के जंगल में संध्या के समय जाने से कोई भी नहीं रोक सकता था। उसे जैसे सायंकाल में एक हलका-सा उन्माद हो जाता। भूरे या मैकू भी उसे वहाँ जाने से रोकने में असमर्थ थे। उसकी दृढ़ता-भरी आँखों से घोर विरोध नाचने लगता।

बरसात का आरंभ था। गाँव की ओर से पुलिस के पास कोई विरोध की सूचना भी नहीं मिली थी। गाँव वालों की छुरी-हँसिया और काठ-कबाड़ के कितने ही काम बनाकर वे लोग पैसे लेते थे। कुछ अन्न यों भी मिल जाता। चिड़ियाँ पकड़कर, पक्षियों का तेल बनाकर, जड़ी-बूटी की दवा तथा उत्तेजक औषधियों और मदिरा का व्यापार करके, कंजरों ने गाँव तथा गढ़ के लोगों से सद्‌भाव भी बना लिया था। सबके ऊपर आकर्षक बाँसुरी जब उसके साथ नहीं बजती थी, तब भी बेला के गले में एक ऐसी नई टीस उत्पन्न हो गई थी, जिसमें बाँसुरी का स्वर सुनाई पड़ता था।

अंतर में भरे हुए निष्फल प्रेम से युवती का सौंदर्य निखर आया था। उसके कटाक्ष अलस, गति मदिर और वाणी झंकार से भर गई थी। ठाकुर साहब के गढ़ में उसका गाना प्राय – हुआ करता था।

छींट का घाघरा और चोली, उस पर गोटे से ढँकी हुई ओढ़नी सहज ही खिसकती रहती। कहना न होगा कि आधा गाँव उसके लिए पागल था। बालक पास से, युवक ठीक-ठिकाने से और बूढ़े अपनी मर्यादा, आदर्शवादिता की रक्षा करते हुए दूर से उसकी तान सुनने के लिए, एक झलक देखने के लिए घात लगाए रहते।

गढ़ के चौक में जब उसका गाना जमता, तो दूसरा काम करते हुए अन्यमनस्कता की आड़ में मनोयोग से और कनखियों से ठाकुर उसे देख लिया करते।

मैकू घाघ था। उसने ताड़ लिया। उस दिन संगीत बंद होने पर पुरस्कार मिल जाने पर और भूरे के साथ बेला के गढ़ के बाहर जाने पर भी मैकू वहीं थोड़ी देर तक खड़ा रहा। ठाकुर ने उसे देखकर पूछा-‘क्या है?’

”सरकार! कुछ कहना है।”

”क्या?”

”यह छोकरी इस गाँव से जाना नहीं चाहती। उधर पुलिस तंग कर रही है।”

”जाना नहीं चाहती, क्यों?”

”वह तो घूम-घाम कर गढ़ में आ जाती है। खाने को मिल जाता है।…”

मैकू आगे की बात चुप होकर कुछ-कुछ संकेत-भरी मुस्कराहट से कह देना चाहता था।

ठाकुर के मन में हलचल होने लगी। उसे दबाकर प्रतिष्ठा का ध्यान करके ठाकुर ने कहा-

”तो मैं क्या करूँ?”

”सरकार! वह तो साँझ होते ही पलाश के जंगल में अकेली चली जाती है। वहीं बैठी हुई बड़ी रात तक गाया करती है।”

”हूँ!”

”एक दिन सरकार धमका दें, तो हम लोग उसे ले-देकर आगे कहीं चले जायँ।”

”अच्छा।”

मैकू जाल फैलाकर चला आया। एक हजार की बोहनी की कल्पना करते वह अपनी सिरकी में बैठकर हुक्का गुड़गुड़ाने लगा।

बेला के सुंदर अंग की मेघ-माला प्रेमराशि की रजत-रेखा से उद्‌भासित हो उठी थी। उसके हृदय में यह विश्वास जम गया था कि भूरे के साथ घर बसाना गोली के प्रेम के साथ विश्वासघात करना है। उसका वास्तविक पति तो गोली ही है। बेला में यह उच्छृंखल भावना विकट तांडव करने लगी। उसके हृदय में वसंत का विकास था। उमंग में मलयानिल की गति थी। कंठ में वनस्थली की काकली थी। आँखों में कुसुमोत्सव था और प्रत्येक आंदोलन में परिमल का उद्गार था। उसकी मादकता बरसाती नदी की तरह वेगवती थी।

आज उसने अपने जूड़े में जंगली करौंदे के फूलों की माला लपेटकर, भरी मस्ती में जंगल की ओर चलने के लिए पैर बढ़ाया, तो भूरे ने डाँटकर कहा-”कहाँ चली?”

”यार के पास।” उसने छूटते ही कहा। बेला के सहवास में आने पर अपनी लघुता को जानते हुए मसोसकर भूरे ने कहा-”तू खून कराए बिना चैन न लेगी।”

बेला की आँखों में गोली का और उसके परिवर्धमान प्रेमांकुर का चित्र था, जो उसके हट जाने पर विरह-जल से हरा-भरा हो उठा था। बेला पलाश के जंगल में अपने बिछुड़े हुए प्रियतम के उद्देश्य से दो-चार विरह-वेदना की तानों की प्रतिध्वनि छोड़ आने का काल्पनिक सुख नहीं छोड़ सकती थी।

उस एकांत संध्या में बरसाती झिल्लियों की झनकार से वायुमंडल गूँज रहा था। बेला अपने परिचित पलाश के नीचे बैठकर गाने लगी-

चीन्हत नाहीं बदल गए नैना….

ऐसा मालूम होता था कि सचमुच गोली उस अंधकार में अपरिचित की तरह मुँह फिराकर चला जा रहा है। बेला की मनोवेदना को पहचानने की क्षमता उसने खो दी है।

बेला का एकांत में विरह-निवेदन उसकी भाव-प्रवणता को और भी उत्तेजित करता था। पलाश का जंगल उसकी कातर कुहुक से गूँज रहा था। सहसा उस निस्तब्धता को भंग करते हुए घोड़े पर सवार ठाकुर साहब वहाँ आ पहुँचे।

”अरे बेला! तू यहाँ क्या कर रही है?”

बेला की स्वर-लहरी रुक गई थी। उसने देखा ठाकुर साहब! महत्त्व का संपूर्ण चित्र, कई बार जिसे उसने अपने मन की असंयत कल्पना में दुर्गम शैल-शृंग समझकर अपने भ्रम पर अपनी हँसी उड़ा चुकी थी। वह सकुच कर खड़ी हो रही। बोली नहीं, मन में सोच रही थी-”गोली को छोड़कर भूरे के साथ रहना क्या उचित है? और नहीं तो फिर….”

ठाकुर ने कहा-”तो तुम्हारे साथ कोई नहीं है। कोई जानवर निकल आवे, तो?”

बेला खिलखिला कर हँस पड़ी। ठाकुर का प्रमाद बढ़ चला था। घोड़े से झुककर उसका कंधा पकड़ते हुए कहा, ”चलो, तुमको पहुँचा दें।”

उसका शरीर काँप रहा था, और ठाकुर आवेश में भर रहे थे। उन्होंने कहा-”बेला, मेरे यहाँ चलोगी?”

