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जाह्नवी – जैनेन्द्र कुमार
आज तीसरा रोज़ है। तीसरा नहीं, चौथा रोज़ है। वह इतवार की छुट्टी का दिन था। सबेरे उठा और कमरे से बाहर की ओर झाँका तो देखता हूँ, मुहल्ले के एक मकान की छत पर काँव-काँव करते हुए कौओं से घिरी हुई एक लड़की खड़ी है। खड़ी-खड़ी बुला रही है, “कौओ आओ, कौओ आओ।” कौए बहुत काफ़ी आ चुके हैं, पर और भी आते-जाते हैं। वे छत की मुँडेर पर बैठ अधीरता से पंख हिला-हिलाकर बेहद शोर मचा रहे हैं। फिर भी उन कौओं की संख्या से लड़की का मन जैसे भरा नहीं है। बुला ही रही है, “कौओ आओ, कौओ आओ।”
देखते-देखते छत की मुँडेर कौओं से बिल्कुल काली पड़ गई। उनमें से कुछ अब उड़-उड़कर उसकी धोती से जा टकराने लगे। कौओं के खूब आ घिरने पर लड़की मानो उन आमंत्रित अतिथियों के प्रति गाने लगी-
“कागा चुन-चुन खाइयो…”
गाने के साथ उसने अपने हाथ की रोटियों में से तोड़-तोड़कर नन्हें-नन्हें टुकड़े भी चारों ओर फेंकने शुरू किए। गाती जाती थी। “कागा चुन-चुन खाइयो…” वह मग्न मालूम होती थी और अनायास उसकी देह थिरक कर नाच-सी जाती थी। कौए चुन-चुन खा रहे थे और वह गा रही थी-
“कागा चुन-चुन खाइयो…”
आगे वह क्या गाती है, कौओं की काँव-काँव और उनके पंखों की फड़फड़ाहट के मारे साफ सुनाई न दिया। कौए लपक-लपक कर मानो छूटने से पहले उसके हाथों से टुकड़ा छीन ले रहे थे। वे लड़की के चारों ओर ऐसे छा रहे थे मानो वे प्रेम से उसको ही खाने को उद्यत हों। और लड़की कभी इधर कभी उधर झुककर घूमती हुई ऐसे लीन भाव से गा रही थी कि जाने क्या मिल रहा हो।
रोटी समाप्त होने लगी। कौए भी यह समझ गए। जब अंतिम टुकड़ा हाथ में रह गया तो वह गाती हुई, उस टुकड़े को हाथ में फहराती हुई ज़ोर से दो-तीन चक्कर लगा उठी। फिर उसने वह टुकड़ा ऊपर आसमान की ओर फेंका, “कौओ खाओ, कौओ खाओ।” और बहुत-से कौए एक ही साथ उड़कर उसे लपकने झपटे। उस समय उन्हें देखती हुई लड़की मानो आनंद में चीखती हुई-सी आवाज़ में गा उठी –
“दो नैना मत खाइयो, मत खाइयो…
पीउ मिलन की आस”
रोटियाँ खत्म हो गईं। कौए उड़ चले। लड़की एक-एक कर उनको उड़कर जाता हुआ देखने लगी। पलभर में छत कोरी हो गई। अब वह आसमान के नीचे अकेली अपनी छत पर खड़ी थी। आसपास बहुत से मकानों की बहुत-सी छतें थीं। उन पर कोई होगा, कोई न होगा। पर लड़की दूर अपने कौओं को उड़ते जाते हुए देखती रह गई। गाना समाप्त हो गया था। धूप अभी फूटी ही थी। आसमान गहरा नीला था। लड़की के ओंठ खुले थे, दृष्टि थिर थी। जाने भूली-सी वह क्या देखती रह गई थीं।
थोड़ी देर बाद उसने मानो जागकर अपने आसपास के जगत को देखा। इसी की राह में क्या मेरी ओर भी देखा? देखा भी हो; पर शायद मैं उसे नहीं दिखा था। उसके देखने में सचमुच कुछ दिखता ही था, यह मैं कह नहीं सकता। पर, कुछ ही पल के अनंतर वह मानो वर्तमान के प्रति, वास्तविकता के प्रति, चेतन हो आई। तब फिर बिना देर लगाए चट-चट उतरती हुई वह नीचे अपने घर में चली गई।
मैं अपनी खिड़की में खड़ा-खड़ा चाहने लगा कि मैं भी देखूँ, कि कौए कहाँ-कहाँ उड़ रहे हैं, और वे कितनी दूर चले गए हैं। क्या वे कहीं दिखते भी हैं? पर मुश्किल से मुझे दो-एक ही कौए दिखे। वे निरर्थक भाव से यहाँ बैठे थे, या वहाँ उड़ रहे थे। वे मुझे मूर्ख और घिनौने मालूम हुए। उनकी काली देह और काली चोंच मन को बुरी लगी। मैंने सोचा कि ‘नहीं, अपनी देह मैं कौओं से नहीं नुचवाऊँगा छिः, घुन-घुनकर इन्हीं के खाने के लिए क्या मेरी देह है? मेरी देह और कौए? -छीः।’
जान पड़ता है खड़े-खड़े मुझे काफी समय खिड़की पर ही हो गया; क्योंकि इस बार देखा कि ढेर-के-ढेर कपड़े कंधे पर लादे वही लड़की फिर उसी छत पर आ गई है। इस बार वह गाती नहीं है, वहाँ पड़ी एक खाट पर उन कपड़ों को पटक देती है और उन कपड़ों में से एक-एक को चुनकर फटककर, वहीं छत पर फैला देती है। छोटे-बड़े उन कपड़ों की गिनती काफी रही होगी। वे उठाए जाते रहे, फटके जाते रहे, फैलाए जाते रहे; पर उनका अंत ही आता न दिखा। आखिर जब खत्म हो गए तो लड़की ने सिर पर आए हुए धोती के पल्ले को पीछे किया। उसने एक अँगड़ाई ली, फिर सिर को ज़ोर से हिलाकर अनबँधे अपने बालों को छिटका लिया और धीमे-धीमे वहीं डोलकर उन बालों पर हाथ फेरने लगी। कभी बालों की लट को सामने लाकर देखती फिर उसी को लापरवाही से पीछे फेंक देती। उसके बाल गहरे काले थे और लंबे थे। मालूम नहीं उसे अपने इस वैभव पर सुख था या दुःख था। कुछ देर वह उँगलियाँ फेर-फेरकर अपने बालों को इकट्ठा समेटकर झटपट जूड़ा-सा बाँध; पल्ला सिर पर खींच, वह नीचे उतर गई।
इसके बाद मैं खिड़की पर नहीं ठहरा। घर में छोटी साली आई हुई है। इसी शहर के दूसरे भाग में रहती है और ब्याह न करके कालिज में पढ़ती है। मैंने कहा, “सुनो, यहाँ आओ।”
उसने हँसकर पूछा, “यहाँ कहाँ?”
खिड़की के पास आकर मैंने पूछा, “क्यों जी, जाह्नवी का मकान जानती हो?”
“जाह्नवी! क्यों; वह कहाँ है?”
“मैं क्या जानता हूँ कहाँ है? पर देखो, वह घर तो उसका नहीं है?”
उसने कहा, “मैंने घर नहीं देखा। इधर उसने कालिज भी छोड़ दिया है।”
“चलो अच्छा है,” मैंने कहा और उसे जैसे-तैसे टाला। क्योंकि वह पूछने-ताछने लगी थी कि क्या काम है, जाह्नवी को मैं क्या और कैसे और क्यों जानता हूँ। सच यह था कि मैं रत्तीभर उसे नहीं जानता था। एक बार अपने ही घर में इसी साली की कृपा और आग्रह पर एक निगाह एक को देखा था। बताया गया था कि वह जाह्नवी है, और मैंने अनायास स्वीकार कर लिया था कि अच्छा, वह जाह्नवी होगी। उसके बाद की सचाई यह है कि मुझे कुछ नहीं मालूम कि उस जाह्नवी का क्या बन गया और क्या नहीं बना। पर किसी सचाई को बहनोई के मुँह से सुनकर स्वीकार कर ले तो साली क्या! तिस पर सचाई ऐसी कि नीरस। पर ज्यों-त्यों मैंने टाला।
बात-बात में मैंने कहना भी चाहा कि ऐसी ही तुम जाह्नवी को जानती हो, ऐसी ही तुम साथ पढ़ती थी कि ज़रा बात पर कह दो ‘मालूम नहीं।’ लेकिन मैंने कुछ कहा नहीं।
इसके बाद सोमवार हो गया, मंगलवार हो गया और आज बुध भी होकर चुका जा रहा है। चौथा रोज़ है। हर रोज़ सबेरे खिड़की पर दिखता है कि कौवे काँव-काँव, छीन-झपट कर रहे हैं और वह लड़की उन्हें रोटी के टुकड़ों के मिस कह रही है-
“कागा चुन, चुन खाइयो…’
मुझको नहीं मालूम कि कौए जो कुछ उसका खाएँगे उसे कुछ भी उसकी सोच है। कौओं को बुला रही है, “कौओ आओ, कौओ आओ।”, साग्रह कह रही है, “कौओ आओ, कौओ आओ।” वह खुश है कि कौए आ गए हैं और वे खा रहे हैं। पर एक बात है कि ओ कौओ, जो तन चुन-चुनकर खा लिया जाएगा, उसको खा लेने में मेरी अनुमति है। वह खा-खूकर तुम सब निबटा देना। लेकिन ए मेरे भाई कौओ! इन दो नैनों को छोड़ देना। इन्हें कहीं मत खा लेना। क्या तुम नहीं जानते कि उन नैनों में एक आस बसी है जो पराए के बस है। वे नैना पीउ की बाट में हैं। ए कौओ, वे मेरे नहीं हैं, मेरे तन के नहीं हैं। वे पीउ की आस को बनाए रखने के लिए हैं। सो, उन्हें छोड़ देना।”
आज सबेरे भी मैंने यह सब-कुछ देखा। कौओं को रोटी खिलाकर वह उसी तरह नीचे चली गई। फिर छोटे-बड़े बहुत से कपड़े धोकर लाई। उसी भाँति उन्हें झटककर फैला दिया। वैसे ही बाल छितराकर थोड़ी देर डोली। फिर सहसा ही उन्हें जूड़े में संभालकर नीचे भाग गई।
जाह्नवी को घर में एक बार देखा था। पत्नी ने उसे खास तौर पर देख लेने को कहा था और उसके चले जाने पर पूछा था, “क्यों, कैसी है?”
मैंने कहा था, “बहुत भली मालूम होती है। सुंदर भी है। पर क्यों?”
“अपने बिरजू के लिए कैसी रहेगी?”
बिरजू दूर के रिश्ते मेरा भतीजा होता है। इस साल एम.ए. में पहुँचा है।
मैंने कहा, “अरे, ब्रजनंदन! वह उसके सामने बच्चा है।”
पत्नी ने अचरज से कहा, “बच्चा है। बाईस बरस का तो हुआ।”
“बाईस छोड़ बयालीस का भी हो जाए। देखा नहीं कैसे ठाठ से रहता है। यह लड़की देखो, कैसी बस सफेद साड़ी पहनती है। बिरजू इसके लायक कहाँ है! यों भी कह सकती हो कि वह बेचारी लड़की बिरजू के ठाठ के लायक नहीं है।”
बात मेरी कुछ सही, कुछ व्यंग्य थी। पत्नी ने उसे कान पर भी न लिया। कुछ दिनों बाद मुझे मालूम हुआ कि पत्नी जी की कोशिशों से जाह्नवी के माँ-बाप से (माँ के द्वारा बाप से) काफी आगे तक बढ़कर बातें कर ली गई हैं। शादी के मौके पर क्या देना होगा, क्या लेना होगा, एक-एक कर सभी बातें पेशगी तय होती जा रही हैं।
इतने में सारे किए-किराए पर पानी फिर गया। जब बात कुल किनारे पर आ गई थी, तभी हुआ क्या कि हमारे ब्रजनंदन के पास एक पत्र आ पहुँचा। उस पत्र के कारण एकदम सब चौपट हो गया। इस रंग में भंग हो जाने पर हमारी पत्नी जी का मन पहले तो गिरकर चूर-चूर सा होता जान पड़ा; पर, फिर वह उसी पर बड़ी खुश मालूम होने लगीं!
मैं तो मानो इन मामलों में अनावश्यक प्राणी हूँ ही। कानों-कान मुझे खबर तक न हुई। जब हुई तो इस तरह- पत्नीजी एक दिन सामने आ धमकीं। बोलीं, “यह तुमने जाह्नवी के बारे में पहले से क्यों नहीं बतलाया?”
मैंने कहा, “जाह्नवी के बारे में मैंने पहले से क्या नहीं बतलाया भाई?”
“यह कि वह कैसी है?”
मैंने पूछा, “ऐसी कैसी?”
उन्होंने कहा, “बनो मत। जैसे तुम्हें कुछ नहीं मालूम।”
मैंने कहा, “अरे, यह तो कोई हाईकोर्ट का जज भी नहीं कह सकता कि मुझे कुछ भी नहीं मालूम। लेकिन, आखिर जाह्नवी के बारे में मुझे क्या-क्या मालूम है, यह तो मालूम हो।”
श्रीमतीजी ने अकृत्रिम आश्चर्य से कहा, “बिरजू के पास खत आया है, सो तुमने कुछ नहीं सुना? आजकल की लड़कियाँ, बस कुछ न पूछो। यह तो चलो भला हुआ कि मामला खुल गया। नहीं तो-“
क्या मामला, कहाँ, कैसे खुला और भीतर से क्या कुछ रहस्य बाहर हो पड़ा सो सब बिना जाने मैं क्या निवेदित करता? मैंने कहा, “कुछ बात साफ भी कहो।”
उन्होंने कहा, “वह लड़की आशनाई में फँसी थी- पढ़ी-लिखी सब एक जात की होती हैं।”
मैंने कहा, “सबकी जात-बिरादरी एक हो जाए तो बखेड़ा टले। लेकिन असल बात भी तो बताओ।”
“असल बात जाननी है तो जाकर पूछो उसकी महतारी से। भली समधिन बनने चली थी। वह तो मुझे पहले ही से दाल में काला मालूम होता था। पर देखो न, कैसी सीधी-भोली बातें करती थी। वह तो, देर क्या थी, सब हो ही चुका था। बस लगन-मुहूर्त की बात थी। राम-राम, भीतर पेट में कैसी कालिख रक्खे हैं, मुझे पता न था। चलो, आखिर परमात्मा ने इज्ज़त बचा ली। वह लड़की घर में आ जाती तो मेरा मुँह अब दिखने लायक रहता?”
मेरी पत्नी का मुख क्यों किस भाँति दिखने लायक न रहता, उसें क्या विकृति आ रहती, सो उनकी बातों से समझ में न आया। उनकी बातों में रस कई भाँति का मिला, तथ्य न मिला। कुछ देर बाद उन बातों से मैंने तथ्य पाने का यत्न ही छोड़ दिया और चुपचाप पाप-पुण्य धर्म-अधर्म का विवेचन सुनता रहा। पता लगने पर मालूम हुआ कि ब्रजमोहन के पास खुद लड़की यानी जाह्नवी का पत्र आया था। पत्र मैंने देखा। उस पत्र को देखकर मेरे मन में कल्पना हुई कि अगर वह मेरी लड़की होती तो? मुझे यह अपना सौभाग्य मालूम नहीं हुआ कि जाह्नवी मेरी लड़की नहीं है। उस पत्र की बात कई बार मन में उठी है और घुमड़ती रह गई है। ऐसे समय चित्त का समाधान उड़ गया है और मैं शून्य-भाव से, हमें जो शून्य चारों ओर से ढके हुए है उसकी ओर देखता रहा गया हूँ
पत्र बड़ा नहीं था। सीधे-सादे ढंग से उसमें यह लिखा था कि, ‘आप जब विवाह के लिए यहाँ पहुँचेंगे तो मुझे प्रस्तुत भी पाएँगे। लेकिन मेरे चित्त की हालत इस समय ठीक नहीं है और विवाह जैसे धार्मिक अनुष्ठान की पात्रता मुझमें नहीं है। एक अनुगता आपको विवाह द्वारा मिलनी चाहिए- वह जीवन-संगिनी भी हो। यह मैं हूँ या हो सकती हूँ, इसमें मुझे बहुत संदेह है। फिर भी अगर आप चाहें, आपके माता-पिता चाहें, तो प्रस्तुत मैं हूँ। विवाह में आप मुझे लेंगे और स्वीकार करेंगे तो मैं अपने को दे ही दूँगी, आपके चरणों की धूलि माथे से लगाऊँगी। आपकी कृपा मानूँगी। कृतज्ञ होऊँगी। पर निवेदन है कि यदि आप मुझ पर से अपनी माँग उठा लेंगे, मुझे छोड़ देंगे तो भी मैं कृतज्ञ होऊँगी। निर्णय आपके हाथ है। जो चाहें, करें।’
मुझे ब्रजनंदन पर आश्चर्य आकर भी आश्चर्य नहीं होता। उसने दृढ़ता से साथ कह दिया कि मैं यह शादी नहीं करूँगा। लेकिन उसने मुझसे अकेले में यह भी कहा कि चाचाजी, मैं और विवाह करूँगा ही नहीं, करूँगा तो उसी से करूँगा। उस पत्र को वह अपने से अलहदा नहीं करता है। और देखता हूँ कि उस ब्रजनंदन का ठाठ-बाट आप ही कम होता जा रहा है। सादा रहने लगा है और अपने प्रति सगर्व बिल्कुल भी नहीं दिखता है। पहले विजेता बनना चाहता था, अब विनयावनत दिखता है और आवश्यकता से अधिक बात नहीं करता। एक बार प्रदर्शिनी में मिल गया। मैं तो देखकर हैरत में रह गया। ब्रजनंदन एकाएक पहचाना भी न जाता था। मैंने कहा, “ब्रजनंदन, कहो क्या हाल है?”