”भूरे मेरा पति है!” बेला के इस कथन में भयानक व्यंग था। वह भूरे से छुटकारा पाने के लिए तरस रही थी। उसने धीरे से अपना सिर ठाकुर की जाँघ से सटा दिया। एक क्षण के लिए दोनों चुप थे। फिर उसी समय अंधकार में दो मूर्तियों का प्रादुर्भाव हुआ। कठोर कंठ से भूरे ने पुकारा-”बेला!”

ठाकुर सावधान हो गए थे। उनका हाथ बगल की तलवार की मूठ पर जा पड़ा। भूरे ने कहा-”जंगल में किसलिए तू आती थी, यह मुझे आज मालूम हुआ। चल, तेरा खून पिये बिना न छोड़ूँगा।”

ठाकुर के अपराध का आरंभ तो उनके मन में हो ही चुका था। उन्होंने अपने को छिपाने का प्रयत्न छोड़ दिया। कड़ककर बोले-”खून करने के पहले अपनी बात भी सोच लो, तुम मुझ पर संदेह करते हो, तो यह तुम्हारा भ्रम है। मैं तो….”

अब मैकू आगे आया। उसने कहा-”सरकार! बेला अब कंजरों के दल में नहीं रह सकेगी।”

”तो तुम क्या कहना चाहते हो?” ठाकुर साहब अपने में आ रहे थे, फिर भी घटना-चक्र से विवश थे।

”अब यह आपके पास रह सकती है। भूरे इसे लेकर हम लोगों के संग नहीं रह सकता।” मैकू पूरा खिलाड़ी था। उसके सामने उस अंधकार में रुपये चमक रहे थे।

ठाकुर को अपने अहंकार का आश्रय मिला। थोड़ा-सा विवेक, जो उस अंधकार में झिलमिला रहा था, बुझ गया। उन्होंने कहा-

”तब तुम क्या चाहते हो?”

”एक हजार।”

”चलो, मेरे साथ”-कहकर बेला का हाथ पकड़कर ठाकुर ने घोड़े को आगे बढ़ाया। भूरे कुछ भुनभुना रहा था; पर मैकू ने उसे दूसरी ओर भेजकर ठाकुर का संग पकड़ लिया। बेला रिकाब पकड़े चली जा रही थी।

दूसरे दिन कंजरों का दल उस गाँव से चला गया।

 

3

ऊपर की घटना को कई साल बीत गए। बेला ठाकुर साहब की एकमात्र प्रेमिका समझी जाती है। अब उसकी प्रतिष्ठा अन्य कुल-बधुओं की तरह होने लगी है। नए उपकरणों से उसका घर सजाया गया है। उस्तादों से गाना सीखा है। गढ़ के भीतर ही उसकी छोटी-सी साफ-सुथरी हवेली है। ठाकुर साहब की उमंग की रातें वहीं कटती हैं। फिर भी ठाकुर कभी-कभी प्रत्यक्ष देख पाते कि बेला उनकी नहीं है! वह न जाने कैसे एक भ्रम में पड़ गए। बात निबाहने की आ पड़ी।

एक दिन एक नट आया। उसने अनेक तरह के खेल दिखलाए। उसके साथ उसकी स्त्री थी, वह घूँघट ऊँचा नहीं करती थी। खेल दिखलाकर जब अपनी पिटारी लेकर जाने लगा, तो कुछ मनचले लोगों ने पूछा-

”क्यों जी, तुम्हारी स्त्री कोई खेल नहीं करती क्या?”

”करती तो है सरकार! फिर किसी दिन दिखलाऊँगा।” कहकर वह चला गया; किंतु उसकी बाँसुरी की धुन बेला के कानों में उन्माद का आह्वान सुना रही थी। पिंजड़े की वन-विहंगनी को वसंत की फूली हुई डाली का स्मरण हो आया था।

दूसरे दिन गढ़ में भारी जमघट लगा। गोली का खेल जम रहा था। सब लोग उसके हस्त-कौशल में मुग्ध थे। सहसा उसने कहा-

”सरकार! एक बड़ा भारी दैत्य आकाश में आ गया है, मैं उससे लड़ने जाता हूँ, मेरी स्त्री की रक्षा आप लोग कीजिएगा।”

गोली ने एक डोरी निकालकर उसको ऊपर आकाश की ओर फेंका। वह सीधी तन गई। सबके देखते-देखते गोली उसी के सहारे आकाश में चढक़र अदृश्य हो गया। सब लोग मुग्ध होकर भविष्य की प्रतीक्षा कर रहे थे। किसी को यह ध्यान नहीं रहा कि स्त्री अब कहाँ है?

गढ़ के फाटक की ओर सबकी दृष्टि फिर गई। गोली लहू से रंगा चला आ रहा था। उसने आकर ठाकुर को सलाम किया और कहा-”सरकार! मैंने उस दैत्य को हरा दिया। अब मुझे इनाम मिलना चाहिए।”

सब लोग उस पर प्रसन्न होकर पैसों-रुपयों की बौछार करने लगे। उसने झोली भरकर इधर-उधर देखा, फिर कहा-”सरकार मेरी स्त्री भी अब मिलनी चाहिए, मैं भी…।” किंतु यह क्या, वहाँ तो उसकी स्त्री का पता नहीं। गोली सिर पकड़कर शोक-मुद्रा में बैठ गया। जब खोजने पर उसकी स्त्री नहीं मिली, तो उसने चिल्लाकर कहा-”यह अन्याय इस राज्य में नहीं होना चाहिए। मेरी सुंदरी स्त्री को ठाकुर साहब ने गढ़ के भीतर कहीं छिपा दिया। मेरी योगिनी कह रही है।” सब लोग हँसने लगे। लोगों ने समझा, यह कोई दूसरा खेल दिखलाने जा रहा है। ठाकुर ने कहा-”तो तू अपनी सुंदर स्त्री मेरे गढ़ में से खोज ला!” अंधकार होने लगा था। उसने जैसे घबड़ाकर चारों ओर देखने का अभिनय किया। फिर आँख मूँदकर सोचने लगा।

लोगों ने कहा-”खोजता क्यों नहीं? कहाँ है तेरी सुंदरी स्त्री?”

”तो जाऊँ न सरकार?”

”हाँ, हाँ, जाता क्यों नहीं”-ठाकुर ने भी हँसकर कहा।

गोली  नई हवेली की ओर चला। वह नि -शंक भीतर चला गया। बेला बैठी हुई तन्मय भाव से बाहर की भीड़ झरोखे से देख रही थी। जब उसने गोली को समीप आते देखा, तो वह काँप उठी। कोई दासी वहाँ न थी। सब खेल देखने में लगी थीं। गोली ने पोटली फेंककर कहा-”बेला! जल्द चलो।”

बेला के हृदय में तीव्र अनुभूति जाग उठी थी। एक क्षण में उस दीन भिखारी की तरह-जो एक मुट्ठी भीख के बदले अपना समस्त संचित आशीर्वाद दे देना चाहता है-वह वरदान देने के लिए प्रस्तुत हो गई। मन्त्र-मुग्ध की तरह बेला ने उस ओढ़नी का घूँघट बनाया। वह धीरे-धीरे उसके पीछे भीड़ में आ गई। तालियाँ पिटीं। हँसी का ठहाका लगा। वही घूँघट, न खुलने वाला घूँघट सायंकालीन समीर से हिल कर रह जाता था। ठाकुर साहब हँस रहे थे। गोली दोनों हाथों से सलाम कर रहा था।