उसने प्रणाम करके कहा, “अच्छा है।”
वह मेरे घर पर भी आया।
पत्नी ने उसे बहुत प्रेम किया और बहुत-बहुत बधाइयाँ दीं कि ऐसी लड़की से शादी होने से चलो भगवान ने समय पर रक्षा कर दी। जाह्नवी नाम की लड़की की एक-एक छिपी बात बिरजू की चाची को मालूम हो गई है। वह बातें- ओह! कुछ न पूछो, बिरजू भैया! मुँह से भगवान किसी की बुराई न करावे। लेकिन-
फिर कहा, “भई, अब बहू के बिना काम कब तक हम चलाएँ, तू ही बता। क्यों रे, अपनी चाची को बुढ़ापे में भी तू आराम नहीं देगा? सुनता है कि नहीं?”
ब्रजनंदन चुपचाप सुनता रहा।
पत्नी ने कहा, “और यह तुझे क्या हो गया है? अपने चाचा की बातें तुझे भी लग गई हैं क्या? न ढंग के कपड़े, न रीत की बातें। उन्हें तो अच्छे कपड़े-लत्ते शोभते नहीं है। तू क्यों ऐसा रहने लगा है रे?”
ब्रजनंदन ने कहा, “कुछ नहीं, चाची। और कपड़े घर रखे हैं।”
अकेले पाकर मैंने भी उससे कहा, “ब्रजनंदन, बात तो सही है। अब शादी करके काम में लगना चाहिए और घर बसाना चाहिए। है कि नहीं?”
ब्रजनंदन ने मुझे देखते हुए बड़े-बूढ़े की तरह कहा, “अभी तो उमर पड़ी है, चाचाजी!”
मैंने इस बात को ज़्यादा नहीं बढ़ाया।
अब खिड़की के पार इतवार को, सोमवार को, मंगलवार को और आज बुधवार को भी सबेरे-ही-सबेरे छत पर नित रोटी के मिस कौओं को पुकार-पुकार कर बुलाने-खिलानेवाली यह जो लड़की देख रहा हूँ सो क्या जाह्नवी है? जाह्नवी को मैंने एक ही बार देखा है, इसलिए, मन को कुछ निश्चय नहीं होता। कद भी इतना ही था; लावण्य शायद उस जाह्नवी में अधिक था। पर यह वह नहीं है, जाह्नवी नहीं है, ऐसी दिलासा मैं मन को तनिक भी नहीं दे पाता हूँ। सबेरे-सबेरे इतने कौए बुला लेती है कि खुद दिखती ही नहीं, काले-काले-वे-ही-वे दिखते हैं। और वे भी उसके चारों ओर ऐसी छीना झपट-सी करते हुए उड़ते रहते हैं मानो बड़े स्वाद से, बड़े प्रेम से, चोंथ-चोंथकर उसे खाने के लिए आपस में बदाबदी मचा रहे हैं। पर उनसे घिरी वह कहती है, “आओ कौओ, आओ।” जब वे आ जाते हैं तो गाती है-
“कागा चुन-चुन खाइयो”
और जब जाने कहाँ-कहाँ के कौए इकट्ठे-के इकट्ठे काँव-काँव करते हुए चुन-चुनकर खाने लगते हैं और फिर भी खाऊ-खाऊ करके उससे, उससे भी ज़्यादा माँगने लगते हैं, तब वह चीख मचाकर चिल्लाती है कि ओरे कागा, नहीं, ये-
“दो नैना मत खाइयो!
मत खाइयो-
पीउ मिलन की आस!”
‘जाह्नवी’ – कहानी परिचय
जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित कहानी ‘जाह्नवी’ एक मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक कहानी है। यह कहानी प्रेम, समर्पण, आत्म-बलिदान और विरह की गहरी संवेदनाओं को एक युवती ‘जाह्नवी’ के माध्यम से प्रस्तुत करती है।
- रहस्यमयी युवती और कौओं का दृश्य
कहानी की शुरुआत लेखक या कथावाचक के अवलोकन से होती है। वह अपने घर की खिड़की से देखता है कि पड़ोस की छत पर एक लड़की अर्थात् जाह्नवी हर सुबह कौओं को बुलाती है। कौए उसके चारों ओर मँडराते हैं, उसकी देह से टकराते हैं और वह उन्हें रोटी के टुकड़े खिलाती है। वह एक भावुक गीत गाती है –
“कागा चुन-चुन खाइयो, चुन-चुन खाइयो मास।
दो नैना मत खाइयो, पीउ मिलन की आस॥”
लेखक देखता है कि लड़की कौओं को अपना शरीर “नुचवाने” के लिए जैसे आमंत्रित कर रही है, मानो वह आत्म-समर्पण की पराकाष्ठा पर हो। वह कौओं से केवल अपनी आँखें बचाने की प्रार्थना करती है क्योंकि उसे अभी भी अपने ‘प्रिय’ (पीउ) के आने की प्रतीक्षा है।
- जाह्नवी का परिचय और टूटा हुआ संबंध
लेखक को बाद में पता चलता है कि वह लड़की जाह्नवी है। करुणा जो लेखक की पत्नी है उसने जाह्नवी और बिरजू का रिश्ता तय करवाया था। ब्रजनंदन (बिरजू) लेखक का भतीजा है और आधुनिक और ठाठ-बाट से रहने वाला एक युवक है। जाह्नवी की शादी कथावाचक के भतीजे ब्रजनंदन उर्फ़ बिरजू से लगभग तय हो चुकी थी। परिवार में बातें चल रही थीं, दहेज़ आदि की चर्चाएँ हो रही थीं। लेकिन तभी ब्रजनंदन को जाह्नवी का एक पत्र मिलता है।
- जाह्नवी का पत्र और बिरजू का परिवर्तन
पत्र में जाह्नवी ने स्पष्ट और सरल शब्दों में लिखा था कि उसका मन इस समय ठीक नहीं है और वह खुद को विवाह जैसे पवित्र बंधन के योग्य नहीं मानती। उसने लिखा कि यदि बिरजू चाहे तो वह शादी के लिए तैयार है और उसके चरणों की धूल माथे पर लगाएगी, लेकिन यदि वह इस रिश्ते को खत्म कर दे, तो वह उसकी अधिक आभारी होगी। बिरजू ने इस पत्र के बाद शादी से इनकार कर दिया। लेकिन इस घटना ने बिरजू को पूरी तरह बदल दिया। जो बिरजू पहले शौकीन और विजेता जैसा दिखता था, वह अब सादा, विनीत और गंभीर रहने लगा। उसने लेखक से यहाँ तक कह दिया कि वह जाह्नवी के सिवा और किसी से शादी नहीं करेगा और जाह्नवी के उस पत्र को हमेशा अपने पास रखा। दूसरी ओर, कथावाचक की पत्नी और परिवार इस घटना से बहुत प्रसन्न हो जाते हैं कि शादी टूट गई, क्योंकि उन्हें जाह्नवी के ‘चरित्र’ पर संदेह हो गया है। वे उसे “आशनाई में फँसी हुई” बताते हैं और खुद पर ईश्वर की कृपा मानते हैं कि घर में ऐसी बहू नहीं आई।
- लेखक का चिंतन और जाह्नवी की विरह-अवस्था
लेखक जाह्नवी की वर्तमान स्थिति को देखकर दुखी और चकित होता है। वह देखता है कि जाह्नवी अब कॉलेज छोड़ चुकी है और घर के कामकाज जैसे – कपड़े धोना, सुखाना आदि कामों में व्यस्त रहती है, लेकिन उसका मन कहीं और है। सुबह कौओं को खाना खिलाना उसके लिए एक आध्यात्मिक क्रिया जैसा है। कौओं का मांस चुनना जैसे उसके अस्तित्व के धीरे-धीरे समाप्त होने का प्रतीक है। वह दुनिया के लिए ‘चरित्रहीन’ या ‘अजीब’ हो सकती है जैसा कि लेखक की पत्नी उसे संदेह की दृष्टि से देखती है, लेकिन लेखक की नज़र में वह एक ऐसी विरहिणी है जिसने अपना सब कुछ अपने प्रेम या अपनी प्रतीक्षा पर न्यौछावर कर दिया है।
- प्रतीकात्मक अर्थ (इंद्रजाल और विरह)
कहानी के अंत में ‘कौए’ और ‘गीत’ गहरा अर्थ लेते हैं। जाह्नवी का कौओं को शरीर का मांस खिलाने की अनुमति देना उसके अत्यधिक आत्म-त्याग को दर्शाता है। उसकी आँखें केवल इसलिए बची हैं क्योंकि उनमें ‘प्रिय मिलन की आस’ है। यह पीउ या प्रिय कोई व्यक्ति भी हो सकता है या कोई ईश्वरीय सत्ता भी।
कहानी के प्रमुख बिंदु
- आध्यात्मिक प्रेम – यह कहानी लौकिक प्रेम से अलौकिक प्रेम की ओर ले जाती है। जाह्नवी का समर्पण साधारण नहीं है।
- बिरजू का हृदय परिवर्तन – जाह्नवी की सच्चाई और उसकी विरक्ति ने बिरजू के अहंकार को नष्ट कर दिया और उसे एक गंभीर व्यक्ति बना दिया।
- प्रतीकवाद – कौए यहाँ काल (समय) या समाज की उन शक्तियों के प्रतीक हैं जो व्यक्ति को धीरे-धीरे नष्ट करती हैं, फिर भी प्रेमी अपनी ‘आस’ (उम्मीद) नहीं छोड़ता।
- नारी का स्वरूप – जैनेन्द्र कुमार ने जाह्नवी को एक ऐसी स्त्री के रूप में चित्रित किया है जो समाज के बंधनों से ऊपर उठकर अपनी अंतरात्मा की पुकार सुनती है।
पात्र परिचय
जैनेन्द्र कुमार की कहानी ‘जाह्नवी’ में पात्र बहुत सीमित हैं, लेकिन वे गहरे मनोवैज्ञानिक अर्थों को समेटे हुए हैं। यहाँ मुख्य पात्रों का परिचय और उनकी विशेषताएँ दी गई हैं –
- जाह्नवी (प्रमुख पात्र)
जाह्नवी कहानी की केंद्रीय पात्र है, जिसके इर्द-गिर्द पूरी कथा का ताना-बना बुना गया है।
- रहस्यमयी और विरहिणी – वह एक ऐसी युवती है जो संसार से विरक्त जान पड़ती है। वह हर सुबह कौओं को रोटियाँ खिलाती है और विरह का गीत गाती है।
- अत्यधिक समर्पित – उसका व्यक्तित्व आत्म-बलिदान की पराकाष्ठा है। वह कौओं को अपना मांस खिलाने की अनुमति देती है, जो उसके गहरे मानसिक कष्ट और समर्पण का प्रतीक है।
- सत्यनिष्ठ और स्पष्ट – वह बिरजू को पत्र लिखकर अपनी स्थिति साफ कर देती है। वह छल से विवाह करने के बजाय सत्य बोलना बेहतर समझती है, भले ही इसके लिए उसे सामाजिक तिरस्कार झेलना पड़े।
- प्रतीक्षा की प्रतिमूर्ति – उसकी आँखें केवल ‘पीउ’ (प्रिय) के आने की आस में टिकी हैं।
- ब्रजनंदन / बिरजू (भतीजा)
बिरजू लेखक का भतीजा है और जाह्नवी का होने वाला मंगेतर था।
- परिवर्तित व्यक्तित्व – शुरुआत में वह ठाठ-बाट से रहने वाला और अहंकारी युवक था, लेकिन जाह्नवी के पत्र ने उसे पूरी तरह बदल दिया।
- मूक प्रेमी – वह जाह्नवी से शादी नहीं कर पाता, लेकिन वह किसी और से भी विवाह नहीं करता। वह जाह्नवी के पत्र को हमेशा अपने पास रखता है और अब विनीत और सादा जीवन जीता है।
- सम्मान का भाव – वह जाह्नवी के चरित्र पर उठने वाले सवालों के बावजूद उसके प्रति मन में आदर और समर्पण का भाव रखता है।
- कथावाचक (लेखक)
लेखक स्वयं इस कहानी के प्रेक्षक (Observer) हैं, जो खिड़की से जाह्नवी की गतिविधियों को देखते हैं।
- संवेदनशील और जिज्ञासु – वे जाह्नवी को एक साधारण लड़की के बजाय एक दार्शनिक और प्रतीकात्मक पात्र के रूप में देखते हैं।
- सहानुभूतिपूर्ण – जहाँ समाज और उनकी पत्नी जाह्नवी पर संदेह करते हैं, वहीं लेखक उसके प्रति सहानुभूति रखते हैं और उसकी पीड़ा को समझने की कोशिश करते हैं।
- पत्नी (श्रीमतीजी)
लेखक की पत्नी समाज के रूढ़िवादी और व्यावहारिक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती हैं।
- संदेही और कटु – वह जाह्नवी के बारे में उड़ने वाली अफवाहों पर तुरंत विश्वास कर लेती हैं और उसे ‘कुलक्षणी’ या ‘फँसी हुई लड़की’ मानती हैं।
- सांसारिक दृष्टि – उनके लिए विवाह केवल एक सामाजिक समझौता है, जिसमें वे केवल बाहरी गुण-दोष ही देख पाती हैं।
कहानी में आए प्रतीक
कहानी का मूल प्रतीकात्मक विरोधाभास है –
- तन बनाम आत्मा
- समाज बनाम प्रेम
- उपभोग बनाम आशा
- बलिदान बनाम पवित्रता
- कौए (प्रतीकात्मक पात्र)
काले, शोर मचाने वाले, भूखे पक्षी जो रोटी के टुकड़े चुन-चुनकर खाते हैं। ये समाज, दुनिया के लोगों के प्रतीक हैं, जिनमें भौतिकवादी प्रवृत्तियाँ हैं, जो व्यक्ति के तन-शरीर-यौवन को नोच-नोचकर खा जाते हैं। वे जाह्नवी के तन को खाने के लिए तैयार हैं, पर आत्मा की पवित्रता को नहीं छू पाते हैं।
2 – रोटी के टुकड़े –
जाह्नवी द्वारा कौओं को खिलाई जाने वाली रोटी आत्म-बलिदान और स्वयं को समाज को समर्पित करने का प्रतीक है।
3 – दो नैना –
जाह्नवी की आँखें, जिन्हें वह कौओं से बचाने की प्रार्थना करती है। इन आँखों में आंतरिक प्रेम, पीउ (प्रियतम) से मिलन की अंतिम आशा, आत्मा की शुद्धता, आध्यात्मिक/भावनात्मक पवित्रता की कहानी स्पष्ट होती है। यह एकमात्र ऐसी चीज़ है जो जाह्नवी नहीं छोड़ना चाहती
4 – छत –
ऊँचा, खुला, अकेला स्थान जो जाह्नवी के अलगाव, एकाकीपन, समाज से दूरी, आत्म-चिंतन का स्थान है। जहाँ से दुनिया को देखा जा सकता है लेकिन उसमें शामिल नहीं हुआ जा सकता। यह जाह्नवी का एकमात्र स्वतंत्र और निजी स्थान है, जहाँ वह अपनी वास्तविक भावना व्यक्त करती है।
5 – लंबे काले बाल –
बाल खोलना, सहलाना, जूड़ा बाँधना – स्त्रीत्व, यौवन, सौंदर्य, जिस पर जाह्नवी का अपना कोई गर्व या दुख नहीं दिखता – सौंदर्य का प्रतीक जो अब उसके लिए अर्थहीन हो चुका है; उसे केवल समाज भोग सकता है।
6 – खिड़की –
कथावाचक के देखने का माध्यम अर्थात् दर्शक-भाव, समाज का मध्यमवर्गीय पुरुष जो समझता तो है पर समझ नहीं पाता, सहानुभूति तो है पर भागीदारी नहीं कथावाचक और पाठक दोनों की स्थिति यहाँ हम देखते हैं, लेकिन दोनों में से कोई जाह्नवी के दर्द में शामिल नहीं होते हैं।
‘जाह्नवी’ का केंद्र बिंदु
जैनेन्द्र कुमार की कहानी ‘जाह्नवी’ का केंद्र बिंदु “प्रेम की पराकाष्ठा और आत्म-विसर्जन (Self-Surrender)” है। यह कहानी स्थूल प्रेम (Physical Love) से ऊपर उठकर एक ऐसी आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक स्थिति का चित्रण करती है जहाँ प्रेमी स्वयं को पूरी तरह मिटा देने को ही उपलब्धि मानता है।
- आत्म-समर्पण और विरह
कहानी का सबसे प्रमुख केंद्र बिंदु जाह्नवी का वह गीत है—“कागा चुन-चुन खाइयो, दो नैना मत खाइयो।” यह पंक्तियाँ प्रसिद्ध सूफी संत अमीर खुसरो की पंक्तियों से प्रेरित हैं। यहाँ केंद्र बिंदु यह दिखाना है कि जाह्नवी का प्रेम इतना गहरा है कि वह अपने अस्तित्व (मांस) को कौओं को खिलाने के लिए तैयार है। वह केवल अपनी आँखें बचाना चाहती है ताकि वह अपने ‘पीउ’ (प्रिय) का अंतिम समय तक दीदार कर सके।
- सत्य और नैतिकता का द्वंद्व
कहानी का एक अन्य महत्त्वपूर्ण केंद्र जाह्नवी का वह ‘पत्र’ है। वह समाज की तरह दिखावा नहीं करती। वह बिरजू को स्पष्ट बता देती है कि वह विवाह के ‘धार्मिक अनुष्ठान’ के योग्य खुद को नहीं मानती। वह अपनी सच्चाई को छिपाकर घर नहीं बसाना चाहती। यह केंद्र बिंदु जाह्नवी की नैतिक शुचिता और आंतरिक ईमानदारी को दर्शाता है।
- अहंकार का विनाश
ब्रजनंदन (बिरजू) का चरित्र परिवर्तन कहानी का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। जाह्नवी के पत्र और उसके रहस्यमयी त्याग ने बिरजू के ‘विजेता’ होने के अहंकार को तोड़ दिया। वह ठाठ-बाट छोड़कर ‘विनयावनत’ हो जाता है। कहानी यहाँ यह संदेश देती है कि सच्चा प्रेम व्यक्ति को भोगी नहीं, बल्कि योगी बना देता है।
- स्त्री के अंतर्मन की रहस्यमयता
जैनेन्द्र कुमार ने इस कहानी के केंद्र में स्त्री के हृदय की उस गहराई को रखा है जिसे साधारण समाज (लेखक की पत्नी की तरह) ‘दाल में काला’ या ‘आशनाई’ कहकर अपमानित करता है। जाह्नवी का कौओं को खिलाना या छत पर अकेले डोलना कोई पागलपन नहीं, बल्कि एक गहरा मानसिक और आध्यात्मिक विलाप है, जिसे केवल एक संवेदनशील दृष्टि ही समझ सकती है।
निष्कर्ष –
संक्षेप में, ‘जाह्नवी’ का केंद्र बिंदु यह दिखाना है कि प्रेम केवल पाने का नाम नहीं है, बल्कि स्वयं को रिक्त कर देने की एक प्रक्रिया है। यह कहानी व्यक्ति के ‘स्व’ (Self) के विसर्जन की गाथा है।
‘जाह्नवी’ कहानी की मूल संवेदना