रात हो चली थी। भीड़ के बीच गोली बेला को लिए जब फाटक के बाहर पहुँचा, तब एक लड़के ने आकर कहा-”एक्का ठीक है।”

तीनों सीधे उस पर जाकर बैठ गए। एक्का वेग से चल पड़ा।

अभी ठाकुर साहब का दरबार जम रहा था और नट के खेलों की प्रशंसा हो रही थी।

 

 

‘इंद्रजाल’ का अर्थ

कहानी में ‘इंद्रजाल’ शब्द के दो अर्थ निकलते हैं –

प्रत्यक्ष अर्थ – नायक गोली द्वारा दिखाई गई नट-विद्या (जादू का खेल), जिसकी आड़ में वह नायिका को मुक्त कराता है।

सांकेतिक अर्थ – समाज का वह छल-कपट और मायाजाल जहाँ शक्तिशाली लोग गरीबों की भावनाओं और देह का सौदा करते हैं।

जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘इंद्रजाल’ केवल एक मनोरंजन प्रदान करने वाली नट-कथा नहीं है, बल्कि यह जीवन और समाज के कई गंभीर पहलुओं को उजागर करती है। इस कहानी के प्रमुख सीख निम्नलिखित हैं –

1. सच्चे प्रेम की अटूट शक्ति

इस कहानी का सबसे बड़ा संदेश यह है कि सच्चा प्रेम समय, दूरी और विषम परिस्थितियों के बावजूद जीवित रहता है। बेला और गोली वर्षों तक एक-दूसरे से दूर रहे, बेला भौतिक सुख-सुविधाओं और सामंती बंधनों में रही, लेकिन उसका मन विचलित नहीं हुआ। यह सीख मिलती है कि प्रेम केवल शारीरिक आकर्षण नहीं, बल्कि आत्मा का जुड़ाव है।

2. कला और बुद्धि का सामर्थ्य

गोली ने अपनी नट-विद्या (इंद्रजाल) का उपयोग केवल पैसे कमाने के लिए नहीं, बल्कि एक महान उद्देश्य (बेला की मुक्ति) के लिए किया। यह सिखाता है कि कला और बुद्धिमानी बड़े-से-बड़े शारीरिक बल और सत्ता को पराजित कर सकती है। जहाँ ठाकुर की तलवार काम न आई, वहाँ गोली की बुद्धि जीत गई।

3. शोषण के विरुद्ध आवाज़ और साहस

कहानी समाज के शोषित वर्ग (कंजर और नट) के संघर्ष को दिखाती है। मैकू द्वारा बेला का सौदा करना और ठाकुर द्वारा उसे कैद करना ‘सत्ता के अहंकार’ को दर्शाता है। गोली का अंत में जोखिम उठाकर गढ़ में घुसना यह सिखाता है कि अपनी स्वतंत्रता और अधिकारों के लिए लड़ना और साहस दिखाना अनिवार्य है।

4. धन और वैभव से हृदय नहीं जीता जा सकता

ठाकुर साहब ने बेला को हर सुख-सुविधा दी, महलों में रखा और संगीत सिखाया, फिर भी बेला उनकी नहीं हो सकी। यह एक महत्त्वपूर्ण सीख है कि भौतिक संपदा से किसी का शरीर तो खरीदा जा सकता है, लेकिन उसका हृदय और निष्ठा नहीं।

5. सामाजिक क्रूरता और नैतिकता का बोध

मैकू जैसे पात्रों के माध्यम से कहानी यह सचेत करती है कि समाज में कुछ लोग अपनी भूख और लालच के लिए दूसरों की भावनाओं की बलि चढ़ा देते हैं। यह हमें मानवीय मूल्यों और नैतिकता के प्रति संवेदनशील होने की प्रेरणा देती है।

6. स्वतंत्रता का मूल्य

बेला के लिए गढ़ की हवेली एक ‘सुनहरा पिंजरा’ थी। उसे सुखों से अधिक अपनी आज़ादी और अपनी जड़ों (गोली और संगीत) से प्रेम था। यह संदेश देता है कि मनुष्य के लिए स्वाधीनता से बढ़कर कोई सुख नहीं है।

  1. प्रेम की विजय और कला का सामर्थ्य

कहानी का सबसे प्रमुख केंद्र बिंदु गोली और बेला का निश्छल प्रेम है।

  • यह प्रेम सामाजिक बाधाओं, गरीबी और क्रूरता के बीच भी जीवित रहता है।
  • कहानी के अंत में गोली अपनी नट-विद्या (कला) के माध्यम से ‘इंद्रजाल’ रचता है और ठाकुर की कैद से बेला को मुक्त कराता है। यह दिखाता है कि कला और सच्चा प्रेम किसी भी सत्ता या धन की शक्ति को पराजित कर सकते हैं।
  1. कंजर समुदाय का संघर्ष और यथार्थ

प्रसाद जी ने इस घुमक्कड़ जाति के जीवन का बहुत ही कठोर यथार्थ चित्रित किया है।

  • मैकू जैसे पात्रों के माध्यम से समाज की उस निर्दयता को दिखाया गया है जहाँ भूख और लालच के आगे मानवीय रिश्ते गौण हो जाते हैं।
  • एक पिता अपनी बेटी का सौदा टट्टू के लिए करता है और एक सरदार (मैकू) बेला को एक हज़ार रुपये के लिए बेच देता है। यह समाज की नैतिकता के खोखलेपन को उजागर करता है।
  1. पुरुष प्रधान सत्ता और स्त्री की पराधीनता

कहानी का एक महत्त्वपूर्ण बिंदु स्त्री की वस्तु स्थिति (Objectification) है।

  • बेला एक प्रभावशाली गायिका और सुंदरी है, लेकिन उसका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। पहले मैकू और भूरे उसे अपनी संपत्ति समझते हैं, और बाद में ठाकुर साहब उसे ‘खरीद’ लेते हैं।
  • बेला के पास प्रतिभा है, पर उसकी स्वाधीनता का निर्णय पुरुष (मैकू या ठाकुर) लेते हैं। अंत में गोली के साथ उसका भागना, इस पुरुष प्रधान व्यवस्था और गुलामी से उसकी ‘मुक्ति’ का प्रतीक है।
  1. इंद्रजाल (भ्रम और वास्तविकता का द्वंद्व)

कहानी का शीर्षक ‘इंद्रजाल’ स्वयं में एक गहरा केंद्र बिंदु है।

  • नट विद्या का जाल – गोली जो खेल दिखाता है (आकाश में चढ़ना, लहू से रंगा आना), वह एक दृष्टि-भ्रम है।
  • जीवन का जाल – ठाकुर साहब का यह सोचना कि वे बेला के शरीर को खरीदकर उसका प्रेम पा लेंगे, यह भी एक इंद्रजाल (भ्रम) ही था।

अंत में, गोली वास्तविक इंद्रजाल रचकर सबको भ्रम में डाल देता है और अपनी वास्तविकता (बेला) को लेकर चला जाता है।

  1. बेला (नायिका)

बेला कहानी की केंद्रीय पात्र है। वह एक ‘बेड़िन’ है, जो अपनी माता के संगीत संस्कार लेकर कंजरों के दल में शामिल हुई थी।

  • संगीत प्रेमी और सुरीली – बेला का गाना इतना प्रभावशाली है कि लोग उसे सुनने के लिए कंजरों के प्रति अपनी घृणा भी भूल जाते हैं।
  • रूपवती और आकर्षक – उसका सौंदर्य प्राकृतिक और मादक है, जिससे आधा गाँव उसके लिए पागल रहता है।
  • एकनिष्ठ प्रेमिका – यद्यपि परिस्थितिवश उसे भूरे की पत्नी बनना पड़ा और बाद में ठाकुर की हवेली में रहना पड़ा, लेकिन उसका हृदय सदा गोली के लिए ही धड़कता रहा।
  • समर्पण की भावना – अंत में वह सब कुछ छोड़कर गोली के साथ भागने का साहस दिखाती है, जो उसके सच्चे प्रेम को सिद्ध करता है।
  1. गोली (नायक)

गोली एक चतुर नट और बाँसुरी बजाने वाला युवक है।

  • कुशल नट और संगीतकार – वह ‘इंद्रजाल’ (जादू) दिखाने में निपुण है। बेला के गीतों के साथ उसकी बाँसुरी का स्वर अद्भुत वातावरण बनाता है।
  • निरीह परंतु साहसी – प्रारंभ में वह बहुत सीधा और लजीला है, लेकिन अपने प्रेम (बेला) के लिए वह भूरे जैसे क्रूर व्यक्ति पर छुरे से वार करने का साहस भी दिखाता है।
  • बुद्धिमान और धैर्यवान – वह कई वर्षों तक बेला से बिछड़ा रहता है, लेकिन हिम्मत नहीं हारता। अंत में अपनी नट-विद्या (जादू) के जाल में सबको उलझाकर वह बेला को मुक्त करा ले जाता है।
  1. मैकू (दल का सरदार)

मैकू कंजरों के दल का मुखिया है, जो अत्यंत क्रूर और धूर्त है।

  • निर्दय और कठोर – दया-माया उससे कोसों दूर है। वह अपने दल के फायदे के लिए कुछ भी कर सकता है।
  • अवसरवादी और लालची – वह बेला के सौंदर्य और कला का सौदा करता है। ठाकुर से एक हजार रुपये लेकर वह बेला को उनके हवाले कर देता है।
  • धूर्त (घाघ) – वह लोगों की कमज़ोरियों को ताड़ने में माहिर है। वह ठाकुर की बेला के प्रति आसक्ति को पहचान लेता है और जाल बुनकर लाभ कमाता है।
  1. भूरे

भूरे कंजर दल का एक अन्य सदस्य है जो बेला के साथ ढोलक बजाता है।

  • ईर्ष्यालु और क्रूर – वह गोली और बेला के प्रेम से जलता है। वह गोली पर छुरे से हमला करता है।
  • अधिकारवादी – वह बेला पर अपना अधिकार समझता है क्योंकि उसने बेला के पिता को एक टट्टू देकर रिश्ता पक्का किया था।
  • पशुवत स्वभाव – मैकू उसे ‘भूरा भेड़िया’ कहता है, जो उसकी हिंसक प्रवृत्ति को दर्शाता है।
  1. ठाकुर साहब

गाँव के प्रभावशाली व्यक्ति और गढ़ के मालिक।

  • विलासी और आसक्त – वे बेला के रूप और संगीत पर मोहित हो जाते हैं। अपनी मर्यादा और प्रतिष्ठा को ताक पर रखकर वे एक कंजर लड़की (बेला) को अपनी हवेली में रख लेते हैं।

अहंकारी – वे समझते हैं कि धन और सत्ता से वे बेला को अपना बना लेंगे, लेकिन अंत में वे गोली के ‘इंद्रजाल’ (नट-विद्या) के सामने पराजित होते हैं और बेला उनके हाथ से निकल जाती है।

क्र.सं.

शब्द (Hindi)

हिंदी अर्थ (Hindi Meaning)

English Meaning

1

इंद्रजाल

मायाजाल, जादू

Illusion / Magic

2

बंजर

अनुपजाऊ भूमि

Barren land

3

प्राणी

जीव, मनुष्य

Living beings / Creatures

4

निर्देयता

क्रूरता

Cruelty / Ruthlessness

5

दंड

सजा

Punishment

6

नित्य

रोज़ाना

Daily / Constant

7

संपर्क

मेल-जोल

Contact / Association

8

स्वर्गीय

सुखद, दिव्य

Heavenly / Divine

9

घुमक्कड़

घूमने वाले

Nomads / Wanderers

10

अकर्मण्य

आलसी

Idle / Lazy

11

संस्कार

प्रभाव, गुण

Impressions / Heritage

12

अनुकरण

नक़ल करना

Imitation

13

अलापना

सुर छेड़ना

To chant / To hum

14

मनोयोग

ध्यान से

Attentively / Devotion

15

प्रतिष्ठा

सम्मान

Prestige / Status

16

अदम्य

जिसे दबाया न जा सके

Indomitable / Irrepressible

17

चेष्टा

कोशिश

Effort / Attempt

18

उद्वेलित

उमड़ता हुआ

Agitated / Overflowing

19

माधुर्य

मिठास

Sweetness / Melodiousness

20

अवांछनीय

जो चाहा न गया हो

Undesirable

21

अर्द्धनिमीलित

आधी खुली (आँखें)

Half-closed

22

ताड़ित

पीटा हुआ / प्रताड़ित

Beaten / Stricken

23

प्रतिद्वन्द्विता

दुश्मनी, मुकाबला

Rivalry / Competition

24

निरीह

सीधा-सादा

Innocent / Meek

25

सुकुमार

कोमल

Delicate / Tender

26

विह्वल

व्याकुल

Overwhelmed / Distraught

27

उग्र

तेज, भयानक

Fierce / Aggressive

28

कर्कश

कड़वा, कठोर

Harsh / Grating

29

निर्जन

सुनसान

Desolate / Lonely

30

कानन

जंगल

Forest

31

उन्मेष

प्रकटीकरण

Awakening / Manifestation

32

आलिंगन

गले मिलना

Embrace / Hug

33

चीत्कार

चीख

Scream / Shriek

34

उन्माद

पागलपन

Frenzy / Madness

35

असमर्थ

लाचार

Incapable

36

सद्‌भाव

अच्छी भावना

Goodwill / Amity

37

उत्तेजक

जोश दिलाने वाला

Stimulating / Provocative

38

निष्फल

बेकार

Fruitless / Futile

39

कटाक्ष

तिरछी नज़र

Glance / Sarcasm

40

अन्यमनस्कता

ध्यान कहीं और होना

Absent-mindedness

41

पुरस्कार

इनाम

Reward / Prize

42

आसक्ति

लगाव, मोह

Attachment / Passion

43

उच्छृङ्खल

मनमौजी, बेलगाम

Unrestrained / Wild

44

काकली

चिड़ियों की मधुर आवाज़

Sweet chirping

45

कुसुमोत्सव

फूलों का उत्सव

Flower festival

46

परिमल

सुगंध

Fragrance / Aroma

47

विवश

मजबूर

Helpless / Compelled

48

अहंकार

घमंड

Ego / Pride

49

उपकरण

साधन, सामान

Equipment / Gadgets

50

विहंगनी

पक्षी (स्त्री)