जैनेन्द्र कुमार की कहानी ‘जाह्नवी’ की मूल संवेदना अत्यंत दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और सूक्ष्म है। जैनेन्द्र जी ‘प्रेम’ को एक शारीरिक आकर्षण के रूप में नहीं, बल्कि एक आत्मिक साधना के रूप में देखते हैं।
कहानी की मूल संवेदना को निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं में समझा जा सकता है –
1. प्रेम का आध्यात्मिक और सूफी स्वरूप (Surrender and Devotion)
इस कहानी की सबसे गहरी संवेदना ‘आत्म-विसर्जन’ (Self-effacement) है। जाह्नवी का कौओं को अपना शरीर “नुचवाने” के लिए सौंप देना और केवल आँखों को बचाने की विनती करना, प्रसिद्ध सूफी संत अमीर खुसरो के दर्शन को दर्शाता है। यहाँ प्रेम केवल मिलन की इच्छा नहीं है, बल्कि स्वयं को पूरी तरह मिटा देने की एक प्रक्रिया है। जाह्नवी के लिए प्रेम का अर्थ है—सब कुछ खोकर भी ‘आस’ (उम्मीद) को जीवित रखना।
2. सत्य के प्रति अटूट निष्ठा (Loyalty to Truth)
कहानी की मूल संवेदना में ‘आंतरिक ईमानदारी’ का गहरा स्थान है। जाह्नवी चाहती तो चुपचाप ब्रजनंदन (बिरजू) से विवाह कर अपना घर बसा सकती थी, लेकिन उसने ‘सत्य’ को चुना। उसने अपनी मानसिक स्थिति और अयोग्यता को पत्र में स्पष्ट कर दिया। यह दिखाता है कि प्रेम व्यक्ति को इतना पवित्र और साहसी बना देता है कि वह किसी को धोखे में रखकर सुख पाना स्वीकार नहीं करता।
3. ‘आस’ (Hope) ही जीवन का आधार है
कहानी यह संवेदना देती है कि मनुष्य के जीवन का अंतिम सहारा उसकी ‘आस’ या उम्मीद होती है। शरीर जर्जर हो सकता है, समाज तिरस्कार कर सकता है, लेकिन जब तक प्रिय के दर्शन की ‘आस’ बची है, तब तक अस्तित्व का अर्थ बचा है। जाह्नवी की ‘आँखें’ इसी शाश्वत प्रतीक्षा की प्रतीक हैं।
4. पुरुष के अहंकार का रूपांतरण (Transformation of Ego)
कहानी यह भी संवेदना व्यक्त करती है कि सच्चा और निश्छल प्रेम पत्थर जैसे व्यक्ति को भी पिघला सकता है। ब्रजनंदन (बिरजू) जैसे आधुनिक और अहंकारी युवक का हृदय परिवर्तन जाह्नवी की मूक साधना का ही प्रभाव है। प्रेम जब अधिकार (Ownership) छोड़कर त्याग (Sacrifice) की ओर बढ़ता है, तो वह दूसरे के अहंकार को स्वतः समाप्त कर देता है।
5. समाज की संकीर्णता बनाम व्यक्तिगत पीड़ा
कहानी समाज के उन दोहरे मानदंडों को भी उजागर करती है जहाँ लोग (जैसे लेखक की पत्नी) किसी की व्यक्तिगत और आध्यात्मिक पीड़ा को केवल ‘कलंक’ या ‘आशनाई’ मान लेते हैं। यह संवेदना पाठक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम दूसरों के रहस्यों को कितनी सतही दृष्टि से देखते हैं।
मनोवैज्ञानिक पक्ष
जैनेन्द्र कुमार अपनी कहानियों में पात्रों की बाहरी घटनाओं से अधिक उनके अंतर्मन की परतों को खोलने के लिए जाने जाते हैं। ‘जाह्नवी’ कहानी का मनोवैज्ञानिक पक्ष अत्यंत गहरा और जटिल है।
1. आत्म-पीड़न और दमित भावनाएँ (Self-Mortification)
जाह्नवी का कौओं को अपना मांस खिलाने की अनुमति देना (प्रतीकात्मक रूप से) मनोविज्ञान में ‘आत्म-पीड़न’ की स्थिति को दर्शाता है। जब कोई व्यक्ति किसी गहरे दुख या अपराधबोध (Guilt) से गुजरता है, तो वह स्वयं को कष्ट देकर शांति पाना चाहता है। जाह्नवी का ‘पीउ’ के प्रति समर्पण इतना गहरा है कि वह अपने अस्तित्व को मिटा देना चाहती है।
2. विरक्ति और पलायनवाद
जाह्नवी ने कॉलेज छोड़ दिया है, वह सामाजिक मेल-जोल से दूर रहती है और अपना अधिकांश समय छत पर कौओं के साथ बिताती है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह ‘सामाजिक विरक्ति’ की स्थिति है। वह वास्तविकता के जगत से कटकर अपनी एक काल्पनिक दुनिया (जहाँ केवल वह, उसके कौए और ‘पीउ’ की आस है) में पलायन कर चुकी है।
3. ‘आस’ और जीवित रहने की प्रेरणा
मनोविज्ञान के अनुसार, मनुष्य को जीवित रहने के लिए किसी न किसी ‘उद्देश्य’ या ‘उम्मीद’ की आवश्यकता होती है। जाह्नवी का पूरा शरीर कौओं के लिए है, पर उसकी आँखें ‘आस’ के लिए हैं। यह ‘आस’ ही उसका ‘सर्वाइवल इंस्टिंक्ट’ (Survival Instinct) है। जब तक वह उम्मीद बची है, वह मानसिक रूप से जीवित है।
4. बिरजू का हृदय परिवर्तन (Psychological Transformation)
बिरजू का चरित्र विकास भी मनोवैज्ञानिक है। जाह्नवी के पत्र ने उसके अहंकार (Ego) को ‘शॉक’ दिया। किसी व्यक्ति की अत्यधिक ईमानदारी और त्याग को देखकर दूसरे व्यक्ति के भीतर का ‘स्वार्थ’ स्वतः ही लज्जित हो जाता है। बिरजू का ठाठ-बाट छोड़ना और सादगी अपनाना उसके ‘सुपर-ईगो’ (Super-Ego) के जाग्रत होने का संकेत है।
5. समाज की संदेही दृष्टि (Projection)
लेखक की पत्नी का जाह्नवी को ‘आशनाई’ में फँसा हुआ बताना मनोविज्ञान के ‘प्रोजेक्शन’ सिद्धांत को दर्शाता है। साधारण मनुष्य अक्सर दूसरों के व्यवहार को अपनी सीमित और रूढ़िवादी सोच के चश्मे से ही देखता है। समाज जाह्नवी की आध्यात्मिक गहराई को न समझकर उसे केवल शारीरिक या चारित्रिक दोषों के रूप में देखता है।
6. मौन संवाद (Silent Communication)
कहानी में शब्दों से अधिक ‘मौन’ प्रभावी है। जाह्नवी और बिरजू के बीच कोई सीधा संवाद नहीं होता, फिर भी उनके बीच एक गहरा मानसिक जुड़ाव है। जैनेन्द्र कुमार ने दिखाया है कि गहरी भावनाएँ शब्दों की मोहताज नहीं होतीं; वे व्यवहार और आचरण से प्रकट होती हैं।
निष्कर्ष –
‘जाह्नवी’ का मनोवैज्ञानिक पक्ष यह सिद्ध करता है कि प्रेम जब अपनी चरम सीमा पर पहुँचता है, तो वह एक प्रकार का ‘उन्माद’ या ‘साधना’ बन जाता है। जाह्नवी का चरित्र एक ऐसी मानसिक स्थिति का चित्रण है जहाँ व्यक्ति स्वयं को खोकर ही पूर्णता का अनुभव करता है।
|
क्र.सं. |
शब्द (Hindi) |
हिंदी अर्थ |
English Meaning |
|
1 |
रोज़ |
दिन |
Day |
|
2 |
इतवार |
रविवार |
Sunday |
|
3 |
मुँडेर |
छत की दीवार का किनारा |
Parapet / Cornice |
|
4 |
अधीरता |
बेचैनी, उतावलापन |
Impatience / Restlessness |
|
5 |
आमंत्रित |
बुलाया हुआ |
Invited |
|
6 |
अतिथि |
मेहमान |
Guest |
|
7 |
मग्न |
लीन, डूबा हुआ |
Engrossed / Absorbed |
|
8 |
अनायास |
अचानक, बिना प्रयास के |
Suddenly / Effortlessly |
|
9 |
थिरकना |
नाचना, काँपना |
To quiver / To dance |
|
10 |
उद्यत |
तैयार |
Ready / Prepared |
|
11 |
लीन |
तन्मय |
Immersed / Absorbed |
|
12 |
कोरी |
खाली, साफ़ |
Blank / Empty |
|
13 |
थिर |
स्थिर, रुकी हुई |
Steady / Still |
|
14 |
अनंतर |
बाद में |
Afterwards |
|
15 |
चेतन |
जाग्रत, होश में |
Conscious / Awake |
|
16 |
निरर्थक |
बिना अर्थ के, बेकार |
Meaningless / Futile |
|
17 |
वैभव |
ऐश्वर्य, धन-सम्पत्ति |
Grandeur / Splendour |
|
18 |
आग्रह |
निवेदन, ज़ोर देना |
Insistence / Request |
|
19 |
नीरस |
बिना रस के, उबाऊ |
Dull / Insipid |
|
20 |
साग्रह |
आग्रह के साथ |
Insistently |
|
21 |
अनुमति |
आज्ञा |
Permission |
|
22 |
वाट |
रास्ता (रास्ता देखना) |
Path / Waiting for |
|
23 |
छितराकर |
फैलाकर |
Scattered / Spread |
|
24 |
सहसा |
अचानक |
Suddenly |