Female bird

51

हस्त-कौशल

हाथ की सफाई

Manual dexterity

52

अदृश्य

जो दिखाई न दे

Invisible

53

प्रतीक्षा

इंतज़ार

Waiting / Anticipation

54

अन्याय

बेइंसाफी

Injustice

55

तन्मय

मगन होना

Engrossed / Absorbed

56

झरोखा

छोटी खिड़की

Casement / Window

57

अनुभूति

एहसास

Perception / Feeling

58

सञ्चित

इकट्ठा किया हुआ

Accumulated / Stored

59

प्रस्तुत

तैयार

Ready / Prepared

60

मन्त्र-मुग्ध

सम्मोहित

Spellbound / Mesmerized

61

समीर

हवा

Breeze

62

वेग

रफ़्तार

Speed / Momentum

63

प्रशंसा

तारीफ़

Praise / Appreciation

64

हल्ला

शोर

Noise / Commotion

65

भयभीत

डरा हुआ

Terrified / Scared

66

कंठ

गला

Throat / Voice

67

प्रमाणित

सिद्ध करना

To prove / Authenticate

68

संघर्ष

लड़ाई

Struggle / Conflict

69

आत्मविश्वास

खुद पर भरोसा

Self-confidence

70

आवरण

पर्दा, ढक्कन

Veil / Covering

71

आवेश

जोश

Passion / Impulse

72

ज्योति

प्रकाश

Light / Flame

73

पौरुष

मर्दानगी

Manliness / Valor

74

आबद्ध

बंधा हुआ

Bound / Tied

75

दृश्य

नज़ारा

Sight / Scene

76

सूचना

खबर

Information / Notice

77

मदिरा

शराब

Wine / Liquor

78

व्यापार

धंधा

Business / Trade

79

मदिर

नशीला

Intoxicating

80

प्रतिष्ठा

मान-मर्यादा

Status / Honor

81

आदर्शवादिता

सिद्धांतों पर चलना

Idealism

82

मनोयोग

एकाग्रता

Concentration

83

घाघ

चालाक

Cunning / Shrewd

84

संकेत

इशारा

Signal / Hint

85

मुस्कराहट

मुस्कान

Smile

86

हलचल

खलबली

Commotion / Stir

87

बोहनी

दिन की पहली बिक्री

First sale of the day

88

रजत-रेखा

चाँदी की लकीर

Silver lining

89

उद्‌भासित

प्रकाशित

Illuminated

90

तांडव

भयानक नृत्य

Destructive dance

91

परिवर्धमान

बढ़ता हुआ

Ever-growing

92

प्रतिध्वनि

गूँज

Echo

93

काल्पनिक

खयाली

Imaginary

94

वायुमंडल

वातावरण

Atmosphere

95

अपरिचित

अनजाना

Stranger / Unknown

96

क्षमता

ताकत

Capability / Potential

97

कातर

भयभीत, दीन

Timid / Distressed

98

निस्तब्धता

सन्नाटा

Silence / Stillness

99

प्रमाद

आलस्य, नशा

Intoxication / Negligence

100

जाँघ

पैर का ऊपरी हिस्सा

Thigh

101

प्रादुर्भाव

प्रकट होना

Appearance / Emergence

102

संदेह

शक

Doubt / Suspicion

103

विवेक

समझदारी

Wisdom / Prudence

104

अहंकार

घमण्ड

Pride / Vanity

105

आश्रय

सहारा

Shelter / Support

106

रिकाब

पैर रखने का पायदान

Stirrup

107

एकमात्र

केवल एक

Sole / Only

108

कुल-वधू

घर की बहू

Daughter-in-law

109

प्रत्यक्ष

आँखों के सामने

Direct / Evident

110

स्मरण

याद

Memory / Recollection

111

जमघट

भीड़

Gathering / Crowd

112

लहू

खून

Blood

113

बौछार

वर्षा

Shower / Volley

114

शोक-मुद्रा

दुखी चेहरा

Mournful pose

115

योगिनी

तपस्विनी

Female ascetic

116

निशंक

बिना डर के

Fearless / Confident

117

प्रच्छन्न

छिपा हुआ

Hidden / Secret

118

महुअर

बीन (वादयंत्र)

Pungi / Pipe instrument

119

भानुमती वाली पिटारी

जादू का डिब्बा

Box of tricks

120

नवागंतुक

नया आया हुआ

Newcomer

121

मेघमाला

बादलों की पंक्ति

String of clouds

122

आलोकपिंड

प्रकाश का गोला

Ball of light

123

तात्कालिक

उसी समय का

Immediate

124

उद्वेलित

उमड़ना

Agitated

125

सुकुमार

कोमल

Delicate

126

विह्वल

बेचैन

Overwhelmed

127

ताड़ना

भांप लेना

To perceive

128

विद्रोही

बग़ावती

Rebel

129

स्थायित्व

टिकाऊपन

Stability

130

झंकार

गूँज

Resonance

131

घाघरा

लंबी स्कर्ट

Skirt

132

अन्यमनस्कता

अनमनापन

Abstractedness

133

मलयानिल

शीतल हवा

Malayan breeze

134

उद्गार

बाहर आना

Expression

135

झिल्लियाँ

झींगुर

Crickets (insect)

136

स्वर-लहरी

धुन

Melody

137

प्रमाद

भूल, नशा

Negligence

138

व्यंग

ताना

Sarcasm

139

भुनभुनाना

धीमी आवाज़ में बोलना

To mutter

140

कुल-बधु

सम्भ्रान्त नारी

Noble lady

141

हवेली

बड़ी इमारत

Mansion

142

तन्मय

खोया हुआ

Engrossed

143

घूँघट

पर्दा

Veil

144

अनुप्रमाणित

प्रमाणित करना

Authenticated

145

विद्रूप

कुरूप

Deformed

146

साहित्यहीन

बिना शब्द के

Wordless

147

अवांछनीय

अनचाहा

Undesirable

148

किल्कारने

ज़ोर से चिल्लाना

To shout with joy

149

शैल-शृंग

पर्वत की चोटी

Mountain peak

150

समीर

मंद हवा

Light breeze

मुहावरा

अर्थ (Meaning)

कहानी में प्रयोग का संदर्भ

दया-माया न फटकना

तनिक भी दया न होना

सरदार मैकू की क्रूरता को दिखाने के लिए।

अवसर से न चूकना

मौका न गँवाना

मैकू का हमेशा चोरी या फायदे का रास्ता ढूँढना।

हवा से बातें करना

बहुत तेज़ रफ़्तार में होना

कहानी के अंत में एक्का (सवारी) की तेज़ गति के लिए।

आँख मूँदकर सोचना

ध्यान मग्न होना

गोली का नट-विद्या दिखाते समय एकाग्र होना।

ठहाका लगाना

ज़ोर से हँसना

जब भीड़ नट के खेल का मज़ा ले रही थी।

खून पीना

जान से मार डालना (अत्यधिक क्रोध)