|
25 |
भली |
अच्छी |
Kind / Good |
|
26 |
लावण्य |
सुंदरता, चमक |
Charm / Grace / Beauty |
|
27 |
ठाठ |
शान-शौकत |
Pomp / Splendor |
|
28 |
व्यंग्य |
ताना, कटाक्ष |
Sarcasm / Satire |
|
29 |
चौपट |
नष्ट होना |
Ruined / Destroyed |
|
30 |
रंग में भंग |
खुशी में बाधा |
Spoiler / Dampener |
|
31 |
अकृत्रिम |
स्वाभाविक, असली |
Natural / Genuine |
|
32 |
आशनाई |
प्रेम-प्रसंग (अक्सर नकारात्मक अर्थ में) |
Love affair / Liaison |
|
33 |
बखेड़ा |
झगड़ा, झंझट |
Mess / Dispute |
|
34 |
लगन-मुहूर्त |
शादी का शुभ समय |
Auspicious time for marriage |
|
35 |
विवेचन |
विश्लेषण, चर्चा |
Discussion / Deliberation |
|
36 |
अनुष्ठान |
धार्मिक कार्य |
Ceremony / Ritual |
|
37 |
पात्रता |
योग्यता |
Eligibility / Worthiness |
|
38 |
अनुगता |
पीछे चलने वाली, आज्ञाकारी |
Follower / Obedient |
|
39 |
कृतज्ञ |
आभारी |
Grateful / Thankful |
|
40 |
विनयावनत |
विनय से झुका हुआ |
Humble / Bowing in humility |
|
41 |
हैरत |
आश्चर्य |
Astonishment / Wonder |
|
42 |
छिपी |
गुप्त |
Hidden / Secret |
|
43 |
रीत |
तरीका, ढंग |
Custom / Manner |
|
44 |
नित |
रोज़ |
Daily / Constantly |
|
45 |
दिलासा |
सांत्वना |
Consolation / Comfort |
|
46 |
बदाबदी |
होड़, मुकाबला |
Competition / Rivalry |
|
47 |
पीउ |
प्रियतम, पति |
Beloved |
|
48 |
आस |
उम्मीद |
Hope / Expectation |
|
49 |
चट-चट |
तेज़ी से |
Quickly |
|
50 |
घिनौने |
नफरत के लायक |
Disgusting / Loathsome |
|
51 |
नुचवाना |
फिंकवाना या कटवाना |
To get plucked/scratched |
|
52 |
झटपट |
जल्दी |
Instantly |
|
53 |
रत्तीभर |
थोड़ा सा |
A tiny bit |
|
54 |
तिस पर |
उस पर भी |
Moreover |
|
55 |
मिस |
बहाना |
Pretext / Excuse |
|
56 |
पराए |
दूसरे के |
Others’ / Foreign |
|
57 |
अचरज |
आश्चर्य |
Surprise |
|
58 |
भतीजा |
भाई का बेटा |
Nephew |
|
59 |
अनावश्यक |
बेकार |
Unnecessary |
|
60 |
धमकी |
डराना |
Threat |
|
61 |
निवेदित |
निवेदन किया हुआ |
Requested / Submitted |
|
62 |
विकृति |
खराबी |
Deformity / Distortion |
|
63 |
तथ्य |
सच, हकीकत |
Fact |
|
64 |
सौभाग्य |
अच्छी किस्मत |
Good fortune |
|
65 |
शून्य-भाव |
खालीपन का अहसास |
Vacant state / Void |
|
66 |
प्रस्तुत |
तैयार |
Present / Ready |
|
67 |
जीवन-संगिनी |
पत्नी |
Life partner |
|
68 |
अलहदा |
अलग |
Separate |
|
69 |
विजेता |
जीतने वाला |
Winner / Victor |
|
70 |
प्रदर्शनी |
नुमाइश |
Exhibition |
|
71 |
सजग |
सावधान |
Alert / Vigilant |
|
72 |
अंतर्द्वंद्व |
मन की लड़ाई |
Inner conflict |
|
73 |
चरित्र |
आचरण |
Character |
|
74 |
दार्शनिक |
दर्शन संबंधी |
Philosophical |
|
75 |
संवेदना |
भावना |
Sensitivity / Emotion |
|
76 |
आध्यात्मिक |
आत्मा संबंधी |
Spiritual |
|
77 |
परम |
सर्वोच्च |
Ultimate / Supreme |
|
78 |
साधना |
तपस्या |
Discipline / Practice |
|
79 |
अनंत |
जिसका अंत न हो |
Infinite |
|
80 |
दृश्य |
नज़ारा |
Scene / Sight |
|
81 |
मनोविज्ञान |
मन का विज्ञान |
Psychology |
|
82 |
जटिल |
मुश्किल |
Complex / Intricate |
|
83 |
समर्पण |
खुद को सौंपना |
Surrender / Dedication |
|
84 |
विरह |
बिछड़ना |
Separation |
|
85 |
स्थूल |
बाहरी, मोटा |
Gross / Physical |
|
86 |
अलौकिक |
जो इस दुनिया का न हो |
Supernatural / Divine |
|
87 |
अंतर्मन |
भीतरी मन |
Subconscious / Inner self |
|
88 |
पलायन |
भागना |
Escape / Departure |
|
89 |
अपराधबोध |
अपनी गलती का अहसास |
Guilt |
|
90 |
अस्तित्व |
वजूद |
Existence |
|
91 |
प्रतीक |
चिह्न |
Symbol |
|
92 |
विरक्ति |
वैराग्य |
Detachment |
|
93 |
सांसारिक |
दुनियादारी |
Mundane / Worldly |
|
94 |
सुचिता |
पवित्रता |
Purity |
|
95 |
उन्माद |
पागलपन |
Mania / Frenzy |
|
96 |
मौन |
चुप |
Silent |
|
97 |
लज्जित |
शर्मिंदा |
Ashamed |
|
98 |
अहंकार |
घमंड |
Ego / Pride |
|
99 |
रिक्त |
खाली |
Empty |
|
100 |
विसर्जन |
त्यागना |
Immersion / Giving up |
|
101 |
आभास |
अहसास |
Glimpse / Inkling |
|
102 |
चेतना |
होश |
Consciousness |
|
103 |
प्रेक्षक |
देखने वाला |
Observer |
|
104 |
जिज्ञासा |
जानने की इच्छा |
Curiosity |
|
105 |
सहानुभूति |
दया |
Sympathy |
|
106 |
रूढ़िवादी |
पुरानी सोच वाला |
Orthodox |
|
107 |
समझौता |
मेल-जोल |
Compromise |
|
108 |
नश्वर |
जो मिट जाए |
Perishable |
|
109 |
अमर |
जो न मिटे |
Immortal |
|
110 |
व्याकुलता |
बेचैनी |
Anxiety |
|
111 |
विद्रोही |
बगावत करने वाला |
Rebel |
|
112 |
मर्म |
रहस्य, दिल की बात |
Secret / Core |
|
113 |
करुणा |
दया |
Compassion |
|
114 |
निष्ठुर |
निर्दयी |
Cruel / Heartless |
|
115 |
विडंबना |
अजीब स्थिति |
Irony |
|
116 |
कचोट |
चुभन |
Prick / Remorse |
|
117 |
आत्मग्लानी |
खुद पर शर्म |
Self-reproach |
|
118 |
तपस्या |
साधना |
Penance |
|
119 |
स्वार्थ |
अपना फायदा |
Selfishness |
|
120 |
पवित्रता |
पाकीज़गी |
Holiness |
|
121 |
लोक |
संसार |
World |
|
122 |
परलोक |
दूसरी दुनिया |
Afterworld |
|
123 |
भ्रम |
धोखा |
Illusion |
|
124 |
कौतूहल |
हैरानी |
Curiosity / Wonder |
|
125 |
दृष्टि |
नज़र |
Vision / Sight |
|
126 |
विस्मृति |
भूल जाना |
Oblivion |
|
127 |
उल्लास |
खुशी |
Exultation |
|
128 |
विषाद |
गहरा दुःख |
Despair / Melancholy |
|
129 |
सांत्वना |
तसल्ली |
Consolation |
|
130 |
धैर्य |
सब्र |
Patience |
|
131 |
संकल्प |
पक्का इरादा |
Resolution |
|
132 |
अविचल |
जो न हिले |
Steady / Unwavering |
|
133 |
मनसूबा |
इरादा |
Intention |
|
134 |
उदारता |
बड़ा दिल |
Generosity |
|
135 |
संकीर्ण |
छोटी सोच |
Narrow / Petty |
|
136 |
मृगतृष्णा |
भ्रम |
Mirage |
|
137 |
अंत्येष्टि |
अंतिम संस्कार |
Last rites |
|
138 |
अश्रु |
आँसू |
Tears |
|
139 |
उच्छ्वास |
लंबी साँस |
Sigh |
|
140 |
स्तब्ध |
हैरान |
Stunned |
|
141 |
विह्वल |
व्याकुल |
Overwhelmed |
|
142 |
तन्मयता |
गहराई से जुड़ना |
Absorbedness |
|
143 |
अडिग |
स्थिर |
Firm |
|
144 |
यथार्थ |
सच |
Reality |
|
145 |
कल्पना |
सोच |
Imagination |
|
146 |
आकांक्षा |
इच्छा |
Aspiration |
|
147 |
मर्यादा |
सीमा |
Dignity / Limit |
|
148 |
कलंक |
दाग |
Stigma / Blemish |
|
149 |
निर्मल |
साफ़ |
Pure / Clean |
|
150 |
गंभीर |
गहरा |
Serious / Grave |
‘जाह्नवी’ दीर्घ उत्तरीय प्रश्न और उत्तर
1. जाह्नवी हर सुबह कौओं को रोटियाँ क्यों खिलाती थी? इसका प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?