भूरे का बेला के प्रति ईर्ष्या और गुस्सा।

घात लगाना

सही मौके का इंतज़ार करना

गाँव के युवकों का बेला की झलक पाने के लिए इंतज़ार करना।

आस्तीन का साँप

विश्वासघाती

(भावार्थ) अपनों द्वारा ही धोखा मिलने की स्थिति।

नाकों दम करना

बहुत परेशान करना

पुलिस का कंजरों के दल को तंग करना।

कुछ विशिष्ट प्रयोग और लोकोक्तियाँ

  1. “भानुमती वाली पिटारी” – इसका अर्थ है जादू का पिटारा या जिसमें से अजीबोगरीब चीजें निकलें। गोली अपनी नट-विद्या के सामान को इसी नाम से संबोधित करता है।
  2. “हृदय की फूँक से बाँस के टुकड़े को अनुप्राणित करना” – यह एक बहुत ही सुंदर साहित्यिक प्रयोग है। इसका अर्थ है— अपनी भावनाओं को बाँसुरी के संगीत के माध्यम से जीवित कर देना।
  3. “इंद्रजाल फैलाना” – भ्रम की स्थिति पैदा करना। कहानी के अंत में गोली इसी का प्रयोग कर बेला को निकाल ले जाता है।
  4. “बोहनी होना” – दिन की पहली बिक्री होना। मैकू जब बेला का सौदा ठाकुर से करता है, तब वह इसे अपनी बड़ी ‘बोहनी’ समझता है।

‘इंद्रजाल’ – विस्तृत सारांश

1. कंजरों का दल और मुख्य पात्र

कहानी की शुरुआत गाँव के बाहर पड़े कंजरों के एक दल से होती है। इस दल का सरदार मैकू है, जो एक अत्यंत निर्दयी और लालची व्यक्ति है। इसी दल में दो मुख्य पात्र हैं— बेला (एक सुंदर गायिका) और गोली (बाँसुरी बजाने वाला एक नट युवक)। बेला और गोली एक-दूसरे से प्रेम करते हैं। उनकी कला का संगम (गीत और बाँसुरी) गाँव वालों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

2. प्रेम, ईर्ष्या और संघर्ष

इस प्रेम कहानी में भूरे नाम का एक पात्र विलेन की भूमिका में है। भूरे ढोलक बजाता है और बेला पर अपना अधिकार समझता है, क्योंकि उसने बेला के पिता को एक टट्टू देकर बेला से विवाह का वादा लिया था। भूरे और गोली के बीच अक्सर तनाव रहता है। एक रात, पलाश के जंगल में जब बेला और गोली मिल रहे होते हैं, भूरे उन पर हमला कर देता है। मैकू बीच-बचाव करता है और अपनी क्रूरता दिखाते हुए फैसला सुनाता है कि बेला का ब्याह भूरे से ही होगा। गोली अपमानित होकर दल छोड़कर चला जाता है।

3. बेला का सौदा

बेला अब भूरे की पत्नी मानी जाने लगी, लेकिन उसका मन अब भी गोली की यादों में भटकता रहता। वह रोज़ शाम पलाश के जंगल में जाकर विरह के गीत गाती। गाँव के ठाकुर साहब बेला के रूप और संगीत पर मोहित थे। मैकू, जो एक शातिर (घाघ) इंसान था, उसने ठाकुर की इस आसक्ति को ताड़ लिया। एक रात जब बेला जंगल में अकेली थी, मैकू ने जाल बुना और ठाकुर के साथ मिलकर एक योजना बनाई। अंततः, मैकू ने ठाकुर से एक हज़ार रुपये लेकर बेला को उनके हवाले कर दिया। कंजरों का दल वहाँ से चला गया और बेला ठाकुर की हवेली की शोभा बन गई।

4. हवेली का जीवन और गोली की वापसी

कई साल बीत गए। बेला अब ठाकुर साहब की प्रिय प्रेमिका के रूप में सुख-सुविधाओं के बीच रहती थी, लेकिन वह अंदर से अकेली थी। उसे संगीत की शिक्षा दी गई, पर उसके गीतों में अब भी वही पुरानी टीस थी। एक दिन गाँव में एक नट आता है जो बहुत ही अद्भुत खेल दिखाता है। यह नट कोई और नहीं, बल्कि गोली था। वह अपना भेष बदलकर आया था और उसके साथ एक ढकी हुई स्त्री थी।

5. इंद्रजाल (क्लाइमेक्स)

अगले दिन गढ़ (ठाकुर की हवेली) के सामने भारी भीड़ जमा होती है। गोली अपनी नट-विद्या का सबसे बड़ा खेल ‘इंद्रजाल’ शुरू करता है। वह एक रस्सी आकाश की ओर फेंकता है और उस पर चढ़कर अदृश्य हो जाता है। कुछ देर बाद वह खून से लथपथ होकर वापस आता है और कहता है कि उसने दैत्य को मार दिया। फिर वह रोने का अभिनय करता है कि उसकी स्त्री को किसी ने छिपा लिया है।

ठाकुर साहब हँसकर उसे गढ़ के भीतर अपनी स्त्री खोजने की अनुमति दे देते हैं। गोली सीधे उस हवेली की ओर जाता है जहाँ बेला थी। बेला उसे पहचान लेती है और पुराने प्रेम के वेग में उसके साथ चलने को तैयार हो जाती है। वह घूँघट ओढ़कर गोली के पीछे-पीछे भीड़ के बीच से निकल आती है।

6. सफल पलायन

ठाकुर साहब और भीड़ को लगता है कि यह नट के खेल का ही कोई हिस्सा है। वे तालियाँ बजाते रहते हैं और हँसते रहते हैं, जबकि गोली ‘इंद्रजाल’ (जादू) के बहाने बेला को सबके सामने से लेकर फाटक के बाहर निकल जाता है। वहाँ पहले से तैयार एक इक्के पर बैठकर दोनों हमेशा के लिए दूर चले जाते हैं। पीछे दरबार में नट के खेल की प्रशंसा होती रह जाती है।

  1. ‘इंद्रजाल’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – ‘इंद्रजाल’ का अर्थ है मायाजाल या जादू। यह शीर्षक पूरी तरह सार्थक है क्योंकि कहानी का चरमोत्कर्ष गोली द्वारा दिखाए गए नट-विद्या के ‘इंद्रजाल’ पर आधारित है। गोली एक दृष्टि-भ्रम पैदा करता है ताकि वह बेला को ठाकुर की कैद से निकाल सके। इसके अतिरिक्त, कहानी मानवीय संबंधों के मायाजाल को भी दिखाती है—जहाँ मैकू का लालच, ठाकुर की कामुकता और भूरे की ईर्ष्या एक नकारात्मक इंद्रजाल बुनती है। अंत में, गोली अपनी कला के वास्तविक इंद्रजाल से इन सभी कृत्रिम जालों को काट देता है और सत्य (प्रेम) की विजय होती है।

  1. बेला के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

उत्तर – बेला कहानी की नायिका है, जो सौंदर्य और कला का अद्भुत संगम है। वह एक ‘बेड़िन’ है जिसके कंठ में अपूर्व माधुर्य है। बेला का चरित्र अत्यंत दृढ़ है; वह परिस्थितियों के कारण भूरे की पत्नी बनने और बाद में ठाकुर की हवेली में रहने को मजबूर होती है, लेकिन उसका हृदय कभी भी गोली के प्रति अपने प्रेम से विमुख नहीं होता। वह सुख-सुविधाओं के बीच भी स्वयं को ‘पिंजरे की वन-विहंगिनी’ महसूस करती है। अंत में, वह समाज और सत्ता का भय छोड़कर गोली के साथ भागने का साहसी कदम उठाती है, जो उसके अटूट प्रेम को दर्शाता है।

  1. मैकू सरदार की क्रूरता और धूर्तता का वर्णन कीजिए।

उत्तर – मैकू कंजरों के दल का सरदार है और वह पूरी तरह संवेदनाहीन पात्र है। उसके लिए मानवीय भावनाएं व्यापार की वस्तु हैं। वह अपने दल की स्त्रियों को आदेश देता है कि यदि भीख न मिले तो अपने बच्चों को निर्दयता से गृहस्थ के द्वार पर पटक दें। उसकी धूर्तता तब चरम पर होती है जब वह बेला के प्रति ठाकुर की आसक्ति को पहचान लेता है। वह एक ‘घाघ’ शिकारी की तरह जाल बुनता है और बेला को एक हज़ार रुपये के लालच में ठाकुर को बेच देता है। मैकू का चरित्र समाज के उस शोषक वर्ग का प्रतीक है जो गरीबी का फायदा उठाता है।

  1. गोली ने अपनी नट-विद्या का उपयोग बेला को मुक्त कराने के लिए कैसे किया?

उत्तर – गोली एक चतुर नट है जो अपनी कला में निपुण है। वह वर्षों बाद अपनी पहचान बदलकर ठाकुर के गढ़ में आता है और अद्भुत ‘इंद्रजाल’ (जादू) दिखाता है। वह रस्सी के सहारे आकाश में चढ़ने और लहू से सराबोर होकर लौटने का स्वांग रचता है। वह भीड़ और ठाकुर को इस कदर भ्रमित कर देता है कि वे उसकी बातों को खेल का हिस्सा समझने लगते हैं। इसी दृष्टि-भ्रम का लाभ उठाकर वह गढ़ के भीतर जाता है और बेला को घूँघट में छिपाकर सबके सामने से निकाल ले जाता है। उसकी कला यहाँ केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मुक्ति का साधन बनती है।

  1. कहानी के विलेन ‘भूरे’ के चरित्र का विश्लेषण कीजिए।

उत्तर – भूरे कंजर दल का एक ईर्ष्यालु और हिंसक पात्र है। उसे मैकू ‘भूरा भेड़िया’ कहता है, जो उसके हिंसक स्वभाव को दर्शाता है। वह गोली और बेला के प्रेम को सहन नहीं कर पाता और हमेशा विवाद पैदा करता है। वह बेला पर अपना अधिकार प्रेम के कारण नहीं, बल्कि उस ‘टट्टू’ के कारण समझता है जिसे उसने बेला के पिता को दिया था। उसकी ईर्ष्या इतनी गहरी है कि वह गोली पर छुरे से वार करने से भी नहीं चूकता। भूरे उस पुरुष मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है जो स्त्री को केवल अपनी संपत्ति मानती है।

  1. ठाकुर साहब और बेला के संबंधों पर टिप्पणी कीजिए।

उत्तर – ठाकुर साहब और बेला का संबंध सत्ता और शोषण पर आधारित है। ठाकुर बेला के रूप और संगीत के प्रति आकर्षित हैं, लेकिन उनका यह आकर्षण केवल वासना और अहंकार की तुष्टि है। वे उसे मैकू से ‘खरीद’ लेते हैं और अपनी हवेली में रखते हैं। यद्यपि वे उसे सुख-सुविधाएं और प्रतिष्ठा देते हैं, लेकिन वे कभी उसका हृदय नहीं जीत पाते। ठाकुर प्रत्यक्ष देख पाते थे कि बेला शारीरिक रूप से उनके पास होते हुए भी मानसिक रूप से कहीं और है। उनका रिश्ता एक ‘सुनहरे पिंजरे’ जैसा था, जिसमें बेला घुट रही थी।

  1. पलाश के जंगल का कहानी के कथानक में क्या महत्त्व है?

उत्तर – पलाश का जंगल कहानी में एक महत्त्वपूर्ण प्रतीकात्मक स्थल है। यह बेला और गोली के निश्छल प्रेम का साक्षी है। यहीं पर उनके बीच प्रेम का प्रथम उन्मेष हुआ था और यहीं भूरे ने उन पर हमला किया था। विछोह के बाद भी बेला इसी जंगल में जाकर अपने विरह के गीत गाती थी। पलाश का लाल रंग और उसकी निर्जनता बेला के जलते हुए हृदय और उसकी तड़प को दर्शाते हैं। यह जंगल सामाजिक बंधनों से दूर एक ऐसी जगह है जहाँ बेला को अपनी वास्तविकता और अपने सच्चे प्रेमी की यादों के साथ रहने की स्वतंत्रता मिलती है।

  1. प्रसाद जी ने कंजर समुदाय के जीवन का कैसा चित्रण किया है?

उत्तर – जयशंकर प्रसाद ने कंजरों के घुमक्कड़ जीवन का अत्यंत यथार्थवादी और कठोर चित्रण किया है। यह समुदाय समाज की मुख्यधारा से कटा हुआ है और गरीबी, अपराध तथा क्रूरता के बीच जीवन यापन करता है। लेखक ने दिखाया है कि कैसे शासन की कठोरता ने उनके पारंपरिक कार्यों को प्रभावित किया। उनके दल में टट्टू, कुत्ते और भैंसों की तरह मनुष्यों का भी कोई विशेष मूल्य नहीं है। मैकू जैसे सरदार के अधीन वे लोग केवल जीवित रहने के लिए संघर्ष करते हैं, जहाँ प्रेम और दया जैसी भावनाओं के लिए बहुत कम स्थान है।

  1. कहानी के अंत में ‘एक्का’ और ‘पलायन’ का दृश्य क्या संदेश देता है?

उत्तर – कहानी का अंत बहुत गतिशील है। गोली जब बेला को लेकर एक्का पर बैठता है और वह वेग से चल पड़ता है, तो यह ‘मुक्ति’ का प्रतीक है। यह पलायन केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना नहीं है, बल्कि यह सामंती सत्ता (ठाकुर) और जातिगत क्रूरता (मैकू) के चंगुल से आज़ादी है। भीड़ का तालियाँ बजाना और ठाकुर का हँसते रहना यह दिखाता है कि सत्ता अपनी जीत के भ्रम में मस्त रहती है, जबकि शोषित और प्रेमी अपनी राह खुद बना लेते हैं। यह अंत सच्चे प्रेम और बुद्धिमत्ता की जीत का संदेश देता है।

  1. ‘इंद्रजाल’ कहानी में संगीत और कला की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – संगीत और कला इस कहानी के प्राण हैं। बेला का गायन और गोली की बाँसुरी उनके बीच के प्रेम का सेतु है। संगीत ही वह माध्यम है जिससे वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं और जिससे समाज (गाँव वाले) उनसे जुड़ता है। कहानी में ‘नट-विद्या’ (जादू) को केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि एक रक्षक के रूप में दिखाया गया है। जहाँ संगीत ने उनके प्रेम को जन्म दिया, वहीं गोली की कला (इंद्रजाल) ने उस प्रेम को बचाने का रास्ता निकाला। यह सिद्ध करता है कि कला में वह शक्ति है जो मनुष्य को विषम परिस्थितियों से बाहर निकाल सकती है।