उत्तर – जाह्नवी का कौओं को रोटियाँ खिलाना उसके गहरे विरह और आत्म-समर्पण का प्रतीक है। वह कौओं को अपना शरीर “नुचवाने” के लिए आमंत्रित करती है, जो इस बात का संकेत है कि वह अपने अस्तित्व को मिटा देना चाहती है। वह प्रसिद्ध सूफी पंक्तियों के माध्यम से कौओं से प्रार्थना करती है कि वे उसके शरीर का सारा मांस खा लें, पर उसकी आँखों को छोड़ दें। प्रतीकात्मक रूप से, यह दर्शाता है कि उसका शरीर नश्वर है और वह उसे कष्टों को सौंपने को तैयार है, लेकिन उसकी आँखों में अभी भी अपने प्रिय ‘पीउ’ से मिलने की ‘आस’ जीवित है।
2. जाह्नवी द्वारा ब्रजनंदन को लिखे गए पत्र की मुख्य बातें क्या थीं?
उत्तर – जाह्नवी ने पत्र में अत्यंत ईमानदारी और स्पष्टता से अपनी मानसिक स्थिति व्यक्त की थी। उसने लिखा कि वह विवाह जैसे पवित्र अनुष्ठान के योग्य स्वयं को नहीं मानती और उसे इस बात में संदेह है कि वह एक आदर्श जीवन-संगिनी बन पाएगी। उसने ब्रजनंदन को निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता दी कि यदि वह चाहे तो विवाह कर सकता है, और वह उसकी आज्ञा का पालन करेगी। लेकिन, उसने यह भी निवेदन किया कि यदि ब्रजनंदन इस रिश्ते को छोड़ दे, तो वह उसकी अधिक आभारी होगी। यह पत्र उसके आंतरिक द्वंद्व और नैतिकता को दर्शाता है।
3. जाह्नवी के पत्र का ब्रजनंदन (बिरजू) के व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर – जाह्नवी के पत्र ने ब्रजनंदन के पूरे व्यक्तित्व को बदल दिया। वह पहले एक आधुनिक, ठाठ-बाट वाला और अहंकारी युवक था जो खुद को ‘विजेता’ समझता था। पत्र की सच्चाई और जाह्नवी के त्याग को देखकर उसका अहंकार चूर-चूर हो गया। वह अब सादा जीवन जीने लगा, कम बोलने लगा और उसमें एक प्रकार की विनयशीलता (Humility) आ गई। उसने किसी और से विवाह नहीं किया और जाह्नवी के उस पत्र को हमेशा अपने पास रखा। जाह्नवी के मौन प्रेम और सत्य ने उसे एक परिपक्व और संवेदनशील इंसान बना दिया।
4. लेखक की पत्नी जाह्नवी के प्रति क्या दृष्टिकोण रखती थी? क्या वह उचित था?
उत्तर – लेखक की पत्नी समाज के संकीर्ण और रूढ़िवादी दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करती है। उसे जाह्नवी के व्यवहार में ‘कालिख’ और ‘आशनाई’ (प्रेम-प्रसंग) की गंध आती थी। वह मानती थी कि जाह्नवी का चरित्र संदेहास्पद है और अच्छा हुआ कि बिरजू की शादी उससे नहीं हुई। यह दृष्टिकोण पूरी तरह उचित नहीं था क्योंकि वह जाह्नवी की आध्यात्मिक गहराई और उसके विरह की पवित्रता को नहीं समझ सकी। वह केवल बाहरी सामाजिक मानदंडों से उसे आंक रही थी, जबकि जाह्नवी का संघर्ष उसके अंतर्मन का था जिसे लेखक की पत्नी नहीं पहचान पाई।
5. कहानी के शीर्षक ‘जाह्नवी’ की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – ‘जाह्नवी’ गंगा का दूसरा नाम है, जो पवित्रता और निरंतरता का प्रतीक है। कहानी का शीर्षक पूरी तरह सार्थक है क्योंकि जाह्नवी का चरित्र भी गंगा की तरह ही पवित्र और समर्पित है। वह अपने प्रेम और प्रतीक्षा में इतनी शुद्ध है कि वह अपने शरीर तक का मोह छोड़ देती है। पूरी कहानी उसके रहस्यमयी व्यक्तित्व, उसके त्याग और उसके मानसिक प्रवास के इर्द-गिर्द घूमती है। वह एक ऐसी पात्रा है जो समाज के कीचड़ के बीच रहकर भी अपनी आंतरिक पवित्रता को बनाए रखती है, इसलिए यह नाम उसके व्यक्तित्व को गहराई देता है।
6. जाह्नवी के गीत “कागा चुन-चुन खाइयो” का आध्यात्मिक पक्ष क्या है?
उत्तर – यह गीत अमीर खुसरो की सूफी परंपरा से प्रेरित है। इसका आध्यात्मिक पक्ष यह है कि प्रेमी स्वयं को पूर्णतः रिक्त (Empty) करना चाहता है। जाह्नवी का कौओं को अपना मांस खिलाने की अनुमति देना सांसारिक मोह के त्याग को दर्शाता है। वह मानती है कि यह शरीर केवल मिट्टी है, लेकिन उसकी आँखें ‘दर्शन’ की प्यासी हैं। यह गीत दर्शाता है कि मृत्यु या विनाश शरीर का हो सकता है, परंतु प्रिय से मिलन की ‘आत्मा की प्यास’ अविनाशी है। यह लौकिक प्रेम का अलौकिक या ईश्वरीय प्रेम में रूपांतरण है।
7. लेखक (कथावाचक) ने जाह्नवी को एक ‘रहस्य’ के रूप में क्यों प्रस्तुत किया है?
उत्तर – लेखक जाह्नवी को दूर से एक प्रेक्षक (Observer) की तरह देखता है। उसके लिए जाह्नवी का व्यवहार—हर सुबह कौओं के बीच घिरना, विरह के गीत गाना और छत पर अकेले डोलना—सामान्य मानवीय व्यवहार से परे है। लेखक को उसके मौन और उसकी थिर दृष्टि में एक अनकही पीड़ा और गहरा दर्शन दिखाई देता है। वह जाह्नवी के अतीत और भविष्य के बीच की कड़ियों को पूरी तरह नहीं जोड़ पाता, जिससे उसका चरित्र एक रहस्यमयी पहेली जैसा बन जाता है। लेखक की जिज्ञासा पाठक को भी उसके मनोविज्ञान की गहराइयों में ले जाती है।
8. जाह्नवी की मौन साधना और सामाजिक उपेक्षा के बीच क्या संबंध है?