1. मैकू सरदार की निर्दयता

“गाँव में भीख माँगने के लिए जब कंजरों की स्त्रियाँ जातीं, तो उनके लिए मैकू की आज्ञा थी कि कुछ न मिलने पर अपने बच्चों को निर्दयता से गृहस्थ के द्वार पर जो स्त्री न पटक देगी, उसको भयानक दंड मिलेगा।”

  • संदर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कहानी ‘इंद्रजाल’ से ली गई हैं।
  • प्रसंग – लेखक कंजरों के दल के सरदार मैकू के कठोर और अमानवीय स्वभाव का परिचय दे रहे हैं।
  • व्याख्या – मैकू एक ऐसा हृदयहीन व्यक्ति है जिसके लिए सहानुभूति और दया का कोई मोल नहीं है। वह भीख माँगने के काम को भी एक हिंसक व्यापार बना देता है। वह माँओं को मजबूर करता है कि वे भीख पाने के लिए अपने मासूम बच्चों का इस्तेमाल करें और उन्हें लोगों के दरवाजों पर पटक कर सहानुभूति बटोरें। यह अंश गरीबी और अपराध के बीच पिसने वाले समुदायों की उस कड़वी हकीकत को दिखाता है जहाँ पेट भरने के लिए ममता का भी सौदा किया जाता है।

 

2. संगीत और प्रेम का सामंजस्य

“गोली जब बाँसुरी बजाने लगता, तब बेला के साहित्यहीन गीत जैसे प्रेम के माधुर्य की व्याख्या करने लगते। गाँव के लोग उसके गीतों के लिए कंजरों को शीघ्र हटाने का उद्योग नहीं करते!”

  • संदर्भ – पूर्ववत्।
  • प्रसंग – बेला और गोली के आपसी प्रेम और उनकी कलात्मक जुगलबंदी का वर्णन।
  • व्याख्या – बेला के गीतों में भले ही शब्दों का कोई बड़ा साहित्य न हो, लेकिन जब गोली की बाँसुरी उसके सुरों के साथ मिलती थी, तो वह संगीत साक्षात प्रेम की परिभाषा बन जाता था। उनकी कला में इतनी शक्ति थी कि जो गाँव वाले कंजरों को घृणा की दृष्टि से देखते थे और उन्हें गाँव से निकालना चाहते थे, वे भी उस मधुर संगीत के मोहपाश में बँधकर उन्हें रुकने देने के लिए विवश हो जाते थे। यहाँ कला की सार्वभौमिक शक्ति को दिखाया गया है।

 

3. पलाश के जंगल में प्रेम का उन्मेष

“आज तारों की क्षीण ज्योति में हृदय-से-हृदय मिले, पूर्ण आवेग में। आज बेला के जीवन में यौवन का और गोली के हृदय में पौरुष का प्रथम उन्मेष था।”

  • संदर्भ – पूर्ववत्।
  • प्रसंग – पलाश के जंगल में रात के समय बेला और गोली के मिलन का अत्यंत भावपूर्ण दृश्य।
  • व्याख्या – तारों की मद्धम रोशनी में बेला और गोली ने अपने प्रेम को स्वीकार किया। यह क्षण उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट था। बेला अपनी किशोरावस्था से पूर्ण यौवन की ओर और गोली एक सीधे बालक से अपनी प्रेमिका की रक्षा करने वाले साहसी पुरुष की ओर बढ़ रहा था। यह मिलन केवल शारीरिक नहीं, बल्कि दो आत्माओं का पूर्ण आवेग के साथ जुड़ाव था, जहाँ सामाजिक बंधनों और भूरे के डर का कोई स्थान नहीं था।

 

4. बेला के सौंदर्य की टीस

“सबके ऊपर आकर्षक बाँसुरी जब उसके साथ नहीं बजती थी, तब भी बेला के गले में एक ऐसी नई टीस उत्पन्न हो गई थी, जिसमें बाँसुरी का स्वर सुनाई पड़ता था। अंतर में भरे हुए निष्फल प्रेम से युवती का सौंदर्य निखर आया था।”

  • संदर्भ – पूर्ववत्।
  • प्रसंग – गोली के बिछड़ने के बाद बेला की मानसिक और शारीरिक स्थिति का वर्णन।
  • व्याख्या – गोली के चले जाने के बाद बेला के जीवन में सन्नाटा छा गया था, लेकिन उसके कंठ में अब एक दर्द भरी पुकार (टीस) थी। जब वह गाती थी, तो ऐसा महसूस होता था मानो गोली की बाँसुरी उसके साथ बज रही हो। विरह की अग्नि और निष्फल प्रेम की पीड़ा ने बेला के रूप को और भी अधिक निखार दिया था। यह प्रसाद जी की विशिष्ट शैली है जहाँ वे पीड़ा और विरह में सौंदर्य की पराकाष्ठा देखते हैं।

 

5. मैकू द्वारा बेला का सौदा

“मैकू जाल फैलाकर चला आया। एक हजार की बोहनी की कल्पना करते वह अपनी सिरकी में बैठकर हुक्का गुड़गुड़ाने लगा। बेला के सुंदर अंग की मेघ-माला प्रेमराशि की रजत-रेखा से उद्‌भासित हो उठी थी।”

  • संदर्भ – पूर्ववत्।
  • प्रसंग – मैकू द्वारा ठाकुर साहब से बेला का सौदा तय करने के बाद का दृश्य।
  • व्याख्या – मैकू एक धूर्त शिकारी की तरह अपना जाल फैलाकर आ चुका था। उसके लिए बेला एक इंसान नहीं, बल्कि एक ‘बोहनी’ (दिन की पहली कमाई) मात्र थी। उसे एक हज़ार रुपये मिलने की खुशी थी। दूसरी ओर, बेला अपने ही प्रेम की दुनिया में मगन थी, उसे खबर भी नहीं थी कि उसकी अस्मत और आज़ादी का सौदा हो चुका है। यहाँ लेखक ने मैकू की नीचता और बेला की भोली मासूमियत के बीच के अंतर को स्पष्ट किया है।

 

6. अंत में कला की विजय (इंद्रजाल)

“मन्त्र-मुग्ध की तरह बेला ने उस ओढ़नी का घूँघट बनाया। वह धीरे-धीरे उसके पीछे भीड़ में आ गई। तालियाँ पिटीं। हँसी का ठहाका लगा… ठाकुर साहब हँस रहे थे। गोली दोनों हाथों से सलाम कर रहा था।”

  • संदर्भ – पूर्ववत्।
  • प्रसंग – कहानी का अंतिम दृश्य जहाँ गोली बेला को गढ़ से बाहर ले जाता है।
  • व्याख्या – यह कहानी का सबसे प्रभावशाली हिस्सा है। गोली ने अपनी नट-विद्या (इंद्रजाल) से ऐसा भ्रम पैदा किया कि लोग हकीकत को खेल समझ बैठे। ठाकुर साहब और भीड़ जिसे खेल समझकर तालियाँ बजा रहे थे, वह वास्तव में एक सफल पलायन था। बेला घूँघट का सहारा लेकर गोली के पीछे ऐसे निकल गई जैसे कोई जादू हो रहा हो। यहाँ ‘इंद्रजाल’ का अर्थ सार्थक होता है— जहाँ सत्ता और अहंकार अपनी ही हँसी में मस्त रहते हैं और कला चुपके से अपनी जीत हासिल कर लेती है।

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