उत्तर – जाह्नवी की मौन साधना उसकी सामाजिक उपेक्षा का ही परिणाम और प्रतिवाद है। जब समाज (विशेषकर लेखक की पत्नी जैसे लोग) उसे ‘चरित्रहीन’ या ‘विचित्र’ मानकर उसका तिरस्कार करता है, तो वह और अधिक अपने एकांत में सिमट जाती है। उसकी छत उसके लिए एक मंदिर बन जाती है जहाँ वह कौओं के माध्यम से अपनी संवेदनाएं व्यक्त करती है। सामाजिक अलगाव ने उसे आत्म-चिंतन और विरह की उस अवस्था में पहुँचा दिया जहाँ उसे अब किसी के समर्थन की आवश्यकता नहीं रही। वह समाज की उपेक्षा को अपनी साधना की शक्ति बना लेती है।
9. क्या जाह्नवी का चरित्र ‘पागलपन’ का शिकार है? मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें।
उत्तर – मनोवैज्ञानिक दृष्टि से जाह्नवी का व्यवहार सामान्य नहीं है, लेकिन इसे केवल ‘पागलपन’ कहना गलत होगा। वह ‘मेलेनकोलिया’ (गहरा अवसाद) या ‘आत्म-पीड़न’ (Self-mortification) की स्थिति में हो सकती है, जहाँ व्यक्ति अपने दुख को शारीरिक कष्ट के माध्यम से कम करने का प्रयास करता है। लेकिन जैनेन्द्र कुमार ने उसे एक ‘साधक’ के रूप में दिखाया है। उसका व्यवहार उसके टूटे हुए सपनों और दमित इच्छाओं की एक प्रतिक्रिया है। वह विक्षिप्त नहीं है, बल्कि वह उस मानसिक स्तर पर है जहाँ सांसारिक वास्तविकताएं उसके लिए अर्थहीन हो चुकी हैं।
10. कहानी ‘जाह्नवी’ हमें जीवन और प्रेम के बारे में क्या संदेश देती है?
उत्तर – यह कहानी संदेश देती है कि प्रेम केवल अधिकार या मिलन का नाम नहीं है, बल्कि यह स्वयं को विसर्जित (Dissolve) कर देने की प्रक्रिया है। सच्चा प्रेम व्यक्ति को आंतरिक रूप से इतना ईमानदार बना देता है कि वह किसी को धोखे में रखकर अपना घर नहीं बसाना चाहता। कहानी सिखाती है कि भौतिक सुख और ठाठ-बाट अस्थायी हैं, जबकि सत्य और त्याग व्यक्ति के चरित्र को महान बनाते हैं। अंततः, यह कहानी ‘आशा’ (Hope) की महिमा गाती है, जो मनुष्य को विषम परिस्थितियों में भी जीवित रहने की प्रेरणा देती है।
‘जाह्नवी’ महत्त्वपूर्ण अंशों की ससंदर्भ व्याख्या
- विरह और आत्म-समर्पण का प्रतीक
“वे लड़की के चारों ओर ऐसे छा रहे थे मानो वे प्रेम से उसको ही खाने को उद्यत हों। और लड़की कभी इधर कभी उधर झुककर घूमती हुई ऐसे लीन भाव से गा रही थी कि जाने क्या मिल रहा हो।”
- संदर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ जैनेन्द्र कुमार द्वारा रचित मनोवैज्ञानिक कहानी ‘जाह्नवी’ से ली गई हैं।
- प्रसंग – लेखक द्वारा छत पर जाह्नवी को कौओं के बीच घिरा हुआ देखने का वर्णन है।
- व्याख्या – लेखक कहता है कि कौए जाह्नवी को चारों ओर से इस तरह घेरे हुए थे जैसे वे उसके शरीर को नोचकर खाना चाहते हों। लेकिन जाह्नवी डरी हुई नहीं थी, बल्कि वह एक दिव्य आनंद (Extasy) में डूबी हुई थी। वह जिस एकाग्रता और तन्मयता से गा रही थी, उससे ऐसा प्रतीत होता था कि उसे इस ‘आत्म-विसर्जन’ में कोई अलौकिक सुख मिल रहा है। यह दृश्य जाह्नवी के उस मानसिक स्तर को दिखाता है जहाँ वह स्वयं को पूरी तरह मिटा देने में ही सार्थकता समझती है।
- ‘आस’ की अमरता (गीत की व्याख्या)
“दो नैना मत खाइयो, मत खाइयो… पीउ मिलन की आस।”
- संदर्भ – पूर्ववत्।
- प्रसंग – जाह्नवी द्वारा कौओं से की गई मार्मिक प्रार्थना।
- व्याख्या – जाह्नवी सूफी संत अमीर खुसरो की प्रसिद्ध पंक्तियों के माध्यम से कौओं से कहती है कि वे चाहे तो उसके शरीर का सारा मांस (अस्तित्व) खा लें, लेकिन उसकी आँखों को न छुएँ। इसका गहरा दार्शनिक अर्थ यह है कि शरीर नश्वर है और दुखों के कारण जर्जर हो सकता है, लेकिन आँखों में अपने प्रिय (पीउ) के आने की जो ‘आशा’ (Hope) है, वह अविनाशी है। जब तक आँखें सुरक्षित हैं, तब तक मिलन की संभावना जीवित है। यह ‘आस’ ही जाह्नवी के जीवन का एकमात्र आधार है।
- जाह्नवी की आंतरिक पवित्रता और सत्य
“विवाह जैसे धार्मिक अनुष्ठान की पात्रता मुझमें नहीं है। एक अनुगता आपको विवाह द्वारा मिलनी चाहिए… पर निवेदन है कि यदि आप मुझ पर से अपनी माँग उठा लेंगे, मुझे छोड़ देंगे तो भी मैं कृतज्ञ होऊँगी।”
- संदर्भ – पूर्ववत्।
- प्रसंग – जाह्नवी द्वारा ब्रजनंदन (बिरजू) को लिखे गए पत्र का अंश।
- व्याख्या – जाह्नवी यहाँ अपनी अत्यधिक ईमानदारी का परिचय देती है। वह नहीं चाहती कि वह किसी को धोखे में रखकर विवाह करे। वह मानती है कि उसका हृदय अब किसी सांसारिक बंधन के योग्य नहीं रहा। वह बिरजू को विकल्प देती है कि यदि वह उसे त्याग दे, तो वह उसकी आभारी रहेगी। यह अंश जाह्नवी के ‘स्व’ के प्रति ईमानदारी और उसके चरित्र की उच्चता को दिखाता है कि वह सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए असत्य का सहारा नहीं लेती।
- अहंकार का विसर्जन (बिरजू का परिवर्तन)
“ब्रजनंदन एकाएक पहचाना भी न जाता था। पहले विजेता बनना चाहता था, अब विनयावनत दिखता है और आवश्यकता से अधिक बात नहीं करता।”
- संदर्भ – पूर्ववत्।
- प्रसंग – जाह्नवी के पत्र के बाद ब्रजनंदन (बिरजू) के बदले हुए व्यक्तित्व का वर्णन।
- व्याख्या – जाह्नवी की निश्छलता और उसके रहस्यमयी त्याग ने बिरजू के भीतर के ‘अहंकारी पुरुष’ को मार दिया। पहले जो बिरजू दुनिया को जीतना चाहता था और अपनी सुख-सुविधाओं पर गर्व करता था, वह अब पूरी तरह विनम्र और शांत हो गया है। लेखक यहाँ यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि जब मनुष्य किसी महान त्याग या सत्य के संपर्क में आता है, तो उसका व्यक्तिगत अहंकार स्वतः ही समाप्त हो जाता है। बिरजू का सादापन जाह्नवी के मौन प्रेम का प्रभाव है।
- समाज की संकीर्ण दृष्टि (व्यंग्य)
“राम-राम, भीतर पेट में कैसी कालिख रक्खे हैं, मुझे पता न था। चलो, आखिर परमात्मा ने इज्जत बचा ली। वह लड़की घर में आ जाती तो मेरा मुँह अब दिखने लायक रहता?”
- संदर्भ – पूर्ववत्।
- प्रसंग – लेखक की पत्नी द्वारा जाह्नवी के चरित्र पर संदेह और कड़वाहट व्यक्त करना।
- व्याख्या – लेखक की पत्नी उस समाज का प्रतीक है जो केवल बाहरी दिखावे और लोक-लाज को महत्त्व देता है। वह जाह्नवी की आंतरिक पीड़ा और उसकी सच्चाई को ‘कालिख’ (अपमान) समझती है। उसे खुशी है कि उसका घर ‘अपवित्र’ होने से बच गया। यह अंश समाज के उस दोहरे मानदंड पर चोट करता है जो किसी व्यक्ति की मानसिक या आध्यात्मिक स्थिति को समझने के बजाय उसे केवल चरित्रहीनता के चश्मे से देखता है।
- विरह की भौतिक और आध्यात्मिक अवस्था
“सबेरे-सबेरे इतने कौए बुला लेती है कि खुद दिखती ही नहीं, काले-काले-वे-ही-वे दिखते हैं।”
- संदर्भ – पूर्ववत्।
- प्रसंग – जाह्नवी का कौओं के साथ पूरी तरह एक हो जाने का चित्रण।
- व्याख्या – यहाँ कौओं का काला रंग दुःख, कष्ट और विनाश का प्रतीक है। जाह्नवी इन कौओं (कष्टों) के बीच इस कदर खो गई है कि उसका अपना पृथक अस्तित्व समाप्त होता जा रहा है। वह अपनी पीड़ा के साथ एकाकार हो चुकी है। यह मनोवैज्ञानिक स्थिति ‘डिप्रेशन’ की भी हो सकती है और ‘उच्चतम साधना’ की भी, जहाँ साधक (जाह्नवी) और साध्य (उसकी पीड़ा) के बीच का अंतर मिट जाता है।

